Tuesday, February 24, 2009

पाकिस्तान से 1600 करोड़ रुपये से ज्यादा लेना निकलता है… कोई है???

Pakistan Owes Rs 300 crore for 60 years

आपने अक्सर खबरों में पढ़ा होगा कि अलाँ-फ़लाँ बैंक के गुर्गे किसी कर्जदार के घर मारपीट करके उससे बैंक की उधारी/कर्जे की रकम लेकर आते हैं। गत 60 साल से एक कर्जदार भारत की छाती पर मूँग दल रहा है, है कोई माई का लाल जो उससे वसूल कर सके? जी हाँ वह कर्जेदार और कोई नहीं, हमारा पड़ोसी, हमारा छोटा भाई(?), हमारा गलेलगू-छुराघोंपू मित्र पाकिस्तान ही है। एक समाचार (यहाँ देखें) के अनुसार 1948-49 से लेकर आज तक भारत के प्रत्येक बजट में बारीक अक्षरों में एक लाइन लिखी होती है “विभाजन के समय हुए समझौते के अनुसार पाकिस्तान से हमारे हिस्से के 300 करोड़ रुपये लेना बाकी”।

असल में विभाजन के समय यह तय किया गया था कि फ़िलहाल दोनों देशों की जो भी संयुक्त अन्तर्राष्ट्रीय देनदारियाँ हैं वह भारत चुका देगा (बड़ा भाई है ना), फ़िर अपनी हिस्सेदारी का 300 करोड़ रुपया पाकिस्तान 3% सालाना ब्याज की दर से 1952 से शुरु करके पचास किश्तों में भारत को वापस करेगा। आज तक “छोटे भाई” ने एक किस्त भी जमा नहीं की है (इस प्रकरण में किसी और ब्लॉगर को अधिक विस्तारित जानकारी मालूम हो तो वह यहाँ टिप्पणियों में साझा कर मेरा ज्ञानवर्धन करें)।

पाकिस्तान को आज़ादी के वक्त भारत ने 55 करोड़ रुपये दिये थे, जो कि गाँधी के वध के प्रमुख कारणों में से एक था। सवाल यह उठता है कि आज तक इतनी बड़ी बात भारत की किसी भी सरकार ने किसी भी मंच से क्यों नहीं उठाई? अपना पैसा माँगने में शरम कैसी? जनता पार्टी और भाजपा की सरकारों ने इस बात को लेकर पाकिस्तान पर दबाव क्यों नहीं बनाया? (कांग्रेस की बात मत कीजिये)। हमने पाकिस्तान को 3-4 बार विभिन्न युद्धों में धूल चटाई है, क्या उस समय यह रकम नहीं वसूली जा सकती थी? या कहीं हमारी “गाँधीवादी” और “सेकुलर”(?) सरकारें यह तो नहीं समझ रही हैं कि पाकिस्तान यह पैसा आसानी से, बिना माँगे वापस कर देगा? (कुत्ते की दुम कभी सीधी होती है क्या?)।

300 करोड़ रुपये को यदि मात्र 3% ब्याज के आधार पर ही देखा जाये तो 60 साल में यह रकम 1600 करोड़ से ज्यादा होती है, क्या इतनी बड़ी रकम हमें इतनी आसानी से छोड़ देना चाहिये? इतनी रकम में तो एक छोटी-मोटी सत्यम कम्पनी खड़ी की जा सकती है, और चलो मान लिया कि बड़ा दिल करके, उन भिखारियों को हम यह रकम दान में दे भी दें तब भी क्या वे हमारा अहसान मानेंगे? छोटा भाई तो फ़िर भी कश्मीर-कश्मीर की रट लगाये रखेगा ही, ट्रेनों-नावों में भर-भरकर आतंकवादी भेजता ही रहेगा।

विभाजन की बहुत बड़ी सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक कीमत भारत पहले ही चुका रहा है उस पर से यह एक और घाव!!! एक सम्भावना यह बनती है कि, असल में यह रकम पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान के हिस्सों को मिलकर भारत को देना थी, लेकिन जब भारत ने पूर्वी पाकिस्तान (यानी हमारा एक और सिरदर्द आज का बांग्लादेश) को आजाद करवाने में मदद देने का फ़ैसला किया और आज़ाद करवा भी लिया तो यह रकम डूबत खाते में चली गई, क्योंकि जब देनदारों में से एक इलाका खुद ही स्वतन्त्र देश बन गया, तो फ़िर कर्जा कैसा? और बांग्लादेश इस रकम में से आधा हिस्सा देगा, यह सोचकर भी हँसी आती है। इसमें पेंच यह है कि भारत ने तो सन् 1971 में बांग्लादेश को आजाद करवाया तो फ़िर सन् 1952 से लेकर 1971 की किस्त क्यों नहीं दी गई? चलो पाकिस्तान कम से कम उतना ही दे दे, लेकिन ऐसी कोई माँग करने के लिये हमारे देश के नेताओं को “तनकर सीधा खड़ा होना” सीखना पड़ेगा। “सेकुलरों” और “नॉस्टैल्जिक” बुद्धिजीवियों की बातों में आकर हमेशा पाकिस्तान के सामने रेंगते रहने की फ़ितरत छोड़ना होगी।

55 करोड़ रुपये का दूध “साँप” को फ़ोकट में पिलाने के जुर्म में गाँधी की हत्या हो गई, अब इस 1600 करोड़ को न वसूल पाने की सजा “नेताओं”(?) को देने हेतु कम से कम 40 नाथूराम गोड़से चाहिये होंगे, लेकिन जो देश “पब कल्चर” और “वेलेन्टाइन” में रंग चुका हो और अंग्रेजों द्वारा “झोपड़पट्टी का कुत्ता” घोषित होने के बावजूद खुशी मना रहा हो, ऐसे स्वाभिमान-शून्य देश में अब कोई गोड़से पैदा होने की उम्मीद कम ही है…

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Sunday, February 22, 2009

“स्लमडॉग मिलियनेयर” को ऑस्कर मिलने हेतु मजबूत “सेकुलर” कारण…

Slumdog Millionaire Oscar Award India Secularism

22 फ़रवरी को ऑस्कर पुरस्कार समारोह में भारत की अब तक की “सबसे महान फ़िल्म”(?) स्लमडॉग मिलियनेयर को ऑस्कर मिलने की काफ़ी सम्भावना है, उसके मजबूत “सेकुलर” कारण निम्नानुसार हैं –

1) क्योंकि फ़िल्म के निर्देशक एक अंग्रेज हैं। जबकि महबूब खान (मदर इंडिया) से लेकर आशुतोष गोवारीकर (लगान) तक के हिन्दी निर्देशक निहायत नालायक और निकम्मे किस्म के हैं।

2) “मदर इंडिया” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें भारतीय स्त्री द्वारा दिखाई गई नैतिकता “अंग्रेजों” को समझ में नहीं आई थी (उनके अनुसार बच्चों को भूख से बचाने के लिये उस औरत को पैसे के लिये लम्पट मुनीम की वासना का शिकार हो जाना चाहिये था, ये “नैतिकता”(?) अंग्रेजों में 40-50 साल पहले आ गई थी जबकि उनके गुलामों में “पब कल्चर” के रूप में अब यहाँ घर कर चुकी है), तथा “लगान” को ऑस्कर इसलिये नहीं मिला क्योंकि उसमें अंग्रेजों को हारते दिखाया गया था, जो कि “शासक मानसिकता” को रास नहीं आया। जबकि “स्लमडॉग” की सम्भावना इसलिये ज्यादा है कि इसमें “तरक्की के लिये छटपटाते हुए युवा भारत” को उसकी “औकात” बताने का प्रयास किया गया है।

3) “हिन्दू” बेहद आक्रामक और दंगाई किस्म के होते हैं, ऐसा भी फ़िल्म में दर्शाया गया है। हीरो मुसलमान है और हिन्दू दंगाई उसकी माँ की हत्या कर देते हैं, भीड़ चिल्लाती है “ये मुसलमान हैं इन्हें मारो… मारो…” और बच्चे चिल्लाते हैं “हिन्दू आ रहे हैं, हिन्दू आ रहे हैं भागो-भागो…” (कुल मिलाकर एक बेहद “सेकुलर” किस्म का सीन है इसलिये पुरस्कार मिलने की सम्भावना बढ़ जाती है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार वामपंथी नन्दिता दास की गोधरा दंगों पर बनी फ़िल्म को पाकिस्तान में पुरस्कार दिया गया है)।



