Saturday, November 7, 2009

इस्लाम के "सच्चे" फ़ॉलोअर्स से आपका परिचय बहुत जरूरी है… Fanatic Followers of Islam

एक खबर अपने "महान सेकुलर" भारत देश से, तथा एक खबर धुर इस्लामिक देश सोमालिया से, जबकि कुछ अन्य खबरें यत्र-तत्र बिखरी पड़ी हुई… इन्हें एक ही पोस्ट में समेटकर लाया हूं, ताकि आप इस्लाम के सच्चे फ़ॉलोअर्स से परिचित हो लें (वे सेकुलर्स और वामपंथी भी परिचित हो लें जो जानते-बूझते-समझते हुए भी नाटक करते हैं)…
 (पाठकों हेतु एक सूचना - ब्रैकेट में लिखे हुए वाक्यों को मेरी "खट्टी डकार" समझा जाये)

1) सबसे पहली खबर अपने देश से (आखिर मेरा भारत महान है)…

उत्तराखण्ड के एक संवेदनशील सीमावर्ती इलाके जसपुर के एक मुस्लिम संगठन छीपी बिरादरी के अध्यक्ष मोहम्मद उस्मान ने बाकायदा बड़े-बड़े बोर्ड लगवाकर मुस्लिम महिलाओं के नाम "फ़रमान" जारी किया है कि वे बुरके के बगैर बाहर ना निकलें, पति के साथ ही बाज़ार जायें और मोबाइल का इस्तेमाल ना करें (शायद ज़ाकिर नाईक भी इस "गैर-इस्लामी चीज़" यानी मोबाइल का उपयोग नहीं करते होंगे)। उत्तराखण्ड और उत्तरप्रदेश की सिद्दीकी बिरादरी के प्रान्तीय अध्यक्ष मोहम्मद उस्मान साहब ने मुस्लिम महिलाओं को मज़ार भी में नहीं घुसने दिया और कहा कि यह कदम उन्होंने शरीयत और इस्लाम के कानूनों के तहत ही उठाया है (यानी कि वे भारत के कानूनों को नहीं मानते) (क्या देवबन्द वाले इन्हें समझा सकते हैं?) (चिदम्बरम जी, ये भारत की ही घटना है…




इसके पहले भी एक पोस्ट में महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में एक पोस्टर के बारे में बताया जा चुका है, यहाँ देखें… http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/10/blog-post.html




2) धुर इस्लामिक देश सोमालिया से एक खबर -

सोमालिया में 112 वर्ष के एक बूढ़े ने 17 साल की एक लड़की से निकाह किया है (अब यदि कोई उन्हें बूढ़ा कहे तो मुझे भी आपत्ति होगी)… प्राप्त खबर के अनुसार सोमालिया के अहमद मोहम्मद दोर जिसकी पहले से 5 बीवियाँ और 13 लड़के हैं (सबसे बड़े लड़के की आयु 80 वर्ष है) ने हाल ही में सफ़िया अब्दुल्ला नामक एक 17 वर्षीय लड़की से एक और निकाह किया है। इनके निकाह में हजारों लोगों ने शिरकत की (सभी फ़ॉलोअर्स)। मोहम्मद दोर ने शादी के बाद कहा कि अल्लाह ने मेरी एक बड़ी इच्छा पूरी की है (शायद अन्तिम होगी), वहीं लड़की के माता-पिता ने कहा कि "लड़की भी अपने नये पति के साथ बहुत खुश है" (ज़ाहिर है खुश तो होगी ही, "परदादा" की गोद देखी नहीं होगी कभी उसने)।


मोहम्मद दोर ने आगे कहा कि उन्होंने लड़की के बड़ा होने का काफ़ी इन्तज़ार किया फ़िर उसके परिवार वालों के सामने शादी का प्रस्ताव रखा (यानी जब वह बच्ची थी, तभी से निगाह थी चचा की)। मैंने किसी से कोई ज़ोर-जबरदस्ती नहीं की है, यह राजी-खुशी से हुई एक शादी है। (चित्र में - नवविवाहित युगल)

जब बीबीसी के संवाददाता मोहम्मद ओलाद हसन ने मोगादिशु में जनता से इस सम्बन्ध में रायशुमारी की तो चौंकाने वाले परिणाम सामने आये, कुछ लोगों ने कहा कि यह इस्लामिक कानूनों (?) के तहत एक सामान्य और मान्य प्रक्रिया है इसलिये उन्हें कोई आपत्ति नहीं है, जबकि कुछ लोगों ने इस उम्र के अन्तर पर चिंता जताई (लेकिन कड़ी या नरम कैसी भी आलोचना नहीं की…… फ़िर वही फ़ॉलोअर्स वाली थ्योरी)। मोहम्मद दार का जन्म 1897 में हुआ बताया जाता है और उसका जन्म प्रमाण पत्र खुद उसके पिता द्वारा बकरे के चमड़े पर लिखा हुआ है। वैसे फ़िलहाल कुल मिलाकर मोहम्मद दार के 114 पोते-पोतियाँ-परपोते आदि हैं, और इसके पहले की पाँच में से तीन पत्नियों की मौत हो चुकी है (न होती तो आश्चर्य ही होता)… दोर को उम्मीद है कि जल्दी ही उसकी नई पत्नी एक बच्चे को जन्म देगी…

इस खबर को बीबीसी की साइट पर पढ़ा जा सकता है…  http://news.bbc.co.uk/2/hi/africa/8331136.stm

अब कुछ और फ़ॉलोअर्स से ही सम्बन्धित खबरें इधर-उधर की…

सूडान में एक महिला पत्रकार को 40 कोड़े मारने की सजा दी गई है, क्योंकि उसने पतलून पहन रखी थी और इस्लाम में महिलाओं के पतलून पहनने पर पाबन्दी है। संयुक्त राष्ट्र की सूचना अधिकारी लुबना अहमद हुसैन को यह सजा दी गई (शायद वे यह भूल गई होंगी कि सूडान कोई संयुक्त राष्ट्र का दफ़्तर नहीं है, यह फ़ॉलोअर्स की धरती है)। लुबना के साथ पकड़ी गई (?) अन्य महिलाओं को 10-10 कोड़े मारे गये, लेकिन लुबना ने अपने लिये वकील की मांग कर डाली इसलिये उन्हें 40 कोड़े मारे गये… है ना वितृष्णाजनक…
(इस खबर को यहाँ पढ़ें… http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4834045.cms)

एक और खबर इधर भी पढ़ें…
""सऊदी महिला पत्रकार को 60 कोड़े मारने की सजा"" (शायद सऊदी अरब भी अशिक्षित और पिछड़ा देश होगा)
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5160424.cms

और भी चाहिये हों तो ये भी पढ़ें…
""फांसी से पहले रेप- एक कानून ऐसा भी""
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4810015.cms


वेदों और पुराणों को आधार बनाकर आलतू-फ़ालतू लेख लिखने वाले नकलबाज ब्लागर इस खबर को भी पढ़ सकते हैं…

""मिस्यार शादी यानी सेक्स संबंध बनाने का लाइसेंस…" (बीच में किसी नियोग-फ़ियोग के बारे में कोई बकवास कहीं पढ़ी थी, शायद इस लिंक को पढ़कर अकल आ जाये)
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/4939231.cms

और लीजिये साहब, महिलाओं की "ब्रा" भी गैर-इस्लामी हो गई…
""सोमालियाई विद्रोहियों ने कहा, ब्रा गैर-इस्लामी…"
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5138430.cms

