आप सामाजिक रूप से कितने जागरूक हैं? इन प्रश्नों द्वारा जरा जाँच करें… … Are You Socially Alert and Active?
कहा जाता है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है, अर्थात यदि “समाज” न होता तो मनुष्य भी सचमुच में एक “प्राणी” ही होता। चूंकि मनुष्य समाज में रहता है तो उसने महानगर, शहर, गाँव, कालोनियाँ, गलियाँ, मोहल्ले आदि बनाये हैं। आज जबकि टीवी, कामों की व्यस्तता आदि की वजह से व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित और परिवार केन्द्रित होता जा रहा है ऐसे में उसे याद दिलाने की आवश्यकता है कि वह एक “सामाजिक प्राणी” है। समाज में रहने पर जहाँ एक तरफ़ व्यक्तियों को एक-दूसरे के सहारे और मनोवैज्ञानिक आधार की आवश्यकता होती है, वहीं दूसरी तरफ़, किसी भी सामाजिक, प्राकृतिक, राजनैतिक आपदा के समय आपस में मिलकर ही उसका समाधान देखना होता है। मैं नीचे एक लिस्ट दे रहा हूं उसे चेक करके बतायें कि इसके अनुसार आप कितने “सामाजिक” हैं?
1) आप अपने बिल्डिंग/गली/मोहल्ले/सोसायटी में रहने वाले कितने व्यक्तियों को चेहरे से, कितनों को नाम से जानते हैं? उनमें से कितनों के बारे में यह जानते हैं कि वह क्या काम करता है?
2) जिन्हें आप व्यक्तिगत रूप से जानते हैं, उनके घर वर्ष में कितनी बार गये हैं?
3) आपकी कालोनी में हुई कितनी शादियों / अर्थियों में आप कितनी बार गये हैं? कितनी बार आप होली-दीवाली के अलावा भी पड़ोसियों से बात करते, मिलते हैं?
4) आप अपनी कालोनी/सोसायटी की किसी मीटिंग अथवा समिति में कितनी बार गये है? क्या आप किसी सामाजिक-सांस्कृतिक संस्था से जुड़े हुए हैं? और उसकी गतिविधियों में माह में कितनी बार जाते हैं?
5) क्या आप अपने इलाके के पार्षद (Corporator), विधायक, सांसद को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं? उनके फ़ोन नम्बर या पता आपको मालूम है? अपने इलाके के राजनैतिक कार्यकर्ताओं-मवालियों-गुण्डों को आप पहचानते हैं या नहीं?
6) क्या आप जानते हैं कि आपके मोहल्ले-गली-वार्ड का बिजली कनेक्शन किस ट्रांसफ़ार्मर से है? आप अपने इलाके के बिजली विभाग के बारे में उनके फ़ोन नम्बर के अलावा और क्या जानते हैं?
7) क्या आप जानते हैं कि आपके इलाके-मोहल्ले-गली-सड़क को पानी की सप्लाई कहाँ से होती है? क्या कभी आपने मोहल्ले की पानी की पाइप लाइन की संरचना पर ध्यान दिया है?
8) क्या आप कॉलोनी की सीवर लाइन के बारे में जानकारी रखते हैं, कि वह कहाँ से गई है, कहाँ-किस नाले में जाकर मिलती है, कहाँ उसके चोक होने की सम्भावना है… आदि-आदि?
9) आपके मोहल्ले में अमूमन लगातार वर्षों तक घूमने वाले अखबार हॉकर, ब्रेड वाले, दूध वाले, टेलीफ़ोन कर्मी, बिजलीकर्मी, नलकर्मी, ऑटो रिक्शा वाले आदि में से आप कितनों को चेहरा देखकर पहचान सकते हैं?
