Tuesday, October 13, 2009

हिन्दुत्व का नुकसान करते और शिवसेना को पसीना लाते हुए - राज ठाकरे Raj Thakre, Shivsena, Maharashtra Elections

राज ठाकरे को महाराष्ट्र की राजनीति का एक "नया धूमकेतु" कहना अभी जल्दबाजी होगी, लेकिन एक बात तो तय है कि बाल ठाकरे की जवानी के दिनों को यदि हूबहू कोई दर्शाता है तो वह भतीजा राज ही है, बेटा उद्धव नहीं। जिन लोगों ने बाल ठाकरे को एक समय मुम्बई पर एकछत्र राज्य करते देखा है, उनके आग उगलते भाषण सुने हैं, उनका खास "मैनरिज़्म", अंदाज़ और डायलॉग देखे हैं, वे लोग पहली ही नज़र में राज ठाकरे से प्रभावित हो सकते हैं। वैसी ही दुबली-पतली कद काठी, चश्मे का अन्दाज़ भी लगभग वैसा ही, बोलने और भीड़ को आकर्षित करने के लिये लगने वाले मैनरिज़्म भी हूबहू वही… बदला है तो सिर्फ़ पहनावा… बाल ठाकरे भगवे कपड़े अधिक पहनते थे, जबकि राज ठाकरे अधिकतर काली पैंट-सफ़ेद शर्ट या सफ़ेद कुर्ते पाजामे में होते हैं…


महाराष्ट्र के चुनावों में राज ठाकरे चुनावी मंचों से जैसा और जो गरज रहे हैं उसकी एक बानगी देखिये -

1) क्या आपने देश के गृहमंत्री पी चिदम्बरम को देखा है, वह अधिकतर भारतीय वेशभूषा अर्थात परम्परागत लुंगी और मुण्डू पहने दिखाई देते हैं, वे जब भी बोलते हैं या तो अंग्रेजी बोलते हैं या तमिल बोलते हैं… ऐसा क्यों?

2) रवीन्द्रनाथ टैगोर ने अपना सारा काम बंगाली में लिखा लेकिन उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला…

3) जब मुम्बई में कुछ टैक्सियाँ फ़ोड़ी जाती हैं तब देश में ऐसा हल्ला मचता है मानो देश जलने लगा हो, जबकि असम में इससे दस गुना होने पर भी कोई खबर नहीं बनती…

4) सत्यजीत रे की अधिकतर फ़िल्में बंगाली में हैं, फ़िर भी उन्हें ऑस्कर मिला…

फ़िर वे बरसते हैं… "तो फ़िर ऐ मराठियों, तुम्हें मराठी बोलने-लिखने में क्या परेशानी है? ऐसा क्यों होता है कि कोई भी बाहरी आदमी, जिसे मराठी नहीं आती तुम्हारा महापौर, विधायक, सांसद, मंत्री बन सकता है, क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? रजनीकान्त भी तमिल नहीं है, इसलिये उसे वहाँ की राजनीति में कूदने के बारे में दस बार सोचना पड़ता है… फ़िर सारा ठीकरा मराठियों के माथे पर ही क्यों? मराठी अस्मिता के बारे में बात करके क्या मैं गुनाह करता हूं?" यह सुनकर युवाओं की भीड़ उत्तेजित हो जाती है…

महाराष्ट्र से बाहर रहने वालों तथा मेरे और आप जैसे लोगों को यह भाषणबाजी भले ही बकवास और भड़काऊ लगे, लेकिन राज ठाकरे वहाँ के बेरोजगार युवकों पर अपना असर छोड़ने में कामयाब हो जाते हैं। राज ठाकरे अपने भाषणों में महाराष्ट्र के लिये कोई योजना पेश नहीं करते, न ही विकास अथवा ग्रामीण उत्थान की बात बताते हैं… वे अपने भाषणों में सोनिया गाँधी की नकल उतारते हैं, विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण की खिल्ली उड़ाते हैं, मराठियों को केन्द्र और राज्य में उचित सम्मान न दिलाने के कारण महाराष्ट्र के पुराने नेताओं को लताड़ते हैं, भीड़ नारे लगाती है, तालियाँ पीटती है… सिर्फ़ एक बात ध्यान देने वाली है कि राज ठाकरे शिवसेना, उद्धव और कई अन्य वरिष्ठ नेताओं की आलोचना करते हैं, उनकी हँसी उड़ाते हैं, लेकिन बाल ठाकरे के विरुद्ध आज तक उन्होंने हमेशा सम्मान की भाषा में बात की है, भले ही बाल ठाकरे ने उन्हें "मराठियों का जिन्ना" कहा हो।

