Friday, September 4, 2009

माननीय सुप्रीम कोर्ट जी, "उन्हें" मुआवज़ा और पेंशन, हम कहाँ जायें? Compensation to Criminal and Pension to Terrorist

पाकिस्तानी आतंकवादी अज़मल कसाब को मिलने वाली सुविधाओं और उसकी मांगों के बारे में तथा सरकार और अन्य "दानवाधिकार" संगठनों द्वारा उसके आगे बिछे जाने को लेकर पहले भी काफ़ी लिखा जा चुका है (ये और बात है कि चाहे कोई भी राष्ट्रवादी व्यक्ति कितनी ही आलोचना कर ले, कांग्रेस और हमारे हिन्दुत्वविरोधी मीडिया पर कोई असर नहीं पड़ता)। इसी प्रकार कश्मीर में मारे गये आतंकवादियों के परिवारों के आश्रितों को कांग्रेस-मुफ़्ती-फ़ारुक द्वारा आपसी सहमति से बाँटे गये पैसों पर भी काफ़ी चर्चा हो चुकी है। यह घटनायें कांग्रेस सरकारों द्वारा प्रायोजित और आयोजित होती थीं, सो इसकी जमकर आलोचना की गई, प्रत्येक देशप्रेमी को (सेकुलरों को छोड़कर) करना भी चाहिये। लेकिन अब एक नया ही मामला सामने आया है, जिसकी आलोचना भी हम-आप नहीं कर सकते।

जैसा कि सभी जानते हैं हमारे देश की न्यायपालिकाएं एक "लाजवन्ती" नारी से भी ज्यादा छुई-मुई हैं, जरा सा "छेड़" दो, तो तड़ से उनकी अवमानना हो जाती है। इसलिए पहले ही घोषणा कर दूं कि यह लेख मेरे प्रिय पाठकों के लिये सिर्फ़ "एक खबर" मानी जाये, "माननीय" न्यायालय के खिलाफ़ टिप्पणी नहीं…

11 अगस्त को "माननीय" सर्वोच्च न्यायालय की दो जजों तरुण चटर्जी और आफ़ताब आलम की खण्डपीठ ने गुजरात में नवम्बर 2005 में एनकाउंटर में मारे गये सोहराबुद्दीन और उसकी पत्नी कौसर बी के परिजनों को दस लाख रुपये का मुआवज़ा देने का निर्देश दिया है। ऐसे में "माननीय" न्यायालय से पूछने को जी चाहता है कि क्या ज्ञात और घोषित अपराधियों के परिजनों के लिये मुआवज़ा घोषित करने से गलत संदेश नहीं जायेगा? मुआवज़ा कितना मिलना चाहिये, यह निर्धारित करते समय क्या "माननीय" न्यायालय ने उस परिवार के "पाप में सहभागी होने" और उसकी आय को ध्यान में रखा है? इन अपराधियों द्वारा अब तक मारे गये निर्दोष व्यक्तियों के परिजनों को क्या ऐसा कोई मुआवज़ा "माननीय" न्यायालय ने दिया है? यदि इन अपराधियों द्वारा मारे गये लोगों के परिजन "माननीय" न्यायालय की दृष्टि के सामने नहीं आ पाये हैं तो क्या इसमें उनका दोष है, और क्या यही न्याय है? एक सामान्य और आम नागरिक इस निर्णय को किस प्रकार देखे? क्या यह निर्णय अपराधियों के परिवारों को कानूनी रूप से पालने-पोसने और उन अपराधियों द्वारा सरेआम एक न्यायप्रिय और कानून का पालन करने वाले आम नागरिक के साथ बलात्कार जैसा नहीं लगता?

उल्लेखनीय है कि सोहराबुद्दीन उज्जैन के पास उन्हेल का रहने वाला एक ट्रक चालक था, जिसे इन्दौर से कांडला बन्दरगाह माल लाने-ले जाने के दौरान अपराधियों का सम्पर्क मिला और वह बाद में दाऊद की गैंग के लिये काम करने लगा। मध्यप्रदेश, गुजरात और राजस्थान सरकारों के लिये वह एक समय सिरदर्द बन गया था और दाऊद के अपहरण रैकेट में उसकी एक महत्वपूर्ण भूमिका रही। सोहराबुद्दीन को गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराये जाने के बाद जब उसका शव उसके पैतृक गाँव लाया गया तब उसकी शवयात्रा का स्वागत एक गुट द्वारा हवा में गोलियां दाग कर किया गया था। इस व्यक्ति के परिजनों को जनता के टैक्स की गाढ़ी कमाई का 10 लाख रुपया देने के पीछे "माननीय" न्यायालय का क्या उद्देश्य है, यह समझ से परे है।