10) जिस सड़क-गली-मोहल्ले से आप रोज़ाना दफ़्तर-बाज़ार आदि के लिये गुजरते हैं क्या आप उस पर चल रही किसी “असामान्य गतिविधि” का नोटिस लेते हैं? क्या आपने कभी अवैध मन्दिर-दरगाह या अतिक्रमण करके बनाई गई गुमटियों-ठेलों-दुकानों-मकानों पर ध्यान दिया है?
हो सकता है कि आपको ये सवाल अजीब लगें, और ये भी हो सकता है कि इनमें से अधिकतर के जवाब नकारात्मक ही निकलें। सामान्य तौर पर इसका कारण (बहाना) यह बताया जाता है कि “मैं तो बहुत व्यस्त रहता हूं… ऐसी छोटी-मोटी बातों पर मैं ध्यान नहीं देता…”, “फ़ुर्सत किसके पास है यार?”, “पड़ोसी/मोहल्ले वाले भी बहुत बिजी हैं”… इत्यादि। लेकिन यह तमाम जानकारियाँ “सामाजिक जागरुकता” के तहत आती हैं, जिनकी जानकारी सामान्य तौर पर "थोड़ी या ज्यादा", प्रत्येक व्यक्ति को होनी ही चाहिये… क्योंकि “बुरा समय” कहकर नहीं आता, कहीं ऐसा न हो कि खतरा आपके चारों ओर मंडरा रहा हो और आप अपने घर में टीवी ही देखते रह जायें…।
कुछ लोग इसे “अनावश्यक ताका-झाँकी” कहते हैं, लेकिन मैं इसे जागरुकता कहता हूं जो कि “आड़े वक्त” पर कभी भी काम आती है, (जैसे कि गत वर्ष उज्जैन में भीषणतम जल संकट के समय मेरे भी काम आई थी, इन्हीं जानकारियों की वजह से मुझे पता था कि पानी की पाइप लाइन किस जगह पर है, कौन-कौन व्यक्ति कहाँ से पानी की चोरी कर रहा है, किसके यहाँ बोरिंग है, किसके यहाँ कुँआ है, पानी के टैंकर से जल वितरण की व्यवस्था क्या होगी, आदि-आदि। इसी प्रकार 1992 के दंगों के दौरान कर्फ़्यू में जब हमारे मित्र अनीस अहमद के फ़ोन पर हम उसे दंगाईयों से बचाने जा रहे थे, तब मुझे यह पक्का पता था कि किस गली से निकल जाने पर हमें पुलिस के डण्डे या छतों से पत्थर नहीं पड़ेंगे…)
तात्पर्य यह कि कोई भी आपदा कभी भी आ सकती है, आपके पास ज़मीनी जानकारी होना बहुत जरूरी है…
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चलते-चलते एक अन्तिम, लेकिन “अ-सामाजिक” सवाल – क्या आपके घर में कोई हथियार है? हथियार न सही, लठ्ठ, लोहे का सरिया अथवा बेसबॉल का बैट जैसा कम घातक ही सही? यदि नहीं, तो मोहल्ले/सोसायटी के ऐसे कितने घरों/लोगों को आप जानते हैं, जिनके पास किसी भी प्रकार का हथियार हैं? (आज के माहौल में यह भी एक “आवश्यक वस्तु अधिनियम” के तहत आने वाली चीज़ बन गई है…)
अब स्कोर की बारी - यदि ऊपर दी गई 10 प्रश्नावली में से 7-8 पर आपका उत्तर "हाँ" है तो आप निश्चित रूप से "जागरुक" की श्रेणी में आते हैं, यदि आपके उत्तर 4-5 के लिये ही "हाँ" हैं, तब आपको और अधिक जानकारी एकत्रित करने की आवश्यकता है, और यदि आपका जवाब सिर्फ़ 1 या 2 के लिये ही "हाँ" है, तब इसका मतलब है कि आप निहायत "गैर-सामाजिक" और "खुदगर्ज़" किस्म के इंसान हैं…
बहरहाल, अब भी समय है… इन प्रश्नों की कसौटी पर यदि आप खुद को “सामाजिक रूप से” जागरुक नहीं पाते हैं, तो घर से बाहर निकलिये, आँखें-कान खुले रखिये, दिमाग चौकस रखिये… किसी भी प्राकृतिक-राजनैतिक-सामाजिक दुर्घटना के समय आपका भाई आपको बचाने बाद में आयेगा, पड़ोसी ही पहले काम आयेगा… सामाजिक रूप से घुलनशील और जागरुक नहीं होंगे तो किसी मुसीबत के समय आप खुद को औरों से अधिक मुश्किल में पायेंगे…



47 comments:
सौ में सौ !!! झंकझोर दिया... वर्तमान के सामाजिक प्रदृश्य में इस तरह के प्रश्न पत्र में शायेद ही कोई पास हो पाए.
