Friday, August 28, 2009

काबा, एक शिव मन्दिर ही है… : वैदिक परम्पराओं के विचित्र संयोग (भाग-2) Kaaba a Hindu Temple

(भाग…1 से http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/08/kaaba-hindu-temple-pn-oak.html आगे जारी…)

उन दिनों काबा में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाला “ओकाज़” सिर्फ़ एक मेला या आनंदोत्सव नहीं था, बल्कि यह एक मंच था जहाँ विश्व के कोने-कोने से विद्वान आकर समूचे अरब में फ़ैली वैदिक संस्कृति द्वारा उत्पन्न सामाजिक, धार्मिक, राजनैतिक, शैक्षणिक पहलुओं पर खुली चर्चा करते थे। “सायर-उल-ओकुल” का निष्कर्ष है कि इन चर्चाओं और निर्णयों को समूचे अरब जगत में सम्मान और सहमति प्राप्त होती थी। अतः एक प्रकार से मक्का, भारत के वाराणसी की तर्ज पर विद्वानों के बीच अतिमहत्वपूर्ण बहसों के केन्द्र के रूप में उभरा, जहाँ भक्तगण एकत्रित होकर परम-आध्यात्मिक सुख और आशीर्वाद लेते थे। वाराणसी और मक्का दोनों ही जगहों पर इन चर्चाओं और आध्यात्म का केन्द्र निश्चित रूप से शिव का मन्दिर रहा होगा। यहाँ तक कि आज भी मक्का के काबा में प्राचीन शिवलिंग के चिन्ह देखे जा सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि काबा में प्रत्येक मुस्लिम जिस काले पत्थर को छूते और चूमते हैं वह शिवलिंग ही है। हालांकि अरबी परम्परा ने अब काबा के शिव मन्दिर की स्थापना के चिन्हों को मिटा दिया है, लेकिन इसकी खोज विक्रमादित्य के उन शिलालेखों से लगाई जा सकती है जिनका उल्लेख “सायर-उल-ओकुल” में है। जैसा कि सभी जानते हैं राजा विक्रमादित्य शिव के परम भक्त थे, उज्जैन एक समय विक्रमादित्य के शासनकाल में राजधानी रही, जहाँ कि सबसे बड़े शिवलिंग महाकालेश्वर विराजमान हैं। ऐसे में जब विक्रमादित्य का शासनकाल और क्षेत्र अरब देशों तक फ़ैला था, तब क्या मक्का जैसी पवित्र जगह पर उन्होंने शिव का पुरातन मन्दिर स्थापित नहीं किया होगा?

अब हम पश्चिम एशिया और काबा में भारतीय और हिन्दू संस्कारों, संस्कृति से मिलती-जुलती परम्पराओं, प्रतीकों और शैलियों को हम एक के बाद एक देखते जाते हैं, और आप खुद ही अनुमान लगाईये कि आखिर काबा में स्थापित विशाल संरचना जिसे छिपाकर रखा गया है, प्राचीन काल में वह शिव मन्दिर क्यों नहीं हो सकता।

मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके। जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है। यह दोनों ही संस्कार प्राचीन काल से हिन्दू मन्दिरों को स्वच्छ और पवित्र रखने हेतु वैदिक अभ्यास के तरीके हैं, यह मुस्लिम परम्परा में कब से आये, जबकि मुस्लिम परम्परा में दाढ़ी साफ़ करने को तो गैर-इस्लामिक बताया गया है? मक्का की मुख्य प्रतीक दरगाह जिसे काबा कहा जाता है, उसे एक बड़े से काले कपड़े से ढँका गया है। यह प्रथा भी “मूल प्रतीक” पर ध्यान न जाने देने के लिये एक छद्म-आवरण के रूप में उन्हीं दिनों से प्रारम्भ की गई होगी, वरना उसे इस तरह काले कपड़े में ढँकने की क्या आवश्यकता है?

“इनसाइक्लोपीडिया ब्रिटानिका” के अनुसार काबा में 360 मूर्तियाँ थीं। पारम्परिक अरबी आलेखों में उल्लेख है कि जब एक भीषण तूफ़ान से 360 मूर्तियाँ नष्ट हो गईं, तब भी शनि, चन्द्रमा और एक अन्य मूर्ति को प्रकृति द्वारा खण्डित नहीं किया जा सका। यह दर्शाता है कि काबा में स्थापित उस विशाल शिव मन्दिर के साथ अरब लोगों द्वारा नवग्रह की पूजा की जाती थी। भारत में आज भी नवग्रह पूजा की परम्परा जारी है और इसमें से दो मुख्य ग्रह हैं शनि और चन्द्रमा। भारतीय संस्कृति और परम्परा में भी चन्द्रमा को हमेशा शिव के माथे पर विराजित बताया गया है, और इस बात की पूरी सम्भावना है कि यह चन्द्रमा “काबा” के रास्ते इस्लाम ने, उनके झण्डे में अपनाया हो।

काबा से जुड़ी एक और हिन्दू संस्कृति परम्परा है “पवित्र गंगा” की अवधारणा। जैसा कि सभी जानते हैं भारतीय संस्कृति में शिव के साथ गंगा और चन्द्रमा के रिश्ते को कभी अलग नहीं किया जा सकता। जहाँ भी शिव होंगे, पवित्र गंगा की अवधारणा निश्चित ही मौजूद होती है। काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है, क्योंकि इस्लामिक काल से पहले भी इसे पवित्र (आबे ज़म-ज़म) ही माना जाता था। आज भी मुस्लिम श्रद्धालु हज के दौरान इस आबे ज़मज़म को अपने साथ बोतल में भरकर ले जाते हैं। ऐसा क्यों है कि कुम्भ में शामिल होने वाले हिन्दुओं द्वारा गंगाजल को पवित्र मानने और उसे बोतलों में भरकर घरों में ले जाने, तथा इसी प्रकार हज की इस परम्परा में इतनी समानता है? इसके पीछे क्या कारण है।

काबा में मुस्लिम श्रद्धालु उस पवित्र जगह की सात बार परिक्रमा करते हैं, दुनिया की किसी भी मस्जिद में “परिक्रमा” की कोई परम्परा नहीं है, ऐसा क्यों? हिन्दू संस्कृति में प्रत्येक मन्दिर में मूर्ति की परिक्रमा करने की परम्परा सदियों पुरानी है। क्या काबा में यह “परिक्रमा परम्परा” पुरातन शिव मन्दिर होने के काल से चली आ रही है? अन्तर सिर्फ़ इतना है कि मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं, जबकि हिन्दू भक्त सीधी तरफ़ यानी Clockwise। लेकिन हो सकता है कि यह बारीक सा अन्तर इस्लाम के आगमन के बाद किया गया हो, जिस प्रकार उर्दू भी दांये से बांये लिखी जाती है, उसी तर्ज पर। “सात” परिक्रमाओं की परम्परा संस्कृत में “सप्तपदी” के नाम से जानी जाती है, जो कि हिन्दुओं में पवित्र विवाह के दौरान अग्नि के चारों तरफ़ लिये जाते हैं। “मखा” का मतलब होता है “अग्नि”, और पश्चिम एशिया स्थित “मक्का” में अग्नि के सात फ़ेरे लिया जाना किस संस्कृति की ओर इशारा करता है?

यह बात तो पहले से ही स्थापित है और लगभग सभी विद्वान इस पर एकमत हैं कि विश्व की सबसे प्राचीन भाषा पाली, प्राकृत और संस्कृत हैं। कुर-आन का एक पद्य “यजुर्वेद” के एक छन्द का हूबहू अनुवाद है, यह बिन्दु विख्यात इतिहास शोधक पण्डित सातवलेकर ने अपने एक लेख में दर्शाया है। एक और विद्वान ने निम्नलिखित व्याख्या और उसकी शिक्षा को कुरान में और केन उपनिषद के 1.7 श्लोक में एक जैसा पाया है।

कुरान में उल्लेख इस प्रकार है -
“दृष्टि उसे महसूस नहीं कर सकती, लेकिन वह मनुष्य की दृष्टि को महसूस कर सकता है, वह सभी रहस्यों को जानता है और उनसे परिचित है…”

केन उपनिषद में इस प्रकार है -

“वह” आँखों से नहीं देखा जा सकता, लेकिन उसके जरिये आँखें बहुत कुछ देखती हैं, वह भगवान है या कुछ और जिसकी इस प्रकट दुनिया में हम पूजा करते हैं…”

इसका सरल सा मतलब है कि : भगवान एक है और वह किसी भी सांसारिक या ऐन्द्रिय अनुभव से परे है।

