ये हैं स्वाइन फ़्लू के असली "स्वाइन" Swine Flue, Roche, Donald Rumsfeld
जबसे स्वाइन फ़्लू का “सुपर हौवा” मीडिया ने खड़ा किया है और उसके बाद लोगबाग हिसाब किताब लगाने लगे हैं कि आखिर इस “डराने वाले खेल” में कौन कितना कमा रहा है, कोई बता रहा है कि 10 रुपये का मास्क 200 रुपये में बिका, किसी ने बताया कि निजी अस्पताल विभिन्न टेस्ट के नाम पर लूट रहे हैं, डॉक्टरों के यहाँ भीड़ लगी पड़ी है और उन्हें नोट गिनने से ही फ़ुर्सत नहीं है… लेकिन शायद आपको पता नहीं होगा कि इस बीमारी के नाम पर डरा-धमकाकर भारत में जितनी और जैसी भी कमाई हो रही है वह “चिड़िया का चुग्गा” भर है।
एक नज़र इधर भी डालिये जनाब – स्वाइन फ़्लू पर कारगर दवा के रूप में रातोंरात मशहूर हो चुकी (हालांकि अभी इसमें भी संदेह है कि यह बच्चों पर कितनी कारगर है) दवाई “टैमीफ़्लू” की स्विट्ज़रलैंड स्थित बहुराष्ट्रीय कम्पनी “रॉश” (Roche) ने गत 6 माह में 938 मिलियन डालर (659 मिलियन यूरो – भारतीय रुपये में गणना मत कीजिये चक्कर आ जायेगा) का माल विभिन्न देशों को बेचा है। रॉश कम्पनी की वार्षिक सेल से 203% अधिक का टारगेट सिर्फ़ 6 माह में हासिल कर लिया गया है। इसके अलावा अभी भी अलग-अलग देशों और अन्तर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्थानों की ओर से भारी मांग बनी हुई है। (यहाँ देखें http://www.nytimes.com/2009/07/24/business/24roche.html) कम्पनी के अध्यक्ष सेवेरिन श्वान कहते हैं कि टैमीफ़्लू की इस भारी मांग के बावजूद वह अपने ऑर्डर पूरा करने में सक्षम हैं लेकिन दवाओं के सभी ऑर्डर इस साल के अन्त तक ही दिये जा सकेंगे। कम्पनी की योजना है कि सन 2010 तक टैमीफ़्लू का उत्पादन 400 मिलियन पैकेट प्रतिवर्ष तक बढ़ाया जाये, जो कि आज की स्थिति से चार गुना अधिक होगा (यानी कम्पनी स्वाइन फ़्लू के प्रति बेहद “आशावान” है)।

इस बड़े “खेल” में एक पेंच यह भी है कि कैलीफ़ोर्निया स्थित “जिलीड साइंसेस” नामक कम्पनी ने इस दवा का आविष्कार किया है, और इसका पेटेंट और लाइसेंस भी उसी के पास है, अतः जितनी अधिक टैमीफ़्लू बिकेगी, उतनी ही अधिक रॉयल्टी जिलीड साइंसेस को मिलेगी, और यह कोई संयोग नहीं हो सकता कि जिलीड साइंसेस कम्पनी के सबसे प्रमुख शेयर होल्डर हैं अमेरिका पूर्व रक्षा सचिव डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड। क्या हुआ चौंक गये क्या? यह रम्सफ़ेल्ड साहब वहीं शख्स हैं, जिन्होंने जॉर्ज बुश को ईराक के खिलाफ़ भड़काने में सबसे प्रमुख भूमिका निभाई थी, इन्ही साहब ने “इराक के पास महाविनाशक हथियार हैं” वाली थ्योरी को मीडिया के जरिये आगे बढ़ाया था। अब ये बात और है कि ईराक के पास से न कुछ मिलना था, न ही मिला लेकिन “तेल के खेल” में अमेरिका, जॉर्ज बुश की तेल कम्पनी और रम्सफ़ेल्ड ने अरबों डालर कमा लिये।