4) फ़िल्म में भगवान राम का ऐसा भयानक काल्पनिक रूप शायद ही पहले किसी ने देखा होगा (जो चित्र यहाँ दिखाया गया है)।

5) मुस्लिम हमेशा “सेकुलर” होते हैं और “पीड़ित” होते हैं जो कि सिर्फ़ एक अंग्रेज निर्देशक ही भारत की मूर्ख जनता को बता सकता है, फ़िल्म में दोनो मुस्लिम लड़के सिर्फ़ सूरदास रचित कृष्ण के भजन ही गाते हैं (सेकुलरिज़्म की दाल में एक और तड़का)।

6) फ़िल्म पूरी तरह से “भारतीय” है, क्योंकि इसके निर्देशक डैनी बोयल अंग्रेज हैं, स्क्रीनप्ले सिमोन ब्यूफ़ोय का है जो अंग्रेज हैं, हीरो देव पटेल नाम के गुजराती हैं जिनका परिवार पहले नैरोबी और अब लन्दन में रहता है, मूल उपन्यास (Q & A) के लेखक एक पूर्व भारतीय राजनयिक हैं जो अब दक्षिण अफ़्रीका में रहते हैं, यह फ़िल्म भी “हू वांट्स टु बी मिलियनेयर” नामक टीवी शो पर आधारित है जो कि एक सफ़ल ब्रिटिश गेम शो है, यानी की पूरी-पूरी “भारतीय”(?) फ़िल्म है, उस पर तुर्रा यह कि मूल उपन्यास में हीरो का नाम है “राम जमाल थॉमस”, जिसे फ़िल्म में बदलकर सिर्फ़ जमाल रखा गया है, क्योंकि यही नाम “सेकुलर” लगता है…

तो भाईयों और बहनों, ऑस्कर पुरस्कार के लिये तालियाँ बचाकर रखिये… हम जैसे “विघ्नसंतोषी” आपका मजा नहीं बिगाड़ेंगे…इसका वादा करते हैं… सो ऑस्कर के लिये जय हो, जय हो…

अब मूल विषय से हटकर एक घटना :– अपुष्ट समाचार के अनुसार मुम्बई के मलाड इलाके में स्थित “हायपरसिटी मॉल” में एक पाकिस्तानी लड़की सबा नज़ीम (उम्र 22 वर्ष) को कुछ नाराज मुसलमानों की भीड़ ने बुरी तरह से पीटा। रियाज़ अहमद तालुकदार नामक शख्स, जो कि “जन सेवा संघ” नाम का एक NGO चलाते हैं, ने उस महिला की पीठ पर उर्दू में “शुक्र अलहम दुलिल्लाह” (यानी, अल्लाह तेरा शुक्रिया) छपा हुआ टैटू देखा, उसने अपनी माँ को फ़ोन किया और मिनटों में ही उस मॉल में दर्जनों महिलाओं ने उस पाकिस्तानी लड़की की सरेआम पिटाई कर दी, वह लड़की घबराकर अगले ही दिन पाकिस्तान लौट गई।
क्या इस घटना के बारे में आपने किसी अखबार में पढ़ा है? किसी न्यूज़ चैनल पर बड़ी बिन्दी वाली प्रगतिशील महिलाओं से इसके बारे में बहस सुनी है? क्या इस घटना को लेकर किसी महिला केन्द्रीय मंत्री ने “नैतिक झण्डाबरदारी” के खिलाफ़ कोई भाषण दिया है? क्या किसी अंग्रेजी पत्रकार ने उस NGO मालिक को गुलाबी चड्डियाँ भेजने का प्लान बनाया है? ट्रेन भरकर आजमगढ़ से दिल्ली आने वाले उलेमाओं में से किसी ने इसकी आलोचना की? यदि इन सबका जवाब “नहीं” में है, तो एक आत्म-पीड़ित, खुद पर तरस खाने वाले, स्वाभिमान-शून्य राष्ट्र को मेरा नमन…

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Sunday, February 15, 2009

मुस्लिमों की भलाई के लिये डॉ रफ़ीक ज़कारिया के कुछ सुझाव

Rafique Zakaria, Indian Muslims, Congress and Secularism

पाठकों को लगेगा कि यह किसी संघ-भाजपा के नेता के विचार हैं, यदि यही बातें नरेन्द्र मोदी या आडवाणी किसी सार्वजनिक सभा में कहते तो “सेकुलर मीडिया” और उनके लगुए-भगुए खासा बवाल खड़ा कर देते, लेकिन नहीं… उक्त विचार प्रख्यात मुस्लिम राजनीतिज्ञ और विद्वान डॉ रफ़ीक ज़कारिया के हैं। डॉ ज़कारिया ने अपनी पुस्तक “कम्यूनल रेज इन सेक्यूलर इंडिया” (पापुलर प्रकाशन, सितम्बर 2002) मे मुसलमानों के व्यवहार और उनकी सोच पर “मुसलमानों को क्या करना चाहिये” नाम से एक पूरा एक अध्याय लिखा है। यह पुस्तक उन्होंने गोधरा दंगों के बाद लिखी थी… डॉ ज़कारिया का निधन 9 जुलाई 2005 को हुआ।

गत कुछ वर्षों में मुस्लिमों के लिये अलग से वित्तीय बजट, अल्पसंख्यकों के लिये अलग से मंत्रालय, सच्चर कमेटी द्वारा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की पहचान करना और विभिन्न सुझाव देना, हज सब्सिडी की रकम बढ़ाना, नौकरियों में आरक्षण का हक जताना आदि कई ऐसे काम हैं जो कि UPA सरकार ने समय-समय पर मुस्लिमों के लिये (वोट बैंक मानकर) किये हैं, वैसे भी कांग्रेस तो 1947 से ही मुसलमानों के फ़ायदे के लिये विभाजन से लेकर उनकी हर माँग मानती आ रही है, फ़िर चाहे देश के अन्य धर्मावलम्बियों पर इसका कुछ भी असर हो। सिख, जैन और बौद्ध भी अल्पसंख्यक हैं यह बात लगता है कि कांग्रेस भूल चुकी है। ईसाईयों पर भी कांग्रेस का “विशेष ध्यान” तब से ही जाना शुरु हुआ, जब उनके खानदान में एंटोनिया माइनो बहू बनकर पधारीं, वरना अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान होता है यह हमारी “महान सेकुलर प्रेस और मीडिया” ने भी मान लिया लगता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम नेतृत्व और कठमुल्लों ने विगत 60 सालों में सिवाय हक मांगने और सरकारों को वोट की ताकत के बल पर धमकाने के अलावा कुछ नहीं किया। पाकिस्तान मांगने से लेकर आरक्षण माँगने तक एक बार भी इन मुस्लिम नेताओं ने “देश के प्रति कर्त्तव्य” को याद नहीं रखा, और रीढ़विहीन कांग्रेस ने सदा इनके सामने लोट लगाई, मुसलमानों को अशिक्षित और गरीब बनाये रखा और देश को सतत गुमराह किया। जब किसी समाज या समुदाय को कोई अधिकार या सुविधायें दी जाती हैं तो देश और सरकार को यह अपेक्षा होती है कि इसके बदले में वह समाज देश की उन्नति और सुरक्षा के लिये काम करेगा और देश को और ऊँचे ले जायेगा। क्या कभी मुस्लिम नेतृत्व ने आत्मपरीक्षण किया है कि इस देश ने उन्हें क्या-क्या दिया है और उन्होंने देश को अब तक क्या दिया?

