चूंकि हिन्दू बर्बर और असभ्य होते हैं… इसलिये उनके खिलाफ़ आवाज़ उठानी चाहिये…?… Thanks Giving Day, Bakrid, Animal Rights, Hinduism
नेपाल के बरियापुर में प्रत्येक पाँच वर्ष में एक त्योहार पर हजारों हिन्दू एकत्रित होते हैं, जहाँ एक पूजा के दौरान अनुमानतः लगभग 2 लाख पशु-पक्षियों की बलि दी जाती है। इस उत्सव के दौरान नेपाल के केन्द्रीय मंत्री भी उपस्थित रहते हैं तथा हिन्दू देवी गाधिमाई की पूजा के दौरान, मुर्गे, बकरे, भैंसे आदि की बलि दी जाती है, और देश की खुशहाली के लिये प्रार्थना की जाती है। इस अवसर पर गत 24 नवम्बर को हजारों मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, “एनीमल राईट्स” और पशुप्रेमियों के संगठनों ने विरोध प्रदर्शनों में हिस्सा लिया। कई संगठनों ने इस परम्परा का कड़ा विरोध किया और इसके खिलाफ़ कई लेख आदि छापे गये। इस मुहिम में न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी हिन्दुओं की इस “बर्बरता”(?) को दर्शाते हुए खबर छापी।
http://www.nytimes.com/2009/11/25/world/asia/25briefs-Nepal.html?_r=2
ऐसा ही एक त्योहार है बकरीद, जिसमें “कुर्बानी”(किसकी?) के नाम पर निरीह बकरों को काटा जाता है। मान लें कि समूचे विश्व में 2 अरब मुसलमान रहते हैं, जिनमें से लगभग सभी बकरीद अवश्य मनाते होंगे। यदि औसतन एक परिवार में 10 सदस्य हों, और एक परिवार मात्र आधा बकरा खाता हो तब भी तकरीबन 100 करोड़ बकरों की बलि मात्र एक दिन में दी जाती है (साल भर के अलग)।
(मैं तो समझता था कि कुर्बानी का मतलब होता है स्वयं कुछ कुर्बान करना। यानी हरेक मुस्लिम कम से कम अपनी एक उंगली का आधा-आधा हिस्सा ही कुर्बान करें तो कैसा रहे? बेचारे बकरों ने क्या बिगाड़ा है।)
अब सवाल उठता है कि यदि 2 लाख प्राणियों को मारना “बर्बरता” और असभ्यता है तो 5 करोड़ टर्की और 10 करोड़ बकरों को मारना क्या है? सिर्फ़ “परम्परा” और “कुर्बानी” की पवित्रता??? इससे ऐसा लगता है, कि परम्पराएं सिर्फ़ मुसलमानों और ईसाईयों के लिये ही होती हैं, हिन्दुओं के लिये नहीं।
हाल ही में कहीं एक बेहूदा सा तर्क पढ़ा था कि बकरीद के दौरान कटने वाले बकरों को गर्दन की एक विशेष नस काटकर मारा जाता है, और उसके कारण उस पशु की पहले दिमागी मौत हो जाती है फ़िर शारीरिक मौत होती है, तथा इस प्रक्रिया में उसे बहुत कम कष्ट होता है। शायद इसीलिये कश्मीर और फ़िलीस्तीन के मुस्लिम आतंकवादियों (सॉरी…स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों) का पसन्दीदा मानवाधिकारवादी तरीका, बंधक व्यक्ति का "गला रेतना" ही है, जिससे उसे कम तकलीफ़ हो। अब एक नया सवाल उठता है कि यदि वाकई इस इस्लामिक पद्धति (हलाल) से जानवरों को बहुत कम कष्ट होता है तो क्यों न कसाब और अफ़ज़ल का गला भी इसी पद्धति से काटा जाये ताकि उन्हें कम से कम तकलीफ़ हो (मानवाधिकारवादी ध्यान दें…)। जबकि शोध से ज्ञात हुआ है कि "झटका" पद्धति कम तकलीफ़देह होती है, बजाय इस्लामिक "हलाल" और यहूदी "काशरुट" पद्धति के। (यहाँ देखें)
एक सर्वे होना चाहिये जिसमें यह पता लगाया जाये कि "धार्मिक कर्मकाण्ड" के नाम पर भारत और बाकी विश्व में कितने मन्दिरों में अभी भी "बलि" की परम्परा वास्तविक रूप में मौजूद है (जहाँ वार्षिक या दैनिक पशु कटाई होती है) तथा भारत में कितने हिन्दू परिवारों में धर्म के नाम पर पशु कटने की परम्परा अभी भी जारी है (आहार के लिये काटे जाने वाले पशु-पक्षियों को अलग रखा जाये), फ़िर हिसाब लगाया जाये कि इस वजह से हिन्दू धर्म के नाम पर कितने पशु-पक्षी कटते हैं। ताकि न्यूयॉर्क टाइम्स जैसे अखबार तथा "एनिमल राइट्स" के नाम पर चन्दाखोरी करने वालों के मुँह पर वे आँकड़े मारे जा सकें तथा अमेरिका तथा ईसाई जगत में कटने वाले टर्की तथा बकरीद के दौरान पूरे विश्व में कटने वाले बकरों की संख्या से उसकी तुलना की जा सके।
