Sunday, October 25, 2009

हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों से परहेज, नामवर सिंह का आतंक और सैर-सपाटा यानी इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलन…

ज़रा सोचिये, आप किसी बड़े शहर के सबसे पुराने और काफ़ी ख्यात ब्लॉगर हैं, उसी शहर में कोई ब्लॉगर सम्मेलन होता है जिसे तथाकथित रूप से "राष्ट्रीय संगोष्ठी" का नाम दिया जाता है, लेकिन फ़िर भी न तो आपको उस सम्मेलन हेतु कोई निमंत्रण पत्र भेजा जाता है, उलटे किसी के व्यक्तिगत बुलावे पर आप गलती से उस सम्मेलन में पहुँच भी जायें तो आपका सभी से परिचय करवाना तो दूर, उलटा एक निश्चित दूरी बनाये रखी जाये, तो इस व्यवहार को आप क्या कहेंगे… अपमान, उपेक्षा या साजिश? कुछ ऐसा ही हिन्दी ब्लॉग जगत के एक पुराने और ख्यात ब्लॉगर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह के साथ हुआ, "महाशक्ति" ब्लॉग के इस मालिक का परिचय देने की मुझे कोई आवश्यकता नहीं है।

जी हाँ मैं बात कर रहा हूं हाल ही में सम्पन्न, सरकारी खर्च पर हुए सैर-सपाटे जिसे कथित रूप से हिन्दी ब्लॉगरों की राष्ट्रीय संगोष्ठी कहा गया और यह सम्मेलन बुरी तरह प्रदूषित गंगा और दिल्लीवासियों द्वारा गटर बना दी गई यमुना नदी के संगम स्थल अर्थात इलाहाबाद में सम्पन्न हुआ।

प्रमेन्द्र प्रताप के साथ जो व्यवहार हुआ, उसके पीछे के कारण पर मैं बाद में आऊंगा। सबसे पहले इस राष्ट्रीय(?) सम्मेलन में हिन्दी के ब्लॉगरों को बुलाने का पैमाना क्या था, इस बात पर सभी ब्लॉगरों को घोर आश्चर्य आज भी हो रहा है, आगे भी होता रहेगा। कहा जा सकता है कि यह तो आयोजकों का अधिकार है कि वे किसे बुलाते हैं और किसे नहीं। बात तो सही है, लेकिन जब कोई विश्वविद्यालय सरकारी खर्चे पर कोई आयोजन करता है और वह भी हिन्दी ब्लॉगिंग पर, जो कि फ़िलहाल एक "पोखर" से ज्यादा बड़ा उपक्रम नहीं है तब कम से आयोजकों को अपनी निष्पक्षता दर्शानी चाहिये, लेकिन लगता है कि ऐसा करने की कोई मंशा थी ही नहीं।

एक बात होती है सूचना, एक होता है औपचारिक निमंत्रण और एक होता है आधिकारिक निमन्त्रण…। सूचना सभी ब्लॉगरों को दी जा सकती थी, दी जानी चाहिये कि अलाँ-फ़लाँ हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन इस-इस शहर में इस-इस तारीख को होने जा रहा है। औपचारिक निमंत्रण वह होता है जिसमें सम्मेलन से सम्बन्धित एजेंडा अथवा निमंत्रण पत्र की छायाप्रति संलग्न होती है अर्थात वह व्यक्ति आना चाहे तो आ सकता है। तीसरा होता है आधिकारिक निमंत्रण, जिसमें बाकायदा टिकट भेजकर सम्बन्धित व्यक्ति को बुलाया जाता है और उसके ठहरने-खाने के बारे में इंतजामों की जानकारी दी जाती है। खेद की बात तो यह है कि हिन्दी के अधिकतर ब्लॉगरों को इस कथित राष्ट्रीय सम्मेलन के बारे में "सादी सूचना" तक नहीं भेजी गई, किसी-किसी को औपचारिक निमन्त्रण मिला, लेकिन कुछ खास-खास लोगों को बाकायदा आधिकारिक निमंत्रण दिया गया, सूत्रों के अनुसार उन्हें आने-जाने का "एसी टू टीयर" का किराया, स्थानीय परिवहन, ठहरने तथा खाने एवं "पीने" का भी इंतजाम किया गया था।

तात्पर्य यह कि कोई भी हिन्दी ब्लॉगर इतना भूखा-नंगा या स्वाभिमान से लचर नहीं है कि वह मुफ़्त के खाने-पीने के लिये मरा जा रहा हो और मात्र एक सूचना पर ही वह वहाँ आ धमके और बजट बिगाड़ दे, लेकिन आयोजनकर्ताओं का यह कर्तव्य था कि अधिकाधिक हिन्दी ब्लॉगरों को कम से कम इस सम्मेलन के बारे में एक "सूचना" तो भिजवाते।

बहरहाल, इलाहाबाद के ब्लॉगर सम्मेलन में जो प्रमुख विभूतियाँ उपस्थित थीं उनके बारे में कुछ जान लिया जाये। जैसा कि हिन्दी ब्लॉगरों ने विभिन्न रिपोर्टों में पढ़ा-सुना और तस्वीरें देखी होंगी, वे जानते ही होंगे कि कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे प्रमुख हिन्दी साहित्य आलोचक नामवर सिंह। अब नामवर सिंह के बारे में मेरे जैसा तुच्छ व्यक्ति अधिक क्या बखान कर सकता है, सिवाय इसके कि कुछ दिनों पूर्व ही इन्होंने हिन्दी ब्लॉग जगत को "साहित्य" मानने से इन्कार कर दिया था और उसे दबे-छिपे शब्दों में "कचरा" करार दिया था, लेकिन यही विभूति हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन की मुख्य अतिथि बन बैठी। अब ये मुख्य अतिथि बन बैठे या बनाकर बैठा दिये गये, यह जाँच का विषय हो सकता है, लेकिन शायद आयोजकों को लगा होगा कि जब तक स्वनामधन्य नामवर सिंह जी हिन्दी ब्लॉगिंग का अनुमोदन नहीं करेंगे तब तक उनका सारा जीवन और लेखन बेकार है इसलिये हिन्दी ब्लॉग पर नामवर सिंह ठप्पा लगवाने को बेताब हुए जा रहे थे।

ऐसे सबसे पहला सवाल यही उठता है कि क्या जब तक नामवर सिंह "एंडोर्स" नहीं करेंगे, हिन्दी ब्लॉगिंग चल नहीं सकती? नामवर सिंह का हिन्दी ब्लॉगिंग में क्या योगदान है? बल्कि मुझे तो लगता है कि सम्मेलन में मंच पर कब्जा जमाये बैठे लोगों में से सिर्फ़ ज्ञानदत्त जी ही सक्रिय ब्लागर होंगे, बाकी के लोग, सक्रिय तो छोड़िये, ब्लॉगर ही नहीं हैं… अब बताईये भला, ऐसे नॉन-ब्लॉगरों से हिन्दी ब्लॉग जगत की सेवा के अरमान पाले जा रहे हैं। क्या नामवर सिंह और विभूतिनारायण राय हमें बतायेंगे कि हिन्दी ब्लॉगिंग कैसी की जानी चाहिये, या फ़िर वे चाहते हैं कि "अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता" का अधिकार सिर्फ़ कुछ विशेष विचारों वाले लोगों की बपौती बनी रहे, अर्थात जैसा उन्होंने "साहित्य और इतिहास" में किया है वैसा ही कुछ अब वे हिन्दी ब्लॉग जगत में भी करें…। इस सम्मेलन से तो ऐसा ही महसूस होता है कि मानो नामवर सिंह अनुमोदन नहीं करेंगे तो हिन्दी ब्लॉग जगत विधवा (या विधुर) हो जायेगा, बरबाद हो जायेगा।

ऐसा हमेशा से होता रहा है कि एक "विचारधारा वर्ग विशेष" जो कि विभिन्न अकादमिक और सत्ता संस्थानों में अतिक्रमण करके बैठा हुआ है, उसे खुश करने के लिये सरकारी खर्च पर ऐसी नौटंकियाँ सतत आयोजित की जाती रही हैं, चाहे उसके पीछे उद्देश्य पुस्तकें बिकवाने का हो अथवा "महानुभाव" के रसूख के जरिये कहीं घुसपैठ करने का। प्रमेन्द्र सिंह के साथ हुआ व्यवहार भी इसी खास विचारधारा के तहत किया गया लगता है। ज़ाहिर है कि जिस सम्मेलन में नामवर सिंह उपस्थित होंगे वहाँ हिन्दुत्ववादी-संघी-भाजपाई ब्लॉगरों का क्या काम? सो स्थानीय और सबसे पुराने होने के बावजूद प्रमेन्द्र सिंह को न्यौता तक नहीं दिया गया। मजे की बात तो यह है कि भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह, भाजपा शासित मध्यप्रदेश के भारत भवन के सरकारी कार्यक्रम में भी मुख्य अतिथि बन जाते हैं और तब उनके चेले उनसे कोई सवाल-जवाब नहीं करते (जबकि कुछ दिनों पूर्व ही गोरखपुर में योगी आदित्यनाथ के हाथों पुरस्कार ग्रहण कर लेने पर एक वामपंथी साहित्यकार को उनके अपनों द्वारा ही लानत-मलामत झेलनी पड़ी थी)। यानी जब भाजपा-संघ वाले उन्हें अपने कार्यक्रम में बुलायें तब वे लोग अच्छे बन जाते हैं, लेकिन हिन्दुत्ववादी लेखकों और ब्लॉगरों से छूत लगी बीमारी जैसा व्यवहार किया जाता है।

