मोहम्मद साहब के इस आपत्तिजनक चित्रण का पुरज़ोर विरोध करें… (अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर भी अपनी राय रखें)... Oppose Denigration of Mohammed, Cartoons of Islamic Icons
हाल ही में एमएफ़ हुसैन द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के नग्न चित्र वाले मामले में “अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता”(?) के पक्षधर और “कलाकार की कला” के बारे में बहुत (कु)चर्चा हुई (कुचर्चा इसलिये क्योंकि उन चर्चाकारों की निगाह में डेनमार्क के कार्टूनिस्ट द्वारा बनाया गया रेखाचित्र “कला” की श्रेणी मे नहीं आता होगा)… बहरहाल, हाल ही में नेट-भ्रमण के दौरान एक वेबसाईट पर पैगम्बर मोहम्मद साहब का यह अश्लील चित्र दिखाई दिया। मेरी जानकारी के अनुसार यह चित्र 26 फ़रवरी के आसपास इस वेबसाईट पर अपलोड किया जा चुका है। (इससे पहले भी यह चित्र सितम्बर 2009 में एक वेबसाईट पर दिखाया जा चुका है, लेकिन आधा काटकर, जबकि साइंस ब्लॉग के नाम से चलाई जा रही साईट पर यह पूरा दिखाया गया है)। दिखाये गये विज्ञापन में बाकायदा “मोहम्मद” नाम दिया गया है तथा उनकी 23 पत्नियों और 6 वर्षीय पत्नी आयशा के बारे में लिखा गया है। समझ में नहीं आता कि ऐसा विकृत विज्ञापन बनाने के पीछे क्या मकसद है?
पहली वेबसाईट है (जिसमें चित्र आधा दिखाई दे रहा है)
और दूसरी वेबसाईट है जिसमें पूरा विज्ञापित चित्र दिख रहा है, साथ ही एक और चित्र भी दिख रहा है, जिसमें एक व्यक्ति की पगड़ी में अरबी में कुछ आयतें लिखी हैं, यह कैसी अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता है?
चूंकि मेरा तकनीकी ज्ञान कम है इसलिये यह बताना मेरे लिये मुश्किल है कि यह चित्र वाकई में है या जानबूझकर शरारतपूर्ण ढंग से मुस्लिम भाईयों को उकसाने के इरादे से “डिज़ाइन” किया गया है, लेकिन इस आपत्तिजनक चित्र पर “मेड इन डेनमार्क” लिखा हुआ है तथा सेक्स खिलौना या जो कुछ भी यह है, बेहद घटिया और बेहूदा है, जिसका पुरज़ोर विरोध किया जाना चाहिये। मैं सभी पाठकों (खासकर तकनीकी और कानूनी जानकार) और मुस्लिम भाईयों से अनुरोध करता हूं कि “साइंस ब्लॉग” के नाम से चलाई जा रही इस वेबसाईट को (कम से कम भारत में) प्रतिबन्धित करवाने हेतु कदम उठायें, या फ़िर इस साईट (अथवा ब्लॉग) मालिक से ताबड़तोड़ इस आपतिजनक चित्र को हटवाने के लिये दबाव बनायें। अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर कथित “सेकुलर” लोगों से यह पूछा जाना चाहिये कि क्या यह दोनों चित्र “कलाकारी” का नमूना हैं? और क्या वे इसका समर्थन करते हैं? यदि “हाँ” तो क्यों, और “नहीं” तो क्यों नहीं? इसका जवाब उन्हें हुसैन के मामले में की गई बकवासों पर बेनकाब कर देगा।
आश्चर्य तो इस बात का भी है कि अभी तक पिछले 8-10 दिनों में भी इस चित्र (या खिलौने) या वेबसाईट या लेखक पर कोई कार्रवाई होना तो दूर, मुस्लिम जगत से कोई विरोध की आवाज़ तक नहीं उठी? मैं इन्तज़ार कर रहा था कि कोई मुस्लिम भाई विरोध करें, लेकिन अब मेरा दिल नहीं माना, इसलिये इसे अपने ब्लॉग पर जगह दे दी ताकि विरोध का एक छोटा सा प्रयास मेरी तरफ़ से भी हो… और कुछ लोग साथ आयें। धार्मिक प्रतीकों (किसी भी धर्म के हों) का मखौल उड़ाना कभी भी किसी “हिन्दू” का मकसद हो नहीं सकता, सभी लोग इसका विरोध करें।
इसी प्रकार एक और साईट है http://www.jesusandmo.net/ जिस पर जीसस और मोहम्मद नाम के दो काल्पनिक पात्रों की खिल्ली उड़ाते हुए कार्टून पेश किये जाते हैं, (और यह साईट भी किसी गैर-हिन्दू की है)। तात्पर्य यह कि पूरे विश्व में मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच खतरनाक तरीके से युद्ध चल रहा है, लेकिन भारत में इनके “गुर्गे” हैं मीडिया मुगल और इसीलिये भारतीय मीडिया का पहला निशाना हैं “हिन्दू”। भारतीय इलेक्ट्रानिक और प्रिण्ट मीडिया का लक्ष्य है हिन्दू खत्म हो जायें, निराश हो जायें, धर्म-परिवर्तित हो जायें, हिन्दू परम्परायें और त्योहार विकृत हो जायें, हिन्दुओं का सनातन धर्म से विश्वास उठ जाये, युवा पीढ़ी नष्ट-भ्रष्ट हो जाये, भारत खण्ड-खण्ड हो जाये… तभी मीडिया को चैन आयेगा।
चलते-चलते एक बात और -
यह बात सोचने वाली है कि जब भी किसी धार्मिक आराध्य अथवा देवताओं का अपमान होता है, उसके पीछे कभी भी कोई हिन्दू कलाकार नहीं होता, क्योंकि हिन्दू धर्म की शिक्षाओं के अनुसार सभी धर्मों का आदर किया जाना चाहिये और जिस व्यक्ति की जो भी इच्छा हो, वह अपनी बुद्धि और श्रद्धा के अनुसार उस आराध्य देव को पूज सकता है। सिर्फ़ “मेरे देवता या मेरे ग्रन्थ ही सही, सच्चे और अन्तिम हैं बाकी के सब गलत हैं” यह घटिया सोच अगर बदल जाये, और यदि यह बात सभी धर्मों के लोग अपना लें तो विश्व अधिकतर समस्याएं दूर हो जायें…। बहरहाल, अभी सब मिलकर मोहम्मद साहब के इस चित्र (या विज्ञापन) का पुरज़ोर विरोध करें…
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56 comments:
हजरत आयशा की उमर बारे में इत्तफाक नहीं सबसे कम उमर की बात भी 9 साल मिलती है,
विक्की पिडिया पर देखें
ऐसे ही पत्नि बारे में भी इत्तफाक नहीं, जब 4 बीवी कुरआन में फाइनल कर दी गयी उसके बाद आपकी 4 से अधिक बिवियां नहीं थीं
जनाब आपके लेख देख कर हमारे बहुत से मुस्लिम भाई ब्लागिंग की तरफ आ रहे हैं ऐसे ही लिखते रहिये
मैं आपको नमन करता हूँ.... दंडवत नमन... आप सही मायनों में सेकूलर हैं... इसे ही कहते हैं सेकूलरिज्म.... जो लोग मुझे गाली देते हैं .... कि मैं सुरेश चिपलूनकर का चमचा हूँ.... उनको यह पोस्ट करारा तमाचा है... मुझे गर्व है कि मैं आपका चमचा हूँ...
