Friday, November 27, 2009

खदानों में हाथ डालिये, मधु कोड़ा और रेड्डियों जैसे खरबपति बनिये… Mining Mafia, Jharkhand, Madhu Koda, Congress

जब झारखण्ड में काले चश्मे वाले राज्यपाल सिब्ते रजी के जरिये काला खेल करवाकर "धर्मनिरपेक्षता" के नाम पर तथा "भाजपा को अछूत बनाकर" सत्ता से दूर रखने का खेल खेला गया था, उसमें "भ्रष्टाचार की माँ" कांग्रेस-राजद और बाकी के लगुए-भगुए किसी धर्मनिरपेक्ष सिद्धान्त के नाम पर एकत्रित नहीं हुए थे… निर्दलीय विधायक को मुख्यमंत्री बनाने पर राजी वे इसलिये नहीं हुए थे कि भाजपा के खिलाफ़ उन्हें लड़ाई लड़ना थी… बल्कि सारे के सारे ठग भारत माँ के सीने में छेद करके खदानों के जरिये होने वाली अरबों-खरबों की कमाई में हिस्सा बटोरने के लिये "गैंग" बनाये हुए थे। जैसे-जैसे मधु कोड़ा की लूट के किस्से उजागर हो रहे हैं, देश का मेहनतकश और निम्न-मध्यमवर्गीय व्यक्ति कुछ अचम्भे से, कुछ निराशा-हताशा से, कुछ गुस्से से और कुछ मजबूरी से इन लुटेरों को मन मसोसकर देख रहा है।

एक समय में मामूली से कंस्ट्रक्शन वर्कर और खदानकर्मी से मुख्यमंत्री बनने और भारतभूमि की अरबों की सम्पत्ति हड़प करने वाले की हरकतों के बारे में लालू और कांग्रेस को पता ही नहीं चला होगा, ऐसा कोई मूर्ख ही सोच सकता है। जबकि जो लोग कोड़ा और कांग्रेस को जानते हैं उन्हें पता था कि ऐसा कोई महाघोटाला कभी न कभी सामने आयेगा।

झारखण्ड से कोयले का अवैध खनन सालाना करीब 8000 करोड़ रुपयों का है, जिसमें लगभग 500 माफ़िया गुट अलग-अलग स्तरों पर जुड़े हुए हैं। कोयला खदानों के अधिकारी और स्थानीय गुण्डे इस रैकेट का एक मामूली पुर्जा मात्र हैं। मनचाहे इलाके में ट्रांसफ़र करवाने के लिये अधिकारियों द्वारा छुटभैये नेताओं से लेकर मुख्यमंत्री तक करोड़ों रुपये की रिश्वत अथवा "अरबों रुपये कमाकर देने की शपथ" का प्रावधान है। इस माफ़िया गैंग की कार्यप्रणाली एकदम सीधी और स्पष्ट है, ऐसी खदानों की पहचान की जाती है जो "बन्द" या समाप्त घोषित की जा चुकी हैं (अथवा मिलीभगत से "बन्द" घोषित करवा दी गई हैं), फ़िर उन्हीं खदानों में से फ़िर से लोहा और अयस्क निकालकर बेच दिया जाता है, और ऐसा दिनदहाड़े किया जाता है, क्योंकि ऊपर से नीचे तक सबका हिस्सा बाँटा जा चुका होता है। बताया जाता है कि सारे खेल में "सेल" (स्टील अथॉरिटी ऑफ़ इंडिया लिमिटेड) के उच्चाधिकारी, खान मंत्रालय और झारखण्ड सरकार मिले हुए होते हैं। खदानों से निकली हुई लाल मिट्टी और अयस्क को कच्चे लोहे में परिवर्तित करने वाले हजारों "क्रशर्स" झारखण्ड में यत्र-तत्र देखे जा सकते हैं जिनमें से 95% के मालिक नेता ही हैं, जो फ़र्जी नामों से छोटे-मोटे खदान ठेकेदार आदि बने हुए हैं। इस प्रकार की छोटी-छोटी फ़ैक्टरियाँ ही करोड़ों कमा लेती हैं, जिसे अंग्रेजी में "टिप ऑफ़ आईसबर्ग" कहा जाता है (हिन्दी में इसे "भ्रष्टाचार के महासागर की ऊपरी लहरें" कहा जा सकता है)

http://ibnlive.in.com/news/exclusive-how-exjharkhand-cm-madhu-koda-profited-from-mines/105088-3.html?utm_source=IBNdaily_MCDB_121109&utm_medium=mailer



