Friday, January 22, 2010

जो काम रीढ़विहीन नेता नहीं कर पाये, IPL के फ़्रेंचाइज़ी ने कर दिखाया…... IPL-3, Pakistani Cricket Players, India-Pakistan Relations

IPL नामक बाजीगरीनुमा भौण्डा तमाशा मुझे पहले एपीसोड से ही पसन्द नहीं था, इसके दूसरे एपीसोड के बाद, जबकि इसे अपने देश से बाहर आयोजित किया गया तब भी इसके प्रति कभी खास रुचि जागृत नहीं हुई। कितनी ही चीयरलीडर्स आई-गईं, लेकिन कभी भी शान्ति से बैठकर IPL के 4 ओवर देखने की भी इच्छा नहीं हुई।

इसीलिये जब IPL के तीसरे संस्करण की बोलियाँ लगाने सम्बन्धी खबर पढ़ी तब कोई उत्सुकता नहीं जागी, कोई भी धनपति किसी भी खिलाड़ी को खरीदे-बेचे मुझे क्या फ़र्क पड़ने वाला था, नीता अम्बानी, प्रीति जिण्टा से हारे या जीते मुझे अपनी नींद खराब क्यों करना चाहिये? वैसा ही सब कुछ आराम से चल रहा था, लेकिन खिलाड़ियों की नीलामी के अगले दिन जब यह सुखद खबर आई कि टी-20 विश्वकप के “मैन ऑफ़ द सीरिज” शाहिद अफ़रीदी समेत सभी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को कोई खरीदार नहीं मिला, तब मुझे बड़ा ही सुकून मिला। मन में तत्काल विचार आया कि 26/11 के हमले के बाद हमारे बतोलेबाज और बयानवीर नेताओं ने जो काम नहीं किया था, उसे इन धनपतियों ने मजबूरी में ही सही, कर दिखाया है।

यह काम बहुत पहले हो जाना चाहिये था, लेकिन “देर आयद दुरुस्त आयद”, पाकिस्तान को उसकी “सही जगह” दिखाने की कम से कम एक रस्म निभा दी गई है, और यह काम “धंधेबाजी” में माहिर हमारे क्रिकेटरों, उन्हें पालने वाले धनकुबेरों ने भले ही मजबूरी में किया हो, इसका स्वागत किया ही जाना चाहिये। यह कदम, हमारे “सेकुलर मीडिया” द्वारा खामख्वाह पाकिस्तान से दोस्ती के नाम पर चलाये जा रहे नौटंकीनुमा हाईप और बाल ठाकरे द्वारा धमकी नहीं दिये जाने के बावजूद हो गया, इसलिये ये और भी महत्वपूर्ण है। अब पाकिस्तानी खिलाड़ियों, अभिनेताओं, बिजनेसमैनों के खैरख्वाह अपने कपड़े फ़ाड़-फ़ाड़कर भले ही रोते फ़िरें, लेकिन भारत की करोड़ों जनता के मनोभावों को इस काम से जो मुखरता मिली है, उसने कई दिलों पर मरहम लगाया है, वरना यही अफ़रीदी, जो गौतम गम्भीर को धकियाकर उसे मां-बहन की गाली सुनाकर भी बरी हो जाता था, और हम मन मसोसकर देखते रह जाते थे, अब उसका मुँह सड़े हुए कद्दू की तरह दिखाई दे रहा है। सड़क चलते किसी भी क्रिकेटप्रेमी से इस बारे में पूछिये, वह यही कहेगा कि अच्छा हुआ *&;$*^*$*# को इधर नहीं खेलने दे रहे।

पाकिस्तान में लोग उबाल खा रहे हैं, लेकिन कोई इस बात पर आत्ममंथन करने को तैयार नहीं है कि मुम्बई हमले के बाद उनकी सरकार ने क्या किया अथवा इन रोने-धोने वालों ने पाकिस्तानी सरकार पर इसके लिये क्या दबाव बनाया? इधर भारत में भी विधवा प्रलाप शुरु हो चुका है, जिसमें कुछ “सेकुलर” शामिल हैं जबकि कुछ (ज़मीनी हकीकत से कटे हुए) “बड़ा भाई-छोटा भाई” वाली गाँधीवादी विचारधारा के लोग हैं। जबकि IPL में पाकिस्तानी खिलाड़ियों के न खेलने से क्रिकेट का कोई नुकसान नहीं होने वाला है, किसी को कोई फ़र्क नहीं पड़ता है उनके न होने से।