कहने का तात्पर्य सिर्फ़ इतना है कि मजमा लगाकर दूसरों को उपदेश देने, दूसरों के धर्मग्रन्थों में खोट निकालने, खुद को श्रेष्ठ बताने और एक किताब को अन्तिम सत्य मानने वाले फ़ॉलोअर्स यह समझ लें कि वेदों के ज़माने में कुछ भी हुआ रहा हो वह उस वक्त के अनुसार सही-गलत रहा होगा, लेकिन हिन्दुओं ने वक्त के साथ अपने को बहुत बदल लिया है, जबकि कुछ लोग अब भी बदलने को तैयार नहीं हैं…। स्पष्ट है कि "रुका हुआ पानी सड़ांध मारने लगता है, बहता हुआ पानी ही निर्मल कहलाता है…"

सुना है कि पूरे विश्व के इस्लामिक जगत में देवबन्द के फ़तवे और राय का काफ़ी महत्वपूर्ण स्थान होता है, वन्देमातरम पर फ़तवा जारी करने से पहले ऊपर बताई गई घटनाओं पर कुछ फ़तवे-जिरह-बहस कर लेते और सम्बन्धित पक्षों को नसीहत देते। अब दिक्कत ये है कि उत्तरप्रदेश में ही देशभक्त मुस्लिम बहनें सार्वजनिक रूप से वन्देमातरम गा रही हैं, गाती भी रहेंगी, एआर रहमान ने वन्देमातरम को विश्वप्रसिद्ध बनाया… ऐसे में प्रगतिशील मुस्लिमों को आगे आना होगा, इन कठमुल्लाओं के खिलाफ़ आवाज़ उठानी होगी, उन्हें यह समझना होगा कि ये लोग उन्हें भी अपनी "भेड़ों की रेवड़" का हिस्सा बना लेना चाहते हैं… जब तक प्रगतिशील मुस्लिम आगे बढ़कर इनका विरोध नहीं करेंगे तब तक साम्प्रदायिकता का मुद्दा हल होने वाला नहीं है।

इनके "असली मंसूबे" क्या हैं यह इस खबर में पढ़ सकते हैं, जिसमें इन्होंने ब्रिटेन में भी शरीयत कानून की मांग, महारानी एलिज़ाबेथ को बुर्का पहनाने और बकिंघम पैलेस का नाम बदलकर "बकिंघम मस्जिद" करने का मंसूबा बनाया है…
(खबर इधर पढ़ें… http://hindi.webdunia.com/news/news/international/0911/01/1091101104_1.htm)

ऐसा नहीं कि सब कुछ बुरा ही बुरा है, कुछ अच्छा भी हो रहा है… दो खबरें और हैं जैसे कि खामखा की फ़िजूलखर्ची रोकने की सलाह देता हुआ शिया पर्सनल लॉ बोर्ड……

""मैरिज हॉल की जगह मस्जिदों में करें निकाह""
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5154148.cms

ऑल इंडिया शिया पर्सनल लॉ बोर्ड ने ऐलान किया है कि निकाह मस्जिदों में कराए जाने चाहिए। ऐसा बेतहाशा खर्च को रोकने के मकसद से कहा गया है। बोर्ड के प्रेजिडेंट मौलाना मिर्जा मोहम्मद अतहर ने कहा, शादी जैसे फंक्शन आम पारिवारिक फंक्शन होते हैं। लेकिन हमारा समुदाय मैरिज हॉल कल्चर के चलते बहुत अधिक खर्चा करने लगा है। मैं लोगों से अनुरोध करता हूं कि इससे बचें।

मिस्त्र में लड़कियों/महिलाओं की कक्षा में बुरके पर बैन…

ओनली वुमन क्लास में बुर्के पर अब बैन
http://navbharattimes.indiatimes.com/articleshow/5107540.cms

काहिरा ।। मिस्त्र के मशहूर अल-अजहर यूनिवर्सिटी ने ऐसी क्लासों में छात्राओं और टीचरों के बुर्का पहनने पर बैन लगा दिया है, जिसमें सिर्फ लड़कियां ही हों। वुमन डॉरमिटरी और यूनिवर्सिटी से संबद्ध स्कूलों में भी यह बैन प्रभावी होगा। हालांकि वे घरों और सड़कों पर नकाब पहन सकेंगी। इस ऐतिहासिक फैसले में इंस्टिट्यूट ने कहा है कि यूनिवर्सिटी की सुप्रीम काउंसिल ने सिर्फ महिलाओं की कक्षाओं में छात्राओं और टीचर्स के नकाब पहनने पर बैन लगाने का फैसला किया है। इसका उद्देश्य आत्मविश्वास, आराम और टीचरों तथा स्टूडेंट्स के बीच परस्पर सुनने-समझने की क्षमता बढ़ाना है। परीक्षा के समय भी उनके नकाब पहनने पर प्रतिबंध लगाने का फैसला लिया गया है।
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चाहता तो इन खबरों पर 10-20 माइक्रो पोस्ट बना सकता था, लेकिन मैंने सोचा कि सुनारों की तरह टुच-टुच क्या करना, लोहार की तरह एक हथौड़ा ही क्यों न चलाया जाये, इसलिये सारी खबरों को एक जगह संकलित कर दिया… संदेश सिर्फ़ एक ही है कि हिन्दुओं को उनके वेदों-पुराणों और धर्मग्रन्थों के बारे में किसी "बाहरी" व्यक्ति से नसीहत सुनने की कतई ज़रूरत नहीं है, "दूसरों के घरों में ताँक-झाँक करना छोड़ो, पहले अपने गंदे कपड़े तो धो लो…" हिन्दुओं में तो परमहंस, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फ़ुले और महात्मा गाँधी जैसे कई समाज सुधारक आये… और बदलाव हुआ भी है… लेकिन आपका क्या?


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65 comments:

संजय बेंगाणी said...

चिट्ठा जगत में भी गंदगी से लबालब चिट्ठे ही नहीं शुएब, महफूज जैसे प्रगतिशील लोगों के चिट्ठे भी है, जिन्हे स्वच्छता-पसन्द लोग मुस्लिम ही नहीं मानते... :)

Suresh Chiplunkar said...

सही कहा संजय भाई,
मैं भी महफ़ूज़ भाई के उस लेख का इन्तज़ार कर रहा हूं, जिसमें उन्होंने कहा है कि इस प्रायद्वीप में रहने वाले सभी लोग सिर्फ़ हिन्दू ही हैं… वे इसे सिद्ध करने के लिये एक लेख लिखने वाले हैं…

Mohammed Umar Kairanvi said...

ऐसे ही इस्‍लाम पर रिसर्च करते रहो, यह तुम पर ऐसा जादू करेगा के एक दिन चिपलूनकर खान कहलाओगे,
इन्‍शाअल्‍लाह (अगर अल्‍लाह ने चाहा तो)

Mohammed Umar Kairanvi said...
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Suresh Chiplunkar said...

एक टिप्पणी हटाई गई है, क्योंकि उसमें सड़ी-सड़ाई लिंक का प्रचार किया गया था… :)

पी.सी.गोदियाल said...

सच कहू तो मुझे तो अब इस विषय से सम्बंधित लेख पढने में ही घृणा महसूस होती है !

