Sunday, June 14, 2009

काश मैं एससी/एसटी होता…- युवाओं के टूटते सपने (एक माइक्रो पोस्ट) Reservation and General Category Youths

रिज़ल्ट का मौसम चल रहा है, मेरे सायबर कैफ़े में युवक-युवतियाँ विभिन्न परीक्षाओं के परिणाम देखने आते रहते हैं। AIEEE, पटवारी चयन परीक्षा, संविदा शिक्षकों की भरतियाँ, इंजीनियरिंग की सीटों की काउंसिलिंग आदि-आदि के लिये सायबर कैफ़े पर युवकों का जमावड़ा होता रहता है। कल पटवारी चयन के परिणाम आये, एक युवक को 200 में से 98 नम्बर मिले और उसका चयन सूची में उसका वेटिंग क्रमांक था 2340, उसी के बाद एक लड़की आई जिसके 43 अंक थे और उसका वेटिंग था सिर्फ़ 20, पहले वाले युवक के मुँह से निकला… “काश कि मैं भी एससी/एसटी होता…”।

गरीब और निम्न-मध्यम आय के “सामान्य वर्ग” के युवाओं के टूटते सपने देखना वाकई दुखद होता है। बड़ी दिक्कतों के साथ अजा/जजा वर्ग के परीक्षार्थियों से कई गुना अधिक परीक्षा शुल्क देने और शहर/गाँव से बाहर जाकर परीक्षा में खर्चा करने के बाद जब वे रिजल्ट देखने आते हैं तब उनके चेहरे पर एक उत्कण्ठा का भाव होता है, जब वे देखते हैं कि उनका चयन सिर्फ़ इसलिये नहीं हो पायेगा क्योंकि वे “सामान्य वर्ग” से हैं तब उनके चेहरे के भाव और मुँह का कसैलापन छिपाये नहीं छिपते। आरक्षण इसलिये लागू किया गया था कि समाज में बराबरी का भाव पैदा हो और पिछड़े वर्गों को भी समाज, नौकरी और सत्ता में भागीदारी का मौका मिले। कई लोग तो यह सपना भी देखते पाये गये हैं कि आरक्षण से “जाति” के बन्धन कमजोर पड़ेंगे, लेकिन ऐसा तो हुआ नहीं, उल्टे आरक्षण के कारण “जाति” का भाव और भी मजबूत हुआ है। इसका अनुमान आये दिन होने वाले विभिन्न जातियों के सम्मेलनों और रैलियों से लगाया जा सकता है। समाज को खण्ड-खण्ड करके छोटे टुकड़ों में बाँट दिया गया है, और हरेक टुकड़े पर कोई न कोई नेता-छाप व्यक्ति अपना कब्जा जमाये बैठा है।

वीपी सिंह वाकई “महान” हैं क्योंकि उन्होंने हिन्दुओं को हजारों टुकड़ों में विभाजित कर दिया है, यह काम मुगल और अंग्रेज शासक भी नहीं कर पाये थे। निराश-हताश सामान्य वर्ग के युवाओं को उस गलती की सजा मिल रही है, जो उन्होंने नहीं की। मैं उन्हें कोई सांत्वना भी प्रदान नहीं कर सकता, क्योंकि सुना है कि अब प्रायवेट कम्पनियों में भी आरक्षण लागू होने वाला है… बुझा-बुझा सा चेहरा लिये जाते हुए प्रतिभाशाली युवा मन में यही सोचते हैं कि काश मैं एससी/एसटी होता…!!!

जी हाँ, सरकार हमेशा “अल्पसंख्यकों” का विशेष खयाल नहीं रखती। क्योंकि देश में सबसे बड़ा अल्पसंख्यक समूह, सामान्य वर्ग के गरीब-मध्यम आय वाले युवक-युवतियाँ ही हैं।

29 comments:

GJ said...

