नववर्ष की पूर्व संध्या पर मैंने एक “बौद्धिक चिकोटी” काटी… (एक माइक्रो पोस्ट)
बीती 31 दिसम्बर और 1 जनवरी के दिन मैंने अपने मित्रों, शुभचिन्तकों, पाठकों, ब्लागरों, चैटिंगकर्ताओं, रिश्तेदारों, ट्विटरों, ऑरकुटों, यहाँ तक कि बीमा-बैंक-पोस्ट ऑफ़िस तथा ग्राहकों आदि सभी को एक प्रयोग के तहत “मानसिक/बौद्धिक चिकोटी” काटी। 28 दिसम्बर से ही शुरु करके आज तक मैंने सभी को शुभकामनाएं देते वक्त “अंग्रेजी” नववर्ष की शुभकामनाएं” कहकर विश किया। बड़ा ही रोचक अनुभव रहा, कुछ लोग चौंके, कुछ लोग हँसे, कुछ लोग उत्साहित हुए, कुछ लोगों ने आश्चर्य व्यक्त किया, एकाध-दो ने बहस भी की…, बैंक-पोस्ट ऑफ़िस में खड़े कई अन्य ग्राहकों ने भी यह वाक्य सुनने पर चौंककर मेरी तरफ़ एक साथ देखा (मुझे गर्व महसूस हुआ) तात्पर्य यह कि कुल मिलाकर अनुभव मजेदार रहा।
आप भी ऐसी “बौद्धिक चिकोटियाँ” काटने की कोशिश कीजिये, मजा आयेगा। बड़ी-बड़ी बातों के जरिये न सही, शायद छोटी-छोटी बातों के सहारे ही भारतीय संस्कृति सम्बन्धी कुछ बातें हम “बेसुध” लोगों तक पहुँचा सकें…। भले ही इससे कोई बड़ा परिवर्तन न आये, लेकिन एक छोटी सी “लहर” तो बनती ही है, और मुझे भीड़ के साथ बहने वाला तिनका बनने की अपेक्षा, अपने बूते एक लहर पैदा करना कहीं अधिक महत्वपूर्ण लगता है…।
सो आगामी “उगादि” अथवा “गुड़ी पड़वा पर्व” के दिन सुबह-सुबह “हिन्दू नववर्ष की हार्दिक शुभेच्छा” कहकर तो देखिये… बहुत मजा आयेगा…
अब चलते-चलते एक नज़र इस चार्ट पर भी डाल लीजिये… जय हिन्द








24 comments:
जागो भारतीय शेरो जागो SSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSSS
आपका कहना बिलकुल ठीक है. अंग्रेज़ी नया साल ही तो है. बौद्धिक चिकोटी जिसे भी काटेंगे वो तटस्थ नहीं रह पायेगा....:-)
उत्तम !
अगर अंगरेजी का ब्लॉग शब्द एक हिन्दी शब्द भी हो सकता है तो १ जनवरी नया साल क्यों नहीं हो सकता ?
बौद्धिक चिकोटी काटने का मज़ा ही अलग है!
ओंठों पर मुस्कान खिलाती शुभकामनाएँ
नए वर्ष की नई सुबह में महके हृदय तुम्हारा!
संयुक्ताक्षर "श्रृ" सही है या "शृ" FONT लिखने के 24 ढंग
"संपादक : सरस पायस"
बंधू इस मामले में , मैं आपसे असहमत हूँ क्योंकि यह जो न्यू इयर इसका पालन हम एक परंपरा के रूप में कर रहे है हाँ यह हम लोगो पर है की हम चाहे तो गुडी पड़ाव को भी उसी उत्साह के साथ जैसे १ जनबरी को मानते है . और फिर अंग्रेजी से परहेज क्यों . आज हम किसी एरिया में आगे बदन चाहे तो बिना अंग्रेजी के मुश्किल है क्योंकि सभी अच्छी technical किताबे इंग्लिश में ही आती है अब आप चाहे इसे मज़बूरी कहे या कुछ और इंग्लिश का ज्ञान बहुत ही जरुरी है
Good
Great
Logical
Rohit Babua
You learn English
speak English
write English
work in English
BUT BUT BUT
BECOME HINDUSTANI
DON'T BE ABSURD BRITISHER.
हमने "ईसा का नया साल" लिखा, सब जगह.
लोगों ने प्रसंशा की, साथ ही यह जागृति भी आयी की यही एक मात्र नव वर्ष नहीं है.
न अंग्रेजी का न ईसा का यह नववर्ष रोमन है जिसे ग्रीगोरियन नववर्ष भी कहा जा सकता है। वैसे रोज सूरज उदय होता है, रोज नववर्ष होता है। हमारा तो आज हुआ है। 130 दिन की हड़ताल को समाप्त कर आए हैं। कल से तैयारी के साथ अदालत जाना है।
और यूँ हम तो 13 अप्रेल को नववर्ष मनाते हैं जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता है।
शेर हो या बकरी रहेंगे तो जानवर के जानवर.
बहुत अच्छी बात।
अंग्रेजी वाला तो निकल गया...हिन्दु नव वर्ष पर काट कर देखेंगे. :)
वैसे हिन्दी नववर्ष १६ मार्च को है और ये तो युवावर्ग में नये क्रिश्चियन ईयर का जुनून है जो दिखता है, जो कि हमारी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, क्योंकि क्रिश्चियन स्कूलों में पढ़ने के बाद प्रार्थना भी केवल यीशु की ही याद रहती है।
’सकारात्मक सोच के साथ हिन्दी एवं हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार एवं प्रसार में योगदान दें.’