आज जबकि समूचा भारत आतंकवाद से जूझ रहा है, आतंकवादियों और अन्तर्राष्ट्रीय अपराधियों में खुलेआम सांठगांठ साबित हो चुकी है, ऐसे में यह उदाहरण पेश करना क्या "माननीय" न्यायालय को शोभा देता है? खासकर ऐसे में जबकि हमारे जांबाज पुलिसवाले कम से कम संसाधनों और पुराने हथियारों से काम चला रहे हों और उनकी जान पर खतरा सतत मंडराता है? सवाल यह भी है कि "माननीय" न्यायालय ने अब तक कितने पुलिसवालों और छत्तीसगढ़ में रोजाना शहीद होने वाले पुलिसवालों को दस-दस लाख रुपये दिलवाये हैं?

दाऊद का एक और गुर्गा अब्दुल लतीफ़, जो कि साबरमती जेल से मोबाइल द्वारा सतत अपने साथियों के सम्पर्क में था, एक मध्यरात्रि में जेल से भागते समय पुलिस की गोली का शिकार हुआ, इस प्रकार के घोषित रूप से समाजविरोधी तत्वों को इस तरह "टपकाने" में कोई बुराई नहीं है, बल्कि इसे कानूनन जायज़ बना दिया जाना चाहिये, खासकर ऐसे मामलों में जहाँ न्यायालय द्वारा यह साबित किया जा चुका हो कि वह व्यक्ति कुख्यात अपराधी है और जेहादी संगठनों से उसकी मिलीभगत है, तभी हम आतंकवाद पर एक हद तक अंकुश लगा पाने में कामयाब होंगे।

"माननीय" न्यायालय को यह समझना चाहिये कि मुआवज़ा अवश्य दिया जाये, लेकिन सिर्फ़ उन्हीं को जो गलत पहचान के शिकार होकर पुलिस के हाथों मारे गये हैं (जैसे कनॉट प्लेस दिल्ली की घटना में वे दोनो व्यापारी)। एक अपराधी के परिजनों को मुआवज़ा देने से निश्चित रूप से गलत संदेश गया है। लेकिन यह बात हमारे सेकुलरों, लाल बन्दरों और झोला-ब्रिगेड वाले कथित मानवाधिकारवादियों को समझ नहीं आयेगी।

बाटला हाउस की जाँच में पुलिस वालों की भूमिका निर्दोष पाई गई है, लेकिन फ़िर भी सेकुलरों का "फ़र्जी मुठभेड़" राग जारी है, साध्वी प्रज्ञा के साथ अमानवीय बर्ताव जारी है लेकिन मानवाधिकार और महिला आयोग चुप्पी साधे बैठा है। अब बाटला हाउस कांड की जाँच सीबीआई से करवाने की मांग की जा रही है, यदि उसमें भी पुलिस को क्लीन चिट मिल गई तो ये सेकुलर लोग मामले को संयुक्त राष्ट्र में ले जायेंगे।

एक बार पहले भी "माननीय" सुप्रीम कोर्ट ने गुजरात दंगों के सम्बन्ध में तीस्ता सीतलवाड द्वारा बगैर हस्ताक्षर किये कोरे हलफ़नामें स्वीकार किये हैं तथा, एक और "माननीय" हाईकोर्ट ने एक युवती इशरत जहाँ को, जिसे आतंकवादियों से गहरे सम्बन्ध होने की वजह से गुजरात पुलिस द्वारा मार गिराया गया था, उसकी न्यायिक जाँच के आदेश दिये थे, जबकि लश्कर-ए-तैयबा की वेबसाईट पर इशरतजहाँ को "शहीद" के रूप में खुलेआम चित्रित किया जा चुका था। ताज़ा समाचार के अनुसार कसाब को अण्डाकार जेल में रोज़े रखने/खोलने के लिये रोज़ाना समय बताया जायेगा ताकि उसकी धार्मिक भावनायें(?) आहत न हों, जबकि साध्वी प्रज्ञा को एक बार अंडा खिलाने की घृणित कोशिश की जा चुकी है, "सेकुलर देशद्रोहियों" के पास इस बात का भी कोई जवाब नहीं है कि यदि साध्वी प्रज्ञा जेल में गणेश मूर्ति स्थापित करने की मांग करें, तो क्या अनुमति दी जायेगी? "सेकुलरिज़्म" के कथित योद्धा इन बातों पर एक "राष्ट्रविरोधी चुप्पी" साध जाते हैं या फ़िर गोलमोल जवाब देते हैं, क्योंकि जैसा कि सभी जानते हैं, नरेन्द्र मोदी के खिलाफ़ बोलना-लिखना अथवा मुसलमानों के पक्ष में कुछ भी बोलना ही सेकुलरिज़्म कहलाता है। ये दो "पैरामीटर" सेकुलर घोषित किये जाने के लिये पर्याप्त हैं। ये घटिया लोग जीवन भर "संघ और हिन्दुत्व" को गाली देने में ही अपनी ऊर्जा खपाते रहे, और इन्हें पता भी नहीं कि भारत के पिछवाड़े में डण्डा करने वाली ताकतें मजबूत होती रहीं।