जब व्यक्तिगत बुलावे पर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह इस कथित सम्मेलन में पहुँचे तब उनका परिचय करवाना तो दूर, लोग उनसे कन्नी काटते रहे, ऐसा क्यों भाई? इसके पीछे वही मानसिकता काम करती लगती है कि हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों की उपेक्षा करो, उनका अपमान करो, उनके लेखन को "कचरा" बताओ आदि-आदि, अर्थात लेखन तो सिर्फ़ हम कर रहे हैं, बाकी जो भी व्यक्ति लिख रहा है वह हमें फ़ूटी आँख नहीं सुहाता, जब हम मान्यता देंगे तभी वह लेखन कहलायेगा, साहित्य कहलायेगा तब तक नहीं, तुम भले ही काफ़ी समय से हिन्दी ब्लॉग लिखते हो, लेकिन चूंकि हमारी "फ़्रेम" में फ़िट नहीं बैठते इसलिये तुम्हें निमंत्रण तो दूर सूचना भी नहीं भेजेंगे… इसे कहते हैं खालिस "वामपंथी मठाधीशी मेंटेलिटी"। यह मात्र संयोग नहीं है कि सम्मेलन में बुलाये गये ब्लॉगरों में एक भी हिन्दुत्ववादी ब्लॉगर नहीं था। इस सारे झमेले और चुनिंदा शातिरों के बीच में रवि रतलामी, मसिजीवी और वडनेरकर जी जैसे सज्जन बड़ी दुविधा में फ़ँसे नज़र आये कि आखिर उन्हें यहाँ बुलाया किसलिये गया है।

इस कथित राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगिंग सम्मेलन के दौरान, ब्लॉगिंग के सम्बन्ध में क्या विचार-विमर्श हुआ? हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा पर कोई मंथन हुआ? समूचे विश्व में ब्लॉगरों को धमकाने और उनकी अभिव्यक्ति का गला घोंटे जाने के खिलाफ़ कोई प्रस्ताव पारित हुआ या इसके बचाव के लिये कोई कदम उठाने पर विमर्श हुआ? (उलटा मान्यवर हमें धमका गये कि भाषा सुधारो, वरना राज्य सत्ता हस्तक्षेप करेगी)। यानी सम्मेलन के नाम पर हुआ सिर्फ़ बैंगन-कद्दू, सैर-सपाटा, खाना-पीना, घूमना-फ़िरना। यदि हिन्दी ब्लॉगिंग पर वाकई कोई गम्भीर विचार विमर्श करना होता तो गुजरात से ब्लॉगिंग कर रहे संजय बेंगाणी को भी सादर बुलाया जाता जो कि चाहते तो गुजराती में भी ब्लॉगिंग कर सकते थे, लेकिन हिन्दी की सेवा कर रहे हैं… परन्तु दिक्कत ये है कि वे हिन्दुत्ववादी ब्लॉगर हैं… यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा पर कुछ गम्भीरता होती तो केरल से ब्लॉगिंग कर रहे शास्त्री जी को ससम्मान बुलाया जाता, जो चाहते तो मलयालम में भी ब्लॉगिंग कर सकते थे, लेकिन वे भी "वामपंथी खाँचे" में फ़िट नहीं बैठते। इसलिये शक होता है कि इस सम्मेलन का उद्देश्य हिन्दी ब्लॉगिंग का भला करना कतई नहीं था, बल्कि सरकारी पैसों के दुरुपयोग से अधिकारियों को खुश करने, तथा कुछ लोगों को उपकृत करने का था।

विश्वस्त सूत्रों से यह भी पता चला है कि सम्मेलन में कुछ ब्लॉगर तो ऐसे भी थे जिन्होंने सदियों से अपने ब्लॉग पर कुछ नहीं लिखा, कुछ ब्लॉगर ऐसे थे जो महीने भर में गलती से एकाध पोस्ट लिख देते हैं, और चूंकि एसी का किराया और इलाहाबाद की मुफ़्त सैर का मौका मिल रहा था इसलिये एकाध ब्लॉगर अपनी पत्नीश्री को भी "सक्रिय ब्लॉगर" की श्रेणी में साथ ले आये…, एकाध-दो ब्लॉगर सिर्फ़ मुँहदिखाई के लिये आये और बाद में इलाहाबाद घूमने निकल लिये… तो ऐसा कुछ रहा इलाहाबाद का, कहने को "विश्वप्रसिद्ध", लिखने में "राष्ट्रीय" लेकिन हिन्दी ब्लॉगिंग के परिणाम के नाम पर "स्थानीय" से भी बकवास, हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन। इस सम्मेलन की विभिन्न रिपोर्टें आपने पढ़ी होंगी, मेरी इस टुच्ची सी रिपोर्ट को भी झेल जाईये…

अन्त में एक बात प्रमेन्द्र भाई से, अमूमन चैटिंग पर आपसी बातचीत को आधार बनाकर मैं कभी भी कोई पोस्ट नहीं लिखता, लेकिन आपके साथ जो व्यवहार हुआ उसने मुझे क्षोभ से भर दिया, और मुझे महसूस हुआ कि हिन्दुत्ववादी ब्लॉगरों को जानबूझकर दूर रखने और नामवर सिंह की उपस्थिति के कारण इस सम्मेलन के पीछे कोई विशिष्ट मानसिकता काम कर रही है, "महाशक्ति" से मेरा भावनात्मक लगाव है, इसलिये यह पोस्ट पूरी तरह से आपको समर्पित है। यदि इस निजी बातचीत को सार्वजनिक करने से आपको कोई तकलीफ़ हुई हो तो खुलेआम आपसे माफ़ी चाहूंगा।

हालांकि इस सम्मेलन के बारे में कुछ भी लिखने या कहने से मैं बच रहा था और इसे "इग्नोर" करने वाला था… लेकिन वर्षों से हिन्दुत्ववादी लेखन करते-करते अब मैं "उपेक्षा-प्रूफ़" हो चुका हूं, "आलोचना-प्रतिरोधी क्षमता" से लैस हूं, इसलिये मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता, न ही आज तक मैंने कभी जीवन में एसी कोच में सफ़र किया है, ना ही किसी सरकारी कार्यक्रम में मुझे बतौर "दामाद" बुलाया गया है।

प्रमेन्द्र भाई आप युवा हैं, आप भी मेरे जैसा "उपेक्षाप्रूफ़" बनने की कोशिश कीजिये… तथा साहित्य, इतिहास, विश्वविद्यालयों, अकादमियों, शोध संस्थानों आदि में काबिज "अतिक्रमणकारी" नीतियाँ अपनाने वाले मठाधीशों की पोल खोलें… जो अब हिन्दी ब्लॉगिंग में भी "प्रभुत्ववादी घुसपैठ" और विभाजन करवाने के इच्छुक हैं… तथा राष्ट्रवादियों को अलग-थलग करने की राष्ट्रीय मुहिम में रत हैं।

इति श्री इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मेलनम् कथा अध्यायः सम्पूर्णम्…

(मेरे सभी नॉन-ब्लॉगर सब्स्क्राइबर इस पोस्ट को इग्नोर करें, क्योंकि आपको नहीं पता कि इस हिन्दी ब्लॉगिंग रूपी "पोखर" में क्या-क्या गुलगपाड़े होते हैं)

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58 comments:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

sahi baat kahne waalon ke saath yahi hota rahega! aur visheshkar tab jab we hindoon hon.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

बस इतना समझ आता है..
1. कि हिन्दी ब्लागिंग के कुछ महानुभाव या तो तथाकथित हिंदी साहित्य के कर्णधारों की गोद में बैठने को आतुर दीखते हैं या,
2. फिर वो कर्णधार खुद ही, प्रकाशनों की ही तरह, हिन्दी ब्लागिंग को हाइजैक कर लेना चाहते हैं...
3. हिन्दी ब्लागिंग में भी गुटबाज़ी न केवल उभर रही है बल्कि मज़बूत भी रही है.


ग़नीमत है कि दूसरी बात को सिरे चढ़ा पाना तकरीबन नामुमकिन है.