पुस्तक में डॉ ज़कारिया ने स्वीकार किया है कि भारतीय मुसलमानों में इस्लामिक कट्टरतावाद के फ़ैलते असर को लेकर बेचैनी है और वे इसके खिलाफ़ कुछ करना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने यह निम्न सुझाव दिये हैं –

1) मुसलमानों के लिये संघर्ष का रास्ता उचित नहीं है। उनके लिये खुशहाली का एकमात्र उपाय यह है कि वे देश और समाज के मुख्य अंगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मुसलमानों को खुले दिल से हिन्दुओं और इस राष्ट्र को अपनाना चाहिये। इसके लिये सबसे पहले उन्हें अपनी “कबीलाई मानसिकता” (Ghetto Mentality) से बाहर आना होगा, एक समरसता भरे समाज के निर्माण में उन्हें ही मुख्य भूमिका निभानी होगी।

2) मुसलमानों को समझना चाहिये कि ज़माना बदल रहा, बदल गया है। उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा और पुरानी मानसिकता को समय के अनुरूप बदलना चाहिये। मुसलमानों को सरकारों से मदद माँगना छोड़कर अपने पैरों पर खुद खड़े होने का प्रयास करना चाहिये, वरना वे एक अपंग समाज की तरह बन जायेंगे जिन्हें कभी-न-कभी बोझ समझा जाने लगेगा। मुसलमानों को जल्दी ही यह समझ लेना चाहिये कि जो भी नेता उनकी मदद करने को तत्पर दिखाई दे रहा है वह निश्चित ही अपने चुनावी फ़ायदे के लिये ऐसा कर रहा है, यहाँ तक कि मुसलमानों को दूसरे देशों के मुसलमानों से भी कोई अपेक्षा नहीं रखना चाहिये, हो सकता है कि वे कुछ आर्थिक मदद कर दें लेकिन मुश्किल समय मे वे उनके बचाव के लिये कभी आगे नहीं आयेंगे, और यह बात अन्य कई देशों में कई बार साबित हो चुकी है।

3) मुसलमानों को “अपनी खुद की बनाई हुई भ्रम की दुनिया” से बाहर निकलना चाहिये, उन्हें कठमुल्लों की भड़काऊ और भावनात्मक बातों पर यकीन नहीं करना चाहिये। मुस्लिमों के दुश्मन सिर्फ़ ये कठमुल्ले ही नहीं हैं बल्कि समाज के ही कुछ मौलाना, शिक्षाविद और पत्रकार भी इनका साथ देकर आग में घी डालने का काम करते हैं, इनसे बचना चाहिये। भारत के मुसलमानों को इस दलदल से बाहर निकलकर अपने काम और हुनर को माँजना चाहिये ताकि वे समाज की मुख्यधारा में आसानी से आ सकें और देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

4) भारतीय मुसलमानों को देश के उदार हिन्दुओं के साथ मिलकर एक उन्नत समाज की स्थापना के लिये काम करना चाहिये। हालांकि यह कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन इसके लिये उन्हें अपने व्यवहार और मानसिकता में बदलाव लाना चाहिये।

5) यही बात भारतीय मुस्लिमों में युवाओं पर भी लागू होती है, उनका ध्यान शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों पर ही होना चाहिये क्योंकि “ज्ञान” का कोई विकल्प नहीं है, इसके लिये सबसे पहले इन युवाओं के माता-पिता को अपने पूर्वाग्रह छोड़ना होंगे और उन्हें अधिक से अधिक और उच्च शिक्षा दिलाने की कोशिश करना चाहिये।

6) भारत के मुसलमानों को जिहादी तत्वों और कट्टर धर्मांध लोगों को सख्ती से “ना” कहना सीखना ही चाहिये। उन्हें अन्य धर्मावलम्बियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करना चाहिये कि उनका धर्म भी “जियो और जीने दो” के सिद्धान्त पर काम करता है। उनके इस प्रयास से ही इस्लाम को भारत में सच्चे अर्थों में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी।

7) कुरान में दिये गये आदेशों को मानते हुए भी भारतीय मुस्लिम “एकपत्नीवाद” का पालन कर सकता है। शरीयत में निकाह, तलाक, मेहर और गुज़ारे के कानूनों को समयानुकूल बदलने की काफ़ी गुंजाइश है। इसे करने की कोशिश की जाना चाहिये।

8) “वन्देमातरम” को गाने या न गाने सम्बन्धी विवाद बेमानी है। आज़ादी के आन्दोलन के समय कांग्रेस के सभी मुस्लिम नेता इस गीत को खुले दिल से गाते थे। जो मुसलमान इसे नहीं गाना चाहते कम से कम वे इसे गाये जाते समय खड़े हो जायें क्योंकि यह राष्ट्रगीत है और देश के सम्मान में गाया जा रहा है। पहले से ही घायल साम्प्रदायिक तानेबाने को एक छोटी सी बात पर बिगाड़ना उचित नहीं है।

9) परिवार नियोजन का सवाल हमेशा प्रत्येक विकासशील देश के लिये एक मुख्य प्रश्न होता है। हमें यह सच्चाई स्वीकारना चाहिये कि परिवार नियोजन को मुसलमानों ने उतने खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जितना कि हिन्दुओं ने। मुसलमानो को अपनी गरीबी दूर करने के लिये यह गलती तुरन्त सुधारना चाहिये। इसके लिये समाज के पढ़े-लिखे व्यक्तियों को ही एक जागरण अभियान चलाना होगा ताकि अनपढ़ मुसलमान परिवार नियोजन अपनायें, यह एक बेहद जरूरी कदम है, वरना भारत कभी भी आगे नहीं बढ़ सकेगा, गरीबी और अशिक्षा बनी रहेगी।

10) मुसलमानों को अपने स्वभाव, हावभाव, रहन-सहन, व्यवहार से हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे उनके दुश्मन नहीं हैं और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचायेंगे। हिन्दुओं को अपने काम से यह विश्वास दिलाना होगा कि मुसलमान भी इसी देश की संतान हैं जैसे कि हिन्दू हैं, और वे भी इस देश की उन्नति के लिये चिन्तित हैं।

11) सबसे अन्त में मैं सबसे मुख्य बात कहना चाहूँगा, कि “मुसलमानों को यह साफ़ समझ लेना चाहिये कि उनका भाग्य सिर्फ़ वे खुद बदल सकते हैं उनका कोई भी नेता नहीं…”

क्या यह मात्र संयोग है कि ऊपर दिये गये कई विचार हिन्दुत्ववादी मानी जानी वाली पार्टियों और व्यक्तियों के विचारों से मिलते-जुलते हैं? हो सकता है कि कोई “अति-विद्वान”(?), डॉ रफ़ीक ज़कारिया की प्रतिबद्धता पर ही शक कर बैठे, इसलिये यहाँ बताना जरूरी है कि डॉ ज़कारिया एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे, उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की है और भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया। डॉ ज़कारिया एक प्रतिष्ठित वकील, शिक्षाविद और पत्रकार थे, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि डॉ ज़कारिया पक्के कांग्रेसी थे, जो संसद के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं तथा महाराष्ट्र सरकार में विभिन्न कैबिनेट पदों पर 15 वर्ष तक रहे।

डॉ ज़कारिया के यह विचार आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक हैं, मुस्लिमों के लिये एक पथप्रदर्शक के तौर पर हैं, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते पहले ही देश को बरबाद कर चुकी कांग्रेस, जिसने पहले भी एक बार आरिफ़ मोहम्मद खान को बाहर का दरवाजा दिखा दिया था… ज़कारिया जी के इन विचारों और सुझावों को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक चुकी है। कांग्रेस, सपा, वामपंथियों के प्रिय पात्र कौन हैं… अबू आज़मी, जावेद अख्तर, शबाना आज़मी, तीस्ता सीतलवाड, अरुन्धती रॉय और अंग्रेजी प्रेस के पेज-थ्री टाईप के कुछ “सेकुलर पत्रकार”(?)… इन जैसे ही कई भांड-गवैयों को नरेन्द्र मोदी के नाम से ही पेचिश हो जाती है… क्योंकि यदि रफ़ीक ज़कारिया के यह विचार अधिक प्रचारित-प्रसारित हो गये तो इनकी “दुकानें” बन्द हो जायेंगी… देश का पहला विभाजन भी कांग्रेस की वजह से हुआ था, भगवान न करे यदि दूसरा विभाजन हुआ तो इसकी जिम्मेदार भी यही घटिया, स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों से भरी पार्टी होगी…

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Friday, February 13, 2009

तालिबानी कहे जाने पर मंगलोर के नागरिकों द्वारा रेणुका चौधरी को भेजे हुए कानूनी नोटिस का मजमून…

Legal Notice to Renuka Choudhary quoting Mangloreans as Taliban

कर्नाटक के प्रसिद्ध वकील श्री पीपी हेगड़े द्वारा मंगलोर शहर के कुछ प्रमुख नागरिकों और संगठनों की तरफ़ से केन्द्रीय मंत्री रेणुका चौधरी जी को एक संयुक्त नोटिस भेजा गया है, उसका मजमून इस प्रकार से है –