डोनल्ड रम्सफ़ेल्ड 1997 में जिलीड रिसर्च बायोटेक के चेयरमैन बने और 2001 में उन्होंने जॉर्ज बुश सरकार में पद ग्रहण किया, और आज की तारीख में भी उनके पास “जिलीड” के लगभग 25 मिलियन डालर के शेयर हैं। बुश प्रशासन के एक और पूर्व रक्षा सचिव जॉर्ज शुल्ट्ज़ भी जिलीड कम्पनी के बोर्ड मेम्बर हैं और उन्होंने सन 2005 से लेकर अब तक 7 मिलियन डालर के शेयर बेचे हैं। सन्देह की पुष्टि की बात यह है कि अमेरिका कि फ़ेडरल सरकार टैमीफ़्लू की सबसे बड़ी ग्राहक भी है, पेंटागन ने जुलाई में 58 मिलियन डालर की टैमीफ़्लू खरीदी के आदेश जारी किये हैं ताकि विश्व के विभिन्न इलाकों में रहने वाले सैनिकों को यह दवा भेजी जा सके, जबकि अमेरिकी कांग्रेस एक और बड़ी खरीदी के बिल पर विचार कर रही है। मजे की बात यह भी है कि जिलीड साइंस ही ओसेटमिविर नामक दवा बनाती है जो बर्ड फ़्लू के उपचार में काम आती है… और पिछले 5-7 वर्ष के दौरान अचानक विश्व में “सार्स”, “बर्ड फ़्लू”, एवियन फ़्लू, स्वाइन फ़्लू नामक नई-नई बीमारियाँ देखने में आने लगीं? इन्हें देखें…
http://www.timesonline.co.uk/tol/news/uk/health/Swine_flu/article6737507.ece और http://www.infowars.net/articles/november2005/081105birdflu.htm
स्वाइन फ़्लू का वायरस प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों की गलती की वजह से फ़ैला? ऐसा हो सकता है, “रशिया टुडे” में वेयन मैडसेन द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक स्वाइन फ़्लू का वायरस “मानव निर्मित” है और यह वैज्ञानिकों और प्रयोगकर्ताओं की गलती की वजह से मेक्सिको में फ़ैला और फ़िर आगे दुनिया में बढ़ा… देखें यह रिपोर्ट http://www.russiatoday.com/Top_News/2009-07-16/Swine_flu_virus_began_life_in_a_lab.html
(अतः इस सम्भावना को खारिज नहीं किया जा सकता कि इन प्रयोगशालाओं के जरिये यह वायरस जानबूझकर फ़ैलाया गया हो)
आईये अब देखते हैं कि स्वाइन फ़्लू नामक इस बड़े भारी “षडयन्त्र” को कैसे अंजाम दिया गया –
1) फ़रवरी 2009 – मेक्सिको के CDC ने कहा कि इस वर्ष फ़ैलने वाला फ़्लू टैमीफ़्लू द्वारा नहीं रोका जा सकता और यह फ़्लू टैमीफ़्लू की गोली के प्रति प्रतिरोधी क्षमता हासिल कर चुका है। इस खबर से रॉश कम्पनी की बिक्री में 68% की गिरावट देखी गई। (यहाँ देखें http://www.fiercepharma.com/story/roche-suffers-tamiflu-resistance/2009-02-06)
2) मार्च का प्रथम सप्ताह 2009 – दवा बनाने वाली एक भीमकाय कम्पनी सनोफ़ी एवेन्टिस ने बोर्ड मीटिंग में यह तय किया कि वह मेक्सिको में प्रतिवर्ष फ़ैलने वाले इन्फ़्लुएंज़ा के वैक्सीन निर्माण हेतु 100 मिलियन डालर का निवेश करेगी (तगड़ा माल कमाने की जुगाड़ सभी को दिखाई देने लगी)। (यहाँ देखें http://www.medicalnewstoday.com/articles/142835.php)
3) 18 मार्च 2009 – स्वाइन फ़्लू का पहला मरीज मेक्सिको सिटी में मिला। (यहाँ देखें http://www.who.int/csr/don/2009_04_24/en/index.html)