वैसे तो यह लूट सालों से जारी है, जब कांग्रेस सत्ता में थी तब भी, और जब 15 साल लालू सत्ता में थे तब भी। झारखण्ड के बिहार से अलग होने का सबसे अधिक दुख लालू को यों ही नहीं हुआ था, असल में एक मोटी मुर्गी हाथ से निकल जाने का वह दुख था, ठीक उस प्रकार जैसे मध्यप्रदेश के नेताओं को छत्तीसगढ़ के निकल जाने का दुख हुआ, क्योंकि छत्तीसगढ़ "लूटने" के काम भी आता था और ईमानदार और सख्त अफ़सरों को सजा के बतौर बस्तर/अम्बिकापुर ट्रांसफ़र करने के काम भी आता था। कहने का मतलब ये कि मधु कोड़ा तो हमारी नज़रों में सिर्फ़ इसलिये आये कि उन्होंने कम से कम समय में अधिक से अधिक कमाने का मौका नहीं गंवाया।

आंध्रप्रदेश के "राष्ट्रसन्त" वायएस राजशेखर रेड्डी, अनधिकृत रूप से देश के सबसे अधिक पैसे वाले नेता माने जाते हैं (शरद पवार के समकक्ष)। उन्हीं के नक्शेकदम पर चल रहे हैं उनके बिजनेस पार्टनर कर्नाटक के खनन माफ़िया रेड्डी बन्धु। एक छोटा सा उदाहरण देता हूं… मध्यप्रदेश में एक सड़क ठेकेदार पर खनन विभाग ने 32 लाख रुपये की वसूली का जुर्माना निकाला, ठेकेदार ने सड़क निर्माण करते-करते सड़क के दोनों ओर नाली खुदाई करके उसमें से निकलने वाली मुरम चुपके से अंटी कर ली, जबकि कुछ का उपयोग वहीं सड़क बनाने में कर दिया… अब सोचा जा सकता है कि सिर्फ़ 8 किलोमीटर की सड़क के ठेके में सड़क के दोनों तरफ़ खुदाई करके ही ठेकेदार लाखों की मुरम निकालकर सरकार को चूना लगा सकता है, तो सुदूर जंगलों में धरती से 100-200 फ़ुट नीचे क्या-क्या और कितना खोदा जा रहा होगा और बाले-बाले ही बेचा जा रहा होगा (ठेकेदार पर 32 लाख का जुर्माना भी "ऑफ़िशियल" तौर पर हुआ, हकीकत में उस ठेकेदार ने पता नहीं कितना माल ज़मीन से खोदा होगा, ऊपर कितना पहुँचाया होगा और जुर्माना होने के बाद सरकारी अफ़सरों के घर कितना पहुँचाया होगा, इसका हिसाब आप कभी नहीं लगा सकते)।

असल में आप कल्पना भी नहीं कर सकते कि खनन के काम में कितनी अनाप-शनाप कमाई है। मधु कोड़ा का भ्रष्टाचार का आँकड़ा, इन तीनों रेड्डियों (एक दिवंगत और दो बाकी) तथा उनके बेटे जगनमोहन के मुकाबले कुछ भी नहीं है। एक मोटे अनुमान के अनुसार चारों रेड्डियों ने इस देश के राजस्व को लगभग 75,000 करोड़ रुपये से अधिक का चूना लगाया है। पिछले दिनों कर्नाटक में जो खेल खेला गया उसके पीछे भी आंध्रप्रदेश के रेड्डी का ही हाथ है, जिसने येद्दियुरप्पा को भी रुलाकर रख दिया। उनका असली खेल यह था कि किसी तरह येदियुरप्पा न मानें और भाजपा में टूट हो जाये फ़िर कांग्रेस के अन्दरूनी-बाहरी समर्थन से सरकार बना ली जाये, ताकि आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित बेल्लारी की खदानों पर सारे रेड्डियों का एकछत्र साम्राज्य स्थापित हो जाये। बेशर्म लालच की इन्तेहा देखिये कि रेड्डियों ने आंध्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित जंगलों में भी बेतहाशा अवैध खनन किया है और अब सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें फ़टकार लगाई है। आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री रोसैया को इसका फ़ायदा हुआ है और अब वह सीबीआई और जाँच की धमकी की तलवार के बल पर जगनमोहन रेड्डी को दबोचे हुए हैं।



