Wednesday, June 3, 2009

विजय तेंडुलकर का नाटक पाकिस्तान में… Vijay Tendulkar Play in Pakistan without Royalty

मराठी भाषा में नाटकों, कला और संस्कृति का एक विस्तृत और समृद्ध इतिहास रहा है। मराठी रंगमंच ने देश के कला जगत को गायन, वादन, नाटक, संगीत आदि क्षेत्रों में कई महान कलाकार दिये हैं। इन्हीं में से एक हैं प्रख्यात नाटककार विजय धोण्डोपन्त तेंडुलकर। कई प्रसिद्ध और विवादास्पद नाटकों के लेखक श्री तेंडुलकर की हाल ही में 19 मई को पहली पुण्यतिथि थी। तेंडुलकर के कई नाटक अपने विषयवस्तु को लेकर सामाजिक रूप से विवादित रहे, लेकिन कभी भी उन्होंने अपने लेखन से समझौता नहीं किया।


संयोग देखिये कि पाकिस्तान के अखबारों को पढ़ते समय अचानक यह खबर मिली कि विजय तेंडुलकर के प्रसिद्ध नाटक “शांतता…कोर्ट चालू आहे…” (खामोश… अदालत जारी है) का उर्दू भाषा में सफ़ल मंचन कराची में किया जा रहा है। इस खबर को “डॉन” अखबार की इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है…

http://www.dawn.com/wps/wcm/connect/dawn-content-library/dawn/news/entertainment/05-silence-the-court-is-in-session

डॉन अखबार मे तेंडुलकर के इस नाटक और उस नाटक की उर्दू प्रस्तुति की खूब तारीफ़ की गई है। यह खबर भारत के कलाप्रेमियों और आम जनता के लिये एक सुखद आश्चर्यजनक धक्का ही है। “धक्का” इसलिये, कि विश्वास नहीं होता कि पाकिस्तान की छवि और वहाँ के वर्तमान हालातों को देखते हुए वहाँ अभी भी “नाटक परम्परा” न सिर्फ़ जीवित है, बल्कि सफ़लतापूर्वक उसका मंचन भी किया जा रहा है। अगला धक्का यह कि, खबर के अनुसार नाटक का टिकट 500/- रुपये रखा गया है (मराठी में तो हम आसानी से कल्पना कर सकते हैं, लेकिन हिन्दी नाट्य जगत 500 रुपये के टिकट लेकर आने वाले दर्शक खींच सकेगा, ऐसा मुश्किल लगता है)। 500 रुपये के टिकट के बाद, एक तीसरा धक्का यह कि भारत के किसी कलाकार का लिखा हुआ और वह भी “कुमारी माता” और गर्भपात जैसे विवादास्पद मुद्दों पर बेलाग बात करने वाला नाटक पाकिस्तान में खेला जा रहा है, है न आश्चर्य की बात… लेकिन यही विजय तेंडुलकर की सफ़लता है। उनके लिखे हुए नाटक और फ़िल्मों को किसी भी भाषा में अनुवादित किया जाये उनका “असर” उतना ही तीव्र होता है, जितना मराठी में हुआ है।

तेंडुलकर के इस नाटक “शांतता कोर्ट चालू आहे…” का हिन्दी सहित अन्य भाषाओं में भी मंचन हो चुका है। संक्षिप्त में इस नाटक की कहानी कुछ इस प्रकार है कि – एक थियेटर ग्रुप जो कि गाँव-गाँव जाकर अपने नाटक दिखाता है, उसे अचानक एक गाँव में किसी कारणवश अधिक रुकना पड़ जाता है। थियेटर ग्रुप के सदस्य टाइमपास के लिये एक नकली अदालत का दृश्य रचते हैं और आपस में मुकदमा चलाते हैं। नाटक के भीतर एक नाटक की शुरुआत तो हल्के-फ़ुल्के माहौल में होती है, लेकिन जल्दी ही ग्रुप के सदस्य अपने असली “रंग” में आ जाते हैं। पुरुष मानसिकता और हिंसा के घालमेल के दर्शन होने लगते हैं। थियेटर ग्रुप की एक महिला सदस्य “सुश्री बेनारे” को लेकर पुरुष सदस्य उस पर विभिन्न आरोप लगाते हैं, क्योंकि वे जानते थे कि मिस बेनारे यौन उत्पीड़ित रही है और वह एक बार गर्भपात भी करवा चुकी है। टाइम पास के लिये शुरु की गई नकली अदालत में सभी पात्र, कब अपनी आपसी रंजिश और पूर्वाग्रहों को उजागर करने लगते हैं पता ही नहीं चलता, अन्त में मिस बेनारे टूट जाती है, वह स्वीकार करती है कि हाँ वह भी एक “कुमारी माता” है, लेकिन सभी पुरुष पात्रों की हिंसात्मक और नारी विरोधी मानसिकता को उजागर करके उनकी “असली औकात” दिखाने के बाद…”।