मैं व्यक्तिगत रूप से इस पशु बलि वाली बकवास धार्मिक परम्परा के खिलाफ़ हूं, लेकिन इस प्रकार का दोगलापन बर्दाश्त नहीं होता कि सिर्फ़ हिन्दुओं की परम्पराओं के खिलाफ़ माहौल बनाकर उन्हें असभ्य और बर्बर बताया जाये। सारे विरोध प्रदर्शन हिन्दुओं की परम्पराओं के खिलाफ़ ही क्यों भाई, क्या इसलिये कि हिन्दू हमेशा से एक "आसान टारगेट" रहे हैं? एक बात तय है कि हम अंग्रेजी प्रेस को कितने भी आँकड़े दे लें, मार्क्स-मुल्ला-मैकाले-मिशनरी के हाथों बिका हुआ मीडिया हिन्दुओं के खिलाफ़ दुष्प्रचार से बाज नहीं आयेगा। जरा एक बार बकरीद के दिन मीडिया, मानवाधिकारवादी और एनिमल राईट्स के कार्यकर्ता कमेलों और कत्लगाहों में जाकर विरोध प्रदर्शन करके तो देखें… ऐसे जूते पड़ेंगे कि निकलते नहीं बनेगा उधर से… या फ़िर पश्चिम में "थैंक्स गिविंग डे" के दिन टर्कियों को मारने के खिलाफ़ कोई मुकदमा दायर करके देखें… खुद अमेरिका का राष्ट्रपति इनके पीछे हाथ-पाँव धोकर पड़ जायेगा… जबकि हिन्दुओं के साथ ऐसा कोई खतरा नहीं होता… कभी-कभार शिवसेना या राज ठाकरे, एकाध चैनल वाले का बाजा बजा देते हैं, बाकी तो जितनी मर्जी हो हिन्दुओं के खिलाफ़ लिखिये, खिलाफ़ बोलिये, खिलाफ़ छापिये, कुछ नहीं होने वाला।
लेख का सार -
1) सभी प्रकार की बलि अथवा पशु क्रूरता, अधर्म है, चाहे वह जिस भी धर्म में हो।
2) सिर्फ़ हिन्दुओं को "सिंगल-आउट" करके बदनाम करने की किसी भी कोशिश का विरोध होना चाहिये, विरोध करने वालों से कहा जाये कि पहले ज़रा दूसरे "धर्मों के कर्मों" को देख लो फ़िर हिन्दू धर्म की आलोचना करना…
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विषयान्तर :- आज ही चिदम्बरम साहब ने भी "हिन्दू आतंकवाद" नामक शब्द फ़िर से फ़रमाया है, उनसे यह जानने का इच्छुक हूं कि भारत और बाकी विश्व में इन "हिन्दू आतंकवादियों"(?) ने अब तक कितने बम विस्फ़ोट किये हैं, कितने विमान अपहरण किये हैं, कितने बन्धक बनाये हैं, कितनी हत्याएं की हैं… ताकि बाकियों से तुलना का कोई आधार तो बने…। शायद चिदम्बरम साहब के पास आँकड़े होंगे और वे हमें बतायेंगे कि "हिन्दू आतंकवादी" कितने खतरनाक हैं… मैं इन्तज़ार करूंगा…
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50 comments:
धर्म के नाम पर हिंसा कतई सही नहीं. बेचारे जानवरों ने क्या किया है? वे तो मनुष्यों जितने धार्मिक जेहादी भी नहीं है.
मगर यह मामला तो डाकू द्वारा चिंदीचोर को कानून सीखाने जैसा है. हिन्दू गरीब की जोरू है भाऊ....
धर्म चाहे कोई भी हो, धार्मिकता के आड़ में निरीह पशुओं का वध निश्चित ही भयानक क्रूर कर्म है। इस प्रकार के क्रूर कर्म के लिये किसी एक धर्मानुयायियों, विशेषतः हिन्दुओं, को बर्बर कहना महान अन्याय है।
आज हिन्दू धर्म की हालत तो गरीब की लुगाई जैसे ही है, वो कहते हैं ना "गरीब की लुगाई सभी की भौजाई"।
धर्म के नाम पर जीवजंतुओं के साथ बर्बरता का अंत होना चाहिये.
हां, एक अनुरोध जरूर है: अमरीकी ईसाईयों को कृपया ईसाई समाज का प्रतिनिधि न माना जाये. विश्व के ईसाई समाज में अमरीका का भाग 2% से अधिक नहीं है.
सस्नेह -- शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.IndianCoins.Org
आपकी बात से पूर्णतया सहमत, और लगभग यही बिचार मैंने बकरीद के दिन अपने ब्लॉग पर भी व्यक्त किये थे !
और ये चिद्दू मिंया क्या जबाब देंगे, इन्हें तो बस वोट चाहिए !
सुरेशजी बहुत बेहतरीन। अच्छा मुद्दा पकड़ा है।
क्या कथित पशु-प्रेमी मेनका गांधी को ये अत्याचार दिखाई नहीं देते? तब कहां चला जाता है उनका पशु-प्रेम?
हमारे इलाके के मंदिरों से बलि प्रथा का लगभग लोप ही हो गया है। विकल्प के तौर पर लोग पेठा या कद्दू चढ़ाते हैं...।
हिन्दू मंदिरों में तो लगभग यह प्रथा समाप्त हो चुकी है आशा है अन्य भी इससे कुछ सीखेंगे
I was reading indian express a day after bakra id and was quite surprized to read an article which depicted the event of butchering millions of animals as one of sacrifice. Starnge ways!
