Monday, February 22, 2010

राहुल गाँधी का ज्ञान, राजनीति और मार्केटिंग के फ़ण्डे … … Rahul Gandhi Indian Politics and Marketing

मार्केटिंग मैनेजमेण्ट के कुछ खास सिद्धान्त होते हैं, जिनके द्वारा जब किसी प्रोडक्ट की लॉंचिंग की जाती है तब उन्हें आजमाया जाता है। ऐसा ही एक प्रोडक्ट भारत की आम जनता के माथे पर थोपने की लगभग सफ़ल कोशिश हुई है। मार्केटिंग के बड़े-बड़े गुरुओं और दिग्विजय सिंह जैसे घाघ और चतुर नेताओं की देखरेख में इस प्रोडक्ट यानी राहुल गाँधी की मार्केटिंग की गई है, और की जा रही है। जब मार्केट में प्रोडक्ट उतारा जा रहा हो, (तथा उसकी गुणवत्ता पर खुद बनाने वाले को ही शक हो) तब मार्केटिंग और भी आक्रामक तरीके से की जाती है, बड़ी लागत में पैसा, श्रम और मानव संसाधन लगाया जाता है, ताकि घटिया से घटिया प्रोडक्ट भी, कम से कम लॉंचिंग के साथ कुछ समय के लिये मार्केट में जम जाये। (मार्केटिंग की इस रणनीति का एक उदाहरण हम “माय नेम इज़ खान” फ़िल्म के पहले भी देख चुके हैं, जिसके द्वारा एक घटिया फ़िल्म को शुरुआती तीन दिनों की ओपनिंग अच्छी मिली)। सरल भाषा में इसे कहें तो “बाज़ार में माहौल बनाना”, उस प्रोडक्ट के प्रति इतनी उत्सुकता पैदा कर देना कि ग्राहक के मन में उस प्रोडक्ट के प्रति लालच का भाव पैदा हो जाये। ग्राहक के चारों ओर ऐसा वातावरण तैयार करना कि उसे लगने लगे कि यदि मैंने यह प्रोडक्ट नहीं खरीदा तो मेरा जीवन बेकार है। हिन्दुस्तान लीवर हो या पेप्सी-कोक सभी बड़ी कम्पनियाँ इसी मार्केटिंग के फ़ण्डे को अपने प्रोडक्ट लॉंच करते समय अपनाती हैं। ग्राहक सदा से मूर्ख बनता रहा है और बनता रहेगा, ऐसा ही कुछ राहुल गाँधी के मामले में भी होने वाला है।

राहुल बाबा को देश का भविष्य बताया जा रहा है, राहुल बाबा युवाओं की आशाओं का एकमात्र केन्द्र हैं, राहुल बाबा देश की तकदीर बदल देंगे, राहुल बाबा यूं हैं, राहुल बाबा त्यूं हैं… हमारे मानसिक कंगाल इलेक्ट्रानिक मीडिया का कहना है कि राहुल बाबा जब भी प्रधानमंत्री बनेंगे (या अपने माता जी की तरह न भी बनें तब भी) देश में रामराज्य आ जायेगा, अब रामराज्य का तो पता नहीं, रोम-राज्य अवश्य आ चुका है (उदाहरण – उड़ीसा के कन्धमाल में यूरोपीय यूनियन के चर्च प्रतिनिधियों का दौरा)।

जब से मनमोहन सिंह दूसरी बार प्रधानमंत्री बने हैं और राहुल बाबा ने अपनी माँ के श्रीचरणों का अनुसरण करते हुए मंत्री पद का त्याग किया है तभी से कांग्रेस के मीडिया मैनेजरों और “धृतराष्ट्र और दुर्योधन के मिलेजुले रूप” टाइप के मीडिया ने मिलकर राहुल बाबा की ऐसी छवि निर्माण करने का “नकली अभियान” चलाया है जिसमें जनता स्वतः बहती चली जा रही है। दुर्भाग्य यह है कि जैसे-जैसे राहुल की कथित लोकप्रियता बढ़ रही है, महंगाई भी उससे दोगुनी रफ़्तार से ऊपर की ओर जा रही है, गरीबी भी बढ़ रही है, बेरोज़गारी, कुपोषण, स्विस बैंकों में पैसा, काला धन, किसानों की आत्महत्या… सब कुछ बढ़ रहा है, ऐसे महान हैं हमारे राहुल बाबा उर्फ़ “युवराज” जो आज नहीं तो कल हमारी छाती पर बोझ बनकर ही रहेंगे, चाहे कुछ भी कर लो।