श्रीश पाठक 'प्रखर' said...

इस सम्मलेन की एक सादी सूचना पाने का अधिकार तो हमारा भी बनता था, पर मैंने सोचा कि चूँकि मै शायद बहुत जूनियर ब्लोगेर हूँ तो छोड़ो भाई, सम्मलेन की शुभकामनाएं मनाओ...

Shastri JC Philip said...

"यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा पर कुछ गम्भीरता होती तो केरल से ब्लॉगिंग कर रहे शास्त्री जी को ससम्मान बुलाया जाता, जो चाहते तो मलयालम में भी ब्लॉगिंग कर सकते थे, लेकिन वे भी "वामपंथी खाँचे" में फ़िट नहीं बैठते। "

प्रिय सुरेश,

मुझे इस सभा के लिये निमंत्रण मिला था जो व्यक्तिगत असुविधा के कारण मैं स्वीकार नहीं कर पाया.

हां यह सही है कि वामपंथी वातावरण से मैं कतई मेल नहीं कर पाता क्योंकि देशप्रेम उनके लिये उतना ही गैर है जितना एक नास्तिक के लिये मूर्तिपूजा है.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

दीन दरवेश said...

आपके कहने सुनने से क्या होता है, चार दिन के नमाज़ियों ने तो दूर बैठ कर इतिहास लिखने की प्रक्रिया में इसे हिन्दी ब्लागिंग की सबसे बड़ी संगोष्ठि घोषित कर दिया है,

शायद इन स्वयंभू इतिहासकारों निगाह में हिन्दयुग्म और साहित्य शिल्पी के ब्लागिंग सम्मेलन नहीं पड़े, इतने ब्लागर तो इनके जब तब की बैठकों में जुड़ जाते हैं

DIVINEPREACHINGS said...

साहित्य, इतिहास, विश्वविद्यालयों, अकादमियों, शोध संस्थानों आदि में काबिज "अतिक्रमणकारी" नीतियाँ अपनाने वाले मठाधीशों की पोल खोलें… जो अब हिन्दी ब्लॉगिंग में भी "प्रभुत्ववादी घुसपैठ" और विभाजन करवाने के इच्छुक हैं… तथा राष्ट्रवादियों को अलग-थलग करने की राष्ट्रीय मुहिम में रत हैं। आपका मार्गदर्शन सही है....यदि युवजन छ्द्म धर्मनिरपेक्षता जैसी मृगमरिचिका के पीछे न दौडें...

cmpershad said...

आपका यह लेख छोटे बच्चे का रुदन लगा। कृपया दिनेश जी का लेख ‘अनवरत’ पर पढ़ लें:)

Suresh Chiplunkar said...

ठीक है cmperashad जी रुदन ही सही, लेकिन मेरे सवालों के कुछ तो जवाब देते… जो मुद्दे मैंने उठाये है, क्या वे सब के सब गैरवाजिब हैं?

SP Dubey said...

हम तो भाई आपके विचार से सहमत है और साधारण तौर पर ब्लाग पढ्ते है यदि आप जिन ब्लागर बन्धुवो का नाम का उल्लेख अपने लेख मे किया है उनका लिन्क भी दे देते उनके ब्लाग भी पढ्ने और समझने मे सुबिधा हो जाती।
वैसे वक्ता (सब नही)श्रोता को अग्यानी समझता है और लेखक (सब नही)पढ्ने वालो को अग्यानी, यह वंचना सभी "विधा" पर लागू है,जनता जनार्दन भोली तो हो सकती है पर मुर्ख नही है, आप जैसे लोग (थोडे ही सही)भोली-भली जनता को जगाने(सावधान)करने का काम कर रहे है, करते रहिए हिन्दुत्व का इतिहास बहुत पुराना है "कुछ तो है हस्ती मिटती नही मिटाने से" अपना ध्यान तो आप अपने लक्ष पर ही रख कर पुनीत कार्य को अन्जाम दे।
धन्यवाद

राज भाटिय़ा said...

भाई हमे तो कुछ भी समझ नही आ रहा, हम तो इसे कुछ ओर ही समझ रहे थे, ओर अभी थोडी देर पहले अनवरत पर दिनेश जी का लेख पढा ओर अब यहां... भाई हमे तो जिन्दगी मै वेसे ही बहुत परेशानियां है, इस लिये हम कान पकडते है ऎसे आयोजनओ से दुरी भली.
धन्यवाद लेकिन आप का लेख भी बहुत कुछ कह रहा है, बीच की बात राम जाने

निशाचर said...

नामवरसिंह एंड कम्पनी ने साहित्य, इतिहास लेखन, पत्रकारिता और कला के अनेक क्षेत्रों में अपनी मठाधीशी कायम कर ली है. वे उसमें किसी स्वस्थ और स्वतंत्र विमर्श के लिए कोई जगह नहीं छोड़ते. अगर आप पिछलग्गू, चाटुकारिता, चरण चुम्बन जैसी कलाओं में पारंगत हैं तो आप इस गैंग में शामिल हो सकते हैं परन्तु यदि आप अपने अपनी खोपडी में जरा भी मगज होने का दावा करते हैं तो फिर इस गिरोह में मिसफिट ही कहलायेंगे. यह गिरोह दशकों से ज्ञान के प्रत्येक विधा में स्वतंत्र चिंतन और विकास को अवरूद्ध किये बैठा है और वह भी सरकारी खर्चे पर (मतलब आपकी और हमारी जेब से टैक्स के रूप में निकले गए धन पर). ब्लागगिंग एक सशक्त माध्यम के रूप में उभर रहा है और अभी तक इस गिरोह कि गिरफ्त से बाहर है इसलिए यह अपने पुराने तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हुए इस पर भी मठाधीशी ज़माने का प्रयास कर रहे हैं.

अगर इनकी कार्य प्रणाली के विषय में जानना है तो कृपया अरुण शौरी की "EMINENT HISTORIANS- THIEIR TECHNOLOGY, THEIR LIES AND THEIR FRAUD" पढें. वामपंथी इस पुस्तक को खारिज करते हैं क्योंकि यह एक भाजपाई द्वारा लिखी गई है लेकिन असल कारण है कि यह उनके भ्रष्ट और कुत्सित चेहरे को पूरी तरह सप्रमाण बेनकाब करती है.

अनूप शुक्ल said...

सुरेशजी, बुलाने न बुलाने की नीति के बारे में तो आयोजक बतायेंगे। लेकिन जितना मुझे पता है उसके अनुसार आपकी कुछ बातें गलते हैं।
१.जब व्यक्तिगत बुलावे पर प्रमेन्द्र प्रताप सिंह इस कथित सम्मेलन में पहुँचे तब उनका परिचय करवाना तो दूर, लोग उनसे कन्नी काटते रहे, ऐसा क्यों भाई?
प्रमेन्द्र कार्यक्रम स्थल पर पहले दिन शाम को दिखे। उस समय कार्यक्रम खतम होने था। उस सत्र का संचालन मैं कर रहा था। जैसे ही मैंने प्रेमेन्द्र को श्रोताओं के बीच बैठे देखा उनको बुलाकर उनका परिचय सबको दिया और उनको खुद अपना परिचय देने को कहा। प्रेमेन्द्र ने ऐसा किया भी। उन्होंने बताया भी कि वे मकान बनवाने में व्यस्त रहने के कारण आ नहीं पाये। अगले दिन भी वे बहुत कम देर के लिये आये।
२.यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की दशा-दिशा पर कुछ गम्भीरता होती तो केरल से ब्लॉगिंग कर रहे शास्त्री जी को ससम्मान बुलाया जाता, जो चाहते तो मलयालम में भी ब्लॉगिंग कर सकते थे, लेकिन वे भी "वामपंथी खाँचे" में फ़िट नहीं बैठते।
इस बारे में शास्त्रीजी खुद टिप्पणी कर चुके हैं कि उनको बुलाया गया था लेकिन वे आ न सके।
३.यदि हिन्दी ब्लॉगिंग पर वाकई कोई गम्भीर विचार विमर्श करना होता तो गुजरात से ब्लॉगिंग कर रहे संजय बेंगाणी को भी सादर बुलाया जाता जो कि चाहते तो गुजराती में भी ब्लॉगिंग कर सकते थे, लेकिन हिन्दी की सेवा कर रहे हैं… परन्तु दिक्कत ये है कि वे हिन्दुत्ववादी ब्लॉगर हैं…
संजय बेंगाणी को आने का निमंत्रण भेजा गया था लेकिन बहुत कम समय होने के कारण उन्होंने आने में असमर्थता व्यक्त की। संजय बेंगाणी के बारे में मैंने काफ़ी पहले एक लेख लिखा था उसका शीर्षक था -राष्ट्र रंग में डूबा एक ब्लागर। अब यह बात संजय ही बतायेंगे कि वे क्या अपने को हिन्दुत्ववादी ही मानते हैं।

बाकी आपकी और किसी बात पर मुझे कुछ नहीं कहना। ये तीन बातें सिरे से गलत लगीं इसलिये मुझे लगा आपको बता दूं। वैसे आपके इस लेख के बाद मैं सोच रहा हूं कि आप और लेख भी क्या अपनी धारणा के आधार पर ही लिखते हैं। आपका आक्रोश कल्पना की नींव पर ही टिका होता है। इन बातों की पुष्टि तो साथ के लोग प्रमेन्द्र, शास्त्रीजी, संजय बेंगाणी कर सकते हैं (या फ़िर उनके मेल के जबाब पेश किये जा सकते हैं) बाकी की आपकी तमाम बड़े-बड़े लोगों के बारे में लिखी जाने वाली बातों की पुष्टि कौन करेगा। सिर्फ़ यही सोच बन रही है कि शायद आप वे बातें भी अपनी कल्पना का सहारा लेकर बिना बातों की पुष्टि किये लिख जाते होंगे। संभव है मैं गलत हूं लेकिन इस मामले जिस तरह आपने बिना पुष्टि किये ये तीनों बातें लिखीं उससे यह सोचना सहज है।

रचना said...