इस सबके मायने क्या हैं? राज की सभाओं में उमड़ने वाली भीड़ को देखकर सबसे अधिक परेशानी सेना-भाजपा गठबन्धन को हो रही है, क्योंकि राज ठाकरे को जो भी वोट मिलेंगे इन्हीं के वोटों से मिलेंगे, अर्थात राज ठाकरे, कांग्रेस का रास्ता आसान बना रहे हैं। सवाल उठता है कि राज की सभाओं में उन्हें सुनने के लिये उमड़ने वाली भीड़ क्या वोटों में तब्दील हो पायेगी? क्योंकि हाल के आंध्रप्रदेश के चुनाव में हमने देखा कि वहाँ के सुपरस्टार चिरंजीवी को सुनने-देखने के लिये लाखों की भीड़ जुटती थी, लेकिन उन्हें वोट नहीं मिले और चुनिंदा सीटें ही मिलीं। संयोग देखिये कि चिरंजीवी और राज ठाकरे दोनों को चुनाव चिन्ह "रेल का इंजन" ही मिला है। अगर लोकसभा चुनावों के आँकड़े देखें, तो साफ़ ज़ाहिर होता है कि राज ठाकरे, शिवसेना को नुकसान पहुँचाने में सफ़ल हो रहे हैं, इसीलिये बुढ़ापे में प्रचार से दूर रहने का इरादा जताने के बावजूद बालासाहेब अपने पुत्रमोह के कारण अब "सामना" में लिख भी रहे हैं, सीडी के जरिये भाषण भी दे रहे हैं।

जैसे-जैसे वक्त बीत रहा है, तथा राज ठाकरे आक्रामक होते जा रहे हैं, उससे अब कांग्रेस की भी परेशानी बढ़ती जा रही है, कांग्रेस को लगने लगा है कि हमारा ही खड़ा किया हुआ "बिजूका", कहीं हमारा ही नुकसान न कर दे। इस आशंका की एक वजह, राज ठाकरे द्वारा प्रचार के अन्तिम दिनों में सोनिया पर अधिकाधिक हमला बोलना है। राज ठाकरे के लिये भी यह चुनाव उसके "राजनैतिक कैरियर" का सबसे बड़ा दांव है, और वह यह बात जानते भी हैं, इसीलिये वे और भी उग्र हो रहे हैं। राज ठाकरे मजाकिया अंदाज में कहते हैं कि "…आंध्रप्रदेश में कांग्रेसी मुख्यमंत्री के चले जाने से लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं, जबकि महाराष्ट्र में लोग कांग्रेसी मुख्यमंत्री बना हुआ है इसलिये आत्महत्याएं कर रहे हैं…"। अपनी हर सभा के अन्त में वे एक कागज़ दिखाते हैं जिसमें राज्य के नासिक, मुम्बई, जलगाँव, ठाणे आदि जिलों में महाराष्ट्र सरकार के अधिकृत आंकड़ों के अनुसार बिहार, उत्तरप्रदेश और बांग्लादेश से आये हुए बाहरी लोगों की संख्या दिखाई गई है, और वे जाते-जाते युवाओं को भड़का जाते हैं कि "ऐसा ही चलता रहा तो एक दिन तुम्हारी भाषा, संस्कृति, अस्मिता खतरे में पड़ जायेगी…"।

13 अक्टूबर को महाराष्ट्र में मतदान होगा, सभी का भाग्य मशीनों में बन्द हो जायेगा, लेकिन यदि परिणामों की सम्भावनाओं पर एक नज़र डालें तो इस प्रकार के दृश्य उभरते हैं -

1) कांग्रेस-NCP को मिलाकर पूर्ण बहुमत मिल जाता है, और वे राज ठाकरे को दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल बाहर फ़ेंकते हैं। ("यूज़ एण्ड थ्रो" की कांग्रेसी संस्कृति, वर्तमान माहौल और वोटों के बंटवारे को देखते हुए फ़िलहाल यह सम्भावना सबसे मजबूत लगती है)।