सैल्यूट...
जानकारी के लिए शुक्रिया... अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता धार्मिक मामलों में नहीं होनी चाहिए। पेन्टर साहब के चित्रों का मैंने पहले भी विरोध किया था और फिर करता हूॅं। लेकिन एक सच्चा मुसलमान कभी किसी धर्म के लिए बुरा भलां नहीं कहता। एक बार फिर आपको बधाई देता हूॅं।
आपने राह दिखा दी! कोई समझदार चलेगा, बाकी का भगवान मालिक है.
कुछ कम्पनियाँ और तथाकथित क्रिएटिव लोग जानबूझकर ऐसे चित्र बनाते हैं ताकी पब्लिसिटी मिले. एम. एफ. हुसैन भी ऐसे ही एक चित्रकार हैं.
उन्होने अपना भारतीय पासपोर्ट जमा करा दिया है. अब वे विदेशी हैं. अच्छा है!
आपने यह पोस्ट लिखकर कई सवालों के जवाब दे दिए हैं और कई सवाल खड़े कर दिए हैं. नमन!
यह ग्राफिक फोटोशोप जैसे सोफ्टवेर के द्वारा बनाया गया है. और काफी पहले से ईमेल के माध्यम से वितरित किया जा रहा है.
खिलौना बनाने वाली कम्पनी लेगो ने 13 अक्टूबर 2006 को बयान जारी कर कहा था कि यह ग्राफिक उसका नहीं है.
कड़ी : http://www.lego.com/eng/info/default.asp?page=pressdetail&contentid=22333&countrycode=2057&yearcode=&archive=false
सुरेश जी आप को साधुवाद !
आप ने सच्चे भारतीय का धर्म निभाया है,मुझे सदा याद है की आप ने कभी भी किसी धर्म का अप्मान नही किया है ,आप ने तो सदा हिन्दुओ पर हो रहे अत्याचारो पर ध्यान आक्रिश्ठ करवाय है!
आम तौर पर हम हिन्दू होते ही सच्चे सेकुलर है पर आप के इस पोस्ट ने आप के उपर लान्छन लगाने वालो का मूह ठूस कर बन्द कर दिया है,,,
यहा आप मे यहाँ कथन नही वरन अभियान दिख रहा है,हर्ष की बात है कि जिसकी सुरुआत आप ने किसी मुसलमान से भी पहले की है, यही नही वरन आप ने ही सबका ध्यान आक्रिश्ट करवाया है !
पाजी तुस्सि ग्रेट हो !!!
वड़ोदरा के एक कलाकार (मैं विकृत मानसिकता वाला कहूँगा) ने यिशु का चित्र इस तरह बनाया था की उनका विर्य टपक रहा है. मैंने विरोध में पोस्ट लिखी थी. एक हिन्दु के लिए सभी आराध्य समान होते है. यह खिलौने भी शरारत के लिए बनाए गए है. जो कतई सही नहीं है. न तो नंगे हो कर कोई महावीर बन सकता है न भगवा धारण कर कोई संत. वैसे ही दो-चार-पाँच बीवीयाँ रख कोई मोहम्मद नहीं बन सकता. धार्मिक उपहास बन्द होने चाहिए. लोगो में द्वैष फैला कर क्या प्राप्त किया जा सकता है? विरोध दर्ज करें.
बेंगाणी जी ने बता दिया कि यह चित्र ग्राफ़िक डिजाइन से बनाया है, साथ ही कई महिला/पुरुष मित्रों, पाठकों के फ़ोन भी आ रहे हैं इसलिये इस अश्लील चित्र को मेरे ब्लॉग से हटा रहा हूं, जिसे देखना हो वह सम्बन्धित लिंक्स पर जाकर देख सकता है…।
इस पोस्ट का मकसद अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के दोगले पक्षधरों का मुँह बन्द करना था, साथ ही यह बताना भी है कि कभी भी कोई हिन्दू व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के आराध्य का अपमान नहीं कर सकता, असली सेकुलर वही होता है जो "हिन्दू" हो… :)
Suresh ji namashkar,
bahut accha aur nek kam kiya hai aapne. Dharm chahe koi bhi ho Dharan karne ke liye hota hai, Danga fasad ke liye nahi. Har Hindu ko ishi tarah se sochna chahiye.
किसी की मान्यताओं का मजाक नहीं उड़ाना चाहिए. मान्यताएं चाहे गलत ही क्यों न हों.