इस्लाम के अस्तित्व में आने के 1300 वर्ष हो जाने के बावजूद कई हिन्दू संस्कार, परम्परायें और विधियाँ आज भी पश्चिम एशिया में विद्यमान हैं। आईये देखते हैं कि कौन-कौन सी हिन्दू परम्परायें इस्लाम में अभी भी मौजूद हैं – हिन्दुओं की मान्यता है कि 33 करोड़ देवताओं का एक देवकुल होता है, पश्चिम एशिया में भी इस्लाम के आने से पहले 33 भगवानों की पूजा की जाती थी। चन्द्रमा आधारित कैलेण्डर पश्चिम एशिया में हिन्दू शासनकाल के दौरान ही शुरु किया गया। मुस्लिम कैलेण्डर का माह “सफ़र” हिन्दुओं का “अधिक मास” ही है, मुस्लिम माह “रबी” असल में “रवि” (अर्थात सूर्य) का अपभ्रंश है (संस्कृत में “व” प्राकृत में कई जगह पर “ब” होता है)। मुस्लिम परम्परा “ग्यारहवीं शरीफ़”, और कुछ नहीं हिन्दू “एकादशी” ही है और दोनों का अर्थ भी समान ही है। इस्लाम की परम्परा “बकरीद”, वैदिक कालीन परम्परा “गो-मेध” और “अश्व-मेध” यज्ञ से ली गई है। संस्कृत में “ईद” का अर्थ है पूजा, इस्लाम में विशेष पूजा के दिन को “ईद” कहा गया है। संस्कृत और हिन्दू राशि चक्र में “मेष” का अर्थ मेमना, भेड़, बकरा होता है, प्राचीन काल में जब सूर्य मेष राशि में प्रवेश करता था तब मांस के सेवन की दावत दी जाती थी। इसी परम्परा को आगे बढ़ाते हुए इस्लाम ने इसे “बकरीद” के रूप में स्वीकार किया है (उल्लेखनीय है कि हिन्दी में भी “बकरी” का अर्थ बकरी ही होता है)। जिस प्रकार “ईद” का मतलब है पूजा, उसी प्रकार “गृह” का मतलब है घर, “ईदगृह = ईदगाह = पूजा का घर = पूजास्थल, इसी प्रकार “नमाज़” शब्द भी नम + यज्ञ से मिलकर बना है, “नम” अर्थात झुकना, “यज्ञ” अर्थात पूजा, इसलिये नम + यज्ञ = नमज्ञ = नमाज़ (पूजा के लिये झुकना)। इस्लाम में नमाज़ दिन में 5 बार पढ़ी जाती है जो कि वैदिक “पंचमहायज्ञ” का ही एक रूप है (दैनिक पाँच पूजा – पंचमहायज्ञ) जो कि वेदों में सभी व्यक्तियों के लिये दैनिक अनुष्ठान का एक हिस्सा है। वेदों में वर्णन है कि पूजा से पहले, “शरीरं शुद्धयर्थं पंचगंगा न्यासः” अर्थात पूजा से पहले शरीर के पाँचों अंगों को गंगाजल से धोया जाये, इसी प्रकार इस्लाम में नमाज़ से पहले शरीर के पाँचों भागों को स्वच्छ किया जाता है।

इस्लाम में “ईद-उल-फ़ितर” भी मनाया जाता है, जिसका मतलब है “पितरों की ईद” या पितरों की पूजा, अर्थात पूर्वजों का स्मरण करना और उनकी पूजा करना, यह सनातन काल से हिन्दू परम्परा का एक अंग रहा है। हिन्दू लोग “पितर-पक्ष” में अपने पूर्वजों की आत्मा की शान्ति के लिये पूजा-हवन करते हैं उन्हें याद करते हैं यही परम्परा इस्लाम में ईद-उल-फ़ितर (पितरों की पूजा) के नाम से जानी जाती है। प्रत्येक मुख्य त्योहार और उत्सव के पहले चन्द्रमा की कलायें देखना, चन्द्रोदय और चन्द्रास्त देखना भी हिन्दू संस्कृति से ही लिया गया है, इस्लाम के आने से हजारों साल पहले से हिन्दू संकष्टी और विनायकी चतुर्थी पर चन्द्रमा के उदय के आधार पर ही उपवास तोड़ते हैं। यहाँ तक कि “अरब” शब्द भी संस्कृत की ही उत्पत्ति है, इसका मूल शब्द था “अरबस्तान” (प्राकृत में “ब” संस्कृत में “व” बनता है अतः “अरवस्तान”)। संस्कृत में “अरव” का अर्थ होता है “घोड़ा” अर्थात “घोड़ों का प्रदेश = अरवस्तान” (अरबी घोड़े आज भी विश्वप्रसिद्ध हैं) अपभ्रंश होते-होते अरवस्तान = अरबस्तान = अरब प्रदेश।

चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है। हिन्दुओं की भांति इस्लाम में भी वर्ष के चार महीने पवित्र माने जाते हैं। इस दौरान भक्तगण बुरे कर्मों से बचते हैं और अपने भगवान का ध्यान करते हैं, यह परम्परा भी हिन्दुओं के “चातुर्मास” से ली गई है। “शबे-बारात” शिवरात्रि का ही एक अपभ्रंश है, जैसा कि सिद्ध करने की कोशिश है कि काबा में एक विशाल शिव मन्दिर था, तत्कालीन लोग शिव की पूजा करते थे और शिवरात्रि मनाते थे, शिव विवाह के इस पर्व को इस्लाम में “शब-ए-बारात” का स्वरूप प्राप्त हुआ।

ब्रिटैनिका इनसाइक्लोपीडिया के अनुसार काबा की दीवारों पर कई शिलालेख और स्क्रिप्ट मौजूद हैं, लेकिन किसी को भी उनका अध्ययन करने की अनुमति नहीं दी जाती है, एक अमेरिकन इतिहासकार ने इस सम्बन्ध में पत्र व्यवहार किया था, लेकिन उसे भी मना कर दिया गया। लेकिन प्रत्यक्ष देखने वालों का मानना है कि उसमें से कुछ शिलालेख संस्कृत, पाली या प्राकृत भाषा में हो सकते हैं। जब तक उनका अध्ययन नहीं किया जायेगा, विस्तार से इस सम्बन्ध में कुछ और बता पाना मुश्किल है।

(लेखमाला के तीसरे और अन्तिम भाग में संस्कृतनिष्ठ नामों और चिन्हों आदि के बारे में…)
जारी रहेगा भाग…3 में…

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72 comments:

संजय बेंगाणी said...

मेरे टिप्पणी करने न करने से क्या होगा? स्वच्छता वालों को ही आने दें... :)

wahreindia said...

महोदय अगर आपकी इज़ाज़त हो तो ये संपूर्ण सामग्री आपके नाम से अपने ब्लॉग पर भी पोस्ट कर दूं ताकि अधिक से अधिक लोगो तक पहुँच सके.
धन्यवाद

पी.सी.गोदियाल said...

संजय जी, आज वे लोग ९/११ को उनके विरादारो द्बारा धवस्त किये गए ट्रेड टावर का मालवा उठाने में व्यस्त है , हा-हा-हा-हा !

Suresh Chiplunkar said...

@ wahreindia - आप यह सामग्री ले सकते हैं और अपने ब्लाग पर सजा सकते हैं, सिर्फ़ मेरे ब्लाग का लिंक अथवा नाम दे दें, इतनी अर्ज़ है।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

जी हाँ, ये सब चीज़ें हिन्दुओं से इस्लाम में आयीं.....और विडम्बना देखिये 'हिन्दू' शब्द ही मुसलमानों का दिया हुआ है.......

काफ़ी समानताएं हैं.......

(wait for my new post भगवान् शिव काबा में विराजमान हैं Answer to Suresh Chiplunkar)

SHASHI SINGH said...

दिल बड़ा और दिमाग खुला हो तो ऐसे बहुत से रास्ते हैं जिसके सहारे आपस में मिलके रहा जा सकता है। अमन और चैन से रहने की शर्त्त शायद मैंने थोड़ी कड़ी लगा दी।

wahreindia said...

सुरेश जी धन्यवाद

बेरोजगार said...

मैं आप से पूरी तरह सहमत हूँ. क्योंकि हमारे पुरखे व्यापार करने जाते थे और महीनों,सालों में लौटते थे. धर्मशाला और मंदिर बनवाना हिन्दू धर्म में पुण्य का काम माना जाता था. अगर अरब में हिन्दू व्यापारियों द्वारा मंदिर बनवा दिए गए हों तो इसमें क्या आश्चर्य? हिन्दू धर्म के सारे कार्यों को उल्टा कर दो तो 'इसलाम' बन जाता है.कभी कभी तो ऐसा लगता है हिन्दुओं के विरोध स्वरुप ही इसलाम का प्रादुर्भाव हुआ है.डिस्कवरी के एक कार्यक्रम में एक मुस्लिम देश में कुछ इमारतों को दिखाया गया, जिसमें हिन्दू व्यापारी रूकते थे. @स्वच्छ जी को इसमें चिढ़ने की जरूरत नहीं है.मैं तो ये भी कहता हूँ हिंदुस्तान और पाकिस्तान के आधे से ज्यादा मुस्लिम 'हिन्दू' ही हैं,जिन्होंने धर्म परिवर्तन कर लिया डर की वजह से. .

गरुणध्वज said...

चलिए सलीम खान ने माना तो सभी चीज़ें हिन्दुओं की दी हुई है इस्लाम को
बस बुराइयों को छोड़कर जो वैसे भी 99% भरी हुई हैं इस्लाम में |

और ये महाशय पिछले कुछ लेखों से बस अपनी पोस्ट का इंतज़ार करवा रहें हैं शायद मुहम्मद साहब खुद उतरने वाले हैं लिखने ?

वैसे सलीम मियां नीचे के कुछ सवालों का जवाब दे दीजिये तो :

(1) "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है "

भाई हमने तो सुना है की केवल गन्दगी वाले ही अल्लाह को पसंद आते हैं उनमे से भी वह जिन्होंने सर पर जालीदार टोपी और एक फ़ुट की दाढ़ी रखी हो, तो ऐसा क्यों होता है काबा में ?......क्या वहां कोई दुसरे देवता हैं क्या ?

या अल्लाह का नया आधुनिक रूप है वैसे वो तो ७वी सदी के बाद बदला ही नहीं है ?

(२)काबा के पास भी एक पवित्र झरना पाया जाता है, इसका पानी भी पवित्र माना जाता है

क्या सलीम मियां इस झरने के पानी की क्या जन्नत से सीधे सप्लाई है क्या ? या इसके पानी में भी कीडे नहीं नहीं पड़ते ?