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दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आरक्षण के कारण “जाति” का भाव और भी मजबूत हुआ है
इस कथन से सहमति है। लेकिन बेरोजगारी का मूल कारण पर्याप्त कामों का न होना है। क्यों कि कुछ लोगों से जरूरत से अधिक काम लिया जा रहा है, कुछ लोग नौकरियों के अतिरिक्त अपना भी काम करते हैं, बहुत से बच्चों से काम लिया जाता है।
काम का वितरण सही नहीं है, काम की मजदूरी में बहुत वैषम्य है। लेकिन यह सब उन्हें जरूर चाहिए जो इस मुल्क के असली आका हैं। वे समाज में जाति, धर्म, वर्ण, क्षेत्रीयता आदि के वैषम्य को बनाए रखना चाहते हैं। जिस से असली वैषम्य छुपा रहे।

प्रदीप कुमार said...

bahut sahi baat uthai hai suresh g.mai reservation ka virodh nahi karta par iski kimat par pratibhaon ke daman ka ghor virodhi hun. durbhagya hai is desh ka ki is masle par koi muhn nahi kholta.

प्रेमचंद गांधी Prem Chand Gandhi said...

आप शायद उन हजारों-लाखों युवाओं को नहीं जानते जो आपके साइबर कैफे में नहीं आते और आरक्षित जाति से होने के बावजूद बेरोजगार हैं और शहर-कस्बों में मजदूरी कर रहे हैं. आप शायद उन आरक्षित युवाओं को भी नहीं जानते जो सामान्य वर्ग के मुकाबले कहीं अधिक कड़ी प्रतिस्पर्धा में पिछड़ रहे हैं, क्योंकि 'संपन्न आरक्षित वर्ग' के युवा उन गरीबों का हिस्सा हड़प रहे हैं. तस्वीर का दूसरा पहलू देखते तो ऐसी बात कुछ और तरीके से लिखते

Suresh Chiplunkar said...

प्रेमचन्द जी, मैं उन्हें भी जानता हूँ जिनकी आप बात कर रहे हैं, (उज्जैन अनुसूचित जाति के लिये आरक्षित सीट ही है)। "सम्पन्न आरक्षित वर्ग" तो पूरे समाज का हिस्सा हड़प ही रहा है, मैं भी इस बात को मानता हूँ...। लेकिन यहाँ पर मुद्दा यह है कि गरीब-निम्न मध्यम वर्ग के सवर्ण युवाओं में भारी निराशा फ़ैल रही है… क्योंकि उनके और आरक्षित वर्ग के बीच कट-ऑफ़ अंकों में भारी अन्तर है…। अधिक फ़ीस भरकर, अधिक मेहनत करके, अधिक अंक लाकर भी सिर्फ़ सामान्य वर्ग का होने के कारण यदि किसी को नौकरी या दाखिला न मिले तो उसके मन में कड़वाहट तो आयेगी ही…। उन के भविष्य पर इस "सामाजिक न्याय" का बोझ लाद दिया गया है तब वे बेचारे क्या करें?

अनिल कान्त : said...

मैं अक्सर देखता हूँ की जब भी एस.सी./एस.टी की बात आती है तो वी.पी. सिंह का नाम आता है की उनका किया धरा है सब.....या तो आप जानकर भी अनजान हैं या जानते नहीं..... वी.पी. सिंह जी ने ओ.बी.सी का रिज़र्वेशन करवाया था ना कि एस.सी./एस.टी. का....और आपने एस.सी./एस.टी का मुद्दा तो उठाया लेकिन ओ.बी.सी को क्यों छोड़ दिया....जो रिज़र्वेशन कि मलाई भी खा रहे हैं और अपने आपको सामान्य श्रेणी का भी बता रहे हैं.....और रिज़र्वेशन २७% पूरा लेता हैं...क्रीमी लेयर जैसा नाटक कर रखा है जो कि करीब ३ लाख तक के लोगों के लिए मुफ्त है.....जो रिज़र्वेशन भी लेते हैं और जाति प्रथा को भी बढ़ावा देते हैं...

अगर मंडल कमीशन के बारे में पता है तो आप सिर्फ एस.सी./ एस.टी. की ही बात न करते...मंडल कमीशन सिर्फ और सिर्फ ओ.बी.सी के लिए लाया गया था...जिसे लोग ठीक से जानते भी नहीं और सोचते हैं कि वो एस.सी/एस.टी. के लिए था

अनिल कान्त : said...

Reservation for Backward Classes
: V. P. Singh himself wished to move forward nationally on social justice-related issues, which would in addition consolidate the caste coalition that supported the Janata Dal in North India, and accordingly decided to implement the recommendations of the Mandal Commission which suggested that a fixed quota of all jobs in the public sector be reserved for members of the historically disadvantaged so-called Other Backward Classes. (Generally abbreviated OBCs, these were Hindu castes, and certain non-Hindu caste-like communities, which, though not untouchable, had been socially and educationally backward). This decision led to widespread protests among the youth in urban areas in North India .