कब तक ब्लॉगर जैसे न्यूट्रल शब्द का बटवारा जारी रहेगा । हिन्दी ब्लॉगर कहना कब शुरू होगा। ब्लॉगर मीट का कोई आयोजन कब होगा । २ साल से ब्लॉगर मीट नहीं हुई हैं । ब्लॉगर मीट यानी ब्लॉगर और ब्लॉग से सम्बंधित लोगो के विचारो का आदान प्रदान ।
अपनी किताब का विमोचन , अपनी रखी हुई गोष्ठी मे , सरकारी संसाधन के इस्तमाल से , ये सब ही तो हिन्दी साहित्य मे होता आ रहा हैं जमाने से । किताब का चर्चा हो गया , प्रतियाँ बिक गयी , आप साहित्यकार बन गए और क्या चाहिये , ब्लॉग का क्या हैं सक्रिए हैं तो ठीक नहीं हैं तो ठीक ।
रवि रतलामी से ही उदघाटन करवा लेते उनसे ज्यादा सुपात्र कौन हैं या हिन्दी के पहले ब्लॉगर को आलोक को कोई सम्मान ही दे देते { निमंत्रण तो दिया होगा !! } मैथिली गुप्त , ब्लोगवाणी को कोई सम्मान या धन्यवाद देने की क्या किसी को याद आयी , यूँ ब्लोगवाणी को लेकर सब पोस्ट लिखते रहे ।
और फिर अगर ये एक प्राइवेट पार्टी थी सरकारी संसाधनों के उपयोग से तो पहले ही कह देते , सार्वजनीक मंच पर निमंत्र्ण देने की भी जरुरत नहीं थी

हाँ सुरेश आप ने ये मान लिया की "कोई भी हिन्दी ब्लॉगर इतना भूखा-नंगा" बड़ा सुकून मिला वरना आप ने सबसे पहले विरोध किया था की ब्लोगवाणी पर सदस्यता शुल्क का याद आया क्या ??? !!!!

Vampanthi said...

वामपंथियों की संख्या बढ़ाने के लिए धन्यवाद!

Suresh Chiplunkar said...

आदरणीय अनूप शुक्ल जी,
लेख का मूल मुद्दा किसी को बुलाना या न बुलाना है ही नहीं… शास्त्री जी का स्पष्टीकरण आ ही चुका है, बेंगाणी जी का भी आता ही होगा…। लेकिन लेख के मूल मुद्दे अर्थात नामवर सिंह के बारे में जरा और टिप्पणियों का इंतज़ार कर लूं… फ़िर बात करेंगे। हिन्दुत्ववादियों की उपेक्षा जानबूझकर की गई अथवा "संयोग"(?) से हो गई इस बारे में भी स्पष्टीकरण आना बाकी है… देखते हैं…

Suresh Chiplunkar said...

आदरणीय अनूप जी,

1) "लेकिन आयोजनकर्ताओं का यह कर्तव्य था कि अधिकाधिक हिन्दी ब्लॉगरों को कम से कम इस सम्मेलन के बारे में एक "सूचना" तो भिजवाते।"
- कोई जवाब नहीं…

2) "जब तक स्वनामधन्य नामवर सिंह जी हिन्दी ब्लॉगिंग का अनुमोदन नहीं करेंगे तब तक उनका सारा जीवन और लेखन बेकार है इसलिये हिन्दी ब्लॉग पर नामवर सिंह ठप्पा लगवाने को बेताब हुए जा रहे थे।"
- कोई जवाब नहीं

3) "समूचे विश्व में ब्लॉगरों को धमकाने और उनकी अभिव्यक्ति का गला घोंटे जाने के खिलाफ़ कोई प्रस्ताव पारित हुआ या इसके बचाव के लिये कोई कदम उठाने पर विमर्श हुआ? (उलटा मान्यवर हमें धमका गये कि भाषा सुधारो, वरना राज्य सत्ता हस्तक्षेप करेगी)।"
- कोई जवाब नहीं…

4) "साहित्य, इतिहास, विश्वविद्यालयों, अकादमियों, शोध संस्थानों आदि में काबिज "अतिक्रमणकारी" नीतियाँ अपनाने वाले मठाधीशों की पोल खोलें… जो अब हिन्दी ब्लॉगिंग में भी "प्रभुत्ववादी घुसपैठ" और विभाजन करवाने के इच्छुक हैं… तथा राष्ट्रवादियों को अलग-थलग करने की राष्ट्रीय मुहिम में रत हैं।"
- कोई जवाब नहीं…

पहले इनके जवाब आ जायें… फ़िर मेरी "कल्पनाशक्ति" के मुताबिक उत्तर दूंगा… मैं तो एक अदना सा लेखक हूं… जिसके पास न तो "रिसोर्सेस" हैं न बड़े-बड़े सम्पर्क… सो कल्पना से ही काम करना पड़ता है… दुख की बात ये है कि इसी कल्पनाशक्ति को कुछ लोग तो पढ़ ही लेते हैं… :)

Sanjeet Tripathi said...

ह्म्म, मुझे अकिंचन को सूचना मिली थी अनूप शुक्ल जी द्वारा चैट के माध्यम से इस सम्मेलन की। फिर बोधिसत्व जी से फोन पर बातचीत के दौरान भी। इसके अलावा अन्य कोई सूचना या आमंत्रण तो मिला नहीं।

यह जानकर तो मुझे भी आश्चर्य हुआ था कि इस सम्मेलन में नामवर जी को मुख्य अतिथि के रुप में आमंत्रित किया गया था। ब्लॉग के संबंध में उनके विचार जानने के बाद भी!

खैर! चलता है, होता है। इसके अलावा क्या कहें।

jayram " viplav " said...

हां ,किसी वाद पर ना भी जायें तब भी नामवर सिंह का मुख्य अतिथि के रुप मे वहां होना बिल्कुल आपत्ति जनक लगा ।

ये कचरा छापने वाले लोग कितना भी उपेक्षित करे कोइ चिन्ता नही ! हम भी इनकी उपेक्षा करते हैं ।

दरअसल , इनके अन्दर क्षमता नहीं है की अपने विचारों के विरुद्ध कुछ सुन सकें . दर्जनों चिट्ठाकारी के मठाधीशों में से छाँट कर तीन -चार नाम का उल्लेख कर रहा हूँ वो भी संकेत के रूप में ...... आप सभी समझ जायेंगे .* एक हैं श्रीमान जो गाली -गलौज से लेकर भारत विरोधी तमाम चीजें अपने तथाकथित सबसे बड़े हिंदी के सामुदायिक ब्लॉग पर छापते हैं और अब मीडिया घरानों में क्या हो रहा इस कनफुसकी को सार्वजनिक कर दलाली का न्य धंधा शुरू किया है .
* दुसरे हैं श्रीमान भी पहले के नक्से कदम पर चल रहे हैं .इनके ब्लॉग और साईट को देखें तो संडास से कम नहीं लगेगा .लोकप्रियता के तमाम हथकंडे ज़माने में माहिर हैं .

*एक और श्रीमान है साहित्य की रोटी खाते हैं . मैं इन्हें साहित्यकार बिचौलिया कहता हूँ . और भी कई एक नाम हैं जो उस ब्लोगर सम्मलेन में जमा थे .


अंत में एक बात , वहां कई लोग ऐसे भी थे जो सम्मलेन में जाने के हकदार थे .आशा है अच्छे लोग मेरी बात को अपने ऊपर नहीं लेंगे !


मुझे तो तब पता चला जब एक बड़े और नाम चीन ब्लोगर की लाइव रिपोर्ट पढ़ा . लाइव माने सम्मलेन के दौरान ही रपट भेजी जा रही थी ब्लॉग पर .