(3)मुस्लिम श्रद्धालु ये परिक्रमा उल्टी ओर (Anticlockwise) करते हैं?

यार तुम लोग परिक्रमा भी करते हो तो क्या कुरआन में भी निर्देश है की काबा की परिक्रमा करो तो क्यों ?

और तुम लोग सभी काम सभी धर्मो से उल्टा क्यों करते हो , सोते उल्टे हो , लिखते उल्टे ही हो , परिक्रमा भी वही उलटी ही ,
और यहाँ तक की सोचते भी उल्टा हो (सोचते भी हो या नहीं इस बारे में बुद्धिजीवियों में मतभेद है) ,
सभी सूर्य को उर्जा का स्रोत मानते हैं और तुम चाँद में अटके हो ?

यहाँ तक की सारी दुनिया आगे जा रही है और तुम लोग पीछे जा रहे हो |

अजीब हाल है यार तुम लोगों का सभी कर्म में उल्टे, अच्छा है चलते सीधा हो वर्ना आपकी बिरादरी को अजायब में रखने की कोई कसर थी वह पूरी हो जाती |




:) :( :P :D :$ ;) ;) :$ :D :P :(

जी.के. अवधिया said...

परिक्रमा तो शुद्ध हिन्दू रीति ही है। एक प्रश्न यह भी उठता है कि यदि काबा में परिक्रमा की जाती है तो फिर अन्य मुस्लिम इबाबतगाहों में क्यों नहीं?

आपके तर्क वास्तव में अच्छे हैं किन्तु विडम्बना तो यह है कि लोग उसे सुनना-समझना ही नहीं चाहेंगे। हाँ सोते हुए को तो जगाया जा सकता है पर जागे-जागे सोये रहने वाले को नहीं जगाया जा सकता।

Rakesh Singh - राकेश सिंह said...

सुरेश जी आपने जो लिखी है वो एक ऐसा विस्फोट है जिसमे तथ्यों के सहारे सच्चाई सामने आई है | मैं आभारी हूँ की आपने इस विषय पर अपने ब्लॉग मैं पोस्ट किया है |

अभी तक के सारे खोज-बिन इसी बात की पुश्टी करते हैं की काबा शिव मंदिर था | आपने तो सारे बात कह ही दी, और इसपे क्या कहें |

विवेक सिंह said...

इति सिद्धम् !

संजय तिवारी said...

काबा में शिव मंदिर और इधर ताजमहल के नीचे भी शिव मंदिर. इनमें सच्चाई भी हो तो क्या हो जाएगा?

ये तर्क ऐसे ही होते हैं जैसे यह कहें कि कपड़े के नीचे हर आदमी नंगा है. खैर, इस देश में लोग अपने अतीत को ही याद करके प्रसन्न हो जाते हैं.

Common Hindu said...

Hello Blogger Friend,

Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/

- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.

Vivek Rastogi said...

सुरेशजी इस बेहतरीन शोध के लिये बहुत बधाई, और बहुत आभार इसमें इतना ऊर्जा लगाने और समय लगाने का ।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

मुस्लिमों को आगे आना चाहिये और जो तथ्य कह रहे हैं उन्हे स्वीकार करना चाहिये. कुतर्कों से काम नहीं चलता. आपका लेख बहुत सार्थक,सोद्देश्य तथा तथ्यपूर्ण है. मुझे अब इन्तजार है कैरानवी जी का तथा सलीम मियां का, देखिये किन कुतर्कों के साथ हाजिर होते हैं. वैसे मैंने काफी अरसा पहले कहीं यह पढ़ा था कि मुस्लिमों की उत्पत्ति कौरवों से हुई थी. उसमें कई तर्क भी दिये थे जो अब मुझे याद नहीं.बहरहाल यदि मुस्लिम खुले दिमाग से सोचें तो शायद भारत में सौहार्द बढ़ सकता है.

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश जी,
एक सलाह है :- आगे से कुरआन को सही तरह से लिखा करें...सही अलफ़ज़ xकुरानx नही xकुरआनx है

सबसे पहले आपने इस लेख को लिखने के लिये जो मेहनत की है उसकी मैं दाद देता हूं...लेकिन आपके दिये गये तथ्यों से मैं सहमत नही हूं

क्यौं नही हूं ये मैं आपके लेख के अनुसार एक-एक करके आपको बता रहा हूं---

जैसा की मैं आपके पिछ्ले लेख पर बता चुका हूं..... काबा पर हर साल कोई मेला नही होता था...वहां पर लोग "हज" करने आते थे...उसको पहले भी "हज" कहा जाता था और आज भी "हज" कहा जाता है...बस फ़र्क काबा में रखे ३६० बुतों का है पहले लोग उनकी इबादत करते थे....

आपने कहा "मक्का शहर से कुछ मील दूर एक साइनबोर्ड पर स्पष्ट उल्लेख है कि “इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का आना प्रतिबन्धित है…”। यह काबा के उन दिनों की याद ताज़ा करता है, जब नये-नये आये इस्लाम ने इस इलाके पर अपना कब्जा कर लिया था। इस इलाके में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश इसीलिये प्रतिबन्धित किया गया है, ताकि इस कब्जे के निशानों को छिपाया जा सके।"

ये हुक्म कुरआन में दिया गया कि गैर-मुस्लिमों को काबे से दुर कर दो....उन्हे मस्जिदे-हराम के पास भी नही आने देना

आपने कहा :- "जैसे-जैसे इस्लामी श्रद्धालु काबा की ओर बढ़ता है, उस भक्त को अपना सिर मुंडाने और दाढ़ी साफ़ कराने को कहा जाता है। इसके बाद वह सिर्फ़ “बिना सिले हुए दो सफ़ेद कपड़े” लपेट कर ही आगे बढ़ सकता है। जिसमें से एक कमर पर लपेटा जाता है व दूसरा कंधे पर रखा जाता है।"

इसमे आप गलत है :- सिर्फ़ सर मुडांया जाता है...ढाढी नही मुडांई जाती है

आपकी जानकारी के लिये आपको बता दूं "काबा" दरगाह नही है

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

आप कौन से पारम्परिक अरबी आलेखो की बात कर रहे हैं....ज़रा हमे भी बतायें..

"काबा" में जो ३६० बुत रखे थे वो किसी तुफ़ान में नही टुटे थे बल्कि उनको "मक्का फ़तह" के वक्त हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वसल्लम ने अपनी छ्डी से तोडा था...हर बुत को तोड्ते जा रहे थे और कुरआन की आयत पढते जा रहे थे सुरह बनी इसराईल सु.१७ : आ. ८१ "और तु कह कि अल्लाह की तरफ़ से हक आ चुका है और झुठ नाबूद हो चुका है क्यौंकि झुठ बर्बाद होने वाला है


इस बात के बाद आपके नवग्रह की पुजा वाली बात खारिज हो जाती है।

"आबे ज़म-ज़म" झरना नही है...वो एक कुआं है जनाब...

18x14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है...
4000 साल पुराना है...ना कभी सुखा...ना कभी स्वाद बदला...
आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा...ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें...

युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।

ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है...8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है....

और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

@ काशिफ जी, यदि हो सके तो कृ्प्या "मस्जिदे हराम" का हिन्दी अर्थ बताने की कृ्पा करें।।

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

लो जी ये गंगा वाली बात भी गलत साबित हो गयी।

जनाब "बकरीद" भारतीय उपमहाद्विप मे कहा जाता है वो भी इस वजह से क्यौंकि यहां पर बकरे की कुरबानी दी जाती है...आपको पता नही है क्या "बकरीद" का असली नाम "ईद-उल-अज़हा" है।

ये बात तो ५वीं के बच्चे को भी पता होती है...


"ग्यारवीं शरीफ़" इस्लाम में नही है....इसका कुरआन या किसी भी सही हदीस में ज़िक्र नही है...ये भारतीय उपमहाद्विप के कुछ मौलवियों के दिमाग की उपज है जिनका पेट हलाल की कमाई से नही भर रहा था तो उन्होने अनपढ मुसलमानों के वर्ग को निशाना बना कर अलग-अलग त्योहार बनायें है...अरब में आपको "ग्यारवीं शरीफ़" का नामोनिशान नही मिलेगा..

भारतीय उपमहाद्विप में ऐसे बहुत से त्योहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नही है--- ये त्योहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज है जैसे :- मोहर्रम, शबे-बारात, ईद-मिलादुनबी, ग्यारवीं, टिकियां,

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश भाई,
दुसरे का लिखा अपने ब्लोग पर उतारने से पहले थोडा दिमाग तो लगा लेते...

आपने ये लेख कहां से लिया है...

ये लेख 7 November 2004 को इस वेबसाइट पर छपा था...


http://www.hinduism.co.za/kaabaa.htm



"ईद-उल-फ़ितर" के मायने "पितरो की ईद" नही है.....आपको फ़ितर और पितरों में कोई फ़र्क नज़र नही आता

"फ़ितर" शब्द "फ़ितरा" से आया है... ये एक खास किस्म का दान होता है जो ईद का चांद दिखने के बाद से ईद की नमाज़ से पहले देना होता है......जो ढाई किलो गेहूं के बराबर होना चाहिये...या तो अनाज दे दिजिये या नकद पैसा दे दिजिये---लेकिन अनाज देना अफ़ज़ल है और ये हर बालिग पर फ़र्ज़ है...

बाकी जवाब बाद में....बहुत देर हो गयी है मुझे 3 बजे सेहरी के लिये उठना है...