स्वच्छ सन्देश है बदलाव की और ज्यादा जानने के लिए पधारे मेरे ब्लॉग पर
bahut badhiya ji
in jaankariyo ke liye dhanyawaad
"व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित और परिवार केन्द्रित होता जा रहा है .."
और इस परिवार में सिर्फ अपने ही बीबी-बच्चे आते हैं, चाचा-चाची, भतीजे-भतीजियों आदि को तो छोड़िये, माता पिता भी नहीं।
१९४७ तक भी अपने देश मैं शेर पैदा होते थे ,अब भारत में शेर नहीं सियार पैदा होते हैं |वो सियार जो सिर्फ चालाकी जानता है,जो सिर्फ अपने परिवार तक ही सिमित रहता है और सामाजिक बिलकुल भी नहीं है |वर्षों से अंग्रज़ सियारों के साथ रहते -२ व् अब १९४७ के बाद अंग्रजियत में जीने व् अंग्रजों के लिखे गए इतिहास को पढ़ कर या तो सिर्फ सियार बनते हैं या रखवाली करने वाले कुत्ते |
अब आवस्यकता है ऐसे किसी भारत में शासन की जो हमें हमारा प्रितिबिम्ब दिखाए ,और हमारे सिंह को जगाये |तब हम सामाजिक बनेगें |
माशा अल्लाह क्या खूब सवाल रखे हैं, हमें विचार करना पडेगा, बेहद उमदा जानकारी है, लग तो यही रहा फेल हो जायेंगे, ब्लागर भाईयों का भी कोई सवाल रख लेते जैसे किस ब्लागर को किस-किस नाम से जाना जाता है, कौन केवल नाम की लडकी है असल में लडका है आदि
एक एक प्रश्न ज्वलंत हैं
बहुत ही बढ़िया पोस्ट
इसका असर हर पढने वाले पर हो
तो बात बनेगी
सुरेश जी आपने लेख के अंत में एक चेतावनी भी लगानी थी कि असामाजिक तत्व कृपया टिपण्णी न दे ! :)
सादर वन्दे
10/9 ये मेरा स्कोर है !
व्यक्ति के सामाजिक होने के ये आधार विन्दु हैं बाकी बातें इसके बाद आती है! बहुत ही सार्थक पोस्ट |
साथ ही साथ गोदियाल जी से सहमत!
