Monday, February 1, 2010

भाषाई विवादों को पीछे छोड़ते और “राज ठाकरेवाद” को सबक देते दो युवा कलाकार… ... Zee Marathi Saregamapa, Rahul Saxena, Abhilasha Chellam, Urmila Dhangar

क्या आप राहुल सक्सेना को जानते हैं? जानते तो होंगे लेकिन अब याद करने के लिये दिमाग पर थोड़ा ज़ोर लगाना पड़ेगा, चलिये मैं ही याद दिला देता हूं… भारत के पहले सबसे अधिक लोकप्रिय रियलिटी शो इंडियन आइडल (प्रथम), जिसमें अमित साना को हराकर, धारावी की झोपड़पट्टी में रहने वाले प्रतिभाशाली गायक अभिजीत सावन्त विजेता बने थे, उसी प्रतियोगिता में नौंवे क्रमांक पर रहने वाले एक प्रतियोगी हैं राहुल सक्सेना। आप कहेंगे इसमें कौन सी बड़ी बात है, ऐसे कई कलाकार, कई-कई शो में निचले क्रमांकों पर रहकर गुमनामी के अंधेरों में खो जाते हैं, लेकिन राहुल सक्सेना उनमें से नहीं हैं।
चार साल पहले भी जिस वक्त इंडियन आईडल से वह बाहर हुए थे, उस समय भी फ़राह खान ने भीगी आँखों से कहा था कि SMS के जरिये वोटिंग अथवा अन्य तकनीकी वजहों से भले ही राहुल बाहर जा रहे हैं, लेकिन मुझे उनकी प्रतिभा पर पूरा यकीन है और मैं इस लड़के को अपनी फ़िल्म में गाने का मौका दूंगी (यह वादा उन्होंने फ़िल्म ओम शांति ओम में सक्सेना को मौका देकर निभाया भी)। राहुल सक्सेना की समूची शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में हुई इंडियन आइडल से पहले जून 2004 में ही वे मुम्बई शिफ़्ट हुए…। चलिये अब भूमिका और प्रस्तावना बहुत हुई, मुद्दे की बात पर आते हैं…

जी मराठी का एक लोकप्रिय कार्यक्रम है हिन्दी की तर्ज़ पर चलने वाला “सारेगमप…”, जिसे पल्लवी जोशी संचालित करती हैं। वर्तमान में जारी इस मराठी सारेगमप के फ़ाइनलिस्ट तीन कलाकारों में से दो कलाकार “गैर-मराठी” हैं… जी हाँ, चौंकिये मत… राहुल सक्सेना (शुद्ध हिन्दी भाषी) और अभिलाषा चेल्लम (एक और प्रतिभाशाली तमिलभाषी लड़की) “मराठी” के इस कार्यक्रम में सारे महाराष्ट्र और मराठियों का दिल जीत रहे हैं और भरपूर SMS प्राप्त कर रहे हैं।

है न मजेदार और थोड़ा आश्चर्यजनक भी… कि जब देश भाषाई और क्षेत्रीय विवादों से जूझ रहा हो, ऐसे वक्त में दो कलाकार जिनकी मातृभाषा तो मराठी तो है ही नहीं, बल्कि वे मराठी बोलना भी नहीं जानते… ऐसे गायक-गायिका, मराठी के एक संगीत कार्यक्रम में फ़ाइनल में पहुँचे हैं। खास बात इसलिये भी है, कि संगीत, नाटक, अभिनय आदि की समालोचना मराठी लोग बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से करते हैं और सच्चे अर्थों में उच्च दर्जे का कलाकार ही यहाँ टिक पाता है। हालांकि मराठियों के लिये यह बात कतई आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि महाराष्ट्र ने हमेशा भाषा, जाति, सम्प्रदाय से ऊपर उठकर “सच्चे कलाकार” और उसकी कला का सम्मान किया है उन्हें प्यार दिया है। ऐसे कई गैर-मराठी कलाकार हैं जिन्होंने मराठी फ़िल्मों-नाटकों में अपना उत्कृष्ट योगदान दिया है, वहीं दूसरी ओर लता मंगेशकर हों या आशा भोंसले दोनों ने हिन्दी में सफ़लतापूर्वक अपना साम्राज्य स्थापित किया है।