Mohammed Umar Kairanvi said...

भैया चिपलूनकर तनिक प्रतीक्षा करो, कैरानवी बिना तुम्‍हें मजा भी नहीं आ रहा होगा, क्‍या करूं अधिकत्‍ार मुसलमानों की तरह रमजान मे पूरे दिन भूखा रह कर गरीबों की भूख से पतिचित हो रहा हूं , पिछली बार तो तुम रेल में चुटकुले सुनाने गये थे अबकि बार कहां जाओगे?
अभी में यह तोडमरोड कहानी पढ रहा हूं फिर जवाब भी दूंगा महानुभव तब तक विचार करो कि
मुहम्मद सल्ल. सर्वधर्म के कल्कि व अंतिम अवतार? या यह Big gamge against Islam है?
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इस्लामिक पुस्तकों के अतिरिक्‍त छ अल्लाह के चैलेंज
islaminhindi.blogspot.com (Rank-2 Blog)

Mohammed Umar Kairanvi said...

@ श्री राकेश सिंह जी जहाँ कहीं भी हों ध्‍यान दें, पुस्‍तक 'कल्कि अवतार और मुहम्मद साहब' पर आपके लिये एक अजनबी ने निम्‍नलिखित कमेंटस छोडा है सभी कुप्रचारीयों से मशवरा करके जवाब से नवाजियेगा, और मुझे जो कमेंटस द्वारा आपने बताया था कि अंतिम अवतार पर पुस्‍तक लिखने वाले श्रीवास्‍तव जी मुसलमान होगये हैं उनका मुस्लिम नाम बतादिजिये ताकि वह शुभ नाम भी उसके साथ लिख सकूं आपके सहयोग का जिक्र भी वहां अवश्‍य करूंगा,

Anonymous said...
राकेश सिंह जी आपकी टिप्पणी के लिए धन्यवाद, मैं भी विभिन्न धर्मों का ज्ञान प्राप्त करने में बहुत रुचि रखता हूँ, और मैं जानता हूँ कि शायद इस पुस्तक का अपजैसे कुछ लोगों पर कोई प्रभाव नहीं होगा - लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस अवतार के चक्कर ने कई हिन्दूओं का धर्मपरिवर्तन करा दिया है, जी हाँ - वे मुसलमान तो नहीं बन पाए लेकिन बहाईयों (बहाई धर्म - जिनका नई दिल्ली में लोटस मंदिर है) ने इस शब्द का उपयोग कर के लाखों हिन्दुओं का धर्म परिवर्तन करा दिया. आज भारत में 15 से 20 लाख बहाई हैं और इन में से सिर्फ 1 प्रतिशत मुसलमान थे बाकी सभी हिन्दू थे. क्या आपने कभी इस धर्म का क्रिटिकल अभ्यास किया है. मैं आपकी सेवा में एक लिंक दे रहा हूँ, अगर आप इसको पढ़ेंगे तो शायद आपके लिए यह मामला और साफ होजाए.

http://www.h-net.org/~bahai/bhpapers/vol2/india2.htm

इसे ज़रूर पढ़ीयेगा ज़रूर

आपका छोटा भाई.

Mohammed Umar Kairanvi said...

चिपलूनकर जी आप हिन्‍दू विरोधी हो, मिडिया को हिन्‍दू विरोधी बताकर वहाँ धर्म को ठेस पहुंचाई खामखाह दूसरे धर्म वालों को भी जगा दिया अब वह कहेंगे भैया हमारा भी पैसा लगा है इस टी.वी चेनल में हमारे धर्म का भी प्रचार करो, अब इस पोस्ट से तो आपने हिन्‍दू-मुस्लिम को एक करने का सिरा ही थमा दिया, मेरी तबियत बाग-बाग करदी अरे जनाब इस तोड मरोड कहानी का तो हर जवाब मैं एक पुस्‍तक के रूप में नेट जगत को प्रस्‍तुत कर चुका, जिसमें श्री अनुवाद सिंह का सहयोग का वर्णन अवश्‍य करूंगा उन्‍होंने मनु श्‍लोक पर बहस करी तो मैं ले आया 'वेद-कुरआन' की शिक्षाओं पर आधारित पुस्‍तक 'अगर अब भी ना जागे तो' जिसने मेरे विचार ही बदल दिये, मुझे मालूम हुआ तुम लोग तो मेरे बिछुडे भाई हो, मनु नौकासवार की नसल से तुम भी हम भी, scribd पर है इस लिये 2 मिनट भी नहीं लगेंगे,जरा झांक आओ अध्‍याय14 'वैदिक धर्मों में काबे की हक़ीक़त, पृष्‍ठ 139 से 143'
http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

झलक दिखादूं तब जाओगे तो लो, दुनिया जानती है काबा को हमने पृथ्‍वी का मध्‍य साबित किया है, वहीं है आपका हमारा तीर्थ, पुस्‍तक में यह भी बताया गया है कि वह आपको कैसे मिल सकता हैः, नीचे दिया गये श्‍लोक का अनुवाद करने की आवश्‍यकता नहीं पडेगी,
'इलायास्‍तवा पदे वयं नाभा पृथिव्‍या अधि' ऋगवेद 3-29-4

fishabab said...

sriman mhudyee ka pura lyekh me ne phra muje lagta un ko or bho islam kebare pata karna chyee kuii ki bhut sari batyee nirdhaar he unhyee bhut acchyee se pataa karna hogaa or islam ke bryee me patna karna ho ga.

farooque shabab
duabi

Dr.Aditya Kumar said...

आपके आलेख शोध परक होते हैं ,आप मेहनत करते हैं. पर लेखन वही रचनात्मक है जो समाज में दिलों को जोड़े ,न कि आहात करे. काबा को शिव मंदिर सिद्ध करने से क्या हो जायेगा. काबा काबा ही रहेगा ,शिव मंदिर नहीं बन सकता. ,वैसे भी हमारे देश में अनेक शिव मंदिर ऐसे है जिनका रख -रखाव होना ही एक चुनौती है.आप जीनियस है .आपका लेखन समाज को एक नई सकारात्मक दिशा एवं प्रेरणा दे न कि विवाद ,यह मेरी अभिलाषा है,

mahashakti said...

संग्रहणीय लेख

SANJAY KUMAR said...

In spite of the fact that your are trying to prove common ancestry and origin and trying to draw similarity between Islam and Hinduism, are your ready to accept Arabs as your own sibling.

Suppose they revert back to their original practice and adopt all the practices of Bramhin, say Konkanath Bramhin, shall you be ready to accept as your brother?
If not, there is no purpose of writing such article

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक said...

अनुसन्धानात्मक लेख में आपने बड़ा परिश्रम किया है।
बधाई!

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

भाई वाह ! काशिफ भाई !! कमाल की धुलाई कर दी... सारे कुतर्कों की 'वाट' ही लगा दी....

सच तो ये है ब्लॉगर बन्धुवों कि इस्लाम अर्थात सनातन धर्म एक ही है.

कुर'आन में अल्लाह सुबहान-व-ताला फरमाता है कि "ऐसी कोई क़ौम न हीं जहाँ हमने समझाने वाला नहीं भेजा" अल्लाह सुबहान-व-ताला ने यह भी फ़रमाया कि "मैंने सभी क़ौम में हिदायत की किताब अता करी है"

और देखिये इस एक वाक्य से यह सिद्ध हो सकता है कि वेद भी (हो सकता है) ईश्वर की पुस्तक हो... और वेदों में कई जगह साफ़ तौर पर लिखा है ईश्वर एक ही है और वेदों में कई जगह मुहम्मद (स) का ज़िक्र है.

यानि ला इलाहा इल्लल्लाह, मुहम्मद उर-रसूलुल्लाह

जगतगुरु शंकराचार्य ने भी कहा था कि "वेदों का रस निचोड़ कर रख दिया इस एक वाक्य ने"

मुहम्मद उमर कैरानवी भाई की टिपण्णी भी बहुत महत्वपूर्ण है...

अब सुरेश बाबू ने जब मान ही लिया है... तो उन्हें देर नहीं करनी चाहिए...

Suresh Chiplunkar said...

@ काशिफ़ आरिफ़ - शायद आपने ठीक से पढ़ा नहीं, मैं पहले ही उल्लेख कर चुका हूं कि यह सारे निष्कर्ष और तथ्य इतिहासकार पीएन ओक साहब के हैं…। मैं जो भी डाटा कहीं से भी लेता हूं उसका उल्लेख अवश्य करता हूं, जरा तीसरे भाग तक सब्र कीजिये सारी लिंक्स दूंगा। "मस्जिदे-हराम" का मतलब भी बताईयेगा और पास नहीं फ़टकने देने को क्यों कहा गया था यह भी। क्या "मस्जिदे-हलाल" भी कोई टर्म होती है, यदि हो तो उसका अर्थ भी बतायें। यह भी बतायें कि वे साहब, छड़ी से उन 360 बुतों को क्यों तोड़ रहे थे? जैसे आपके तर्क और तथ्य हैं और आपने भी कहीं से उठाये होंगे, ठीक वैसे ही ओक साहब का भी अपना शोध है… इस मामले में सलीम जी को एक सलाह कि "कुतर्क" दूसरे लोग भी कर सकते हैं… अकेले आप नहीं।

@ कैरानवी - कृपया सीधी-सादी भाषा में लिखें भाई, मुझे आज तक आपकी एक भी बात समझ में नहीं आई, कि आखिर आप कहना क्या चाहते हैं? कभी किसी तथाकथित अवतार के बारे में, कभी कुरआन को लेकर, कभी कुछ-कभी कुछ…। हिन्दी में लिखिये ना तो मुझे समझ में भी आये। "गोल पृथ्वी" के बीचोंबीच(?) काबा कैसे होता है इस बात का भी पता लगाना होगा। :)

cmpershad said...

