सोनिया गाँधी के अनाड़ीपन और कांग्रेस की मूर्खता की वजह से जल रहा है आंध्रप्रदेश… Telangana Movement, Sonia Gandhi and Reddy
अभी यह ज्यादा पुरानी बात नहीं हुई है जब भारत में तीन नये राज्यों छत्तीसगढ़, झारखण्ड और उत्तरांचल का निर्माण बगैर किसी शोरशराबे और हंगामे के हो गया और तीनों राज्यों में तथा उनसे अलग होने वाले राज्यों में वहाँ के मूल निवासियों(?) और प्रवासियों(?) के बीच रिश्ते कड़वाहट भरे नहीं हुए। इन राज्यों में शान्ति से आम चुनाव आदि निपट गये और पिछले कई सालों से ये राज्य अपना कामकाज अपने तरीके चला रहे हैं। फ़िर तेलंगाना और आंध्र में ऐसा क्या हो गया कि पिछले 15 दिनों से दोनों तरफ़ आग लगी हुई है? दरअसल, यह सब हुआ है सोनिया गाँधी के अनाड़ीपन, खुद को महारानी समझने के भाव और कांग्रेसियों की चाटुकारिता की वजह से।
तेलंगाना इलाके की ज़मीनी स्थिति यह है कि आंध्र की दो मुख्य नदियाँ कृष्णा और गोदावरी इसी इलाके से बहते हुए आगे जाती हैं, लेकिन सभी प्रमुख बाँध और नहरें बनी हुई हैं आंध्र वाले हिस्से में, जिस वजह से उधर की ज़मीन बेहद उपजाऊ और कीमती बन चुकी है। रावों और रेड्डियों ने आंध्र तथा रायलसीमा का जमकर दोहन किया है और अरबों-खरबों की सम्पत्ति बनाई है, जबकि तेलंगाना को छोटे-मोटे लॉलीपाप देकर बहलाया जाता रहा है। अधिकतर बड़े उद्योग और खनन माफ़िया आंध्र/रायलसीमा में हैं, नौकरियों-रोज़गार पर आंध्रवासियों का कब्जा बना हुआ है। ऊपर से तुर्रा यह कि आंध्र वाले लोग तेलंगाना के निवासियों के बोलने के लहज़े (उर्दू मिक्स तेलुगु) की हँसी भी उड़ाते हैं और इधर के निवासियों को (ज़ाहिर है कि जो कि गरीब हैं) को नीची निगाह से भी देखते हैं, यहाँ तक कि उस्मानिया विश्वविद्यालय जो कि तेलंगाना समर्थकों का गढ़ माना जाता है, वहाँ होने वाले किसी भी छात्र आंदोलन के दौरान उन्हें पीटने के लिये पुलिस भी विशाखापत्तनम से बुलवाई जाती है। अब ऐसे में अलगाव की भावना प्रबल न हो तो आश्चर्य ही है। यह तो हुई पृष्ठभूमि… अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर…
जैसा कि सभी जानते हैं केसीआर के नाम से मशहूर के चन्द्रशेखर राव पिछले कई दशकों से तेलंगाना आंदोलन के मुख्य सूत्रधारों में से एक रहे हैं। अभी उन्होंने इस मुद्दे पर आमरण अनशन किया तथा उनकी हालत बेहद खराब हो गई, तब सोनिया गाँधी को तुरन्त कूटनीतिक और राजनैतिक कदम उठाने चाहिये थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। उल्टे उनके जन्मदिन पर तेलंगाना के सांसदों को खुश करने के लिये उनकी महंगी शॉलों के रिटर्न गिफ़्ट के रूप में तेलंगाना राज्य बनाने का वादा कर दिया (मानो वे एक महारानी हों और राज्य उनकी मर्जी से बाँटे जाते हों)। बस फ़िर क्या था, सोनिया की मुहर लगते ही चमचेनुमा कांग्रेसियों ने तेलंगाना का जयघोष कर दिया। गृहमंत्री ने संसद में ऐलान कर दिया कि अलग तेलंगाना राज्य बनाने के लिये आंध्र की राज्य सरकार एक विधेयक