अब पाकिस्तानी खिलाड़ियों के “Humiliation” और अपमान की बड़ी-बड़ी बातें की जा रही हैं, लेकिन यही लोग उस समय दुबककर बैठ जाते हैं जब शारजाह में संजय मांजरेकर को अंधेरे में खेलने पर मजबूर किया जाता है, तब इन्हें मांजरेकर की आँखों के आँसू नहीं दिखाई देते? अकीब जावेद जैसा थर्ड क्लास गेंदबाज जब शारजाह में 5-5 भारतीय खिलाड़ियों को LBW आउट ले लेता है तब किसी का मुँह नहीं खुलता, जब अन्तिम गेन्द पर छक्का मारकर जितवाने वाले जावेद मियांदाद को दाऊद इब्राहीम सोने की तलवार भेंट करते हैं तब सारे सेकुलर देशभक्त घर में घुस जाते हैं? ऐसा क्यों भाई, क्या खेलभावना के नाम पर जूते खाते रहने का ठेका सिर्फ़ भारतीय खिलाड़ियों ने ही ले रखा है? जो लोग “खेलों में राजनीति का दखल नहीं होना चाहिये…” टाइप की आदर्शवादी बातें करते हैं, वे इमरान खान और जिया-उल-हक के पुराने बयान भूल जाते हैं।

भले ही IPL-3 में फ़्रेंचाइज़ी ने यह निर्णय मजबूरी में लिया हो, धंधे में रिस्क न लेने की प्रवृत्ति से लिया हो, अथवा एक विशेष विज्ञापन “प्रोपेगैण्डा” के तहत किया गया हो, लेकिन जो काम भारत के रीढ़विहीन नेताओं को बहुत पहले कर देना चाहिये था, वह जाने-अनजाने इसके जरिये हो गया है। टाइम्स और जंग अखबार द्वारा शुरु की गई “अमन की आशा” नौटंकी"  की भी इस एक कदम से ही हवा निकल गई है।

होंगे पाकिस्तानी खिलाड़ी टी-20 के विश्व चैम्पियन, हमें क्या? जब IPL एक “तमाशा” है, तब इसमें पाकिस्तान के 2-4 खिलाड़ी नहीं खेलें तो कोई तूफ़ान नहीं टूटने वाला भारतीय क्रिकेट पर, लेकिन कम से कम एक “संदेश” तो गया पाकिस्तान में। जो लोग इस थ्योरी पर विश्वास करते हैं कि “स्थिर, शान्त और विकसित पाकिस्तान भारत के लिये अच्छा दोस्त साबित होगा”, वे लोग तरस खाने लायक हैं। 1948 से अब तक 60 साल में जितने घाव इस गन्दे देश ने भारत के सीने पर दिये हैं इसके लिये उनके पेट पर जहाँ-जहाँ और जितनी लातें जमाई जा सकती हों, निरन्तर जमाना चाहिये। जिस मुल्क के बाशिंदे कोरिया से आई चायपत्ती की चाय पीते हों, चार सौ रुपए किलो अदरक खरीदते हों, पांच हजार में जिन्हें साइकिल की सवारी नसीब होती हो, सोलह रुपए की अखबार व पिच्चासी रुपए में पत्रिका खरीदते हों, सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?
==========

नोट – ऑस्ट्रेलिया के साथ ऐसा कोई “सबक सिखाने वाला” कदम कब उठाया जाता है यह देखना अभी बाकी है… या हो सकता है कि “यूरेनियम” के लालच में फ़िलहाल भारतीयों को पिटने ही दिया जाये उधर… क्योंकि हमारे लिये “धंधा” अधिक महत्वपूर्ण है, राष्ट्रीय स्वाभिमान से…

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31 comments:

रचना said...