मजे की बात ये है कि राहुल बाबा सिर्फ़ युवाओं से मिलते हैं, और वह भी किसी विश्वविद्यालय के कैम्पस में, जहाँ लड़कियाँ उन्हें देख-देखकर, छू-छूकर हाय, उह, आउच, वाओ आदि चीखती हैं, और राहुल बाबा (बकौल सुब्रह्मण्यम स्वामी – राहुल खुद किसी विश्वविद्यालय से पढ़ाई अधूरी छोड़कर भागे हैं और जिनकी शिक्षा-दीक्षा का रिकॉर्ड अभी संदेह के घेरे में है) किसी बड़े से सभागार में तमाम पढे-लिखे और उच्च समझ वाले प्रोफ़ेसरों(?) की क्लास लेते हैं। खुद को विवेकानन्द का अवतार समझते हुए वे युवाओं को देशहित की बात बताते हैं, और देशहित से उनका मतलब होता है NSUI से जुड़ना। जनसेवा या समाजसेवा (या जो कुछ भी वे कर रहे हैं) का मतलब उनके लिये कॉलेजों में जाकर हमारे टैक्स के पैसों पर पिकनिक मनाना भर है। किसी भी महत्वपूर्ण मुद्दे पर आज तक राहुल बाबा ने कोई स्पष्ट राय नहीं रखी है, उनके सामान्य ज्ञान की पोल तो सरेआम दो-चार बार खुल चुकी है, शायद इसीलिये वे चलते-चलते हवाई बातें करते हैं। वस्तुओं की कीमतों में आग लगी हो, तेलंगाना सुलग रहा हो, पर्यावरण के मुद्दे पर पचौरी चूना लगाये जा रहे हों, मंदी में लाखों नौकरियाँ जा रही हों, चीन हमारी इंच-इंच ज़मीन हड़पता जा रहा हो, उनके चहेते उमर अब्दुल्ला के शासन में थाने में रजनीश की हत्या कर दी गई हो… ऐसे हजारों मुद्दे हैं जिन पर कोई ठोस बयान, कोई कदम उठाना, अपनी मम्मी या मनमोहन अंकल से कहकर किसी नीति में बदलाव करना तो दूर रहा… “राजकुमार” फ़ोटो सेशन के लिये मिट्टी की तगारी उठाये मुस्करा रहे हैं, कैम्पसों में जाकर कांग्रेस का प्रचार कर रहे हैं, विदर्भ में किसान भले मर रहे हों, ये साहब दलित की झोंपड़ी में नौटंकी जारी रखे हुए हैं… और मीडिया उन्हें ऐसे “फ़ॉलो” कर रहा है मानो साक्षात महात्मा गाँधी स्वर्ग (या नर्क) से उतरकर भारत का बेड़ा पार लगाने आन खड़े हुए हैं। यदि राहुल को विश्वविद्यालय से इतना ही प्रेम है तो वे तेलंगाना के उस्मानिया विश्वविद्यालय क्यो नहीं जाते? जहाँ रोज-ब-रोज़ छात्र पुलिस द्वारा पीटे जा रहे हैं या फ़िर वे JNU कैम्पस से चलाये जा रहे वामपंथी कुचक्रों का जवाब देने उधर क्यों नहीं जाते? लेकिन राहुल बाबा जायेंगे आजमगढ़ के विश्वविद्यालय में, जहाँ उनके ज्ञान की पोल भी नहीं खुलेगी और वोटों की खेती भी लहलहायेगी। अपने पहले 5 साल के सांसद कार्यकाल में लोकसभा में सिर्फ़ एक बार मुँह खोलने वाले राजकुमार, देश की समस्याओं को कैसे और कितना समझेंगे?