यदि मतभेद हैं तो स्वस्थ ढंग से तर्क-वितर्क से शास्त्रार्थ करके उसका हल होना चाहिए, छल और धोखे से नहीं और जो सत्य हो उसको मानें.
हम मुस्लिमों के उस मजहबी जूनून के विरोधी हैं जिसको ये लोग आँखे मूँद कर विश्वास करते हैं, जबकि मनुष्यता के नाते हमें किसी प्राणी से बैर नहीं है.हाँ पर यदि लोग अपनी गलत बातों के समर्थन में तलवार उठाते हैं तो उनका नरसंहार करना भी मनुष्यता है.
इसीलिए सबको चाहिए एक दूसरे का मजाक उड़ाना बंद करें और एक स्वस्थ वाद करें जिसका उद्देश्य सत्य लाना हो
सुरेश जी,
ये क्या किया आपने!फस गए बेचारे कला के प्रेमी!
सेकुलरिस्म पचाना मुश्किल हो रहा होगा उन्हें!
एक न्यायपूर्ण लेख,तार्किक तो है ही हर बार कि तरह!
कुंवर जी,
-फैरुन्गला पर छपे आलेख का मजमून तो देख लेते मियाँ ? यह साइंस ब्लॉग मेरे बुकमार्क पसंदों में है और मैं इसे इसे प्रायः पढता ही रहता हूँ -इसमें कोई अनर्गल बात नहीं है !
सुरेश चिपलूनकर जी, ढेर सारी बाते समझते हुए भी मैं कुछ बातों से असहमत हूँ !
१. सर्वप्रथम तो मुझे आपका यह सेकुलर पक्ष पसंद नहीं आया !
२. दूसरा आपको कैसे मालूम कि उस ब्लॉग पर हजरत मुहमद के बारे में लिखी बाते असत्य है ? ६ और ९ लिखने में त्रुटि हो सकती है !
३. हाँ, किसी धर्म के सर्वोपरी के बारे में भड़काऊ और अश्लील चित्र-चलचित्र सरासर निंदनीय है, स्पष्ट कर दूं कि मैं भी किसी और धर्म के मानने वाले द्वारा किसी दूसरे धर्म की मान्यताओं पर उंगली उठाना सरासर गलत है किन्तु.
4. यह तभी संभव है, बशर्ते उस धर्म, जिस पर उंगली उठाई जा रही है के अनुयायी भी दूसरे धर्मो का सम्मान करते हों ! मैंने अभी दो दिन पहले ही अपने ब्लॉग पर बताया था कि यहाँ एक तथाकथित धर्म का ठेकेदार ब्लोगर फर्जी हिन्दू नामो से ब्लॉग लिखकर हिदू धर के बारे में अनाप-सनाप लिख रहा है ! कितने लोगो ने उस पर ध्यान दिया ?
५. आपको याद होगा कि कुछ समय पहले सौरभ भाई ( उम्दा सोच ) ने अपने ब्लॉग पर एक लेख लिखकर बताया था कि कैसे ये दूसरे धर्म के धर्म्भीरुओ ने अश्लील रामायण बनाकर उसको यु -ट्यूब पर डाला है ! कितने लोगो ने उसका पुरजोर विरोध किया ? जब ये लोग दूसरे के धर्म की इस तरह खिल्ली उड़ा रहे है फिर हम क्यों और किसलिए इनके धर्म के बारे में की गई बातों का विरोध करे ? ये पहले अपना घर दुरस्त करे, तब दूसरों के घर पत्थर फेंके !
एक बात और मुह्हम्मद के उस चलचित्र पर लिखे गए लेख के नीचे टिप्पणियों पर अगर गौर फरमाओ तो आप पाओगे कि सारी Remarks (टिप्पणियाँ ) "बेनामी "Annonymous द्वारा की गई है, हंसी आती है इनपर कि इनमे इतनी भी हिम्मत नहीं कि टिपण्णी तो अपने नाम से कर सके !
@ आदरणीय मिश्रा जी - उस लेख में क्या कहा गया है इस पर बात नहीं हो रही बल्कि चित्र (चित्रों) पर हो रही है, यह आपत्तिजनक है या नहीं?
@ गोदियाल जी - आपकी बातों से सहमत, लेकिन यह पोस्ट किसी को नीचा दिखाने के लिये नहीं, बल्कि यह दर्शाने के लिये लिखी है कि हिन्दू सामान्य परिस्थितियों में दूसरे धर्म का अपमान नहीं कर सकता, वैसे भी इस पोस्ट का उद्देश्य "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के पक्षधर", कलाप्रेमी(?) और सेकुलरों के विचार जानना है, लेकिन दुर्भाग्य से इनमें कोई भी अभी तक ज्ञान बांटने नहीं आया है…
सुरेश जी से पूरी तरह सहमत. अब उस तरह का कोई सेक्युलर आयेगा भी नहीं. हमारे-आपके जैसे साम्प्रदायिक लोग इस मजाक के विरोध में हैं.
मेरी ऊपर वाली टिप्पणी मोहम्मद के उक्त गैर जिम्मेदार चित्र को लेकर ही की गई है.
सुरेश भाई सही समय पर सही चोट किया है लेकिन हमें लगता है अभी हमारा ध्यान हुसैन जैसों से हटाकर अपने भीतर के हुसैनों ( बाबा भीमनाद, नित्यानंद आदि ) पर केन्द्रित करके अपने घर की सफाई करनी होगी . शंकराचार्यों , रामानान्दचार्यों , आदि आध्यत्मिक-धार्मिक पदों पर फर्जियों की बाढ़ सी आ गयी है . खबर यहाँ तक है कि ऐसी ताजपोशियों के लिए करोड़ों की लेन-देन होती है . ऐसे हालत में तो हमें खुद पर शर्म आती है कि हम ऐसे समाज में कैसे जी रहे हैं! एक आलेख हिन्दू समाज की आँखें खोलने वाली और इन अन्दर के हुसैनों के खिलाफ जरुर लिखिए और इससे मुहीम के तौर पर शुरू किया जाए .