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सुरेश जी,
इस पोस्ट के लिए बहुत बहुत बधाई!

mehta said...

mohammad keranvi ko jwab
और भी चाहिये हों तो ये भी पढ़ें…
""फांसी से पहले रेप- एक कानून ऐसा भी""
keranvi padh ise issliye log dharm pariwartan kar rhe hai
abb jis dharm me asi bate hogi to log to akrshit honge hi
kesa dharm hai ye
kesa kanoon hai ye
hamare hindu dharm me orat ko devi ka roop bataya gya hai

पंकज बेंगाणी said...

औरंगाबाद मध्य सीट से खड़े "सिरफिरे" अब्दुल कदीर अमीर की हार हुई है. उसे निर्दलीय प्रदीप जायसवाल ने 9000 मतों से हराया है.


शिवसेना तीसरे नम्बर पर रही.

गौर करें कि प्रदीप 1998 में शिवसेना के टिकट से ही चुनाव जीते थे. पार्टी ने उनको इस बार टिकट नही दिया था.


वैसे आपने अच्छी तरह से पोल खोल की है. धन्यवाद.

Suresh Chiplunkar said...

सही कहा गोदियाल साहब आपने, घृणा, वितृष्णा, सब महसूस होता है, लेकिन क्या करें, वन्देमातरम में ही सारी बुराईयों को देखने वाले खुद अपने घर में भी तो झाँकें, इसलिये लिखना पड़ा… इनके बारे में जानते तो सभी हैं… मानते भी हैं… सिर्फ़ सेकुलरिज़्म का मुखौटा ओढ़ने की खातिर मन को मारना पड़ता है कुछ लोगों को…

राज भाटिय़ा said...

भाई इन समचारो को पढ कर तो दिमाग घुम गया, लेकिन सभी मुस्लिम ऎसे नही , इन मे पढे लिखे ओर सायने भी है, ओर अपना अच्छा बुरा खुद सोचते है, अब क्या कहे... आप का लेख पढ कर हेरान हो गया
धन्यवाद

Shuaib said...

१) महिलाओं को कोड़े मानरने से मुल्लाओं को बहुत मज़ा आता है उनकी चीख़ों से।
२) यानी अब मस्जिदों को मैरिज हॉल बनाया जा रहा है।
३) 112 वर्ष के अहमद मोहम्मद दोर को देख मेरा दिल कांप उठा। बेचारी 17 वर्ष की बच्ची, अल्लाह उसपर रहम क्यों नहीं करता?
४) आज ही क्यों पता चला कि "ब्रा" भी गैर-इस्लामी है? अब तो मुस्लिम औरत से शादी भी नहीं करनी जिसने ब्रा नहीं पहना। ये मेरा फ़्तवा है ;)
५) छीपी बिरादरी के अध्यक्ष मोहम्मद उस्मान को अगर इजाज़त हो तो अगली टिप्पणी मे एक गाली लिखदूं उनके लिए?
६) हां सब जानते हैं कि देवबन्द से सिर्फ फ़त्वे छपते हैं भले वे अंदर से कितने भी नंगे क्यों ना हों।
७) मैं पूछता हूं कि मुस्लिम मे ये बुर्का क्यों ज़रूरी है? यानी कि अपनी छुपाओ और दूसरों की घूरो? अच्छा है कि इस बुर्के को बैन ही करो।
८) ब्रैकेट लिखे टोटके यानी आपकी "खट्टी डकारें" अच्छी लगीं।
( दो बजे मीटिंग है दफ़्तर मे वरना और भी लम्बी टीपणी थी )

परमजीत बाली said...

सुरेश जी,आप किसी विवेकशील इंसान को तो समझा सकते हैं.....लेकिन किसी जिद्दि व कूप मडूक को नही.....

खुर्शीद अहमद said...

When God Brahma could not escape from sex with his daughter how can a man.
On seeing his beautiful daughter Padma, Brahma was sexually excited. He wooed his daughter and wanted to copulate with her. How could a daughter give consent to her own father? Padma refused. Brahma could not give up his desire. He began to quote the Vedas to convince her that there was nothing wrong in having sex with anyone, anytime, anywhere for the sake of giving birth to a child. "
-- ( Puran )
This is the Vedic verse Brahma quoted to justify incest :
Mathara Mupathya, susara Mupatithe, Puthrartheetha.
Sagamarthi, Napathra loka, nasthee thath.
Saravam paravo vindu ha, dasmath Puthrar tham.
Matharam suransathee Rehathee
- ( Vedas, cited in Puran )
Translated this verse means
" This is the sanskrit sloka Brahma quoted to his daughter. The sacred verse enjoins, that for the sake of a child one can enjoy her own sister or daughter, without any sin attached to it.
( Puran )"

Suresh Chiplunkar said...

1) शुऐब की टिप्पणी, कैरानवी को जवाब है…
2) खुर्शीद की टिप्पणी से साबित होता है कि वह वेदों के काल को आज के कालखण्ड से तुलना कर रहा है और इसी बात का मैंने अपनी पोस्ट में उल्लेख किया है… कि ये अभी भी उसी काल में टिके हुए हैं एक पुस्तक से चिपककर…

mahashakti said...

आपने बिल्‍कुल सही लिखा है, सुऐब भाई जैसे चिट्ठा मित्रों से हमारा पुराना सम्‍बन्‍ध किन्‍तु अराजको द्वारा सौहार्द को बिगाड़ने का प्रयास किया जाता है।

यह लेख उनके खुले पर के दिखवे का चांटा है।

निशाचर said...

वन्दे मातरम
वन्दे मातरम
वन्दे मातरम
.
.
@खुर्शीद

पुराण धार्मिक ग्रन्थ नहीं हैं. यह उस काल के पुरोहितों द्वारा निरक्षर और धर्मभीरू जनता को लूटने और अपने वर्चस्व कायम रखने के लिए लिखे गए बकवास थे. इनका इतिहास के लिहाज से केवल इतना ही महत्व है कि इनसे समकालीन राजवंशों और समकालीन सामाजिक- राजनैतिक परिवेश का थोडा - बहुत विवरण या संकेत मिल जाता है. पुराणों को हिन्दू धर्म कब का पीछे छोड़ चुका है.
जिन श्लोकों को आप उद्धृत कर रहे हैं वे मनगढ़ंत हैं और वेदों में कहीं भी नहीं हैं. मिथ्याभाषण द्वारा दुष्प्रचार आपकी आदत है परन्तु अब लोग इससे परिचित हो चुके हैं.

जय हिंद

रचना said...

kyaa sahii aur kyaa kehaan kehaan mahila kae prati galt haen is sab sae hat kar aaj ki shodh parak post ki jitni taareef ki jayaae kam haen
umeed haen aap ko aaptti nahin hogee agar aap kae is shodh mae sae mae kuch naari blog par daal dun

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.

जी.के. अवधिया said...

"संदेश सिर्फ़ एक ही है कि हिन्दुओं को उनके वेदों-पुराणों और धर्मग्रन्थों के बारे में किसी "बाहरी" व्यक्ति से नसीहत सुनने की कतई ज़रूरत नहीं है, "दूसरों के घरों में ताँक-झाँक करना छोड़ो, पहले अपने गंदे कपड़े तो धो लो…" हिन्दुओं में तो परमहंस, राजा राममोहन राय, ज्योतिबा फ़ुले और महात्मा गाँधी जैसे कई समाज सुधारक आये… और बदलाव हुआ भी है… लेकिन आपका क्या?"