अब आते हैं नक्सलियों पर, नक्सली विचारधारा और उसके समर्थक हमेशा से यह आरोप लगाते आये हैं कि आदिवासी इलाकों से लौह अयस्क और खनिज पदार्थों की लूट चल रही है, सरकारों द्वारा इन अति-पिछड़े इलाकों का शोषण किया जाता है और खदानों से निकलने वाले बहुमूल्य खनिजों का पूरा मुआवज़ा इन इलाकों को नहीं मिलता आदि-आदि। लेकिन तथाकथित विचारधारा के नाम पर लड़ने वाले इसे रोकने के लिये कुछ नहीं करते, क्योंकि खुद नक्सली भी इन्हीं ठेकेदारों और कम्पनियों से पैसा वसूलते हैं। यहीं आकर इनकी पोल खुल जाती है, क्योंकि कभी यह सुनने में नहीं आता कि नक्सलियों ने किसी भ्रष्ट ठेकेदार अथवा खदान अफ़सर की हत्याएं की हों, अथवा कम्पनियों के दफ़्तरों में आग लगाई हो…। मतलब ये कि खदानों और खनिज पदार्थों की लूट को रोकने का उनका कोई इरादा नहीं है, वे तो चाहते हैं कि उसमें से एक हिस्सा उन्हें मिलता रहे, ताकि उनके हथियार खरीदी और ऐश जारी रहे और यह सब हो रहा है आदिवासियों के भले के नाम पर। नक्सली खुद चाहते हैं कि इन इलाकों से खनन तो होता रहे, लेकिन उनकी मर्जी से… है ना दोगलापन!!! यदि नक्सलियों को वाकई जंगलों, खनिजों और पर्यावरण से प्रेम होता तो उनकी हत्या वाली "हिट लिस्ट" में मधु कोड़ा और राजशेखर रेड्डी तथा बड़ी कम्पनियों के अधिकारी और ठेकेदार होते, न कि पुलिस वाले और गरीब निरपराध आदिवासी।
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विषयान्तर :- ऐसे भ्रष्ट संस्कारों और संस्कृति की जन्मदात्री है कांग्रेस…। इसके जवाब में यह तर्क देना कि भाजपा-बसपा-सपा-शिवसेना-कमीनिस्ट सभी तो भ्रष्ट हैं, नितान्त बोदा और बेकार है, क्योंकि ये भी उसी संस्कृति की पैदाइश हैं। असली सवाल उठता है कि ऐसी "खाओ और खाने दो" की संस्कृति का विकास किसने किया और इसे रोकने के प्रयास सबसे पहले किसे करना चाहिये थे और नहीं किया…। फ़िर भी लोग मुझसे पूछते हैं कि मैं कांग्रेस से घृणा क्यों करता हूं? (इस विषय पर जल्दी ही एक पोस्ट आयेगी…)

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20 comments:

Mohammed Umar Kairanvi said...

एक नजर में अच्‍छा लगा, इसलिए आज बधाई देने हम खुद आगये, धन्‍यवाद मत कहतना, बस डिलिट नहीं करना वही धन्‍यवाद होगा

मुहम्‍मद उमर कैरानवी
Rank-3 Blogger
ब्लागवाणी जिसे अपना रजिस्‍ट्रेशन देने से घबराये

उम्दा सोच said...

आप का पोस्ट आँखे खोल देता है !पर आज ये क्या हुआ इस पोस्ट ने कैरान्वी की अकल ही खोल दी !!!

जी.के. अवधिया said...