"सिर्फ़ “मेरे देवता या मेरे ग्रन्थ ही सही, सच्चे और अन्तिम हैं बाकी के सब गलत हैं” यह घटिया सोच अगर बदल जाये, और यदि यह बात सभी धर्मों के लोग अपना लें तो विश्व अधिकतर समस्याएं दूर हो जायें…।"
प्रणाम स्वीकार करें
अन्तर सोहिल ji ne sahi kaha hai ..
"सिर्फ़ “मेरे देवता या मेरे ग्रन्थ ही सही, सच्चे और अन्तिम हैं बाकी के सब गलत हैं” यह घटिया सोच अगर बदल जाये, और यदि यह बात सभी धर्मों के लोग अपना लें तो विश्व अधिकतर समस्याएं दूर हो जायें…।"
वैज्ञानिक व उपदेशक नहीं आए पढ़ने?
संजय बेंगाणी जी किस वैज्ञानिक उपदेशक की बात कर रहे हैं ?
भैया लोगन बात कुल जमा इतना ही है की हुसैन मियाँ जब सरस्वती माई क कला के नाम पर नंगा दिखा सकते हैं तो मुहम्मद साहब की अर्धांगिनियों को भी उन्हें दिखा देना चाहिए था बस कला अपने उरूज तक पहुँच जाती -कोई विवाद न होता -मूल यी जो दोहरा मानदंड हौवे ऊ अच्छी बात नहीं -
मैं तो चूंकि नास्तिक आदमी हूँ मेरे लिए कौनो फर्क नहीं पड़ता जिसे भी चाहो नंगा दिखा दो -मगर विचार और व्यवहार में नंगई नहीं होनी चाहिए जैसे यी बाबा लोग और या मुलाला पंडित भी कर बैठ रहे हैं ,
मुझे फरुन्गला के चित्र पर भी कोई आपत्ति नहीं है बल्कि वह तो इतना सरल है की मैं खुदाई कई बार ट्राई करके बना रहा हूँ क्या झक्कास बनता है -
मैंने खुदा/ईश्वर /गाड के भी कई चित्र बनाने चाहे पर ससुरे वे बन नहीं पते -यी सुरेश भाई आला मियाँ कैसे दीखते हैं ? न न आप बड़े पैरोकार बन रहे हैं न तनिक बात देवें !!
बाबू लोगन इतना खुल के विचार शायद ही आपके मिले कहूं से -मगर मैं शपथपूर्वक कहता हूँ मैंने एक एक हर्फ़ /लफ्ज वैसा ही कहा है जैसा मेरा दिल दिमाग बोल रहा है !
धरम के विकृत और गदहा पंथ से मुझे कोई लेना देना नहीं है -हाँ एक प्रतिक्रया वादी हिन्दू जरूर हूँ -मुसलमान भी होने में गुरेज नहीं है मुझे मगर शर्त यह है की मैं अल्लाह मियाँ को नहीं मानूगा! क्योकि नास्तिक हूँ !
नीरज की पंक्तियाँ सहसा ही बड़ी मौजू हो गयी हैं -
अब मजहब कोई ऐसा चलाया जाय, जहाँ इंसान को इन्सान बनाया जाय !
Suresh Ji bahut khushi hui aapke is lekh ko dekh kar.. har kisi ke paas dil hai aur dil hai to jazbaat hain. kisi ko jazbaat ko thes nahin pahunchani chahiye.. aaj aapne bhaichare ko badhane ka jo prayas kiya wo tareeef-e-kabil hai.. ek na ek din jaroor anya log jo ye baat nahin samajhte samjhenge..
Abhar
सर जी आपने साबित कर दिया कि आप हमेशा निष्पक्ष रहते हैं । पर आपको समझने के लिए आपकी हर पोस्ट को सही नज़रिए से देखा जाना चाहिए । बेमतलब आपको साम्प्रदायिक दायरे में बाँध लेना वाकई दुर्भाग्यपूर्ण हैं । आप हमेशा स्पष्ट और तटस्थ रहते हैं यही आपका सबसे उम्दा आयाम हैं।
आपके इतने परिश्रम के लिए धन्यवाद् । इश्वर करे आप हमेशा लेखन में ऐसे ही ऊर्जावान रहें ।
क्योंकि भारतीय दर्शन हमे यही सिखाता है कि सबमें भगवान हैं, उस दृष्टिकोण से आपको साधुवाद। वरना तो आपकी पोस्ट सांप को दूध पिलाने का कार्य ही कर रहे हैं। जब भी मौका मिलेगा आपको काटे बिना नही रहेगा।
@ त्यागी जी - अब क्या कहूं. कभी कभी मन में कुछ संदेह उठने लगता है. अब दूध कौन पी रहा है और किस वेष में पी रहा है, यह देखने की बात है.
इस पोस्ट से कई सेकुलरों और हुसैन के नंगी कला के पारखियों का मुह बंद हो जाना चाहिए | पर वो सेकुलर बड़े बेसरम और मोती चमड़ी के हैं .... इस पोस्ट के कुछ भाग से सहमत होंगे ... और जैसे ही आपने हिन्दू देवी देवता के अपमान की बात करेंगे .... सेकुलर कुत्ते की दम की तरह टेढ़ी हो जायेगी और कहेंगे हुसैन की कला का जोड़ नहीं |
आपकी बातों से सहमत हूँ। काश ऐसी सोच वाले दूसरे धर्मों में भी प्रभावशाली होते...
सच्चा हिंदू कभी किसी धर्म का अपमान नही करता,वो सभी धर्मों का सम्मान करता है और ये लेख लिख कर आपने साबित कर दिया है कि आप एक सच्चे और अच्छे हिंदू हैं।शाबास सुरेश भाऊ,शाबास!
Hinduism is real secularism.
India should understand this fact.
As hindu is really NO DHARAM.
IS DUNIYA SE AGAR DHARAM GAYAB HO JAAYE TO DUNIYA BEHAD SUNDAR,SHANT AUR PYARI BAN JAYE.
SACH MEN DHARAM NE BURA HAAL KAR RAKHAA HAI.