आपका सन्देश तो बहुत अच्छा है सुरेश भाई किन्तु औंधे घड़े में कभी पानी जाता है क्या?

मूर्खों को उपदेश देना दीवार से सर टकराना है।

Alok Nandan said...

तुर्की का अतातुर्क मुस्तफा कमाल पाशा ने तुर्की को आगे बढाने के लिए जो कदम उठाये थे वे निसंदेह शानदार थे...कठमूल्लों की हवा गुम कर दी थी..स्कूलो और कालेजों में आधुनिक ड्रेस मुफ्त में बंटवाये थे...शिक्षा का आधुनिकीकरण किया था..और हर स्तर पर जाकर एक आधुनिक राष्ट्र की नींव रखने की पूरी कोशिश की थी....पता नहीं लोग कैसे एक किताब की गुलामी करते हैं, जबकि कमाल पाशा ने बहुत पहले ही दुनिया के साथ कदमताल करने के लिए इस किताब से इतर जाकर न सिफ सोंचा बल्कि उसे अपनी सोंच को अमली जामा भी पहनया...लेकिन यहां ध्यान देने योग्य है कि यह उसने सत्ता पर अधिकार करने के बाद ही किया था...जब कमाल पाशा के हाथ में शक्ति आई तो उसने कोड़ों का रुख कठमूल्लों की ओर कर दिया और फिर कठमूल्ले उसकी की भाषा बोलने लगे...तो यह मान लिया जाये कि कठमूल्ले सिर्फ कोड़ों की भाषा ही समझते हैं...

पंकज बेंगाणी said...

@आलोक नंदन,

कमाल पाशा के रूप में तुर्की को एक महान शासक मिला था. उनकी सोच आधुनिक थी.

ऐसा नहीं है कि सभी मुस्लिम कठमुल्ली मानसिकता वाले ही हो. कई अपवाद हैं.. परंतु ये अपवाद अपनी आवाज बुलंद नहीं करते यह दुख की बात है.

तमाम वैचारिक मतभेद के बावजूद मुझे जावेद अख़्तर के द्वारा होली के दिन रंगों से तरबतर हो जाना अच्छा लगता है. सलमान के घर पर हनुमान के लिए स्थान है. कल्बे सादिक कुम्भ में डुबकी लगाएंगे.. उनकी सोच भी काफी हद तक आधुनिक है.

हमारे अपने शुएब और महफूज़ हैं...

परंतु ऐसे लोग कम है.. बहुत कम.. यही दुख है.

Shuaib said...

@ खुर्शीद अहमद
प्लीज़ हक़ीकत को मानो और सम्झो। ख़ाली-पीली बोलना तो सबको आता है।

उम्दा सोच said...

सुरेश भाई आप का अनुसंधान आँखे खोल देता है, सच है!! पर सलीम और कैरान्वी जैसो का कुछ नहीं हो सकता क्योकि पहले उनकी अकल खुलने की ज़रुरत है !

@ Mohammed Umar Kairanvi आप ने ऊपर टिपण्णी में लिखा है इन्‍शाअल्‍लाह और ब्रैकेट में लिखा है (अगर अल्‍लाह ने चाहा तो)
यानि सिद्ध है की आप को मालूम नहीं है की अल्लाह की रज़ा क्या है सब मनमर्जी से कर रहे हो बिना अल्लाह से पूछे ! आप और आप जिसके गुर्गे हो उन सब को जब पता ही नहीं है की अल्लाह क्या चाहता है तो पाप से सराबोर काली काली करतूते क्यों किये जा रहे हो ?

अव्वल तो आप में से तो किसी ने ये भी नहीं देखा है की अल्लाह ताला ने मुहम्मद को उनके कर्मो का क्या सिला दिया है हो सकता है आप को भी सिला मिले अल्लाह आप को मुर्गा बने रहने का फरमान दे!

इंशाअल्लाह!!! (अगर अल्‍लाह ने चाहा तो)

Asad said...

भाईयों कहां चिप्पू को समझा रहे हो
अगर ये लोग मार्डन नहीं रहे और इनके यहां पर्दा शुरू हो गया तो बाज़ारों मैं Intertenment कैसे होगा ।

Common Hindu said...

http://hinduonline.blogspot.com/


Before the grand lanch function of "Bharat Swabhiman Mission"
Baba Ramdev seems to be genueinly interested
in the betterment of desh, dharam, rajniti
and i used to watch him on Aastha channel regularly

But right from the lanch function of "Bharat Swabhiman Mission"
where Babaji had invited a Shia Muslim maulaavi
and introduced him as his darling brother
speeches of Babaji has lost its sharpness
for the protection of desh, dharam, rajniti

Maybe its the price one has to pay
to garner support of all residing in india
and whether they are muslim
it does not matter

As a common hindu
what more could i have done but
only stopped actively watching Babaji
from that lanch function
though i still regard Babaji
as a great yoga master
and for his oratory skills

But, now in the present controvercy
of Devband fatva against Vande Mataram
attended by Babaji and home minister
hindus should protest and show their displeasure
to both Babaji and home minister
for agreeing to be a part of function
working against the spirit of Bharat
and consolidating/ fanning the Jihadi movement

As politicians support Jihadis
for capturing muslim vote bank
is Babaji trying to capture
muslim and sickular followers
by agreeing to attend Jihadi function
and not speacking out against
the fatva then and there
not even 2 days after that

all this when Babaji is
the most outspoken hindu guru
who is more than ready to
give sound bytes on each and every
topic including yoga
and never take any nonsense
laying down from any celebrited reporters/ editors

is it that like all other leaders
whether they are politicians or not
they are always supporting Jihadis
at the cost of hindus
and like them Babaji too
wants to capture muslim and sickular followers
and / or
even Babaji fears from Jihadis

O Hindus come out of your hibrenation
how long you want to wait
for things to get worse
before trying for their recovery

its easy to get charged up against Jihadis
but path to recovery goes first
by winning over the sickular hindus

O Hindus, this is the time
to lanch campainge against
all sickular hindus
in the form of Babaji
and dont wait for RSS/ BJP/ VHP
dont look forward for their orders
listen to your heart/ mind

Babaji has a reputation
of coming out sucessfully
from every controvery in the past
which where lanched by sickulars
but this time
if common hindus campainge
against his sickular tendencies
at least he has to say sorry
for his moments of weakness

i appeal all PRO-HINDU bloggers
to write-up on this topic from their heart
so that greater clearity and publicity to
hindu's view emerage in media

also remember that
blogging alone cannot provide
answers to worldly problems.


http://hinduonline.blogspot.com/2009/11/original-post-no-4-o-hindus-come-out-of.html



.

सैयद | Syed said...
This comment has been removed by the author.
सैयद | Syed said...

सुरेश जी,
नमस्कार,
आपके ब्लॉग पर हमेशा ही आता हूँ, पर टिपण्णी करने से परहेज ही किया है, क्यूंकि मुझे ऐसा लगता है की मेरी बात को मेरे नाम के साथ जोड़ कर देखा जाएगा. आपके कई पोस्ट बेहद पसंद आये पर कई बार आप एक तरफा बात भी कर जाते हैं.

आज के पोस्ट में आपने दोनों पक्ष अच्छा-बुरा दोनों रखा. अच्छा लगा. अच्छा बुरा हर जगह हर समाज में होता है. ये लोगो की व्यक्तिगत सोच होती है की वो उसमे से कितनी अच्छाई ग्रहण करते है या कितनी बुराई... होना तो ये चाहिए की हम अच्छी चीजों को प्रोत्साहित करें और बुरी चीजों को इग्नोर करें.