4) 25 अप्रैल 2009 – एक माह में मेक्सिको में इस बुखार से 60 लोगों की मौत हो गई, जबकि अमेरिका में इसी वायरस से ग्रसित 7 मरीज अपने-आप ठीक भी हो गये। यहाँ देखें (http://uk.reuters.com/article/idUKTRE53N4X020090424)
5) 25 अप्रैल 2009 – इसी दिन इसे “स्वाइन फ़्लू” नाम दिया गया, जबकि न तो यह सूअरों को संक्रमित करती है, न ही सूअरों के द्वारा फ़ैलती है। यह वायरस मनुष्य से मनुष्य में ही फ़ैलता है।
6) फ़रवरी से अप्रैल 2009 आते-आते मात्र 2 महीने में मीडिया के जरिये यह घोषित कर दिया गया कि “रॉश” कम्पनी की दवाई टैमीफ़्लू स्वाइन फ़्लू पर सर्वाधिक असरकारक है। यहाँ देखें http://www.marketwatch.com/story/roche-talks-who-tamiflu-potential
जबकि जिन जड़ी बूटियों के बारे में स्वामी रामदेव बता रहे थे.. उनका ज़िक्र और स्वाइन फ्लू से लड़ने के उपाय डॉक्टर विरेंदर सोढ़ी (1980 से अमेरिका के निवासी और आयुर्वेद के एमडी) मई 2009 में कर चुके थे, लेकिन उनके पास पालतू मीडिया की ताकत नहीं थी और इतने समय में तो बड़े खिलाड़ी अपना खेल दिखा चुके। यहाँ देखें http://74.125.153.132/search?q=cache:mBxlGe9h0qUJ:goodeatssd.blogspot.com/2009/05/about-swine-flu.html+Tinospora+cordifolia+Swine+Flu&cd=1&hl=en&ct=clnk
स्वाइन फ्लू का पहला केस 18 मार्च 2009 को सामने आया था.. तब से लेकर अब तक क़रीब 150 दिनों (पांच महीने) में दुनियाभर में अधिकतम 1500 मौत हुई हैं (WHO के मुताबिक़ 1154)... इस लिहाज़ से स्वाइन फ्लू दुनिया में रोज़ सात से दस लोगों को मौत का शिकार बना रहा है. जबकि दूसरी संक्रामक बीमारियां ज्यादा ख़तरनाक है.
1) TB ट्यूबरकोलिसिस – रोज़ 900 भारतीय मारे जाते हैं
यहाँ देखें http://www.medindia.net/news/TB-Claims-900-Lives-in-India-Daily-Dr-Ramadoss-36092-1.htm
2) डायरिया– रोज़ 1000 मारे जाते हैं- डायरिया के कारण दुनिया भर में 3.5 मिलियन बच्चे अपने जीवन के 5 वर्ष पूर्ण नहीं कर पाते, और मरने वाला हर पाँचवां बच्चा भारतीय होता है।
(http://www.earthtimes.org/articles/show/109532.html)
(कभी गुलाम नबी आज़ाद को डायरिया के सम्बन्ध में इतने बयान देते देखा है?)
3) मलेरिया से रोज़ाना देश में 41 मौत, जिसमें 13 बच्चे
WHO की ताज़ा रिपोर्ट http://apps.who.int/malaria/wmr2008/malaria2008.pdf
(कभी अम्बुमणि रामादौस को मलेरिया के लिये चिन्तित होते देखा है?)
4) हेपीटाइटिस से रोज़ 273 की मौत- http://74.125.153.132/search?q=cache:ue5L0E7gRvIJ:india.gov.in/citizen/health/hepatitis.php+hepatitis+india+every+year&cd=2&hl=en&ct=clnk
5) देश में रोज़ 214 महिलाएं प्रसव के दौरान मर जाती हैं - यहाँ देखें http://uk.reuters.com/article/idUKLNE51H04H20090218?sp=true
(कभी प्रधानमंत्री को इलाज के अभाव में देश के ग्रामीण इलाकों में रोज़ाना होने वाली महिलाओं की दशा को लेकर राष्ट्र को सम्बोधित करते देखा है?)