कहा जाता है कि राहुल बाबा युवाओं से संवाद स्थापित कर रहे हैं? अच्छा? संवाद स्थापित करके अब तक उन्होंने युवाओं की कितनी समस्याओं को सुलझाया है? या प्रधानमंत्री बनने के बाद ही कौन सा गज़ब ढाने वाले हैं? जब उनके पिताजी कहते थे कि दिल्ली से चला हुआ एक रुपया गरीबों तक आते-आते पन्द्रह पैसा रह जाता है, तो गरीब सोचता था कि ये “सुदर्शन व्यक्ति” हमारे लिये कुछ करेंगे, लेकिन दूसरे सुदर्शन युवराज तो अब एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि गरीबों तक आते-आते सिर्फ़ पाँच पैसा रह जाता है। यही बात तो जनता जानना चाहती है, कि राहुल बाबा ये बतायें कि 15 पैसे से 5 पैसे बचने तक उन्होंने क्या किया है, कितने भ्रष्टाचारियों को बेनकाब किया है? भ्रष्ट जज दिनाकरण के महाभियोग प्रस्ताव पर एक भी कांग्रेसी सांसद हस्ताक्षर नहीं करता, लेकिन राहुल बाबा ने कभी इस बारे में एक शब्द भी कहा? “नरेगा” का ढोल पीटते नहीं थकते, लेकिन क्या राजकुमार को यह पता भी है कि अरबों का घालमेल और भ्रष्टाचार इसमें चल रहा है? हाल के पंचायत चुनाव में अकेले मध्यप्रदेश में ही सरपंच का चुनाव लड़ने के लिये ग्रामीण दबंगों ने 1 करोड़ रुपये तक खर्च किये हैं (और ये हाल तब हैं जब मप्र में भाजपा की सरकार है, सोचिये कांग्रेसी राज्यों में “नरेगा” कितना कमाता होगा…), क्योंकि उन्हें पता है कि अगले पाँच साल में “नरेगा” उन्हें मालामाल कर देगा… कभी युवराज के मुँह से इस बारे में भी सुना नहीं गया। अक्सर कांग्रेसी हलकों में एक सवाल पूछा जाता है कि मुम्बई हमले के समय ठाकरे परिवार क्या कर रहा था, आप खुद ही देख लीजिये कि राहुल बाबा भी उस समय एक फ़ार्म हाउस पर पार्टी में व्यस्त थे… और वहाँ से देर सुबह लौटे थे… जबकि दिल्ली के सत्ता गलियारे में रात दस बजे ही हड़कम्प मच चुका था, लेकिन पार्टी जरूरी थी… उसे कैसे छोड़ा जा सकता था।



अरे राहुल भैया, आप शक्कर के दाम तक तो कम नहीं करवा सकते हो, फ़िर काहे देश भर में घूम-घूम कर गरीबों के ज़ख्मों पर नमक मल रहे हो? लेकिन यहाँ फ़िर वही मार्केटिंग का फ़ण्डा काम आता है कि प्रोडक्ट की कमियाँ ढँक कर रखो, उस प्रोडक्ट के “साइड इफ़ेक्ट” के बारे में जनता को मत बताओ, और यह काम करने के लिये टाइम्स ऑफ़ इंडिया, NDTV, द हिन्दू से लेकर तमाम बड़े-बड़े अखबारी-मीडिया-टीवी घराने (जिन्हें आजकल जनता “भाण्ड-गवैया” समझती है) लगे हुए हैं… लेकिन यह लोग एक बात भूल रहे हैं कि किसी प्रोडक्ट से अत्यधिक आशायें जगा देना भी बेहद खतरनाक होता है, क्योंकि जब वह प्रोडक्ट जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता तब हालात और बिगड़ जाते हैं। यदि प्रोडक्ट कोई निर्जीव पदार्थ हो तो ज्यादा से ज्यादा उस कम्पनी को नुकसान होगा, लेकिन राहुल गाँधी नामक नकली प्रोडक्ट जब फ़ेल होगा, तब सामाजिक स्तर पर क्या-क्या और कैसा नुकसान होगा…

