अड़ियल व्यक्ति को जवाब देने का “खांटी” स्टाइल…
(वैधानिक चेतावनी – इन दोनों किस्सों में पात्र व घटनायें काल्पनिक हैं, इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है, हिन्दी ब्लॉग जगत से तो बिलकुल भी नहीं है…)
किस्सा क्रमांक 1 -
एक बार एक बैंक की शाखा में एक आदमी आया और चेक जमा करते हुए काउंटर पर बैठे बैंककर्मी से पूछा, क्यों भाई साहब यह एक चेक मैं आज डाल रहा हूँ, कब तक क्लियर होगा? कर्मचारी ने जवाब दिया कि परसों तक होगा। उस व्यक्ति ने कहा कि भाई साहब यह चेक तो आपकी बैंक के सामने वाली दूसरी बैंक का ही है… कर्मचारी ने कहा कि फ़िर भी तीसरे दिन ही आपके खाते में आयेगा। वह व्यक्ति लगभग अड़ते हुए बोला कि “भाई साहब, जब दिये गये चेक की बैंक शाखा सड़क के उस पार ही है तो इतना समय क्यों लगेगा, चेक तो कल ही क्लियर हो जाना चाहिये?” अब बैंककर्मी से नहीं रहा गया, उसने जवाब दिया, भाई साहब ऐसा नहीं होता, जो प्रक्रिया है उसी हिसाब से चलेगा… वह व्यक्ति फ़िर से बोला, लेकिन इतनी देर तो लगना ही नहीं चाहिये…
बैंककर्मी ने सोचा कि अब तो इसे “निपटाना” ही पड़ेगा, वह बोला – मैं आपको समझाता हूँ, मान लीजिये कि आप मर गये, तो आप तुरन्त स्वर्ग नहीं चले जायेंगे… पहले कुछ देर आप भूत बनकर घर के आसपास ही किसी पेड़ पर टंग़े रहेंगे, फ़िर स्वर्ग-नर्क के दरवाजे पर चित्रगुप्त आपके पाप-पुण्य का हिसाब देखेंगे, यमराज से सलाह लेंगे और उसके बाद ही आप स्वर्ग या नर्क में घुस पायेंगे, है ना? तो जो प्रक्रियागत समय लगना है वह तो लगेगा ही…। नौ औरतें मिलकर एक महीने में बच्चा पैदा नहीं कर सकतीं, नौ माह तो लगेंगे ही…।
यह जवाब आजीवन उस अड़ियल व्यक्ति को याद रहेगा और फ़िर दोबारा कभी भी, कहीं भी वह “जवाब दो, जल्दी करो” की रट नहीं लगायेगा…
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किस्सा क्रमांक 2 –
एक बार एक व्यक्ति रेलयात्रा में लम्बे सफ़र पर जा रहा था, साथ में एक-दो किताबें थीं और उन्हें पढ़ते हुए वह चुपचाप अपना सफ़र तय कर रहा था। एक स्टेशन पर एक मुस्लिम यात्री भी चढ़ा और बराबर वाली सीट पर आकर बैठा। कुछ देर तो सफ़र शान्ति से कटा, लेकिन फ़िर मुस्लिम भाई ने उस पहले व्यक्ति से कहा कि आप बातें क्यों नहीं करते हैं, इतना लम्बा सफ़र है बातें करते-करते कट जायेगा। उस व्यक्ति ने कहा कि मुझे फ़िजूल की बातें करने में मजा नहीं आता, इसमें समय भी बरबाद होता है और बहसबाजी में कई बार मूड भी खराब हो जाता है। फ़िर भी मुस्लिम व्यक्ति बोला कि हाँ बात तो सही है, लेकिन टाइम पास करने के लिये हमें कुछ न कुछ तो करना ही होगा। पहले व्यक्ति ने पूछा कि आप क्या चाहते हैं कि हमें किस विषय पर चर्चा करनी चाहिये? मुस्लिम व्यक्ति बोला कि वैसे तो काफ़ी विषय हैं, लेकिन मेरा पसन्दीदा विषय है धर्मग्रन्थों का अध्ययन, तो क्यों न हम वेदों और कुरान पर चर्चा और बहस करें…। अब तक वह पहला व्यक्ति उसे टालने की नाकाम कोशिश कर चुका था, अब उसका धैर्य जवाब दे गया, उसने कहा, ठीक है चलो हम वेदों और कुरान पर बहस करें, लेकिन पहले आपका ज्ञान परखने के लिये मैं एक सवाल पूछता हूँ, यदि आप उसका सही-सही जवाब दे सकें तब हम वेद-कुरान जैसे मुश्किल विषय पर बातें करेंगे…। मुस्लिम भाई ने कहा कि “ठीक है, पूछिये।
पहले व्यक्ति ने प्रश्न किया – एक बात बताईये, गाय-भैंस घास खाती है और गोबर करती है, उसी प्रकार हिरन और बकरी भी घास खाते हैं लेकिन वे छोटी-छोटी लेंडियाँ करते हैं, जबकि गधे-घोड़े भी घास खाते हैं तथा वे रेशेदार लीद निकालते हैं, ऐसा क्यों?
मुस्लिम व्यक्ति भौंचक हुआ और गड़बड़ाते हुए बोला- इस बारे में तो बताना मुश्किल है कि ऐसा क्यों होता है।
तब पहले व्यक्ति ने उसे कहा कि – भाई, जब आप जीवन की सबसे मूलभूत बात यानी “गू” के बारे में ही ठीक से नहीं जानते हैं, तब मैं आपसे वेद-कुरान पर क्या बहस करूं? और वह अपनी किताब निकालकर पढ़ने लगा।
इसके बाद उसका बाकी का सफ़र शान्ति से कटा।



72 comments:
ये बात उल्लू तो समझ सकता है लेकिन उल्लू का पट्ठा अभी भी नये कुतर्क करने लगेगा. यकीन ना हो तो देखना अभी चालू हो जायेगा :)
वाह ! सर जी मजा आ गया
उल्लुओं को क्या टीप के जूता मारा है , अगर अक्ल थोडी बहुत भी होगी तो कसक अगले साल तक याद रखेंगे |
लेकिन कुतर्कों से तौबा करना उनकी फितरत में नहीं है |
फिर से देखना अभी वे आते ही होंगे |
धन्यवाद ||
यकीनन मजा आ गया. एक बार बैंक में हम लाइन में लगे थे. पीछे एक सज्जन भी थे. उन्हें बड़ी जल्दी थी. उन्होंने जोर से कहा मै बडो हूँ. मुझे जल्दी है. हमारा काम पहले कर दो. बाबु ने कहा आप गले में एक तख्ती लटका कर अन्दर एजेंट से मिल लीजिये.