सुरेश जी , एक मजेदार घटना बताता हूँ आपको . एक कबाड़ी को हमने अपने सामुदायिक चिट्ठे पर लिखने का आमंत्रण भेजा .उन्होंने स्वीकार किया और एकाध पोस्ट भी लिखा .इसी बीच एम् ऍफ़ हुसैन औए सच्चिदानंदन की कविता को लेकर चल रहे बहस को देख कर जनाब भाग खड़े हुए . और अपने ब्लॉग पर एक पोस्ट भी लिख डाली . उक्त सज्जन ने उस बहस को कुत्ता घसीटी नाम दिया जबकि अगर आप उस बहस को पढेंगे तो पता चलेगा ऐसी बहस बहुत कम मिलती है हिंदी ब्लॉग्गिंग में . पोस्ट से ज्यादा बड़ी -बड़ी टिप्पणियाँ , अलग-अलग विचारधारों के लोग और संयत भाषा का प्रयोग . तब मैंने उस सज्जन को मेल में लिखा " आप भगौड़े हैं . क्योंकि आप तर्क से वार नहीं कर सकते . केवल अपनी विचारधारा के लोगों को एक जगह इकट्ठा करके लिखना और पढ़ना कोई बौद्धिकता की बात नहीं है . विभिन्न वादों के बीच में आप जैसों ने संवाद शुन्यता बना दी है . और इसी संवाद शुन्यता को भरने के लिए हमने अपने चिट्ठे को सामुदायिक किया था ताकि हर विचारधारा के लोग बेहिचक होकर लिखें और आपस में न एक स्वस्थ बहस हो सके . लेकिन कबाड़ / कूडेदान / और संडास आदि में रहने वाले संकुचित मानसिकता वालों को इतना खुलापन नहीं पचेगा . वैसे हीं जैसे दिन रात एसी की हवा खाने वाले को स्वच्छ प्राकृतिक हवा से सर्दी हो जाती है .

SHIVLOK said...

priya suresh ji,
SADAR PRANAM
Aapkii is post ko padhne ke bad mujhe to bhot dar lag raha hai. Mujh jaise bechare ka kya hal hoga? main to kuchh bhi nahin janta. sahi dhang se post likhna bhii nahin aata hai. Kal se hii blogging chalu kii hai. ekdam navjat shishu ki tarah hun. pahla hii post likhii hai. kripa karke mujh navjat ko sambhal lena .

http://shivlok.blogspot.com/

Is ek din ke navjat ko sambhal lena.
Dhanyavad, namaskar, jai hind.

Vivek Rastogi said...

पता नहीं ये ब्लॉगरों को साहित्यकारों को बुलाने का कीड़ा क्यों काटा, अरे भाई लोगों हम लोग साहित्यकार नहीं है, "ब्लॉगर हैं", अगर साहित्यकार होते तो "ब्लॉगर" क्यों होते।

अरे कोई तो समझाओ इन महारथियों को जो बजाय ब्लॉगरों का साथ देने के नामी साहित्यकारों की चाटुकारिता करके साहित्यकार बनने की कोशिश कर रहे हैं। उनका भी विरोध किया जाना चाहिये और हुक्का पानी बंद कर देना चाहिये।

बाकी तो ये सभी महारथी ही जानें। हम तो अदने से ब्लॉगर हैं और हमें किसी संगोष्ठी में जाने का कीड़ा नहीं काटा है, इसलिये हम अपना चीखना चिल्लाना यहीं बंद करते हैं।

वैसे एक सवाल यह भी है कि "क्या हम बुलाये जाने योग्य थे" या "ये जो लोग चिल्लाये जा रहे हैं" "वो भी"।

गिरीश बिल्लोरे 'मुकुल' said...

अब किधर जाएं क्या करें कईयों के साथ यह संकट है
सो ग्यानरंजन जी से पूछा जा सकता है भाइयो लोकेषणा
कहास दिखास छपास दिखास जैसे तत्वों का रचनाकार की देह
में जीन के साथ समाहित हैं उसके चलते जो भी हो रहा है
ठीक ही है

अनूप शुक्ल said...

सुरेशजी, जो जो लोगों ने वहां बोला उसका अधिकतर विनीत कुमार के ब्लाग में मौजूद है। आप उस पर देख सकते हैं। निमंत्रण और नामवरजी बारे में आयोजक बता सकते हैं। बाकी मेरी समझ में जो बातें उन्होंने कहीं वे शाकाहारी और शिक्षाप्रद बातें किसी भी मौके पर बोली जा सकती हैं। अधिकार के साथ कर्तव्य, स्वतंत्र बनाम स्वछंद या फ़िर इसी तरह की और बातें। नामवरजी को अब कुछ पाने को शेष नहीं है। वहां आकर उनके कद में कोई तमगे नहीं लग गये होंगे। अस्सी साल की उमर में जब हम पहुंचे शायद तब चलने-फ़िरने बोलने-चालने लायक न रहें। नामवरजी गलत-सही ही सही कम से कम इस विधा का ककहरा सीखने का प्रयास करते दिखे।
इसमें अगर आप अपने घर बैठे-बैठे कोई षड़यंत्र समझते हैं तो यह आपकी समझ है।

ब्लागिंग ऐसा अभिवयक्ति का माध्यम नहीं है जिसका कोई नामवर या नामधारी या मठाधीश अपहरण कर सके। ब्लागिंग को किसी के ठप्पे की जरूरत है यह जो कोई भी सोचता है वह गलतफ़हमी में है।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

भैया जी हमें तो आज आपसे ही पता चला कि इलाहाबाद में ऐसा कोई सम्मलेन था, यदि पता पहले चल जाता तो हम तो जरूर जाते, एक तो मान्यवर नामवर सिंह से मुक्कालात नहीं नहीं मुलाक़ात करना था. दूसरे हम तो इलाहाबाद के दामाद हैं तो दो एक दिन ससुराल से खातिरदारी भी करवा आते. खैर....
हम तो हिंदी में कूड़ा ही लिखेंगे, हिंदी वाले जो ठहरे, ये तो नामवर सिंह जैसे लोग बताएँगे कि सही क्या है, गलत क्या है.....
चलो मूड क्या खराब करना, प्रमेन्द्र जी के साथ जो हुआ उस पर हम सब अपना विरोध जरूर करेंगे....आखिर ताकत दिखाना भी चाहिए.

मुनीश ( munish ) said...

Some people simply had fun there @the cost of tax payer's money. Having fun is no sin ,but this is not the way certainly. This blog meet was an attempt to sabotage the momentum being built by blogging .A malicious attempt of dividing bloggers among themselves !

Vishal Pandey said...
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AlbelaKhatri.com said...

आदरणीय सुरेशजी..........

आपकी वेदना अकारण नहीं है ।

आपकी पीड़ा में हिन्दी ब्लॉगिंग का हितचिन्तन नज़र आता है.......

इस प्रखर स्वर के लिए आपको बधाई !

गौतम राजरिशी said...

मेरे ख्याल से तो इस संगोष्ठी का आयोजन ही अपने-आप में बहुत बड़ी बात थी। कम-से-कम एक शुरूआत तो हुई है। अब कमी-बेसी, रूठना-मनाना किस आयोजन में नहीं होता। अपने ही घर में अपने ही शादी-विवाह जैसे व्यक्तिगत आयोजन में अपने ही रिश्ते-नाते नहीं रूठते, बुरा मानते हैं क्या?

एक पहल हुई है, जो प्रशंसनीय है...

Varun Kumar Jaiswal said...

@ सुरेश जी

जिन बातों से आपको आपत्ती है वो चाहे जायज हों या नाजायज लेकिन इतना तो तय है कि यह सम्मेलन अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रहा | अगर हमें किन्ही भी बातों से परहेज़ है तो यह प्रयास होना चाहिए उसकी बराबरी का अपना स्तर बना लेवें |

बुद्धिजीवी ? वर्ग हमेशा हिंदुत्व को उपेक्षित करके ही सम्मान पता रहा है ऐसे में उसके इस व्यवहार पर हैरानी क्यों ?

परमेन्द्र जी युवा हैं ( मात्र २२ - २३ वर्ष के ) सो बहुत से उम्रदराज़ ब्लागरों से भरे हुए सम्मेंलन में उनको सम्मान कैसे मिल सकता है ? जबकि देश की परंपरा ही युवाओं की उपेक्षा करने की रही है |

हिंदुत्व के प्रति सिर्फ लेख लिखने से काम नहीं चलेगा बल्कि हमें भी ऐसे सम्मेलन स्वयं एकत्र होकर आयोजित करने होंगे तब जाकर कही हिंदुत्व के प्रति ब्लोगिरी योगदान की गूँज सुनायी देगी | इस पर अपनी राय अवश्य दें |

जिस दिन हिंदुत्व के प्रति समर्पण का भावः मन में जग उठा था उसी दिन से हमने स्वयं को उपेक्षा - प्रूफ़ समझ लिया है | अतः निश्चिंत रहें |


|| " सत्यमेव जयते " ||

mahashakti said...