शुरुआत में जिन दोनों मामलों (कसाब और कश्मीर के आतंकवादी) का जिक्र किया गया था, उनमें तो "सरकारी तंत्र" और वोट बैंक की राजनीति ने अपना घृणित खेल दिखाया था, लेकिन अब "माननीय" न्यायालय भी ऐसे निर्णय करेगा तो आम नागरिक कहाँ जाये?

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विशेष नोट - इस लेख में "माननीय" शब्द का उपयोग 12-13 बार किया है, इसी से पता चलता है कि मैं कानून का कितना घोर, घनघोर, घटाटोप सम्मान करता हूं, और "अवमानना" करने का तो कोई सवाल ही नहीं है :)। टिप्पणी करने वाले बन्धु-भगिनियाँ भी टिप्पणी करते समय माननीय शब्द का उपयोग अवश्य करें वह भी डबल कोट के साथ… वरना आप तो जानते ही हैं कि पंगेबाज के साथ क्या हुआ था।

फ़िलहाल यू-ट्यूब की यह लिंक देखें और अपना कीमती (और असली) खून जलायें… सेकुलर UPA के सौजन्य से… :)

http://www.youtube.com/watch?v=NK6xwFRQ7BQ



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30 comments:

संजय बेंगाणी said...

किसी की अवमानना होती हो तो मेरी बला से....


इसी विषय पर लिखी इस पोस्ट को टिप्पणी समझे...

http://www.tarakash.com/joglikhi/?p=1226

Alok Nandan said...

अब तो मारे जाने वाले आतंकियों के परिवारों को आर्थिक सिक्युरिटी भी मिल रही है। शायद यह सेक्युलरिज्म का क्लाइमेक्स है। माननीय अदालत की भूमिका सराहनीय है,....लेकिन आप सवाल ज्यादा करते हैं, और इन सवालों का जवाब के लिए सिर पटक के मर जाये फिर भी सही जवाब नहीं मिलता है।

दीन दरवेश said...

"माननीय" सर्वोच्च न्यायालय का फैसला फैसला भर है, इसमें न्याय नहीं दिखता. न्याय सिर्फ होना ही नहीं चाहिये, बल्कि न्याय होते दिखना भी चाहिये

न्याय देते समय न्यायकर्ता अपने पूर्वाग्रहों के आधार पर फैसला देते हैं और इस फैसले को कानून का लिबास पहना देते हैं.
न्यायकर्ताओं की इसी मनोस्थिति को "रुका हुआ फैसला" (12 Angry Men) फिल्म में अच्छी तरह से दिखाया गया है

"माननीय" न्यायालय से आम आदमी का विश्वास उठता जा रहा है, अदालत में मुकदमें सालों अटके रहते हैं, एक पुलिस आफीसर से निश्चित समय में जांच करा कर रिपोर्ट मांगी जा सकती है, लेकिन "माननीय" न्यायालय में मुकदमें दशकों लम्बित रहते हैं, बात उठने पर यह कह दिया जाता है कि अदालतें कम है. कोई भी यह नहीं सोचता कि वे कौन से "तत्व" है जो कानून की राह में रोड़े बन रहे हैं.

मैं भी न्यायालय का सम्मान करता हुं, इसकी अवमानना करने वालों की निन्दा करता हुं

वैसे सम्मान अन्दर से उपजना चाहिये, ये किसी के डंडे के बल पर अन्दर से उमड़ कर नहीं बहने लगेगा...

khursheed said...

When our ideal Modi Govt. has accepted that encounter was fake then why are you worried.

flare said...

Modi Govt. also accepted that they are not involved in Godhara. Do you accept that........ ?

psudo said...