गधे-घोड़े इसलिये लीद करते हैं कि उन्हें आप जैसों के लेख खाने को दिये जाते हैं, कभी धोबियों जैसी बात कभी चुटकले कभी राजीव गाँधी पर कीचड उछालते हो, महानुभव लीद, गोबर की बात तो आपका करना ठीक है आपका अपना अनुभव है, इस्लाम को बदनाम करने वाले महाराज तुम जिस ग्रथ का नाम ठीक से नहीं जानते xकुरानx (क़ुरआन) उसके बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना होगा इससे ही ता पता चल जाता है, अरे कुछ सवाल हमसे करो चुटकलों का सहारा ना लो, कुप्रचारियों के देवता लाज बचाओ दुनिया की निगाहें आप पर टिकी हैं, उन्हें मायूस ना करो,
फिर भी कूतर्क करने वाले आ ही जाते है :)
देखो आ गये ना गधो के सरताज के आखिरी अवतार लीड करने.ना ना लीद करने
आप सारे लोग फालतू की बहस न करो और जजिया दो मुझको, देखो इस्लाम क्या कहता है।
नीचे पढ़ो जरा.....
Tuesday, July 7, 2009
हर काफ़िर पर चाहे वह ईसाई या यहूदी ही क्यूँ न हो, इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है, क्यूंकि अल्लाह त-आला अपनी किताब में फरमाता है:
"(ऐ मुहम्मद ! ) आप कह दीजिये कि ऐ लोगों! मैं तुम सभी की ओर उस अल्लाह का भेजा हुआ पैगम्बर हूँ, जो असमानों और ज़मीन का बादशाह है, उसके अतिरिक्त कोई (सच्चा) पूज्य नहीं, वही मारता है वही जीलाता है. इसलिए तुम अल्लाह पर और उसके रसूल, उम्मी (अनपढ़) पैग़म्बर पर ईमान लाओ, जो स्वयं भी अल्लाह पर और उसके कलाम पर ईमान रखते हैं, और उनकी पैरवी करो ताकि तुम्हें मार्गदर्शन प्राप्त करो." (सूरतुल आराफ़: १५८)
अतः तमाम लोगों पर अनिवार्य है कि वे अल्लाह के पैग़म्बर (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) पर ईमान लायें, किन्तु इस्लाम धर्म ने अल्लाह त-आला की दया और हिक़मत से गैर-मुस्लिमों के लिए इस बात को भी जाईज़ ठहराया कि वो अपने धर्म पर बाक़ी रहें. इस शर्त के साथ कि वह मुसलमानों के नियमों के अधीन रहें, अल्लाह त-आला का फरमान है:
"जो लोग अहले-क़िताब (यानि यहूदी और ईसाई) में से अल्लाह पर ईमान नहीं लाते और न आखिरत के दिन पर विश्वास करते है और न उन चीज़ों को हराम समझते हैं जो अल्लाह और उसके पैग़म्बर ने हराम घोषित किये हैं और न सत्य धर्म को स्वीकारते हैं, उनसे जंग करों यहाँ तक वह अपमानित हो अपने हाथ से जिज़्या दें दे." (सूरतुल तौबा: २९)
सहीह हदीस में बुरौदा रज़िअल्लाहु अन्हु से वर्णित हदीस में है कि नबी सल्लल्लाहु अलैहिवसल्लम जब किसी लश्कर (फौज) या सर्रिया (फौजी दस्ता जिसमें आप शरीक न रहें हो) का अमीन नियुक्त करते तो तो आप उसे अल्लाह त-आला से डरने और अपने सह-यात्री मुसलमानों के साथ भलाई और शुभ चिंता का आदेश देते और फरमाते:
"उन्हें तीन बातों की ओर बुलाओ (विकल्प दो) वह उनमें से जिसको भी स्वीकार कर लें, तुम उनकी ओर से उसको कुबूल कर लो और उन से (जंग करने से) रुक जाओ." (सहीह मुस्लिम हदीस नं. १७३१)
इन तीन बातों में से एक यह है कि वह जिज़्या दें. इसलिए बुद्धिजीवियों के कथनों में से उचित कथन के अनुसार यहूदियों एवं ईसाईयों के अतिरिक्त अन्य काफ़िरों (गैर-मुस्लिमों) से भी जिज़्या स्वीकार किया जाये.
सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ.
अल्लाह ही तौफ़ीक़ देने वाला है.
लेख संग्रहकर्ता: सलीम खान
Mohammed Umar Kairanvi कैराना मे तुम्हारे जैसे बह्त बावले फ़िरते है मदरसो से इससे ज्यादा उम्मीद भी क्या हो सकती है. तुम्हारे और आतंकवादियो के दिमाक मे ज्यादा अंतर नही होता दोनो इसी तरह बेवेकूफ़ियो भरी इस्लाम की बाते कर विध्वंस करते है . http://satyarthved.blogspot.com/2009/04/musalman.html
http://albedar.blogspot.com/2009/05/blog-post_24.html
ये देखना लेकिन गधे को कितना नहलाओ घोडा नही बनता रहता गधा ही है
सलीम भाई जूते ना दे , वो भी बिना गिने , दे धनाधन दे धनाधन. कैराना मे भी बहुत पडते है तभी तो इतनी अकल और खाल मोटी हो गई है कैरानविओ की :)
हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा-हा----! सहज-सहज में आपने तो लम्बी पटाक मार दी सुरेश जी ! लेकिन अफसोस कि उसे तब भी बात समझ में नहीं आई !
गलती इसमें भी उनकी है जो ऐसी जगह जाते हैं और धर्मनिरपेक्ष कहलाने के शौक में माथा टेकते रहते हैं, जबकि सामने वाला दूसरों को बेवकूफ बनाते हुये अपने धर्म का प्रचार करता रहता है और यहां उसी में अपनी बड़ाई समझते रहते हैं. देख लीजिये कि कितने लोग अपना माथा रगड़ रहे हैं. माननीय सुरेश जी, मूर्खों और मृतकों के विचार नहीं बदलते. अगर यह धर्म-निरपेक्षता आजादी से पहले रही होती तो स्वतन्त्रता नहीं मिलती. जो लोग सुभाष, गांधी, भगत सिंह और बिस्मिल का नाम लेते हैं और रोटियां सेकते हैं, मैं दावा करता हूं कि उन लोगों ने इन व्यक्तियों का लिखा हुआ धेले बराबर नहीं पढा होगा. यही बात नाथूराम गोड़से को गालियां देने वालों के बारे में कही जा सकती है. अपना सिक्का इतना खोटा है कि उसे सोने और चमड़े के बीच फर्क महसूस नहीं होता.
ऋचा जी आप भी अपनी कोशिश जारी रखे, आपने भी अच्चे प्रयास किये है, उम्मीद पर ही दुनिया कायम है !
पी.सी.गोदियाल जी मैने एक नाटक पढा था " एक था गधा उर्फ़ अलादाद खां. गलत था सही है
एक है गधा उर्फ़ मुहम्मद उमर कैरानवी
ऋचा जी, कैरानवी की तुलना गधो से करके गधो का अपमान न कीजिये ..... :)
वैसे भी ये लोग सुधरने वाले नहीं हैं |
बेचारे गधे भी न जाने क्या सोचे ? ;)
" हर काफ़िर पर चाहे वह ईसाई या यहूदी ही क्यूँ न हो, इस्लाम स्वीकार करना अनिवार्य है, क्यूंकि अल्लाह त-आला अपनी किताब में फरमाता है: "
ताकि कुरआनी बकवासों का प्रचार प्रसार ठीक ढंग से हो सके ...........?
are re re re maff kijiyega ye कैरानवी नही कोरे नवी यानी दिमाग से कोरे नबी है और नबी का काम होता है पुरानी कुरानी बकवासों का प्रचार प्रसार ठीक ढंग से हो सके ...........?