इस विषय पर मै तो कुछ कहने लायक ही नही रहा।

आप हो, अनूप जी हो या सिद्धार्थ जी किसी के लिये असम्‍मान की भावना हो ही नही सकता।

मेरी स्थिति( उम्र, शिक्षा, सामजिक स्थिति) के हिसाब से निमत्रण उतना मायने नही रखता, सिद्धार्थ भाई का प्रेम ही था मुझे कार्यक्रम में पहुँचा पड़ा।

वैचारिक मतभेद कहीं भी हो सकते है, पर मेरा मानना है कि वैचारिक मतभेद को आपसी व्‍यवहार में नही आने देना चाहिये। क्‍योकि कार्यक्रम तो खत्‍म हो गया किन्‍तु इसके बाद की यह स्थिति बाद स्थिति को मै झेल पाने की स्थिति में न ही हूँ।

हाँ, चिट्ठकारी में यह आपकी यह चिंता जायज हो सकती है नामवर सिंह की चिट्ठकारी में भूमिका, इस पर स्‍वस्‍थ चर्चा की जा सकती है। क्‍योकि ब्‍लागरों के मध्‍य यह चर्चा होना स्‍वाभाविक है कि ब्‍लागर किसे पचा पाते है किसे नही ?

कार्यक्रम के प्रारम्‍भ में पहुँचने पर कुछ असहज स्थिति थी किन्‍तु धीरे धीरे कुछ परिचित ब्‍लागर मिले जिसने आत्‍मसात हो कर अच्‍छा लगा।

आपने कहा कि महाशक्ति के सम्‍बन्‍ध में कहा कि आपका भावात्‍मक लगाव है, आप सभी का स्‍नेह है कि आप बना हुआ हूँ।

मेरे लिये गलत आप सिद्ध होगे या अनूप जी या सिद्धार्थ भाई हार तो आपके महाशक्ति होगी, बाते यही खत्‍म होनी चाहिये।

Suresh Chiplunkar said...

भाई प्रमेन्द्र आपको इतनी ग्लानि महसूस करने की आवश्यकता नहीं है… पोस्ट की केन्द्र में भले ही आप हों, लेकिन अब बहस धीरे-धीरे आकार ले रही है और मुद्दों पर बात होने लगी है… कुछ पाठक इसे मेरी नाराज़गी से जोड़कर देख रहे हैं, लेकिन यह व्यक्तिगत नाराजगी नहीं है यह मुद्दा आधारित नाराज़गी है… पूरे सम्मेलन की सबसे आपत्तिजनक बात यानी नामवर सिंह की उपस्थिति थी, संघ-भाजपा को गरियाने वाले व्यक्ति को ब्लागर सम्मेलन का मुख्य अतिथि बनाना जिसका ब्लागिंग से कोई लेना-देना नहीं हो…, अधिकाधिक ब्लागरों को कम से कम ईमेल द्वारा सूचना तो दी ही जा सकती थी जो कि नहीं दी गई, तथा जानबूझकर अथवा "संयोग"(?) से हिन्दुत्ववादी ब्लागरों की उपेक्षा, यही मुख्य मुद्दे हैं… रही बात किसी को आधिकारिक रूप से बुलाने या न बुलाने की तो यह पूर्णतः आयोजकों का अधिकार है।

आप इस बहस को अपने दिल पर न लें… त्रिपाठी जी आपसे नाराज़ नहीं होंगे, उन्हें जो भी बुरा-भला कहना होगा, मैं अपने माथे झेल लूंगा…। आदरणीय अनूप जी के भी जवाब आ चुके हैं, आप सिर्फ़ सिम्बालिक तौर पर ही इस पोस्ट में हैं, बड़े मुद्दे तो अलग हैं…। फ़िर भी यदि आप चाहते हों तो मैं या तो इस पोस्ट को हटा लूं (आपसे दोबारा माफ़ी के साथ) या फ़िर यह बहस बन्द करके आगामी टिप्पणियों को हटाना शुरु कर दूं… जैसा आप कहें।

amitabh tripathi said...

इस पूरी कवायद के दो निहितार्थ हैं। पहला, हिन्दी ब्लागिंग काफी तीव्र गति से वैकल्पिक पत्रकारिता और साहित्य के रूप में उभर रही है। दूसरा नामवर सिंह जैसे लोग ब्लागिंग विधा की भी ठेकेदारी लेना चाहते हैं जैसा कि इन्होंने हिन्दी साहित्य में और पत्रकारिता में ले रखी है। इसका समाधान यही है कि सही मायने में हिन्दी ब्लागर सम्मेलन शीघ्र ही आयोजित किया जाये। मैं शीघ्र ही इस सम्बन्ध में अपने मित्रों से चर्चाकर योजना बनाता हूँ।

संजय बेंगाणी said...

मुझे सम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए कहा गया था, मगर बहुत कम समय पहले कहे जाने से मैं वहाँ जा पाने में असमर्थ था. अतः विनयपूर्वक मना कर दिया. न जाने का दुसरा कारण विषय का बचकानापन था. आयोजक मुझे क्षमा करें मगर इतना खर्च उठा कर हम क्या चर्चा करने वाले थे? अच्छा होता ब्लॉगिंग के भविष्य व वर्तमान की चुनौतियों पर कोई चर्चा होती. तो मन भी बनाते.

शेष बाद में टिप्पणी करता हूँ.

जी.के. अवधिया said...

इस बहस से मुझे कुछ विशेष लेना देना नहीं है किन्तु एक प्रश्न है मेरा किः

कौन है हिन्दी ब्लॉगर?

जिसका ब्लॉग संकलक में है वह?
या जिनका ब्लॉग सबसे ज्यादा पढ़ा जाता है वह?
या जो रोज एक पोस्ट लिखता है वह?
या जिसने कम से कम कुछ पोस्ट लिखे हैं वह?
या जिसने एक हिन्दी ब्लॉग बनाया है और जिसका नाम गूगल की प्रोफाइल सूची में है वह?

क्या है हिन्दी ब्लॉगर की परिभाषा?

भारत में 29,30,000 ब्लॉगर प्रोफाइल्स हैं (देखें - प्रोफ़ाइलें ब्राउज़ करें), इनमें से एक बड़ी संख्या वाले लोगों के हिन्दी ब्लॉग्स हैं। तो इस हिसाब से तो वे भी हिन्दी ब्लॉगर हुए। पर क्या हम सभी को जानते हैं?

विवेक सिंह said...

'मजे की बात तो यह है कि भाजपा-संघ को पानी पी-पीकर कोसने वाले नामवर सिंह, भाजपा शासित मध्यप्रदेश के भारत भवन के सरकारी कार्यक्रम में भी मुख्य अतिथि बन जाते हैं'

यह मजे की बात है तो कोलाहल क्यों ?

पंकज बेंगाणी said...

सुरेशजी की भावनाएँ गलत नहीं होती परंतु वे उत्तेजित बहुत जल्दी हो जाते हैं ऐसा मुझे लगता है.

यह पोस्ट अनावश्यक है. सुरेशजी को लिखने से पहले कम से कम शाष्त्रीजी और संजयभाई से पूछना तो था!

सुरेशजी छानबीन कर लिखने वालों मे से है, इसलिए उनकी यह पोस्ट देख अचंभित हूँ.

संजय बेंगाणी said...

@ अमिताभ त्रिपाठी. हिन्दी ब्लागर सम्मेलन शीघ्र ही आयोजित किया जाये।

प्रतिक्षा रहेगी. विषय वस्तु तकनीकी तथा थोड़े गम्भीर किस्म के रखें. विशेषज्ञों द्वारा विषय आधारीत प्रस्तुति हो.

Suresh Chiplunkar said...

मेरे दुर्भाग्य से पंकज बेंगाणी भी, इस पोस्ट के "असली निहितार्थ" को समझने में विफ़ल रहे…

Common Hindu said...

I agree with Varun Kumar Jaiswal


" हिंदुत्व के प्रति सिर्फ लेख लिखने से काम नहीं चलेगा बल्कि हमें भी ऐसे सम्मेलन स्वयं एकत्र होकर आयोजित करने होंगे तब जाकर कही हिंदुत्व के प्रति ब्लोगिरी योगदान की गूँज सुनायी देगी |"

संजय बेंगाणी said...

सीधी स्पष्ट बात. भारत का हित चाहने वाले अधिकाधिक लोगों को ब्लॉगिंग से जोड़ना लक्ष्य होना चाहिए, क्योंकि यही भविष्य है. जब समान विचारधारा वाले को पढ़ते हैं तो सम्बल मिलता है. मन में दृढता आती है.