It is an open truth that these days our hounrable courts are no more impartial.It appears that they have also been bought by vatican money?

Science Bloggers Association said...

एक गम्भीर प्रश्न।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }

जी.के. अवधिया said...

अब तक सेकुलरिज्म विधायिका और कार्यपालिका तक ही सीमित थी शायद अब उसकी पहुँच न्यायपालिका में भी हो गई है।

khursheed said...

@ Flare:
Suresh Chiplunkar has praised Supreme Court regarding Tista Sitalwadin one of his post . He want to run the Supreme Court according to his will.

निशाचर said...

कार्यपालिका तो हमेशा से ही उपनिवेशवादी मानसिकता से ग्रस्त रही है और कालांतर में भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी, नेताओं द्वारा अपनी दुर्गति करवा रही है. हमारे जनप्रतिनिधि भी आजादी के बाद ६२ वर्षों में खादी छोड़कर कीमती "डिजायनर" पर आ गए हैं. लोकतंत्र का "चौथा खम्बा" (मीडिया) तो पहले हमले में ही घुटनों पर रेंगने लगा है. उम्मीद बची हुई थी सेना और न्यायपालिका से तो, सेना में एक बार "सेकुलर" गिनती की कोशिश हो चुकी है और भ्रष्टाचार का घुन वहां भी धीरे -धीरे आबादी बढा रहा है. न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद है लेकिन...............
क्या यह हमारी जड़ों को खोखला करने की दूरगामी रणनीति नहीं है?? क्या हमें अब भी चुप बैठकर इसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए???

दिवाकर मणि said...

वीडियो भी देखी और आलेख भी पढ़ा. बिल्कुल सही मुद्दे को आपने उठाया है.
जहां तक आंख पर पट्टी बांधी हुई न्याय(?) की देवी के पीछे ऊंची कुर्सी पर बैठने वाले माननीयों की बात है, तो यह साफ है कि इनमें से बहुत से माननीय भी दूध के धुले नहीं हैं या पूर्वाग्रहग्रस्त नहीं होते हैं. निचले स्तर के न्यायालयों में तो ये माननीय अपने एजेंटों के माध्यम से एक निर्णय देने के लिए क्या-क्या नहीं करते. ईश्वर ही मालिक है.... अगर ऐसा ही चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब इन "न्याय के मंदिर के माननीय पुजारियों" के प्रति लोगों की धारणाएं बिल्कुल ही नकारात्मक हो जाएं, बिल्कुल जैसे नेताओं के बारे में सोचा जाता है. और यह बात अब ढंकी-छुपी भी नहीं रह गयी है...

पंकज बेंगाणी said...

श्री खुर्शीद,


मोदी सरकार ने माना है कि एनकाउंटर फर्जी था. लेकिन यह नहीं माना है कि सौराबुद्दीन संत महापुरूष था. सौराबुद्दीन के खिलाफ पहले भी काफी केस दर्ज थे और वह शातिर अपराधी ही था.

दूसरी बात सुरेश ने कभी सुप्रीम कोर्ट की तारीफ भी की होगी तो अब आलोचना क्यों नही कर सकते. सही सही होता है गलत गलत.

कांग्रेस ने कुछ अच्छे काम भी किए है लेकिन इससे वह दूध की धुली नहीं हो जाती. यही बात भाजपा पर लागू होती है.


श्री सुरेश,


जो जवान शहीद होते हैं उन्हें मुआवजा दिलाने के लिए कितने लोग याचिका दायर करते हैं? आखिर कॉर्ट तो याचिकाओं पर ही फैसला देती है. कोई नहीं करता तो क्यों ना हम करें. शुरूआत तो हो.

रंजना said...

सच कहा सौ ग्राम कीमती खून पांच मिनट के अन्दर जल गया.......पर काश यह किसी काम आ पाता.

वस्तुतः सरकार का प्रयास है कि आम लोग भी उग्रवाद नक्सलवाद इत्यादि के ग्रुप में शामिल हो अपना भविष्य सुनिश्चित करें...

Ratan Singh Shekhawat said...

आपसे सौ फीसदी सहमत |

Suresh Chiplunkar said...