पास करके केन्द्र को भेजेगी। इस मूर्खतापूर्ण कवायद ने आग को और भड़का दिया। सबसे पहला सवाल तो यही उठता है कि चिदम्बरम कौन होते हैं नये राज्य के गठन की हामी भरने वाले? क्या तेलंगाना और आंध्र, कांग्रेस के घर की खेती है या सोनिया गाँधी की बपौती हैं? इतना बड़ा निर्णय किस हैसियत और प्रक्तिया के तहत लिया गया? न तो केन्द्रीय कैबिनेट में कोई प्रस्ताव रखा गया, न तो यूपीए के अन्य दलों को इस सम्बन्ध में विश्वास में लिया गया, न ही किसी किस्म की संवैधानिक पहल की गई, राज्य पुनर्गठन आयोग बनाने के बारे में कोई बात नहीं हुई, आंध्र विधानसभा ने प्रस्ताव पास किया नहीं… फ़िर किस हैसियत से सोनिया और चिदम्बरम ने तेलंगाना राज्य बनाने का निर्णय बाले-बाले ही ले लिया? इनके साथ दिक्कत यह हो गई कि सोनिया ने अपने जन्मदिन पर तेलंगाना सांसदों को खुश करने के चक्कर में अपनी जेब से रेवड़ी बाँटने के अंदाज़ में राज्य की घोषणा कर दी, उधर चिदम्बरम ने भी चन्द्रशेखर राव को अधिक राजनैतिक भाव न मिल सके तथा कांग्रेस की टांग दोनों तरफ़ फ़ँसी रहे इस भावना से बिना किसी भूमिका के आंध्र के बंटवारे की घोषणा कर दी।
अब इसका नतीजा ये हो रहा है कि ऊपर से नीचे तक न सिर्फ़ कांग्रेस बल्कि आंध्र के लोगों की भावनाएं उफ़ान मार रही हैं, और आपस में झगड़े और दो-फ़ाड़ शुरु हो चुका है। चिरंजीवी पहले तेलंगाना के पक्ष में थे, विधानसभा चुनाव तक उनके समर्थक भी उनके साथ ही रहे, जैसे कांग्रेस ने यह तमाशा खेला, चिरंजीवी की फ़िल्मों का बॉयकॉट प्रारम्भ हो गया, आंध्र की तरफ़ अपना अधिक फ़ायदा देखकर मजबूरन उन्हें भी पलटी खाना पड़ी और जब पलटी खाई तो अब तेलंगाना में उनकी फ़िल्मों के पोस्टर फ़ाड़े-जलाये जाने लगे हैं, लोकसभा में सोनिया गाँधी के सामने ही आंध्र और तेलंगाना के सांसद एक-दूसरे को देख लेने की धमकियाँ दे रहे हैं, जो "कथित" अनुशासन था वह तार-तार हो चुका, तात्पर्य यह कि ऊपर से नीचे तक हर कोई अलग पाले में बँट गया है। पहले चन्द्रशेखर राव ने भावनाएं भड़काईं और फ़िर सोनिया और उनके सिपहसालारों ने अपनी मूर्खता की वजह से स्थिति और बिगाड़ दी। ऐसे मौके पर याद आता है जब, वाजपेयी जी के समय छत्तीसगढ़ सहित अन्य दोनों राज्यों का बंटवारा शान्ति के साथ हुआ था और मुझे तो लगता है कि बंटवारे के बावजूद जितना सौहार्द्र मप्र-छत्तीसगढ़ के लोगों के बीच है उतना किसी भी राज्य में नहीं होगा। हालांकि छत्तीसगढ़ के अलग होने से सबसे अधिक नुकसान मप्र का हुआ है लेकिन मप्र के लोगों के मन में छत्तीसगढ़ के लोगों और नेताओं के प्रति दुर्भावना अथवा बैर की भावना नहीं है, और इसी को सफ़ल राजनीति-कूटनीति कहते हैं जिसे सोनिया और कांग्रेस क्या जानें… कांग्रेस को तो भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम और तेलंगाना-आंध्र जैसे बंटवारे करवाने में विशेषज्ञता हासिल है।