प्रति,
श्रीमती रेणुका चौधरी
महिला एवं बाल विकास मंत्रालय
भारत सरकार, नई दिल्ली

नोटिस
निम्नलिखित के निर्देशानुसार –
1) श्री गणेश होसाबेत्तु (मंगलोर शहर के माननीय मेयर)
2) श्री रमेश वासु (एक उद्योगपति, मंगलोर)
3) श्री अनवर मणिप्पादि (भाजपा प्रदेश उपाध्यक्ष)
4) श्री मेलविन फ़र्नांडीज़, निवासी मंगलोर
5) श्री हसन साब (संगठन “युवाशक्ति” के अध्यक्ष)
6) श्रीमती नलिनी शेट्टी (स्त्री शक्ति ग्रुप मंगलोर की अध्यक्षा)
एवं अन्य कई संगठनों की ओर से –
मैं पीपी हेगड़े आपके नोटिस में लाना चाहता हूँ कि –

1) आपने सार्वजनिक रूप से बयान दिया है कि “मंगलोर का तालिबानीकरण हो रहा है…” और “मंगलोर का तालिबानीकरण हो चुका है…”। आपने आगे एक बयान में कहा है कि “मंगलोर में साफ़ तौर पर धार्मिक विभाजन हो चुका है, जहाँ एक हिन्दू लड़की को मुसलमान लड़के के साथ जाने से रोका गया है…”

2) आपके यह विभिन्न बयान अनेक अखबारों में 7 और 8 फ़रवरी को प्रकाशित हो चुके हैं, और पूरे मंगलोर शहर में वितरित भी हो चुके हैं। मंगलोर शहर की जनता अपने ऊपर लगाये गये इन आरोपों से हैरान और व्यथित है।

3) मंगलोर शहर का एक प्रतिष्ठित इतिहास है और यहाँ कई धर्मों के पवित्र मकबरे भी हैं। यह शहर अपने शिक्षा केन्द्रों और धार्मिक सदभावना के लिये भी मशहूर है। मंगलोर शहर के लोग विभिन्न तरीकों से देशसेवा के काम में लगे हुए हैं और उन्हें अपने देश से प्रेम है।

4) तालिबान और तालिबानीकरण नामक शब्द का सन्दर्भ आतंकवाद, आतंकवादियों और अफ़गानिस्तान के कुछ गुटों का प्रतिनिधित्व करता है। प्रत्येक भारतीय के लिये “तालिबान” का अर्थ भारत-विरोधी और मानवता-विरोधी ही है। “तालिबान” और “तालिबानीकरण” शब्द मंगलोर निवासियों के लिये एक अपशब्द के रूप में उपयोग किया गया है। किसी एक घटना के लिये समूचे मंगलोर शहर को जिसमें हिन्दू, मुस्लिम ईसाई सभी रहते हैं, तालिबान की संज्ञा देना अधार्मिक कृत्य है और जनता के विश्वास को चोट पहुँचाने वाला है। मंगलोर शहर की जनता “तालिबान” और “तालिबानीकरण” शब्द से घृणा करती है।

5) आपके इन बयानों से इस शहर और मंगलोर के निवासियों का “तालिबान” कहे जाने से अपमान हुआ है, यह आपके द्वारा मंगलोर की भावनाओं के साथ किया गया गम्भीर अपराध है।

6) एक जिम्मेदार केन्द्रीय मंत्री होने के बावजूद आपने मंगलोर निवासियों को तालिबान के समकक्ष रखकर बेहद गैर-जिम्मेदारी का काम किया है और उनकी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है।

7) आपके इस प्रकार के लगातार आये बयानों से मेरे मुवक्किलों को यह आभास होता है कि आप जानबूझकर दो समुदायों के बीच अविश्वास और दुश्मनी फ़ैलाने का काम कर रही हैं और इन बयानों से मंगलोर शहर की शान्ति भंग होने का खतरा है।

8) आपके यह बयान राष्ट्रीय एकता के प्रति भी पूर्वाग्रह से ग्रसित लगते हैं क्योंकि तालिबान खुले तौर पर भारत का विरोधी है और इस देश को खत्म करने का दावा करता है। “तालिबान” कहकर आपने मंगलोर वासियों के देशप्रेम पर शक किया है, हिन्दू-मुस्लिम सम्बन्धी एकाध घटना का उल्लेख करके आपने हिन्दू-मुस्लिम समुदायों के बीच नफ़रत बढ़ाने का काम किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि राजनैतिक फ़ायदे के लिये यह बयान देकर आपने मंगलोर शहर में दुर्भावना फ़ैलाने का काम किया है।

9) आपके बयानों की वजह से मंगलोर के बाहर रहने वाले अन्य भारतीयों के मन में मंगलोर की छवि खराब हुई है, जिसकी वजह से मेरे मुवक्किलों के आर्थिक सम्बन्धों और कार्य-व्यवसाय पर विपरीत असर पड़ने की आशंका है। मंगलोर शहर की आर्थिक उन्नति को भी इन बयानों से धक्का पहुँच सकता है।

10) मेरे मुवक्किलों की माँग है आप ऊपर दर्शाये गये सभी बयानों को तत्काल सार्वजनिक रूप से माफ़ी माँगकर वापस लें, आप नोटिस प्राप्त होने के तीन दिन के भीतर मंगलोर शहर के निवासियों से उनकी भावनायें दुखाने के लिये भी माफ़ी माँगें।

11) यदि आप ऐसा नहीं करती हैं तो मेरे मुवक्किलों की ओर से आप पर न्यायालय में आपराधिक मुकदमा दर्ज किया जायेगा जिसकी पूरी जिम्मेदारी आपकी होगी।

पीपी हेगड़े
अधिवक्ता, मंगलोर

चलते-चलते : हो सकता है कि मामला कुछ आगे बढ़े तथा आये दिन भाजपा-संघ के बहाने तालिबान-तालिबान भजने वाले कुछ संगठनों, नेताओं और सेक्यूलरों (SICKular) के मुँह पर कुछ दिन तक ताला लगे… यह भी देखना है कि माननीया मंत्री द्वारा "पब भरो आन्दोलन" को समर्थन देने पर कोई केस बनता है या नहीं?

स्रोत : दीपक कामत

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Wednesday, February 11, 2009

“गुलाबी चड्डी” अभियान से ये महिला पत्रकार(?) क्या साबित करना चाहती है?

Pink Chaddi Campaign, Women Liberation and Mangalore Pub Incidence

दिल्ली स्थित एक स्वयंभू पत्रकार महोदया हैं निशा सूसन, इन्होंने श्री राम सेना के प्रमोद मुतालिक के विरोध करने के लिये वेलेण्टाइन डे के अवसर पर सभी पब जाने वाली लड़कियों और महिलाओं से अनुरोध किया है कि वे 14 फ़रवरी को बंगलोर स्थित श्रीराम सेना के दफ़्तर में “गुलाबी चड्डियाँ” (गुलाबी रंग की महिला अण्डरवियर) भेजें। इन आभिजात्य वर्ग की महोदया (जो पत्रकार हैं तो जाहिर है कि पढ़ी-लिखी भी होंगी) का कहना है कि पब जाने वाली महिलाओं के समर्थन में यह एक अनूठा विरोध प्रदर्शन है। (इनका छिछोरा ब्लॉग यहाँ देखें)

इस तथाकथित “महिला समर्थक”(???) अभियान के अनुसार दिल्ली, मुम्बई, पुणे, हैदराबाद आदि शहरों में 11-12 फ़रवरी तक गुलाबी अंडरवियर एकत्रित की जायेंगी और उन्हें 14 फ़रवरी को श्रीराम सेना को भेजा जायेगा। नारी स्वतन्त्रता की पक्षधर निशा सूसन ने सभी महिलाओं (जाहिर है हाई सोसायटी की) से आव्हान किया है कि 14 फ़रवरी के दिन वे पब-बार आदि में भीड़ करें, श्रीराम सेना का नाम लेकर “चियर्स” करें और खूब “मस्ती”(???) करें। एक इंटरव्यू (जो कि उन्हीं जैसे किसी विद्वान ने उनसे लिया होगा) में इस महान महिला ने कहा कि चूँकि “गुलाबी” एक स्त्री रंग माना जाता है इसलिये उन्हें गुलाबी अन्तर्वस्त्र भेजने का आयडिया आया, साथ ही गुलाबी रंग कलर चार्ट स्पेक्ट्रम में “खाकी” के ठीक सामने आता है, सो “खाकी चड्डी” का विरोध करने के लिये यह “गुलाबी चड्डी” अभियान जारी किया गया है।