आप यहाँ आने वाली प्रतिक्रियाओं से अचम्भित न हों. आपसे अपेक्षाएं बहुत अधिक है. वरना कोई कुछ भी लिखता है किसे फर्क पडता है? मगर यहाँ पड़ रहा है. लोग आपको गम्भिरता से लेते है.

@अनुप शुक्लजी. मुझे कोई हिन्दुत्त्ववादी कहे या राष्ट्रवादी कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैं धर्मनिरपेक्ष कहलवाने की बेकार लालसा नहीं रखता. जो हिन्दुओं के हित में वह लिखता रहुंगा. जो देश हित में वह भी लिखता रहुंगा. देश हित ही हिन्दु हित होना चाहिए. भारत के किसी अहित में हिन्दुओं का हित नहीं हो सकता. दुसरे अपनी जाने.

dinesh dhawan said...

आप लफ्फाज नहीं है, दूसरों की हाहा हीही, हूहू करके मौज नहीं लेते इसलिये आपसे तो अपेक्षायें हैं,

विदूषकों से तो कोई ये नहीं पूछता कि आप वहां गये थे तो चाय पोहे जलेबी खाने के अलावा क्या किया!

K. D. Kash said...

@ सुरेशजी

ये तो होना ही था आप इस पर ध्यान ना दे मेरे जैसे बहोत पाठक आपका लिखा पढते है ! मगर
ओफीस में होने के बजह से टिप्पणी नही कर पाते !

अभी जरुरत है तो एक होने की लेकिन दुर्भाग्य से हम बिखरे हुए है !
कहा जाता है की आच्छे लोग होते बहोत है मगर बिखरे हुए इंको एकत्र करनेके लिए आप ही कोई हल निकलिए

आप को भी पता होगा की आप जैसी सोच बहुतो की है बस वो जाहीर नही कर पाते वाम्पन्थिओ के डर के बजह से

आप के प्रयास से शायद ये काम हो सकता है

K. D. Kash said...

Varun Kumar Jaiswal
& Common Hindu

दोनोसे सहमत

संजय बेंगाणी said...

@ विशाल पाण्डेजी.

यहाँ कोई मठाधीश नहीं हो सकता. ताल ठोक कर करो ब्लॉगिंग. वास्तव में किसी को भी ब्लॉगिंग से रोकना या हाशिये पर डाल देना सम्भव नहीं. तकनीक किसी की जागीर है न ताबे में रहती है. सुरेशजी को इतनी भारी संख्या में लोग पढ़ते है, बताएं ये किसकी चमचागीरी करते है? वास्तव में सामग्री पढ़ी जाती है. और विश्वसनीयता भी माने रखती है.

दुसरी बात गूगल से पैसा खाने कि तो आपसे इस मुद्दे पर भी असहमती है. मुझे बताएं कैसे गूगल से पैसा खाया जा सकता है? मैं भी खाना चाहता हूँ. आपने जिन दो लोगो की ओर इशारा किया है उनके योगदान के बारे में सम्भवतः आपको ज्ञात नहीं है. हम में वैचारिक भिन्नता हो सकती है, मगर किसी के योगदान को नकार देना गलत है.

अर्शिया said...

अरे भई, वहां तो मुस्लिमवादी ब्लॉगर भी नहीं बुलाए गये थे।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं, राष्ट्र को प्रगति पथ पर ले जाएं।

Ashish Shrivastava said...

सुरेश जी,

आपकी इस पोष्ट से मै सहमत हूँ या नही यह दूसरी बात है! आपको अपने विचार व्यक्त करने की पूरी आजादी है ! ब्लाग या चिठठो की इस दूनिया को किसी मठ , गुट और मठाधिसो की जरूरत नही है|

हिन्दी ब्लागीग किसी साहित्यकार या मठाधीस ने शुरू नही की थी ! कुछ लोगो को इटरनेट पर हिन्दी को बढावा देने का भूत चढा था जिनकी बदौलत आज इतने चिठ्ठे है, नेट पर हिन्दी की उपस्थिती है| और वे लोग आज भी अपने आप को साहित्यकार नही कहते है|

दुःख इस बात का है कि आपके इस चिठ्ठे पर स्वस्थ बहस करने की बजाये विशाल पाण्डे अपनी घटीया सोच का प्रदर्शन कर जाते है और आप उस टिप्पणी को प्रकाशित कर देते है|

mahashakti said...
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mahashakti said...

मै किसी और विषय पर बात नही रखूँगा जो मैने कहना था कह दिया और जिससे मेरी शिकायत था उसका निवारण भी हो गया है, रही बात तो यह मेरे लिये कोई विषय नही था। बस मेरा यह मठाधीशी को लेकर अपनी बात रखना भर है।


मठाधीशी किसे कहते है यह परिभाषा मठाधीश ही दे पायेगा। कुछ मठाधीश ऐसे है जिन्‍होने कुछ चुन्निदा ब्‍लागरो का विनाश करने का ठेका तक ले रखा है।

तुम्‍हारा नाम न ब्‍लाग जगत में रहने देगे और नही कहीं अन्‍यत्र, कुछ लोग ऐसी मंशा से काम कर रहे है।

विकीपीडिया पर एक मात्र वही बचते है जिनके पास ब्‍लागरो के उनमूलन का ठेका है। अगर चिट्ठकारी में विकीपीडिया पर अनूप शुक्‍ल जी की प्रोफाईल बन सकती है तो किसी अन्‍य ब्‍लागर की क्‍यो नही ? अगर एक ही बंदा घम घूम कर अपनी ताकत का प्रदर्शन करे तो इसे हम और क्‍या कर सकते है ?

गूगल के समूह को अपनी सम्‍मपत्ति घोषित कर अपनी मठाधीशी कर ही रहे थे एक विकी भी बचा था उसे भी अपने गिरफ्त में लिये घूम रहे है।

Ashish Shrivastava said...

@महाशक्ति
ब्लागर गूगल की बपौती है, इसे कोई भी अपनी जेब मे लेकर नही घूम सकता है ! इस पर ब्लाग गूगल की मेहरबानी से जब तक वह चाहे रहँगे !
वीकी एक सामुहिक प्रयास है कोई भी अपना योगदान दे सकता है| आप को किसी ने नही रोका है कि आप किसी चिठ्ठाकार की प्रोफाइल ना बनाये ! आपको ऐसा लगता है कि और भी लोगो के प्रोफाइल इसमे होना चाहिये आप आगे आयेँ और प्रोफाइल बनाते जाइये| हाँ आपको वीकी के निर्देशो का पालन करना होगा|
यदि आप यह जानना चाहते की वीकी पर कौनसा पृष्ठ किसने बनाया उस पृष्ठ पर पूराने अवतरण की कडी है उससे आप जान जायेँगे कि यह पृष्ठ किसने बनाया है, किसने क्या परिवर्तन किये है !

Satyajeetprakash said...

जिन्होंने ब्लॉग पर आज तक कोई पोस्ट न की हो, वो क्या जाने ब्लॉगिंग की महिमा.
जहां तक साहित्य होने या नहीं होने का सवाल है तो लोग ब्लॉग पढ़ते हैं यही उसके साहित्य होने का सबूत है.
मठाधीश तकनीक और तकनीक के जरिए लेखन को साहित्य मानते ही नहीं है और प्रकाशकों के दफ्तरों पर कब्जा जमाये रखते हैं.
कम से कम अब हमें अपना उपन्यास या अन्य रचना छपाने के लिए किसी प्रकाशक के पास नहीं जाना पड़ेगा.
हम अपनी रचना खुद छाप सकते हैं और नेट पर प्रकाशित कर सकते हैं जिसे दुनिया भर के लोग पढ़ेंगे.

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

भारत मैं ज्यादातर सम्मलेन, किसी विशिष्ट व्यक्ती और आयोजकों का show होता है | इलाहाबाद ब्लॉगर सम्मलेन भी आज के fashion show की तरह ही था .... जिसपे cat walk करने के लिए मुख्य अतिथि थे डॉ. नामवार सिंह | ये वही नामवार सिंह जी हैं जिनसे आम जन शायद ही पढता हो ... लेकिन हिंदी साहित्य मैं इनका कद उंचा है ... खैर ये तो होता है |

अच्छे और सच्चे ब्लागरों की उपेक्षा तो होंनी ही थी ... ये मठाधीश जो हमारे रहनुमा बन बैठे हैं |

हिंदी ब्लॉग्गिंग की एक बड़ी तकलीफ या दिक्कत ये है की अभी भी हिंदी का कोई बढिया स्पेल चेकर उपलब्ध नहीं है | हिंदी स्पेल चेकर पे शायद ही चर्चा हुई होगी .... |

ऐसे सम्मेलनों से हिंदी ब्लॉग्गिंग के उद्धार की आशा यदि हम करते हैं तो ... हिंदी ब्लॉग्गिंग का भविष्य अंधकारमय ही होगा | बाकी तो सुरेश जी से ही सहमत हूँ |

Dr. Anil Kumar Tyagi said...

