Tuesday, June 16, 2009

वोटिंग मशीनों का “चावलाकरण” – अन्य सम्भावना (विस्तारित भाग) EVM Rigging, Elections and Voting Fraud

वोटिंग मशीनों के “चावलाकरण” का विस्तारित भाग शुरु करने से पहले एक सवाल – इलेक्ट्रानिक वोटिंग में इस बात का क्या सबूत है कि आपने जिस पार्टी को वोट दिया है, वह वोट उसी पार्टी के खाते में गया है? कागज़ी मतपत्र का समय सबको याद होगा, उसमें प्रत्येक बूथ पर मतपत्रों के निश्चित नम्बर होते थे, जिससे वोटिंग के 6 महीने बाद भी इस बात का पता लगाया जा सकता था कि किस बूथ पर, किस मतदाता ने, किस पार्टी को वोट दिया है, लेकिन इलेक्ट्रानिक मशीनों में जो रिकॉर्ड उपलब्ध होता है वह “कुल” (Cumulative) होता है कि कुल कितने मत पड़े, और कितने-कितने मत किस पार्टी को मिले, लेकिन व्यक्तिगत रूप से किसने किसे वोट दिया यह जान पाना असम्भव है।

EVM में गड़बड़ी और वोटिंग में तकनीकी धोखाधड़ी की सर्वाधिक आशंका-कुशंका तमिलनाडु के चुनाव नतीजों को लेकर, तमिल और अंग्रेजी ब्लॉगों पर सर्वाधिक चल रही है (तमिल ब्लॉग्स की संख्या हिन्दी के ब्लॉग्स से कई गुना अधिक है)। जैसा कि प्रत्येक राजनैतिक जागरूक व्यक्ति जानता है कि हर चुनाव (चाहे विधानसभा हो या लोकसभा) में तमिलनाडु की जनता हमेशा “एकतरफ़ा” फ़ैसला करती है अर्थात या तो द्रमुक या अन्नाद्रमुक को पूरी तरह से जिताती है, आधा-अधूरा फ़ैसला अमूमन तमिलनाडु में नहीं आता है। इस लोकसभा चुनाव में भी करुणानिधि के खिलाफ़ “सत्ता-विरोधी” लहर चल रही थी, करुणानिधि के परिवारवाद से सभी त्रस्त हो चुके थे (अब तो दिल्ली भी त्रस्त है और शुक्र है करुणानिधि ने सिर्फ़ तीन ही शादियाँ की)। ऐसे में तमिलनाडु में जयललिता को सिर्फ़ नौ सीटें मिलना तमिल जनता पचा नहीं पा रही। हाँ, यदि जयललिता को सिर्फ़ एक या दो सीटें मिलतीं तो इतना आश्चर्य फ़िर भी नहीं होता, लेकिन सीटों का ऐसा बँटवारा और वह भी द्रमुक के पक्ष में, दक्षिण में हर किसी को हैरान कर रहा है।

मेरी पिछली एक पोस्ट http://sureshchiplunkar.blogspot.com/2009/05/electronic-voting-machines-fraud.html में EVM में गड़बड़ी और धोखाधड़ी सम्बन्धी जो आशंकायें जताई थीं, उसके पीछे एक मूल आशंका यही थी कि आखिर कैसे पता चले कि आपने जिसे वोट दिया है, वह वोट उसी प्रत्याशी के खाते में गया? मशीन से तो सिर्फ़ बीप की आवाज़ आती है, स्क्रीन पर “कमल” या “पंजे” का निशान तो आता नहीं कि हम मान लें कि हाँ, चलो उसी को वोट गया, जिसे हम देना चाहते थे। न ही वोटिंग मशीनों से कोई प्रिण्ट आऊट निकलता है जो यह साबित करे कि आपने फ़लाँ प्रत्याशी को ही वोट दिया। उस पोस्ट में आई टिप्पणियों में कई पाठकों ने ऐसी किसी सम्भावना से दबे स्वरों में इनकार किया, कुछ ने कहा कि ऐसा नहीं हो सकता, कुछ ने खिल्ली भी उड़ाई, कुछ ने माना कि ऐसा हो सकता है जबकि कुछ पाठकों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया। फ़िर सवाल उठा कि यदि जैसा प्रोफ़ेसर साईनाथ कह रहे हैं कि मशीनों में गड़बड़ी की जा सकती है तो आखिर कैसे की जा सकती है, उसका कोई तकनीकी आधार तो होना चाहिये। आईये कुछ नई सम्भावनाओं पर एक नज़र डालें –