हालांकि अभी इस बात की पुष्टि होना बाकी है कि इस कथित नारी मुक्ति आन्दोलन के पीठ पीछे “तहलका” का हाथ है या नहीं, क्योंकि इन मोहतरमा का पता है –

निशा सूसन (9811893733)
द्वारा – तहलका
M-76, “M” Block Market
Greater Kailash, Delhi

यदि इस मुहिम को “तहलका” का समर्थन हासिल है तब तो यह विशुद्ध रूप से एक राजनैतिक अभियान है, क्योंकि तहलका की विश्वसनीयता और उसकी निष्पक्षता पहले से ही सन्देह के घेरे में है। “वेलेन्टाइन डे के दिन पब-बार को भर दो” का आव्हान तो निश्चित रूप से दारू कम्पनियों द्वारा प्रायोजित लगता है (क्योंकि पैसे के लिये इस प्रकार की पत्रकार कुछ भी कर सकते हैं) और यदि यह मुहिम निशाजी ने स्वयंस्फ़ूर्त ढंग से पैदा किया है तब तो इनकी मानसिक कंगाली पर तरस ही किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है ऐसे “मानसिक कंगाल” मीडिया के चहेते बने हुए हैं और इनका यथोचित “इलाज” करना बेहद आवश्यक होता जा रहा है। “गुलाबी चड्डी” को एकत्रित करने का काम भी अधिकतर महिलाओं ने ही संभाल रखा है, जो भी इच्छुक हों वे दिव्या (9845535406), रत्ना (09899422513) से भी सम्पर्क कर सकते हैं।

अब इस कथित अनूठे विरोध प्रदर्शन से कई सवाल खड़े होते हैं,

1) गुलाबी चड्डी और पब का आपस में क्या सम्बन्ध है?

2) क्या श्रीराम सेना को गुलाबी चड्डियां भेजने से पब-बार में जाने वाली महिलाओं को नैतिक बल मिलेगा?

3) क्या रत्ना जी को यह मालूम है कि गोवा में स्कारलेट नाम की एक लड़की के साथ बलात्कार करके उसकी हत्या की गई थी और उसमें गोवा के एक मंत्री का बेटा भी शामिल है, और वे वहाँ कितनी बार गई हैं?

4) क्या निशा जी को केरल की वामपंथी सरकार द्वारा भरसक दबाये जाने के बावजूद उजागर हो चुके “सिस्टर अभया बलात्कार-हत्याकांड” के बारे में कुछ पता है?

5) इंटरव्यू लेने वाले पत्रकार को दिल्ली की ही एक एमबीए लड़की के बलात्कार के केस की कितनी जानकारी है?

6) जिन उलेमाओं ने सह-शिक्षा को गैर-इस्लामी बताया है क्या उन्हें भी निशा जी गुलाबी चड्डी भेजेंगी? या यह विशेष कृपा सिर्फ़ भाजपा की कर्नाटक सरकार और श्रीराम सेना के लिये है?

7) कश्मीर में आतंकवादियों ने कई लड़कियों से बन्दूक की नोक पर शादी कर ली है, क्या दिव्या जी गुलाबी चड्डियों का एक बन्डल श्रीनगर भिजवा सकती हैं?

8) तसलीमा नसरीन भी तो औरत ही है जो कलकत्ता, जयपुर और न जाने कहाँ-कहाँ मारी-मारी फ़िर रही थी, तब यह “तहलका” कहाँ चला गया था?

9) यदि प्रमोद मुतालिक इन सभी चड्डियों के साथ चिठ्ठी लगाकर वापस भेजें कि “…कल शायद पब में आप नशे में अपनी गुलाबी चड्डी वहीं भूल गई थीं और इसे गलती से मेरे पास भेज दिया गया है, कृपया वापस ले लीजिये…” तो क्या इसे अश्लीलता समझा जायेगा?

10) सबसे अन्तिम और महत्वपूर्ण सवाल कि क्या भारत में नारी स्वतन्त्रता आन्दोलन का यह एक नया, बदला हुआ और परिष्कृत रूप है? (इस विषय पर महिला लेखिकाओं और ब्लॉगरों के विचार जानना भी दिलचस्प रहेगा)

नोट : चूंकि यह मुहिम एक महिला द्वारा शुरु की गई है, इसलिये यह लेख बनती कोशिश सभ्य भाषा में लिखा गया है, जिसे “भारतीय संस्कृति” का एक हिस्सा माना जा सकता है, और जिसका नाम भी इन “पेज-थ्री महिलाओं” ने शायद नहीं सुना होगा… और इस लेख को श्रीराम सेना द्वारा मंगलोर में किये गये कृत्य का समर्थन नहीं समझा जाये…

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Monday, February 9, 2009

मुस्लिम आरक्षण का “भूत” फ़िर निकला, आम चुनाव की हवा बहने लगी…

Muslim Reservation in India, Congress & Minority Politics

विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह का यह बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है…” अब जोर-शोर से अपना रंग दिखाने लगा है, जाहिर है कि आम चुनाव सिर पर हैं, “कौए” बोलने लगे हैं और “सियार” गुफ़ाओं से बाहर आ चुके हैं। रविवार (दिनांक 1 फ़रवरी 2009) को दिल्ली में आयोजित मुस्लिम आरक्षण सम्बन्धी राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से एक सुर में मुसलमानों को आरक्षण देने की माँग की। तमाम मुस्लिम संगठनों के नेताओं का कहना था कि उन्हें जनसंख्या के अनुपात में और पिछड़ेपन की वजह से सरकारी नौकरियो में आरक्षण मिलना चाहिये। इस सिलसिले में एक संयुक्त कमेटी बनाकर सरकार से कम से कम 10 प्रतिशत का आरक्षण माँगा गया है। हालांकि अधिकतर वक्ताओं ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशों को मानने का आग्रह करते हुए 15% आरक्षण की माँग की, साथ ही यह माँग भी रखी गई कि मुस्लिमों और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाये। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एएम अहमदी ने कहा कि “मुस्लिम गत 60 साल से समाज के हाशिये पर हैं (यानी कौन सा दल जिम्मेदार हुआ?), और मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार भेदभाव होता रहा है, उन्हें मुख्यधारा (फ़िर मुख्यधारा का राग) में लाने के लिये “सच्चर” कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू किया जाये…”।

इस अवसर पर रामविलास पासवान (एक और “शर्मनिरपेक्ष” नेता) ने कहा कि “सच्चर कमेटी ने पाया है कि मुस्लिम आबादी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भारत की अनुसूचित जनजातियों के बराबर ही है… इसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा जो 50% प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय की गई है, उसे बढ़ाना उचित होगा, क्योंकि मण्डल आयोग ने पिछड़ी जातियों को 52% आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी, जबकि उन्हें सिर्फ़(?) 27% आरक्षण दिया जा रहा है… और अधिकतम 50% आरक्षण की सीमा व्यवहारिक नहीं है…” (यानी पासवान अपने दलित हिस्से में से मुसलमानों को आरक्षण नहीं देंगे, अलग से चाहिये)। भाकपा के एबी बर्धन ने कहा कि “मुसलमानों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज समाज से कटा हुआ और निराश महसूस कर रहा है और देश के लिये यह एक खतरनाक संकेत है…” (यानी कि बर्धन साहब मुसलमानों का उत्साहवर्धन करते हुए पश्चिम बंगाल के सभी जिलों को मुस्लिम बहुल बनाकर ही दम लेंगे)।