जहाँ तक मैंने अध्ययन किया है 'किताब' में कुछ भी गलत नहीं है, पर लोगो ने इसे अपने अपने हिसाब से परिभाषित कर दिया. कुछ चीजे उसमे ऐसी है जो आने वाली सदियों तक साबित होती रहेगी, पर कुछ को बदलना भी जरूरी है, क्यूंकि वो उस समय के हालात और जरूरतों के हिसाब से थे. उस काल में वो चीजें सही थी पर आज नहीं.

जिन दो 'महान ब्लोगर्स' की बात आप कर रहे है ये पूरे समाज का प्रतिनिधित्व नहीं कर रहे ना कर सकते हैं. शायद इन जैसे लोगो की वजह से ही आज मुझे ये शहर छोड़ने का मन बनाना पड़ा.

Suresh Chiplunkar said...

सैयद भाई,
पंकज बेंगाणी की टिप्पणी को मेरी भी टिप्पणी माना जाये… आपको सादर समर्पित… ऐन वही बात मैं कहना चाहता हूं…

अमित अग्रवाल said...

vande mataram,

bahut achcha lekh

जीत भार्गव said...

यह तो महज 'नमूने' हैं. करीब चार साल पहले की बात है, मुम्बई में एक मुस्लिम ने अपने ही भाई की ह्त्या इसलिए कर दी थी, क्योंकि वह टी.वी. देख रहा था. और उसके अनुसार टीवी देखना इस्लाम के खिलाफ है! हमारे देश में ऐसी वीभत्स घटनाएं रोज होती हैं. अमीना और गुडिया का केस भूल गए क्या? शाहबानो के साथ क्या हुआ? लेकिन न तो मुस्लिम बुद्धीजीवी इसके खिलाफ प्रभावी ढंग से आवाज उठा रहे हैं, ना ही हिन्दू बुद्धीजीवी /प्रगतीशील/नारीवादी/सुधारवादी (सेकुलर पढा जाए) उन्हें ऐसा करने दे रहे हैं. मीडिया का तो कहना ही क्या? ऐसे में कुरान-शरीफ और शरियत का हवाला देते हुए कठमुल्ले अनरगल बाते/फतवे निकालते हुए अपनी दुकानदारी चलाते हैं. सबसे पहले असली मुस्लिमो को और समझदार लोगों को आगे आना चाहिए ताकि इस्लाम के नाम पर चल रही गैर-मानवीय करतुते और कठ्ठार्ता कम हो. मुल्लाओं को (सेकुलरों और चिदाम्बरों को भी)वन्देमातरम गाना गैर-इस्लामी लगता है, लेकिन अनाप-शनाप ब्याजखोरी करनेवाले 'पठानों' और 'पठानी वसूली' से इन्हें कोइ कोइ एतराज नहीं. ड्रग्स और शराब की स्मगलिंग करने वाले हाजी मस्तानो(मुम्बई), अब्दुल लतीफों (अहमदाबाद) और दाउद इब्राहिमो से भी मुल्लाओं को कोइ एतराज नहीं. जबकि ब्याज खाना और नशीली दवाओं का कारोबार-सेवन करना इस्लाम में कुफ्र माना जाता है. शर्म आती है कि हमारी धरती पर एक भी मुसलमान पैदा नहीं हुआ जो मुल्लाओं की बकवास के खिलाफ मोर्चा खोले. सवाल ये है की बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे. ..आमीन!

रामकुमार अंकुश said...

"रुका हुआ पानी सड़ांध मारने लगता है, बहता हुआ पानी ही निर्मल कहलाता है…"।
सभी को पसंद आने वाली, तर्क और यथार्थ से परिपूर्ण एक बेहतरीन पोस्ट
बधाई हो...

Mithilesh dubey said...

बहुत सही किया आपने इन सब बातो को प्रकाशित करके। इतना सब कुछ होते हुये भी ये लोग अपने धर्म को सबसे बढिया बताते फिरते है।

VIJAY ARORA said...

काहे को भैंस के आयेज बिन बजाते हो
जो क़ौम हज़ारों साल से नहीं सुधरी अब क्या खाक सुधरेगी
ऐसे ही कठ मुल्लाओं की गुलाम बनी रहेगी
सड़े हुए विचारों से भरे हुए हैं इनके नेता
क़ौम की तर्रकी तो चाहते ही नहीं

Anil Pusadkar said...

सत्य वचन सुरेश भाऊ।

अब तो यही कहा जा सकता है
सुरेश चिपलुणकर ज़िंदाबाद्।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

ya khuda in nasamjho ko kaun samjhaye

safat alam said...

सुरेश भाई ! आपको ईश्वर ने लेखन शक्ति दी है, बुद्धि-ज्ञान प्रदान किया है, जिसके सहारे आप अच्छा लिखते हैं....ईश्वर आपके अंदर अधिक गुण पैदा करे,,, यह है मेरे प्रार्थना---
पर जब मैं आपके लेखों को पढ़ता हूं तो बड़ा आश्चर्य होता है कि आपके जैसे बुद्धिजीवि लोग भी ऐसी ऐसी बातें कैसे लिखने लगते हैं।
ज्ञात है कि आपने इस्लाम का अध्ययन नहीं किया। कृपया इस्लाम को उसके अस्ली रूप में पढ़ कर देखें ...यही मेरी आप से प्रार्थना है,,, यदि आप पढ़ेंगे तो 100 प्रतिशत आप कुछ से कुछ हो जाएंगे। बस भ्रम हैं कुछ समाज में इस्लाम के सम्बन्ध में,,, यदि स्वयं अध्ययन शुरू किया तो यह अवश्य जाता रहेगा।
बस देख लें,,, एक बार,,, वह आपकी अमानत है,,,जिसका विरोद्ध करने बैठे हैं,,, और फिर दुनिया कितने दिनों के लिए है,,, आज हैं कल नहीं,, मेरे दिल से निकली हुई बातें हैं, बिस्तर पर जाने से पहले ज़रा इस पर गौंर कर लेंगे... मैं आपका छोटा भाई हूं, पर सहानुभूति की भावना से ही कुछ शब्द प्रस्तुत किया है।

Suresh Chiplunkar said...