ये मज़जिद है वो बुतखाना

चाहे ये मानो या वो मानो॥

rkg said...

SHRI MAAN KASHIF JI, VAISE YE CHHADI KIS CHEEJ KI BANI HUI THI JISKE LAGNE SE HI SAARE STATUE (BUT) TOOT GAYE.

wahreindia said...

सुरेश जी आपका कारया सराहनीय है आप फ़िज़ूल की बकवास पर ध्यान ना देकर आगे बढ़ते रहिए अंत मे आपका धन्यवाद आपकी पोस्ट को मेरे ब्लॉग पर प्रस्तुत करने की इज़ाज़त देने के लिए.
http://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश भाई,

मैने भी तो यही कहा है जो आप कह रहे है...

मैने ऐसा इसलिये कहा कि आप इतने अच्छे पत्रकार है बात की गहराई में जाते है...तो दुसरे का शोध और लोगो तक पहुचाने से पहले थोडा दिमाग लगाकर सोच लेते...

"काबा" को मस्जिदे-हराम इसलिये कहा गया है क्यौंकि यही एक मस्जिद है जो गैर-मुस्लिमों पर हराम की गयी है.....वरना गैर-मुस्लिम हर मस्जिद में जा सकते है..उनको मस्जिद में जाने को मना नही है। मुसलमानों को गैर-मुस्लिम को मस्जिद में जाने से रोकने का हुक्म सिर्फ़ एक हालत में है जब गैर-मुस्लिम के इरादे गलत हो...वो मस्जिद को नुक्सान पहुचाने का इरादा रखता हो...

पास नही फ़टकने को इसलिये कहा गया था क्यौंकि इब्राहिम अलैहि सलाम के काबा बनाने के बाद काफ़िरों ने उस पर कब्ज़ा कर लिया था...और वहां अपने खुदाओं के बुत रख दिये थे...तो जब मक्का फ़तह किया गया तो साफ़ ताकिद कर दी गयी की काफ़िरों इसके पास फ़टकने भी नही देना क्यौकि हो सकता है वो दोबारा इस पर कब्ज़ा करने कि कोशिश करें।

अल्लाह के रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम के हाथ में उस वक्त छ्डी थी तो उन्होने उन बुतों को छ्डी से तोडा....ये तो आम बात है

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

आगे के जवाब :-

आपने कुरआन कि कुछ आयतों का ज़िक्र किया है चन्द्रमा के बारे में विभिन्न नक्षत्रीय तारामंडलों और ब्रह्माण्ड की रचना के बारे में वैदिक विवरण कुरान में भी भाग 1, अध्याय 2, पैराग्राफ़ 113, 114, 115, 158 और 189 तथा अध्याय 9, पैराग्राफ़ 37 व अध्याय 10 पैराग्राफ़ 4 से 7 में वैसा ही दिया गया है।


आपने इन आयतों के नंबर वगैरह ठीक से नही दिये है...इसलिये इनके बारे में बाद में बात करेंगे।

हां कुरआन में स्पेस साइंस के मुताल्लिक बहुत सी आयतें हैं जिसमें काफ़ी कुछ बताया गया है जो अब साइंटिस्ट बता रहे हैं।

जैसा कि मैं पिछली टिप्पणी में बता चुका हूं "शबे-बारात" का कुरआन या किसी भी हदीस में जिक्र नही है...ये हिन्दुस्तान के कुछ मुल्लाओं की ईजाद हैं।

जगदीश त्रिपाठी said...

सुरेश भाई,
दरअसल यह निवेदन मैं तभी करने जा रहा था, जब आपने इस आलेख की पहली कड़ी लिखी थी। लगभग पूरी टिप्पणी लिख चुका था कि एक खबर को लेकर आपाधापी मच गई और टिप्पणी पोस्ट नहीं कर सका। फिर रात देर हो जाने के कारण सीधे आवास पर चला आया और भूल गया। निवेदन है कि चूतियों के चक्कर में न पड़ें। क्योंकि हर चीज की हद होती है, चूतियापे की नहीं। बेहतर हो कि इनकी टिप्पणियां आप डिलीट कर दें। ये अपने कुतर्क का कचरा अपने ब्लॉग पर ही परोसें। सो आप अपना काम करें। अच्छा कर रहे हैं। साधुवाद के पात्र हैं।

wahreindia said...

आदरणीय सुरेश जी इंटरनेट पर सरफिंग के दौरान एक बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है अवश्य देखे
गुजरात दंगो का सच - मीडिया द्वारा फेलाए भ्रम का सच
इसका लिंक आप यहा से प्राप्त कर सकते है. क्षमा चाहता हू मेरी हिन्दी कमज़ोर है पर यदि आप इसे उचित समझे तो इसका हिन्दी अनुवाद करके पोस्ट करके अपने ब्लॉग पर एक नेक काम कर सकते है
http://wahreindia.blogs.linkbucks.com/

VIJAYENDRA said...

sureshjee,
aksar aap nirman samvad par aate hai, socha kee mai bhee nyotaa poora kar doon.yah lekh padha.atma-mugdha honaa achha hai, par aseem aatm- mugdhtaa achhee nahee hai. mana kee aapke kathit hidutwa ka samrajya duniyaan me faila tha. kaikayee kakrkas kee gandharee gandhar kee.ahiraawan patal lok yanee america ka,ghodraa pradesh yanee poora arabian country sab aapka hee raha. mohammad ka baal bhee aapke hajrat bal me hee hai.

duniyaa ke saare dharam,mahapuroos do kauree ke hain, aap nahee hote to e log janm hee nahee le paate

VIJAYENDRA said...

bare samraajyawadee the aap log bhai.,Bush ka baap bhee itnaa bada samrajya vistaar nahee kar paata jitnaa aapne kiyaa......? bade miyan to bade miyan chhote miyan subhan allaah...sangh se lekar suresh chiplunkar tak sabhee log ek hee saoloon me baal katate hain..
mana kee dada ke paas haathee huaa karta tha, ab janjeer hila- hila kar desh ko kya dikhana chahte hain..?

flare said...

बहुत बेहतरीन लेख ...... पर कई जगहों पे सन्दर्भ/ चित्र दिए जाने पे थोडा और मजा आता ...........

Press Club of Kairana said...

chiplonkar sahab aapki jhot mot ki khani barbad hone per mery taraf se badhai

निशाचर said...

@ काशिफ आरिफ
भारतीय उपमहाद्वीप में ऐसे बहुत से त्यौहार आपको मिल जायेंगे जो इसलाम में नहीं हैं - ये त्यौहार शिया समाज तथा कुछ मौलवियों की उपज हैं जैसे :-मुहर्रम, शबे बारात , ईद उल मिलादुल नबी, ग्याहरवी, टिकिया,

तो भाई आरिफ आपके यहाँ तो फतवों से बड़े - बड़े मसले निपटा लिए जाते हैं, क्यों नहीं इन सबको गैर- इस्लामी (काफिर) घोषित कर देते, या फिर "हाथी के दांत " वाला मसला है.

और जहाँ तक नक़ल की बात है तो नक़ल पूर्ववर्ती की होती है. सभी जानते हैं कि इसलाम का प्रादुर्भाव सातवी- आठवीं सदी में हुआ जबकि सनातन धर्म का इतिहास ईसा से दो हज़ार साल पहले तक प्रमाण सहित खोजा जा चुका है. क्या यह संभव है कि वैदिक धर्म इसलाम की नक़ल पर आधारित हो? यह तो बच्चे द्वारा अपने बाप को पैदा करने जैसी असंभव कल्पना है.

आँखे खोल कर सत्य को स्वीकार करो, कुँए के मेंढक बनकर कुछ हासिल नहीं होने वाला. जन्नत की हूरों के चक्कर में क्यों अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हो........

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

@ निशाचर जी,

इस सिलसिले पर काम और कोशिशे जारी है...लेकिन ये लोगो के दिलो-दिमाग में बहुत गहराई से बस चुका है...फ़तवे निकालने वाले लोग ही इसमें शामिल हैं और जब इस मसले पर सुबुतों और हदीसों को पेश करने की बात आती है तो उन लोगो की "अना" बीच में आ जाती है।

जनाब आपसे किसने कहा कि इसलाम सातवी-आठवीं सदी में हुआ...जब से दुनिया बनी है तब से इस्लाम है...

अल्लाह ने दुनिया में 1,24,000 नबी और रसुल भेजे और सब पर किताबे नाज़िल की...

कुरआन में नाम से 25 नबी और 4 किताबों का ज़िक्र है.... कुरआन में बताये गये २५ नबी व रसुलों के नाम बता रहा हूं...उनके नामों के इंग्लिश में वो नाम दिये है जिन नामों से इन नबीयों का ज़िक्र "बाईबिल" में है....