IS DUNIYA SE AGAR DHARAM GAYAB HO JAAYE TO DUNIYA BEHAD SUNDAR,SHANT AUR PYARI BAN JAYE.
SACH MEN DHARAM NE BURA HAAL KAR RAKHAA HAI.
अब मजहब कोई ऐसा चलाया जाय, जहाँ इंसान को इन्सान बनाया जाय !
सारे फसाद की जड़ हैं तीन लोग :
१. पंडित
२. मौलवी
३. पादरी
सिर्फ़ अपनी दूकान चलाने के लिए इतना ताम-झाम करते हैं...लोग इनके झांसे में न आवें तो सब ठीक है ...
अच्छा काम किया है आपने...मेरा भी विरोध दर्ज किया जाए...
मैं इसकी भर्त्सना करती हूँ...
lage हाथों यहाँ भी आप नज़र मारिएगा...सीता मैया के वस्त्र-विन्यास कुछ अजीब लगे मुझे....और भी बहुत कुछ आपत्तिजनक है ...आपकी तीक्क्ष्ण दृष्टि पड़ेगी तो कुछ और भी बातें उभरेंगी...
लिंक नीचे हैं...
आभार...
http://illustrationfriday.com/blog/2009/01/09/cartoon-o-rama/
आपके इस लेख ने ये सिद्ध कर दिया की सही मायने में हिन्दू धर्म को समझने वाला व्यक्ति कभी किसी व्यक्ति या धर्म को नीचा दिखने की कोशिश नहीं करता. लेकिन अगर कही कुछ गलत या अन्यायपूर्ण है तो इसके बारे में आवाज़ उठा कर अपना विरोध दर्ज भी करवाना जरुरी समझता है.
जैसा की वरिष्ट पत्रकार एन विनोद जी ने अपने हाल ही के ब्लॉग में लिखा है, की आजकल आस्था के साथ घात हो रहा है और ये जो धर्म के नाम पर नैतिक पतन का वीभत्स प्रदर्शन कर रहे तथा कथित धर्म गुरु की नंगाई हमारा धर्म नहीं धर्मान्धता है. आज हर समाज में धर्म के नाम पर दुकान खोल 'बाबागीरी' करने वालों ढोंगी समाज के अल्पज्ञानी या अज्ञानी और मानसिक रूप से कमजोर लोगो को ठग कर अपनी दुकान चला रहे है.
प्राय आपके हरेक लेख काफी हद तक ढोंग और ढोंगियों की पोल खोलते है और आपको एक और अच्छी पोस्ट पर बधाई.
"तात्पर्य यह कि पूरे विश्व में मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच खतरनाक तरीके से युद्ध चल रहा है"
A very OBVIOUS , but overlooked HARD REALITY . I do not know who looks after press council of India, but u deserve to be its chief !
"तात्पर्य यह कि पूरे विश्व में मुस्लिमों और ईसाईयों के बीच खतरनाक तरीके से युद्ध चल रहा है" This is the CRUX , rest is just extension.
सादर वन्दे!
बहुत ही बढ़िया लेख!
एक तरह से बीमार मानसिकता वाले लोगों की पूरी फ़ौज इस तरह के कामो में लगी हुयी है, ये समाज में बीमारी फ़ैलाने की एक सोची समझी साजिस है, अभी एकदिन पहले IBN7 के एक मशहूर एंकर ने महिला बिल को लेकर भगवान राम, कृष्ण, राधा, मीरा और पुरे भारतीय सभ्यता को ही गलत ठहरा दिया, अब इन पागलो के लिए इलेक्ट्रिक शाक के आलावा अन्य कोई रास्ता नजर नहीं आता.
मै आपके इस विचार से सहमत होते हुए उन सभी पागलों (छद्म सेकुलरवादी) व बीमार मानसिकता (एम् ऍफ़ हुसैन जैसे कलाकार) वाले लोगों से अपील करता हूँ की इससे पहले की लोग जूतों से मारें, अपनी दुकान बंद कर दीजिये.
रत्नेश त्रिपाठी
भई आपका लेख हमेशा की भांति बहुत ही तथ्यपरक और विचारणीय....पर भाऊ ये दो पहलवान जब लङते हैं तो लङें अपन को काह बीच मैं घसीट रहैं हैं....हमेशा की तरह कैराननी मिंया की बेतुकी टिप्पणी समझ नहीं आई....
Priya Suresh Bhai,
Post dekh kar Atal ji ki panktiya yaad aa rahi hi
Gopal ram ke naam par, kab maine atyachar kiya! kab kisi Hindu kar ne ghar ghar me narsanhar kiya! Bhu bhag nahi shat shat manav ke hridaya jeetane ka nishchay! Hindu tan man, Hindu jeevan, Rag Rag Hindu mera parichay.....
Pranam swikar kare....apana ujjain/indore ka pata jarur de...taki vaha aane par aap se mil saku...mai hal hi me ujjain aaya tha ( mera ghar indore me hai) par pata nahi hone se mil nahi paya...urjawan lekho hetu kotisha dhanyawad....Anurag wani pune
अपना नाम/ ब्रांड स्थापित करने और लाइम लाईट में रहकर अपना दूकान चलाने को अति आतुर लोगों के लिए नारी तथा धर्म, ये दो साधन सदा से ही सुगम लगते रहें हैं और आगे भी लगेंगे... सो क्या कहा जाय...किसी भी सम्प्रदाय के आस्थाओं का उपहास उड़ना अधर्म है...