सफ़त भाई, ऐन यही बात मैं हिन्दू धर्म के लिये आपको कह सकता हूं…। समस्या यह है कि इस्लाम वाले चाहते हैं कि दूसरे लोग भी कुरान पढ़ें, इस्लाम को जानें… क्यों जानें भई? क्या किसी हिन्दू को कभी जबरदस्ती करते सुना है कि गीता पढ़ें, सारा ज्ञान मिल जायेगा? नहीं ना… यही मू्ल अन्तर है…। मेरे लेख की मूल भावना को समझिये वह ये कि कोई भी किसी दूसरे के धर्म में दखलअंदाज़ी न करे, हमें यह गवारा नहीं कि कोई विधर्मी हमें हमारे ग्रन्थों की बुराईयों के बारे में बताये… हमारे धर्म, ग्रन्थों, पुराणों में जो भी विसंगतियाँ हैं उनसे निपटने में हम सक्षम हैं… मुस्लिम अपने घर में खुश रहें हम अपने घर में… यह सार बात है, लेकिन कुछ लोग इस बात को समझते नहीं और अड़ियलपन पर आ जाते हैं, कुप्रचार करते हैं… तब जवाब देना मजबूरी हो जाती है… यदि कोई हिन्दू व्यक्ति वेदों की आलोचना करे या उसमें कमियाँ निकाले तो उस पर विचार विमर्श होगा, सोच बनेगी, उसका प्रभाव अधिक होगा, लेकिन यदि कोई मुस्लिम व्यक्ति पुराणों में से कोई कमियाँ निकाले तो उसका उलटा असर होता है… बस यह बेसिक बात कुछ "ठस दिमागों" को समझ में आ जाये तो हमें कोई जवाब देने की ज़रूरत ही नहीं रह जायेगी…। देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है कांग्रेस उससे निपटना अधिक जरूरी है। लेकिन ऐसे ऊटपटांग कामों में भी कभीकभार उर्जा लगानी पड़ जाती है… वरना "ठस दिमागों" को ये कैसे पता चलेगा कि हमें भी जवाब देना आता है? यदि हम भी कुप्रचार पर उतर आयें तो हदीस और कुरान की आयतों में बहुत कुछ विकृत ढूंढ कर निकाला जा सकता है, लेकिन फ़िलहाल उस स्तर पर उतरना नहीं चाहते…

cmpershad said...

या अल्लाह! कैसे कैसे लोग इस्लाम का नाम लेकर भी उसका सत्यानाश कर हरे हैं- ईन्शाअल्लाह, जल्दी ही ऊपरवाला सद्भुद्धि देगा।

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

धर्म,ज्ञान और बुद्धि से यद्यपि कौसो दूर हैं
लेकिन इसका क्या करें,कि आदत से मजबूर हैं ।।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

आलेख तथ्यपरक और लाजवाब है | पर कठमुल्ला लोग कुत्ते की दुम की तरह हैं ... कितना भी समझाईये वही ढाक के तीन पात |
अच्छे और सच्चे मुस्लिम भाईयों को आगे आ कर इन कठमुल्लों का जोर-सर से विरोध करें ....

Satyajeetprakash said...

उतनी खराबी इस्लाम या मुसलमानों में नहीं है जितनी हमारे तथाकथित सेक्युलरों, बुद्धिजीवियों और सेक्यलरिज्म की संपोषक हमारी सरकार में है. वो वोट बैंक पुख्ता करने के लिए चाहते ही नहीं हैं कि मुस्लिम समाज अपनी अच्छाई के बारे में सोचे, अपना विकास करे उसकी तरक्की हो. उसने दस-बीस सरकारी मुसलमान पाल रखे हैं और वही फतवा-फरमान जारी कर मुसलमानों को वोट बैंक की तरह इस्तेमाल करता है. सरकारी मुसलमान की परिभाषा इस लेख से प्रभावित होकर उल्लेख किया गया है.
http://www.outlookindia.com/article.aspx?262703

rohit said...

yaar something i m missing here. do u know what? ya its Saleem wohi swach sandesh wala.

दिवाकर मणि said...

सुरेश जी,
आपके नवीनतम आलेख को पढ़कर मुझे काफी वर्षों पूर्व "पाञ्चजन्य" में लिखे एक आलेख का स्मरण हो आया, जिसमें "पाञ्चजन्य" ने देश की राजधानी नई दिल्ली के ओखला (एक खास जमात की तादाद जहां सबसे ज्यादा है...) इलाके में यत्र-तत्र SIMI (Students Islamic Movement of INdia-सिमी) के द्वारा लगाए गए "Waiting for Gaznavi" पोस्टर सहित एक आलेख लिखा था। तत्कालीन समय में SIMI अपने प्रस्फुटन काल में था। जब पोस्टर सहित वह आलेख "पाञ्चजन्य" ने छापा, तब हुंआ-हुआं वाली पाखंडी धर्मनिरपेक्षों की जमात ने RSS और अन्य राष्ट्रवादी संगठनों के बारे में यह दुष्प्रचार करना शुरु कर दिया कि संघ वाले केवल साम्प्रदायिकता का विष बोना जानते है, इस पोस्टर में कोई सच्चाई नहीं है। ये निरीह मुसलमानों के खिलाफ देश की जनता को भड़का रहे हैं। किन्तु उस आलेख के "पाञ्चजन्य" में छपने के दो-तीन वर्षों के भीतर ही SIMI की सच्चाई से पूरा देश अवगत हो गया.....
खैर, आपका प्रयास सराहनीय़ ही नहीं अपितु स्तुत्य है....

safat alam said...

सुरेश भाई! बात यह है कि हम एक दूसरे को जब तक जानेंगे नहीं तब तक परस्पर झगड़ते रहेंगे, शताब्दियों से हम एक साथ रहते आ रहे हैं पर एक दूसरे की धार्मिक संस्कृति के प्रति हमारा ज्ञान सूनी सुनाई बातों,दोषपूर्ण विचार और काल्पनिक वृत्तांतों पर आधारित है, ऐसा नहीं होना चाहिए वास्तविकता को जानने की हर आदमी की कोशिश होनी चाहिए।
जहाँ तक हिन्दू धर्म की बात है तो हम उसके सिद्धांतों को जानते हैं बल्कि उसके सिद्धांत सब लोगों के सामने विदित हैं परन्तु इस्लाम के सिद्धांत पर एक प्रकार से काई पोत दी गई है ताकि लोग उसके निकट न हो सकें... बिल्कुल बात यही है... इसे वही व्यक्ति जान सकता है जो निष्पक्ष हो कर का अध्ययन करे...इसी लिए हमने कहा कि हम इस्लाम को उसके वास्तविक रूप में जानना चाहते हैं तो उसका अध्ययन करके देखें। सारे संदेहों का निवारण हो जाएगा। और हाँ ! हम ने इस्लाम ही नहीं बल्कि सारे धर्मों का अध्ययन किया है और अंत में इसी परिणाम पर पहुंचा हूं कि इस्लाम पर सब से बड़ा अत्याचार यही हो रहा है कि उसके सिद्धांत से लोग अनभिज्ञ हैं। जो लोग टेस्ट करके देखेंगे मेरी बातों का समर्थन अवश्य करेंगे... इस्लाम सम्पूर्ण मानव लिए है... यह एक जीवन व्यवस्था है...इस्लामी सिद्धांत के आधार पर हर युग में शान्ति-पूर्ण समाज की स्थापना की जा सकती है। मेरी सब लोगों से अनुरोध है कि जज़बात में आ कर न लिखें,तथ्य को जानने का प्रयास करें...हब सब पर ईश्वर की दया हो।

sajid khan said...

safat alam bhai kuch nai bas "i love you"

maat lado bhai loog apas mai

RAJENDRA said...

ek poori jeevan laga dene ke bawajood hindi dharm ki samajh kee baat karna bhee sandehaspad hai phir siddhanton kee samajh kee bat karna safat jaison ko to adhikaar hee nahin hai yadi voh islaam ko hee achhi tarah se jaante hain to ibadat main lag jaye - sufee log dharm kaa siddhant samajhte they aur aaj bhee hain - parabhu safat ko sadbhddhi den

Baba said...