1. आदम अलैहि सलाम (Adam)
2. इदरीस अलैहि सलाम (Enoch)
3. नुह अलैहि सलाम (Noah)
4. हुद अलैहि सलाम (Eber)
5. सालेह अलैहि सलाम (Saleh)
6. ईब्राहिम अलैहि सलाम (Abraham)
7. लुत अलैहि सलाम (Lot)
8. इस्माईल अलैहि सलाम (Ishmael)
9. इशाक अलैहि सलाम (Isaac)
10. याकुब अलैहि सलाम (Jacob)
11. युसुफ़ अलैहि सलाम (Joseph)
12. अय्युब अलैहि सलाम (Job)
13. शुऎब अलैहि सलाम (Jethro)
14. मुसा अलैहि सलाम (Moses)
15. हारुन अलैहि सलाम (Aaron)
16. दाऊद अलैहि सलाम (David)
17. सुलेमान अलैहि सलाम (Solomon)
18. इलियास अलैहि सलाम (Elijah)
19. अल-यासा अलैहि सलाम (Elisha)
20. युनुस अलैहि सलाम (Jonah)
21. धुल-किफ़्ल अलैहि सलाम (Ezekiel)
22. ज़करिया अलैहि सलाम (Zechariah)
23. याहया अलैहि सलाम (John the Baptist)
24. ईसा अलैहि सलाम (Jesus)
25. आखिरी रसुल सल्लाहो अलैहि वस्सलम (Ahmed)



इन नबीयों में से छ्ठें नबी "ईब्राहिम अलैहि सलाम" जिन्होने "काबा" को तामिल किया था उनका जन्म 1900 ईसा पूर्व हुआ था....

अब आप बतायें कि "बाप कौन है और बेटा कौन?"

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

@ निशाचर जी,

जिस कहानी को आप और सुरेश जी सत्य कह रहे है उसे सत्य तो साबित कीजिये...

मैं इतिहास का जानकार नही हूं मैने सुरेश जी के लेख में जितनी गलतियां निकाली सब कुरआन और हदीस की जानकारी के बल पर निकाली है....

और इतनी कमिंयां निकलने के बाद कोई शोध सत्य कैसे हो सकता है???????

अब मुझ जैसे इतिहास की कम जानकारी रखने वाले ने इतनी कमियां निकाल दी........ज़रा सोचिये की इतिहास और इस्लाम दोनो का जानकार इंसान इसमें कितनी कमियां निकालेगा??????



सुरेश जी से एक सवाल :-

आपने अपने पहले लेख "राजा विक्रमादित्य" का ज़िक्र किया है....

क्या आप बता सकते है कि उनका जन्म और मुत्यु कब हुई थी?

और जैसा मैं सोच रहा हूं अगर आपका जवाब मेरे अनुरुप हुआ तो ये बहस और विचार-विमर्श यही खत्म हो जायेगा

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

जगदीश त्रिपाठी जी और गरूणध्वज जी,

ब्लोग के रुप में हम लोगो को बहुत अच्छा मंच मिला है....

तो कृप्या करके इसका सही और अच्छा उपयोग करे...

यहां बहस बहुत सार्थक और तथ्यों के दम पर हो रही है.....अगर आप लोग तथ्य पेश कर सकते है तो कीजिये....

अगर आप लोग सार्थक बहस नही कर सकते है तो बहस में हिस्सा मत लीजिये।

किसी भी धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये कृप्या करके उन शब्दों का उपयोग ना करे...जो शब्द आप अपने धर्म और धर्म-ग्रन्थ के लिये ना सुन सकें।

ये गुज़ारिश मैं सारे हिन्दी ब्लोग्गर्स से पहले भी कर चुका हूं अपने लेख में और अब भी कर रहा हूं....

Suresh Chiplunkar said...

@ काशिफ़ आरिफ़ -
1) अपशब्दों का प्रयोग करना मैं भी अनुचित समझता हूं, इसलिये आपकी इस बात से सहमति। आपने देखा होगा कि सलीम की साइट पर भी मैंने कभी अपशब्दों का प्रयोग नहीं किया है…। जो भी टिप्पणीकार ऐसा कर रहे हैं, वे अपनी जिम्मेदारी समझें, तथ्य रखें, तर्क रखें, व्यंग्य करें, हँसी उड़ायें लेकिन सभ्य शब्दों में। मैं बस इतना ही कह सकता हूं, हाँ ये बात जरूर है कि मैं इन टिप्पणियों को हटाऊंगा नहीं, क्योंकि मैं शुरु से इसके खिलाफ़ रहा हूं…
2) यदि आप इस्लाम को वैदिक संस्कृति से पुराना माने बैठे हैं, तब तो बहस की कोई गुंजाइश ही नहीं बचती… जो भी पुरावशेष सारी दुनिया में मिले हैं और मिलते रहते हैं उनकी कार्बन डेटिंग के आधार पर ही लगभग सभी इतिहासकार सहमत हैं कि वैदिक संस्कृति हजारों वर्षों पुरानी है, जबकि इस्लाम और ईसाईयत बहुत बाद में आये… आप नहीं मानना चाहते हों तो न मानें, आपकी मर्जी।
3) दुनिया के प्रत्येक कोने में खुदाई के दौरान हिन्दू वैदिक परम्पराओं से सम्बन्धित देवताओं के चिन्ह और मूर्तियाँ मिलती रहती हैं, ऐसा क्यों होता है? कभी सुनने में नहीं आया, कि रूस या कम्बोडिया अथवा अफ़्रीका में खुदाई के दौरान किसी मस्जिद का गुम्बद प्राप्त हुआ जो इतने हजार वर्ष पुराना है? ऐसी कोई लिंक उपलब्ध हो तो आप बतायें, मैं आपको ऐसी दसियों उदाहरण (डाक्यूमेंट्री प्रूफ़ सहित) दे सकता हूं, जिसमें खुदाई के दौरान प्राप्त ऐसी मूर्तियों का विस्तारपूर्ण अध्ययन किया गया है, और पाया गया है कि ये हजारों साल पुरानी हैं। फ़िर भी यदि आप इस्लाम को, वैदिक परम्परा और संस्कृति से प्राचीन मानते हैं, तो मैं कुछ नहीं कर सकता।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

दर असल मस्जिद-उल-हराम लफ्ज़ भी है और हरम-शरीफ भी है....

अर्थात हराम और हरम...

हराम शब्द का मायने होता है प्रतिष्ठित....

दर असल जिस तरह से ज़ और ज होता है वैसे ही अरबी अक्षरों में एक ह होता है (वैसे ही जैसे हिंदी में बोलते हैं) और एक ह होता है (जो हलक़ से बोला जाता है)

इस तरह जब हम अरबिक शब्द कोष का अध्ययन करेंगे तो पता चलता है कि एक शब्द 'हराम' का मतलब होता है निषेध (prohibited) (यह सामान्य तरह से बोला जाता है, वैसे ही जैसे हिंदी में है)

एक शब्द हराम होता जिसका अर्थ होता है 'प्रतिष्ठित' The Sacred यह हलक़ से बोलते हैं

जब हम प्रतिष्ठित वाला हराम लिखते है हिंदी में तो उसके नीचे बिंदी लगाते हैं...

Masjid-ul-Haram means The Secrad Mosque

Suresh Chiplunkar said...

सलीम ने मेरे बाद टिप्पणी की, फ़िर भी कमाल है, मेरी टिप्पणी का कोई जवाब नहीं, कोई कुतर्क नहीं? :)
काशिफ़ ने "बाप-बेटे वाले" तर्क का जवाब दिया है, अब तो आपको यह साबित करना ही होगा कि इस्लाम विश्व का सबसे पुराना धर्म है। हम साबित करेंगे कि वैदिक संस्कृति सबसे पुरानी है। किसने किसकी नकल की, किसने किसकी परम्परायें उधार लीं, कैसे उन्हें अपने अनुसार बदला आदि-आदि। दूध का दूध पानी का पानी हो जायेगा…। फ़िलहाल आप मानते रहिये कि इस्लाम सबसे पुराना है, लेकिन ऐतिहासिक तथ्यों और शोधग्रंथों को झुठलाना आपके लिये आसान नहीं होगा…

SANJAY KUMAR said...

One small doubt,
If KABA is Shivlinga and there are many idols in the vicinity and Stone Scriptures are Sanskrit and other Indian languages.

How, it was allowed to remain in Centre of Islamic Culture.

Muslims would have destroyed all those symbols as they have done in other part of the world.

दिवाकर मणि said...

प्रमाणयुक्त आलेख हेतु धन्यवाद. सुरेश जी और अन्य पाठक बंधुओं, आप एक बात अवश्य जान लें, कि मियां सलीम और कैरानवी भाई से कभी सार्थक टिप्पणी की आशा नहीं की जा सकती। ये तो वही कहेंगे, जो इनको कहना है। अगर आपको मेरी बात पर विश्वास ना हो तो इनके तथाकथित "स्वच्छ संदेश" पर चले जाइए या फिर अन्य कहीं...एक ही टिप्पणी को हजार बार चिपियाते रहेंगे। हां, काशिफ आरिफ़ भाई की बातों में अवश्य तार्किकता का समावेशन किंचित हद तक मिल सकता है...

Mohammed Umar Kairanvi said...