बहरहाल, बात हो रही थी, इन दो युवा कलाकारों की… राहुल सक्सेना से आपका परिचय हो गया है, अब जान लीजिये दूसरी चुलबुली, नटखट, दाक्षिणत्य सौन्दर्य से भरपूर अभिलाषा चेल्लम के बारे में…

पुणे में निवासरत तमिलभाषी चेल्लम अय्यर की पुत्री अभिलाषा ने 4 वर्ष की आयु से ही कर्नाटक संगीत की शिक्षा ली, और पुणे में आयोजित होने वाली विभिन्न गायन प्रतियोगिताओं में हिस्सा लिया। जब वह 8 वर्ष की थी उस समय सब टीवी पर आने वाले कार्यक्रम “आओ झूमें गायें” में फ़ाइनल तक पहुँची थी, लेकिन उम्र कम होने की वजह से वह दूसरे क्रमांक पर रही। इसलिये जब स्टार टीवी के “अमूल वॉइस ऑफ़ इंडिया” में उसे गाने का मौका मिला तब भी वह अन्तिम 12 प्रतिभागियों में स्थान बनाने में सफ़ल रही। इससे पहले भी कई प्रतियोगिताओं में अभिलाषा ने मन्ना डे, ज़ाकिर हुसैन, दुर्गा जसराज, मोहम्मद अज़ीज़ जैसे परीक्षकों के सामने बेधड़क गा चुकी है, और इस बार भी जी-मराठी के इस सारेगामापा में सुरेश वाडकर, जतिन-ललित और शंकर महादेवन समेत मराठी-हिन्दी के अनेक दिग्गजों ने इसकी आवाज़, संगीत की समझ और गाने के अन्दाज़ की दिल खोलकर तारीफ़ की है। अभिलाषा का सपना है कि उसे एक बार काजोल के लिये प्लेबैक करने का मौका मिले…

जब आप इन दोनों गायकों के उच्चारण सुनेंगे तो यह कतई महसूस नहीं होगा कि इन दोनों को मराठी नहीं आती, सिर्फ़ समझ सकते हैं। अभिलाषा तो पुणे की निवासी होने की वजह से टूटी-फ़ूटी मराठी बोल सकती हैं, लेकिन राहुल सक्सेना तो ठेठ दिल्ली के हैं और उन्हें मराठी बिलकुल नहीं आती। लेकिन “संगीत” को किसी भी भाषा, किसी राजनीति, किसी क्षेत्रवाद, किसी ठाकरेवाद में बाँधा नहीं जा सकता, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि 31 जनवरी को होने वाले फ़ाइनल मुकाबले में अभिलाषा चेल्लम ही महाराष्ट्र की महागायिका बनकर उभरें। अभिलाषा की स्वर अदायगी, मराठी उच्चारण (गाने के दौरान), ताल की समझ बेहतरीन है और राहुल सक्सेना से उसकी काँटे की टक्कर होगी, तीसरी फ़ाइनलिस्ट मराठी है जिसका नाम है उर्मिला धनगर, लेकिन कोई भी उसे जीत का दावेदार नहीं मान रहा।


चित्र में तीनों फ़ाइनलिस्ट प्रख्यात गायिका अलका याग्निक के साथ 

अपने काम से देर शाम घर पहुँचता हूँ तब दिन भर ब्लॉगिंग के नशे के बाद संगीत का नशा ही लेता हूं… जो सारे नशे पर भारी है… और जी मराठी के बेहतरीन संगीत और हास्य कार्यक्रमों की वजह से बिग बॉस के घटियापन, राखी-राहुल के फ़ूहड़ स्वयंवरों, पुनर्जन्म की नौटंकियों आदि से बचा रहता हूँ… हाँ न्यूज़ चैनलों को अवश्य 5-5 मिनट देखना पड़ता है कि किस चैनल पर कौन सा एंकर भाजपा-संघ-हिन्दुत्व को गरिया रहा है, और कौन सा एंकर राहुल बाबा के चरण स्पर्श कर रहा है…