2) राज ठाकरे की पार्टी अप्रत्याशित प्रदर्शन कर जाती है और उसे 25-30 सीटें मिल जाती हैं, तब वे किंगमेकर की भूमिका में भी आ सकते हैं, यह बाकी की चारों पार्टियों को मिलने वाली सीटों से निश्चित होगा।

3) सेना-भाजपा को मिलाकर पूर्ण बहुमत आ जाता है और राज ठाकरे, हार मानकर बाल ठाकरे के शरणागत हो जाते हैं।

4) सेना-भाजपा को बहुमत से थोड़ा कम मिलता है और राज ठाकरे का समर्थन लेना पड़े, तो क्या बाल ठाकरे, राज को मनाएंगे? यदि ऐसा होता है तब बाल ठाकरे के जीवनकाल की संध्या में यह उनके जीवन की पहली बड़ी हार होगी, वह भी अपने भतीजे के हाथों।

5) कुछ "जंगली" सम्भावनाएं (अंग्रेजी शब्द Wild Possibilities को यदि शब्दानुरूप देखें) ये भी हैं - भाजपा और NCP मिलकर सरकार बना लें, कांग्रेस और शिवसेना देखती रह जायें, अथवा शिवसेना-पवार का चुनाव बाद गठबंधन हो जाये और भाजपा टापती रह जाये… राजनीति में कुछ भी सम्भव है…

जो भी होगा वह तो नतीजों के बाद ही सामने आयेगा, लेकिन आज की स्थिति में तो राज ठाकरे सभी के लिये सिरदर्द बने हुए हैं, सेना-भाजपा के लिये प्रत्यक्ष रूप से, कांग्रेस-NCP के लिये अप्रत्यक्ष रूप से जबकि देश और हिन्दुत्व का भला सोचने वालों के लिये एक "घरतोड़क" के रूप में… क्योंकि आखिर नुकसान तो हिन्दुत्व और हिन्दू वोटों के एकत्रीकरण का हो रहा है…

इस स्थिति के लिये कुछ हद तक बाल ठाकरे का पुत्रमोह ही कारणीभूत लगता है, जो लोग राज ठाकरे और उद्धव को बचपन से जानते हैं, उन्हें पता है कि राज ठाकरे, उद्धव से राजनीति, वक्तृत्व कला, मैनरिज़्म, और युवाओं को अपील करने के मामले में हमेशा आगे रहे हैं, फ़िर भी उन्होंने शिवसेना की कमान उद्धव के हाथों में दी। ज़रा सोचिये कि यदि आज राज ठाकरे पर बाल ठाकरे का वरदहस्त होता और शिवसेना का नेतृत्व उनके हाथों में होता, तो राज के सामने महाराष्ट्र में राहुल गाँधी कहीं नहीं लगते, शिवसेना को एक युवा नेतृत्व मिल जाता, न मराठी-अमराठी का मुद्दा पैदा होता, न ही कोई बवाल होता। एक तरह से देखा जाये तो राज ठाकरे की "एनर्जी" का दुरुपयोग हो रहा है, भाषा और प्रान्त के नाम पर, जबकि उसे पता होना चाहिये कि वह हिन्दुत्व का नुकसान और कांग्रेस का फ़ायदा करवा रहा है। बुढ़ापे में हर व्यक्ति को अपने बेटों का कैरियर संवरते देखने की तीव्र इच्छा होती है और बाल ठाकरे वही चाहत अब दोनों पार्टियों को ले डूबेगी।