बुद्धीजीवियों की शाला में मैं छोटा हूं. इतना जानता हूँ कि किसी भी धर्म के व्यक्ति के ने धर्म के प्रति कट्टर नहीं होना चाहिए. वर्ना जब चाहे तब लोग उसे भडकाते रहते हैं और वह भडकता रहता है. जरा-जरा सी बात पर चाकू, तलवारे निकल जाती है. दंगे हो जाते हैं.
रही बात इस्लाम की तो शिक्षा के अभाव के कारण मुस्लिमों की यह हालत है. बराबरी की शिक्षा हासिल करेंगे तो विचार बदलेंगे. विचार बदलेंगे तो वे कठमुल्लों की सुनेंगे नहीं. अपने विवेक से निर्णय लेंगे. ऐसे में मुस्लिम नेताओं, मुल्लों की दुकानदारी खतरे में पड जाएगी.
इसीलिए ये इन्हें मदरसों की पढाई से बाहर नहीं आने देना चाहते.
यही चाहते हैं मुस्लिम नेता. इन्होंने मुसलमानों को चाबी का गुड्डा बनाकर रख दिया है. मुझे हँसी आती है कि वोट किसी देना है, इसके लिए भी आदेश आता है.
...और वक्त के साथ... बराबरी की शिक्षा के लिए आर्थिक स्थिति का ठीक होना जरूरी है. आज एक साधारण मध्यमवर्गीय परिवार भी १-२ बच्चों को सीबीएसई (इतनी महंगी) में पढाने की कोशिश कर रहा है. ऐसे में ७-८ बच्चों को कैसे शिक्षा हासिल होगी

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश जी बहुत उम्दा लेख...काफ़ी दिनों बाद आपने "सिक्के के दोनों पहलुओं को दिखाया है"।

बहुत छानबीन कर लिखा गया लेख है उसके लिये बधाई...अब ज़रा लेख की बिन्दुवार बात करते है....

१. मोबाइल को इस्तेमाल करने में कोई बुराई नही है ये फ़तवा सिर्फ़ शक्की दिमाग के लोगो की उपज है....

"मज़ार इस्लाम में नही है"

"औरतों का कब्रों पर जाना मना है"

२. कादिर मौलाना के साथ बिल्कुल सही हुआ है...वो इसी हार का हकदार था।

३. इस्लाम में शादी के लिये उम्र की कोई बन्दिश नही है लेकिन मौहम्मद साहब ने कहा है की मियां बीवी की उम्र में ज़्यादा फ़र्क नही होना चाहिये क्यौंकि इससे वैचारिक मतभेद ज़्यादा हो जाते है और वो शादी कामयाब नही होती है।

४. औरत पर मर्द का कपडा हराम है और मर्द पर औरत का......(इस बात के ताल्लुक से मुझे पुरी हदीसें वगैरह नही मिली हैं इसलिये पुरे सबुत के साथ नही कह सकता)

५. फ़ांसी से पहले रेप वाला लिंक काम नही कर रहा है.... जहां तक मैं इस्लाम की जानकारी रखता हूं शरीयत में ऐसा कोई कानुन नही है....

६. ये मिस्यार शादी का ज़िक्र इस्लाम में कही नही है बल्कि बगैर शादी के किसी औरत या मर्द से सम्बंध बनाना "ज़िना" कहलाता है...ये गुनाहे कबीरा है और इसकी माफ़ी नही है..।

७. जो ब्रा को गैर-इस्लामी बता रहा है उसके मुंह पर जुता मार दो क्यौंकी इस्लाम में औरत को ऐसा वस्त्र पहनने से मना किया गया है जिससे उस पर मर्द का ध्यान जायें....जब औरत ब्रा नही पहनेगी तो ध्यान कैसे नही जायेगा..???

८. इस्लाम में शादी में सिर्फ़ एक दावत है और है "वलीमा" यानी रिसेप्शन...लडकी के बाप पर कोई खर्चा ना डाले...चार लोग जाये और निकाह करा कर दुल्हन ले आयें


बाकी बाद में अभी कुछ काम से जाना है

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश जी बहुत उम्दा लेख...काफ़ी दिनों बाद आपने "सिक्के के दोनों पहलुओं को दिखाया है"।

बहुत छानबीन कर लिखा गया लेख है उसके लिये बधाई...अब ज़रा लेख की बिन्दुवार बात करते है....

१. मोबाइल को इस्तेमाल करने में कोई बुराई नही है ये फ़तवा सिर्फ़ शक्की दिमाग के लोगो की उपज है....

"मज़ार इस्लाम में नही है"

"औरतों का कब्रों पर जाना मना है"

२. कादिर मौलाना के साथ बिल्कुल सही हुआ है...वो इसी हार का हकदार था।

३. इस्लाम में शादी के लिये उम्र की कोई बन्दिश नही है लेकिन मौहम्मद साहब ने कहा है की मियां बीवी की उम्र में ज़्यादा फ़र्क नही होना चाहिये क्यौंकि इससे वैचारिक मतभेद ज़्यादा हो जाते है और वो शादी कामयाब नही होती है।

४. औरत पर मर्द का कपडा हराम है और मर्द पर औरत का......(इस बात के ताल्लुक से मुझे पुरी हदीसें वगैरह नही मिली हैं इसलिये पुरे सबुत के साथ नही कह सकता)

५. फ़ांसी से पहले रेप वाला लिंक काम नही कर रहा है.... जहां तक मैं इस्लाम की जानकारी रखता हूं शरीयत में ऐसा कोई कानुन नही है....

६. ये मिस्यार शादी का ज़िक्र इस्लाम में कही नही है बल्कि बगैर शादी के किसी औरत या मर्द से सम्बंध बनाना "ज़िना" कहलाता है...ये गुनाहे कबीरा है और इसकी माफ़ी नही है..।

७. जो ब्रा को गैर-इस्लामी बता रहा है उसके मुंह पर जुता मार दो क्यौंकी इस्लाम में औरत को ऐसा वस्त्र पहनने से मना किया गया है जिससे उस पर मर्द का ध्यान जायें....जब औरत ब्रा नही पहनेगी तो ध्यान कैसे नही जायेगा..???

८. इस्लाम में शादी में सिर्फ़ एक दावत है और है "वलीमा" यानी रिसेप्शन...लडकी के बाप पर कोई खर्चा ना डाले...चार लोग जाये और निकाह करा कर दुल्हन ले आयें


बाकी बाद में अभी कुछ काम से जाना है

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

रही बात वन्देमातरम गाने या न गाने की..

तो एक मुसलमान कभी अल्लाह के अलावा किसी और की पुजा या इबादत नही कर सकता है...चाहे वो कोई भी हो...

हदीसों में ज़िक्र है अल्लाह के रसुल ने बताया है की अगर अल्लाह के बाद किसी को सजदा जायज़ होता तो मां-बाप को होता.....लेकिन उनको भी सजदा नही बताया गया बल्कि पांव तक छुना मना है.....

"हम लोग देशप्रेमी है देशभक्त नही है"

अपने वतन के लिये जान दे सकते है और ले सकते है इसी जज़्बे की वजह से ईंग्लिश मिडियम की पढाई छोडी सिर्फ़ एन.सी.सी जाईन करने के लिये......5 साल एन.सी.सी. की...शुंटिंग में गोल्ड मेड्ल...सीनियर अण्डर आफ़िसर रहा 3 साल तक....A ग्रेड से पास किया....

एन.डी.ए. के सारे इम्तिहान पास किये लेकिन मेडीकल में पन्द्र्ह साल की उम्र में लगी एक चोट की वजह से बाहर कर दिया गया....