1) मशीनों में ट्रोज़न वायरस डालना –

धोखाधड़ी की इस “पद्धति” को सफ़ल मानने वालों की संख्या कम है, अधिकतर का मानना है कि इस प्रक्रिया में अधिकाधिक व्यक्ति शामिल होंगे जिसके कारण इस प्रकार की धोखाधड़ी की पोल खुलने की सम्भावना सर्वाधिक होगी। हालांकि तमिलनाडु के शिवगंगा सीट (चिदम्बरम वाली सीट) का उदाहरण देखें तो अधिक लोगों वाली थ्योरी भी हिट है, जहाँ पहले एक प्रत्याशी को विजयी घोषित कर दिया गया और बाद में अचानक चिदम्बरम को बहुत मामूली अन्तर से विजेता घोषित कर दिया गया। ट्रोज़न वायरस डालने (मशीनें हैक करने) की प्रक्रिया मशीनों के कंट्रोल यूनिटों के निर्माण के समय ही सम्भव है। चुनाव आयोग ने दावा किया है कि कई मशीनें दो-तीन बार भी उपयोग की जा चुकी हैं जबकि कुछ नई हैं, तथा मशीन पर प्रत्याशी का क्रम पहले से पता नहीं होता, इसलिये मशीन निर्माण के समय “ट्रोज़न वायरस” वाली थ्योरी सही नहीं हो सकती। जबकि आयोग के दावे को एकदम “फ़ुलप्रूफ़” नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ट्रोज़न वायरस को सिर्फ़ मशीन का वह बटन पता होना चाहिये जो “फ़ायदा” पहुँचने वाली पार्टी को दिया जाना है। ज़ाहिर है कि यह बटन अलग-अलग चुनाव क्षेत्रों में अलग-अलग जगह पर होगा, लेकिन “हैकर्स” को विभिन्न “बटन कॉम्बिनेशन” से सिर्फ़ यह सुनिश्चित करना होगा कि सॉफ़्टवेयर जान सके कि वह बटन कौन सा है। उदाहरण के तौर पर – माना कि किसी बूथ पर तीसरा बटन कांग्रेस प्रत्याशी का है तब सॉफ़्टवेयर शुरुआती दौर में पड़ने वाले मतों के “कॉम्बिनेशन” से जल्द ही पता लगा लेगा कि वह बटन कौन सा है, और तय किये गये प्रतिशत के मुताबिक वह वोटों को कांग्रेस के खाते में ट्रांसफ़र करता चलेगा।

चुनाव आयोग ने यह भी कहा है कि प्रत्येक मशीन की “चिप” का एक विशिष्ट कोड निर्धारित है और वह हर मशीन के लिये अलग होता है, और यदि वह “चिप” बदलने की कोशिश की जाये तो वह मशीन बन्द हो जायेगी। हालांकि इस बात में भी कोई दम इसलिये नहीं है क्योंकि यदि गड़बड़ी करने की ठान ली जाये, तो उसी नम्बर की, उसी कोड की और उस प्रकार की हूबहू चिप आसानी से तैयार की जा सकती है।

2) दूसरी सम्भावना – बेहद माइक्रो वायरलेस ट्रांसमीटर /रिसीवर को मशीन में ऊपर से फ़िट करवाना