ये लेख पढ़ने के समय जिसके बारे में मेरे दिमाग में विचार आया उसके बारे मैं यहा काफी टिप्पणीया आगई है इस लिये मैं सिर्फ इतना कहूगा।
भैंस के आगे बीन बजाये भैंस देख पगुराय
लो जी बीन भी बजा दी ..............
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तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु..
तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु.. .......... :) :)
तन डोले.. मेरा मन डोले..
मेरे दिल का गया करार रे... कौन बजाये बाँसुरिया..
तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु
तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु
तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु
कुश जी बीन तो खुब बजाई पर नागराज माफ़ कीजीयेगा कर्रा-नवाज तो कही किसी आस्तीन मे जाकर छुप गये है.आप जानते ही है आस्तीन के साप तो छुप कर ही वार करते है ना ?
Bhagwan kasie kasie looge banaye hain tune is dunya me!
ॠचा जी आप पहली बार मेरे चिठ्ठे पर आईं और मेरी इतनी तरफ़दारी की, एक महिला होते हुए इतनी जोर-शोर से लोहा लेने के इस जज्बे को सलाम। हालांकि मैंने पहले ही "वैधानिक चेतावनी" जारी कर दी थी, फ़िर भी पता नहीं जुलाहों में लठ्ठमलठ्ठा क्यों हो रहा है, बहरहाल ॠचा जी और गरुणध्वज साहब को एक बार फ़िर शुक्रिया…
यह समस्या तो बहुत है। मैं कहता हूँ कि न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पहल अदालतों पर बोझ कम करने से होगी। अदालतें बढ़ानी पड़ेंगी। लेकिन हर बार सुझाव आता है कि तकनीकी उपयोग बढ़ना चाहिए। अब मशीन को जज तो नहीं बनाया जा सकता न? निर्णय करने के लिए तर्क तो सुनने ही होंगे। सारा रिकार्ड देखना पड़ेगा उस के बाद निर्णय करना पड़ेगा। यह काम मशीनों को कैसे दिया जा सकता है। दस दिन में निपटने वाले मुकदमे को दस जज एक दिन में नहीं निपटा सकते।
गुरु जी मज़ा आ गया!
सुरेश जी आपने लिखा और रिचा जी ने आगाह भी किया ki आपके कहने के बावजूद उल्लू का पट्ठा अपने कुतर्क लेकर हाजिर हो जाएगा. और वह हाजिर हो गया. विश्वास न हो तो 4th नंबर के कमेन्ट पर नजर डालें. लगता है यह उल्लू का पट्ठा आपको पढ़ते, सोचते और समझते हुए एक दिन 'राम पुनियानी' या प्रफुल किदवाई बन जाए तो कोई शक नहीं!
मियां सलीम, हिन्दुस्तान एक सेकुलर देश है और तुम फिर से ये कुरानी पेनल कोड खोल के बैठ गए......... तुमको मालूम है ना कि धर्म की बातें करना यहाँ गुनाह है.......... कांग्रेसी सरकार तुम पर टाडा......अरे नहीं पोटा...........नहीं नहीं मकोका या उसके जैसा ही कुछ लगा देगी फिर रोते रहना अपनी किस्मत को..........
मैं इस लेख के बारे में कुछ नही कहुंगा क्यौंकी हमारे सुरेश जी पहले ही वैधानिक चेतावनी जारी कर दी है की इन दोनों किस्सों में पात्र व घटनायें काल्पनिक हैं, इनका किसी जीवित या मृत व्यक्ति से कोई सम्बन्ध नहीं है, हिन्दी ब्लॉग जगत से तो बिलकुल भी नहीं है…)
लेकिन स्वच्छ सन्देश ; हिन्दोस्तान की आवाज़ के नाम से जिसने कमेन्ट किया है वो सलीम खान नही है------कोई और है
सलीम खान का असली आई डी ये है----स्वच्छ सन्देश : हिन्दोस्तान की आवाज
दोनो आई डी में : का फ़र्क है
तो क्रप्या करके सलीम खान पर कोई आरोप लगाने से पहले इस आई डी को ध्यान से देख लें
सलीम खान की आई डी जनवरी २००९की है
नकली आई डी अगस्त २००९ की है
वाह भाई ... मजा आ गया पढ़ कर | बहुत सही और मजेदार लिखा है | ये पढ़ कर गधों को भी समझ मैं आ जाएगी | पर जो गधों से भी निचे की श्रेणी के हैं उनका क्या ? वो तो phir भी कुतर्क करने आ ही जायेंगे |
पोस्ट वाकई बढिया है |
ha-ha-ha-ha
aap logo ko bhi lagta hai mazaa aane laga hai murkho ki pitayee karne me....jab dekho football ki tarah latiyate rahte ho....football bhi nirlazz ho gaya hai....
@ काशिफ आरिफ,
यह ठीक है कि मैं सलीम खान नहीं...
जो पोस्ट मैंने quote की है वह सलीम खान के ब्लॉग में ७ जुलाई २००९ को छपी थी क्या इस सच से आप मना करते हो?
फिर इतना हाय हल्ला क्यों?
अगर वाकई हिन्दोस्तान को जोड़ना चाहते हो तो आप और सलीम दोनों इस मंच पर स्वीकारो कि जो इस पोस्ट में लिखा है, गलत है..
सलीम की तरह मुझे भी हक है खुद को मेरे देश की आवाज़ मानने का.....
सलीम और आरिफ से ये आशा करना की वो अपनी गलती स्वीकार करेंगे, ऐसी आशा तो नहीं है |
देखिये जिससे गलती हो जाती है वो इसे स्वीकार कर सकता कई पर जो जान बुझ कर गलती करता हिया वो कभी स्वीकार नहीं करता , example आपके सामने ही है | इनलोगों को तर्क, समझदारी, औरमानवता से कोई मतलब ही नहीं ये तो लगता है ब्लॉग जगत पे ओसामा जैसे लोगों का समर्थन करते हैं | सलीम और आरिफ जी को ही ले लीजिये आज तक वो मुस्लिम आतंकवाद पे चुप हैं | पर ये हमेशा दुहराए जा रहे हैं की सारे गैर मुस्लिम काफिर हैं | मुझे तो लगता है अल्लाह की नजर मैं सारे मुस्लिम ही काफिर हो गए हैं तभी तो पाकिस्तान, अफगानिस्तान, इराक, इरान... हर जगह मुस्लिम कत्लेआम कर रहा है | गैर मुस्लिम नहीं मिल रहे हैं तो मुस्लिमों (शिया, अहमदिया ) को ही मार रहे हैं |
भइया जी, मजा तो आ गया किन्तु क्या आपको वह कहावत नहीं मालूम कि
चोर चारी से जाये हेरा-फेरी से न जाये
या फिर
सौ-सौ जूता खायें तमाशा घुस के देखें।
इन्हें कुछ भी सुना लो अन्त में ये ‘‘गू’’ कर ही देंगे।
जो तर्क से नहीं मानते उन्हें कुतर्क से ही समझाना पड़ता है
बैंक की जो बात कही है उस क्लर्क ने तो बहुत सभ्यता से समझाई वरना हमने तो वो दिन भी देखे हैं जब कम्प्य़ूटर नहीं होते थे भारी लेजर होते थे और कोई ग्राहक ज्यादा मगजमारी करता था तो बस लेजर लेकर उस पर पिल पड़ते थे।
अब इन लोगों को सबसे मूलभूत बात यानी "गू" के बारे में ठीक से जानकारी नहीं है तो ये क्या धर्म और धार्मिक ज्ञान की बातें करेंगे।
@ डुप्लीकेट स्वच्छ सन्देश
मैने सलीम खान का ब्लोग अभी कुछ दिनों पहले से पढना शुरु किया इसलिये मैने उनका ये लेख नही पढा था....