विजय तेंडुलकर ने मात्र 6 वर्ष की उम्र में पहली कहानी लिखी और 11 वर्ष की आयु में पहला नाटक लिखा, उसमें अभिनय किया और उसका निर्देशन भी किया। तेंडुलकर का झुकाव वामपंथी विचारधारा की ओर रहा है, लेकिन फ़िर भी भारत की सांस्कृतिक परम्परा और भारत की मिट्टी के प्रति उनका गहरा लगाव था। गुजरात दंगों के बाद उनका वह वक्तव्य बेहद विवादित हुआ था, जिसमें उन्होंने कहा था कि “यदि मेरे पास पिस्तौल होती तो मैं नरेन्द्र मोदी को गोली से उड़ा देता…” हालांकि बाद में उन्होंने सफ़ाई देते हुए कहा था कि गुस्सा किसी भी बात का हल नहीं निकाल सकता और वह वक्तव्य गुस्से में दिया गया था। विजय तेंडुलकर को महाराष्ट्र तथा भारत सरकार की ओर से कई पुरस्कार और सम्मान मिले, जिसमें प्रमुख हैं 1999 में “महाराष्ट्र गौरव”, 1970 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, 1984 में पद्मभूषण। उनकी लिखी कई फ़िल्मों की पटकथाओं पर कलात्मक फ़िल्में बनीं, जैसे मंथन, निशांत, आक्रोश, अर्धसत्य आदि।

पाकिस्तान में चल रहे नाटक के बारे में एक बात का दुःख जरूर है कि उस नाटक से पैसा बनाने वालों ने तेंडुलकर परिवार को कभी रॉयल्टी का एक रुपया भी ईमानदारी से नहीं दिया है। तेंडुलकर के अवसान के बाद उनकी बौद्धिक सम्पत्ति की देखभाल कर रहीं उनकी पुत्री तनुजा मोहिते ने बताया कि “जब तक बाबा (यानी पिताजी) जीवित थे तब तक तो कई जगहों से ईमानदारी, या शर्म के मारे ही सही रॉयल्टी आ जाती थी, लेकिन उनके निधन के पश्चात इसमें ढील आती जा रही है। श्री तेंडुलकर ने तय किया था कि उनके प्रत्येक प्रमुख नाटक के एक शो पर 1000 रुपये, एकांकी नाटक के प्रति शो 500 रुपये, बाल नाट्य के 300 रुपये तथा लेखों के अनुवाद हेतु प्रति लेख 1500 रुपये रॉयल्टी वे लेंगे। नाटक “शांतता…” के पाकिस्तान में कई सफ़ल शो 500 रुपये प्रति व्यक्ति के टिकट की दर से आयोजित हो चुके हैं, इस नाटक का अनुवाद भी मुम्बई में रहने वाले एक लेखक इंतिज़ार हुसैन ने किया है, लेकिन रॉयल्टी के नाम पर तेंडुलकर परिवार को अब तक कुछ नहीं मिला है। इस सम्बन्ध में सुश्री मोहिते ने बताया कि बौद्धिक सम्पदा की चोरी रोकने के लिये उन्होंने कई कम्युनिटी वेबसाईटों और गूगल अलर्ट पर भी सावधान किया है कि यदि इस प्रकार के नाटक या तेंडुलकर के कोई लेख आदि प्रकाशित होते हैं तो उन्हें 9820362103 पर सम्पर्क करके बताने का कष्ट करें, ताकि रॉयल्टी के बारे में निश्चित स्थिति पता चल सके। उन्होंने आगे बताया कि महाराष्ट्र के छोटे शहरों में कई छोटी संस्थायें हैं जो “बाबा” के नाटकों का मंचन करती हैं और अधिकतर बार ईमानदारी से रॉयल्टी का पैसा देती हैं, या पूर्व-अनुमति लेकर मुफ़्त में नाटक करती हैं… लेकिन बड़ी संस्थायें या जाने-माने नाट्य ग्रुप रॉयल्टी देने में आनाकानी करते हैं।