6) जापानी बुखार से रोज़ चार मौत- जापानी इन्सेफ़लाइटिस की रिपोर्ट यहाँ देखें
http://www.thaindian.com/newsportal/health/japanese-encephalitis-claimed-963-lives-in-india_10042110.html
7) कैंसर, हार्ट अटैक और अन्य बीमारियों के आंकड़े भी हैरत में डालने वाले हैं. और जबकि इसमें सड़क दुर्घटनाओं में मरने वालों का आँकड़ा शामिल नहीं किया गया है।
कहने का तात्पर्य यह है कि विश्व में फ़ैलने वाली किसी भी महामारी और युद्ध के बारे में कुछ निश्चित नहीं कहा जा सकता कि वह वाकई महामारी और लड़ाई है अथवा “पैसे के भूखे” अमेरिका में बैठे कुछ बड़े “शातिर खिलाड़ियों” का एक घिनौना षडयन्त्र है। स्वाइन का मतलब होता है “सूअर” और जो पैसा कमाने के लिये नीच कर्म करता है…
(भाईयों-बहनों, स्वाइन फ़्लू पर पहले भी कई पोस्ट लिखी जा चुकी हैं लेकिन बड़ी पोस्ट लिखने की मेरी आदत छूटती नहीं, इसलिये स्वाइन फ़्लू पर जरा देर से यह पोस्ट दी है, जरा “हट-के”)
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38 comments:
साधारण जूकाम से ही हर साल 2.5 लाख लोग मरते है...सत्य है भाई.
खेल बड़ा है, मीडिया का काम क्या है यह मीडिया वाले भूल चुके है.
बाजार अवसरवादी होता है.
आप भी कहा कहा के पचडो मे पड जाते है . विदेशी त्योहार हो माल हो या बिमारी मिडिया पागल कुत्तो की तरह भौकने लगता ही है. पिछले दिनो जब अमेरिका भारत मे एडस जनित बिमारियो के लिये पैसा दे रहा था. तब हमने कहा था कि भाई मलेरिया जापानी बुखार के लिये भी कुछ दे दो.तब उनका कहना था कि जैस चीज के लिये अमेरिका जिम्मेदार नही उसके लिये वो सहायता काहे दे. मतलब आप समझ गये होंगे.
सुरेश जी!
सादर वन्दे,
भाई जी इस रिपोर्ट को भारतीय मंत्रालय व हमारी तथाकथित मिडिया को पोस्ट कर दें शायद इन बुद्धि के भसुरों को समझ में आ जाये, ये सारा खेल तो व्यवसाय का ही है पहले ये हमें गुलाम बनाकर खेलते थे और अब हम खुद ही गुलाम बनकर उनको खेलने देते हैं, पता नहीं ये आजाद नेता और स्वतंत्र मिडिया कहाँ सो रही है ? कही इन्ही व्यवसायिओंकी ..................?. इतनी विस्तृत जानकारी के लिए आप बधाई के पात्र हैं.
रत्नेश त्रिपाठी
बेजोड़ लेख .......... इसको कहते है "पत्रकारिता" ......... और "सच का सामना" ......... एक साथ एक जगह .........
वाह! वाह!
बेजोड़ पोस्ट है सुरेश जी. सच में हट के.
वाह! वाह!
बेजोड़ पोस्ट है सुरेश जी. सच में हट के.
गुरूजी मज़ा आ गया पढ़ कर. अमेरकियों की चड्ढी खोल के रख दी आप ने. अरे ये सूअर पैसों के लिए टट्टी भी खा लेंगे.
Mind Blowing
सुरेश जी इस पोस्ट के लिए आप का जितना भी आभार व्यक्त करूँ वह कम होगा। आप ने पूरे शोध और तथ्यों के साथ इस संदेह को पुष्ट करने का काम किया है।
मंदी के इस दौर में भी लूट का जो विश्वव्यापी निजाम चल रहा है उसे उजागर करना बहुत महत्वपूर्ण है। इस में भारतीय कंपनियाँ और मीडिया भी शामिल है। यदि यह मान भी लिया जाए कि यह साजिशाना नहीं है। तब भी संकट के समय में जो लूट हो रही है। उस से जनता को बचाने के उपाय करने की जिम्मेदारी भी सरकारों की है जिस में वे असफल रही हैं।
सुरेश जी आपने बहुत अच्छा किया की सारी घटनाओं को सिलसिलेवार ढंग से बताया |
पोस्ट के लिए धन्यवाद | यहाँ अमेरिका मैं कई ऐसे रिपोर्ट आते रहते हैं जिसमे दवाई बनाने वाली कम्पनी की धुर्ताताओं का कच्चा चिट्टा खोला जाता है | बहुत सारी कंपनियों पे कई बेहतरीन movie भी आयी है जैसे की The Insider .