बहरहाल इस “खेल”(?) में आंध्र के शक्तिशाली रेड्डियों ने पहली बार सोनिया गाँधी को उनकी असली औकात दिखा दी है। पहले भी जब तक वायएसआर सत्ता में रहे, सोनिया अथवा कांग्रेस उनके खिलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोल पाते थे, वे भी भरपूर धर्मान्तरण करवा कर “मैडम” को खुश रखते थे, उनकी मृत्यु के बाद रेड्डियों ने पूरा जोर लगाया कि जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री बनवाया जाये, लेकिन सोनिया ने ऐसा नहीं किया और उसी समय रेड्डियों ने सोनिया को मजा चखाने का मन बना लिया था। रेड्डियों की शक्ति का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लोकसभा में सर्वाधिक सम्पत्ति वाले सांसदों में पहले और दूसरे नम्बर पर आंध्र के ही सांसद हैं, तथा देश में सबसे अधिक प्रायवेट हेलीकॉप्टर रखने वाला इलाका बेल्लारी, जो कहने को तो कर्नाटक में है, लेकिन वहाँ भी रेड्डियों का ही साम्राज्य है।
पिछले 15 दिनों से आंध्र में हंगामा मचा हुआ है, वैमनस्य फ़ैलता जा रहा है, बनने वाले राज्य और न बनने देने के लिये संकल्पित राज्यों के लोग एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं, राजनीति हो रही है, फ़िल्म, संस्कृति, खेल धीरे-धीरे यह बंटवारा नीचे तक जा रहा है, आम जनता महंगाई के बोझ तले पिस रही है और आशंकित भाव से इन बाहुबलियों को देख रही है कि पता नहीं ये लोग राज्य का क्या करने वाले हैं…। उधर महारानी और उनका “भोंदू युवराज” अपने किले में आराम फ़रमा रहे हैं… क्योंकि देश में जब भी कुछ बुरा होता है तब उन दोनों का दोष कभी नहीं माना जाता… सिर्फ़ अच्छी बातों पर उनकी तारीफ़ की जाती है, ज़ाहिर है कि उनके पास चमचों-भाण्डों और मीडियाई गुलामों की एक पूरी फ़ौज मौजूद है…
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22 comments:
ये हुई न बात, एक झटके में वापस फॉर्म में लौट आये !
यह अनौपचारिक टिपण्णी थी ओपचारिक टिपण्णी लेख पढने के बाद !
मुख्य लेख के अतिरिक्त टीप -
अब दोनों पक्ष हैदराबाद पर अपना दावा जता रहे हैं, ऐसी स्थिति में राजनैतिक दलों को आपसी समझबूझ से या तो हैदराबाद को केन्द्रशासित प्रदेश घोषित करके (चण्डीगढ़ की तरह) दोनों प्रदेशों की राजधानी बना देना चाहिये, अथवा विशाखापतनम को आंध्रप्रदेश की राजधानी बनाना चाहिये जहाँ समुद्र तट होने की वजह से उसका विकास भी मुम्बई की तरह किया जा सकेगा…
पूरी च्रीर फाड़ के साथ विस्त्रित रिपोर्ट
बहुत बढिया बातें सामने रखी हैं तुमने, कभी दिल्ली आओ तो मिलना, जामा मस्जिद इलाके में हर किसी से पूछ लेना सबको पता है अज्जु कसाई का काम कठोर दिल वाला है मगर है बहुत नरम दिल आदमी अज्जु कसाई
"उधर महारानी और उनका “भोंदू युवराज” अपने किले में आराम फ़रमा रहे हैं… क्योंकि देश में जब भी कुछ बुरा होता है तब उन दोनों का दोष कभी नहीं माना जाता… सिर्फ़ अच्छी बातों पर उनकी तारीफ़ की जाती है, ज़ाहिर है कि उनके पास चमचों-भाण्डों और मीडियाई गुलामों की एक पूरी फ़ौज मौजूद है… "
और "मौन सिंह" मौन बैठा है !!!!!