हालांकि अधिकतर नेताओं के सुर थोड़े धीमे थे, लेकिन सबसे खतरनाक बयान था स्टूडेण्ट इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन के सचिव शाहनवाज़ का, उन्होंने कहा कि “मुसलमानों को आरक्षण सरकार से भीख में नहीं चाहिये, यह मुसलमानों का हक है…” (सुन रहे हैं मनमोहन सिंह जी, आपकी कोशिशें रंग लाई हैं)। शाहनवाज़ ने आगे कहा कि “हमारे लिये आरक्षण कोई खैरात नहीं है, मुस्लिम इस देश की आबादी का 23 प्रतिशत हैं, जिसमें से 10% मुस्लिमों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाकी के 12% मुसलमानों को नौकरियों में 12% आरक्षण चाहिये…। 10% आरक्षण तो कम है, 15% आरक्षण ज्यादा लगता है, इसलिये हम 12% आरक्षण की माँग करते हैं (यह देश पर उनका अहसान है)। मुस्लिम द्रविड़ मुनेत्र कषगम के इब्नैस मुहम्मद कहते हैं, “हमें देश को एक कारपोरेट कम्पनी की तरह देखना चाहिये, इस हिसाब से मुसलमानों का 15% शेयर इस कम्पनी में बनता ही है…” (अब कोई इस शेयर होल्डर को जाकर बताये कि “कम्पनी” को बरबाद करने में इसका शेयर कितना है)

आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री रेड्डी द्वारा 5% आरक्षण देने के बावजूद “शर्मनिरपेक्षता” के इस खुले नाच के बाद हमेशा की तरह अनसुलझे सवाल उठते हैं कि, मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा, अशिक्षित और भयग्रस्त रखने वाली कांग्रेस आखिर इनके वोटों के लिये इन्हें कितनी बार और कितने साल तक उपयोग करती रहेगी? मुसलमानों को तथाकथित “मुख्यधारा”(?) में लाने के बहुतेरे प्रयास पहले भी किये गये, लेकिन “कठमुल्लों” के अत्यधिक नियन्त्रण के कारण वे इस धारा से बाहर ही रहे, इसमें किसकी गलती है? मुसलमानों को मदरसे छोड़कर सीबीएसई या राज्य के स्कूलों में पढ़ने से किसने रोका था, क्यों नहीं वे कम से कम बच्चे पैदा करके खुद की गरीबी दूर कर लेते?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच मुसलमान राष्ट्र की मुख्यधारा में आना भी चाहते हैं या नहीं? यदि वाकई में वे मुख्यधारा में आना चाहते हैं तो पहले उन्हें अपने दिमाग खुले करने पड़ेंगे, ये नहीं चलेगा कि वे मुख्यधारा में भी आना चाहें और शरीयत के कानून(?) भी चाहें, ऐसा नहीं हो सकता कि वे मदरसों को आधुनिक बनाने के लिये पैसा माँगते रहें और लड़के-लड़कियों की सहशिक्षा को इस्लाम-विरोधी बताते रहें (हाल ही में उप्र के एक उलेमा ने सहशिक्षा वाले स्कूलों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया है), कश्मीर में लड़कियाँ स्कूल की साधारण वेशभूषा में भी स्कूल नहीं जा सकती हैं, सरेआम उनके चेहरे पर तेजाब फ़ेंका जा रहा है और “शर्मनिरपेक्ष मीडिया” को मंगलोर की घटनायें अतिवादी लग रही हैं (शर्म की बात तो है, मगर भाजपा या हिन्दूवादी संगठनों की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकतों को नज़र-अंदाज़ करना शर्मनिरपेक्ष लोगों का एक पुराना खेल है)।

अब एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि सभी तरह का जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाये, नया फ़ार्मूला इस प्रकार हो कि - जिस “परिवार में सिर्फ़ एक बच्चा” हो उसे 5%, विकलांगों के लिये 10%, महिलाओं के लिये 20%, आर्थिक रूप से अति-गरीब सभी जातियों-धर्मों के लोगों के लिये 30% तथा सेना-अर्धसैनिक बलों-पुलिस वालों के परिजनों तथा शहीदों के उत्तरजीवियों के लिये 10% आरक्षण दिया जाये। इस फ़ार्मूले से एक तो जनसंख्या पर रोक लगाने में मदद मिलेगी तो दूसरी ओर सेना और पुलिस में भरती होने का एक और आकर्षण बढ़ेगा, गरीबों का सच में फ़ायदा होगा। बाकी के आर्थिक रूप से सक्षम लोगों, जातियों, धर्मों आदि को आरक्षण की क्या जरूरत है?

लेकिन जो पार्टी 60 साल से वोट-बैंक की राजनीति के आधार पर ही इस देश में टिकी हुई है, आज की तारीख में कथित “युवा शक्ति और युवा सोच”(?) का ढोल पीटने के बावजूद उसमें इस प्रकार का राजनैतिक “प्रस्ताव रखने तक की” हिम्मत नहीं है… अमल में लाना तो बहुत दूर की बात है।

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Sunday, February 8, 2009

एक माइक्रो पोस्ट – ब्लॉगरों से कुछ सवाल…

उज्जैन में एक प्रोफ़ेसर साहब हैं, जिनके यहाँ एक कुँआ था। “था” इसलिये लिखा कि उन्होंने एक वास्तुशास्त्री की सलाह(?) के अनुसार वह कुँआ बन्द करवा दिया, क्योंकि उसके अनुसार वह अशुभ था। उज्जैन में भीषण जल संकट चल रहा है, प्रोफ़ेसर साहब के कुँए में भरपूर पानी की आवक थी, आसपास के लोग खूब पानी भरते थे और उन्हें दुआएं देते थे। सज्जन प्रोफ़ेसर हैं तो पढ़े-लिखे ही होंगे, उनके दो पुत्र विदेश में हैं और एक पुत्री भी साइंटिस्ट है। जैसा कि मैंने पिछली एक-दो पोस्ट में बताया है कि उज्जैन में भीषण जल संकट चल रहा है और फ़िलहाल 5 दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है (देखें यह लेख) और विस्फ़ोट पर प्रकाशित यह लेख… ऐसे में ब्लॉगरों से सवाल हैं कि –

1) वास्तुशास्त्री की बात मानकर इतने बेहतरीन पानी वाला कुँआ बन्द करने की मानसिकता को क्या कहा जाये?
2) इसमें उस वास्तुशास्त्री का दोष कितना है और पढ़े-लिखे प्रोफ़ेसर साहब का कितना दोष है?
3) क्या उच्च शिक्षा के बावजूद इस प्रकार के वास्तुदोष पर विचार करना और उसे अमल में लाना अंधविश्वास है? अति-विश्वास है? या मूर्खता है?
4) जब उज्जैन में इतना भयानक जल संकट चल रहा हो ऐसे में इस कृत्य को पाप कहना उचित होगा?

आप ही तय करें… मैं तो ज्योतिष और वास्तु पर भरोसा नहीं करता…

Wednesday, February 4, 2009

नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों ने उज्जैन वासियों को भीषण संकट में धकेला…

Water Supply Crisis Ujjain Gambhir Dam

क्या आपने कभी कल्पना की है कि 6-7 लाख की आबादी वाले देश के एक महत्वपूर्ण धार्मिक शहर में यदि नलों से पानी ही न आये तो क्या तस्वीर बनेगी? जी हाँ… भगवान महाकालेश्वर की नगरी में यह एक हकीकत बनने जा रही है, यदि नगर निगम के अधिकारियों की मानें तो दिनांक 15 फ़रवरी के बाद शहर को नलों से पानी नहीं दिया जा सकेगा और पार्षदों और नेताओं की मानें तो अधिक से अधिक 15 मार्च के बाद नलों की पाइप लाइन सूख जायेगी। अर्थात, मार्च-अप्रैल-मई-जून-जुलाई के पाँच महीने उज्जैन की जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है, लगभग “अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने… हम तो पानी नहीं दे सकते… जो बन पड़े सो कर लो…” वाले अंदाज़ में…

इस वर्ष समूचे मध्यप्रदेश मे ही सामान्य से कम वर्षा हुई है, कहीं-कहीं तो बहुत ही कम बारिश हुई है। उज्जैन में भी सामान्य से आधी वर्षा हुई, लेकिन 1992 के सिंहस्थ में चम्बल-गम्भीर नदी पर उज्जैन को पानी पिलाने के लिये बनाये गये गम्भीर बाँध जिसकी कुल क्षमता 2250 MCFT है, में बारिश खत्म होने के महीने अर्थात सितम्बर के अन्त तक 350 MCFT पानी संग्रहीत था (देखें यह लेख)। उज्जैन शहर में एक दिन की पानी की खपत 4 MCFT है इस हिसाब से यदि 1 अक्टूबर से तीन दिन छोड़कर चौथे दिन पानी दिया जाता तो लगभग 90 बार अर्थात 270 दिनों तक पानी दिया जा सकता था, जाहिर है कि 350 MCFT पानी को बचा-बचाकर उपयोग किया जाता, तो आराम से मई-जून का समय भी निकाला जा सकता था।