सभी तकनीकी लोग जानते हैं कि “नैनो” तकनीक का कितना विकास हो चुका है। आज के युग में जब प्रत्येक वस्तु छोटी-छोटी होती जा रही है तब एक माइक्रोचिप वाला ट्रांसमीटर/रिसीवर बनाना और उसे मशीनों में फ़िट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। EVM की यूनिट में रिमोट कंट्रोल द्वारा संचालित वायरलेस ट्रांसमीटर/रिसीवर चिपकाया जा सकता है। मशीनों में छेड़छाड़ करके मनचाहे परिणाम प्राप्त करने के लिये यह सबसे सुरक्षित और आसान तरीका हो सकता है। जो विद्वान पाठक इस “आईडिया” को सिरे से खारिज करना चाहते हैं, वे पहले बीबीसी पर जारी एक तकनीकी रिपोर्ट पढ़ लें। http://news.bbc.co.uk/2/hi/technology/5186650.stm

HP कम्पनी द्वारा तैयार यह बेहद माइक्रोचिप किसी भी कागज़, किताब, टेबल के कोने या किसी अन्य मशीन पर आसानी से चिपकाई जा सकती है और यह किसी को दिखेगी भी नहीं (इसका मूल साइज़ इस चित्र में देखा जा सकता है)। इस चिप में ही “इन-बिल्ट” मोडेम, एंटीना, माइक्रोप्रोसेसर, और मेमोरी शामिल है। इसके द्वारा 100 पेज का डाटा 10MB की स्पीड से भेजा और पाया जा सकता है। यह रेडियो फ़्रिक्वेंसी, उपग्रह और ब्लूटूथ की मिलीजुली तकनीक से काम करती है, जिससे इसके उपयोग करने वाले को इसके आसपास भी मौजूद रहने की आवश्यकता नहीं है। ऑपरेटर कहीं दूर बैठकर भी इसे मोबाइल या किसी अन्य साधन से इस चिप को क्रियान्वित कर सकता है।

इसलिये इस माइक्रो वायरलेस ट्रांसमीटर / रिसीवर के जरिये EVM की कंट्रोल यूनिट को विश्व के किसी भी भाग में बैठकर संचालित और नियन्त्रित किया जा सकता है।
(चित्र देखने से आपको पता चलेगा कि यह कितनी छोटी माइक्रोचिप होती है)




आगे बढ़ने से पहले कृपया माइक्रोचिप की जानकारी के बारे में यह साइट भी देख लें -
http://www.sciencedaily.com/releases/2009/03/090310084844.htm
जिसमें एक पतली सी फ़िल्म में एंटेना, ट्रांसमीटर, रिसीवर सभी कुछ शामिल है।

इसी प्रकार की एक और जानकारी इधर भी है -
http://embedded-system.net/bluetooth-chip-with-gps-fm-radio-csr-bluecore7.html

HP कम्पनी की साईट पर भी (http://www.hp.com/hpinfo/newsroom/press/2006/060717a.html) विस्तार से इस माइक्रो चिप और उसकी डिजाइन के बारे में बताया गया है - और इस माइक्रोचिप के उपयोग भी गिनाये गये हैं, जैसे अस्पताल में किसी मरीज की कलाई में इसे लगाकर उसका सारा रिकॉर्ड विश्व में कहीं भी लिया जा सकता है, विभिन्न फ़ोटो और डॉक्यूमेंट भी इसके द्वारा पल भर में पाये जा सकते हैं। जब ओसामा बिन लादेन द्वारा किये गये सेटेलाइट फ़ोन की तरंगों को पहचानकर अमेरिका, ठीक उसके छिपने की जगह मिसाइल दाग सकता है, तो आज के उन्नत तकनीकी के ज़माने में इलेक्ट्रानिक उपकरणों के द्वारा कुछ भी किया जा सकता है।

2002 में जारी एक और रिपोर्ट यहाँ पढ़िये http://www.sciencedaily.com/releases/2002/05/020530073010.htm कि किस तरह वायरलेस तकनीक इन माइक्रोचिप में बेहद उपयोगी और प्रभावशाली है।