क्या बात है। बड़ी ही विस्तृत जानकारी के साथ आपने इस मुद्दे पर कांग्रेस की बेवकूफी का खुलासा किया है। छोटी से छोटी बात का हवाला देकर आंध्र के हालात को समझाया है। बढिय़ा पोस्ट।
मैंने पूरा लेखा पढ़ा... इट्स ओ.के !
लेकिन सोनिया जी जिनका शूमार दुनियां की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में होता है... और जिनकी पार्टी लगातार २ बार (और हैट्रिक की तैयारी है) सरकार बनाने में सफ़ल रही है..वह भी उनके नेतृत्व में...!
आज जाना वो अनाड़ी (!!!???) हैं.
अगर देखा जाये तो सोनिया गांधी के नेतृत्व में ही का्ग्रेस अपने लोकसभा के इतिहास में सबसे कम 118 सीटे पायी थी, यह जरूर है कि भाजपा अपनी कमजोरियो के कारण आज इस स्थिति आज अंग्रेजो द्वारा बनाई काग्रेस में कोई ऐसा नेतृत्व नही जो पारिवारिक वंश वाद को चुनौती दे सकते, यह कोई लोकतंत्र नही, एक जो जीतेन्द्र प्रसाद(जतीन प्रसाद) के पिता जो सोनिया के खिलाफ चुनाव लड़े, उन्हे उनकी गति तक पहुँचा दिया गया।
यही है सोनिया गांधी के कांगेस की मक्कारी
यात्रा से लौटा हूँ, अराम से पढ़ कर टिप्पियाता हूँ, अपना फॉर्म बनाए रखें :)
उम्दा माल निकाला आपने. कांग्रेस को हटाना अब मुश्किल ही नामुमकिन हो गया है. ईवीएम और उनमें किये गये संशोधनों के चलते. एक चैनल पर एक इन्जीनियर ने इन फूलप्रूफ मशीनों को हैक कर दिखाया था लेकिन न तो जनता को ये दिखाई देता है न लोकतन्त्र के रक्षकों को. बाकी देश का विभाजन ही बाकी रह गया है. कभी कभी लगता है कि वह भी शायद ठीक हो. अन्यथा अभी तो कोई कसर बाकी छोड़ी नहीं है हिन्दुओं को तीसरे दरजे का और गुलाम बनाने में.
Ekdam sateek vivechnaa...
मै इस बारे मे आप से सहमत नही हूं . यह सोनिया गान्धी और कांग्रेस का अनाडीपन या मूर्खता नही यह उनकी शातिराना चाल है देश वासियो को महंगाई जैसे गम्भीर मुद्दो से ध्यान भट्काने के लिये . पहले लिब्राहन रिपोर्ट और अब यह आगे क्या क्या पिटारे मे भरा उनके कोई नही जानता .
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Looking in Good form, aapse milne ke baad ye pehli post padhi. Bahut acchi !!!
Congress ke ka ek-2 supporter Sonia Gandhi ka chamcha hai kyunki revadiyna wahi se batati hai.
Dekhte hai Sonia mein kitna dum hai aur wo bharat ka kitna bura kar sakti hai !!!