अनिल कान्त : said...

यदि मंडल कमीशन के बारे में पढना है तो कृपया इस लिंक पर जाएँ

http://en.wikipedia.org/wiki/Mandal_Commission

राहुल प्रताप सिंह राठौड़ said...

प्रदीप जी आपने सही मुद्दा उठाया...मैं इस बात से पूर्ण सहमत हूँ कि जो वर्ग बर्षो से अवसरों के लिए वंचित रहा है ,उनको अवसर जरूर मिलना चाहिए, पर जो अवसर का पूर्ण फायदा उठा चुके है (क्रिमिलयेर) वो किसी दुसरे का हक़ ना मारे, सिर्फ वंचित के लिए ही आरक्षण होना चाहिए, चाहे वो सामान्य वर्ग से हो या एसटी या ओबीसी.

मिहिरभोज said...

मै पैदा तो भारतीय हुआ था फिर पता लगा कि मैं जनरल कैटेगेरी का हिंदु हूं....जब कङी मैहनत कर जब मैं डाक्टर बनने गया तो पता लगा कि मुैं पिछङा हो गया हूं...तब दो दिन मैने खाना नहीं खाया....अब पता लगा है कि मैं गुर्जर हूं इसलिए अब मुझे खानबदोश कहा जायेगा.....पता नहीं कितनी बार मेरी पहचान बदलेगी....क्या मैं सिर्फ हिंदु नहीं हो सकता .....बिना किसी टैग के

परमजीत बाली said...

विचारणीय पोस्ट लिखी है।

Dr Prabhat Tandon said...

और उत्तर प्रदेश तो सबसे अलग है वैसे भी मेडिकल मे नये बच्चॊं की रुझान कम होता जा रहा है और अब नये तुगलकी नियमों के जरिये यूपी संभवत: देश का पहला राज्य है, जहां सरकार ने मेडिकल कालेजों में 97 फीसदी सीटें आरक्षण से भरने का फैसला किया है। शासन ने यह फरमान कन्नौज और जालौन में नव-स्थापित मेडिकल कालेजों के बारे में जारी किया है, जहां आगामी सत्र में सौ-सौ सीटों पर दाखिले किये जाने का प्रस्ताव है। तर्क यह है कि ये दोनों मेडिकल कालेज चूंकि स्पेशल कम्पोनेन्ट प्लान के बजट से स्थापित किये गए हैं, लिहाजा इनकी 70 फीसदी सीटें अनुसूचित जाति व जनजाति के प्रवेशार्थियों से भरी जाएंगी। इसके अलावा अन्य पिछड़ी जातियों को 27 फीसदी आरक्षण मिलना ही है। देखे पूरी खबर : http://in.jagran.yahoo.com/epaper/index.php?location=37&edition=2009-06-13

Sunil Bhaskar said...

चिपलूनकर जी आप जानते कितना हैं जाती और रिज़र्वेशन के बारे में. और ये उलटी सीधी बातें फैलाकर समाज को क्यों गन्दा कर रहे हो. और जो कुछ भी लिख रहे है कम से कम तथ्यात्मक को लिखें. आप कैसे कह सकते हैं की वी पी सिंह ने हिन्दुओं के हजारों टुकड़े कर दिए, जाती क्या वी पी सिंह जी ने बनाईं थीं, हिन्दू समाज तो २५०० सालों से हजारों टुकडों में बता हुआ है. इस समाज में जाती २५०० सालों से बनी हुई हैं. और जो हजारों टुकडों में बता गया उच्च जाती के लोगों ने ही बता अपने फायदे के लिए. दूसरी बात ये कहना बहुत आसान है काश में एस सी एस टी होता, अगर अपने बारे में कभी किसी से चमार छुते की गली सुन लेते तो शायद साडी बातें निकल जाती दिमाग से.
और एक बात जिसे शायद आप नहीं जानते वोह ये है की एस सी एस टी की रिज़र्वेशन कोई इकोनोमिकल कंडिशन्स के बसिस पर नहीं की गयी है, वोह की गयी है unke समाज से बहिष्कृत होने के कारन. आज भी अगर रिज़र्वेशन समाप्त कर दी जाये तो आज भी उच्च जाती के लोग नौकरियों में उन्हें नहीं आने देंगे. कुछ नहीं होगा तो उप नाम सुन कर ही उन्हें साइड कर देंगे. और इस बात को तो आप प्राइवेट सेक्टर में खुद ही देख सकते हैं. जहाँ अग्रवाल बॉस है तो मक्सिमुम बनिया समाज के दिखाई देते हैं, जहाँ शर्मा बॉस है वहां बहुतायत में शर्मा दिखाई देते हैं, और जहाँ पंजाबी बॉस है वहां पंजाबी दिखाई देते हैं. में नहीं कहता की ऐसा १०० प्रतिशत होता है परन्तु ये सच है की ऐसा बहुतायत में होता है, अत्लीस्त जब प्रभाब्शाली पोस्ट और पोसिशन की सीट होती है.
और फिर सब से बड़ी बात की बात एस सी एस टी की ही क्यों की जाती hai