जाते-जाते : ईमानदारी से बताईयेगा कि उड़ीसा में चर्च के प्रतिनिधियों के दौरे वाली शर्मनाक खबर के बारे में आपने पुण्यप्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, किशोर अजवाणी, विनोद दुआ, पंकज पचौरी, प्रणय “जेम्स” रॉय, राजदीप सरदेसाई, दिबांग आदि जैसे तथाकथित स्टार पत्रकारों से कोई “बड़ी खबर”, या कोई “सबसे तेज़” खबर, या कोई परिचर्चा, कोई “सामना”, कोई “मुकाबला”, कोई “सीधी बात”, कोई “हम लोग” जैसा कितनी बार सुना-देखा है? मेरा दावा है कि इस मुद्दे को दरी के नीचे खिसकाने में मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है, और यह ऐसा कोई पहला मामला भी नहीं है, मीडिया हमेशा से ऐसा करता रहा है, और जब कहा जाता है कि मीडिया “पैसे के भूखे लोगों का शिकारी झुण्ड” है तो कुछ लोगों को मिर्ची लग जाती है। यही मीडिया परिवार विशेष का चमचा है, सम्प्रदाय विशेष का दुश्मन है, पार्टी विशेष के प्रति प्रेम भावना से आसक्त है…

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युवाओं से अनुरोध है कि इस लेख को अपने “राहुल भक्त” मित्रों को ट्वीट करें, ऑरकुट करें, फ़ॉरवर्ड करें… ताकि वे भी तो जान सकें कि जिस प्रोडक्ट को मार्केटिंग के जरिये उनके माथे पर ठेला जा रहा है, वह प्रोडक्ट कैसा है…


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29 comments:

संजय बेंगाणी said...

पुण्यप्रसून वाजपेयी, रवीश कुमार, किशोर अजवाणी, विनोद दुआ, पंकज पचौरी, प्रणय “जेम्स” रॉय, राजदीप सरदेसाई, दिबांग आदि भी प्रोडक्ट ही है. मीडिया मालिकों को द्वारा तैयार मुखौटे. सिने सितारों जैसे....


मार्केटिंग को गलत नहीं मानता. ढोल की पोल खूल ही जाती है. आज नहीं तो कल राहुल भाई को कठीन सवालों से आमने सामने होना ही पड़ेगा, तब परिक्षा हो जाएगी.

सिख पाकिस्तान में मरे है, हम कुछ नहीं कर सकते यह वहाँ का अन्दरूनी मामला है. फिर कंधमाल कैसे बहारी मामला हो गया? धिक्कार तो ईसाईयों को है जो यहाँ का न्यायालय, सरकार, सुरक्षा तंत्र पराया लगता है और युरोपिय अपने, जो वहाँ से मंडल को पकड़ लाए.

Amit said...

What an eye opening report!

पी.सी.गोदियाल said...

गुलाम मानसिकता का दोष है ! अजय कुमार झा जी की एक कविता हल ही में पढी थी, शुरुआती चार लेने कुछ इस तरह थी ;
जो दिखता है, वो बिकता है, और,
जो बिकता है, वही दिखता है।
दर्द बेचो , या नंगापन,
अच्छी पैकिंग में सब बिकता है॥

मिहिरभोज said...

जो दिखता है, वो बिकता है, और,
जो बिकता है, वही दिखता है।
दर्द बेचो , या नंगापन,
अच्छी पैकिंग में सब बिकता है॥
.......इस से सटीक और क्या कहें......हमारा भी मत दर्ज करें....

जी.के. अवधिया said...

भीतर का माल थोड़े ही दिखाई देता है, दिखता तो सिर्फ पैकिंग ही है। बस पैकिंग जोरदार होनी चाहिये, माल अपने आप बिकता है!

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

पत्रकारों के बारे में आपने एक लेख में सबकुछ लिख ही दिया था. फिर हम उनसे कैसे सत्य और निष्पक्षता की उम्मीद करें.