आपने बताया तो मैने उसको पढा है...जो आयत उन्होने कोट की है वो "कुरआन" में मौजुद है और उसका तर्जुमा भी उन्होने सही किया है....
लेकिन यहां मैं एक बात कहना चाहुंगा....कुरआन में "जज़िया" का ज़िक्र सिर्फ़ इसी आयत में है-----इसके अलावा मुझे कोई और आयत नही मिली जिसमें जज़िया का हुक्म हो----मैं ज़ाती तौर पर इस चीज़ के हक में नही हूं क्यौंकी कुरआन में गैर-मुस्लिमों से मोहब्ब्त से पेश आना बहुत सारी आयतों मे बताया गया है जबकि जज़िया की बात सिर्फ़ एक आयत में हैं
तो मैं जज़िया के हक में नही हूं
@ Rakesh Singh - राकेश सिंह जी
सिर्फ़ नाम या मज़हब देखकर टिप्पणी ना किया कीजिये----हर धर्म में हर तरह के लोग मौजुद है...
मिसाल मुंम्बई हमले को ही ले--
मुंम्बई पर हमला करने वाले मुस्लमान थे ये जगज़ाहिर है.......
और उनको दफ़नाने के लिये कब्रस्तान में ज़मीन देने से इन्कार करने वाले भी मुसलमान थे!
आपने मेरा ब्लोग कभी पढा है जो आप इस तरह की टिप्पणी कर रहे है.....मैने कभी भी कोई लेख ऐसा नही लिखा जिसने हिन्दु-मुस्लिम झगडे को बढाया हो.....
मैने हमेशा सब धर्मो को साथ लेकर चलने की बात कही है....और मैं ओसामा से नफ़रत करता हूं और अगर वो मुझे कही मिल गया तो सबसे पहले मैं गोली चलाऊंगा
मैं एक देशभक्त हूं...और देश सेवा के लिये ५ साल एन.सी.सी. की ट्रेनिंग ली और फिर एन.डी.ए. का इम्तिहान पास कर लिया लेकिन अफ़सोस १५ साल की उम्र मे लगी एक चोट की वजह से मेडिकल टेस्ट में फ़ेल हो गया......
तो आज के बाद कभी भी टिप्पणी करने से पहले इंसान को जान लें...
मेरा ये लेख पढें
Varun Kumar Jaiswal उर्फ़ गरुणधव्ज उर्फ़ bambambhole उर्फ़ डुप्लीकेट स्वच्छ सन्देश
अरे भाई, हमें गलत साबित करने और आपकी बात को सही साबित करने के लिये समर्थक कम पड रहे है क्या...........जो अलग-अलग आई-डी बना कर टिप्पणी कर रहे हो..........
या मां-बाप का दिया नाम पसंद नही है......
क्या नजारा है.बात हो रही खेत की और लोग खलिहान मे लट्ठम लट्ठा करने मे लगे पडे है .कोई कुरान की रोशनी मे देख कर बात करता है कोई कानून की रोशनीमे देख कर . मतलब कुल जमा अंधो का संसार है यहा हिंदी ब्लोगिंग मे .ये देखिये
दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...
यह समस्या तो बहुत है। मैं कहता हूँ कि न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पहल अदालतों पर बोझ कम करने से होगी। अदालतें बढ़ानी पड़ेंगी। लेकिन हर बार सुझाव आता है कि तकनीकी उपयोग बढ़ना चाहिए। अब मशीन को जज तो नहीं बनाया जा सकता न? निर्णय करने के लिए तर्क तो सुनने ही होंगे। सारा रिकार्ड देखना पड़ेगा उस के बाद निर्णय करना पड़ेगा। यह काम मशीनों को कैसे दिया जा सकता है। दस दिन में निपटने वाले मुकदमे को दस जज एक दिन में नहीं निपटा सकते।
Mohammed Umar Kairanvi said...
गधे-घोड़े इसलिये लीद करते हैं कि उन्हें आप जैसों के लेख खाने को दिये जाते हैं, कभी धोबियों जैसी बात कभी चुटकले कभी राजीव गाँधी पर कीचड उछालते हो, महानुभव लीद, गोबर की बात तो आपका करना ठीक है
अब इन्हे समझाना इससे अच्छा है कि हम एक गधे को डिलिट करादे . वो जल्दी हो जायेगा :)
@ काशिफ़ आरिफ़ मैं ज़ाती तौर पर इस चीज़ के हक में नही हूं क्यौंकी कुरआन में गैर-मुस्लिमों से मोहब्ब्त से पेश आना बहुत सारी आयतों मे बताया गया है जबकि जज़िया की बात सिर्फ़ एक आयत में हैं
तो मैं जज़िया के हक में नही हूं
हसी आ रही है आप पर ? मिया ये पाकिस्तान नही और यहा अभी आपकी औकात नही वरना आप तो जजिया वसूलने निकल लेते कैरानवी साहब के साथ यही है जाहिलता मुसलमानो की जिसके कारण दुनिया को नरक बना रहे है आप लोग
मैं "स्वच्छ सन्देश: हिन्दोस्तान की आवाज़" नाम से पिछले ८ महीनों से लिखा रहा हूँ लेकिन आज तक किसी ने भी इस तरह की ज़लील हरकत नहीं की. अल्लाह बेहतर जनता है ये किसकी गलीज़ हरकत होगी... मगर मुझे याद आ गयी कुरआन की वो आयत जो ईश्वर के अस्तित्व को इनकार करने वालो के लिए अल्लाह सुबहान व-ताला ने फरमाई:
अल-कुरआन, अध्याय (सुरह) अल-बक़रा, अध्याय संख्या १८:
"वे बहरे हैं, गूंगे हैं, अंधे हैं, अब वे लौटने के नहीं"
और
मेरा उस इन्सान से यह गुजारिश है कि आप अगर डुप्लिकेट आई डी से लिखना चाहते हो तो लिखो............ मगर मैं फिर भी एक सलाह देना चाहता हूँ प्लीज़ वेदों और पुराणों और हो सके तो कुरआन का अध्ययन भी साइड में चालू रखो.....
अब मेरा चैलेंज भी लेलो अगर तुमने ऐसे सिर्फ एक महीने भी कर लिया ना.....
तो तुम भी कहने लगोगे....