अपनी पुत्री प्रिया तेंडुलकर (“रजनी” फ़ेम) के निधन (सितम्बर 2002) के पश्चात विजय तेंडुलकर भीतर से टूट गये थे और 19 मई 2008 को पुणे में उनका देहान्त हुआ। इस महान नाटककार को विनम्र श्रद्धांजलि…
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नोट – मेरे कुछ नये पाठकों (जिन्होंने मेरे पुराने लेख नहीं पढ़े) ने ई-मेल पर कहा कि क्या मैं सिर्फ़ कांग्रेस विरोध, राजनीति और “शर्मनिरपेक्षता” आदि पर ही लेख लिखता हूँ? क्योंकि गत 6 महीने में मैंने अधिकतर लेख “राजनीति, समाज और हिन्दुत्व को हो रहे नुकसान पर ही लिखे। इसलिये एक वाम विचारधारा के, धर्म आधारित राजनीति के प्रखर विरोधी, समाज को हिलाकर रख देने वाले कालजयी नाटकों के रचयिता तेंडुलकर, पर यह लेख उनकी शिकायत को दूर करने के लिये है…

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18 comments:

संजय बेंगाणी said...

पहली बात तो यह कि पोस्ट शानदार, जानकारी देती है. बहुत सी बातें नई पता चली. रॉयल्टी का तो क्या कहें. पायरेसी हम सब में रची बसी लगती है. पाकिस्तान में बॉल्ड किस्म का नाटक खेला जाना आश्चर्यजनक लगता है.

दुसरी बात किसी की शिकायत दूर करने के लिए लिखना समझ नहीं आया. मुझे उस बन्दे का लिखा रास नहीं आता क्या वह मेरे हिसाब से लिखेगा? मैने तो वहाँ टिप्पणी कर दी कि जो खराब लिखते है उन्हे मत पढ़ो, बहुत से कस्बों के मोहल्लों के हासिये पर अच्छा लिखा जा रहा है, वह पढ़ो.

दीपक भारतदीप said...

यह ख़ुशी की बात नहीं है अगर उस नाटक का मंचन बिना किसी रायल्टी चुकाए किया जा रहा है.
दीपक भारतदीप

Vivek Rastogi said...

रायल्टी तो तब भी कुछ सुना हुआ सा शब्द लगता है पर जब आम लोगों को यह ही नहीं पता है कि जितने भी सोफ़्टवेयर वो लोग उपयोग कर रहे हैं उनके लाईसेंस लेना पड़ते हैं, सब जाने अनजाने पायरेटेड साफ़्टवेयरों का उपयोग कर रहे हैं।

यह जागृति तो समाज में लानी पड़ेगी।

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आप को किसी दूसरे के कहने पर नहीं लिखना चाहिए। जो आप को अच्छा लगे और जिसे आप ईमानदारी से लोगों के सामने रखना चाहें उसे ही लिखें। किसी के कहने पर लिखना या किसी को दिखाने के लिए लिखना तो उचित नहीं है। फिर भी आप ने यह कह कर अपनी ईमानदारी का परिचय दिया है कि इसे मैं इस कारण से लिख रहा हूँ। आप मूलतः एक ईमानदार व्यक्ति हैं। इसी कारण तो आप को पसंद किया जाता है। आप गलत बात को भी सिर्फ इसलिए नहीं कह सकते कि वह औरों को अच्छी लगती है। बल्कि इसलिए कहते हैं कि उसे सही समझते हैं। यही तो आप का श्रेष्ठ गुण है, जिस के कारण विरोधी भी आप को पसंद करने लगते हैं।