इस प्रकार की माइक्रोचिप में विभिन्न देशों की सेनाओं ने भी रुचि दर्शाई है और इनमें छोटे माइक्रोफ़ोन और कैमरे भी लगाने की माँग रखी है ताकि इन चिप्स को दुश्मन के इलाके में गिराकर ट्रांसमीटर और रिसीवर के जरिये वहाँ की तस्वीरें और बातें प्राप्त की जा सकें। अमेरिकी सेना से सम्बन्धित एक साइट पर भी इसके बारे में कई नई और आश्चर्यजनक बातें पता चलती हैं (यहाँ देखें http://mae.pennnet.com/articles/article_display.cfm?article_id=294946)

EVM मशीनों में इस तकनीक से कैसे गड़बड़ी की जा सकती है?

मशीनों में गड़बड़ी या छेड़छाड़ के सम्भावित परिदृश्य को समझने के लिये हम मान लेते हैं कि यह ट्रांसमीटर और रिसीवर युक्त माइक्रोचिप वोटिंग मशीनों के निर्माण के समय अथवा बाद में फ़िट कर दी गई है।

क्या इस प्रकार की कोई “चिप” पकड़ में आ सकती है?

इस प्रकार की वायरलेस माइक्रोचिप के दिखाई देने या पकड़ में आने की सम्भावना तब तक नहीं है, जब तक यह सिग्नल प्रसारित न करे (अर्थात डाटा का ट्रांसफ़र न करे)। माइक्रोचिप से डाटा तभी आयेगा या जायेगा जब उसे एक विशिष्ट फ़्रीक्वेंसी पर कोई सिग्नल न दिया जाये, तब तक यह ट्रांसमीटर सुप्त-अवस्था में ही रहेगा।

क्या इन माइक्रोचिप की संरचना को आसानी से पहचाना जा सकता है?
नहीं, क्योंकि अव्वल तो यह इतनी माइक्रो है कि आम आदमी को इसे देखना सम्भव नहीं है और विशेषज्ञ भी इसकी पूरी जाँच किये बिना दावे से नहीं कह सकते कि इसमें क्या-क्या फ़िट किया गया है।

अब आते हैं मुख्य मुद्दे पर –

EVM मशीनें उनके निर्धारित चुनाव क्षेत्रों में भेजी जा चुकी हैं और एक “उच्च स्तरीय हैकरों की टीम” सिर्फ़ यह सुनिश्चित करती है कि माइक्रोचिप लगी हुई मशीनें उन क्षेत्रों में पहुँचें जहाँ वे परिणामों में गड़बड़ी करना चाहते हैं। इसके बाद चुनाव हुए, मशीनों में वोट डल गये और मशीनों को कड़ी सुरक्षा के बीच कलेक्टोरेट में स्ट्रांग रूम में रख दिया गया। अब यहाँ से “तकनीकी हैकरों” का असली काम शुरु होता है। हैकरों की यह टीम उच्च स्तरीय तकनीकी उपकरणों की मदद से सैटेलाइट के ज़रिये उन मशीनों से डाटा प्राप्त करती है, डाटा को कम्प्यूटर पर लिया जाता है, और उसमें चालाकी से ऐसा हेरफ़ेर किया जाता है कि एकदम से किसी को शक न हो, अर्थात ऐसा भी नहीं कि जिस प्रत्याशी को जिताना है सारे वोट उसे ही दिलवा दिये जायें। डाटा में हेरफ़ेर के पश्चात उस डाटा को वापस इन्हीं माइक्रोचिप ट्रांसमीटर के ज़रिये मशीनों में अपलोड कर दिया जाये। वोटिंग होने और परिणाम आने के बीच काफ़ी समय होता है इतने समय में तो सारी मशीनों का डाटा बाकायदा Excel शीट पर लेकर उसमें मनचाहे फ़ेरबदल गुणाभाग करके उसे वापस अपलोड किया जा सकता है।