इस झमेले में एक "एंगल" बिके हुए मीडिया का भी है। मीडिया में आजकल ठाकरे परिवार के बड़े चर्चे हैं। हो भी क्यों ना, चुनाव कवरेज के समय मीडिया को ऐसा तैयार मिर्च-मसाला भला कब मिलेगा। यदि आप महाराष्ट्र की समस्याओं और प्रदेश की हालत का जायज़ा लेने के लिये मीडिया द्वारा किया जा रहे चुनाव कवरेज की रिपोर्ट देखना चाहते हैं तो आपको कुछ नहीं मिलने वाला, क्योंकि मीडिया के लिये महंगाई, किसानों की आत्महत्या, मुम्बई हमले के आरोपियों पर कार्रवाई, मुम्बई को शंघाई बनाने के सपने, गढ़चिरौली की नक्सल समस्या आदि कोई मुद्दा है ही नहीं, मीडिया के सामने एकमात्र और मुख्य मुद्दा है "ठाकरे परिवार" में चल रही जंग। चूंकि भाजपा और शिवसेना कोई भी साम्प्रदायिक मुद्दा नहीं उठा रहे और सिर्फ़ महाराष्ट्र के विकास की बात कर रहे हैं तो बेचारे "सेकुलरों" को उन्हें कोसने का कोई मौका भी नहीं मिल रहा।

एक विशेष रणनीति के तहत, कांग्रेस द्वारा हमेशा की तरह मैनेज किये हुए चापलूस मीडिया ने राज ठाकरे को जबरदस्त कवरेज देकर हीरो बनाया हुआ है, ठाकरे परिवार, उनके झगड़े-विवाद, राज-उद्धव-बाल ठाकरे के बारे में ऑफ़िस में बैठे-बैठे तैयार की गई रिपोर्टें सतत 24 घंटे आपको विभिन्न चैनलों पर दिखाई देंगी। कांग्रेस के दोनों हाथों में लड्डू हैं, और लगातार तीसरी बार सत्ता में आने के पूरे आसार नज़र आ रहे हैं (जो कि महाराष्ट्र का भीषण दुर्भाग्य ही होगा, ठीक वैसे ही जैसे केन्द्र में कांग्रेस का लगातार दूसरा कार्यकाल शुरु से ही जनता की रातों की नींद हराम किये हुए है)।

देखना है कि कांग्रेस द्वारा शतरंज पर खड़ा किया हुआ यह राज ठाकरे नामक मोहरा "हाथी" की तरह सीधा चलता है या "घोड़े" की तरह ढाई घर… या फ़िर "पैदल" की तरह बिना कुछ किये गायब हो जायेगा, बस कुछ दिन का इंतज़ार और…। तब तक हिन्दुत्ववादी वोटों के बिखराव का सदाबहार और सनातन "मातम" जारी रखिये…, और यदि कांग्रेसी हैं तो खुशियाँ मनाईये…

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30 comments:

महफूज़ अली said...

bahut achcha laga padh kar.......... isey kahte hain sahi maayane mein political analysis......

पी.सी.गोदियाल said...

कहते है कि इंसान को अपने कर्मो का फल यही मिल जाता है, कुछ-कुछ ऐसा ही लगता है चचा-भतीजे की इस नौटकी को देखकर ! लेकिन अफ़सोस मराठी लोगो की संकीर्ण मानसिकता पर होता है जो फालतू में इनकी चालो के मोहरे बन रहे है !

निशाचर said...

राज ठाकरे महाराष्ट्र का "लालू प्रसाद यादव" है फर्क सिर्फ इतना है कि लालू ने जातिवाद के सहारे सत्ता पाई और राज क्षेत्रवाद के सहारे पाना चाहता है. लालू के पास बिहार के लिए कोई विजन नहीं था राज के पास भी नहीं है. लालू भी नौटंकी, मसखरी और नक़ल एवं चुटकुलों के जरिये भीड़ बटोरता था राज भी वही कर रहा है. लालू ने सत्ता के लिए देश, समाज और प्रदेश की कोई चिंता नहीं की राज भी सत्ता के लिए राज्य, हिन्दू समाज और देश हित सबको दांव पर लगा चुका है. ये सब सत्ता के भूखे हैं जिन्हें दुसरे किसी भी चीज की परवाह नहीं है.

संजय बेंगाणी said...

हिन्दुस्तानी रीत पर सदा चलिए,
हिन्दु आपस में ही लड़ मरिए.

अवधिया चाचा said...
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Common Hindu said...

good post

Varun Kumar Jaiswal said...

महाराष्ट्र की राजनीती में राज ठाकरे के मायने और भी बहुत कुछ बयान कर रहे हैं |

राज भाटिय़ा said...