"ऐसे भ्रष्ट संस्कारों और संस्कृति की जन्मदात्री है कांग्रेस…।"

बिल्कुल सही बात है। कांग्रेस का तो जन्म ही स्वार्थ के लिये हुआ था।

Anil Pendse अनिल पेंडसे said...

इस देश और यहाँ के लोगों के बारे में पता नहीं और क्या क्या जानकारी मिलती जाएगी, जितना जानो कम हैं

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ उमदा सोच - तुम कैरानवी को अच्‍छी तरह नहीं जानते, कुछ और समझने के लिए देखों हिन्‍दू-मुस्लिम एकता की मिसाल इसी ब्लाग की पोस्‍ट, पहले न. के कमेंटस से आखिर तक के कमेंटस देखना

क्या "नेस्ले" कम्पनी, भारत के बच्चों को "गिनीपिग" समझती है?
http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/09/nestle-foods-gm-content-and-consumer.html

वीरेन्द्र जैन said...

पहली बात तो यह कि आप अनुमान के आधार पर इसमें नक्सलियों को भी जोड़ कर गलत कर रहे हैं और इस तरह अपराध को स्वाभिक बनाने का प्रयास कर रहे हैं जबकि ऐसा है नहीं दूसरी कि भाजपा और येदुरप्पा का बचाव करते हुये अपनी नफरत को उन्हें कमीनिष्ट कह कर व्यक्त कर रहे हैं और में जानता हूं कि यह प्रूफ की भूल नहीं है। बाकी अगर ऐसी ही पोस्टें लिखते रहें तो आप अपनी छवि सुधार सकते हैं

निशाचर said...

सुरेश जी, झारखण्ड में ८१ सीटों के सदन में राजग को ३६ सीटें मिली और उसने निर्दलियों के समर्थन से २००५ में सरकार बनाई. निर्दलियों ने २००६ में समर्थन वापस ले लिया और राजग सरकार गिर गयी. यूपीए ने राजद (२६+७) और निर्दलियों को मिलाकर सरकार बनानी चाही परन्तु निर्दलीय समर्थन को तैयार नहीं हुए. तब यूपीए ने निर्दलीय मुख्यमंत्री का दांव खेला. अब बताईये कि ३३ (२६+७) दलीय विधायकों के होते हुए कांग्रेस को क्या मजबूरी आन पड़ी थी कि उसे निर्दलीय की अगुवाई में सरकार बनानी पड़ी? अगर कांग्रेस चाहती तो राष्ट्रपति शासन लगाकर पुनः जनादेश प्राप्त करने का निर्णय ले सकती थी परन्तु उसे इस विकल्प में ज्यादा "रिस्क" नजर आया बनिस्पत इस सुनहरे अवसर के. तो कांग्रेस ने एक निर्दलीय मुख्यमंत्री बनवाया इस शर्त पर की "खाओ और खिलाओं". इस सौदे में रिस्क भी नहीं था क्योंकि "करेगा कोई, भरेगा कल्लू" वाली स्थिति थी. यह ट्रिक कांग्रेसियों ने अंग्रेजो से सीखी जिन्होंने बंगाल और अवध में नवाबों के मार्फ़त राज चलाया जहाँ राजस्व तो वे स्वयं वसूलते थे लेकिन कानून व्यवस्था और जनकल्याण की जिम्मेदारी नवाब पर छोड़ रखी थी. इस तरह वे बगैर जिम्मेदारी के मलाई चाट रहे थे और नवाब बलि का बकरा बनने के लिए हाजिर था. यही कुछ कोड़ा के साथ हुआ. और जब चुनाव का समय आया तो कोड़ा को ठिकाने लगाने और दो साल की सरकार के सभी कुकर्मों की जिम्मेदारी कोड़ा पर डालने के लिए सीबीआई को कोड़ा पर छोड़ दिया गया. मैं आपे पूरी तरह सहमत हूँ कि भारत के समक्ष उपस्थित सभी समस्याओं की जड़ में कांग्रेस है. कांग्रेस घृणा योग्य ही है. जो लोग कांग्रेस का समर्थन करते हैं वे या तो कांग्रेस के असली चेहरे को नहीं जानते या फिर उसके कुकर्मों में संलिप्त हैं या वे ऊँचे दर्जे के संत हैं जो सब कुछ क्षमा करने की क्षमता रखता है. ईश्वर ऐसे संतों से देश को बचाए........