इस बात का ज़िक्र मैने कभी किया...लेकिन आज बताना ज़रुरी था.....

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

ये मुल्ला जो फ़तवा जारी करते है वो इस्लाम से बहुत दुर है क्यौंकी ये लोग खुद कभी इस्लाम को अपने घरों बसा नही सके...जो मौलवी स्टेज पर खडे होकर औरतों को पर्दे की सलाह देता है...उसके घर की औरते बेपर्दा घुमती है....

मै किसी मुल्ला और फ़तवे वगैरह को नही मानता मैं सिर्फ़ कुरआन और हदीस को मानता हूं...कोई मौलवी अगर कोई बात बताता है तो उससे कुरआन और हदीस का हवाला मागंता हूं....


कुरआन दुनिया में सबसे श्रेष्ट किताब है.....उसमें ज़िन्दगी जीने का पुरा तरीका बताया गया है....१४३० साल पहले से लेकर कयामत तक कैसे रहना है...क्या चीज़ फ़ायदेमंद है और क्या नुकसानदायक वो सबकुछ बताया गया है.....

कुरआन सिर्फ़ एक किताब नही है...वो एक जिन्दगी जीने की कला है

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

पढकर देखिये...मैं भेजता हूं आपको हिन्दी या अंग्रेज़ी की कुरआन...अगर पढ नही सकते तो सुन भी सकते है मेरे पास कुरआन के तर्जुमें की एमथ्री में सीडी भी है.....पता मेल कीजिये मैन आपको कोरियर करता हूं.......


ये मत समझियेगा की आपको इस्लाम में आने की दावत दे रहा हूं.....ऐसा इसलिये कहा ताकि आप असली इस्लाम को अच्छी तरह जान सकें.....

एक बात और

"जो वक्त के साथ बदल जाये तो ईश्वर का पैगाम हो ही नही सकता....ईश्वर अपने नियम एक बार बनाता है.."

ये माईक्रोसोफ़्ट नही है की साल में दो बार सर्विस-पैक लांच करती है

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

जो वक्त के साथ बदल जाये तो ईश्वर का पैगाम हो ही नही सकता....ईश्वर अपने नियम एक बार बनाता है.."

और वह ईश्वर = ब्रह्म है --
ना के सिर्फ " खुदा " और जेहोवाह भी है
- लावण्या

Alok Shankar said...

http://www.youtube.com/watch?v=MeSSwKffj9o

गौरव सोलंकी said...

यह बहुत रोचक बात है कि वही लोग प्रगतिशील मुसलमान माने जा रहे हैं जो अपने घर में हनुमान को ज़गह दे सकते हैं या होली खेल सकते हैं या यह सिद्ध कर सकते हैं कि इस देश में सब हिन्दू ही हैं। फिर बिल्कुल इसी तर्क पर प्रगतिशील हिन्दू होने के लिए ईद को उसी उत्साह से मनाना चाहिए। मुझे तो अपने आसपास ऐसे हिदू नज़र नहीं आते।
वाकई कुछ लिखना नहीं चाहता था लेकिन रुक न सका। मुझे ऐसे आलेखों को देखकर वैसा ही लगता है जैसा पंजाब केसरी पढ़कर या देर रात में न्यूज़ चैनलों के सनसनी वाले कार्यक्रम देखकर।

पंकज बेंगाणी said...

श्री गौरव,

यदि कोई मुस्लिम हिन्दू त्यौहार मनाता है या भाग लेता है तो वह प्रगतिशील है ही! लेकिन सिर्फ वही प्रगतिशील है ऐसा नही है... आप बात को समझे नही.

सहिष्णुता के लिहाज से देखें तो मुस्लिम प्रजा हिन्दूओं से कम सहिष्णु और लचीली होती है यह सर्वविदित है.

बाकी आपको इस अति महत्वपूर्ण और उपयोगी लेख पंजाबी केसरी मार्का लेख लग रहा है तो यह सुरेशजी का दुर्भाग्य है.

Pak Hindustani said...

एक जबर्दस्त लेख, धर्म के नाम पर हो रहे कमीनेपन को उजागर कर दिया आपने.

हिन्दू धर्म की सबसे उम्दा खासियत यही है कि इस धर्म ने अपने आप को लगातार बदला है, और बुर्जुआपन को लात मारता रहा है. इसलिये यह सनातन है. इस्लाम के कुछ फॉलोअरों का बस चले तो यह सबसे पीछे बन्दरों के जमाने में भी चले जायें जब इन्सान हु-हु हा-हा करता हुआ फिरता था.

हिन्दुओं में रिफोर्म की बहुत जगह है, चाहे वो विधवाओं की बात हो, जातिवाद कि, सति प्रथा कि, परदे की, या किसी भी ऐसी घृणित प्रथा की, इनकी स्वीकार्यता निरंतर कम हुई है, और यह हमारी जीत है.

लेकिन कुछ बबूनों ने कसम खा रखी है कि बन्दरपना बन्द नहीं करेंगे, अपने पीढ़ीयों से मिली अक्ल का इस्तेमाल करे न करें, बेवकूफी जरूर अपनायेंगे.

इनका दिमाग तो धर्मांधता चर चुकी है, इसलिये इन्हें समझाने से कोई फायदा नहीं.

Pak Hindustani said...

नहीं गौरव सोलंकी, प्रगितिशील मुसलमान वहीं है जो काफिरों का कत्ल करें, औरतों की आजादी छीनें, और सभी धर्मों को बेइज्जत करें. तुम्हें अकल होती तो तुम भी देखते की हिन्दू भी क्रिसमस पर कैन्डल जलाते हैं और सेन्टा को बुलाते हैं. ईद तो क्या मनायेंगे क्योंकि मुसलमानों ने अपने धर्म का इतना बड़ा हव्वा बना दिया है...

बाकी तुम्हे अपने अजीबो-गरीब कविताओं से फुर्सत मिले तो तुम देश दुनिया की बात भी समझ पाओगे अभी तुम उन्हीं का जाप करो.

दिलीप बिरुटे said...

चिपलूणकर साहेब, लेख वाचायला येतच असतो.
लेखन आवडले.

[मराठीच बोलू असे सध्या धोरण आहे.]

Chinmay said...

umda aalkeh . sau sunar ki ek luhar ki

इस्लामिक वेबदुनिया said...

अगर वास्तव में इस्लाम ऐसा ही जैसा इसके बारे में गलमफहमियां पैदा की जा रही है तो गौर करे आखिर इन शख्सियतों ने क्यों अपनाया इस्लाम। देखें मेरे ब्लॉग उन शख्सियतों को जिन्होने अपनाया इस्लाम।

बुरके वाली said...

u r great

Ravindra Nath said...

उन सभी भाइयों से जो हमें बता रहे हैं कि कुरान में कोई बुरे नहीं है, सिर्फ इस्लाम के अनुयायी ही गलत हैं, उनसे एक ही बात कहनी है, हमारा पाला कुरान से नहीं पड़ता है, इस्लाम मानने वालों से पड़ता है, और उनका आचरण हमें इस्लाम के विषय में अपनी राय कायम करने का मौका deta है|
@pankaj: अगर किसी को यह blog पंजाब केसरी का मार्का लग रहा है तो यह सुरेश जी का नहीं उस व्यक्ति का दुर्भाग्य है|

Ravindra Nath said...

@kairanvi: सपने देखने पर टैक्स नहीं है, देखते रहो|