IPL नामक बाजीगरीनुमा भौण्डा तमाशा मुझे पहले एपीसोड से ही पसन्द नहीं था, इसके दूसरे एपीसोड के बाद, जबकि इसे अपने देश से बाहर आयोजित किया गया तब भी इसके प्रति कभी खास रुचि जागृत नहीं हुई। कितनी ही चीयरलीडर्स आई-गईं, लेकिन कभी भी शान्ति से बैठकर IPL के 4 ओवर देखने की भी इच्छा नहीं हुई।

इसीलिये जब IPL के तीसरे संस्करण की बोलियाँ लगाने सम्बन्धी खबर पढ़ी तब कोई उत्सुकता नहीं जागी, कोई भी धनपति किसी भी खिलाड़ी को खरीदे-बेचे मुझे क्या फ़र्क पड़ने वाला था, नीता अम्बानी, प्रीति जिण्टा से हारे या जीते मुझे अपनी नींद खराब क्यों करना चाहिये? वैसा ही सब कुछ आराम से चल रहा था, लेकिन खिलाड़ियों की नीलामी के अगले दिन जब यह सुखद खबर आई कि टी-20 विश्वकप के “मैन ऑफ़ द सीरिज” शाहिद अफ़रीदी समेत सभी पाकिस्तानी खिलाड़ियों को कोई खरीदार नहीं मिला, तब मुझे बड़ा ही सुकून मिला।

aur aap ne is vishya par apni dhardaar lekhni sae maere man ki baat keh dii

ham sab ko yahii karna chaiyae apni apni jagah

संजय बेंगाणी said...

दोस्ती की किसे जरूरत है? भारत को या पाकिस्तान को?


पाकिस्तान के लिए भारत "व्यापार के लिए पसन्दिदा" देश नहीं है, फिर कमाने के लिए पाकिस्तानी और उनके यहाँ के दलाल इतने क्यों कलप रहे हैं?

कहते है आईपीएल संघी हो गया है. भैया जब यहाँ के कलाकारों को पाकी आने नहीं देते तब वे क्या होते है?

आम जनता की भावना को न नेता समझे न पत्रकार. वेपारी परख गए :)

अजय कुमार said...

अच्छा लेख ,टीम मालिक बधाई के पात्र हैं , बल्कि उन्हें खुलकर कहना चाहिये- हां हमने ऐसा किया क्योंकि तुम इसी लायक हो ।

संजय बेंगाणी said...

पाकिस्तानी खिलाड़ी भारत के लिए कैसे विचार रखते है, यह बताने की जरूरत है?

हजार साल तक लड़ने की हांकने वाले ऐसे रोते हैं?

rohit said...
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rohit said...

बंधू मैं तो कहता हूँ की अगर ये फैसला सरकार के दवाब में भी लिया गया है तो सही है आखिर सरकार पहली बार अपने दवाब का सही इस्तेमाल कर रही है . ना मालूम ये कोन लोग है जो कोवो की तरह चिल्ला रहे है की जाने कोन सी नाइंसाफी हो गयी. क्या आप जानते है की युसूफ युहाना जो की एक शानदार खिलाडी था और ईसाई था को मजबूरन अपना धर्म परिवर्तन करना पड़ा ताकि टीम में जगह बनी रहे आज पाकिस्तान टीम के आधे से जयादा खिलाडी कट्टर मुस्लिम है इमरान खान को तो तालिबान भी बहुत इज्ज़त देता है और सही मुस्लमान कहता है जो तालिबान का समर्थक है फिर हम कैसे इन पर विस्वास कर ले. की ये भारत के प्रति सहानभूति रखते है. खुद शहीद अफरीदी इतने कट्टर मुस्लमान है की इनके घर की औरते परदे से बाहर नहीं आतीं है. ये जब पाकिस्तान में होते है तो भारत के विरोधी होते है लेकिन पैसे के लिए खेल का रोना रो रहे है.
अगर ये लोग सच में सही है तो क्यों नहीं एक कैम्पेन करते है की पाकिस्तान को आतंकवाद से दूर रहना चाहिए जैसे की हमारे खिलाडी करते है. इन्हें पाकिस्तान सरकार पर दवाब डालना चाहिए की वोह आतंकवाद से दूर रहे. लेकिन जिस टीम का मेनेजर ही खुद पाकिस्तान की फ़ौज का हो उससे क्या आप ये आशा कर सकते है जेनरल शहयर खान तो पाकिस्तानी फौजी है क्या वोह चाहेंगे की भारत में अमन कायम रहे .
यह मेरे अपने निजी विचार है

Mithilesh dubey said...