मुझे याद है बचपन में राजस्थान स्थित कूलदेवी के मन्दीर जाते थे तब राजपुत नवरात्री में बली देते थे. आज बन्द हो चुकी है. हिन्दु प्रगतिशील , समय के साथ चलते है, एक किताब के मोहताज नहीं.
सहमत हूँ । बढ़िया पोस्ट………
जिव हत्या ? हुह ..! इतना ही ये ध्यान देते तो अपने ही बेटे बेटियो/ नागरिको को (अमरीकी, ब्रिटिश और अरबी) युद्ध में झौक देते ?
इन्होने दिया ही क्या है ? भोपाल गैस कांड ? भारत विभाजन ? पूरा विश्व अशांत है इनलोगों की वजह से |
इनको पता है ? अगर लोग लड़ते नहीं रहेंगे तो इनके घर में thanksgiving नहीं मानेगा | किसी की संस्कृति का विनाश कर के दूसरा धर्म कभी आगे नहीं बढ़ सकता |
इस्लाम और crishtianity को हुआ ही कितना समय है ? इन्हें पता है बिना मार्केटिंग के ये कभी आगे नहीं बढ़ सकते | इसी लिए मैंने ऐसे लोगो का नाम चमाX खान रखा है |
...क्योंकि हम हिन्दू हैं
...क्योंकि हिन्दू कभी धर्म के नाम पर पनपी बुराइयों से हमेशा के लिए चिपककर नहीं रहते. हिंदू देर-सवेर उन बुराइयों से पल्ला झाड लेते हैं. लेकिन कई बार वे समाज सुधार के नाम पर झांसे में भी आ जाते हैं.
बहरहाल, कितनी अच्छी बात है कि आज हिंदू धर्म से बलि प्रथा का लगभग लोप हो चुका है और अपवाद स्वरूप सिर्फ़ इक्का-दुक्का जगहों पर ही यह बकवास परंपरा जारी है. दुनियाभर में हिंदुओं के करोडों मंदिर, और उनमें से दो-तीन में ही शायद साल में एकआध बार बलि होती हो. फिर भी हिंदू बर्बर? हिंदू असभ्य?
हिंदू दिवाली पर पटाखे चलाकर खुशी का इज़हार करते हैं तो देशभर के तमाम बुद्धूजीवी उनके पीछे हाथ धोकर पड जाते हैं और इतना अपराधबोध भर देते हैं कि हिंदू एक पटाखा फोडने में भी पाप महसूस करने लगता है. और क्रिसमस या न्यू इयर पर दुनियाभर में क्या होता है? मेरे ख्याल से, दिवाली में जितना प्रदूषण पटाखे फोडने से होता होगा उससे लाखों-करोडों-अरबों गुना प्रदूषण सालभर बेवजह चलने वाले एसी, फ़्रिज़, मोटर-कार, और अन्य विलासिता की वस्तुओं से होता है, जो सच पूछा जाए तो अधिकांश मामलों में बिलकुल बेवजह होती हैं.
यही कहानी होली के अवसर पर दोहराई जाती है. रंग खेलने से सेहत खराब हो जाती है, रंग खेलने से त्वचा खराब हो जाती है, रंग-गुलाल में यह रसायन पाया जाता है, वह रसायन पाया जाता है. पानी की बर्बादी होती है. और ध्यान रहे, यह सब हिंदुओं के त्योहारों पर ही होता है.
इनका संदेश साफ़ है- दिवाली पर पटाखे न फोडो, होली पर रंग न खेलो. अगर ये सब करोगे तो तुम पाप करोगे. और हिंदू अपने खिलाफ़ जारी व्यापक षड्यंत्र से बेखबर, इन सब दुष्प्रचार को सच मान लेता है. यही लोग शिवजी को अर्पित किए जाने वाले दूध, दही, जल, शहद को "बर्बादी" बताते हैं. यानी आप अपने धर्म का पालन करेंगे, अपने त्योहार मनाएंगे तो आप "पाप" करेंगे.
हमें बलि प्रथा का समूल नाश करने की कोशिश करनी चाहिए, लेकिन कथित समाज सुधार की आड में चल रहे व्यापक षड्यंत्र से भी सावधान रहना चाहिए. खासतौर पर मीडिया को, जो होली-दिवाली से १५-२० दिन पहले से ही दुष्प्रचार अभियान में सहभागिता शुरू कर देता है.
महोदय, आपने सही तरीके से सही बात कही है.
जहां तक इन तथाकथित दोगले मुंह वाले अधिकारवादियों की बात है तो इनके लिए बस हिन्दू और हिन्दुत्व पर प्रहार करना ही कर्तव्य की श्रेणी में आता है। इन्हे पता है कि यदि कोई कौम है, जिसके ऊपर अपना भड़ास निकाला जा सकता है, तो वह हिन्दू जनमानस ही है। इनकी हिम्मत नहीं है कि ये इस्लाम या इसाई सम्प्रदाय में फैली गंदगी पर कुछ कह दें। जरा कह कर तो देंखे, पूरा पिछला हिस्सा लाल मिलेगा इनको अपना। और यही नहीं, हो सकता है कि वे दोजखनशीं या जन्नतनशीं भी हो चुंके तब तक तो !!