इस प्रकार की गड़बड़ी या धोखाधड़ी के फ़िलहाल को सबूत नहीं मिले हैं, इसलिये दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ऐसा ही हुआ होगा, लेकिन आधुनिक तकनीकी युग में कम्प्यूटर के जानकार और विश्वस्तरीय उपकरणों से लैस हैकर कुछ भी करने में सक्षम हैं, इस बात को सभी मानते हैं। यह भी सवाल उठाये गये थे कि यदि कांग्रेस पार्टी ने ऐसी गड़बड़ी की होती तो क्यों नहीं 300 सीटों पर धोखाधड़ी की ताकि पूर्ण बहुमत आ जाता? इसका उत्तर यही है कि धांधली करने की भी एक सीमा होती है, जब महंगाई अपने चरम पर हो, आतंकवाद का मुद्दा सामने हो तब कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल जाये तो सभी को शक हो जायेगा, इसीलिये पहले ही कहा कि “चतुराईपूर्ण” गड़बड़ी की गई होगी कि शक न हो सके। कांग्रेस को गड़बड़ी करने की आवश्यकता सिर्फ़ 150 सीटों पर ही थी, क्योंकि बाकी बची 390 सीटों में से क्या कांग्रेस 50 सीटें भी न जीतती? कुल मिलाकर हो गईं 200, इतना काफ़ी है सरकार बनाने के लिये।

अब क्या किया जा सकता है?

वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी और धांधली की इस प्रकार की अफ़वाहों के बाद सवाल उठने लगे हैं कि आखिर राजनैतिक पार्टियाँ इस बात पर चुप्पी क्यों साधे हुए हैं? इसका जवाब यह हो सकता है, कि राजनैतिक पार्टियाँ इस मुद्दे पर बोलने से इसलिये बच रही हैं क्योंकि अभी तो यह विश्वसनीय बात नहीं है, कौन इस मुद्दे पर बोले और अपनी भद पिटवाये, क्योंकि यह इतना तकनीकी मुद्दा है कि आम जनता या मीडिया का एक बड़ा हिस्सा पार्टियों के एक बयान पर उसे पहले तो सिरे से खारिज कर देगा, और भाजपा जैसी पार्टी यदि इस बात को उठाये तो उसका सतत विरोधी मीडिया “खिसियानी बिल्ली खम्भा नोचे” की कहावत से नवाज़ेगा। ऐसे में कोई भी इस मुद्दे पर बोलना नहीं चाहता। जानकारी के अनुसार सुप्रीम कोर्ट में भी यह मामला (वोटिंग मशीनों की जाँच और गड़बड़ी की सम्भावना का पता लगाने सम्बन्धी) चल रहा है, इसलिये फ़िलहाल सभी “रुको और देखो” की नीति पर चल रहे हैं।

राजनैतिक पार्टियाँ फ़िलहाल इतना कर सकती हैं कि जिन-जिन क्षेत्रों में उनकी अप्रत्याशित हार हुई है, वहाँ के गुपचुप तरीके से लेकिन चुनाव आयोग से अधिकृत डाटा लेकर, पिछले वोटिंग पैटर्न को देखकर, प्रत्येक बूथ और वार्ड के अनुसार वोटिंग मशीनों में दर्ज वोटों का पैटर्न देखें कि क्या कहीं कोई बड़ी गड़बड़ी की आशंका दिखाई देती है? फ़िर अगले चुनाव में पुनः वोटिंग के पुराने तरीके अर्थात “पेपर मतपत्र” पर वोटिंग की मांग की जाये। पेपर मतपत्रों में भी गड़बड़ी और लूटपाट की आशंका तो होती ही है, लेकिन बड़े पैमाने पर गुमनाम तरीके से तकनीकी धांधली तो नहीं की जा सकती। क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो हो सकता है कि इधर पार्टियाँ करोड़ों रुपये खर्च करती रहें और उधर दिल्ली अथवा न्यूयॉर्क के किसी सात सितारा होटल में बैठी हैकरों की कोई टीम “मैच फ़िक्सिंग” करके अपनी पसन्द की सरकार बनवा दे।