बिल्कुल सही कहा आपने, जितने लोग पाकिस्तान का इस मामले पर समर्थन कर रहें है सब के सब आतंकवादी हैं ।

महफूज़ अली said...

दोस्ती की किसे जरूरत है? भारत को या पाकिस्तान को?....

IPL Franchiseez ने वो कर दिखाया जो बाकी डरते थे...करने में.....

बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट...

पी.सी.गोदियाल said...

सुरेश जी, मैं भी यहाँ के कुछ सेकुलर चेनलो पर कुछ दिनों से यह सब नौटंकी देख हंस रहा था ! जो चीज नपुंसक नहीं कर पाते उसे समय किसी और बहाने से कर दिखाता है इसी लिए तो कहते है कि समय बलवान होता है !

लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ ; "नोट – ऑस्ट्रेलिया के साथ ऐसा कोई “सबक सिखाने वाला” कदम कब उठाया जाता है यह देखना अभी बाकी है… या हो सकता है कि “यूरेनियम” के लालच में फ़िलहाल भारतीयों को पिटने ही दिया जाये उधर… क्योंकि हमारे लिये “धंधा” अधिक महत्वपूर्ण है, राष्ट्रीय स्वाभिमान से… "



मेरे हिसाब से ऐसा करना तब हमें शोभा देगा जब मराठी लोग वैसा ही सलूक ठाकरे एंड कंपनी से करे! क्योंकि दोगली बाते हमारे लिए अशोभनीय होंगी ! एक तरफ जब हमारे ये भडवे अपने ही देश में अपने ही लोगो पर क्षेत्रवाद और भाषा का जुल्म ढाते है तब किस मुह से हम ऑस्ट्रेलिया को दोषी करार दे ?

एक बात और बता दूं कि जो कुछ प्रचार आजकल ऑस्ट्रेलिया से सम्बंधित कर रहा है, ऐसा नहीं कि ये सब पहले नहीं होता था, बहुत ज्यादा फर्क नहीं है सिर्फ मीडिया सुर्खिया बटोर रहा है ! अगर ऑस्ट्रेलिया में रहने वाले किसी निष्पक्ष भारतीय से पूछो तो वह कहेगा कि इसमें सिर्फ ऑस्ट्रेलियाई लोगो का ही दोष नहीं दोष अपने भारतीयों का भी है, जिस तरह से ये लोग दो चार इकठ्ठे होकर अपनी दिखने की कोशिश करते है वह जरूरी नहीं कि दूसरो को भी सही लगे ! हुडदंग मचाना तो ये अपना सम्ब्वैधानिक अधिकार समझते है !

कुश said...

जूता, भिगो के दिया है..


...और देना भी चाहिए

उम्दा सोच said...

जिस मुल्क के बाशिंदे कोरिया से आई चायपत्ती की चाय पीते हों, चार सौ रुपए किलो अदरक खरीदते हों, पांच हजार में जिन्हें साइकिल की सवारी नसीब होती हो, सोलह रुपए की अखबार व पिच्चासी रुपए में पत्रिका खरीदते हों, सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?

Dr. Smt. ajit gupta said...

आज इसी विषय पर मन हो रहा था लिखने को, लेकिन आप का लिखा देखा तो मन बल्‍ले-बल्‍ले हो गया। हमारी आदत है कि हम अक्‍सर प्रतिक्रिया करते हैं, मैं अक्‍सर कहती हूँ कि प्रतिक्रिया नहीं क्रिया करके देखो, बड़ा आनन्‍द आएगा। हम जब प्रतिक्रिया करते हैं तो दुनिया जहान से उपदेश सुनने को मिलते हैं अब जब कल पाकिस्‍तानी क्रिकेटर बौखला रहे थे तब मन को सुकून मिल रहा था। बहुत ही अच्‍छी लगी आपकी पोस्‍ट, बधाई।

shikha varshney said...

कुश से १००% सहमत ...बहुत बढ़िया लेख .आखिरी पंक्तियाँ तो कमाल की हैं.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

काफी अच्छी घटना है यह. किसी भी कारण से हुई हो. पहली बार कोई अच्छी बात हुई है. सहमत.