चिपलूनकर- जो भी अगली बार चुराकर लाओगे देख लेना वेसे सैंकडों प्रश्‍नों का उत्‍तर यानी हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म से संबंधित प्रश्‍नों का उत्‍तर इस बुक में मिल जायेगा, पहले इस बुक में झांक लेना कि आपका जवाब है कि नहीं फिर अपना लेख पिटवाने को रखना,

हिन्‍दू-मुस्लिम धर्म पर सैंकडों सवालों के जवाब पाने के लिये पढें:
सनातन धर्म के अध्‍ययन हेतु वेद-- कुरआन पर अ‍ाधारित famous-book- ''अगर अब भी ना जागे तो''
http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

पुस्‍तक परिचयः
जिस पुस्‍तक ने उर्दू जगत में तहलका मचा दिया (मुसलमान हैरानी में इसका विरोध कर रहे थे) और लाखों भारतीय मुसलमानों को अपने हिन्‍दू भाईयों एवं सनातन धर्म के प्रति अपने द़ष्टिकोण को बदलने पर मजूर कर दिया था उसका यह हिन्‍दी रूपान्‍तर है, महान सन्‍त एवं विद्वान मौलाना आचार्य शम्‍स नवेद उस्‍मानी के ध‍ार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन पर आधारति पुस्‍तक के लेखक हैं, धार्मिक तुलनात्‍मक अध्‍ययन के जाने माने लेखक और स्वर्गीय सन्‍त के प्रिय शिष्‍य एस. अब्‍दुल्लाह तारिक, स्वर्गीय मौलाना ही के एक योग्‍य शिष्‍य जावेद अन्‍जुम (प्रवक्‍ता अर्थ शास्त्र) के हाथों पुस्तक के अनुवाद द्वारा यह संभव हो सका है कि अनुवाद में मूल पुस्‍तक के असल भाव का प्रतिबिम्‍ब उतर आए इस्लाम की ज्‍योति में मूल सनातन धर्म के भीतर झांकाने का सार्थक प्रयास हिन्‍दी प्रेमियों के लिए प्रस्‍तुत है,
http://www.scribd.com/doc/19003014/AGAR-AB-BHI-NA-JAGE-TO-HINDI-

दिवाकर मणि said...

क्या कहा था पाठक बंधुओं मैंने अपनी पूर्व की टिप्पणी में !! एकदम सही निकला ना !! मेरी टिप्पणी के ठीक सोलह मिनट बाद ही पुराना चिपियाउ राग मियां कैरानवी ने अलाप दिया ना?? हा हा हा....

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

दर असल हज़रत आदम (अ) (संसार के सबसे पहले मानव) के दो बेटे थे...(मैं संछिप्त में कहना चाहता हूँ...) वही से यह चला आ रहा है... इस्लाम और कुफ्र (नास्तिक) या मुश्रीक़ (ईश्वर का साझीदार बनाना, बहुदेववाद) का चलन....

मैं वैदिक आदि बहस में न पड़ कर यह कहना चाहता हूँ... कि यह दोनों तभी से है....

वैसे अगर आप वेदों की बात कर रहें है और वैदिक शब्द वेदों की शिक्षाओं से सम्बंधित हो कर, कह रहे हैं तो सुरेश बाबू आप ठीक है क्यूंकि वेदों को मैं (हो सकता है) ईश्वर का ग्रन्थ ही मानता हूँ क्यूंकि उसमें कहीं भी मूर्ति पूजा का ज़िक्र नहीं है...और वेदों में कई जगह कहा गया है कि 'ईश्वर एक ही है, दूसरा नहीं है. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है'...

कृष्ण मोहन मिश्र said...

दमदार पोस्ट और उससे भी दमदार टिप्पणियां ।

Ankhen said...

श्रीवास्ताव जी तो खैर मुसलमान बन गये लेकिन इन साहब का क्या करें ‘इस्लाम ’ क्या है सच – एक मुस्लिम की जबानी , जानिये कि किस कारण  उसने अपने मजहब से किनारा लिया :

Quran

Do they not consider the Qur'an (with care)? Had it been from other Than Allah, they would surely have found therein Much discrepancy Q.4:82

What Quran Teaches?   The intolerant teachings of Islam    Quranic verses

How the Quran lied about Mary and Jesus Christ�s birth? Mohammad Asghar 2005/04/18

An Imperfection in the Perfect Quran Kimble Smith  2004/10/30

Psychotherapy a la Qur�anic verses? Abul Kasem   October .24, 2003

Inheritance Rand 23-Dec-2002

Ankhen said...

Western Scholars Play Key Role In Touting 'Science' of the Quran By DANIEL GOLDEN Staff Reporter of THE WALL STREET JOURNAL  02/15/02
Contradictions in Quran    (Arabic)  S.K.      12/03/01

Folklore in Qur�an-Who was Zul-Qarnain?   S Kamran Mirza

Contradictions,  Inconsistencies and Errors of Quran     S Kamran Mirza

Divinity of Quran     S Kamran Mirza

Did Jesus Escape Crucifixion?   Ali Sina

Inheritance: Who Thought God Maths?   Ali Sina

Masjidul' Aqsa Didn't Allah study history?   Ali Sina
Samaritans and Moses?   Ali Sina

Day of Judgment   Ali Sina

Predestination   Ali Sina

An Open Challenge to Muslims   Is Earth Fixed?    Avijit Roy

Historical Errors of the Qur'an

Qur'anic Language and Grammatical Mistakes

Capricious Revelation of the Qur'an

The Abrogator and Abrogated Qur'anic Verses

The Contradictions of the Qur'an
The Perversion of the Qur'an and the Loss of Many Parts of It

The Content of the Qur'an

Some Ordinances and Laws of the Qur'an

Errors in the Qur'an

Textual Corruption of the Qur'an

Is the Qur'an Written in Pure Arabic?

Ankhen said...

Science and Quran

To argue with a person who has renounced the use of reason is like administering medicine to the dead." -- Thomas Paine More Islamic Pseudo-Science THHuxley 2005/09/26
The Big Bang in the Qur'an 2005/02/21

7 Layers of Heaven Ali Sina 2004/07/12


Super-Scientific Religious Scriptures! Oct 21 2003  Avijit Roy

Is Islam Scientific? By Shafiya April 2002
Does Quran have any Scientific miracles ? By Avijit Roay

Western Scientists Discovered the $cience in Quran Abul Kasem

Religion vs. Modern Science Avijit Roy

Genesis According to Muhammad    Ali Sina

Embryology of Quran     A.E.

Shooting Stars, Allah's Missiles to Scare the Jins?   Ali Sina

Science in the Quran

Scientific Errors of the Qur'an

Ankhen said...

Women in Islam



I have seen that the majority of the dwellers of Hell-Fire were women....[because] they are ungrateful to their husbands and they are deficient in intelligence. " (The Prophet Muhammad) Sahih Bukhari V 2, B 24, N 541
Symposium: Gender Apartheid and Islam 2004/12/31

Islamic Women's Day Abul Kasem 2005/03/14

Importance of Sex in Islam Zaa Brifd 2004/01/18

Beat your wives or �separate from them�? Arab Christian and Egyptian Kafir September 7, 2003
Reclaiming Hijab Or  Declining Freedom? By  Lopa Hassan 09/30/02

Islam, Political Islam and Women in the Middle East. By Maryam Namazie 09/23/02

Women in Islam: An exegesis  By Abul Kasem 08/29/02
Unveiling the Islamic Veil  By Abul Kasem
Inhuman but Islamic Indeed! By Syed Kamran Mirza 04/16/02
Women's High status and Privileged Position  Ayesha A 03/08/02
Holy and blessed Family: An example to emulate?   Abul Kasem   08/19/01

Slave Girls and Their Rights in Islam   07/07/01
Women's Paradise  Abul Kasem   07/01/01

Ambiguity of Dress Code in Islam: Burkha or Hijab (?)   Khurshed Alam Chowdhury   06/14//01

Polygamy  Fatemolla
Some Weird Logic in the Polygamy Debate   Aparthib Zaman

I Apologize   Fatemolla
Status of Women in Islam Hikmat
Women Before and After Islam Did really Islam improve the status of women?  Ali Sina

Status of Women in Islam From Veil of Equality and Justice

The Bitter Lament of a Muslim Woman

I Am A Muslim Woman  The story of Dr. Homa Darabi.
Islam's Shame  Lifting the Veil of Tears
The Women in Islam according to hadith and Quran

Mohammed Umar Kairanvi said...

@Ankhe- हिन्‍दी ब्लागिंग में क्‍या कर रहे हो, महाराज से अनुवाद करके रखो तो दुनिया देखे कैरानवी भी हे कोई चीज, मुझे कई बार यह लिंक दे चुके किया करूं में इसका, मेरे भाई मुझे पांच भाषाओं में विचरना है, उर्दू में पहचान बनाने के बाद हिन्‍दी में आया इसमें रूत्‍बा बनाने के बाद मुझे फारसी की तरफ जाना है, उसके बाद सोचुगा की अरबी की तरफ जाउं या आपकी इच्‍छा के मुताबिक इंग्लिश की ओर, वैसे भी वहां पहले कैरानवी का कार्य पहुचा हुआ है नीचे देखो यह लन्‍दन से छपी कैरानवी की पुस्‍तक 7या8 भाषाओं में अनुवाद होचुका इसका, आखिर यह जाकिर नायक के गुरू के गुरू हैं, खरीदना हो तो इस साइट http://www.taha.co.uk/ से खरीद लो, फ्री का तरीका सबको पता है ही
English Translation of: Izhar -ul- Haq - By M Rahmatullah Kairanvi
Originally written in Arabic under the Title Izhar ul Haq by the distinguished 19th century Indian Scholar Maulana Rahmatullah Kairanvi and appeared in 1864. Well before the now famous Muslim-Christian Debates by Ahmad Deedat of South Africa Maulana Rahmatullah was challenging the Christian offensive against Islam in British India. In a debate which took place in January 1854, in Akbarabad in the City of Agra. The Rev C C P Founder (who had written a book in Urdu to cast doubts into the minds of the Muslim) admitted that there were alterations in the Bible in seven or Eight places to which the Maulana commented "If any alteration is proved to have been perpetrated in a particular text, it is considered null and void and invalidated. This and other debates proving Islam to be the true religion was part of the trigger which lead to the Brutal British aggression against the Muslims of India in 1857 in which thousands of Ulemah were killed, Maulana Rahmatullah was at the top of the list, but Allah saved him and took him to Makkah where he established The Madrasa Saulatia
The Truth Revealed Parts 1-2 and 3 Paperback 474 Pages Ref: 139 ti Price: £9.95

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

सुरेश जी,

1. मुबारक हो, चलिये किसी बात पर तो हमारे विचार मिलते है।

2. मैने पिछली टिप्पणी में क्या लिखा था की "आदम अलैहि सलाम दुनिया के पहले इन्सान थे....और इस्लाम यही से शुरु हुआ है और हुज़ुर सल्लाहो अलैहि वस्सलम पर आकर पुरा हुआ है....