धर्म कोई भी हो सम्मानीय होता है, इसी प्रकार धर्म के प्रवर्तक भी पूज्यनीय होते हैं. सभी धर्मो का सम्मान करने वाला धर्म हिन्दू धर्म ही है इसी लिए ये सर्वे श्रेष्ठ है. केवल इसी धर्म में धर्म का आलोचक और नास्तिक भी ससम्मान हिन्दू होने का गौरव प्राप्त कर सकता है. इस संभंध में कुछ दिन पहले मेरे एक मित्र ने मुझे एक मेल भेजी थी जिस में आलोचनाओं को समुचित स्थान दे कर भी हिन्दू धर्म को सर्वे श्रेष्ठ सिद्ध किया है. मेल काफी लंबी है पूरी मेल देना यहाँ संभव नहीं है अता मैं अपने 2 साल से खाली ब्लॉग की शरुआत इसी से कर रहा हूँ. समर्थन की अपेक्षा है
http://dixitajayk.blogspot.com
विवाह के समय माता सीता जी की आयु मात्र 6 वर्ष थी ।
माता सीता रावण से कहती हैं कि
‘ मैं 12 वर्ष ससुराल में रही हूं । अब मेरी आयु 18 वर्ष है और राम की 25 वर्ष है । ‘
इस तरह विवाहित जीवन के 12 वर्ष घटाने पर विवाह के समय श्री रामचन्द्र जी व सीता जी की आयु क्रमशः 13 वर्ष व 6 वर्ष बनती है ।
आदरणीय चिपलूनकर जी
सादर प्रणाम आदमी एक जिज्ञासु प्राणी है । सैक्स और विवाद उसे स्वभावतः आकर्षित करते हैं। प्रस्तुत पोस्ट के माध्यम से आपने इसलाम के प्रति उसके स्वाभाविक कौतूहल को जगा दिया है । इसके लिए हम आपके आभारी हैं ।
आदमी नेगेटिव चीज़ की तरफ़ जल्दी भागता है । मजमा तो आपने लगा दिया है और विषय भी इसलाम है लेकिन ये मजमा पढ़े लिखे लोगों का है । इतिहास में भी ऐसे लोग हुए हैं कि जब वे इसलाम के प्रकाश को फैलने से न रोक सके तो उन्होंने दिखावटी तौर पर इसलाम को अपना लिया और फिर पैग़म्बर साहब स. के विषय में नक़ली कथन रच कर हदीसों में मिला दिये अर्थात क्षेपक कर दिया जिसे हदीस के विशेषज्ञ आलिमों ने पहचान कर दिया ।
इन रचनाकारों को इसलामी साहित्य में मुनाफ़िक़ ‘शब्द से परिभाषित किया गया ।
कभी ऐसा भी हुआ कि किसी हादसे या बुढ़ापे की वजह से किसी आलिम का दिमाग़ प्रभावित हो गया लेकिन समाज के लोग फिर भी श्रद्धावश उनसे कथन उद्धृत करते रहे । पैग़म्बर साहब स. की पवित्र पत्नी माँ आयशा की उम्र विदाई के समय 18 वर्ष थी । यह एक इतिहास सिद्ध तथ्य है । यह एक स्वतन्त्र पोस्ट का विषय है । जल्दी ही इस विषय पर एक पोस्ट क्रिएट की जाएगी और तब आप सहित मजमे के सभी लोगों के सामने इसलाम का सत्य सविता खुद ब खुद उदय हो जाएगा ।
क्षेपक की वारदातें केवल इसलाम के मुहम्मदी काल में ही नहीं हुई बल्कि उस काल में भी हुई हैं जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था।
महाराज मनु अर्थात हज़रत नूह अ. के बाद भी लोगों ने इन्द्र आदि राजाओं के प्रभाव में आकर वेद अर्थात ब्रहम निज ज्ञान के लोप का प्रयास किया था । वे लोग वेद को पूरी तरह तो लुप्त न कर सके लेकिन उन्होंने पहले एक वेद के तीन और फिर चार टुकड़े ज़रूर कर दिये । और फिर उनमें ऐसी बातें मिला दीं जिन्हें हरेक धार्मिक आदमी देखते ही ग़लत कह देगा । उदाहरणार्थ -
प्रथिष्ट यस्य वीरकर्ममिष्णदनुष्ठितं नु नर्यो अपौहत्पुनस्तदा
वृहति यत्कनाया दुहितुरा अनूभूमनर्वा
अर्थात जो प्रजापति का वीर्य पुत्रोत्पादन में समर्थ है ,वह बढ़कर निकला । प्रजापति ने मनुष्यों के हित के लिए रेत ( वीर्य ) का त्याग किया अर्थात वीर्य छौड़ा। अपनी सुंदरी कन्या ( उषा ) के ‘शरीर में ब्रह्मा वा प्रजापति ने उस ‘शुक्र ( वीर्य ) का से किया अर्थात वीर्य सींचा । { ऋग्वेद 10/61/5 }
संभोगरत खिलौनों को पवित्र हस्तियों के नाम से इंगित करना आप जैसे बुद्धिजीवियों को ‘शोभा नहीं देता । गन्दगी को फैलाने वाला भी उसके करने वाले जैसा ही होता है । हमारे ब्लॉग पर आपको ऐसे गन्दे चित्र न मिलेंगे ।
ब्लॉग लेखन का मक़सद सत्य का उद्घाटन होना चाहिये न कि अपनी कुंठाओं का प्रकटन करना । हज़रत साहब स. के बारे में फैल रही मिथ्या बातों का खण्डन होना चाहिये ऐसा दिल से आप सचमुच कितना चाहते हैं ?
इस का निर्धारण इस बात से होगा कि आप मर्यादा पुरूषोत्तम श्री रामचन्द्र जी पर समान प्रकार के लगने वाले आरोप का निराकरण कितनी गम्भीरता से और कितनी जल्दी करते हैं ?