सुरेश जी जलते हुऎ दिये को देखने के लिये प्रकाश की आवश्यकता नही होती, वह तो स्वयं जलकर अपनी उपस्थिति दर्शाता है। कोई भी प्रतिभा हो यदि वो प्रमाणिक है तो अपने बलबूते पर अच्छे से उभरती है, और अपना सहारा भी स्वयं ही खोज लेती है। वैसे भी सभी हिन्दूवादियों, संघियों, को मैं A+ खून की तरह मानता हूं जो काम तो सभी के आ जाता है किन्तु यदि इसे आवश्यकता होती है तो A+ ही काम आता है। मै आपकी भावना को समझते हुऎ कहना चाहता हूँ कि एसे लोगों के बारे ज्यादा विचार विमर्श करना इन्हें महत्व देना ही है। जो व्यक्ति 80 वर्ष का हो गया उसे अभी भी सम्मान पाने की तृ्ष्णा हो उसे कोइ क्या सुधार सकता है।
माया मरी न मन मरे, मर-मर गयी शरीर।
मन की तृष्णा ना मरी कह गये दास कबीर।।
फिर वो मान सम्मान चाहे हिन्दी ब्लागर ही क्यों न दे।

ePandit said...

आपकी इस बात से सहमत हूँ कि कम से कम सूचना तो सभी को दी जानी चाहिए थी। .यहाँ सारी रिपोर्टें बाद में प्रकाशित हुई। सूचना चिट्ठाकार समूह या फिर कभी हिन्दी ब्लॉगर मीट का चिट्ठा बनाया गया था (http://hindibloggersmeet.blogspot.com/) उस पर दी जा सकती थी।

आपकी साहित्य में वामपन्थी मठाधीश वाली बातों से सहमत हूँ। कुछ बातें उचित हैं पर कुछ बातें आयोजकों की मजबूरी या कोई और वजह हो सकती है। विस्तार से टिप्पणी बाद में करेंगे।

बाकी सूचना या निमन्त्रण तो हमें भी नहीं मिला, शायद भूतपूर्व ब्लॉगर होने की वजह से बिरादरी-बाहर हो गए हैं। :)

ऊपर विशाल पाण्डे जी ने गलत लोगों पर हमला बोल दिया। हम भी उनसे असहमत हैं, जिनकी तरफ उन्होंने इशारा किया है हम भी उनके योगदान के कायल हैं। खासकर एक तो बिल्कुल ही सज्जन और विवादों से दूर रहने वाले हैं।

अमित said...

सुरेश जी,
कहीं यह पोस्ट अधिक टिप्पणियाँ बटोरने के लिये तो नहीं लिखा गया है क्योंकि अभी तक ब्लॉगरों में हिन्दुत्ववादी या गैर हिन्दुत्ववादी का विभाजन नहीं हुआ था। इस पोस्ट के बाद शायद हो जाय। किसी घटना को उसके सामयिक मूल्य से ही आँका जाय तो ठीक है। नामवर जी से इतनी चिढ़ क्यों? उन्होने तो अपने संबोधन में एक शब्द भी मार्क्सवाद का या सर्वहारा के अधिनायकवाद का नहीं कहा बल्कि उन्होने ने स्वीकार किया कि इसे (चिट्ठाकारी को)रोका नहीं जा सकता। उनकी चिन्ता इसके दुरुपयोग को लेकर थी जो किसी भी जिम्मेदार व्यक्ति की हो सकती है। बोधिसत्व जी ने जरूर यह कहा कि यह खाये-पिये और अघाये लोगों की विधा है। हो सकता है कि कुछ समय के लिये उनका यह कहना सही साबित हो लेकिन बहुत जल्द ही यह जनसाधारण का भी औजार होगा। आप ने सारा गुस्सा नामवर जी को लेकर उतारा है लेकिन नामवर जी का समर्थक न होते हुये भी मैं यह स्वीकार करता हूँ कि उनका कद प्राप्त करने में एक जीवन लगता है। नामवर किसी की दया पर नामवर नहीं हैं अगर आपने उनके जीवन के बारे में जाना हो तो।
मैने यह अनुभव किया है कि धुरदक्षिणपंथियों और धुरवामपंथियों दोनों में ही सहनशीलता और जनतन्त्रात्मक मूल्यों की कमी होती है। सुरेश जी इसी ग्रंथि से प्रभावित हैं। इतना तनाव लेकर आप क्यों जीते हैं। बहुत कुछ है जिससे खुश हुआ जा सकता है। आप इस तरह दबाव बना कर अगले सम्मेलन में अपनी जगह पक्की नही कर सकते।
आपको मनःशान्ति प्राप्त हो (कुछ बुरा लगा हो तो क्षमा)
सादर
(हाँ! आप मुझे नहीं जानते। इस आयोजन में सिद्धार्थ जी के सहयोग में मैं भी था।)

संजय बेंगाणी said...

हिन्दी वालों की एक कमी यहाँ लिख देना चाहता हूँ, लगे हाथ अपना मन भी हल्का हो जाए तो क्या बूरा है?


हिन्दी में यह नहीं, वो नहीं गाने वाले उन्हे उपलब्ध करवाने के लिए अपना क्या योगदान देते है, पहले यह देखे. सब कुछ अपने आप नहीं हो जाता.

सुरेशजी बहुत लिखते है. क्या जरूरत है लिखने की? बस इतना ही लिख दे कि ऐसा लिखने वाला कोई नहीं है यह दूर्भाग्य की बात है. बस हो गया काम खत्म. मगर ऐसा नहीं है. काम करना पड़ता है. सुरशजी को लिखना पड़ता है. और इसमें मेहनत लगती है. कृपया आगे से शिकायत न कर काम करें.

दर्पण साह "दर्शन" said...

इस सम्मलेन की एक सादी सूचना पाने का अधिकार तो हमारा भी बनता था, पर मैंने सोचा कि चूँकि मै शायद बहुत जूनियर ब्लोगेर हूँ तो छोड़ो भाई, सम्मलेन की शुभकामनाएं मनाओ...

Shredhar ji ki tippani meri bhi !!

SANJAY KUMAR said...

Very good ,


You thoroughly exposed those traitors.
But in your opening paragraph, the adjective given for river Ganga and Yamuna appears to be seen through SECULAR LENS.

Had you used your HINDUTVADI LENS, you would not have used such words for our holy rivers.

Being a HINDU I shall not write VARANASI as dirty, poor and polluted city, for me it is always"PARAM PAVAN SHIV KI NAGARI".

as you write UJJAIN as Mahakaal ki Nagari.

You may grievances with others but please spare our holy rivers in this business.

Hitesh Janki said...

(बोधी अंकल ने इस टिपपणी को नही छापा, इसलिये यहाँ डाल रहा हूँ।)

इस सम्मेलन मे भाग ले रहे विशुद्ध ब्लागरो के नामो की चिट एक बक्से मे डालनी थी और फिर तीन नाम चुनकर मुख्य अतिथि और दो सामन्य अतिथि बनाने थे। उन्हे मंच मे बिठाने की जगह सब लोगो के बीच बिठाना था।

नामवर जी का स्वागत करिये पर उनसे कहिये दादा, हिन्दी ब्लागिंग को जान लीजिये पहले। उन्हे रवि रतलामी की बेसिक क्लास मे बिठा देना था। कुछ सीखते और फिर ब्लाग बनाते तो हम समझ जाते कि वे हमारे क्षेत्र के है। इससे ऐसी अफरा-तफरी नही मचती।

उनके मुख्य अतिथि बनने से ऐसे हुआ जैसे किसी संगीत समारोह मे धोनी को बिठा दिया गया हो। धोनी की गुणवत्ता पर कोई प्रश्न नही पर वह कहने लगे कि सरगम के सात स्वर उसने इजाद किये है यह बात किसी को हजम नही होगी। नामवर जी के साथ ऐसा ही हुआ।

दिखिये रवि रतलामी और अनूप शुक्ल पहले विशुद्ध साहित्यकार है और फिर ब्लागर। रवि रत्लामी शुरु से छपते रहे है। अनूप कन्हैयालाल नन्दन के भाँजे है। ब्लागिंग मे तो ये हाल मे आये है। हमारे आस-पास ऐसे लोग बडी संख्या मे है जो केवल ब्लागर है। साहित्य के बन्धनो से मुक्त। ज्ञान दत्त, शिव, भाटिया जी, संजय बैगाणी, अरुण अरोरा, उनमे से कुछ है। ब्लागर सम्मेलन मे इन जैसो को सामने रखना चाहिये। यदि आप ब्लागिंग मे उतरे घिसे-पिटे साहित्यकारो को लायेंगे तो वे वहाँ की गन्दगी यहाँ फैलायेंगे। जैसा वे कर भी रहे है।

बी एस पाबला said...

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बधाई।

बी एस पाबला