सबसे पहले एक बात पर चर्चा जरुर होना चाहिए कि बलिप्रथा का विरोध केवल इसीलिए हो क्योंकि वह धार्मिक कर्मकांड में शामिल है ? आखिर धर्म ,एक जीवन पद्धति जिसके सहारे मानव पिछले 5 हजार सालों से जीवनचर्या चलता आ रहा है उससे इतना परहेज क्यों ? अगर बलिप्रथा को कुरीति मानते हैं तो इसका कारण क्या है ? शायद जीवहत्या को देखकर मानवीयता जाग उठती होगी आपके मन में ! क्यों ठीक कहा ना ? परन्तु गुरुदेव वो मानवता तब कहाँ चली जाती है खाने के नाम पर अरबों -खरबों मुर्गे-मुर्गियों का , बकरों का, गायों , भैंसों का ,सर काट दिया जाता है या हलाल किया जाता है { मेरे लिए बात बराबर है हलाल हो या झटका ,जब मारना ही है दर्द का फर्क देख कर क्या होगा ?} बर्बरता नापने वाले लोग धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान की गयी बलि को हीं क्यों देखते हैं , क्या उनको संसार भर में चल रहे लाखों वैध -अवैध बूचडखाना नहीं दीखता जहाँ की बर्बरता को देख लेने भर से आदमी बर्बर हो जाए ? मैं तो कहता हूँ वर्तमान बाजार प्रधान समाज में धर्म की प्राचीन परम्पराओं के खिलाफ अघोषित युद्ध भी चल रहा है और दूसरी तरफ नए नए बाजार प्रायोजित हथकंडों से धर्म को भी बाजार में शामिल कर लिया गया है और अंधविश्वास व कुरीतियों की नई खेप जो बाज़ार के अनुकूल हो वह पैदा की जारही है .और खास कर हिन्दू धर्म और भारतीय प्रायद्वीप कीसनातन संस्कृति इनके निशाने पर है .................
एक प्रकार का षड्यंत्र है जिसे कैसे निबटा जाए इस पर यहाँ बहस हो तो सार्थक हो जाएगी चर्चा
बर्बरता का कोई धर्म नहीं होता। पर ईसाई या मुस्लिम बर्बरता के कारण देवी के मन्दिर पर बलि को मैं स्वीकार नहीं करता।
यहां विन्ध्याचल में मां का मन्दिर है। वहां नवरात्र में बलि दी जाती है और मैं वहां नहीं जाता।
मेरी मां में महाकाली तत्व है, पर वह मात्र असुर संहार हेतु है।
हिन्दू समाज एक बहुत ही प्रगतिशील समाज है, यह नेपाल की बलि भी बंद हो ही जाएगी.
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@ g
हम प्रोपेगेंडा का सहारा लेकर हिन्दुओं में घुस आई नै कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को सही नहीं ठहरा सकते. हिन्दू एक प्रगतिशील समाज है पटाखों के शोर और धुंए से कई लोग सच में परेशान हो जाते हैं, शोर से कितने ही मवेशी और पालतू जानवर बीमार पड़ जाते हैं या मर जाते हैं. और होली के खतरनाक कैमिकल रंग कुछ लोगों में बुरी तरह एलर्जी पैदा कर देते हैं.
जो बात गलत है वह गलत ही रहेगी, कुप्रथा का समर्थन सही नहीं.
Suresh Ji
Aap Se Sahmat Hoo
Main to aapke lekh ke isi saar ko duhrana chahungi...
लेख का सार -
1) सभी प्रकार की बलि अथवा पशु क्रूरता, अधर्म है, चाहे वह जिस भी धर्म में हो।
kisi bhi karan se pashu hatya ke main shakht khilaaf hun...
Haan chidambaram ji ki hasyaspad baat sun mere liye bhi yah tay karna kathin ho gaya ki ye sachmuch itne padhe likhe hain aur mujhe lag raha tha ki is vishay par aap awashy kuchh likhenge. .
सभी प्रकार की अन्य बलि निंदनीय है। बलिदान तो खुद का ही हो सकता है। वह भी किसी काल्पनिक देवता के नाम पर हर हाल में गलत है। मनुष्य अपनी पाशविक प्रवृत्तियों की पूर्ति धर्म का चोला पहना कर करता है। इस से निकृष्ठ कर्म कुछ भी नहीं हो सकता।
सभी प्रकार की क्रूरता अधर्म है चाहे वह जिस भी धर्म में हो।
जानवरों की बलि या कुर्बानी देना या उनको खाने के लिये काटना कोई नई बात नही है...लेकिन बात जब धार्मिक अनुष्ठान को तो इसका विरोध करना बेमानी है...चाहे वो अनुष्ठान हिन्दुओं का हो या किसी और धर्म का....
जिस विषय पर जानकारी कम हुआ करें उस पर लिखा ना करें.....आपकी अक्ल पर हंसी आ रही है.....
किसने कहा आपसे की सारे मुस्लमान कुर्बानी करते है???
आपको पता भी है कुर्बानी किस लिये की जाती है???