बाल्मीकि रामायण( अरण्य कांड , सर्ग 47 , ‘लोक 4,10,11 ) के अनुसार विवाह के समय माता सीता जी की आयु मात्र 6 वर्ष थी ।
माता सीता रावण से कहती हैं कि
‘ मैं 12 वर्ष ससुराल में रही हूं । अब मेरी आयु 18 वर्ष है और राम की 25 वर्ष है । ‘
इस तरह विवाहित जीवन के 12 वर्ष घटाने पर विवाह के समय श्री रामचन्द्र जी व सीता जी की आयु क्रमशः 13 वर्ष व 6 वर्ष बनती है ।
रंगीला रसूल सत्यार्थ प्रकाश की तरह दिल ज़रूर दुखाती है लेकिन वह कोई ऐसी किताब हरगिज़ नहीं है जिसके नक़ली तिलिस्म को तोड़ा न जा सके । जो कोई जो कुछ लाना चाहे लाये लेकिन ऐसे किसी भी सत्यविरोधी के लिए परम प्रधान परमेश्वर ने ज़िल्लत के सिवा कुछ मुक़द्दर ही नहीं किया । जो चाहे आज़मा कर देख ले । आशा है आप भविष्य में भी इसी प्रकार मजमा लगाकर इसलाम की महानता सिद्ध करने के लिए हमें आमन्त्रित करते रहेंगे ।
इस पोस्ट की टिप्पणियाँ सबस्क्राइब कर रखी है. अभी डॉ. जमाल की टिप्पणी देखी. पता नहीं क्या कहना चाहते हैं.
वे इस दुष्कर्म के लिए भी आपको ही कोस रहे हैं. अब आप इन्हें अपनी इमानदारी का सबूत और किस तरह से देंगे? वो पता नहीं.
अजीब लोग होते हैं ये भी. जबरदस्ती मीनमेख निकालना कोई इनसे सीखे.
1) यदि राम और सीता की आयु के सम्बन्ध में ऐसा कहीं (किसी रामायण में) उल्लेखित भी हो (क्योंकि हम लोग एक किताब से चिपके नहीं रहते), तब भी जिस ज़माने में बाल विवाह एक आम बात समझी जाती थी उस समय 13 वर्ष का दूल्हा और 6 वर्ष की दुल्हन कोई आश्चर्य की बात नहीं है…।
2) यह भी स्पष्ट करें कि इस पोस्ट का आपकी सीता-राम की आयु सम्बन्धी टिप्पणी से क्या सम्बन्ध है?
3) कहीं आप इसके जरिये मोहम्मद और आयेशा के रिश्ते(?) को जस्टिफ़ाई तो नहीं कर रहे?
4) आपने लिखा… "संभोगरत खिलौनों को पवित्र हस्तियों के नाम से इंगित करना आप जैसे बुद्धिजीवियों को ‘शोभा नहीं देता । गन्दगी को फैलाने वाला भी उसके करने वाले जैसा ही होता है। हमारे ब्लॉग पर आपको ऐसे गन्दे चित्र न मिलेंगे। ब्लॉग लेखन का मक़सद सत्य का उद्घाटन होना चाहिये न कि अपनी कुंठाओं का प्रकटन करना…"
क्या मैंने उस चित्र में अपनी तरफ़ से कुछ भी जोड़ा है? बल्कि मैंने तो विरोध करने का आव्हान किया है और आप खामखा गले पड़ रहे हैं, कैसे तथाकथित विद्वान हैं आप? मैंने तो रंगीला रसूल का उल्लेख तक नहीं किया, फ़िर क्यों आपकी दाढ़ी में तिनका आ गया? आप मेरी 2-4 पोस्ट दिखाईये जिसमें मैंने "इस्लाम" के खिलाफ़ कुछ लिखा हो… जबकि मैं आपको ईसाईयों द्वारा लिखित हजारों वेबसाईटें और पुस्तकें बताता हूं जिसमें इस्लाम और मोहम्मद के बारे में "बहुत खास तरीके" से लिखा हुआ है… और आप हैं कि मेरे माथे आ रहे हैं?
बेहद अनुपयुक्त / अनर्गल किस्म की टिप्पणी है आपकी…
अनवर जैसे लोग तर्क की भाषा नहीं समझते क्यों कि तर्क से इनका कोई नाता नहीं रहा है. न ही सही जगह सही तर्क दे सकते है. इस पोस्ट पर उनकी टिप्पणी समझ से बाहर है.
सुरेशजी की बात से सहमत नहीं कि बाल विवाह आम बात थी. वह अपवाद बात हो सकती है आम नहीं. हिन्दू तब कहीं अधिक प्रगतिशील थे. अतः बाल विवाह का प्रश्न ही नहीं उठता.
साथ ही किसी ने कार्टून में सीता के वस्त्र आपत्तिजनक कहे है उनसे भी सहमत नहीं हूँ.
सुरेश जी, आपने सिद्ध कर दिया कि आप सभी धर्मों का सम्मान करते हैं। किन्तु क्या कहा जाये कि आपके सम्मान को भी कुछ लोग विरोध ही समझते हैं। इसी से पता चल जाता है कि ऐसे लोगों के भीतर पूर्वाग्रहरूपी कितना कलुष भरा हुआ है।
सुरेश जी, हिन्दू, हिन्दुस्तान हमेशा से ये ही कहता रहा है जो आपने अपनी पोस्ट में लिखा है कि "सब में हम, हम में सब" किन्तु अनवर जी की टिप्प्णी पढ कर आपको लग ही गया होगा आसतीन के सांप को कितना ही दूध पिलाओ अपना नहीं हो सकता।
जमाल जी,
जैसा की हम सब जानते है, समय के साथ साथ लोगो ने धर्म को अपनी सुविधा और धर्म के व्यापार के हिसाब से तोड़ मरोड़ दिया है. उदहारण के तौर पर हिन्दू धर्म में पिछले एक महीनो में कुछ कुख्यात बाबाओ के कारनामे हमारे सामने है. ठीक वैसे ही मुस्लिम धर्म में कुछ लोग मानते है की किसी भी बेगुनाह को मारने वाले को अल्लाह से कभी माफ़ी नहीं मिलती वही कुछ लोग इसे अल्लाह के रसूल का हुकुम मान कर आतंक को धर्म का पर्याय बनाने को आतुर है. आइये विषय पर आते है.