रत्नेश त्रिपाठी
2/10 बहुत बुरी हालत है मेरी। घनघोर असामाजिक हूं। अलबत्ता मौक़ा पड़ने पर कुछ मदद ली और दी भी है। आवश्यक वस्तु भी नहीं है।
प्रेरणादायी पोस्ट। विश्वास दिलाता हूं कि ठीक करूंगा। वैसे इस पोस्ट का शीर्षक ऐसा भी कर सकते हैं।
थोड़ा-सा सामाजिक हो जाएं।
सुरेश जी समाज आदमी के लिए बनाया गया है, जरूरी नहीं की आदमी खुद को समाज से जोड़े ही. और हाँ बात रही खुदगर्जी की, तो ये पूरी दुनिया हर इंसान की उतनी ही है जितनी की आप की . और अगर वो आपके हिस्से की ज़िन्दगी आपसे नहीं ले सकता , तो आपके पास कोई हक़ नहीं है, उसे पर कोई टैग लगाने का , मेरे हिसाब से तो दुनिया उस दिन अपने चरम पर होगी जब इंसान वाकई में अपनी ज़िन्दगी जियेगा, मेरा सारा प्रयोजन ही भीड़ को तोड़ने में है , जिस दिन वो ऐसा होगा , हमे कोई जरुरत नहीं रहेगी किसी समाज को सँभालने की . समाज तो था ही इसीलिए क्योंकि इंसान खुद को सँभालने में असमर्थ है.
I am not in oppose for you. But I am in oppose of the tags you put on the people of the other side. A human being is more than being civilised.
सामाजिक रूप से घुलनशील और जागरुक नहीं होंगे तो किसी मुसीबत के समय आप खुद को औरों से अधिक मुश्किल में पायेंगे…
परम आवश्यक बातें !!
(10) नंबर वाली बात पर मैंने बहुत ध्यान दिया है. ये अक्सर होते हैं छोटे बड़े कसबे, जिला मुख्यालय में, बाज़ार में देखे जा सकते हैं... आगे चलकर बहुत से विवाद यहीं से शुरू होते हैं.
सभी बाते महत्वपूर्ण है, सबके फायदे की पोस्ट है ये.
@ Mohit Singh जी
समाज में असामाजिक तत्व तभी पनपते हैं, जब लोग सामाजिक और जागरूक नहीं रहते हैं. समाज तब ही सुरक्षित है जब आप "परिवार, खानदान और मोहल्ले" सभी में दिलचस्पी लेते हैं. कम ही सही मगर भागीदारी तो होनी ही चाहिए.
सुरेश जी, आज व्यक्ति केवल आत्मकेन्द्रित है याने व्यक्तिवाद या केरियरवाद का शिकार। परिवार केन्द्रित व्यवस्था को तो तोड़ने पर तुला है। यदि वह परिवार केन्द्रित होता तो आपको ये सारे प्रश्न करने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती। हम तो छोटे शहर वाले हैं इसलिए अभी तक सामाजिक प्राणी बने हुए हैं। परिवार केन्द्रित होने पर स्वत: ही समाज केन्द्रित होता और फिर राष्ट्र केन्द्रित।
Mudde ki bat hai , maja aa gaya aur to aur apne sochane par majboor kar diya. Log to bevajah Hindu aur Mushlim Mudee ki liye ghoom rahe hain.
बहुत लंबे अंतराल के पश्चात आप का आपकी वर्तमान लीक से ह्टकर लिखा गया Topic देखकर बहुत अच्छा लगा.
आपने एक बहुत ही अच्छे विषय पर प्रकाश डाला है.
वास्तव में आपके लेख में उठाये गये प्रश्नों के उत्तर अधिकांश लोगों द्वारा नकारार्थी ही होंगे.
एक प्रेरणादायी लेख लिखने के लिये धन्यवाद..
इसी तरह विचारोत्तेजक लेखों की आप से अपेक्षा है.
हमेशा की तरह विचारोत्तोजक पोस्ट
मेरा स्कोर तो बहुत कम है
क्या करूं?
"व्यक्ति धीरे-धीरे आत्मकेन्द्रित और परिवार केन्द्रित होता जा रहा है .."
सहमति
आधे नम्बर का पात्र हूं लेकिन इसे जल्दी ही बढ़ाऊंगा..
आज का लेख अच्छा और कुछ हटकर लगा
लेकिन है तो सामाजिक चेतना के लिये ही
इसी प्रकार 1992 के दंगों के दौरान कर्फ़्यू में जब हमारे मित्र अनीस अहमद के फ़ोन पर हम उसे दंगाईयों से बचाने जा रहे थे, तब मुझे यह पक्का पता था कि किस गली से निकल जाने पर हमें पुलिस के डण्डे या छतों से पत्थर नहीं पड़ेंगे…
इसे बोल्ड करना था..