पहली बात कुर्बानी का गोश्त अपने खाने के लिये कम रखा जाता है और गरीबों में ज़्यादा से ज़्यादा बांटा जाता है......कुर्बानी अपनी हैसियत के हिसाब से करने का हुक्म है अगर आपकी हैसियत है तो कीजिये वर्ना नही और अगर हैसियत है लेकिन आप नही कर रहे हैं तो आपको ईदगाह में जाने की कोई ज़रुरत नही है......
तो परिवार के सद्स्यों के हिसाब से कुर्बानी नही होती है.... मुस्लमान कुर्बानी अपनी हैसियत के हिसाब से करते है तो आपका ये 100 करोड का आकंडा बिल्कुल बेकार है....
आप जानते है कुर्बानी की शुरुआत कैसे हुई थी.....शायद नही पता होगा अगर होता तो शायद ऐसा नही लिखते....
पैगम्बर ईब्राहिम अलैहि सलाम को अल्लाह ने हुक्म दिया था की अपने बेटे को मेरी राह में कुर्बान कर दों...तो वो अपने उस बेटे को कुर्बान करने के लिये ले गये थे जो उनके बुढापें में पैदा हुआ था.......लेकिन छुरी फ़ेरते वक्त बेटे के बदले दुम्बां हलाल हो गया....
ये त्योहार इस बात के लिये मानसिक तौर पर तैयार करता है की अभी हम अपने पैसे से खरीदे हुये या अपने घर में अपने बच्चे की तरह पाले हुये जानवर को अल्लाह की राह में कुर्बान कर रहे है और अगर आगे ज़रुरत हुई तो कुछ भी कुर्बान कर सकते है...
काश हिन्दू बर्बर होता तो कम से कम इन भौकने वालो को जबाब तो दे पाता . बलि में हर्ज होना एक बात है और बलि की आड में गाली देना अक्षम्य है .
आखिर में "हलाल" और "झटके" के विषय में आपने एक शोध तो दिखा दिया....बहुत जल्द में आपको शोधों का भंडार दिखाऊंगा...इस विषय पर काफ़ी वक्त से रिसर्च कर रहा हूं...आपके सारे सवालों का जवाब उस लेख में दे दुंगा....
लेकिन आपसे एक सवाल है की "हलाल करते वक्त जिस्म में से सारा खुन बहा दिया जाता है उसके बाद SPINAL CORD को काटा जाता है जिससे किसी प्रकार की बीमारी का खतरा नही रहता है"
जबकि "झटके में ऐसा नही होता है क्यौंकि SPINAL CORD कटने से दिल धड्कना बन्द हो जाता है"
इस लिहाज़ से कौन-सा तरीका सही है???
बकरीद के बारे में और जानकारी के लिये आप ये लेख पढ सकते है....
http://qur-aninhindi.blogspot.com/2009/11/matters-compulsory-works-of-bakrid-eid.html
अगर ईदउलअजहा मानाने वालों की आस्था सच्ची है तो अपने ही बच्चे को कुर्बान क्यों नहीं करते? अगर अल्लाह सच में तुम्हारी क़ुरबानी से प्रभावित है तो वही बच्चे को हटा कर दुम्बा रख देगा. मुसलमानों को अल्लाह पर विश्वास नहीं शायद, तभी अपने बच्चे का गला काटने की हिम्मत नहीं होती. परवरदिगार पर भरोसा कर के तो देखो एक बार, गर तुम्हारी बंदगी सच्ची हो.
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गरीबों में तो सब्जी, दाल, आटा, राजमा, चने, शक्कर, मसाले या इनसे बनी चीज़ें भी बांटी जा सकती हैं. सस्ती भी पड़ेंगी और हर एक के हिस्से ज्यादा आएगा जिससे ज्यादा लोगों का पेट भरेगा. और किसी बेगुनाह जानवर की जान भी नहीं जाएगी.
काशिफ़ साहब,
आप बेशक मेरी अक्ल पर हँसें, मैं आपको कैसे रोक सकता हूं।
1) गोश्त अपने खाने के लिये हो बाँटने के लिये क्या फ़र्क पड़ता है, जानवर तो कटेगा ही।
2) आपके हिसाब से 100 करोड़ का आँकड़ा बेकार है, चलिये तो उसे 50 करोड़ या 20 करोड़ कर लीजिये बस!!! फ़िर भी ये नेपाल के हिन्दुओं द्वारा बलि किये जा रहे बीस लाख से सौ गुना होता है… तब इसका विरोध मानवाधिकारवादी और एनिमल केयर वाले क्यों नहीं करते? इसका जवाब आप नहीं देंगे, क्योंकि आप पहले ही धार्मिक अनुष्ठानों के लिये कुर्बानी(?) को जायज़ मान रहे हैं।
3) आपने लिखा "…जानवर को अल्लाह की राह में कुर्बान कर रहे है…" यानी जानवर को ही कुर्बान(?) कर रहे हैं ना… कौन सी बड़ी बात कर रहे हैं?