मुह्म्मद साहब के आने से पहले तक लोग इसे इसलाम के नाम से नही पुकारते थे.... हर नबी के वक्त में उसके मज़हब को उसके नाम से पुकारा जाता था... इब्राहिम अलैहि सलाम के वक्त में लोग इसे इब्राहिम का मज़ह्ब कहते थे... दाऊद अलैहि सलाम के वक्त में दाउद का मज़हब कहा जाता था....

यहां तक कि जब मुहम्मद साहब ने इसलाम की दावत लोगो को दी तो मक्का के लोगो ने उसे "मुह्म्मद का दीन कहा"

अल्लाह ने हर वक्त और हर कौम के लिये नबी और रसुल भेजे सब पर किताबे नाज़िल की.... और हर किताब पिछ्ली किताब से बेहतर थी क्यौकी जैसे जैसे इन्सान की अक्ल बढती गयी वैसे वैसे उसे तालीम मिलती गयी...

3. मैं मानता हूं कि वैदिक सभ्यता के सबुत मिले है क्यौकि इन्सान के दुनिया में आने के बाद जिस चीज़ ने उसे नुक्सान पहुचाया...चाहे वो पानी का तुफ़ान हो, हवा का तुफ़ान हो, या सुरज की तेज गर्मी...उसने हर उस ताकत की मुरत बनायी जिसका वो कुछ नही बिगाड सकता था... तो मुर्तिया और मन्दिर मिलना लाज़मी है...

मस्जिद में गुम्बद ज़रुरी नही है... ये तो तुर्कों और मुगलों के द्वारा शुरु किया गया था...फ़िर ये पुरी दुनिया में फ़ैल गया..

मुसलमान नमाज़ कही भी पढ सकता है चाहे वो जंगल हो, शहर हो, रेगिस्तान हो, बस में हो, ट्रेन में हो या घर में।

मस्जिद के लिये सिर्फ़ चार दीवारें, एक छत और साफ़ ज़मीन काफ़ी है...

चार दीवारें भी इसलिये ताकि कोई जानवर या इन्सान उस जगह को, ज़मीन को गन्दा ना कर दें... उस जगह पर नाजाईज़ कब्ज़ा ना कर ले...

राजा और रंक एक सफ़ (पंक्ति) में कधें से कधां मिलाकर नमाज़ पढे..उनके अन्दर से ऊंच-नीच की भावना खत्म हो जाये...

मिनारे इस्लिये बनायी गयी ताकि दुर से पता चल जायें की यहां मस्जिद है क्यौकि सफ़र में मुसाफ़िर की पानी और दुसरी आवश्य्कतायें तथा थोडे बहुत आराम और नित्य किर्याओं के लिये मस्जिद से अच्छी जगह कोई नही है....जहां पर आधा-एक घंटा बहुत सुकुन से गुज़र जाता है...


मैं पिछ्ले सात साल से भारत के दस-बारह शहरों में सफ़र कर रहा हूं...जब पहली बार मैं सफ़र पर गया था तो मेरे पिताजी ने मुझे सबसे पहला जो सबक सिखाया था वो ये था... जब भी किसी नये शहर या नयी जगह जाओं तो दो जगहों के बारे पता करना....पहली मस्जिद और दुसरी एक मुसलमान की खाने की होटल क्यौकी मुसलमान के यहां हलाल का मीट मिलेगा...जो किसी और के यहां नही मिलेगा

काशिफ़ आरिफ़/Kashif Arif said...

@ जनाब गरुणध्वज,

कभी तो दिमाग का इस्तेमाल कर लिया करो...हमारे आगरा में एक कहावत है..

शक्ल अच्छी नही तो कम से कम बात तो अच्छी कर लिया करो....अब आपकी शक्ल तो दिख नही रही है....तो शक्ल को नाम से रिप्लेस कर देते है

जब किसी चीज़ के में जानकारी नही हुआ करें तो ऐसे मुंह खोल के बोलते नही है..

इस्लाम में उल्टा सोना मना है...कहते है कि उल्टा इबलीस सोता है..

ज़रा आखें खोल कर देखो हिन्दी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है....अंग्रेजी बायीं तरफ़ से लिखी जाती है....

जबकि उर्दु और अरबी दायीं तरफ़ से लिखी जाती है.....

तो उल्टा कौन हुआ???????

"आबे ज़म-ज़म" झरना नही है...वो एक कुआं है जनाब...

रही बात आबे-ज़म-ज़म की....तो लगता तो है इसकी सप्लाई जन्नत से होती है क्यौकि जहां हर तरफ़ ज़मीन में तेल ही तेल है वहां पर ये कुआं पिछले ४००० साल से मौजुद है...

18x14 फ़ीट और 18 मीटर गहरा है...

4000 साल पुराना है...ना कभी सुखा...ना कभी स्वाद बदला...

आज तक कभी भी कुऐं में ना कोई काई जमी और ना ही कोई पेड उगा...

ना आज तक उस पानी में कोई बैक्टिरिया मिलें...

युरोपियन लैबोरेट्री में चेक हो चुका है उन्होने इसे पीने लायक घोषित कर दिया है।

ये छोटा सा कुआं लाखों लोगो को पानी देता है...

8000 लीटर प्रति सेकेण्ड पानी की ताकत वाली मोटर 24 घण्टे चलती है....

और सिर्फ़ 11 मिनट बाद पानी का लेवल बराबर हो जाता है

प्रिया शर्मा said...

सुरेश जी आपने पी.एन.ओके. साहब के शोध के रुप में एक गोल चीज़ रखी जिसको कुछ लोगो ने बगैर सोचे समझे आखें बन्द करके तरबुज़ समझ कर खाना शुरु कर दिया....

काशिफ़ जी, आये तो उन्होने उस गोल चीज़ को अपने तर्कों से इतना ठोका की उसके ऊपर से तरबुज़ का खोल उतर गया और सबके सामने आ गया की ये शोध तरबुज़ नही बल्कि नारियल की तरह खोखला था.....

अब जहां तक मुझे लगता है आपको तीसरा भाग प्रकाशित कर अपनी और फ़जीहत नही करानी चाहिये....

तो क्या इरादा है????

रक्षक said...

इस लिंक पर चित्र सहित सबूत उपलब्ध है |एक बार देख ले |सब कुछ स्पष्ट हो जायेंगा

http://www.stephen-knapp.com/photographic_evidence_of_vedic_influence.htm

and
http://www.stephen-knapp.com/was_the_taj_mahal_a_vedic_temple.htm

सुरेश जी अब तीसरा भाग प्रकाशित करे |

हल्ला बोल said...

ब्लॉग जगत में पहली बार एक ऐसा सामुदायिक ब्लॉग जो भारत के स्वाभिमान और हिन्दू स्वाभिमान को संकल्पित है, जो देशभक्त मुसलमानों का सम्मान करता है, पर बाबर और लादेन द्वारा रचित इस्लाम की हिंसा का खुलकर विरोध करता है. जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर कायरता दिखाने वाले हिन्दुओ का भी विरोध करता है.
इस ब्लॉग पर आने से हिंदुत्व का विरोध करने वाले कट्टर मुसलमान और धर्मनिरपेक्ष { कायर} हिन्दू भी परहेज करे.
समय मिले तो इस ब्लॉग को देखकर अपने विचार अवश्य दे
.
देशभक्त हिन्दू ब्लोगरो का पहला साझा मंच - हल्ला बोल
हल्ला बोल के नियम व् शर्तें

RAVI MANKAR said...

आज संसार का सबसे बडा आतंकवादी बन गया है इस्लाम क्या इन्हे कुरआन यसे यही प्रेरणा मिलती है|

ravindra mankar said...

भगवान काबा मे ही नही हर भक्त के दिलो मे निवास करते वो कैलाश मे है,उजयिनी,अमरनाथ,सोमनाथ उन्हे पाने के लिए सच्चे दिल की आवश्यकता है_जय महाकाल

ravindra mankar said...

भगवान काबा मे ही नही हर भक्त के दिलो मे निवास करते वो कैलाश मे है,उजयिनी,अमरनाथ,सोमनाथ उन्हे पाने के लिए सच्चे दिल की आवश्यकता है_जय महाकाल

ravindra mankar said...

भगवान काबा मे ही नही हर भक्त के दिलो मे निवास करते वो कैलाश मे है,उजयिनी,अमरनाथ,सोमनाथ उन्हे पाने के लिए सच्चे दिल की आवश्यकता है_जय महाकाल

ravindra mankar said...

भगवान काबा मे ही नही हर भक्त के दिलो मे निवास करते वो कैलाश मे है,उजयिनी,अमरनाथ,सोमनाथ उन्हे पाने के लिए सच्चे दिल की आवश्यकता है_जय महाकाल

ravindra mankar said...

अरे भाई ये कुरआन ही तो है जो लाखो मुस्लिमो को शैतान बनाती है_जैसे लादेन,दाऊद

ravindra mankar said...

जय महाकाल