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आदरणीय सुरेश जी,
आपके लेख से स्पष्ट है कि तेलंगाना की मांग एक जायज मांग है, परन्तु सरकार को दूर दॄष्टि दिखाते हुऐ राज्य पुनर्गठन आयोग को बनाना चाहिये और तेलंगाना सहित देश के अन्य भागों से उठ रही/ उठ सकने वाली मांगों पर भी विचार करना चाहिये... ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है... तेलंगाना शीघ्र ही अस्तित्व में आ जायेगा... रही बात गठन को लेकर हो रहे विवादों की... तो कुछ समय तक सरकार केवल चुप रहकर देखे... दोनों पक्ष खुद ही मसले सुलझा लेंगे... बस अराजक तत्वों को शांतिभंग न करने दी जाये।
प्रवीण भाई,
शायद सोनिया/कांग्रेस की बुराई सुनकर आपको बुरा लगा होगा :) लेकिन तेलंगाना की मांग जायज़ है यह तो काफ़ी समय से साबित है, लेकिन पिछले 60 साल में एकाध-दो बार छोड़कर अधिकतर कांग्रेस ही आंध्र में सत्ता में रही है, लेकिन उसने आज तक कुछ नहीं किया और अब किया तो ऐसा किया कि दोनों तरफ़ आग लगा दी।
संयुक्त आंध्र की मांग करने वाले भी सिर्फ़ अपना स्वार्थ देख रहे हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि तेलंगाना राज्य बनते ही सबसे पहले उधर बाँध बनेंगे और आंध्र की तरफ़ पानी की मारामारी हो जायेगी और जिन ज़मीनों के भाव तथा मिर्च-कपास की फ़सलों के बल पर रेड्डी लोग इतराते हैं उसकी वाट लग जायेगी… कांग्रेस ने अपनी जिम्मेदारियाँ ठीक से नहीं निभाई हैं, इसीलिये तो देश की भी वाट लगी पड़ी है… :)
आंध्र तेलांगना की स्थितियों पर तथ्यों के साथ सटीक विवेचना की है आपने.
मुर्ख कहें या शातिर कहें, नुक्सान अपना(जनता का) ही है.
जबरदस्त फॉर्म में चल रहे हैं.
वैसे सुरेश जी, आपके पोस्ट में एक बात सोचनीय है-
युवराज और माहारानी जी का गुणगान मीडिया में सबसे ज्यादा क्यों होता है...
जहाँ सड़क पर मह्नागाई पड़ोस जाता है वहां क्या आसमान में सस्ता स्पेक्ट्रम / बैंडविथ की रेवरी भी बांटी जाती है...?
पड़ताल का विषय है. जड़ा तथ्य के साथ खुलासा कीजियेगा..
सुलभ
कांग्रेस को तो भारत-पाकिस्तान, हिन्दू-मुस्लिम और तेलंगाना-आंध्र जैसे बंटवारे करवाने में विशेषज्ञता हासिल है।
क्या तेलंगाना और आंध्र, कांग्रेस के घर की खेती है या सोनिया गाँधी की बपौती हैं? इतना बड़ा निर्णय किस हैसियत और प्रक्तिया के तहत लिया गया?
महारानी और उनका “भोंदू युवराज” अपने किले में आराम फ़रमा रहे हैं… क्योंकि देश में जब भी कुछ बुरा होता है तब उन दोनों का दोष कभी नहीं माना जाता… सिर्फ़ अच्छी बातों पर उनकी तारीफ़ की जाती है, ज़ाहिर है कि उनके पास चमचों-भाण्डों और मीडियाई गुलामों की एक पूरी फ़ौज मौजूद है…
Sateek...
नेहरु-गांधी परिवार के लिए यह कोई नयी बात नहीं है .महाराष्ट्र गुजरात ,
पंजाब हरियाणा ,आंध्र और मद्रास राज्य .........कितने नाम गिनाऊँ .
देश में यह परिवार पश्चिमी साम्राज्यवाद का ही अग्रसारण है .
बेवकूफी और सत्तालिप्सा का अद्भुत मेल ,और भाग्य काभी . क्योंकि सौभाग्य के सैकड़ों कारण होने के बावजूद , भारत का यह अभाग्य श्राप सा, भारत की नियति बन गया है .
उबरने के लिए क्रांति के अलावा कोई मार्ग नहीं है.
कौन करेगा ????????????.......................
पता नहीं किसका भला होगा पर जनता तो पिट रही है:)
सोनिया मैडम जी के कुटिल चालों से पूरा देश गर्त में जा रहा है .... पर इससे हम भारत वासियों को क्या लेना देना ... आम भारतवासी तो अपने में ही व्यस्त हैं ...
कोई कहे कहता रहे कितना भी हमको .......
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