जहाँ तक पाकिस्तान का प्रश्न है वह सारा वैसा नहीं है जैसा अक्सर दिखाया जाता है। वहाँ भी जनता है जो व्यवस्था से परेशान है, भारत और विश्व से दोस्ती चाहती है और यह भी कि ऐसी जनता बहुमत में भी है। लेकिन उस के पास सत्ता नहीं है। वह शासित है और उस का दम घुट रहा है। पाकिस्तान से बहुत खबरें इस तरह की आती हैं लेकिन वह सब मीडिया और समाचार पत्रों में नहीं आ पाता। दुश्मनी सरकारों और राज्यों में हो सकती है। जनता उसे ढोती रहती है। जिस दिन जनता जनता दोस्ती पर उतर आए और एक दूसरे के साथ खड़ी होने की हिम्मत जुटा लेगी। उस दिन सरकारों को भी दुश्मनियाँ भी समाप्त हो लेंगी।

विजय वडनेरे said...

अरे वाह!
"आपका लिखा पसंद नहीं आता" ऐसा बताने पर उसी के लिये कुछ लिखा जाता है। यह तो बड़ी अच्छी बात है।

मैं भी अपने ब्लाग पर जा कर तुरंत आपके लिये कुछ अगड़म-बग़ड़म लिखता हूँ।

शायद आपकी अगली पोस्ट मुझे ही "समर्पित" हो...!! :)

Suresh Chiplunkar said...

@ बेंगाणी जी, आपका आदेश सिर माथे, यह सिर्फ़ संयोग है कि मेरी यह पोस्ट आज आई, लेकिन मेरे पाठक "वेरायटी" चाहते थे, सो मैंने भी सोचा कि कुछ हटकर लिखा जाये… बाकी जो अपना "रंग" है वह तो आगे भी जारी रहेगा ही… :)
@ वडनेरे जी - हा हा हा हा हा हा… आपको भी अवश्य समर्पित करूंगा… पहले आप मेरी आलोचना तो कीजिये…

मैथिली गुप्त said...

सुरेश जी, मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि पाकिस्तान में खामोश अदालत जारी है खेला गया.

हिन्दी नाटक खेलने वालों की बहुत दुर्दशा है. मराठी और गुजराती नाटक खेलने वाले तो अपना खर्चा निकाल लेते हैं, कमाई भी कर लेते हैं लेकिन हिन्दी नाटकों को देखने कोई नहीं आता, कभी कभी तो मंच पर नाटक खेलने वालों की संख्या दर्शकों की संख्या से भी अधिक होती है, दिल्ली में तो नाटक में भी हिन्दी ब्लागिंग का दौर दौरा है, तू मेरा नाटक देख, मैं तेरा देखूंगा. नाटक करने वाले ही एक दूसरे का नाटक देखते रहते हैं. रंग महोत्सव जैसे एकाध सरकारी आयोजन इसके अपवाद है.

दूर दराज इलाकों में कई बार खेले नाटकों की रायल्टी खेलने वाले संपर्क के अभाव में चाह कर भी नहीं चुका पाते. एसे मुश्किल हालातों में अगर पाकिस्तान जैसी मुश्किल जगह पर अगर कोई विजय तेंदुलकर जी का नाटक कर पाता है तो मैं तो एसे लोगों की तारीफ ही करूंगा

परमजीत बाली said...

आप का यह रंग भी पसंद आया।

anitakumar said...

बड़िया जानकारी, ये रंग पसंद आया।

अंशुमाली रस्तोगी said...

उम्दा जानकारी के साथ विजय तेंदुलकर पर लिखा सबसे बेहतर लेख है। शुभकामनाएं।

दिल दुखता है... said...

अच्छा लेख, अच्छी जानकारी से भरा हुआ.. पर आगे से किसी की शिकायत दूर करने के लिए मत लिखियेगा... बस आप तो सच लिखियेगा.. जिसे पसंद आये पढ़े न आये तो भी पढ़े और अपनी असहमति दर्ज कराये... उसकी असहमति को दूर करना पर उसके मन के जैसा मत लिखना... शेष आप मुझसे बहुत बड़े है... मैं तो आपका अनुज हूँ..

अभिषेक ओझा said...

शायद ही आपकी कोई ऐसी पोस्ट हो जो मैंने नहीं पढ़ी हो ! टिपण्णी नहीं करता वो अलग बात है. और मैं तो यही कहूँगा कि आप अपने दिल कि लिखिए एकदम खरी-खरी काहे किसी के कहने पर जाते हैं.

Kashif Arif said...