"एकम् ब्रह्मा द्वितीयो नास्ति, नेह्न्ये नास्ति, नास्ति किंचन"
यानि "भगवान् एक ही है, दूसरा नहीं है.. नहीं है, नहीं है, ज़रा भी नहीं है"
केवल भावावेश में आकर ऐसा कुछ भी करना ईश्वर की नज़र में हिमाकत तो है ही.... ज़रा अकेले में अपने आप से एक सवाल पूछना फिर जो तुम्हारा मन करे वही करना
सवाल है:::: क्या ऐसा करके मैं सही कर रहा हूँ या गलत " फिर जो तुम्हारा मन करे, वही करना...
दूसरा चैलेज : मुझसे अगर इन सभी विषयों पर बहस करना चाहते हो तो मैं लखनऊ में एक संघोस्ठी आयोजित कर सकता हूँ जहाँ तुम्हे अपनी बात कहने की पूरी आज़ादी होगी और मैं उन सभी सवालों का जवाब इंशा -अल्लाह ज़रूर दूंगा
ऊपर से आने जाने का खर्चा भी दूंगा.
आखिर में इन्ही शब्दों के साथ कि ईश्वर तुम्हे सद्बुद्धि दे ......
और यह तौफीक दे कि तुम यह समझ सको कि सत्य क्या है...................
वन्दे-ईश्वरम
ताज्जुब है कि फिर भी आपने वैधानिक चेतावनी लगा दी है:)
मिंया ये पकिस्तान नहीं और यहाँ अभी आपकी औकात नहीं , वरना आप तो जजिया वसूलने निकल लेते ....!
ऋचा जी, एकदम सत्य बात कह दी आपने !
एक बात और कहूँ, यहीं से आप सहज अंदाजा लगा सकते है की आतंकवादियों को समझाबुझाकर राष्ट्र की मुख्य धारा में लाना कितनी टेडी खीर है और ये तथाकथित मानवादिकार संघठन बेफालतू इनसे लगातार जूझ रहे हमारे सुरक्षा बालो को दोष मड़ते फिरते है
@ काशिफ आरिफ
कितनी भी मेहनत कर लो रहोगे, तुम गधे ही |
मुझे समर्थकों की कमी नहीं है मित्र जो की मुझे कोई छद्म ID i.e ( bambambhole उर्फ़ डुप्लीकेट स्वच्छ सन्देश ) बनाने की जरुरत पड़ेगी वैसे भी यह कार्य तुम और तुम्हारे बिरादर ज्यादा अच्छी तरह से कर ही रहे हैं
और रही बात गरुणध्वज जी की वो हमारे मित्र अवश्य हैं किन्तु मैं स्वयम नहीं चाहो तो स्वयं चिपलूनकर जी से ही पूछ लो |
लगता है पूरे ब्लॉग जगत के जूते खाकर दिमाग पर गहरा असर पड़ा है | मुझे तुमसे पूरी सहानुभूति है |
@ पाठकगण
अभी कुछ समय पहले जनाब काशिफ जी पूरे ब्लॉग जगत को बार - बार चैलेन्ज दे रहे थे की इनकी कुरान में कोई भी एक बात गलत साबित कर के दिखला दो !
और अब देखिये ज़जिया की बात आते ही कैसे गिरगिट की तरह रंग बदलने लगे |
असल में इन गधों ( गधों की बिरादरी से हार्दिक क्षमा ) को कितना भी समझाओ बाज़ नहीं आएंगे |
अच्छा तो काशिफ आरिफ तुम्हे कुरान में लिखी एक बात जो ( अरे वही ज़जिया ) तो पसंद नहीं है आखिर मिल ही गयी , अब तुम चैलेन्ज हार गए और सलीम खान भी हार ही चुका है |
अब चलो तुम दोनों अपनी शुद्धि करवा ही लो |
चाहो तो अगली टिपण्णी में आवश्यक वस्तुओं की सूची भी भेज देता हूँ |
:P :) ;)
अरे ,
सुना है कि मैं = वरुण जी = बमभोले = डुप्लीकेट स्वच्छ सन्देश
ये भी लगता है कि उस कुरान में ही लिखा है |
या फिर काशिफ आरिफ को सपने में रसूल आकर बता गए है |
:P
क्यों है ना ?
वैधानिक चेतावनी लगाने के बावजूद इतनी मगजमारी हो रही है, यदि नहीं लगाता तो पता नहीं क्या होता… :) :) बहरहाल इस सारे झमेले में ॠचा जी ने एक महत्वपूर्ण बात कही जिसका समर्थन गोदियाल जी ने भी किया। प्रकारान्तर से यह सवाल सभी हिन्दुओं के दिमाग में आता है कि आखिर मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में अन्य धर्मों के अल्पसंख्यकों के साथ बुरा सलूक क्यों होता है? मुस्लिम बहुसंख्यक देशों में वह कौन सी मानसिकता है, कौन सा ग्रन्थ है या कौन सी शिक्षा है, जिसके कारण बांग्लादेश, पाकिस्तान, कश्मीर में हिन्दू चैन से नहीं रह पाते? जबकि वेदों और गीता पर चलने वाले हिन्दू भारत में मुस्लिम और अन्य धर्मावलम्बी बड़ी-बड़ी सहूलियतें पाते हैं? काशिफ़, सलीम, और ब्लॉगिंग के ज्ञात इतिहास में सबसे महानतम ब्लागर कैरानवी भी इन सवालों का जवाब खोजने की कोशिश करें…, जवाब हमें तो मालूम है, लेकिन हम इन्हीं लोगों के मुँह से सुनना चाहते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है/हो रहा है।
रेल (ब्लागजगत) में मुझे तो लगा था कि आपही सबसे अधिक धर्म के नाम पर बेवकूफ बना रहे हो, अफसोस, तुम तो वेद कुरआन के मध्य गंदी चीजों को खींच रहे हो, चुटकलों पे आगये हो तो चलो खुश हो लो यहाँ ढील देता हूँ, कियूंकि में चुटकलों से धर्म का मजाक नहीं उडा सकता, यह तो बहुत सरल होता है, फुटपाथ से पुस्तक खरीदो, रेल में सवार हो जाओ पंडित की जगह सुनने वालों को मौलाना सुनादो, ईसाई मिले तो फादर करदो, हद है भई जिसको सिरमौर बना रखा हो, वह तो फुटपाथी लेखक बन गया, , कहो तो पंडित जी पर चुटकला भेज दूं पंडित की जगह अबके हाजी जी कर देना,
शब्द कैरानवी का मजाक उडाने वालों तुम्हारी यही सोच तुम्हें धर्म के मामले में पीछे धकेले हुये है तुमने डा़ जाकिर नायक पर अपनी शक्ति लगा दी कभी यह ना जाना नायक का गुरू का गुरू कौन है, तो सुनो वह हैं मौलाना रहमतुल्लाह कैरानवी वह शख्सियत जिसके कारण आज भारत में हम हैं तुम हो अन्यथा सबको ईसाई बनादिया गया होता,