4) झटका हो या हलाल हो क्या फ़र्क पड़ता है, कट तो मासूम जानवर ही रहा है, इसीलिये मैंने कहा है "किसी भी धर्म में होने वाली इस परम्परा का मैं विरोध करता हूं…", लेकिन आप नहीं करेंगे।
5) बेंगाणी जी पहले ही कह चुके हैं कि हिन्दुओं ने वक्त के साथ बहुत बदलाव किया है, अब मन्दिरों में बलि की प्रथा लगभग समाप्त हो चली है, अब कद्दू या आलू को काटकर प्रतीकात्मक तौर पर बलि दी जाती है…। हम किसी एक किताब में लिखी हुई बातों पर अंधानुकरण नहीं करते…
इतनी बड़ी पोस्ट के बाद कुछ कहना शेष नही रह जाता है। परिवर्तन जीवन का नियम है, हिन्दु तो बदल देते है किन्तु क्या मुस्लिम बदलेगे ?
he kashif naam ke pranee kurbaani ke shuruaat apne shareer ke pyare hisse se shuru kar - allah bahut bada hai teri kurbaani jaroor kabool karega
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आदरणीय सुरेश जी,
"लेख का सार -
1) सभी प्रकार की बलि अथवा पशु क्रूरता, अधर्म है, चाहे वह जिस भी धर्म में हो।
2) सिर्फ़ हिन्दुओं को "सिंगल-आउट" करके बदनाम करने की किसी भी कोशिश का विरोध होना चाहिये, विरोध करने वालों से कहा जाये कि पहले ज़रा दूसरे "धर्मों के कर्मों" को देख लो फ़िर हिन्दू धर्म की आलोचना करना…"
पूर्ण रूपेण सहमत गुरुदेव !
जिस तरह हिन्दू हितों को साधना आपका एजेंडा है उसी प्रकार मेरा भी प्रयास है कि "धर्म को उसी जगह पहुंचाया जाये जिस जगह का धर्म वाकई हकदार है" इसी प्रयास के क्रम में आदरणीय गोदियाल जी के ब्लॉग में की गई अपनी टिप्पणी को एक बार फिर दोहराने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ...
"एकदम सही कहा आपने... 'ऊपर वाला' अगर वाकई में है तो है तो वह सभी का...माता या पिता समान... फिर सारे जगत की 'माता'या 'पिता' यह 'ऊपर वाला' अपने ही बनाये बेजुबान जानवरों की बलि लेकर ही क्यों खुश होता है ?
मौका है, तो यह भी सोचा जाये कि सारे जगत का 'पिता' या 'माता' यह 'सर्वशक्तिमान' कैसा सैडिस्ट है कि अपने बच्चों के व्रत या उपवास के नाम पर अन्न-जल छोड़कर भूखा रहने से प्रसन्न होता है जबकि सृष्टि का हर मां-बाप खुद भूखा रह सकता है पर अपने बच्चे को भूखा नहीं देख सकता।"
पाकिस्तान के आतंकवाद तो जगत-जाहिर हैं परन्तु हमारे भारत के आतंकवाद छुपे हुए हैं। प्रमाण देने की आवश्यकता नहीं बस दिल पर हाथ रख के दिल से पूछ लीजिए...हर व्यक्ति का दिल सच्चा होता है। वैसे यह मेरा विषय नहीं, हम शान्तिवादी हैं और शान्ति से प्यार करते हैं।
रही बात जीव-हत्या की तो छोड़िए पूरे संसार को, अपनी बात कीजिए, आप शाकाहारी हैं ना...विज्ञान पढ़ते और पढ़ाते भी हैं...तो शायद आपकी नज़र से गुज़रा होगा कि एक गिलास पानी में दस करोड़ कीटानू होते हैं। पानी गर्म करते समय क्या जीव-हत्या का ख्याल नहीं आया? वास्तविकता यह है कि इनसान चाहते न चाहते हुए विभिन्न जीव-जंतुओं को नष्ट करता रहता है। दूध और दही के सम्बन्ध में निश्चित रूप में सिद्ध हो चुका है कि इसमें भी जीव-हत्या है । जिस व्यक्ति को इस विषय पर संदेह हो वह किसी भी Laboratory में जाकर Microscope में दूध और दही की स्थिति देख सकता है। एक ही दृष्टि में पता चल जाएगा कि इसकी वास्तविकता क्या है? विज्ञान कहता है कि दूध दही में कीटानुओं के होने के कारण ही प्रोटीन प्राप्त होता है। इन कीटानुओं को माइक्रो आर्गनिज्म अर्थात छोटे शरीर कहा जाता है। जबकि पशुओं का मआमला बड़े शरीर का है। जीव-हत्या करने वाले तो दोनों हुए...जो व्यक्ति इस पाप से बचना चाहता हो उसके लिए दो चीज़ों में से एक का इख्तियार है। या तो वह आत्म-हत्या करके स्वंय को नष्ट कर ले, अथवा वह एक दूसरा जगत बना ले जिसके नियम इस से भिन्न हों जो आधुनिक संसार के नियम हैं।
@ सफत आलम
तो फिर इंसान मारना भी बुरा नहीं है. आतंकवादीयों के विचार आपसे मिलते हैं. और कीटाणु मारना और जानवर मारना एक सा है तो जानवर मारना और इन्सान मारना एक सा हुआ. तब तो जानवर खाना और इंसान खाना भी एक ही बात है. क्या बकरे की तरह इंसान हलाल कर नोश फरमाना पसंद करोगे?