राज भाटिय़ा said...

इस आरक्षण के कारण ही कितने लोग ऎसे ड्रा बन गये जिन्हे टीका लगाना भी नही आता, ओर जब तह यह आरक्षण नाम की बिमारी भारत मै रहेगी तब तक हम सब इन नेताओ के जुत्ते खाते रहे गै, इन के तलवे चाटते रहे है,क्योकि यह आरक्षण नाम की चीज एक रोटी का वो टूकडा है जिसे यह नेता हमे कुत्ता समझ कर हमारे सामनेर फ़ेंकते है, ओर बदले मै किमती वोट ले लेते है.

Vivek Rastogi said...

बिल्कुल सही आपने आज के युवा के मन की बात पकड़ ली। कहीं न कहीं मन के कोने में होता है जब हम कुछ ही नंबर से असफ़ल होते हैं और आरक्षित वर्ग बहुत कम नंबर में वह जगह पाने में कामयाब होता है।

और वैसे भी उज्जैन की जनता ने लाभ लेने वाले नेता को उनका आईना दिखा दिया है पर जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है, क्योंकि जो दूसरा आरक्षि्त प्रतिनि्धि जनता ने चुना है वह भी किसी काबिल नहीं है, बस किसी और को चुनना था इसलिये चुन लिया।

Baba said...

चिपलुनकरजी ने सही लिखा है. कोटा (रिजर्वेशन) वाले भरी जवानी में बैसाखी लेकर चलने के आदि हो रहे हैं. जो लोग आरक्षण का लाभ ले रहे हैं. वे और ज्यााॅदा पिछड रहे हैं. जैसे-जैसे आरक्षण की बातें गर्म होती जा रही है वैसे-वैसे आरक्षण वाले एक ग्रुप बनाकर ही रहते हैं. अभी हाल ही में एक छात्र सुहास डोइफोडे एसईईई में १८८ नंबर लेकर ओबीसी वर्ग में प्रथम आया है. कितनी खुशी की बात है. सामान्य सूची में उसका नबर ७५ वां है!!! है ना शर्म की बात. जो सबसे टॉपर है उसे १९६ नंबर मिले है. लेकिन नहीं फिर भी वह कहते हैं कि मैं ओबीसी में टॉपर हूँ. जबकि उसका नंबर ७५ वां है.
आरक्षण वाले कभी कॉम्पिटीशन नहीं कर सकते हैं. क्योंकि उन्हें पता है कि अपने वालों की औकात कितने नंबर/परसेंट पर सिमट जाती है. इसलिए निश्चित रहते हैं. आणक्षण इस देश को दीमग की तरह खोखला किए जा रहा है. कितने शर्म की बात है कि इस देश में जिसे ९१ प्रतिशत मिलते हैं वह एडमिशन से वंचित रह जाता है ८५ प्रतिशत का कोटेवाला एडमिशन पा जाता है. आज सर्वसामान्य लोग इन्हें कोटेवाला कहकर संबोधित करते हैं. और ये लोग गर्व से फूले नहीं समाते.