-त्रुटियों की तरफ ध्यान दिलाना जरुरी है किन्तु प्रोत्साहन उससे भी अधिक जरुरी है.
नोबल पुरुस्कार विजेता एन्टोने फ्रान्स का कहना था कि '९०% सीख प्रोत्साहान देता है.'
कृपया सह-चिट्ठाकारों को प्रोत्साहित करने में न हिचकिचायें.
-सादर,
समीर लाल ’समीर’
पूर्णतः सत्य वचन अभिव्यक्त किया महराज, यह भारतीय नववर्ष तो नहीं ही है।
यहाँ देश के अलग-अलग हिस्सों में असली नया साल किसी न किसी त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। यह तो उनका हैप्पीन्यूइयर है जिनके राज में सूरज डूबता ही नहीं था। जब डूबता ही नहीं था तो उगने का टैम भी नहीं था। इसी लिए आधीरात को जश्न मनाने के शौकीनों ने इस काम के लिए भी रतजगे का जुगाड़ कर लिया होगा। :)
मनाइए मनाइए, शौक से भारतीय नववर्ष। हम भी शामिल होंगे उस चिकोटी में।
Hello Blogger Friend,
Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/
- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.
वाकई में बड़ी मजेदार और सीखने लायक 'चिकोटी' काश शराब में धुत्त रहकर नववर्ष का स्वागत करने वाले लोग इसे समझ पाते.
हम मानसिक और बौद्धिक रूप से आज तक गुलाम ही हैं। इसीलिये हम अपनी परम्पराओं से श्रेष्ठ दूसरों की परम्पराओं को समझते हैं। हम अपनी परम्पराओं को दिनोंदिन भूलते जा रहे हैं और दूसरों की परम्पराओं को अपनाते जा रहे हैं। नये साल वाली परम्परा को तो खैर बहुत पहले से अपना लिया था हमने किन्तु फादर्स डे, मदर्स डे, वैलेन्टाइन डे आदि को अपनाते जाना क्या है?
और गोदियाल जी से मैं कहूँगा कि परम्परा और भाषा अलग-अलग बाते हैं। किसी भाषा के शब्द को अपना लेना अलग चीज है, यदि अपनी भाषा में उस शब्द के लिये पहले से ही कोई शब्द न हो तो, और किसी की परम्परा को अपनाना अलग चीज है।
जी, हम तो अबतक भी सबको "ख्रीष्ट नववर्ष 2010 की कोटिशः हार्दिक शुभकामनाएँ...." दे रहे हैं। जीमेल, फेसबुक इत्यादि पर अभी भी "कस्टम संदेश" में यही लगा रखा है। और ऐसा हम केवल इसी आंग्ल वर्ष में ही नहीं अपितु पिछले दसेक सालों से करते आ रहे हैं।
rohit said...
"सभी अच्छी technical किताबे इंग्लिश में ही आती है"
अरे भैया, तो "टेक्निकल किताबें" हिन्दी में लिखने से रोका किसने है? क्या किसी ने हाथ बांध के रखे हैं? मुझे ये बात बिल्कुल समझ नही आती है कि भारत के लेखक जब भारतीयों के लिए तकनीकी किताबें लिखते हैं तो वो अंग्रेजी में ही क्यों लिखते हैं? हिन्दी,बंगाली,मराठी,तेलुगू आदि में क्यों नही?
फ़िर लोगों को इसी बात का रोना रहता है कि किताबें भारतीय भाषाओं में नही हैं.
@रोहित जी,
यह सभी पुस्तकें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ में भी उपलब्ध होती यदि नेहरु और उन जैसे अंग्रेजीदां रहनुमाओं ने इसके लिए किये जा रहे प्रयासों में रोड़े न अटकाए होते. विस्तार से पढना चाहें तो महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की आत्मकथा "मेरी जीवन यात्रा" देखें.
यहाँ बात भाषा (अंग्रेजी) के विरोध की नहीं है, मानसिकता के विरोध की है. प्रत्येक भाषा ज्ञान का नया द्वार खोलती है अतः उसके विरोध का सवाल ही नहीं उठता है. लेकिन घंटे भर से पंक्ति में खड़े लोगो से आगे बढ़कर जब कोई अपना काम पहले करवाने की गरज से अंगरेजी में रौब ग़ालिब करने की कोशिश करता है तो इस मानसिकता को आप क्या नाम देंगे???
निशाचर जी, आपने बिल्कुल सही फ़रमाया. ये किताब महापंडित राहुल सांस्कृत्यायन की आत्मकथा "मेरी जीवन यात्रा" कहां मिलेगी? कोई आनलाइन लिंक है क्या?
अंकुर जी, यह आत्मकथा राधाकृष्ण प्रकाशन ने छः खण्डों में पेपरबैक में छापी है. आप चाहें तो प्रकाशक से संपर्क कर इसे मँगा सकते हैं. पता इस प्रकार है:-
राधाकृष्ण प्रकाशन प्राईवेट लिमिटेड
७/३१, अंसारी रोड, दरियागंज,
नई दिल्ली - ११०००२
वेबसाइट पता है:-
www.radhakrishanprakashan.com
इस लेख और इससे पिछली पोस्ट में एक अवधारणा के उदाहरण मिलते हैं--
अंग्रेज़ी में देशभक्ति।
मुझे हैरानी होती कि महान इतिहासकार धर्मपाल, जिन्होंने अंग्रेज़ों द्वारा हमारी स्मृतियों से की गई छेड़छाड़ को दुरुस्त किया, उन्होंने अपनी सारी किताबें अंग्रेज़ी में क्यों लिखीं?
Post a Comment