सुरेश जी aapne और इतनी सारी टिप्पणियों मैं इतना कुछ कह दिया गया है की बाकी कुछ बचा नहीं | मैं जय राम जी (जनोक्ति) जी से सहमत हूँ | धर्म के नाम पर निरीह पशुओं की बलि किसी भी तरह (चाहे वो हिन्दू हो, या मुसलमान या ईसाई ) मान्य नहीं होनी चाहिए | पर धर्म से अलग हट कर करोड़ों पशु पक्षियों को सिर्फ अपने जीभ के स्वाद के लिए मार कर खाना .. ये कहाँ तक उचित है ? इसपे कोई संगठन क्यों नहीं काम करता ? काम करना तो दूर की बात, टीवी पे लगभग रोज प्रचार दिया जाता है की मुर्गे खाओ .... कम से कम इसपे तो एनीमल राईट्स” और पशुप्रेमियों के संगठन कुछ करे .. पर ऐसा करेंगे नहीं क्योंकि उनका वास्तविक मकसद तो हिन्दू को नीचा दिखाना और बर्बर करार देना है |
@ Shastri JC Philip जी मैं तो आपको प्रगतिशील समझता था पर आपकी टिप्पणी तो यही दर्शाती है की आप प्रगतिशील नहीं हैं | आखिर "अमरीकी ईसाईयों को कृपया ईसाई समाज का प्रतिनिधि न माना जाये" ऐसा क्यूँ क्या अमेरिकी ईसाई .. ईसाई नहीं हैं ? क्या क्रिसमस के मौके पे विश्व के अन्य भागों मैं ईसाई मांस, मछली नहीं खा रहा है? पशु, पक्षी हत्या चाहे वो ईसाई या मुसलमान या हिन्दू कोई करे का विरोध कीजिये ... सिर्फ हिन्दुओं का नहीं |
@ कासिफ आरिफ जी इस्लाम के हिसाब से आप सही कह रहे हैं | वैसे भी इस्लाम मैं मसलमानों को छोड़ कर किसी की हत्या को जायज ही ठहराया है | इस्लाम जब अन्य धर्म के लोगों के संहार को जायज ठहराता है तो ... इस्लाम से पशुओं-पक्षियों के प्रति दया की आशा करना मुर्खता ही है |
@ safat alam जी क्या आपको survival के लिए जाने अनजाने किसी जीव की हत्या और अपने जीभ के स्वाद के लिए पशु पक्षियों को मारना दोनों मैं कोई अंतर नहीं दिखता है?
सुरेश जी, आपने अच्छा मुद्दा उठाया है और सलीके से अपनी बात को रखे हैं।
हिन्दू???? ये है कौन???? आप जानते हैं???? यदि जानते हैं तो आप भी सांप्रदायिक. और नहीं जानते तो आप खतरे में हैं. ये बज्जात आप पर कभी भी हमला कर सकते हैं धर्म के नाम पर, मंदिर के नाम पर. इन्हें इसके अलावा और कुछ करना भी नहीं आता है.......
बचो-बचो-बचो.....हिन्दू आ रहा है.....
सही है सबको जीवन जीने का समान अधिकार होना चाहिये।
और हिन्दू आतंकवाद क्या होता है, हम भी जानना चाहते हैं।
जितने दुनिया में समझदार है, उससे ज्यादा कमअक्ल हैं. इन चुगदपंथियों से यह आशा करना भी बेकार है कि अपने दिमाग के एकाध तंतुओं का इस्तेमाल भी कभी करें. जो लोग दूध-पानी में होने वाले कीटाणू और जानवरों के कत्ल को एक बराबर ठहरा रहे हैं उन्हें उनकी अक्ल का बीमा तो खुदा भी नहीं करेगा.
मांसखोरों के अपने घटिया तर्क हैं और मांस की प्यास में यह कुछ समझने को तैयार नहीं होंगे. इनके मुंह खून लग चुका है.
किसी भी नाम पर जीव हत्या सही नहीं है, ये लोग बकरे मारने को कुर्बानी कहते हैं. अबे क्या कुर्बानी दी है तुमने कातिलों!
हिन्दुओं ने बहुत सारे घृणित कर्मकांडो को त्यागा है और आगे भी त्याग रहे हैं चाहे वो जाती प्रथा हो, या कुछ और. कोई भी ऐसा धर्म या समाज नहीं है जिसमें इतनी बड़ी संख्या में लोग शाकाहारी हो जितने हिन्दू हैं.
बलि प्रथा कम होती जा रही है, और इसका विरोध हिन्दु खुद कर रहे हैं. इसलिये यह आज इतनी कम है. हिन्दुओं के मन्दिरों में बलि प्रथा तो समय होते बंद होगी ही. यह हम यकीन से कह सकते हैं. लेकिन क्या मांसखोरों के घरों में खून बहना रुकेगा?
@सफत आलम
अहिंसा की जिस अतिवादिता की बात आप कह रहे हैं हिन्दू धर्म ने विश्व को जैन धर्म के रूप में वह रास्ता भी दिखाया है और वह भी ईसा से ५०० वर्ष पूर्व. तब इस्लाम और इसाई धर्म के प्रवर्तक विश्व परिदृश्य पर कहीं नहीं थे. अगर उस राह पर आप चल सकें तो जैन धर्म में दीक्षित हो जाएँ, आपका स्वागत है.
विश्व में शाकाहारी और मांसाहारी - दोनो है। मांसहारी है तो पशु के वध के बिना तो काम नहीं चलेगा- घोडा घास से दोस्ती करेगा तो खाएगा क्या :) रही बात बली को धर्म से जोड़ने की, यह एक बहाना होता है उत्सव मनाने का। अच्छा क्या है यह तो ईश्वर, प्रभू, खुदा जाने॥
चाणक्य नें सही फ़रमाया है:
सीधे पेड को सबसे पहले काटा जाता है.इसलिये सीधापन भी गलत है.