योगेन्द्र सिंह शेखावत said...

राहुल गाँधी युवा राजनीति के दूत बने फिरते हैं | युवाओं के कांग्रेसी दल को ज्वाइन करने के लिए उन्होंने अधिकतम उम्र 35 साल कर रखी है | सबसे पहले तो उनको युवा दल की अध्यक्षता छोडनी होगी | क्योंकि वो खुद इस बार जून में 40 साल हो जायेंगे | पांच साल ऊपर हो चुके हैं युवा उम्र से |
फिर वो मंत्रालय पद लेकर कब देश के लिए काम करना शुरू करेंगे | युवा राजनीति की बात करने वाला ये इंसान क्या खुद भी 50-60 साल का होकर वही टिपिकल नेताओं वाली नेतागिरी करेगा ? ये ढकोसले इसको बंद करने चाहिए | इनके छोड़े हुए दलाल सारे दिन एम्.एल.एम् कंपनियों के एजेंट की तरह स्कीम लिए फिरते हैं और सभी को कांग्रेस पार्टी ज्वाइन करवाते फिर रहे हैं, उनको एक निश्चित समय का टारगेट मिलता है और वो हर किसी को ज्वाइन करवाते फिरते हैं टारगेट पूरा करने के लिए !!
इसका मतलब इनके अनुसार मैं कांग्रेस पार्टी ज्वाइन किये बगैर देश के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वाह नहीं कर पाउँगा !! शायद भविष्य में ऐसा ही हो जो कांग्रेसी नहीं होगा वो देशद्रोही हो जायेगा |

वैसे सुरेश सर, राहुल गाँधी JNU एक बार जा चुके हैं और उनको वह कुछ छात्रों के भी विरोध का सामना भी करना पड़ा था और कुछ छात्रों के सवालों के जवाब भी वो नहीं दे पाए थे और इसलिए राहुल गाँधी ने वहां से जल्दी निकलने में ही भलाई समझी |

HINDU TIGERS said...

बौद्धिक गुलाम मिडीया कर्मी सारे देश को इटालियन वाई एंटोनियो माईनो मारियो के इस नलायक का गुलाम बनाने पर तुले हैं

HINDU TIGERS said...

बौद्धिक गुलाम मिडीया कर्मी सारे देश को इटालियन वाई एंटोनियो माईनो मारियो के इस नलायक का गुलाम बनाने पर तुले हैं

HINDU TIGERS said...

बौद्धिक गुलाम मिडीया कर्मी सारे देश को इटालियन वाई एंटोनियो माईनो मारियो के इस नलायक का गुलाम बनाने पर तुले हैं

उम्दा सोच said...

ग्राहक सदा से मूर्ख बनता रहा है और बनता रहेगा, ऐसा ही कुछ राहुल गाँधी के मामले में भी होने वाला है।

Ratan Singh Shekhawat said...

बहुत सटीक लिखा है आपने | आपके राहुल बाबा के सम्बन्ध में विचारों से १००% सहमत |


“नरेगा” का ढोल पीटते नहीं थकते, लेकिन क्या राजकुमार को यह पता भी है कि अरबों का घालमेल और भ्रष्टाचार इसमें चल रहा है?
@ नरेगा ने भ्रष्टाचार के साथ साथ हराम खोरी को भी जन्म दिया है आज नरेगा की वजह से बिना मेहनत के मजदूरी मिलने के चलते गांवों तक में कोई मजदूरी करने को राजी नहीं है यदि एसा ही रहा तो वो दिन दूर नहीं जब हर कोईबिना मेहनत के सरकारी रोटी तोड़ने के चक्कर में रहेगा |

shivendra sinha said...

धन्य हो प्रभु आप धन्य हो
हर पोस्ट में सिर्फ एक ही चीज देखता हूँ कि आप किसी न किसी बहाने गांधी परिवार पर कीचड फेंका करते हैं. कोई भी घटना में आप गांधी परिवार के ऊपर जहर उगले बिना नहीं रहते. राहुल तो ठाकरे के गढ़ में जाकर भी उनके खिलाफ एक भी विद्वेष भरा शब्द नहीं बोलते. यह शालीनता उनके खून में है. ये बाजार में नहीं मिलती.