@ पंकज भाई - जब न्यायालय "स्वतः संज्ञान" से सड़क ठीक करवाने हेतु सरकार को निर्देश दे सकता है तो जवानों के परिवारों को मुआवज़ा दिलवाने में क्या हर्ज है, हर बात के लिये याचिका दायर करने की आवश्यकता ही नहीं है, क्या माननीय न्यायाधीश अखबार नहीं पढ़ते हैं? एक "पोस्टकार्ड" द्वारा भी जनहित याचिका स्वीकार करने के कई उदाहरण मौजूद हैं…

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सुरेश जी ऐसे सकडों उदाहरण हैं जिससे ये सिद्ध होता है की आज-कल जिधर देखो उधर सेकुलर का बोल-बाला है | चाहे वो मीडिया, सरकार, न्यायालय हो या फिर पुलिस |

अब क्या कहें अपने देश का, सब जगह से आस पहले ही छुट चुकी है | अब न्यायालय भी सेकुलर के चुंगुल मैं आ गया लगता है |

जो भी रास्ट्र अपने इतिहास से सबक नहीं लेता उसका भविष्य अंधकारमय होता है, आज भारत के साथ भी कामो-बेस यही इस्थिति है |

psudo said...

I wonder articles like this dont reach millions? What can we do..for that.Today the way these guys projected YSR. I am sure he would be given Bharat Ratna soon. And Gods of Tirupati would shed blood tears.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

जबरदस्त मुद्दा...
अफ़सोस कि हम सब यह धाँधली देखने को अभिशप्त हैं।

शिवम् मिश्रा said...

सुरेश जी ,
एक बहुत ही बढ़िया पोस्ट |
अपने देश की यही कहानी है..... क्या करे ??

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

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डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

अब क्या कहा जाये?
हम बोलेगा तो बोलोगे कि बोलता है।

cmpershad said...

मेरा कानून महान! मेरा भारत महान!!!

Dr.Aditya Kumar said...

सटीक टिप्पणी..मजा आ गया ' हमारे देश की न्यायपालिकाएं एक "लाजवन्ती" नारी से भी ज्यादा छुई-मुई हैं, जरा सा "छेड़" दो, तो तड़ से उनकी अवमानना हो जाती है'

Anil Pusadkar said...

खून जल रहा है और लगता है जलता ही रहेगा।

Vivek Rastogi said...

माननीय सुप्रीम कोर्ट का आदेश सर आंखों पर, पर सुप्रीम कोर्ट को संज्ञान लेते हुए भारत के लिये हुए शहीदों और उनके परिजनों का भी ध्यान रखना चाहिये।

jitendra said...

पर अभी तक स्वच्छ ता नही आई है

हा हा हा हा :)

wahreindia said...

Dear Suresh Ji once again well done.
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Thanks

कृष्ण मोहन मिश्र said...

Zordar Lekh. Mananiya lagane wala kaam to kar nahi rahi to kahe ko lagyen Mananiya.

राज भाटिय़ा said...

क्या लिखे इतनी कमीनी ओर कमीने नेता वोट के लिये अपनी मां को भी लिटा दे, इन्हे बेबस ओर मजबुर वो कशमीरि नही दिखे जो बीस साल से केम्पो मै धक्के खा रहे है, वो बेबस हिदु जो अपना बसा बसाया घर कश्मीर मे छोड कर आये है,

sunil patel said...

बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है बहुत चिन्तनीय, विचारणीय और गंभीर विश्लेषण का विषय है। आखिर हमारा समाज (सरकारी तत्रं) जा कहां रहा है। हम किससे डर रहे हैं। यूरोप, एशिया से सपोर्ट नहीं मिलेगा तो क्या हमारे देशवासी भूखे मर जाऐगे। हम किस डर में जी रहे हैं। अंग्रेजी अदालतो के सिस्टम में कभी कभी हास्यास्पद निर्णयों को देखकर लगता है ’’........ .......... ........ .......... .......... ……… ......’’।

अदालते तुरन्त निर्णय दे दे तो हमारे देश से 75 प्रतिशत भ्रष्टाचार खत्म हो जाऐ। देर से (10 से 20 साल बाद) मिला सही निर्णय, तुरन्त मिले गलत निर्णय से ज्यादा दुखदायी होता है।

पकिस्तान के प्रति हमारे रुख को देखकर लगता है कि जैसे शेर या बाघ के मुंह पर टेप बंधा हो, वह जंजीरों में जकड़ा हुआ गहरी नीन्द मे हो और पाकिस्तन पामेलियन कुत्ते की तरह उस पर दिन रात भौकता रहता हो। अमेरिका और चीन लोमड़ी की तरह उस पामेलियन कुत्ते को और ज्यादा जोर से चिल्लाने के लिए चोरी छुपे उकसाते रहते हैं। इन्तज़ार है कब शेर या बाघ अंगड़ाई लेता है या फिर से जम्भाई लेकर सो जाता है।