बहुत अच्छा लेख लिखा, हमे इतना नही पता, लेकिन संज बेगांणी जी की टिपण्णि से सहमत है
धन्यवाद

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

बढिया विश्लेषण |

इस चुनाव मैं संभावना तो कांग्रेस की ही दिख रही है, कारन हमेसा की तरह मुस्लिम वोटों का एकत्रीकरण, हिन्दू वोटों का बिखराव ... और कांग्रेस की सारी गन्दी चाल....

चुनाव के नतीजे जो भी हो इन चाचा - भतीजों (ठाकरे) ने हिंदुत्व को इतना नुक्सान पहुचाया है की अब एक हिन्दू ही हिन्दू के खिलाफ हो गया है |

eSwami said...

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम सरफ़िरे हैं इसके ये बावला हमारा

दिलीप कवठेकर said...

अच्छा राजनैतिक विश्लेशण !!

महाराष्ट्र के बाहर के मराठीयों के लिये राज ठाकरे या बाल ठाकरे क्या सोच रखते हैं , ये पता नहीं. मगर नुकसान होने की आशंका है.

SP Dubey said...

सभी नीतिवान मित्र सामुहिक रुपसे देश और जाति को जगाने के अभियान मे प्राण पण से लगे रहे।
जै भारत जै हिन्द अजि हिन्दी

SP Dubey said...

सभी नीतिवान मित्र सामुहिक रुपसे देश और जाति को जगाने के अभियान मे प्राण पण से लगे रहे।
जै भारत जै हिन्द अजि हिन्दी

Anil Pusadkar said...

कांग्रेसियो के लिये सच मे खुश होने वाली बात है

दिवाकर मणि said...

बहुत सटीक विश्लेषण है. यदि वाकई बाल ठाकरे जी ने पुत्रमोह की बलवती इच्छा को त्यागकर पार्टी हित और हिन्दूत्व हित की बात सोची होती तो राज ठाकरे की दिशा आज के नकारात्मक क्षेत्रवादी सोच से इतर सकारात्मकता की ओर होती.

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

SANJAY ji ne bahut hi sahi kahaa hai. theek yahi vichar hamaare bhi hain.

ek aam aadmi said...

rightly said.

shubhi said...

सुरेश जी, राज ठाकरे वह राजनीतिज्ञ है जिसने अपनी राजनीति बढ़ाने के लिए देश को बलिवेदी पर चढ़ाया है नुकसान देश का है यह नासूर है और अगर इस आदमी को हमने नहीं रोका तो यह जहर पूरे देश में फैल जायेगा। इस घटिया आदमी के लिए जितने बुरे शब्द कहे जाये उतने कम हैं।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

सुरेश जी ,
शिवसेना और भाजपा जब केंद्र में शासन कर रहे थे तब हिंदुत्व का क्या फायदा किया कुछ याद हो तो बताये

DIVINEPREACHINGS said...

एक तरह से देखा जाये तो राज ठाकरे की "एनर्जी" का दुरुपयोग हो रहा है, भाषा और प्रान्त के नाम पर, जबकि उसे पता होना चाहिये कि वह हिन्दुत्व का नुकसान और कांग्रेस का फ़ायदा करवा रहा है।

सत्य तो बस इतना सा ही है....

परमजीत बाली said...

बढिया पोस्ट लिखी है...

SHASHI SINGH said...

सही कहा सुरेश भाई, एक सही प्रतिभा का बेहद बुरा इस्तेमाल हो रहा है। कांग्रेस के साथ-साथ बाल ठाकरे भी इसके लिए उतने ही दोषी हैं। कितना अच्छा होता कि उद्धव राज को सहयोग करते और राज महाराष्ट्र की विषवेल बनने की जगह राष्ट्र के लिए बरगद के रूप में विकसित होते। तब न तो देश को किसी मैडम की जरूरत होती और न ही उनके मुन्ने की।

क्या कर सकते हैं, नियति को जब हेमू की आंखों में तीर लगना मंजूर था... ये तो फिर भी ठाकरे परिवार की बुद्धि पर पड़ा पत्थर भर है, जिससे हम सिर्फ अपना सिर फोड़ सकते हैं।

महफूज़ अली said...

aapko deepawali ki haardik shubhkaamnayen..........

योगेन्द्र सिंह शेखावत said...