परमाणु करार को लागू करवाने और उसके द्वारा अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारने के सपने देखने वाले अमेरिका, फ़्रांस और ब्रिटेन का भारत के इन चुनावों में “बहुत कुछ दाँव पर” लगा था। कल्पना कीजिये कि यदि इस सरकार में भी वामपंथी पुनः निर्णायक स्थिति में आ जाते अथवा भाजपा परमाणु करार की पुनर्समीक्षा करवाती तो इन देशों द्वारा अरबों डालर की परमाणु भट्टियों के सौदों का क्या होता। है तो यह दूर की कौड़ी, लेकिन जब बड़े पैमाने पर हित जुड़े हुए हों तब कुछ भी हो सकता है। जो लोग इसे मात्र एक कपोल कल्पना या “नॉनसेंस” मान रहे हों, वे भी यह अवश्य स्वीकार करेंगे कि आज के तकनीकी युग में कुछ भी सम्भव है… जब ओसामा के एक फ़ोन से उसके छिपने के ठिकाने का पता लगाया जा सकता है तो इन मामूली सी वोटिंग मशीनों को सेटेलाइट के जरिये क्यों नहीं कंट्रोल किया जा सकता?

और वह पहला मूल सवाल तो अपनी जगह पर कायम है ही, कि “आपके पास क्या सबूत है कि आपने जिस बटन पर वोट दिया वह वोट उसी प्रत्याशी के खाते में गया”? कागज़ी मतपत्र पर तो आपको पूरा भरोसा होता है कि आपने सही जगह ठप्पा लगाया है।

[नोट – मैं कोई तकनीकी विशेषज्ञ नहीं हूँ, यह पोस्ट विभिन्न साइटों (खासकर तमिल व अंग्रेजी ब्लॉग्स) पर खोजबीन करके लिखी गई है, सभी पहलुओं को सामने लाना भी ज़रूरी था, इसलिये पोस्ट लम्बी हो गई है, लेकिन उम्मीद है कि बोर नहीं हुए होंगे]

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20 comments:

संजय बेंगाणी said...

बोर होने वाली कोई बात ही नहीं है. राहत की बात यह रही कि आपने लिखना जारी रखा है.

वोटिंग मशीनों में माइक्रो चीप लगे हुए है. इसका निर्माण करने वाले भी "गड़बड़ नहीं हो सकती" इसका दावा नहीं कर सकते. मगर क्या सचमुच में गड़बड़ हुई ही है? इसका जवाब कोई नहीं दे सकता. अविशवसनीय परिणाम शंकाओं को बल देते है. एक पक्षिय सत्ता वाले देशों में यह काम सरलता से किया जा सकता है, भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह असम्भव नहीं तो कठीन जरूर है. कोई यह कठीन काम कर गुजरता है तो लोकतंत्र के लिए भयानक खतरा है. निपटने का रास्ता? :(

Baba said...

Lagta hai Congress ko Satta main Dekh Aur BJP ko Satta se Bahar pakar Sureshji kafi Aahat hai...

अनिल कान्त : said...

Suresh ji aap apni post likh to dete hain lekin un par aaye hue comments ka jawab nahi dete...i think aapko jawab dena chahaiye...otherwise phir aise muddo ko uthane se kya fayda

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

सारे राजनीतिक सिस्टम की मशीन ही गड़बड़ है। ईवीएम की मशीन से क्या होगा?

त्यागी said...