मुस्लिम बहुसंख्यक देशों के जो आप नाम गिनवा रहे हो उसमें हमारे तुम्हारे बिछुडे भाईबंद ही तो हैं उनकी मानसिकता और आपकी मानसिकता में कोई फर्क नहीं है, हमें यहाँ कितनी सहूलियत है इसपर हंसूं कि रोदूं यही नहीं समझ रहा आपको किया लिखूं, वैसे मेरे से अधिक ज्ञानी एक उमर सेफ है उससे आजकल मैं आपका परिचय करा रहा हूँ मैं इस लिये भी नेट पर कम आ सका, सोचा एक उमर पागल कर देता है तो दो उमर अर्थात एक और एक ग्यारह हो जायेंगे, उसका परिचय करा दूं तो इस रेल से आप उतरोगे ही नहीं, दिल थामके बैठो बडे बडे शंकराचार्य उससे पनाह माँगते हैं,
@ काशिफ साहब, सलीम साहब आपका धन्यवाद मेरी गैर मोजूदगी में आपने खूब संभाला,
आदरणीय चिपलूनकर जी पिछले एक साल से मेें आपके ब्लाग पर नियमित रूप से आता हू वाकई लेखन पर आपकि पकड जर्बरदस्त है और अन्य प्रचार प्रसार वाले ब्लोग पर भी जाता रहता हॅंू पर कभी टिप्पणी करने का मन नही करता एक अन्तहिन बहस का हिस्सा बनने से अच्छा है तटस्थ रहा जाये क्यांेकि अगर कोई कुछ समझाना चाहे तो भी उनको कोई कुछ समझा नही सकता जो धर्म कि गहराई समझता है वो कभी तर्क वितर्क नहीं करता ये सब सतही ज्ञान के ज्ञाता है दोष इनका भी नहीं है भाई आजकल क्रेश कोर्स का जमाना है दो तीन बातें पढ ली और चले आये कुतर्क करने खैर भगवान सभी का भला करे
आप तो लगे रहो हम उत्साहवर्घन करते रहेंगे
आरिफ़, उमर और सलीम जी सबसे पहले ये बता दूं की जब इस्लाम दुसरे धर्मों की अस्तित्व को नकारता रहेगा तब तक दुसरे धर्म वाले भी इस्लाम को ऐसा ही मानते रहेंगे |
भाई आप तीनो मिलकर जवाब दो यदि जजिया को सही ठहराते हो और यदि आल्लाह के सच्चे भक्त हो तो तुन्हें भी गैर-मुस्लिम शाशन मैं extra टैक्स देना चाहिए | पर आप लोग तो उल्टे गैर-मुस्लिम सासन मैं हज का और अन्य सहायता ले रहे हो | दोनो हाथ मैं लड्डू, क्यों?
आरिफ़ भाई अब जरा आप सलीम या उमर के साईट पे जा के देखो , क्या क्या उल-जलूल लिख रहे हैं | यदि उन्हें दुसरे धर्म के परती सम्मान नहीं तो फिर हमें क्यों ?
और एक बात बोलूंगा उमर सच मैं गधे से भी बदतर है | देखो अब क्या बोल रहा है - शंकराचार्य उससे पनाह मांगते हैं | यार उमर तुम अपने धर्म की बात करो , हिन्दुओं के गुरु या धर्मग्रन्थ गधों के समझ से परे की चीज है | नहीं बंद करोगे तो सुनते रहो ... इतने लोग सुना रहे हैं ना |
@काशिफ आरिफ जी,
बहुत शुक्रगुजार हूँ आपका यह कहने के लिये कि आप जजिया के हक में नहीं हैं। 'सार सार को गहि रहैं, थोथा देय उड़ाय'धर्म को लेकर यही भाव हर आधुनिक इन्सान में होना चाहिये।
"सारांश यह है कि गैर-मुस्लिमों के लिए यह अनिवार्य है कि वो या तो इस्लाम में प्रवेश करें या इस्लामी अह्कान शासन के अधीन हो जाएँ."
इस पर आपका क्या विचार है?
मैं वरुण नहीं हूं,यह सब मुझे करना पड़ा उन कुतर्कों की ओर ध्यान दिलाने के लिये जिन्हें ब्लॉग जगत ने अनदेखा कर दिया था।
@ सलीम खान,
आप तो अब भी जजिया पर कायम हो मेरा मन साफ है और धर्म प्रचार के नाम पर तुम्हारे द्वारा फैलाई जा रही जहालत के खिलाफ है कयामत के दिन देखना जब हिसाब होगा तो मैं पास होउंगा और तुम फेल क्योंकि तुमने यकीनन धर्मग्रंथ तो बहुत पढे होंगे पर धर्म के मर्म को नहीं समझा।
तुम में और महसूद में कोई अंतर नहीं एक बारुदी आतंकवाद फैलाता है दूसरा वैचारिक,वह भी अपने धर्म के नाम पर.....
असली आवाज़!
गुरूजी मज़े में निरंतर बढोतरी हो रही है......बीच-बीच में आकर थोडा घी डालते रहिये लौ जलती रहेगी.बस!आग न लग जाए.
@कैरानावी जी लगे रहिये आप जरूर जीतेगे.
@ स्वच्छ सन्देश अस्वच्छ हो रहा है. पता नहीं कोई डुप्लीकेट भी आ गया है .
@ Rakesh Singh जी खून मत जलाओ अपना.
@ गुरूजी को ऋचा का अच्छा सपोर्ट मिल रहा है.
सुरेश भईया,
सुबह हो गयी है राम राम आपको और सारे टीपने वाले जनों को...
आप भी कमाल के हो मारते हो तो भींगा के ( कोल्हापुरी चप्पल ), वैसे गधो को मारना चाहिए लेकिन ज़रा प्यार से l
ऋचा जी के हिम्मत की दाद देनी होगी की वो गधों की तशरीफ़ पर दे दना दन बजाये जा रही है,
इनकी यही औकात है की खाते इस देश का है और फतवा ( नौटंकी ) पेश करते है हमारे बहुसंख्यक समुदाय के हितैसी समाचारपत्रों के द्वारा की "वन्देमातरम" को नहीं गाना चाहिए, इन बेवकूफों को कौन समझाए की जिस माँ का दूध पीते है उसकी पूजा करते है देवी समझ कर ( इनकी तो कौम में तो बहन को भी नहीं बख्शते ) और फतवा पढ़ कर कहते है की हमे इस मुल्क से प्यार है पर हम इसकी पूजा नहीं कर सकते, ये हमारे कुअरान @$५७^#५६&%^ ८५३*@ में लिखा है.....
इन जैसे वतनपरस्तों के लिए एक और हिटलर की जरुरत है जिसकी नज़र में इक राष्ट्र, इक धर्म और इक नेता की अहमियत थी इस देश में तो कुकुरमुत्तों की तरह तो मदरसे और दारूम उलूम जैसे आतंकवादी संगठन उग आये है. ( इन्हें घुमा कर इनके तशरीफ़ पर गर्म लोहे की सलाखों से "हिन्दुस्तान" गुदवा देना चाहिए )
......जय जवान जय किसान जय विज्ञान और जय भगवान्..........