दुःख की बात ये हैं की हमारे पढ़े लिखे बुद्धिजीवी अब तक यही मानते हैं की इन्ही बहुरास्ट्रीय कंपनियों से भारत का विकास संभव है |
कल ही मैं एक रिपोर्ट पढ़ रहा था (written by a A. True Ott, PhD, ND) , इस रिपोर्ट मैं उनहोंने ये सिद्ध किया है की swine flu , कंपनियों ने आपने फायदे के लिए बनाया है |
ऐसे ऐसे रहस्योद्घाटन की बाद भी हम भारतीय यदि यही मानते रहे की भारत का विकास यही बहुरास्ट्रीय कंपनियाँ करेगी तो चल्ने दिजिये सब कुछ भगवान् भरोसे |
This is an important aspect of this flu-phobia. thanks for this post
पैसे के लालची सुअरों को समर्पित एक पोस्ट ।
आभार
हम बहुत पहले से ही कहते रहे हैं कि इस हौवे के पीछे बड़े राज छिपे हैं।
सुअरा पर यह लेख वाकई जरा हट के है। कितनी मेहनत कर आप ने सामग्री जुटाई है !
Sirjee, is post ka angrezi anuwaad ho to batana, mere kuch videshi dost hain main unhe bhejunga.
यार, वाकई कमाल का लिखते हो,
पता नहीं कहाँ कहाँ से खोद खोद कर लाते हो. पढ़ने वाला भी चाकर्गहीन्नी हो जाता है.
लिखते भी सॉलिड हो
कोई विरोधी भी विरोध करने का साहस नहीं जुटा पता.
लगे रहो सुरेश भाई
भगवान तुम्हारी कलाम को ओर बानगी दे
दहशतगर्दी से ही तो मल्टीनेशनल कम्पनियां चल रहीं हैं- चाहे वो बंदूक की गोली हो या दवा की!!
शानदार विश्लेषण. इसे कहते हैं वेब पत्रकारिता. यह असली काम है. बाकी पत्रकार तो सिर्फ गप्पबाजी करते हैं. अथवा ज्ञानवर्षा. लगे रहिए.
स्वाइन, मैड काउ, बर्ड फ्लू, प्लेग और अब खसरा कहीं ऐसा तो नहीं कि यह वायरस दवाइयां बेचने के लिये छोड़े जाते हैं??
सुरेश जी इस पोस्ट के लिए आप का जितना भी आभार व्यक्त करूँ वह कम होगा। आप ने पूरे शोध और तथ्यों के साथ इस संदेह को पुष्ट करने का काम किया है।
इन समस्त श्वानों के लिए हम आम जन लज्जतदार गोस्त और हड्डियाँ भर हैं,जिन्हें उन्हें बड़े चाव से नोचना ,खाना और अपना पेट भरना है.....सारा ताम झाम बस इसी के लिए इनके द्वारा रचा जाता है..........
आपके इस आलेख के सम्मुख नतमस्तक हूँ......कितनी मेहनत करते हैं आप ..... बस देखकर मुंह बाये आँखें फाड़े हतप्रभ और stabdh रह जाना padta है.....
sachmuch इसे कहते हैं,सही maayne में patrakarita.......
आपकी lekhni इसी तरह हमें saty से saamna karata रहे,यही kaamna है....
बहुत बहुत आभार इस mahat aalekh के लिए....
aap k lakhan par mujhe garva hay.
aap k lakhan par mujhe garva hay.
ऐसे पोस्टों के लिए आपका अभिनन्दन किया जा सकता है " जो अमरीका का यार है वो देश का गद्दार है "
hmmn..very interesting and scary Suresh bhai...U know what??
I can actually relate this to a question I had since a very long time that yeh sari jitni nayi nayi bimaariyan aati hain sab videsho se hi kyu aati hain, specially US se? After reading this, pata chal raha hai ki ho sakta hai yeh intentionally failayi jati hain ...Its horrible man..