सुरेश जी बार बार महत्वपूर्ण मुद्दा उठा रहे है. और यह तो बहुत ही महत्वपूर्ण हैं. परन्तु प्रशन यह है की बीजेपी और उस से सम्बंधित लोग मुद्दा क्यों नहीं उठाते है जिसको की सबसे ज्यादा हानि हुई है. दूसरा वामपंथी जो की मीडिया के चहते है वो बंगाल की हार एअसे नहीं पचाते. इसका एक कारन यह भी है की मीडिया जिस तरहे बीजेपी की आज खिंचाई कर रही है बीजेपी उस से बचने के लिए मीडिया को टोपिक दो दे सकती थी यदि सचाई का तत्व होता.
इतना तो निश्चित है सुरेश जी की धांधली हुई है परन्तु तरीका यह नहीं रहा होगा जैसा की अपने बताया. मैं आपकी सीमा भी जानता हूँ की आप तकनिकी व्यक्ति नहीं है. जैसे की एक बात अपने बताई है की सैटलाइट के जरिये मशीन को हेक कर कर उनके आंकडे बदल दिए जा सकते है. परन्तु मशीन का किसी दूसरी मशीन से जुड़ना अवशयक है जैसे की आपका कंप्यूटर उस में आंकडे किसी दूसरी मशीन (वायर या ब्लूटूथ) के जुड़ने पर ही लिए जा सकते है. कम्पुटर के बंद रहेते सेटलाइट से उसके आकडे कैसे उडाये जा सकते है?
हैं धांधली तो अवशयक हुई है उसके कारण भी बहुत है. जैसे शशि थरूर का जितना , कांग्रेसी नेताओ के हर बच्चे का जितना (एक भी तो हारा नहीं). कांग्रेस का बड़े सलीके से (बिना संदेह के एक तरफा जीतना )
सुरेश जी पता तो यह करो की धान्द्ली क्या और कैसे हुई है. बहुत हिमत की बात है की आपने इतना तो लिखा.और अँधेरे में एक दीपक ही काफी है. बधाई हो.

Abhishek Mishra said...

Yeh sawal kisi Party ke liye hi nahin, Loktantra ke liye bhi itne hi mahatwapurn hain.

RAJNISH PARIHAR said...

हमेशा की तरह हर अच्छी बात को विवादास्पद बनाना हमारी पुरानी आदत है...!लेकिन आपकी बात में कुछ न कुछ दम जरूर है..!कितना दम है ये तो तकनिकी लोग ही बता पाएंगे...

Vivek Rastogi said...

सुरेशजी पिछली पोस्ट में भी मैंने यही बात दोहराई थी और फ़िर आज वापस से आज दोहरा रहा हूँ, कि वोटिंग मशीन में छेड़खानी संभव ही नहीं है वह भी इतने बड़े पैमाने पर। मैंने बीईएल के साथ २ साल काम किया है और मैं कह सकता हूँ कि यह संभव ही नहीं है।

अन्तर सोहिल said...

आदरणीय सुरेश जी
अब पांच वर्ष बीजेपी को और हारे हुए प्रत्याशियों को इस तकनीक से लैस हो जाना चाहिये। हो सके तो 100-200 हैकर भी तैयार करने की कोशिश करनी चाहिए। चुनाव तो आगे भी होने हैं।
वैसे नही तो ऐसे सही
जीतने के लिये यही तरीका क्यों ना आजमाया जाये…………………

संजय बेंगाणी said...

मैं सोहिलजी से सहमत नहीं. जनता में छवि बनाओ, काम करो और जीतो. गलत रास्ता अपनाना अंतः गलत साबित होता है. लोकतंत्र के लिए भी यह ठीक नहीं है.

परमजीत बाली said...

विचारणीय पोस्ट लिखी है।जिस तरह से तकनीकी ज्ञान बढ रहा है कुछ भी हो सकता है। इस बात से इंनकार नही किया जा सकता। लेकिन इस विषय पर तकनीकी जानकार की राय ही बता पाएगी।वैसे एक बात तो निश्चित है कि जिस प्रकार विज्ञान आज प्रगति कर रहा है ऐसे में कुछ भी संभव है।

rahul said...

सुरेश जी मै आप से सहमत नहीं हूँ , कोई भी वाइरस पार्टी देखकर अटैक नहीं करता
ये बात तो कांग्रेस के साथ भी हो सकता है ,भाजपा ही क्यों ?
रही बात चिप की तो इतने बड़े पैमाने पर ये संभव नहीं |

GJ said...