@ समस्त ब्लॉगजगत
आप सभी के जूते खाकर अपनी भड़ास निकालने के लिए जनाब काशिफ आरिफ ने मुझे और ऋचा जी की कितने मधुर शब्दों में तारीफ की है , जरा इसे देखें , मेरी और ऋचा जी की तारीफ में दो शब्द
ऊपर दिए गए लिंक पर मैंने अपना ज़वाब भी दे दिया है , और वहां से उसके डिलीट किये जाने की पूरी संभावना है ( वो क्या है कि इस्लाम में लोकतंत्र एक कुफ्र है ) इसीलिए लगे हाथ सुरेश जी के मंच पर भी इसे पोस्ट कर देता हूँ |
अब आप फैसला दीजिये |
@ काशिफ आरिफ
लगता है पूरे ब्लॉग जगत के जूते खाकर तुम्हारा दिमाग चल चुका है |
खैर मुझे तो लगता है कि आगरे से पागल खाना तो शिफ्ट हो गया है पर कुछ पागल शहर में ही रह गए | :P :D
रही बात जुम्मे - जुम्मे आठ दिन से ब्लोगिंग करने कि तो सुनो ' मियां जी अपनी लुंगी से बाहर मत निकलो '
मैं पहले ही हिंदी ब्लोगिंग में रह चुका हूँ और मेरे दोनों ब्लॉग काफी सफल भी रहे थे |
जरा इन दोनों ब्लोगों पर नज़र ( वही तुम्हारी कौवे वाली ) डाल कर देखो कि कैसी सार्थक चर्चायें की गयी हैं , ना कि धार्मिक और कुतर्की बकवासों का पुलिंदा थोपा गया है |
१ . भारत की युवादृष्टि
२ .अजब अनोखी दुनिया के चित्र
@ पाठकगण
आप सभी के सहयोग के लिए बहुत - बहुत धन्यवाद |
@ ऋचा जी
आप अपने उपक्रम में लगी रहिये वो कहावत तो आपने सुनी ही होगी
' हाथी चले बाज़ार '
' कुत्ते भौंके हज़ार ' ||
@ गरुणध्वज जी
आपका संगीतकार कुश जी के निर्देशन में इन भैसों के तबेले में मधुर बीन बजाने का बहुत - बहुत शुक्रिया |
@ सुरेश चिपलूनकर जी
आपके वैधानिक चेतावनी जारी करने के बाद भी ये गधे ( गधा प्रजाति फिलहाल क्षमा करे ) पूरी बयान - बाजी से खुद को जोड़कर क्यों देख रहे हैं ?
डुप्लीकेट स्वच्छ सन्देश जी
अल्लाह के इन बन्दों को आइना दिखलाने का शुक्रिया |
:) :( :P :D :$ ;)
दुसरे इस्लामिक देशों में जो हो रहा है उसके लिये आप और हम अगर कुछ कर सकते है तो वो है "निन्दा" इसके अलावा कुछ नही कर सकते!
मैं त्रर्चा जी की बात से सहमत हूं.......जहां तक मैने इस बात को समझा है इसका मतलब यही निकलता है "की मुसलमानों ने असली इस्लाम को छोड दिया है.....कुरआन और सही हदीस को छोड दिया है.....मुसलमान आंख बंद करके कुछ कथित इस्लाम के ठेकेदारों की बातों पर यकीन कर रहा है....
कुरआन की कुछ आयतों की वजह से जो १४३० साल पहले उतारी गई थी वो भी उन काफ़िरो के लिये जिन्होने मुस्लमानों को उनके घर, उनके शहर से निकाल दिया और उन पर अत्याचार किया..! उनको देखते ही मारने का हुक्म दिया गया था.....कुरआन में कहीं नही कहा गया है की बेकुसुर और मजबुर को मार दों.......जंग के वक्त भी सिर्फ़ उन्ही लोगो से लडने की इजाज़त है जो तुम्हारा मुकाबला कर सकें!.....
जब तक मुसलमान मुल्लाओं की कही गयी बात की जाचं-पडताल नहीं करेगा तब तक कुछ नही होगा.......हम लोग इस कोशिश मे लगे हुये है की मुसलमान कुरआन और हदीस को समझना और अमल करना शुरु कर दे....बहुत से ऐसे लोग है जो हिन्दुस्तान के अन्दर और बाहर इस काम में लगे हुये है....और मैं भी अपनी तरफ़ से जितना होता है उतना करता हूं
आप मेरा ब्लोग देख सकते है जिसका मुख्य मकसद यही है..इस्लाम और कुरआन
@ वरूण जी
आप अपने दिलॊ-दिमाग से ये बात निकाल दें की मैं आपकी टिप्पणी डिलीट करुगां....ये काम मैने कभी नही किया है और ना आगे करने का इरादा है.......जिस तरह से मुझे अपनी बात कहने का हक है ठीक उसी तरह से आपको भी है....
कुछ उल्टा-सीधा कहने से पहले ये देख ले की जिस आई-डी से आप टिप्पणी कर रहे है उसमें कितने ब्लोग है??????
मेरे पास आपकी कुण्ड्ली तो है नही जो मुझे सब पता हो.........
आपने मेरा ब्लोग "हमारा हिन्दुस्तान" पढा है----------अगर नही पढा है तो ध्यान से दोबारा पढ लो मेरे ब्लोग पर भी आपको ऎसा कोई लेख नही मिलेगा|||
मैने कुरआन की आयत को गलत नही कहा है----मैने कहा की मैं ज़्यादती तौर पर उससे सहमत नही हूं......तो चैलेन्ज़ हारने या ना हारने वाली इसमें कोई बात नही है
"बहुत से ऐसे लोग है जो हिन्दुस्तान के अन्दर और बाहर इस काम में लगे हुये है.." - आखिर कर वो लोग कौन हैं ? डॉ. जाकिर, सलीम खान, Mohammed Umar Kairanvi जैसे लोग ही ये काम कर रहे हैं ना ? डॉ. जाकिर, सलीम खान, Mohammed Umar Kairanvi जैसे लोगों से क्या आशा किया जाना चाहिए ये उनके ब्लॉग पे जा कर ही पता चलता है |
डॉ. जाकिर, सलीम खान, Mohammed Umar Kairanvi ही बकवास भरी बाते कर रहे हैं| बिलकुल कमीने किस्म के लोग हैं ये तीनो |
@ वरूण जी
एक बात और आप शायद "बमबमभोले" ना हो....और "स्वच्छ सन्देश" ना हो लेकिन आप "गरूणध्वज" ज़रुर है......मैं बताऊ कैसे........
Varun Kumar Jaiswal ने आपकी पोस्ट " अल्लाह, इस्लाम, कुरआन और मुसलमानों को गरियातें हिन... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
लो भाई यहाँ पर भी वही भैंसों का तबेला लगा हुआ है ...........
मेरी भी बीन सुन ही लो ...............
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तू रु.. रु रु.. रु रु रु रु.. .......... :) :)
Varun Kumar Jaiswal द्वारा "हमारा हिन्दुस्तान"... के लिए Sat Aug 08, 06:28:00 PM IST को पोस्ट किया गया
गरुणध्वज ने आपकी पोस्ट " अल्लाह, इस्लाम, कुरआन और मुसलमानों को गरियातें हिन... " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
लो भाई यहाँ पर भी वही भैंसों का तबेला लगा हुआ है ...........
मेरी भी बीन सुन ही लो ...............