पी.सी.गोदियाल said...

क्या कोयला, क्या इस्पात क्या अन्य खनिज ये इनके लिए( कोंग्रेस ख़ास तौर पर ) हमेशा ही सोने की खान रही है और यहाँ का निवासी दुसरे प्रदेशो में राज ठाकरे की मार खा रहा है!

निशाचर said...

@वीरेन्द्र जैन जी, यह अनुमान नहीं है. NDTV पर साक्षात्कार के दौरान नक्सली नेताओं ने स्वयं माना है कि वे खदानों के ठेकेदारों, कंपनियों के मालिकों, सरकारी योजनाओं में शामिल ठेकेदारों, अधिकारियों, ग्राम प्रधानों से पैसे वसूलते हैं. अगर यह लोग इनका शोषण कर रहे हैं तो फिर राबिन हुड होने का दम भरने के बजाये नक्सली सीधा उन्ही पर वार क्यों नहीं करते?? तो इस मुगालते से बाहर आईये कि कम्यूनिस्ट और नक्सली दूध के धुले हैं.

दिवाकर मणि said...

महाराज सुरेश जी, अगर आपको मुझे एक उपाधि अथवा उपाख्य देना हो तो मैं आपको "खाल-उधेड़ु ब्लॉगर" कहना चाहूंगा। आपने अपने आलेख के माध्यम से कोड़ा पर ही कोड़ा नहीं बरसाया अपितु देश पर दीर्घकालिक शासन करने वाले "मैडम-मंडली" की खटिया खड़ी कर दी है।
अब तो शर्मनिरपेक्ष (....ओहोहो क्षमा करें, "ध" के बदले "श" लिख दिया है...) लोग भी (पढ़ें- वीरेन्द्र जैन, रोहित जैसे) यहां कलम घिसने में असहजता महसूस कर रहे हैं।

प्रवीण शाह said...

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आदरणीय सुरेश जी,

खदान माफिया के बारे में आपका यह आलेख असल स्थिति को बयान करता है। यह धंधा ऐसा है कि छोटी से छोटी जगह पर भी इस काम में माफिया पैदा हो जाता है। यकीन न हो तो कहीं पर छोटी से छोटी नदी से रेता-बजरी-पत्थर के खनन के कारोबार को ही देख लें। पर इसके पीछे कोई एक राजनीतिक दल विशेष का ही हाथ है ऐसा नहीं कहा जा सकता है, सरकारें बदलती हैं, बारी बारी से अलग-अलग दल या गठबंधन सत्ता में आते हैं पर यह माफिया पहले जैसे ही फलफूल रहा होता है।

कारण अनेक हैं पर सबसे बड़ा कारण जो मुझे लगता है वह है हम भारतीयों के बीच भ्रष्टाचार की एक प्रकार की "स्वीकार्यता", हम लोगों को केवल दूसरे का ही भ्रष्टाचार दिखता है, अपने करीब के या संबंधियों के भ्रष्टाचार को हम 'प्रैक्टिकल' होना कह कर जस्टिफाई कर लेते हैं, आप ईमानदारी से अपने इर्द गिर्द देखेंगे तो भी ऐसा ही पायेंगे, हमारी इसी कमजोरी का फायदा भ्रष्ट नेतागण उठाते हैं... वे किस दल के हैं यह मुद्दा यहां पर गौण है।

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

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- Hindu Online.

cmpershad said...

सावधान! कभी इन खदानों में हाथ न डालें... वहां कोडा और रेड्डियों जैसे नाग फ़न फैलाए बैठे है... जिंदा नहीं छोडेंगे... देख रहे हो न यदुरप्पा की हालत:)

वीरेन्द्र जैन said...