A. Arya said...

सुरेश जी शायद हम आपकी बात से सहमत नही हूँ, आपने ने सिर्फ़ आरक्षण का एक ही पहलू देखा है, आरक्षण की बात छोड़ो आप जिन्हे एस टी / एस सी बोल रहे हैं उनकी हालत देखो, आज की तारीख मे भी, हमारा समाज उनके साथ क्या सलूट करता है, एक बार एसी और कंप्यूटर को छोड़ कर गाँव ओर देहात मे जाकर देखो और उनका दर्द सुनो, शायद उसके बाद आप कभी एसी पोस्ट नही लिखेंगे,आपको सिर्फ़ चन्द लोग दिखाते है जो आपके करीब होते हैं, और आप महसूस करना चाहते हैं तो यही देख लो जो लोग आपकी पोस्ट का समर्थन कर रहे हैं वो लोग गरूर के साथ नाम के आगे सर नाम लगा रहे हैं, सुरेश जी एस सी / एस टी होने की समाज कितनी मानसिक पीड़ा देता है उस समाज को, शायद आप बड़ी से बड़ी नौकरी देकर भी उनके घाव को नही भर सकते, हाँ कुछ महनुभाव कुरेचते ज़रूर रहते हैं, ज़रा किशी ग़रीब का दर्द महसूस करके देखिए!!!! में आपकी हर पोस्ट पढ़ता हू मगर कॉमेंट पहली बार लिख रहा हू, कुछ आके विचारो के विरुध्ह लिख दिया हो तो माफ़ करने का अधिकार आपके पास है,

पंगेबाज said...

दोस्त हमेशा की तरह आपकी मेल मिली पर माफ़ कीजीयेगा.मै कोई टिप्पणि नही कर पाऊंगा.मै नही चाहुंगा कॊई मुझे फ़िर से मेल कर ब्लैक मेल करे कि मेरी टिप्पणी किसी एस एटी / एस सी के किसी सिरफ़िरे वकील बंदे को पढवाकर वो मुझ पर केस करवा कर कोर्टस से बाहर समझौता करवा मेरा धन और समय दोनो का नुकसान कर सकते थे पर वो ऐसा नही कर मुझ पर एहसान कर रहे है. अलविदा दोस्त कृप्या मुझे मेल ना करे

संजय बेंगाणी said...

मैने जातीगत भेदभाव देखा है. मगर क्या यह भी जातीगत भेदभाव नहीं है. प्राथमिकता प्रतिभा को मिलनी चाहिए, चाहे कोई भी हो.

Dikshit Ajay K said...

सुरेश जी, पोस्ट दम दर है, साथ ही आरक्षण के समर्थन और विरोध में दीये गई सभी कॉमेंट्स भी विचारणीय हैं . मुझे A. Arya ... जी की एक बात बहुत ठीक लगी की -"एस सी / एस टी होने की समाज कितनी मानसिक पीड़ा देता है उस समाज को, शायद आप बड़ी से बड़ी नौकरी देकर भी उनके घाव को नही भर सकते," बिलकुल ठीक कहा है नोकरी मिलने के बाद उन की आर्थिक परिस्थिती तो सुधर जाती है पर समाज उन को और ज्यादा हिकारत या ईर्षा से देखने लगता है, क्यों की उसे (समाज को ) लगता है की ये हमारा हक़ मर (ये ठीक है या गलत फैसला आप करे) कर इस कुर्सी पर बैठा है. कम योग्यता होने के कारन आरक्षण प्राप्त व्यक्ती अपने पद के साथ न्याय भी नहीं कर पता नतीजा ये होता है की उस के आधीनास्थ कर्मचारी सामने तो सलाम मरते हैं (मजबूरी मैं ) पर पीछे क्या कहते हैं ये सब को मालूम है. अखीर मैं उन की अयोग्यता/गलत निर्णयों की कीमत पूरे समाज और पूरे देश को चुकानी परते है.