सुरेश जी, आज आपने मेरे ब्लोग पर अपनी नज़र नही की, कयौ? मैने आपकी बात का जवाब दिया है, उसे तो देख लेते...

आपका नया पाठक

cmpershad said...

हम को उनसे वफ़ा की है उम्मीद जो नहीं जानते वफ़ा क्या है--....तो फिर रायल टी कैसी..केवल टी ले लीजिए:)

Kumar Dev said...

आदरणीय सुरेश जी,
हमेशा की तरह लेख जानदार तो नहीं था, क्यूँ की आप थोड़े से असमंजस में लगे l आपने लिखा हैं तो हरदम अच्छा ही होगा इसकी गारंटी नहीं है हाँ शैली परिवर्तन और विषयवस्तु का चुनाव करते वक्त आपको ख्याल रखना चाहिए की आपकी छवि एक उलझे हुए आलोचक और समालोचक जैसी न हो...
अगर बुरा न माने तो कभी कभी अपने मौलिक विचार भी प्रस्तुत करने का प्रयास करे l
इस लेख में ना तो आप पाक की आलोचना कर पा रहे है और ना ही तारीफ करने के मूड में दीखते है,.
लेखक साहब की रोयल्टी की बात तो छोड़ दीजिये, साहब ये तो नाटक है, बड़े बड़े फिल्मकार भी चोरी में आगे रहते है और इसका मेहनताना चुकाने में पीछे l
मुझे और मेरे जैसे लोगों को ये पढ़ कर ख़ुशी होती की आप कभी शरदचन्द्र जी के उपन्यास देवदास की रोयल्टी के बारे में या दिवंगत किशोर जी के मिटते धरोहर ( उनका घर ) के बारे में आवाज़ उठाते.....
बस इतना ही कहना था.... इनसे अलग मैंने आपको दो दफा मेल भेजा है कृपया कर पढ़े और उतर दे....
" जय जवान, जय किसान, जय विज्ञान और जय भगवान्"

Suresh Chiplunkar said...
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katyayan said...

श्रेयान्‌ स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्‌।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥

आनंद said...

सुरेश जी,

जानकर सुखद आश्‍चर्य हुआ कि विजय तेंदुलकर के नाटक अब पाकिस्‍तान में खेले जा रहे हैं। यह आश्‍चर्य सुखद इसलिए है कि विजय तेंदुलकर के नाटकों को देखकर अच्‍छे-अच्‍छे उदारमना और प्रगतिशील दर्शकों को भी जूता सा लगता है। उनके नाटक और उसकी सामग्री किसी भी देश, स्‍थान या समय से परे है।
अभी तक हमारी सोच यह रही है उसके मुताबिक अब तक वहाँ नाटक मंचन करने वाली संस्‍था, आयोजकों तथा विजय तेंदुलकर के लिए फतवा जारी हो जाना चाहिए। परंतु ऐसा नहीं है, उलटे लोग रुचि से नाटक देख रहे हैं। इससे वहाँ आए बदलाव का आभास होता है। समाज का एक ऐसा वर्ग मौजूद है जो कामकाजी महिला के प्रति पुरुषों की ईर्ष्‍या और उसके फलस्‍वरूप चरित्र हनन, समाज की संकीर्ण मानसिकता को उधेड़ने वाले नाटकों को झेलने का हौसला रखता है। आपके लेख से आशा बंधी है कि दुनिया के हर कोने में धीरे-धीरे इसी तरह आईना देखने की हिम्‍मत आएगी।

जहाँ तक रॉयल्‍टी की बात है तो यह भ्रष्‍टाचार सर्वव्‍याप्‍त है, यह नहीं मिटने वाला। यहाँ भारत में भी लेखकों को उनका हिस्‍सा देने में प्रकाशकों की नानी मरती है। फ्री में सामग्री चुराने वाले इतने अधिक हैं कि रॉयल्‍टी या श्रेय देने की घटनाएँ अपवादस्‍वरूप सुनाई देती हैं।

आपका यह आलेख पिछले अन्‍य लेखों से हटकर है। यह भी एक सुखद आ‍श्‍चर्य है। आशा है इसी तरह आप अपने मुख्‍य एजेंडा के साथ ही अन्‍य मुद्दों पर भी बेधड़क लिखते रहेंगे।

- आनंद