बवाल तो है | और बाल ठाकरे समझदारी से काम लेते तो काफी फायदा हो सकता था | लेकिन राज ठाकरे ने जो तर्क देते हैं, उनका जवाब भी शायद ही किसी के पास होगा | जब राजदीप सरदेसाई, राज ठाकरे का interview लेते हैं तो राजदीप से भी जवाब देते नहीं बनता | लगता है राज ठाकरे राजदीप का interview ले रहे हों | मुंबई में एक दंगा हो जाना देश जलना हो जाता है और कश्मीरी पंडित को अखबार में एक column भी नहीं मिलता | देश में इतनी बार बम धमाके और हमले होते रहे हैं, लेकिन ताज होटल पर धमाका होते ही, सरकार जो चिल्लाई है की पूरी दुनिया को पता चल गया, ये सब पहले कहाँ चले गए थे, गरीबों और मध्यमवर्गीय लोगों के क्षेत्र पर हमले इतनी महत्ता नहीं रखते शायद, इस बार इन ऊँचे लोगों के बैठने वाली जगह पर हमला हुआ था |

भाषा को लेकर उन्होंने जो तर्क दिए हैं, उनमे भी मुझे तो कोई बुराई नहीं लगती, मराठी बोलना गुनाह है क्या ?
जब आज एक बेरोजगार युवा पर सामाजिक, राजनैतिक, सरकारी व निजी कंपनियों का परोक्ष रूप से दबाव होता है की अगर उसे काम करना है तो अंग्रेजी आनी ही चाहिए तो युवा शरीर होने के नाते उसका उतेजित होकर जोश मारना स्वाभाविक प्रक्रिया है | जब हिंदी भाषी हिंदी के प्रचार-प्रसार में हिंदी दिवस का आयोजन करते हैं, तो अंग्रेजी के खिलाफ बोलते ही हैं, उनको भी तो हिंदी के ख़त्म होने का डर है | राज ठाकरे युवा होने के कारण जोशीले सुर में बोल जाते हैं, इसलिए थोडा कटु लगने लगता है लोगों, को बाकी काम तो वो भी वही कर रहे हैं जो हिंदी भाषी अंग्रेजी के लिए चाहते हैं | काम में कोई फर्क नहीं है सिर्फ नाम बदल गए है, एक मराठी को बढ़ने के लिए हिंदी को गाली दे रहा है, तो दूसरा हिंदी को बढ़ने के लिए इंग्लिश को गाली दे रहा है बस इनकी आवाज थोडी दबी हुई सी है |

निश्चित ही राज ने कुछ गलतिया की होंगी, परन्तु गलतियाँ हम सभी कर रहे हैं, सिर्फ ठीकरा एक-दो लोगों पर फूटता है | मतलब बात वही है की हम समझदारी से मिलकर सोच विचार करके काम नहीं करेंगे, सिर्फ दूसरो की कमियां गिनाते रहेंगे और अपनी गलती को भूल जायेंगे | इसी बात को बेंगानी जी दो लाईन में कह दिया है |
दूसरो को बर्बर और पिछड़ी कौम या जाति का बताने वाले और खुद को ज्यादा होशियार और प्रगतिशील, स्वच्छ, समझदार समझने वाले हम लोग खुद की कुत्ता लड़ाई नहीं देख रहे हैं |

जी.के. अवधिया said...

नमस्‍तेऽस्‍तु महामाये, श्री पीठे सुरपूजिते।
शंख-चक्र-गदा-हस्‍ते, महालक्ष्‍मी नमोऽस्‍तुते॥

दीपोत्सव का यह पावन पर्व आपके जीवन को धन-धान्य-सुख-समृद्धि से परिपूर्ण करे!!!

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

दीप की स्वर्णिम आभा
आपके भाग्य की और कर्म
की द्विआभा.....
युग की सफ़लता की
त्रिवेणी
आपके जीवन से ही आरम्भ हो
मंगल कामना के साथ

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

दीप की स्वर्णिम आभा
आपके भाग्य की और कर्म
की द्विआभा.....
युग की सफ़लता की
त्रिवेणी
आपके जीवन से ही आरम्भ हो
मंगल कामना के साथ

SANJAY KUMAR said...