पानी, राजनीति और पैसे के खेल ने ऐसा नहीं होने दिया। उज्जैन में कुल 54 पार्षद हैं और उज्जैन नगर निगम में कांग्रेस का बोर्ड है, पानी की सप्लाई प्रत्येक शहर की तरह P.H.E. के जिम्मे है। जब सितम्बर में ही यह तय हो चुका था कि इतना ही पानी हमें जुलाई तक उपयोग करना है, उसी समय तत्काल निर्णय लेकर काम शुरु हो जाना चाहिये था, लेकिन निगम बोर्ड में 54 पार्षद आपस में लड़ते रहे और नवम्बर अन्त तक शहर में एक दिन छोड़कर ही पानी दिया जाता रहा। इन दो महीनों में अधिकारियों, निगम कर्मचारियों और पीएचई कर्मचारियों ने बाँध से पानी की चोरी रोकने की कोई पहल नहीं की, उधर पानी चोरी होता रहा, इधर एक दिन छोड़कर पानी देने से बाँध में पानी का लेवल खतरनाक निचले स्तर पर पहुँच गया। अधिकारियों ने पैसा खाने की गरज से करोड़ों की एक योजना बनाई, जिसके द्वारा नागदा के पास अमलावदा बीका के एक बैराज से पानी लाने के लिये पाइप लाईन बिछाई जाना थी। सर्वे हुए, योजना बनी, फ़ाइल भोपाल गई, विधानसभा की आचार संहिता के चक्कर में कोई निर्णय नहीं हो पाया, और जब भोपाल से एक तकनीकी दल ने योजना देखी तो उसे अव्यावहारिक घोषित करके रद्द कर दिया। उस योजना को “अव्यावहारिक” बताने के पीछे भी कोई रहस्य है, क्योंकि नागदा का ग्रेसिम उद्योग पहले ही वह पानी देने से मना कर रहा था, और नागदा के विधायक भी किसानों के दबाव में उसका विरोध कर रहे थे, सो अचानक वह योजना रद्द कर दी गई।

उज्जैन में धीरे-धीरे पानी के लिये हाहाकार मचना शुरु हो चुका है, जनवरी माह में 3 दिन छोड़कर चौथे दिन पानी दिया गया है, फ़िर भी बाँध में सिर्फ़ 30 MCFT पानी बचा है। मजे की बात यह है कि पीएचई के इंजीनियर(?) भी नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर बाँध में असल में पानी कितना है, कभी वे कहते हैं 30 MFCT है कभी कहते हैं शायद 50 MCFT भी हो सकता है। जब जनता ने नेताओं के घरों को घेरना शुरु कर दिया है तब नेताओं ने बाँध के पीछे के दस किलोमीटर के इलाके का दौरा करके बताया कि बाँध में 5 किलोमीटर पीछे तक खूब पानी भरा हुआ है, लेकिन यह अधिकारियों को नहीं दिखाई दिया। अब उस पानी को जमीन काटकर आगे लाने की योजना बनाई जा रही है, ताकि कम से कम मार्च तक का समय निकाला जा सके, यानी उज्जैनवासियों की कड़ी परीक्षा होगी अप्रैल से जुलाई के बीच।

यह पूरा संकट विशुद्ध मानव-निर्मित है, लालच, कामचोरी और राजनीति ने मिलकर यह गन्दा खेल खेला है। पहले पीएचई कर्मचारियों ने किसानों से मिलीभगत करके पानी की चोरी करवा दी और लाखों कमा लिये, फ़िर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वोटों के लालच में दोनों में से कोई पार्टी यह निर्णय नहीं लेना चाहती थी कि 3 दिन छोड़कर पानी प्रदाय किया जाये, इस कवायद में दिसम्बर निकल गया। नगर निगम और पीएचई के अधिकारी उस पाईप लाइन की योजना पर ज्यादा जोर देते रहे क्योंकि 15 करोड़ की उस योजना में काफ़ी लोगों के “वारे-न्यारे” हो जाते, जबकि उज्जैन शहर में ही कम से कम 10 बड़ी बावड़ियाँ और 60 बड़े कुएं हैं जिनकी सफ़ाई पहले जरूरी थी, लेकिन उसमें पैसे खाने की कोई गुंजाइश नहीं थी। 54 पार्षद भी इसलिये समस्या से मुँह मोड़े रहे क्योंकि सन 2002 के पिछले जल संकट के दौरान टैंकरों से पानी सप्लाई करने में भी उन्होंने काफ़ी कमाया था। उज्जैन के बाहरी इलाके में स्थित भू-माफ़ियाओं के खेतों में वैध-अवैध ट्यूबवेल लगे हुए हैं जहाँ भरपूर पानी है, पैसा लेकर उससे टैंकर भरे जाते हैं…

अब आज की स्थिति यह है कि एक 3000 लीटर टैंकर के 400 रुपये लिये जा रहे हैं जिसके दाम अप्रैल-मई तक बढ़कर 600-700 रुपये हो जायेंगे। एक टैंकर यदि दिन भर में 10 फ़ेरे भी लगाये तो 5000 रुपये कमायेगा। टैंकर से पानी खरीदने में भी हर कोई तो सक्षम नहीं है और जो सक्षम हैं भी तो 3000 लीटर पानी का स्टोरेज करने की जगह भी होना चाहिये। शासन ने अपनी ओर से टैंकरों से पानी सप्लाई की योजना बनाई है, जिसके अनुसार एक टैंकर एक वार्ड में दिन भर पानी की सप्लाई करेगा, सोचने वाली बात है कि लगभग 2 वर्गकिमी के वार्ड में जहाँ एक-एक वार्ड में 20-25 हजार लोग रहते हों, एक टैंकर से कितना और कैसे पानी मिलेगा, उसके लिये कितना झगड़ना पड़ेगा, और जिन घरों में पानी भरने वाले कोई जवान नहीं हैं उन अकेले रहने वाले बूढ़ों, महिलाओं को पानी कैसे मिल पायेगा। जाहिर है कि लोग पैसा देकर पानी खरीदेंगे, और नेता यही चाहते हैं। पैसा खाने का एक और तरीका है ट्यूबवेल खुदवाना। जब 15 करोड़ की योजना इंजीनियरों ने निरस्त कर दी तो जल संकट से निपटने का बहाना लेकर अब उज्जैन की धरती पर 400 बोरिंग करने की योजना है, यानी बोरिंग करने वाली कम्पनी से उसमें भी कमीशन। जो व्यक्ति खुद के खर्चे पर बोरिंग करवाना चाहता है उसे नगर निगम में ऐसा उलझाया जा रहा है कि वह बोरिंग के नाम से ही तौबा कर ले या फ़िर कुछ पैसा खिलाये तब बोरिंग की इजाजत देने वाली फ़ाइल आगे बढ़ाई जाये, यानी चारों तरफ़ लूट मची हुई है…।

भारतीयों के संस्कार में दोषी को पर्याप्त “सजा” नहीं देने के जो कीटाणु भरे पड़े हैं उसके कारण अभी तक इस संकट के लिये किसी भी अधिकारी-नेता-किसान को जिम्मेदार ठहराना तो दूर, उसकी पहचान भी नहीं की है, क्योंकि सभी तो मिले हुए हैं… और उज्जैन की जनता भी कोई भारत की जनता से अलग थोड़े ही है… जब पूरे बरबाद हो जायेंगे तब नींद खुलेगी वाले अन्दाज में धीरे-धीरे जाग रहे हैं। रोजाना पानी को लेकर आपसी विवाद-झगड़े-मारपीट आम हो चले हैं… जो जागरूक हैं या जो अब मजबूरी में जागरूक बने हैं उन्होंने अपने तईं पानी बचाने के कई उपाय अपनाने शुरु कर दिये हैं, जैसे कि मेहमान को शुरु में आधा गिलास पानी पेश करना, वाश बेसिन और फ़्लश का उपयोग बन्द करना, गाड़ी धोने की बजाय गीले कपड़े से पोंछना, गमलों और बगीचे में कपड़े धोने के बाद का बचा हुआ पानी ही डालना आदि…। लोगों ने अपने परिजनों (जो उज्जैन छोड़ सकते हैं) को तीन महीने के लिये अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेजने की योजना भी बना ली है। हालांकि कुछ “देवदूत” भी हैं जो अपने व्यक्तिगत कुंए और ट्यूबवेल से आसपास के हजारों लोगों को निस्वार्थ भाव से पानी दे रहे हैं, लेकिन जब कुओं का जलस्तर घट जायेगा और नलों से पानी आना बन्द हो जायेगा तब स्थिति भयावह हो जायेगी… लेकिन जब जिम्मेदार लोग अपना कर्तव्य भूलकर सिर्फ़ पैसा खाने-कमाने में लग जायें तब जनता को कौन पूछेगा?