इस कार्यक्रम के बारे में आप लोगों को देर से बताने के लिये माफ़ी चाहता हूँ… लेकिन इन दोनों कलाकारों के एक-दो यू-ट्यूब वीडियो आपके लिये सादर प्रस्तुत करता हूं… उधर एक और मराठी माणुस मोहन भागवत जी ने भी अपना संयम तोड़ते हुए ठाकरेद्वय को कल “मराठी मुम्बई” के बारे में खरी-खरी सुना दी है भले इससे भाजपा-सेना गठबंधन खतरे में आ जाये, लेकिन राजनीति की बात अगली पोस्ट में करेंगे, फ़िलहाल आप इन दोनों युवा कलाकारों का गाना सुनिये… जिन्हें मराठी जजों, मराठी दर्शकों और मराठियों के अधिकाधिक SMS ने फ़ाइनल में पहुँचाया है…। मेरी भी अभिलाषा है कि “अभिलाषा” ही जीते…

मी राधिका, मी प्रेमिका : http://www.youtube.com/watch?v=q0eHkNTRXiA



नटरंग फ़िल्म की एक मुश्किल लावणी… http://www.youtube.com/watch?v=PsIS_CREvAo



खेळ मांडला… http://www.youtube.com/watch?v=Ww9A0a8XKvw



करुया उदो-उदो अम्बाबाईचा… http://www.youtube.com/watch?v=yXY2jy02hJM



चलते-चलते : पूरी पोस्ट लिख चुकने के बाद, कल रात की खबर यह है कि इन दोनों प्रतियोगियों को पीछे छोड़कर उर्मिला धनगर ने अधिक SMS प्राप्त करने की वजह से यह मुकाबला जीत लिया है। आज सुबह से इस बात की सम्भावना जताई जा रही है कि जी-मराठी, आईडिया (प्रायोजक) और कार्यक्रम संचालकों पर कोई "बाहरी दबाव" था जिसकी वजह से काँटे की टक्कर वाले इस मुकाबले में अभिलाषा चेल्लम की जीत नहीं हो सकी। हालांकि मंच से इन दोनों प्रतियोगियों ने किसी प्रकार की नाखुशी व्यक्त नहीं की, लेकिन एक जज "अवधूत गुप्ते" (जिन्होंने ठाकरे परिवार पर आधारित हाल ही में एक फ़िल्म "झेण्डा" का निर्माण किया है) ने इशारों-इशारों में ही बहुत कुछ कह दिया।

वहीं दूसरी तरफ़ महाराष्ट्र के कुछ संगीतप्रेमियों को इस बात पर ऐतराज़ हैं कि राहुल और अभिलाषा के कई मराठी उच्चारण दोषों को नज़र-अंदाज़ करके कई प्रतिभाशाली प्रतियोगियों को कार्यक्रम की "इमेज" बनाने के लिये जानबूझकर बाहर कर दिया गया है। अब ये तो पता नहीं कि अन्तिम समय पर क्या हुआ या ऐसे कार्यक्रमों की अन्दरूनी राजनीति क्या और कैसी रही, लेकिन मेरे कुछ वर्षों के "कानसेन" अनुभव के आधार पर यदि मुझे इन तीनों में से किसी को चुनने का मौका मिलता तो मैं निश्चित ही अभिलाषा चेल्लम को अपना वोट देता…। पहले मैं सिर्फ़ राहुल और अभिलाषा के वीडियो ही लगाने वाला था, लेकिन अब उर्मिला धनगर के दो सुपरहिट और खूब पसन्द किये गये गाने भी लगा रहा हूं, उर्मिला धनगर की आवाज़ में भी एक विशिष्ट ग्रामीण एवं लोकगायक का टच है जो उसे बाकियों से अलग करता है। पसन्द अपनी-अपनी, खयाल अपना-अपना, अब आप लोग खुद ही सुनें और अपना मत बतायें…।