हर सार्थक और सकारात्मक चीजों का विरोध करना ही आपका उद्देश्य मात्र है. लगता तो ऐसा है जैसे कोई आपको प्रोडक्ट के तौर पर लांच कर रहा हो.

देश अगर किसी युवा की तरफ आशा भरी नजरों से देख रहा है तो यह रातों रात नहीं हुआ ! त्याग और आदर्श का उदाहरण सामने रखा है

.... खैर आप जैसे लोग नहीं समझ सकते

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय सुरेश जी,

आपके आज के लेख के एक-एक शब्द से सहमत,

पर इस मर्ज की जड़ें काफी गहरी हैं...दरअसल भारतीय उपमहाद्वीप अभी तक शासक-शासित की मानसिकता से बाहर नहीं निकल पाया है...और इसी का नतीजा है पाकिस्तान के भुट्टो, भारत के गांधी-नेहरू, लंका के बंडारानायके, बांग्लादेश के मुजीबुर्रहमान और जियाउर्रहमान राजवंश...

अब राहुल जी के चाणक्य दिग्विजय सिंह जी को ही ले लीजिये...क्या कमी है उनमें...योग्य हैं, अनुभव है, ईमानदार हैं, बेदाग हैं...पर केवल चाणक्य बनने को ही जीवन ध्येय मान बैठे हैं...क्योंकि उनकी, बाकी लोगों की और मोटे तौर पर हमारी अधिकांश जनता की नजरों में राजगद्दी पर तो प्रभु ही ज्यादा जंचते हैं।

हजारों हजार साल हम लोग शासित रहें हैं राजवंशों के नीचे...मानसिक गुलामी की बनाई यह ग्लास सीलिंग इतनी जल्दी नहीं टूट सकती...शरद पवार का अंजाम तो देख ही चुके हैं सब...मनमोहन सिंह जी तो मात्र गद्दी गरम रखने का कार्य कर रहे हैं प्रभु के लिये!

आभार!

योगेन्द्र सिंह शेखावत said...

@ शिवेंद्र
सही पॉइंट है आपका लेकिन इस लेख पर नहीं जमता | ये सही है की किसी की निजी जिंदगी से हमारा ज्यादा ताल्लुक नहीं होना चाहिए | लेकिन गाँधी परिवार ही सत्ता में पिछले 60 सालों में ज्यादा रहा है | और देश की उन्नति-अवनति की चर्चा पर सत्ता के विश्लेषण होने पर वे अछूते नहीं रह सकते हैं | देश के विकास में अगर उनका हिस्सा है तो देश में जो समस्याएं उत्पन्न हुयी हैं उनकी जिम्मेवारी कौन लेगा | ये तो कुछ वैसी ही बात हुयी की भारत के पिछले 60 सालों में हुए युद्धों की बात हो और पाकिस्तान को कोई गाली भी न दे | एवं राहुल गाँधी की विशुद्ध रूप से मार्केटिंग हो रही है इस बात से मैं 101 % सहमत हूँ |वो देश भर में दिखावे वाले दौरे कर-कर के क्या सिद्ध कर रहे हैं मुझे समझ में नहीं आता |

देश की मुद्रा जो 1948 में 1$ = 3.30 INR थी आज 1$ = 46 INR के ऊपर जा रही है उसका जिम्मेवार कौन है | 1988 में जो 1$ = 13.91 INR तक ही पहुंचा था, मतलब आजादी के 40 साल बाद तक भी जो केवल 10 Rs. तक बढ़ा वो अगले 20 सालों में ही 30 Rs. से भी ज्यादा उछाल मारकर 1$ = 45 INR के पार जा रहा है, अगले आधे वर्षों में तिगुनी प्रगति | इस प्रगति के जिम्मेदार कांग्रेस के ये दो होनहार वित्त मंत्री मनमोहन सिंह और पी. चिदंबरम रहे हैं |