चलते-चलते : क्या आप जानते हैं कि आपके शहर में पानी कहाँ से आता है? उस स्रोत में कितना पानी है? वह आप तक कैसे पहुँचता है? यदि नहीं जानते तो पता कीजिये, नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के भरोसे मत रहिये… फ़िलहाल आप इस भयावह कल्पना पर विचार कीजिये कि यदि आपके यहाँ नल आना बन्द हो जायें तो क्या होगा… तब तक मैं पानी भरकर आता हूँ…

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Sunday, February 1, 2009

यह मध्यप्रदेश भाजपा सरकार की सदाशयता है या नाकामी??

Bharat Bhawan Culture Politics & BJP

1982 में चार्ल्स कोरिया द्वारा डिजाइन किया हुआ “भारत भवन” भोपाल ही नहीं बल्कि समूचे देश की एक धरोहर है। इस के मूलतः चार प्रखण्ड हैं, “रूपंकर” (फ़ाइन आर्ट्स का म्यूजियम), “रंगमण्डल” (नाटकों हेतु), “वागर्थ” (कविता और साहित्य सम्बन्धी लायब्रेरी) और “अनहद” (शास्त्रीय और लोक संगीत का पुस्तकालय)। कला और संस्कृति के विकास और साहित्य के प्रचार-प्रसार की गतिविधियों में लगे हुए इस संस्थान के बारे में पहले भी कई सकारात्मक और नकारात्मक खबरें आती रही हैं। ताजा खबर यह है कि “वागर्थ” के अन्तर्गत भारत भवन से एक आलोचनात्मक पत्रिका निकलती है “पूर्वग्रह”, इसे नये कलेवर के साथ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है और इसका लोकार्पण 4 फ़रवरी को दिल्ली में डॉ नामवर सिंह करेंगे।




राज्य में चलने वाले किसी भी प्रकार के संस्थान में जब कोई गतिविधि होती है तो उसमें राज्य सरकार का हस्तक्षेप भले ही न हो लेकिन उसकी जानकारी में उस गतिविधि या उससे सम्बन्धित कार्यकलापों की जानकारी उच्च स्तर तक होती ही है और होना चाहिये भी। चूंकि भारत भवन सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है और इसके कर्ताधर्ता अन्ततः सरकार के ही नुमाइन्दे होते हैं, चाहे वे प्रशासकीय अधिकारी हों या कोई अन्य। जब इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा से फ़ोन पर चर्चा हुई तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यानी कि 4 फ़रवरी को भारत भवन द्वारा आयोजित दिल्ली में होने वाले एक विशेष समारोह और पुस्तक विमोचन की जानकारी मंत्री जी को 31 जनवरी तक नहीं दी गई या नहीं पहुँची, यह घोर आश्चर्य का विषय है।

उल्लेखनीय है कि डॉ नामवर सिंह खुले तौर पर भाजपा-संघ की विचारधारा के आलोचक और भारतीय संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसने वालों में से हैं। अब सवाल उठता है कि जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है तो “वागर्थ” द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में नामवर सिंह जैसे व्यक्ति को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने और महिमामण्डित करने का क्या औचित्य है? क्या इससे नामवर सिंह भाजपा-संघ से खुश हो जायेंगे? या फ़िर भाजपा शासित सरकारें अपनी छवि(?) सुधारने के लिये ऐसी कोई भीषण सदाशयता दिखा रही हैं कि वे अपने घोर विरोधियों को भी सम्मान देने में नहीं हिचक रहीं? या, क्या भाजपा सरकार में नौकरशाही-अफ़सरशाही इतनी मनमानी करने लगी है कि प्रदेश के संस्कृति मंत्री को ही कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई? क्या कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के किसी कार्यक्रम में संघ की विचारधारा वाले किसी व्यक्ति को बुलाया जाता है? यदि नहीं, तो फ़िर नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, खुशवन्त सिंह, शबाना आजमी आदि जैसे घोषित रूप से संघ विरोधी लोगों के प्रति भाजपा के मन में प्रेम क्यों उमड़ना चाहिये?

भाजपा विरोधियों को सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन आम लोगों खासकर संघ और भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता से बात कीजिये तो अक्सर उनका यह दर्द उभरकर सामने आता है कि भाजपा की सरकार में संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं के मामूली ट्रांसफ़र जैसे वाजिब काम ही नहीं हो पाते, जबकि कांग्रेसी व्यक्ति, कैसी भी सरकार हो, अपना गैरवाजिब काम भी करवा लेते हैं। इसे क्या कहा जाये? भाजपा का कांग्रेसीकरण, कार्यकर्ताओं के त्याग की उपेक्षा या प्रशासनिक नाकामी? भाजपा का यही रवैया भारतीय संस्कृति के बारे में भी है, जब वे सत्ता से बाहर होते हैं तब हिन्दू विरोधी पाठ्यक्रमों, पुस्तकों, पेंटिंग्स आदि पर खूब विरोध जताते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही याददाश्त गुम हो जाती है।

मई 2007 में भारत भवन में चित्रकार कैलाश तिवारी की चित्र प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें गोधरा के ट्रेन जलाये जाने की एक पेंटिंग थी। स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और प्रदर्शनी बन्द कर दी गई। आगामी 13 फ़रवरी को भारत भवन का वार्षिकोत्सव होने जा रहा है, उसमें एक कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, पता चला है कि उसमें से 70% कवि कम्युनिस्ट विचारधारा वाले हैं, और अब नामवर सिंह से “पूर्वग्रह” का विमोचन करवाने जैसी हरकत… ऐसा क्यों किया जा रहा है और हो कैसे रहा है, यही सोच-सोचकर हैरानी होती है, कि इसका क्या अर्थ निकाला जाये?

मैं जानता हूँ कि इस लेख के विरोध में कई कथित “संस्कृति प्रेमी” उठ खड़े होंगे और कला-संस्कृति-साहित्य में किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या तथाकथित राजनैतिक दखल-अंदाजी के विरोध की मुद्रा अपनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन जेएनयू के कम्युनिस्ट हों, ICHR से पैसा लेकर विकृत भारतीय इतिहास लिखने वाले हों या जमाने भर के नकली फ़ाउण्डेशनों के द्वारा “संस्कृति” की सेवा(?) करने वाले हों, वे खुद जानते हैं कि वे भीतर से कितने खोखले हैं। दुःख तो इस बात का है कि सत्ता का फ़ायदा उठाकर कम्युनिस्ट और कांग्रेसी तो अपनी विचारधारा फ़ैलाने वालों को प्रश्रय देते हैं, खुलेआम अनुदान देते हैं, विभिन्न हिन्दू विरोधी और संघ विरोधी संस्थाओं को पैसा देते हैं, जबकि भाजपा दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद भारत भवन जैसी संस्था के कार्यक्रम में “भारतीयता विरोधी व्यक्ति” को प्रमुखता दे रही है…। इस समय जबकि देश एक वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है, ऐसे वक्त में भाजपा को अपने बौद्धिक और वैचारिक समर्थकों को आगे बढ़ाना चाहिये या किसी और को? या फ़िर संघ कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थक बुद्धिजीवियों, लेखकों का काम सिर्फ़ सभाओं में दरियाँ उठाना और भूखे पेट गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना भर है? इतनी छोटी सी बात मेरे जैसा अदना व्यक्ति समझाये, यह उचित नहीं है…


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