राम जन्म :
बाल काण्ड सर्ग १८ शलोक ८-९-१० में महार्षि वाल्मीक जी ने उल्लेख किया है कि श्री राम जी का जन्म चैतर शुकल पक्ष की नवमी तिथि को अभिजित महूर्त में मध्याह्न में हुआ था। कंप्यूटर द्वारा गणना करने पर यह २१ फरवरी, ५११५ ई पू आता है। इस दिन नवमी तो आती है लेकिन नक्षत्र पुष्य आता है। नवमी तिथि के बारे में तुलसी राम चरितमानस में भी उल्लेख मिलता है एवं रामनवमी चैत्र शुकल की नवमी को ही मनाई जाती है। बाल काण्ड के दोहा १९० के बाद की प्रथम चौपाई में तुलसीदास जी लिखते हैं ---
नौमी तिथि मधुमास पुनीता, सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता | मध्य दिवस अति सीत न धामा , पावन काल लोक विश्रामा ||
पवित्र चैत्र मास के शुकल पक्ष की नवमी तिथि को मधाहं में अभिजित महूर्त में श्री राम का जन्म हुआ था। अतः नवमी तिथि को आधार मान कर एवं नक्षत्र की अनदेखी कर राम नवमी तिथि की गणना करते हैं तो २१ फरवरी ५११५ ई पू प्राप्त होती है। इस प्रकार राम जन्म को ७१२५ वर्ष पूरे हो चुके है.
श्री राम १६वे वर्ष में ऋषी विश्वमित्र के साथ तपोवन को गए थे। इस तथ्य की पुष्टि वाल्मीक रामायण के बाल काण्ड के वीस्वें सर्ग के शलोक दो से भी हो जाती है, जिसमे राजा दशरथ अपनी व्यथा प्रकट करते हुए कहते हैं- उनका कमलनयन राम सोलह वर्ष का भी नहीं हुआ और उसमें राक्षसों से युद्ध करने की योग्यता भी नहीं है।
उनषोडशवर्षो में रामो राजीवलोचन: न युद्धयोग्य्तामास्य पश्यामि सह राक्षसौ॥ (वाल्मीक रामायण /बालकाण्ड /सर्ग २० शलोक २)
यानि प्रभु राम की शादी सोलह वर्ष के उपरान्त हुई थी. माँ सीता की उम्र के विषय में आप ने अपने तर्क में दो श्लोको का उल्लेख किया है वे है :
उषित्वा द्वा दश समाः इक्ष्वाकुणाम निवेशने | भुंजाना मानुषान भोगत सेव काम समृद्धिनी || ३-४७-४
मम भर्ता महातेजा वयसा पंच विंशक ||३-४७-१० ब || अष्टा दश हि वर्षिणी नान जन्मनि गण्यते ||३-४७-११ अ ||
गौर से ध्यान दे की पहले श्लोक में द्वा और दश शब्द अलग अलग है. ये द्वादश यानि बारह नहीं बल्कि द्वा "दो" को और दश "दशरथ" को संबोधित करता है. इसमें माँ सीता, रावन को, कह रही है की इक्ष्वाकु के राजा दशरथ के यहाँ पर दो वर्ष में उन्हें हर प्रकार के सुख जो मानव के लिए उपलब्ध है उन्हें प्राप्त हुए है.
दुसरे श्लोक में माँ सीता कह रही है की उस समय (वनवास प्रस्थान के समय) मेरे तेजस्वी पति की उम्र पच्चीस साल थी और मैं जन्म से अठारह की थी.
इसे ये ज्ञात होता है की वनवास प्रस्थान के समय माँ सीता की उम्र अठारह साल की थी और वो करीब दो साल राजा दशरथ के यहाँ रही थी यानि उनकी शादी सोलह साल की उम्र के आस पास हुई थी. ये केवल सोच और समझ का फेर है. आज शायद इन चीजो को न तो को ढंग से समझने वाला शिष्य है और न ही समझाने वाला गुरु. समय मिला तो शास्त्रों में लिखी हुई बाते आज के संधर्भ में कैसे समझी जानी चाहिए इसपर जरुर लिखूंगा.
अंत में बस इतना ही कहूँगा की तुलसी बाबा ने कहा है, "जिनकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखि तिन तैसी". मानो तो भगवान् नहीं मानो तो पत्थर.
हम तो मानते आये है कि वनवास के समय राम व सीता क्रमश: 25 व 18 वर्ष के थे. एक वर्ष पहले विवाह हुआ था. यानी तब इनकी उम्र 24 तथा 17 थी. अयोध्या वापसी के समय दोनो की आयू 39 व 32 वर्ष रही होगी. अपने बच्चों से मिलते समय राम कम से कम 51 के रहे होंगे.
good job done.
Really DONE.
http://parshuram27.blogspot.com/
सुरेश जी
महापुरुष किसी भी धर्म के हो उनका अनादर करने का हक़ किसी को नहीं है |
आपने सही तथ्य पेश किये लेकिन ऊपर कुछ मुश्लिम बंधुओं की टिप्पणी देख हैरानी हुई वे इस पोस्ट के विषय से भटक दूसरा राग अलापने लग गए | खुदा खैर करें इनके दिमाग की |
@DR. ANWER JAMAL,
"क्षेपक की वारदातें केवल इसलाम के मुहम्मदी काल में ही नहीं हुई बल्कि उस काल में भी हुई हैं जब उसे सनातन और वैदिक धर्म के नाम से जाना जाता था।
महाराज मनु अर्थात हज़रत नूह अ. के बाद भी लोगों ने इन्द्र आदि राजाओं के प्रभाव में आकर वेद अर्थात ब्रहम निज ज्ञान के लोप का प्रयास किया था।"
ये डॉक्टर साहब कौन सा नया शोध किये हैं। क्या ये कहना चाह रहे हैं कि इस्लाम ही पहले सनातन/वैदिक धर्म था? साथ ही क्या महाराज मनु हजरत नूह अ. थे?
ये दिव्य ज्ञान कहाँ से प्राप्त हुआ डॉक्टर साहब को?
baap re baap.........ab kahun to kyaa kahun....bas itna hi kahungaa....suresh ji keep it up....!!
@Bhaveshji,
Exceleent Explaination & True Details. Keep it up.
bhavesh is excellent...!!!
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