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

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- Hindu Online.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

भारत की बहुसंख्यक क्रिकेट प्रेमी जनता IPL के इस फैसले से खुस है पर सेकुलर नेता और पत्राकार को मिर्ची लगी हुई है | क्या इसी से ये साबित नहीं हो जाता की सेकुलर नेता और पत्राकार जनमानस विरोधी है और इनके लिए बहुसंख्यक जनता की भावना का कोई मोल नहीं इन्हें तो बस अपनी divide & rule निति प्यारी है |

प्रसिद्द पाकिस्तानी क्रिकेटर जहिर अब्बास साहब कहते हैं IPL ने पाकिस्तान का अपमान किया है, लेकिन जहिर अब्बास शारजाह मैं बार-बार पाकिस्तानियों द्वारा भारतियों के अपमान को भूल गए ...

Sanjeet Tripathi said...

ekdam dho dalaa prabhu, sunil ki badhai

Sanjeet Tripathi said...

ekdam dho dalaa prabhu, sunil ki badhai

वाणी गीत said...

आई पी एल में खिलाडियों की खरीद फरोख्त मुझे तो बहुत ही बुरी लगती है ....गुलामों को खरीदने बेचने जैसा पुराना इतिहास आँखों से होकर गुजरता है ....इससे ज्यादा अपमानजनक कुछ नहीं हो सकता ...जो बिके उनके लिए भी और जो बिकने से रह गए उनके लिए भी ....!!

दिलीप कवठेकर said...

आपका कथन शत प्रतिशत सही है. कल अंग्रेज़ी सेक्युलर चेनल ललित मोदी की उस टिप्पणी पर दांत पीस रही थी जिसमें मोदी नें मेडिया को जो कुछ भी छापना हो तो छापें का कह दिया था.

ना’पाक’ खिलाडियों, सरकारी महकमें के दोगले लोगों, इमरान जैसे व्यक्तियोंके इस खंबे नोचनें में भारतीय मीडिया का साथ देना दुखद है.

आई [पी एल के फ़्रेंचाईज़ी कोई ना’पाक’ सरकार के गुलाम हैं जो उन्हे जवाबदेह हों? शिल्पा नें सही कहा. जो देश भारत से व्यापार करने को इच्छुक नहीं, वह किस मुंह से कलप रहा है?

Shiv Kumar Mishra said...

आपका लेख तो परम प्रसन्नता दे गया है.
टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अविजीत घोष को लिख कर बता दिया कि भैया आप शारदा उग्रा के साथ मिलकर आई पी एल की टीम खरीद लीजिये और केवल पाकिस्तानी खिलाडियों को अपनी टीम में रखिये. अब इतनी डेमोक्रेसी तो है ही भारत में कि आपको पाकिस्तानी खिलाडियों को खरीदने का मौका मिल जाएगा.

सुलभ 'सतरंगी' said...

सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?

यही तो मूल बात है, जो कुछ लोग रोने और हल्ला करने से पहले नहीं सोचते.

ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...
This comment has been removed by the author.
ज़ाकिर अली ‘रजनीश’ said...

आपकी भावनाएं सही हैं, सचमुच पाकिस्तान इसी लायक है। पर आज की खबरें कह रही हैं ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि फ्रेन्चाइजी उनकी सुरक्षा की गॉरन्टी दे पाने में अस्मर्थ थे।
--------
वह काली सुबह फिर कभी न आए...
पैडल से चलाइए, डुबकी भी लगाइए।

vikas mehta said...

asa hi kadm khel ho ya sangeet inhe kahi bhi nhi ghusne dena chahiye

रंजना said...

Awwal to khiladiyon ke kharee farokht waalee baat hi kabhi mere gale se neeche nahi utari.....lekin isbaar jo bhi hua hai,bahut hi sahi hua hai...

जिस मुल्क के बाशिंदे कोरिया से आई चायपत्ती की चाय पीते हों, चार सौ रुपए किलो अदरक खरीदते हों, पांच हजार में जिन्हें साइकिल की सवारी नसीब होती हो, सोलह रुपए की अखबार व पिच्चासी रुपए में पत्रिका खरीदते हों, सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?

shat pratishat sahmat hun isse...