आपने जो फ़रमाया है शालीनता, उस हिसाब से तो सारे दिन विश्व शांति और शालीनता के बातें करने वाला और पर्यावरण की सुरक्षा के लिए चिंतित, भूखे नंगे लोगों के विकास के लिए चिंतित अमेरिका भी वाकई में एक महान पूजनीय देश है | और उसके कई राष्ट्रपतियों को नोबेल पुरष्कार (शांति प्रयासों के लिए) भी मिल चुके हैं | अगर आप मानते हैं की अमेरिका ने वाकई में विश्व में शांति फैलाई है तब तो आपका आज का कमेन्ट सही है वरना गलत, क्योंकि आपकी बात खुले आम वाले आतंकवादी और युनिफोर्म वाले आतंकवादी वाले कथन को न समझने को दर्शातीहै |

एक बात और अगर आपका ये कमेन्ट नेहरु-गाँधी राजवंश के लेख पर आया होता तो मैं वाकई में आपके समर्थन में होता |

ई-गुरु राजीव said...

हमें राहुल से कोई शिकायत नहीं है, बड़े लोग हैं भाई. अपना तो खून-पानी, जीना-मरना बेमानी. उनका तो हगना भी सोना होता है.

Chinmay said...

शिवेंद्र जी राहुल गाँधी युवा तो बिल्कुल नहीं है ४० साल के बूढउ को आप कम से कम हम युवाओं का नेता न ही कहें तो अच्छा. ५ वीं कक्षा में पढ़ने वाला बच्चा भी राहुल जी से अधिक सामान्य ज्ञान रखता है , जानता है कि बिहार और गुजरात अलग राज्य हैं , हमारे राहुल जी तो माशाल्लाह बिहार में अहमदाबाद वाला रटा रटाया भाषण बोल देते हैं , और पकड़े जाने पर सिर पर पाँव रख कर भाग जाते हैं. यकीन न हो तो यू ट्यूब पे राहुल जी की फ़ज़ीहत खुद देख लो!

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

युवराज जी की किरकिरी इस विडियो में देख लीजिये, बिहार से है ये :

http://www.youtube.com/watch?v=sIv_rtFWLps

वस्तुओं के आसमान छुते कीमतों से कभी कभी ये सक होने लगता है की कहीं ये कांग्रेस की सोची समझी निति का ही तो हिस्सा नहीं है ये ? ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है की अगले चुनाव में राहुल बाबा के नाम पर ही वोट माँगा जाएगा .... राहुल के आते ही वस्तुओं के दाम Bottom पे होंगे ... चुकी दाम पहले से ही आसमान छू रहे हैं तो दाम कम होने की काफी गुन्जाईस रहेगी |

कुछ भी कहिये राहुल बाबा की मार्केटिंग की दाद देता हूँ ... मार्केटिंग सच में जबरदस्त है ...

Mithilesh dubey said...

सुरेश भईया आपका लेख पढ़कर बहुत ही बढ़िया लगा , आपसे पूरी तरह से सहमत हूँ ।

सौरभ आत्रेय said...

@शिवेंद्र
अपनी आशा को देश की आशा मत कहो, कोई तथ्य सामने रखो अगर तुम्हारे पास उत्तर है तो. पता नहीं तुम लोगो को एक बेवकूफ में किसी आशा दिखती है.

@प्रवीण शाह
चाणक्य जैसे विद्वान पुरुष कि तुलना आपने एक दिग्विजय जैसे पालतू कुत्ते, महाचमचे से कैसे कर दी. चाणक्य तो चंद्रगुप्त के एक ब्राह्मण विद्वान सन्यासी गुरु थे जिन्होंने राष्ट्र हित के लिए कार्य किये और स्वयं एक कुटिया में रहे. उस संत कि तुलना एक गद्दार से मत करिये.

सुरेश जी के लेख से १००% सहमत, बहुत ही अच्छा लिखा है.

संजय बेंगाणी said...

मार्केटिंग के बल पर तो काला पानी "कोला" भी सोने के भाव बिकता है, फिर यह तो गोरा-चिट्टा छोरा है. :)

संजय बेंगाणी said...