सुरेश जी,आपकी आज की पोस्ट वास्तविकता में गहन विचार के योग्य है!
सभी प्रश्न उत्तर कि राह में पाठक की और तक रहे है!लेकिन जवाब सब मन-मन में दे रहे है!
सवाल ही ऐसे है!आपके पिछले अनुभव की झलक भी देखने को मिली जो सच में प्रेरणादायी रही!
कुंवर जी,
ऒह हम तो किसी भी श्रेणी में नहीं आते एक और श्रेणी होनी चाहिये थी - "ढ़क्कन की" हम उसमें जरुर आते ।
किसके ब्लॉग में क्या हो रहा है ये बता सकते हैं पर किसके घर में क्या हो रहा है बहुत मुश्किल सवाल है। किसके ब्लॉग पर कैसे पहुँचा जा सकता है ये पता है पर किस गली से कहाँ पहुँचा ज सकता है ये नहीं पता है। :(
हम भी विवेक रस्तोगी जैसे है :)
एक प्रेरणादायी लेख लिखने के लिये धन्यवाद..
इसी तरह विचारोत्तेजक लेखों की आप से अपेक्षा है.
बहुत अच्छा विषय है...और लेख भी शानदार है...
अपने अच्छा उदाहरण भी दिया है-
इसी प्रकार 1992 के दंगों के दौरान कर्फ़्यू में जब हमारे मित्र अनीस अहमद के फ़ोन पर हम उसे दंगाईयों से बचाने जा रहे थे, तब मुझे यह पक्का पता था कि किस गली से निकल जाने पर हमें पुलिस के डण्डे या छतों से पत्थर नहीं पड़ेंगे…
जानकारी के फायदे तो होते ही हैं...
aapki is post ke poster ya pamphlets baante jaane chaahiye.
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ham jagenge - desh jagega
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maine bahut arsa pahle hindustan newspaper men ek lekh padha tha jismen likha tha-
"agar har koyi sirf do gharon (daayen aur baayen) ke baare men hi jankari rakhen to aatankvad aur crime men bahut had tak rok lag sakti hai."
बहुत ही अच्छी पोस्ट सुरेश भाऊ,
इतनी जानकारी तो मोहल्ले के रहवासी को
अवश्य होनी चाहिए।
लेकिन सब एक लोटा दूध वाली प्रवृति पाले बैठे हैं।
आभार
आईये... दो कदम हमारे साथ भी चलिए. आपको भी अच्छा लगेगा. तो चलिए न....
कुछ प्रश्नों को पुनर्संयोजित करने की आवश्यकता है ताकि 'हाँ' या 'नहीं' में ही उत्तर हो। भाव समझते हुए कहूँ तो मैं अर्ध रेखा पार कर सका - मतलब सुधार की आवश्यकता है।
वैसे आप को 200% अंक मिलने चाहिए। 'अपने आप में सिमट कर रहना' और 'चरम सुविधासक्ति' - ये दो मुख्य कारण हैं जिसके कारण उदासीनता एक कैंसर की तरह फैल चुकी है/रही है। आज ही एक रिटायर्ड दम्पति से बात हो रही थी..किसी के यहाँ बुलाने पर गए और बुलाने वाले सज्जन जरा सी बात पर भड़क कर यूँ चिल्लाने लगे कि दम्पति सहम कर वापस आ गए। ..तुनकमिजाजी भी बहुत बढ़ी है। शायद यह भी 'असामाजिक' होने के कारण ही हुआ है।
टीवी, इंटरनेट, मोबाइल वगैरह से भी दूरियाँ बढ़ी हैं - सोचने पर आश्चर्य सा होता है।
यह पोस्ट इस वर्ष मेरे द्वारा पढ़ी गई पोस्टों में सर्वश्रेष्ठ लगी।
लगभग १० मे १० . अन्त का सवाल जखीरा नही तो कम भी नही ३०,४० मार कर ही मरेंगे अगर मौका मिला .