इस प्रकार दी गई नोकरी का पूरा फायदा किसी को भी नहीं मिल पाया सिवा नेताओं को जिसे उन समाज के वोट मिल गई. मेरे विचार से इस प्रकार से नोकरी बटने का पूरा फ़ायदा तो केवल नेताओं को ही मिलता है, घाटे मैं रहता है पूरा समाज और देश. अतः आरक्षण को तत्काल प्रभाव से बंद कर के समाज के कमजोर वर्ग आगे लेन के लिए उन को योग्य बनाने के लिए प्रभाव शाली कदम उठाने की जरूरत पर जोर दिया जाना चाहिए. इस के लिए राहुल गांधी का उन के घर १-२ घंटे रुक कर रोटी खाना (बाद मैं अंगरेजी साबुन से नहाना) काफी नहीं है वाल्की इस के लिए समाज विशेष के गावों मैं नए स्कूल कालिज (जहाँ वास्तव मैं शिक्षण का कार्य हो न की आरक्षण प्राप्त शिक्षक के द्वारा खानापूरी की जाये) बने और उन को योग्य बनाने पर बल दिया जाई. इस से उन को आरक्षण की जरूरत ही नहीं रहे गी और वे लोग भी अपने बल पर देश की प्रगती मैं अपना योगदान दे कर खुद को गोरवान्वित महसूस करेंगे .और उन का खुद अतम विशवास इतना वाढ जय गा की वो स्वयं आरक्षण का विरोध कर के काम चोर और अयोग्य लोगों समाज की मुख्या धारा मैं आने से रोक देंगे

त्यागी said...

सुनील भास्कर जी से अनुरोध है वो सुरेश जी को प्रवचन देना छोड़ कर पहेले बेसिक की बात करे वीपी सिंह को तो राजनीती से मतलब था जिसको वास्तव में आरक्षण से इन निम्न वर्गो को लाभ पहुचाने की बात थी और जो प्रमाणिक तौर से पीड़ित भी थे श्री आंबेडकर जी जब उन्होंने ही आरक्षण की सीमा १० साल ही रखी थी तब तो कोई सवाल की गुंजायश ही नहीं रहे जाती. दूसरा आपने एक ही झटके में पञ्जाबी (जो की एक सूबाई पहचान है) को शर्मा और अग्रवाल से जोड़ दिया. क्यों पंजाबियो में दलित नहीं होते क्या.
आपका कानून कुछ इस प्रकार से है की एक पिट रहा ही तो न्याय देने के लिए दोसरे को भी पीटने लग जाओ. हो गया न्याय.
अरे लल्लू जैसे को भी कभ तक आरक्षण कम से कम अब तो विचार कर लो या जब तक इन ब्रह्मण (जिस को की आप लिखने में सावधानी बरत रहे हो) कब तक उसके पुरखो के तथा कतिथ ज्यतितियो की सजा इस युग में उसके कुपोषित बच्चो को देते रहो गे.
सुरेश जी को प्रवचन करते कभी कांग्रेसी भइयो को अलाप्संख्योंको आरक्षण देने के कुपरिनामो पर भी विचार कर लिया करो.

Sunil Bhaskar said...

Tyagi ji bahut jaldi jod di 10 sal ke arakshan ki bat, ap sahi keh rahe hain reservations was meant for next 10 years but applied with the conditions that it can be extended depending upon the social and economical status of the persons. Ap ko lagta hai ki 10 sal mein itne halat badal gaye the ki reservation khatm ki jaye ya ab bhi jo log quota se belong karte hain unki halat poori tarah se sudhar chuki hai. Secondaly why are you peoples so tense abt the 15 seats meant for s.c. candidates. Un 15 seats ke liye already competition itna increase ho chuka hai ki 2-3 sal mein reservtaion se kuch fark nahi padne wala sc candidates. If you dont believe you can go through the merit lists of the results. Jo thoda bahut difference hai woh bhi 2-3 sal mein decrease ho jayega. And the person you are saying lallu mostly belong to st. Even after some time they will also be in the same status as sc candidates are.
And the whole discussion is being done because of quoting "Kash mein bhi SC ST hota". Why only SC/ST, why not "mein bhi OBC hota".
And one more thing punjabi word belongs to peoples of punjab, but when you go to the notations it denotes peoples who belong to punjabis a that is in pakistan now. And if you want to confirm this you can come to NCR area where mostly punjabis are living. Yes they do have the dalits peoples there but they peoples never shows this and have got mixed with other peoples and are living with the general tag. Is that okay. No one says them chamar or any thing else. They are happy because they dont have any tag of SC/ST.

khursheed said...

लेकिन फिर भी हर जगह हर तरफ सवर्ण ही दिखाई देता हैं. क्यों?

Suresh Chiplunkar said...