@हे अज्ञात कुल शील रहस्यमयी निशाचर
जिन जिन को नक्सलवादी माओवादी आदि नहीं मारते वे उनके बिजनेस पार्टनर हों ये ज़रूरी नहीं। वे जो इतना पैसा हथियारों आदि पर खर्च करते हैं वह पैसे वालों से ही वसूलते होंगे। किंतु वे अपनी ज़िन्दगी पर खेल कर अपने उद्देश्य के लिये काम कर रहे हैं जो सही या गलत कैसा भी हो। उनके ऐश करने के भी कोई समाचार नहीं मिलते। कम्युनिष्ट नैतिकता पूंजीवादी नैतिकता से भिन्न होती है वे बेईमान नहीं होते क्योंकि उन्हें पैसा जोड़ने की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि वे जनबल पर भरोसा करते हैं। दूसरी ओर पूंजीवादी पार्टी का कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष बेईमान ही होगा। कांग्रेस भाजपा सपा बसपा नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं है। यही कारण है कि बामपंथी दलों के सदस्यों के चरित्र आइने की तरह् होते हैं जबकि.........
इसी पैसे के लिये ही वे सत्ता पाना चाहते हैं और इसी सत्ता के लिये साम्प्रदायिकता, जातिवाद क्षेत्रवाद भाषावाद के खेल खेले जाते हैं जिनके उन्मूलन के लिये रणनीतिक गठजोड़ बनाने होते हैं। पैसा जहाँ भी होगा किसी न किसी दिन जनबल उसे बाहर निकलवा ही लेगा पर यदि व्यवस्था यही रही तो यही पैसा फिर नये कोड़ा, प्रमोद महाजन बंगारू लक्षमन आदि बना लेगा। बाम पंथ व्यवस्था बदलने की बात करता है जबकि दक्षिण पंथ एक दूसरे को बदलने की बात करता है

निशाचर said...

@वीरेन्द्र जैन साहब,
जब लोगों के पास सवालों/तर्कों का उत्तर नहीं होता तो वे मुद्दे से हटकर आँय-बांय करने लगते हैं. ब्लागजगत पर विचारों का महत्व है परिचय का नहीं और मैं आपको अपने कुलशील का ब्यौरा देने के लिए किसी प्रकार से उत्तरदायी नहीं हूँ. आगे से प्रश्न का जवाब दें और न दे सकें तो कृपया मुंह बंद रखें क्योंकि बुजुर्गों ने भी कहा है- "मोल करो तलवार का, पड़ी रहन दो म्यान..."

अब आते हैं मुद्दे की बात पर-

"वे जो इतना पैसा हथियारों आदि पर खर्च करते हैं वह पैसे वालों से ही वसूलते होंगे।"

आप अभी भी अनुमान पर ही टिके हैं मतलब आपको जानकारी नहीं है या फिर अनजान बन रहे हैं. परन्तु यह उनका स्वयंस्वीकार्य और जगजाहिर सत्य है कि वे न सिर्फ माफियाओं,ठेकेदारों, पूंजीपतियों से धन वसूल रहे हैं बल्कि आदिवासियों के कल्याण के लिए आई सरकारी परियोजनाओं से भी धन वसूल रहे हैं.

"............किंतु वे अपनी ज़िन्दगी पर खेल कर अपने उद्देश्य के लिये काम कर रहे हैं जो सही या गलत कैसा भी हो।"

कितना बचकाना और हल्का तर्क है आप खुद भी फिर से पढेंगे तो आपको हंसी आएगी....... जिंदगी पर तो आतंकवादी, सुपारी किलर, डाकू और यहाँ तक कि छुटभैये गुंडे भी खेल रहे होते हैं, उद्देश्य चाहे सही हो या गलत. तो क्या उनकी यह "वीरता" आपकी नजर में उनके उद्देश्य की शुचिता से ज्यादा महत्त्वपूर्ण है?

शब्द सीमा के कारण शेष टिप्पणी नीचे दे रहा हूँ.

निशाचर said...