आपने ये comment देखा सुरेश भाई : "ऐसे पोस्टों के लिए आपका अभिनन्दन किया जा सकता है" .... ऐसे पोस्टों के लिए अभी भी आपका अभिनन्दन किया नहीं जाएगा .... क्यों ? क्योंकी आपने अभी तक कांग्रेस की चमचागिरी की नहीं | कोई भी अभिनन्दन (चाहे वो ब्लॉग पे ही क्यों नहीं हो) बिना सेकुलार्स के approve किये नहीं हो सकता |
:)
सुरेश जी,
आप ओवरसिम्पलिफिकेशन कर रहे हैं,दुनिया में एक तबका conspiracy theorists का है जिनका काम ही हर मामले में conspiracy खोजना है इस मामले में आप उनसे प्रभावित लगते हैं। १५०० मर चुके हैं यह तो आप मानते हैं जबकि संक्रमण अभी कुछ लाख को ही हुआ है,क्या होगा जब करोड़ों या अरबों संक्रमित होंगे? मरें लाखों या कुछ सौ,मृत्यु एक मानवीय त्रासदी होती है क्या आप नहीं मानते कि हर जान को बचाने का हरसम्भव प्रयास होना चाहिये। ६७% मामलों में टेमिफ्लू अतिरिक्त बचाव देता है जो हर हाल में कुछ भी न करने से बेहतर है।
सौ बात की एक बात मुझे स्वाइन फ्लू होने पर मैं तो टेमिफ्लू लूंगा, दिल पर हाथ रख कर बोलो आप क्या करोगे....???
bilkul alag dhang se likhi gyi report hai. aap ne jo likha hai gar wo sach hai to bhayavah hai.
thik hai.
सुरेश जी इस बेजोड़ लेख के लिए बधाई स्वीकार करें , टॅमिफलू बनाने वाली जिलीड़ ही इससे होने वाले साइड एफेक्ट्स से सावधान रहने को कहती है कृपया यह लिंक देखें
http://www.tamiflu.com/sideeffects.aspx
दूसरी तरफ यह प्रमाणित है की मियूटेट होने वाला ख़तरनाक स्वाइन फ़्लू वाइरस अमरीकी विश्वविद्यालय में बनाया गया . कृपया यह लिंक देखें
http://www.youtube.com/watch?v=a9gMiJVb2Cc
चीनी डॉक्टर्स के अनुसार एच 1 एन 1 वाइरस का इलाज जड़ी बूटियों में है .
http://www.youtube.com/watch?v=Kb9h7YID6e4&feature=fvw
और अमेज़न तथा एबे पर बेची जाने वाली स्वाइन फ़्लू कीट में होली बेसिल [तुलसी] और लहसुन से निर्मित दवाएँ यह कह कर बेची जा रही हैं की इससे रोगप्रातिकारक क्षमता बढ़ेगी. किंतु एन डि टी वी तथा टाइम्स चॅनेल स्वाइन फ़्लू को आयुर्वेद के ज़रिए ठीक करने को बकवास मानते हैं , वाकई यह मीडीया विदेशियों के हाथ बिका है
सुरेश भाई, बेहतरीन आलेख, तथ्यपरक, ज्ञानपरक। आपके परिश्रम को प्रणाम। आपकी राष्ट्र निष्ठा का शत शत अभिनंदन। वास्तव में विदेशी मीडिया बहुत चालाक है.लेकिन भारतीय मीडिया के बारे में क्या कहें। हम भारतीयों ने कसम ही खा रखी है, पश्चिम का अंधानुकरण करने की।
Good one Suresh ji, As usual different and logical.
Well researched, Well Said. I salute you boss!
A recent survey has said that India accounts for maximum road fatalities in the world. and we are busy in filling the pockets of some politically connected biotech companies.
बाप रे बाप.....अब मैं करूँ तो क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करूँ....मेरी तो सिट्टी-पिट्टी ही गुम हो गयी.....!!
डोनल्ड रम्सफेल्ड अपने नेवार्क हवाई अड्डे के सुरक्षा अधिकारियों को कोस रहे होंगे कि भारतीय मीडिया को शाहरुख खान का मुद्दा दे दिया जिससे
भारतीय मीडिया चैनल स्वाइन फ्लू भूलकर दो दिनों तक शाहरुख की सी डी बजाते रहे, और भारत से स्वाइन फ्लू का भूत उतर गया, यदि शाहरुख प्रकरण न आता तो मीडिया स्वाइन फ्लू पर ही भौंकता रहता और व जाने कितने दिनों तक यह भूत जिन्दा रहता?
Hello Blogger Friend,
Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/
- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.
कुछ तो गडबड है , मजे की बात स्वाइन फ़्लू की वैक्सीन बनाने वाले स्वंय यह वैक्सीन लेना नही चाहते , देखें
http://www.youtube.com/watch?v=B4SmFxyust0
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