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thanks for writing the post for the benefite of hindi readers

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राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी यह सब संभव हो सकता है, ओर कही ना कही दाल मै काला है, आप की दाद देता हुं, लेकिन यह भी अन्य मामलो की तरह से एक दिन जनता मै उजागर हो जायेगी, लेकिन फ़िर जनता कया करेगी, पांच साल बाद फ़िर से भुल जायेगी.
धन्यवाद

मुनीश ( munish ) said...

every thing is possible in love and war !

renu said...

The information is very important and this is being discussed by nationalist people. In India , the common masses do not want to know any truth, if the truth is before them, they firstly deny it without having any eagerness to know them. I congratulate you over this important topic and you are well wisher of democracy. The elections are the biggest cheaters to democracy . The opposition is being cracked by their own faults and conspiracy of foreign powers. Out media is being run by them , so this conspiracy cannot be exposed. Let us see the future of India.

RAJ SINH said...

प्रिय सुरेश जी .
मेरे ब्लॉग ' राजसिंहासन से ' की post ' राम की शक्ति परीक्स्चा -२ ' पर आपकी एक टिप्पणी आयी थी . उसमे रूपेश श्रीवास्तव की टिप्पणी का हवाला दे कर कुछ बातें थीं . रूपेश मुझ पर इल्जाम लगा रहे हैं की वह टिप्पणी आपके नाम से मैंने ही दी थी . मैंने कोई मोदेरेसन नहीं रखा था उस वक़्त . उसपे कुछ कहेंगे .
निवेदन है की यदि वहीं आकर कुछ कह सकें तो आपका आभारी हां रहूँगा .

योगी said...

जहां चाह वहां राह । जहां बेईमानी आम जिन्दगी का हिस्सा बन चुका हो वहां मशीनें कुछ नहीं कर सकती हैं । लेकिन बेईमानी मशीनें नहीं करतीं, उन्हें बेईमानी के लिये ढाला जा सकता है । यदि जिम्मेदार व्यक्ति/संस्था धांधली का इरादा कर ही ले तो कोई व्यवस्था काम नहीं दे सकती है । बैलट पेपर वाला तरीका भी तो ‘फ़ेल’ हो जाता है । लेकिन यदि सामुहिक सोच सुधार की हो तो मशीन अधिक भरोसे की चीज है यह मैं एक वैज्ञानिक के नाते मानता हूं । उनके साथ खिलवाड़ गिने-चुने लोग ही कर सकते हैं और वह भी तकनीकी साधनों के साथ ।

Ajit said...

सुरेश जी , ये हम भारतीयों की पुरानी आदत रही है की हम किसी भी नयी चीज पर विश्वास नहीं करते, पहले हस्ते है, फिर उस पर झल्लाते है और फिर मान लेते है, जैसे ही कांग्रेस जीती यहाँ पैरिस में कुछ अंतर्राष्ट्रीय सम्बन्ध और लोकतंत्र विषय के छात्रो का एक सम्मलेन हुआ जिसमे कांग्रेस के जीत की वजहों पर चर्चा हुई और सबसे पहली वजह यही बताई गयी
आखिर जिस देश में कांग्रेस हर चुनाव चाहे वो जिस भी प्रदेश में हो हार रही थी, कैसे नविन चावला के आते ही चुनाव जितने लगी ??
किस बात पर खुश होकर जनता ने उन्हे वोट दिया ??
आखिर क्यों नहीं विशेषज्ञों की एक त्यें बनाई जाती जो इस पर से पर्दा उठाये ??
चिपलूनकर साहब आने वाले दिनों में इस सच्चाई से पर्दा उठेगा लेकिन जनता किसी का कुछ बिगाड़ नहीं पायेगी..कुछ दिनों में फिर भूल जाएगी

vinayak said...

mashino mai gadbad hai ya nahi yah to padtal ka vishay hai par yahbat jarur hai ki videshi takat bharat ke chunav mai dkhal rakhate hai.