खुर्शीद भाई, ऐसा इसलिये है क्योंकि आपको अभी ठीक से देखना नहीं आया… यदि ध्यान से देखें और अध्ययन करें तो आप पायेंगे कि सवर्णों का प्रतिशत तेजी से बहुत कम होता जा रहा है… न सिर्फ़ सत्ता प्रतिष्ठानों में, बल्कि सरकारी दफ़्तरों में भी… जो योग्य हैं उनका कोई विरोध नहीं कर रहा, मूल मुद्दा यह है कि जिसे 90 अंक मिले हैं उसे नौकरी/दाखिला मिलना चाहिये अथवा उसे जिसे 80 अंक मिले हैं… जबकि दोनों ही गरीब हों।

Anurag wani said...

Reservation par bahut satik tippani.
suresh bhai 11 june ko mai ujjain me tha lekin aapka pata malum na hone ke karan, aapse mil nahi paya. kripya pata jarur muze bhej deve taki jab agali bar ujjain aana ho to aapke darshan jarur kar saku...mera id hai wani.anurag@webdunia.com
Jai Mahakal...Anurag wani(pune)

त्यागी said...

सुनील भास्कर जी कहेने को तो बहुत कुछ है परन्तु इस बार में सिर्फ आपके ज्ञान पर वो भी एन सी आर की बात पर ही आ पाउँगा.जिस प्रकार अपने पाकिस्तान से आय पीड़ित हिन्दू भाई बहेन को एक खांचे में बैठा कर उनको सभी जगह पद और अधिकार हड़पने वाली जमात में रखने की कोशिश की है वो निहायत ही खेद पूर्ण है. अरे जिसने अपने पुरखो की न केवल जमीन छोडी बल्कि सर्वस्व लुटा कर आये और हिंदुस्तान में जहाँ जगह मिली वहा बस गए अपने खून पसीने से समाज में स्थान बनाया. आपके लुल्लू की तेरहे भेंसे तो थी नहीं जो लाठी लेकर चलाते. परन्तु जिस प्रकार से अपने इनको कठघरे में खडा किया है उसे से क्षमा करे दोस्त अपने अपनी निहयेत ही छुद्र और निम्न मानसिकता का परिचिय दिया है. यह लोग बिना आरक्षण के और बिना संबंधो के इस हिंदुस्तान में मुकाम बना पाए. और मुझे इनपर गर्व है.

Sunil Bhaskar said...

Tyagi ji jara mere dono comments ko dhyan se pada hota to aisi baten na karte. Kum se kum blog par to politics mat karo. Mere udharano mein to sharma aur agarwal bhi ate hain, ap ye punjabis ko kyon ghasitne lage. Koi bhi pad kar itna to samajh hi sakta hai ki jo sab apne matlab nikala hai woh sab katai nahi tha. Baki sabki apni samajh hai. Mujhe taras a raha hai apki samajdari par. Apko dekhte hue mujhe samjhana pad raha hai ki kisi vyakti vishesh ya samaj vishesh se hamen koi samasya nahi. Desh ka har tabka tarakki kare yahi hum bhi chahte hain. Aur apse anurodh hai ki jo mudda hai us se related likha jae to accha hoga otherwise yun ek doosre par cheenta kashi karne se kuch hasil nahi hone wala.

त्यागी said...

भास्कर सहाभ हुआ तो ८०० साल की गुलामी और ६० साल के लोकतंत्र के ढकोसले से भी नहीं. अब क्या है. लुट तो सब कुछ गया बस समेटने को को चिंतन और मंथन ही है और वो ही हो रहा है.

Dikshit Ajay K said...

खुर्शीद जी आपका "Deserve & desire " वाले फार्मूले के वारे मैं क्या विचार है अगर एक योग्य उम्मीदवार आगे आता है, तो वो देश का भला करे गा रिज़र्वेशन वाले तो केवल अपना भला कर सकते हैं ऐसे लोग जो देश और समाज का भला न कर सके वो तो धरती का बोझ है उन के साथ सहानुभूती करना देश और समाज दोनों के साथ धोका देना है. मैं फिर कहता हूँ की रिज़र्वेशन होना चाहिए पर देश/समाज सेवा यानी नौकरी मैं नहीं अपितु समाज के कमजोर वर्ग को शिक्षित करने मैं होना चाहिए. एसा होने से स्वस्थ कोम्पिशन बढे गा और योग्य व्यक्ती देश को तरक्की की राह पर ले जैन गे