बहरहाल, दो गैर-मराठी युवा कलाकारों ने काफ़ी समय से मुम्बई में चल रहे "ठाकरेवाद" की हवा निकालने की सफ़ल कोशिश की है। जय भारत, जय हिन्द तथा "जय हो महाराष्ट्र की संगीत परम्परा"

कळिदार कपुरी पान : http://www.youtube.com/watch?v=7IcZ03_G1kQ



पिकलं ज़ाम्भुळ तोड़ू नका - http://www.youtube.com/watch?v=twKyRx5oRmk




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21 comments:

संजय बेंगाणी said...

आज हम कहें कि हिन्दी मेरी है तो यह मुर्खता होगी, ठीक वैसे ही मराठी पर किसी का कोई अधिकार नहीं.
जो भाषा समझ न आए उसे गा लेना अजीब भी है और आश्चर्यजनक भी.
ठाकरेवाद अगर राष्ट्रवाद के आड़े आएगा तो अस्वीकार होगा ही.

SHASHI SINGH said...

सुरेश भाई,

यही वो कुछ बातें हैं ठाकरेवाद की महामारी के बाद भी मुम्बई में रहने का हौसला देती हैं।

इस महामारी पर अवधूत गुप्ते का हस्तक्षेप "झेण्डा" ने भी मुझे खासा प्रभावित किया... और यह यकीन दिया कि महाराष्ट्र में अभी भी राष्ट्र की चिंता करने वाली की कोई कमी नहीं है। संघ प्रमुख का ताजा बयान भी इसी तथ्य की पुष्टि करता है।

विक्रम एक शांत वादळ said...

सुरेश जी
आपसे आशा थी कि आप मराठी माणूस कि भावनाको समजते. आपके भाषामे आप उसे ठाकरे वाद कहते हे
मै ऐसे कितनेही लोग जो शिवसेना या मनसे को मानते हे उन्हे राहुल को जितने केलीये कोशिश करते हुये देखा है
मराठी माणूस कभी भी संगीत या प्रतिभा के बीच मै नही आता और नही कोई मराठी माणूस को राष्ट्रवाद शिखाये .
बाळासाहेब के प्रखर राष्ट्रवाद से सब वाकीफ है
चाहे ओ कोई 'खान' भी हो
जय हिंद
जय महाराष्ट्र !
जीवनमूल्य

जी.के. अवधिया said...

“संगीत” को किसी भी भाषा, किसी राजनीति, किसी क्षेत्रवाद, किसी ठाकरेवाद में बाँधा नहीं जा सकता ..."

भाषा, संगीत और देश तो महान हैं मूर्ख हैं वे जो इन्हें किसी भी वाद से बाँधने की कोशिश करते हैं!

Yogesh said...

बहुत उमदा लेख है । आज ये खबर आई है कि राज ठाकरे ने बयान दिया है कि महाराष्ट्र मे अगर काम करना है तो सिर्फ़ मराठी बोलने से काम नही चलेगा, जनम से भी मराठी होना चाहिए । इस बात से सब कुछ साफ हो जाता है कि दबाव कहा से था ।

Yogesh said...

बहुत उमदा लेख है । आज ये खबर आई है कि राज ठाकरे ने बयान दिया है कि महाराष्ट्र मे अगर काम करना है तो सिर्फ़ मराठी बोलने से काम नही चलेगा, जनम से भी मराठी होना चाहिए । इस बात से सब कुछ साफ हो जाता है कि दबाव कहा से था ।

संजय बेंगाणी said...

@ विक्रम, बाळासाहेब के प्रखर राष्ट्रवाद....क्या राष्ट्रवादी मराठी-हिन्दी-तमील के चक्कर में पड़ता है? क्षमा करना दोस्त क्षेत्रियता ने भारत को गुलाम बनाया था, उसका समर्थन करना नासमझी होगी.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

संजय जी ने मेरे मन की बात कह दी.