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गरुणध्वज द्वारा "हमारा हिन्दुस्तान"... के लिए Sat Aug 08, 06:33:00 PM IST को पोस्ट किया गया
अब सवाल उठता है की "दो दोस्त एक ब्लोग के एक लेख पर सिर्फ़ पांच मिनट के फ़र्क से एक-एक समान शब्द वाली टिप्पणी कैसे कर सकते है"
इसका जवाब ज़रुर दीजियेगा वो क्या है ना आपके कहे अनुसार "मैं पागल हूं, मैं गधा हूं".....तो इतनी गहरी बात मैं समझ नही पा रहा हूं
आपके जवाब के इन्तेज़ार में
@ काशिफ आरिफ
आपकी जानकारी के लिए मैं बता दूं की हम दोनों एक ही अपार्टमेन्ट में रहते हैं और एक ही अपार्टमेन्ट का WI - FI कनेक्शन इस्तेमाल करते हैं | ( ताकि कहीं आगे तुम गधे ये न कहो की एक ही IP address इस्तेमाल कर रहे हैं )
वैसे तो मेरा अपना लैपटॉप भी है लेकिन कई बार मैं वरुण जी का भी कंप्यूटर इस्तेमाल करता हूँ |
और एक साथ मिलकर हम तुम्हारे कुतर्को का जवाब देने के लिए काम करते हैं |
क्या हैं न गधो की जमात से निपटने के लिए साथ मिलकर काम करना पड़ता है |
तुम लोग सीधे तर्क देने से समझते नहीं हो तो मैं भी तुम्हारे इस घटिया कुतर्को का जवाब तुम्हारी ही भाषा में देने के लिए इस ब्लॉग जगत में बीन का सहारा लेना पड़ा ....................................
रही बात उस कमेन्ट की तो उसे पहली बार मैंने ही वरुण भाई को बोला था, किन्तु उन्होंने उसे पोस्ट करने के बाद इसलिए मिटा दिया की मेरा कमेन्ट फिर पोस्ट नहीं हो पाया ................... बाद में मैंने वही कमेन्ट दुबारा उसी वक़्त पर दुबारा पोस्ट किया ........................
अगर इतना समझाने के बाद भी न यकीन हो तो पुणे के bloggers का हार्दिक स्वागत है तुम उन्हें भेज कर अपना शक दूर कर सकते हो ........................
@ काशिफ आरिफ
जैसा की आपने अपनी टिप्पणी ने लिखा है " मैने कुरआन की आयत को गलत नही कहा है----मैने कहा की मैं ज़्यादती तौर पर उससे सहमत नही हूं......तो चैलेन्ज़ हारने या ना हारने वाली इसमें कोई बात नही है "
काशिफ मियां आपको शायद पता नहीं की कोई भी मुसलमान जाती तौर पर भी इस्लाम मानते हुए कुरान की किसी भी आयत से असहमत हो कत्तई नहीं हो सकता है ऐसा करना उसके लिए कुफ्र ही है ( अब भी अपना असली रंग दिखाते हुए सहमत हो जाओ वरना कहीं ब्लॉग जगत की सहानुभूति पाने के चक्कर में पूरे हिन्दुस्तान के मुल्ले तुमको इस्लाम से खारिज कर दें |
और रही बात मेरे ID पर मेरे पुराने ब्लॉग क्यूँ नहीं दिख रहे ?
भाई मैं " रमता जोगी , बहता पानी " वाली विचारधारा का हूँ जिन ब्लोगों के लेख पर व्यापक चर्चा हो चुकी है उनको मैंने अपने ID से हटा दिया है वो क्या है कि मेरा दिमाग पिछले १४०० वर्षों से एक ही बात में अटका हुआ थोड़े ही है |
:) :( :P :D :$ ;)
आज तक मैंने कभी भी अपने चिठ्ठे पर किसी टिप्पणी को प्रतिबन्धित नहीं किया है, न ही किसी टिप्पणी को हटाया है, न ही किसी टिप्पणीकार के प्रति दुराग्रह रखा है…। अतः मैं सभी बन्धुओं से अनुरोध करता हूं कि फ़ालतू की बहस में न उलझें… इस चर्चा को यहीं विराम दें… दुनिया में और भी गम हैं…। मुझे मजबूर न करें कि मैं किसी का नाम लेकर उस पर आक्षेप करूं या उसकी आलोचना करूं। वरुण, गरुणध्वज, राकेश जी, ॠचा जी सभी से अनुरोध है कि यदि कोई समझना ही नहीं चाहता है तो क्यों अपनी ऊर्जा खराब कर रहे हैं। सोये हुए को जगाना आसान है, लेकिन जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे आप नहीं उठा सकते…
Bahut sundar.
{ Treasurer-S, T }
नौ औरतें मिलकर एक महीने में बच्चा पैदा नहीं कर सकतीं, नौ माह तो लगेंगे ही…।
---------
सही कहा, जिस संघ की आप तारीफ करते नहीं अघाते हैं, उसके जैसे नौ संघ भी मिलकर काम करें तो एक बुद्धिजीवी नहीं तैयार कर सकते, बल्कि वे नौ साल लगे रहें तो भी सुरेश चिपलूनकर ही तैयार होंगे।
मुझे इस छिछोरेपन की सम्भावना शुरू में ही दिख गयी थी, इसीलिए बिना टिप्पणी किए निकल गया था। सुरेश जी को शायद टिप्पणियों का नया रिकार्ड मिल गया हो। बधाई।
Hello Blogger Friend,
Your excellent post has been back-linked in
http://hinduonline.blogspot.com/
- a blog for Daily Posts, News, Views Compilation by a Common Hindu
- Hindu Online.
@Richa - जिस albedar की तुमने मुझे याद दिलाई, वहाँ चिपलूनकर साहब भी आशिर्वाद देकर आये, दोबारा जाके देखो, बीस कदम ओर पीछे हटादिया उसे, मेरे जवाब के बाद तीन महीने से कुछ नहीं लिख सका, सारा ब्लाग रोंन्द डाला, रही बात गधे की मैंने अनुवाद सिंह के चाणक्य प्रतिपादित कहने पर चाणक्य को पढा तुम भी पढ लो, दूसरे ग्रंथों में हेर फेर की तरह इसमें वेश्यालय,विष कन्या का जिक्र निकाल दिया गया है
आचार्य चाणक्य को पढना कई गुण गधे से सीखने को कह गया वह आचार्य यह ज्ञान उसने किया पढके दिया दुनिया जाने है,
are o keranvi musalmaano ne kya kami chodi thi hinuon ko khatm karne ki.terebaap dada to pit kar ya lalach me musalmaan ban gaye.or jahan tak baat hai hinduon ko bachaane ki to tujhe bata doon ki hindu samaj apne balidaano ki vajah se jinda hai na ki tere kisi keraanvi molvi ki vajah se. aur richa ne jo blog diya hai use padh. (satyarthved.blogspot.com)
itihas ki va kuran ki sahi jaankari mil jayegi.
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@ rashmi aroda - इस ब्लाग पर जाने से मेसेज मिलता है steal your information, इस कैरानवी से सोचो वह कैरानवी कैसा होगा, तुम जब भी ऐसे थे अब भी ऐसे हो, जिस ब्लाग को देखने को कह रहे हो उसकी असलियत यह है,
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