जीत भार्गव said...

जब वोट बैंक के लोभ में सेकुलर नेता नपुंसक हो जाते हैं तब बाजार के डर से व्यापारी फैसला लेते हैं. आम भारतीय की (चाहे एक कंजूमर के तौर पे ही सही) असली ताकत यहाँ दिखती है. क्योंकि देश से प्यार करने वाले ८० % लोग नहीं चाहते कि पाक के नापाक खिलाड़ी हिन्दुस्तान की सरजमीं पर खेलकर इस देवभूमि को गंदा करे. ललित मोदी और शिल्पा शेट्टी सहित तमाम फ्रेंचाइजी ने देश की इस भावना /ताकत को समझा यह अच्छी बात है. बाकी मुट्ठीभर महेश भट्टों या कुलदीप नैयरों और सेकुलर मीडिया के पेट में मरोड़ आए तो आने दे. क्योंकि इन लोगो का ना देश से वास्ता है और ना ही देश के लोगों से. दुर्भाग्य की बात तो ये है कि भारत में भिखारियों की तरह आकर पाकिस्तानी जेहादी मानसिकता वाले खिलाड़ी और भौंडे/फूहड़ कलाकार (?) बेशुमार दौलत कमाने के मंसूबे तो रखते हैं लेकिन अपने देश में भारतीय खिलाड़ियों/कलाकारों को बैन करने वाली अपनी (ना)पाक सरकार का विरोध नहीं करते. और तो और वह भारत की प्रजा पर हमले करने वाले जेहादियों की भर्त्सना तो दूर निंदा या विरोध भी नहीं करते. वह सिर्फ हमें नोचकर हमें लूटने ही हिन्दुस्तान में आते है..और यहाँ के मूर्ख सेकुलर सहित मीडिया और नपुंसक नेता उनकी आवभगत में पलक-पांवड़े बिछाती है.
ऊपर एक पाठक ने बहुत ही सार्थक राय दी है कि क्यों ना हम सब अपने-अपने स्तर पर आईपीएल जैसी पहल करे, क्योंकि नपुंसक सेकुलर सरकार से तो इस देश को बचाने की उम्मीद कर नहीं सकते. क्यों ना हम पाकिस्तान, बांग्लादेश, चीन और मलेशिया जैसे भारतद्रोही-हिंदूद्रोही देशो की वस्तुओं का बायकाट करे? और दुनिया के हर मंच पर उनको रोके? इसके अलावा उनकी तरफदारी करनेवाले भारतीय मीडिया और भड्वो का भी बायकाट करे (और उनको विज्ञापन देनेवाले ब्रांड्स का भी बायकाट करे). क्योंकि खुद को गिरवी रख बैठे सेकुलर मीडिया और कुबुद्दीजीवियों के लिए यही एकमात्र उपाय है. वरना अपनी 'दमन की आशाएं' देश पर लाद-लाद कर देश को फिर गुलाम बना देंगे.

SHIVLOK said...

Shaabbaas Shaabbaas Shaabbaas Shaabbaas

THIS ALL IS GOOD BETTER & BEST

APKO MERA PRANAAM
SABHII TIPPANIIKARON KO MERA PRANAAM

SABHII SHABDON KO MERA PRANAAM

दोस्ती की किसे जरूरत है? भारत को या पाकिस्तान को?

सोचना “उन्हें” चाहिए कि भारत से दोस्ती का कितना फायदा हो सकता है, बार-बार हम ही क्यों सोचें?

यही तो मूल बात है, जो कुछ लोग रोने और हल्ला करने से पहले नहीं सोचते.

आपका कथन शत प्रतिशत सही है. कल अंग्रेज़ी सेक्युलर चेनल ललित मोदी की उस टिप्पणी पर दांत पीस रही थी जिसमें मोदी नें मेडिया को जो कुछ भी छापना हो तो छापें का कह दिया था.

ना’पाक’ खिलाडियों, सरकारी महकमें के दोगले लोगों, इमरान जैसे व्यक्तियोंके इस खंबे नोचनें में भारतीय मीडिया का साथ देना दुखद है.