@ शिवेन्द्रजी, देश का मतलब अगर कॉंग्रेस है तो जैसे कि इंडिया का मतलब इंदिरा होता है, तो देश जरूर राहुल बाबा को आशा भरी नजरों से देख रहा है. कॉंग्रेस इस आशा को पूरा काहे नहीं कर रही, सत्ता तो उसी के पास है?

psudo said...

Fully agree with you Suresh ji. Almost for last 60 years with help of foriengers this family has looted country like crazy. They have always been ready to be pawn of world powers. But the real problem lies with all of us who are not able to get rid of corrupt politicans.

जयराम “विप्लव” { jayram"viplav" } said...

शिवेंद्र जी , राहुल से आप कौन सी आशा लिए बैठे हैं ? गरीबों की कुटिया को पवित्र कर देने भर से काम नहीं चलेगा , उनका पेट भरने का कोई उपाय बताएं आपके राहुल बाबा ? लोगों के यहाँ जा -जा कर उनकी बदहाली के बारे में चर्चा कर देने से क्या उनकी समस्याएं ख़त्म हो जाएँगी ? तमाम योजनाओं का पैसा जनता तक पहुँचते -पहुँचते १० % हो जाता है यह सभी जानते हैं पर समस्याओं को जानते हुए उनका हल न धुंध पाना क्या जनता के जख्मों पर नामक छिड़कने जैसा नहीं है ?
जिस राहुल के एक इशारे पर हजारों करोड़ रुपयों के खर्चे वाले बुंदेलखंड विकास प्राधिकरण का गठन हो जाता हो , जिसके मुंह से एक बार कलावती का नाम निकल जाए तो वो लखपति बन जाती हो , उस सर्वशक्तिमान के रहते देश के अन्य पिछडे क्षेत्रों और करोडों कलावतियों की दशा दयनीय क्यों है ? अब , सवाल यह उठता है कि क्या आने वाले दिनों में जनता {विशेष रूप से गरीब और दलित} यह हकीकत समझ पाएगी ? क्या कोई दलित राहुल से यह सवाल पूछने की हिम्मत जुटा पायेगा कि आये तो सही पर क्या लाये हो हमारे लिए ?

जिस शालीनता की बात आप कर रहे हैं वह तो राजनीति का पहला नियम है राजनीति में स्वांग तो रचाना हीं पड़ता है !

K__Kash said...

@ सुरेशजी
आप की पोस्ट चेक करना
http://blog.sureshchiplunkar.com/2008/12/blog-post.html
बराबर १ साल बाद और १ महीने बाद फिर १३ तारीख को पुणे में बॉम्ब स्फोट हुआ तो फिर १ महीने का गॅप रख कर १३ एप्रिल को देखेंगे क्या होगा

२००८ में १ -१ महीने के गॅप से बॉम्ब स्फोट हुए है बाद में २००९ का १ साल का गॅप
जैसे २००८ में महीने के गॅप वैसे ही १ साल का भी गॅप हुआ. २००८ में जिन महीनो में बॉम्ब स्फोट नही हुए है उन महीनो में शायद २०१० मे बॉम्ब स्फोट हो सकते है

K__Kash said...

१३ एप्रिल को या तो २६ एप्रिल को देखेंगे.

sunil patel said...

राहुल जी का बहुत ठीक विश्लेषण किया है सुरेश जी ने.

वाकई हमारे मीडिया ने इस परिवार को सर पैर पर बताने में कोई कसार नहीं छोड़ी है. इन्हें देव परिवार का दर्जा दिया है. हमारे शिक्षा व्यसाय (१२ साल स्कूल और ३ साल स्नातक और २ साल स्नातकोत्तर) की शिक्षा के बाद भी हमें देश के इतिहास, वर्तमान आदि की वास्तविक जानकारी नहीं मिल पति है जो की सुरेश जी की पोस्ट और उनके लेख में प्राप्त टिप्पनिओं से मिल जाती है.

nitin tyagi said...

great

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

और कितने साल सोओगे ?????? ... जागो ग्राहक जागो !!