इसिलिये बौद्धिक स्तर पर हिंदुओं को ऐसी सभी बातों का कठोर विरोध करना चाहिये, जिसमें दुश्प्रचार किया जाता हो.
दुनिया में सभी जानवरों , पक्षियों और जलचरों का Survival of Fittest का नैसर्गिक नियम है. मस्ती या जीभ के स्वाद के लिये मानव मात्र ही मांसाहार करता है.धर्म के नाम पर तो और भी निंदनीय है.
धर्म शब्द को सूत्र रूप में पकडें, तो जहां प्रेम नहीं वहां धर्म नहीं । प्रेम, सह-अस्तित्व की भावना से भी ऊपर की अनुभूति है । दूध में अंतर्निहित माइक्रो-आर्गनिज़्म को पी जाना अलग बात है और बलि या कुरबानी के नाम पर बडे-माँसल जीव की हत्या दूसरी बात है । दूसरी दशा में, निस्सन्देह हम प्रेम की हत्या कर रहे होते हैं । अपने स्वार्थ में गढे गये तर्क तथाकथित धार्मिक किताबों मे अनन्य मिलेंगे । किताब के आगे भी कुछ है । जिनके पास विवेक है वे ही गढे हुए रास्ते से आगे बढते हैं ।
जिस धर्म का जन्म ही तलवार के बल पर हुआ हो उससे किसी तरह की दया और प्रेम की तवक्को करना ही बेवकूफी है.... वैसे खतना करके ये अपना कुछ हिस्सा भी कुर्बान तो जरूर करते हैं....हां अगर ये हर साल बकरीद को ही खतना करें तो निरीह जानवरों की जान बच जाए और कुर्बानी भी सही अर्थों में हो.....
बलि देना काफी हद तक आदम युग और बर्बरता का प्रतीक है. आदि काल में परिस्तिथिवश शायद मानव को अपनी क्षुधा शांत करने के लिए अन्न के अभाव में मॉस खाना पड़ा होगा. बिना हड्डी की इस जीभ पर कुछ को शायद मॉस का स्वाद लग गया हो और वो विवेकशून्य हो कर मांसाहारी बन गया होगा. मनुष्य शाकाहारी है या मांसाहारी ये प्रश्न कई बार उठता है और हर तरफ के लोग अपनी बात सिद्ध करने के लिए तर्क वितर्क करते है. दूध, दही, पनीर इत्यादि में जो जीवाणु होते है उन्हें बेक्टीरिया कहाँ जाता है. विज्ञानं बेक्टीरिया और अन्य पशु, पक्षीया प्राणियों को अलग अलग विभाजित करता है.
ये बेक्टीरिया या माइक्रो-आर्गनिज़्म स्वयं जनित होते है और इनका गला रेंत कर इनको मारा जा सकता है. इनके खून से दूध का रंग लाल नहीं हो जाता है. फिर भी अगर जानवर की बलि देना सही है तो इंसान नाम का सामाजिक प्राणी भी तो जानवर है. आदमी की बलि को हत्या क्यों माना जाता है.
दरअसल मानव शरीर की सरंचना शाकाहारी जन्तुओ के परिवार से ज्यादा मिलती जुलती है. मानव शारीर, मांसाहारी और शाकाहारी प्राणियों की शारीरिक समानताये नीचे लिखे हुए लिंक पर देखे और फिर खुद ही फैसला करे.
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SAFAT ALAM
KO
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MEN
BHEJO
VO
ISKO
BILKUL
USII TARAH KHYEGA JAISE MAIN
DAHII KO KHATA
HUN TABHII ISKO TARK AUR KUTARK KA
ANTAR SAMAJH MEN AAYEGA
पहले ही बहुत कुछ लिखा जा चूका है इसलिए मैं कुछ नहीं कहूँगा ..
आपके लेखन और विचारों की कद्र करता हूँ
हिन्दू धर्म की कोई भी मान्य पुस्तक बलि को मान्यता नहीं देती और न ही मांस भक्षण की अनुमति देती है, इसका अर्थ यह है की हिन्दू धर्म में जो लोग बलि देते हैं, शराब चड़ाते हैं वो अंधविश्वास में जकड़े जा चुके हैं. ये कुरीतियाँ महाभारत के पश्चात् मुर्ख वाम-मार्गियों द्वारा चालाई गयी थी और कुछ समय पश्चात् धीरे-धीरेअनेक सम्प्रदायों ने जन्म लिया था और उसी समय हिन्दुओ में मूर्ति पूजा आरम्भ हुई थी, यह एक अति प्राचीन ऐतिहासिक तथ्य है खैर मैं यहाँ अधिक नहीं कहता हुआ यही कहना चाहता हूँ हिन्दू इन कुरीतियों, अंधविश्वासों में फंसकर ही स्वयं अन्धकार में चला गया है अन्यथा गहन अध्यन से पता चलता है की समस्त आधुनिक विज्ञान उसीकी आधारशिला पर खड़ा है
और हाँ जो मूल तथ्य इस लेख द्वारा कहा गया है है उस से मैं भी पूर्णतयः सहमत हूँ.
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