KAVITA RAWAT said...

Kisi par jabardasti bhasha thopna is rajnitikaran se sabko baahar aana hoga, tabhi desh ek kahlayega. yah bhashavaad sankirn mansikta ka parichayak or dushit rajniti ka karak hai. Ise sabhi logon ko bhali bhanti samjh lena hoga... Kisi ko bhashavaad mein bandhna murkhata hi hai, samjhdarinahi...
Bahut achha likha aapne.
Aapko bahut badhai

डॉ महेश सिन्हा said...

हद हो गयी

वैसे कोई नयी बात नहीं है तुछ राजनीति सब पे भारी

विक्रम एक शांत वादळ said...

@संजय बेंगाणी
जब भी देश कि बात या हिंदू धर्म कि बात आई है सबसे पहले बाळासाहेब ने आवाज उठाई है
उनके देशनिष्ठा या धर्मनिष्ठा पार शक खाना बेवखुफी कि बात होगी
मगर महाराष्ट्र में मराठी भाषा और उस संस्कृती का मन रखना चाहिये ऐसा उनका और पुरी राज्य का मत है तो उसमे गलत क्या है ?
जीवनमूल्य

दिलीप कवठेकर said...

आपकी बात से सहमत हूं.

दुख की बात यह है, कि ठाकरे की वजह से अधिकतर मराठीयों पर यह तोहमत लग रही है कि हम क्षेत्र वाद का समर्थन करतें है. आपकी इस पोस्ट से यह बात पक्की हो जानी चाहिये कि मराठीयों में न्यायप्रियता, रेशनेलिटी , और कला, साहित्य एवम संस्कृति की समझ है, और वे संकिर्णता की मानसिकता से कोसों दूर हैं.

बस यहां सहिष्णुता की वजह से नुकसान भी होता है.

मेरी समझ से अभिलाषा चेल्लम निस्संदेह बेहतर गायिका है. अगर किसी अंदरूनी राजनीति की बात ना करें (संभावना हो सकती है) तो उर्मिला धनगर को ज़्यादा वोट मिलनें का एक कारण यह भी हो सकता है, कि उसनें अधिकतर ग्रामीण और लोकसंगीत के टच लिये गानें लिये, जिसकी वजह से दूरस्थ ग्रामीण महाराष्ट्र में ज़्यादाह पसंद किया गया हो, और जिसे वोट में तब्दिल होना समझा जा सकता है.

वैसे भी गायक या गायिका की प्रतिभा किसी वोट से निर्धारित हो ही नहीं सकती, क्योंकि गुणवत्ता और लोकप्रियता के मापदंड में लोकप्रियता कहीं भी टिकती नहीं.

kayvatelte said...

सुरेश
अतिशय सुंदर लेख झालाय.आवडला..
इथे पण एक छान लेख आहे निरंजन ने लिहिलेला , वाचुन बघा..
http://preview.tinyurl.com/yzpaj7y

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

वीर शिवाजी जो पूरे भारत का गौरव है आज विचलित होन्गे कि उन्के नाम क उप्योग करने वाले लोग कितनी तुच्छ मानसिकता क प्रदर्शन कर रहे है . ईश्वर इस ठाकरे परिवार को सदबुद्धी प्रदान करे .
एक हमारे पारिवारिक संरक्षक स्व.कुशाभाऊ ठाकरे थे जो इन ठाकरे लोगो से लाख दर्जे अब्बल थे

Anil Pusadkar said...

राजनिती जो न कराये कम है!

सुलभ § सतरंगी said...

जैसे भारत में बांगला गीत-संगीत गौरव के प्रतीक हैं वैसे ही मराठी भाषा और संगीत भी है. यहाँ आलोचना सिर्फ राजनीत या सामजिक जीवन में क्षेत्रवाद को बढ़ावा देने वालों की हो रही है.