@वीरेन्द्र जैन
".....उनके ऐश करने के भी कोई समाचार नहीं मिलते। कम्युनिष्ट नैतिकता पूंजीवादी नैतिकता से भिन्न होती है वे बेईमान नहीं होते क्योंकि उन्हें पैसा जोड़ने की ज़रूरत नहीं होती क्योंकि वे जनबल पर भरोसा करते हैं। "

समाचार अखबारों और मीडिया में नहीं आते इसका अर्थ यह नहीं है कि समाचार है ही नहीं. शायद आप कभी बंगाल नहीं गए हैं वरना वहां लाल कैडर से जुड़कर अपने वारे-न्यारे करने वाले यूनियन नेताओं, वार्ड सदस्यों, छुटभैय्ये नेताओं, ग्राम प्रधानों से लेकर मंत्रियों तक के लूट, भ्रष्टाचार और ऐय्याशी के "जनश्रुतियों" का रूप ले चुके किस्सों को सुनकर आपका दिल बाग़-बाग़ हो जाता.


"दूसरी ओर पूंजीवादी पार्टी का कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष या परोक्ष बेईमान ही होगा। कांग्रेस भाजपा सपा बसपा नाम गिनाने की ज़रूरत नहीं है। "

यह आपका मुगालता ही है. मुझे नेताओं से कोई सहानुभूति नहीं है परन्तु पार्टी जनवादी नहीं है तो इसका अर्थ यह नहीं है की उसके सदस्य भ्रष्ट ही हैं यह कोई जरूरी नहीं. अनेकों ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ लोग कांग्रेस, भाजपा और अन्य दलों में भी हैं और रहे हैं. हाँ यह अलग बात है कि इनकी संख्या तेजी से घटी है और अब ये संख्या में न्यून ही रह गए हैं.

".......यही कारण है कि बामपंथी दलों के सदस्यों के चरित्र आइने की तरह् होते हैं "

यह भी आपका भ्रम ही है. कृपया थोड़ी सी पड़ताल करें आपको रोचक जानकारियां हाथ लग जाएँगी. वैसे केरल का उदाहरण अभी सामने है.
आपकी सुविधा के लिए ढेरों में से एक लिंक नीचे दे रहा हूँ-

http://www.upiasia.com/Human_Rights/2008/05/19/shameless_corruption_in_kerala/2289/

जरा लाल चश्मे को उतारकर देखे वही तस्वीरें जो आपको गुलाबी दिखती हैं उनका रंग धूसर पड़ जायेगा.

महफूज़ अली said...

सुरेश भैया.... नमस्कार....

आपकी यह पोस्ट बहुत अच्छी लगी....

youth is ready for kranti said...

सबसे पहले तो लोगों को निरंतर जागरूक करने के लिए आपको बधाई.
आगे मैं एक सुझाव देना चाहता हूँ.यह बहुत अच्छा है
पोस्टों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया जाये पर यहाँ तक एक खास तबके की ही पहुँच है.जबकि एक बड़ी आबादी बिना जानकारी के गुमराह हो रही है.
हमें आम लोगों तक पहुँचने की कोसिस नहीं करनी चाहिए?
ऐसा करने के लिए देस्भाक्तों की कोई कमी नहीं है , कमी है तो उनको एक दिशा देने वाले व्यक्ति की.और ऐसे लोगों के बीच में वार्तालाप की.

जीत भार्गव said...
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जीत भार्गव said...

भाई निशाचर,
आपने तो सुरेश जी के 'सोने' पे 'सुहागा' लगा दिया. बड़ा लाजवाब तर्क और उपयोगी जानकारी. लेकिन मैं शुक्रिया तो वीरेंद्र जैन साहेब को ही दूंगा. क्योंकि उनके बिना कम्युनिस्टो के इन छिपे कारनामो पर आप प्रकाश नहीं डालते! दरअसल आप वीरेन्द्रजी के मंतव्य को समझ नहीं पाए. शायद उनका कहना है कि 'सेकुलर' और 'कम्युनिस्ट' हो जाने से किसी भी नेता को देश और जनता को लूटने का लायसेंस मिलना चाहिए. चाहे वह केरल में हो या बंगाल में. नक्सली हो या माओवादी. कोड़ा हो या राजशेखर, लालू हो या मायावती. भाजपा जैसे 'साम्प्रदायिक' पार्टी के सफ़ेद दामन पर मामूली छींटा भी कुफ्र है. लेकिन कोंग्रेस-कम्युनिस्टो की काली चादर भी माफ़ है, क्योंकि वो सेकुलर हैं. सही कहा ना वीरेन्द्रजी!
जय हो सेकुलर भ्रष्टाचार की!