Many among North Indian settled in Maharshtra are supporter of cause of hindisum, but the attitude of Thakrey family towards North Indian forced them cast their vote in favour of other parties.

At one hand Thakreys talks of Hindusim on the other hand they shows aversion towards PURE HINDU FESTIVAL "CHHATH".

It leaves North Indian consufed.

So far I do not a single North Indian leaders winning election without knowlwedge of Marathi.

In fact I personnaly know that "SANJAY NIRUPAM" and "KRIPASHANKAR SINGH"is fluent in Marathi.

So far even Raj Thakrey could cite any example of Mararthi culture being disgressed by a North Indian.

Thakrey talks of adoption of Marathi culture by Maharashtrian.

Can he say Maharastrian culture is unique? Whether culture of Maharastrian Brahmin is simiar to that of Kayastha or that of a Mahar.

Then which culture of adopt.

Maharastrian Brahmin follow strict dietary rules, whereas some other Maharastrian communities has no aversion from even eating PORK.

North Indian left confused which dietary practices, Thakrey is talking to be adopted.

In certain section of Maharastrian marriage with Maternal Uncles daughter (Mameri Behan)is not a taboo, hence allowed and other section of Maharastrian it is strictly prohibitive.

A North Indian again gets confused, which marriage practice, to be adopted.

SANJAY KUMAR said...

Contination with earlier comment...

All because of this attitude of Thakreys person like SANJAY NIRUPAM, who is stauch supporter of HINDUISM was forced to leave SHIV SENA and embrass a party, which for we would never in his life would like to join.
Often I herad from NORTH INDIANS that even though the a TAMILIAN knows HINDI, he shall never speak.

But when I got the opprtunity to stay in Tamilnadu, I found that, in recent time, the reason for this attitude in not the support of DRAVIDIANISM or something else rather they are scared of being mocked for the incorrect speaking HINDI.

The same reason stands for the a North Indian staying in Maharashtra and not speaking Marathi, it is not the disrespect for Marathi.

Even I have studied SANSKRIT upto class X and I can understand also, but because of above reason I am scared of speaking SANSKRIT.

The North Indians, who are settled in Mahrastra and do not speak Marathi are of following class of people.

1.So called Elite Class, who has strong aversion for any of Indian language, the same section of Maharastrian has same attitude
2. Very few stubborn people, who may be categorised as lunatics.
3. Those who came and settled in Maharastra in their late.
4. Those who has limited intercourse with local people e.g. IIT Mumbai student, those who are in Armed forces like Navy etc.
5.Deaf & Dumb.

As I wrote in my earlier comment majority of North Indians settled in Mararashtra are strong supporters of Hinduism and they strongly oppose violence in Kashmir & Assam. In fact they are the one who are victims of that violence.

Thakreys rather than sailing alongwith them and really doing somthing concreate against the cause of violence, they pounce upon those North Indians, who has similars views as that of Thakreys on the issue of Kashmir & Assam.

The North Indian get perplexed.

SANJAY KUMAR said...

Apart from Muslim and Christian divisive forces, Forces like Thakrey cannot be pardoned off, in the guise of Hindusim, they are doing much harm to the Hindu community settled in Maharashtra.

What a shame ?
A hindu cannot celebrate his PURE & AUSPICIOUS FESTIVAL of CHHATH, becuase of a HINDU.
Many North Indians were so scared to celebrate CHHATH that they went back to their native place for celebrations.

Remaining who had performed they performed under heavy protection due to threat not from PAKISTAN or TALIBAN rather .....( Shame to call them Hindu also).
Now it is becoming difficult for HINDU to protect thier relions because of THAKREYS and their goons.

During our "Scared Thread (ygayopavit)" ceremony, we performs ritual of going KASHI for education".

Thakrey shall look through their regional spectacles and ask us to change the ritual to going to Latur, Jalgaon or Dhulia.

During our puja we make ahwhan (Calling) of "Sapt-sindhu (Seven rivers)" as GANGA, YAMUNA GODAVARI SCH--" now we may have to change "Godavari, Bani, Khari, Mithi -sch (rivers of Maharashtra)"

It is matter of shame none of the Hindu nor follower of other religion, not even commumnist and secular has ever made any remark against this Hindu festival.

It is condemned none other than person who claim themselves as champions of Hindu Cause"