राष्ट्रवाद एक ऐसी धारणा हैं जहाँ कभी किसी क्षेत्रीय भाषा की गुलामी नहीं की जा सकती. यदि हम भाषाई लड़ाई या क्षेत्रवाद को ले लड़ते रहे तो कभी भी राष्ट्र उन्नत नहीं हो पायेगा.

SANJAY KUMAR said...

During my long stay in MUMBAI, I had not come across a single Taxi Driver who could not communicate in Marathi, I am sure, others' experiance may not be very different.

It is Thakreys who projected Non-Maharastrian Taxi Drivers as anti-marathi.

During my stay I picked Marathi on my own and many Maharastrian appreciate my command over Marathi.

BUT I certainly object, if someone dictate me to speak a particular language to become eligible to stay in a particular city.

Moreover,
If a person who dictate a hindu not to celebrate his festival say Chhath, dictate against speaking National Language can be any other thing than a Nationalist.

flare said...

ब्लॉगिंग के नशे के बाद संगीत का नशा ही लेता हूं…

गलत !!!!! सबसे बड़ा नशा है ................ बढ़िया भोजन का नशा .......... :)

मनुज said...

@सुरेश जी, एक बात जो मैं आपसे कहना चाहूँगा वो ये है कि हमें किसी समूह या व्यक्ति पर "टेग" नहीं लगाना चाहिए. जैसा कि आपने लिखा -
"खास बात इसलिये भी है, कि संगीत, नाटक, अभिनय आदि की समालोचना मराठी लोग बड़ी ही सूक्ष्म दृष्टि से करते हैं और सच्चे अर्थों में उच्च दर्जे का कलाकार ही यहाँ टिक पाता है। "

अब अगर, दादा कोंडके की लोकप्रियता से मराठी लोगो के विषय में ये अंदाज़ा लगाया जाये (यानि कि उनपर टेग लगाया जाये ) कि मराठी जनमानस फूहड़ और द्विअर्थी संवादों को पसंद करने वाले लोग है जो कि निम्न स्तर के मनोरंजन पसंद करते है, तो निश्चित रूप से ये एक गलत बात होगी.
हर समाज में हर तरह के लोग होते हैं, और जैसे काबुल के घोड़े विश्वप्रसिद्ध हैं पर इसका ये अर्थ कतई नहीं है कि वहां गधे नहीं पाए जाते !

अब दूसरी बात, इस क्षेत्रीयता की संक्रींड देशतोदू राजनीति को मात्र "राज-ठाकरेवाद" कह देना एक तरह से बाल ठाकरे और उनके तालिबानी गुंडों को "नो ओब्जेक्शन सर्टिफिकेट" दे देना है. अगर राज गद्दार है तो चचा भी कोई दूध के नहाये हुए नहीं हैं....

वस्तुतः राज अपने चाचा की ही विचारधारा को ही आगे बढ़ा रहे हैं. चचा के बयानों को सुनकर तो ऐसा लगता है कि वो बिलकुल ही सठिया गए हो. कभी कभी तो अमर सिंह से भी बड़े बक्चोद मालूम होते हैं...

गौर फरमाईयेगा ज़रा

मनुज said...

मैं आपकी बेबाक और आग-उगलती शैली का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ ; मैंने पिछली टिप्पड़ी इसलिए की क्यूंकि मैंने "आपको" राष्ट्रवाद के मुद्दे पर कुछ कम बेबाकी दिखाते देखा, जो कि आपके लिखने का स्टाइल नहीं है. मैं बस इतना चाहता हूँ कि राष्ट्रवाद के मुद्दे पर आप कभी अपनी कलम को ढीला न पड़ने दें.

जितनी बेबाकी से आप कमीनिस्टों और "छद्म-सेकुलरों" की बखिया उधेड़ते रहे हैं, उसी तरह से आप इन नकली-हिंदुत्व-वादियों को भी न बख्शे!

अनामिका!!!!! said...

नमस्कार !
हो सके तो यंहा भी भेट दे.
http://www.misalpav.com/node/10899