प्रशनावली हल करने के बाद लगता है इस बार चुनाव लड ही लू
बहुत ही उपयोगी और आत्ममंथन को बाध्य करने वाला लेख. आज उच्च -मध्यमवर्गीय भारतीय जरूरत से ज्यादा आत्मकेंद्रित होता जा रहा है. इसी के कारण समाज में अराजकता और भ्रष्ट लोगो का राज कायम है. समय और संसाधन होने के बावजूद लोग सोये हुए हैं, यह दुखद स्थिती देश को रसातल में ले जायेगी. हमेशा की तरह अच्छे के लिए धन्यवाद.
पटना कि बात करें तो दस में दस, और अगर चेन्नई कि बात करें तो मामला दो-तीन से आगे नहीं जायेगा..
अब इसे किस कैटेगरी में रखेंगे? :)
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आदरणीय सुरेश जी,
हालांकि अपनी तारीफ खुद करना एक गलत बात है फिर भी सबको यह बताते हुऐ फख्र महसूस कर रहा हूँ कि काफी अच्छे अंकों से पास हूँ...
आभार इस जागरूक करती पोस्ट के लिेये...
समाज को दर्पण दिखा दिया ।
हमने सामाजिकता और असामाजिकता पर पोस्ट लिखी थी और आपने सवाल दाग दिए....बहुत खूब.
जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड
अभी समय है, सुधर जा अमर कुमार !
तेरे मरीज़ तेरा लहू पीने के लिये हैं, काम तो आख़िर पड़ोसी ही आयेंगे ।
यदि किसी पड़ोसी के घर में षोडशी बाला हो, तो बड़ी असमँजस हो जाती है ।
इसके लिये कुछ खास निर्देश देंगे, सुरेश भाई ?
I gladly announce that 'YES' i am quite social !
People love me and love the folk around .
Smiles !
people love me and i love the folk around ...(correction)
हाल ही में हमारे शहर की एक कालोनी में पूरा परिवार ज़हर खाकर मर गया. पड़ोसियों को दस दिन बाद खबर हुई!
किसी व्यक्ति विशेष की सामाजिकता को नापने के लिए आप का १० सूत्रीय पैमाना नाकाफी है. इस हिसाब से तो हमारे देश के सभी कर्णाधार को असामाजिक तत्व करार दिया जाना चाहिए. फिर भी पोस्ट अतम मंथन करने को प्ररित करती है
"आवश्यक वास्तु अधिनियम" को आज के परिवेश में परिभाषित करने के लिए में आप का नाम "भारत रतन" के लिए अनुमोदित करता हूँ.
हर सवाल.... बेमिसाल....
बहुत ही उम्दा पोस्ट....
जनोपयोगी, जानकारीपरक और आज के परिपेक्ष्य में आवश्यक पोस्ट के लिये धन्यवाद
यह पोस्ट भी जागरुकता की श्रेणी में ही आती है जी
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हम खुद को स्ट्रॉंगली असामाजिक फील कर रहे हैं। :(
जनाब हम तो खरे उतरे हैं अल्लाह का शुकर है
इतने अंक पाए कि न तो सामाजिक रहे न असामाजित. संतुलन सा दिखता है :)
सुन्दर पोस्ट. बहुत पसन्द आई.
suresh ji aap bahut acha likhte hai, per ek baat pasand nahi aati aapki, ki aap sabhi political partyo ke virodhi kyoun hai, sach kahoonga per sayad kadwa lage, a leader is power of some silent peoples. who can speek loudly, but if they silent peoples know how to speek, then only their is no need of leaders.
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