आई [पी एल के फ़्रेंचाईज़ी कोई ना’पाक’ सरकार के गुलाम हैं जो उन्हे जवाबदेह हों? शिल्पा नें सही कहा. जो देश भारत से व्यापार करने को इच्छुक नहीं, वह किस मुंह से कलप रहा है?
जब वोट बैंक के लोभ में सेकुलर नेता नपुंसक हो जाते हैं तब बाजार के डर से व्यापारी फैसला लेते हैं. आम भारतीय की (चाहे एक कंजूमर के तौर पे ही सही) असली ताकत यहाँ दिखती है. क्योंकि देश से प्यार करने वाले ८० % लोग नहीं चाहते कि पाक के नापाक खिलाड़ी हिन्दुस्तान की सरजमीं पर खेलकर इस देवभूमि को गंदा करे.

आम जनता की भावना को न नेता समझे न पत्रकार. वेपारी परख गए :)

बंधू मैं तो कहता हूँ की अगर ये फैसला सरकार के दवाब में भी लिया गया है तो सही है आखिर सरकार पहली बार अपने दवाब का सही इस्तेमाल कर रही है

बिल्कुल सही कहा आपने, जितने लोग पाकिस्तान का इस मामले पर समर्थन कर रहें है सब के सब आतंकवादी हैं ।
सुरेश जी, मैं भी यहाँ के कुछ सेकुलर चेनलो पर कुछ दिनों से यह सब नौटंकी देख हंस रहा था ! जो चीज नपुंसक नहीं कर पाते उसे समय किसी और बहाने से कर दिखाता है इसी लिए तो कहते है कि समय बलवान होता है !

जूता, भिगो के दिया है..


...और देना भी चाहिए

आज इसी विषय पर मन हो रहा था लिखने को, लेकिन आप का लिखा देखा तो मन बल्‍ले-बल्‍ले हो गया। हमारी आदत है कि हम अक्‍सर प्रतिक्रिया करते हैं, मैं अक्‍सर कहती हूँ कि प्रतिक्रिया नहीं क्रिया करके देखो, बड़ा आनन्‍द आएगा। हम जब प्रतिक्रिया करते हैं तो दुनिया जहान से उपदेश सुनने को मिलते हैं अब जब कल पाकिस्‍तानी क्रिकेटर बौखला रहे थे तब मन को सुकून मिल रहा था। बहुत ही अच्‍छी लगी आपकी पोस्‍ट, बधाई।
दोस्ती की किसे जरूरत है? भारत को या पाकिस्तान को?....

IPL Franchiseez ने वो कर दिखाया जो बाकी डरते थे...करने में.....

बहुत अच्छी लगी आपकी यह पोस्ट
कुश से १००% सहमत ...बहुत बढ़िया लेख .आखिरी पंक्तियाँ तो कमाल की हैं.

ekdam dho dalaa prabhu, sunil ki badhai

प्रसिद्द पाकिस्तानी क्रिकेटर जहिर अब्बास साहब कहते हैं IPL ने पाकिस्तान का अपमान किया है, लेकिन जहिर अब्बास शारजाह मैं बार-बार पाकिस्तानियों द्वारा भारतियों के अपमान को भूल गए ...

aur aap ne is vishya par apni dhardaar lekhni sae maere man ki baat keh dii

ham sab ko yahii karna chaiyae apni apni jagah

DHANYA HAI AAP AUR AAPKII MAAN
POOJNIYA HAI MAAN AAPKII

SHIV RATAN GUPTA
09414783323

the said...

"जावेद मियांदाद को दाऊद इब्राहीम सोने की तलवार भेंट करते हैं"

दाउद इब्राहिम जैसे आतंकवादी के लिए आदरसूचक शब्द का प्रयोग खटक रहा है. मैं निश्चित रूप से जानता हूं कि यह अनजाने में ही हो गया है, पर क्रिपया ध्यान अवश्य रखें, क्योंकि आप पर बडी ज़िम्मेदारी है.
शुभकामनाएं.

दहाड़ said...

यह तो पहली झाकी है...अभी तो सबकी भुखमरी बाकी है..हजार साल भारत से लडने की कस्में खाने वाले ऐसे ही रोते रोते भुखे खुद ही मर जायेगे...सेकुलर एवं प्रेस उनकी जनाजे उठाने के लिये जिन्दा रहेंगे

Indra said...

fully agree with your views.