तुवर दाल 74 रुपये किलो – साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ने की छोटी सी कीमत (एक अति-माइक्रो पोस्ट)
तुवर दाल के भाव 74 रुपये किलो हो चुके हैं, अन्य दालों के भाव भी 40-50-60 की रेंज में चल ही रहे हैं, चावल के भाव भी पिछले एक साल में दुगुने हो चुके हैं, शकर हाल ही में 28-30 रुपये किलो को छूकर वापस थोड़ी नीचे उतरी है… कहने का मतलब यह कि सोनिया सरकार अपना काम बड़ी ईमानदारी से कर रही है। जनता और जनता के साथ-साथ “लाल बन्दरों” और लालू-मुलायम-पासवान-माया-ममता सभी ने साम्प्रदायिक ताकतों को हराने के लिये जी-जान लड़ा दिया था। “सेकुलर मीडिया” के पास भी बलात्कार, गैंगरेप, समलैंगिकता जैसे “राष्ट्रनिर्माण” के महत्वपूर्ण मुद्दे मौजूद हैं। तो भाईयों-बहनों, दाल-चावल-आटा-शकर-तेल के भाव न देखो, न महसूस करो… साम्प्रदायिक शक्तियों से मुकाबला करने की इतनी मामूली कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी ना??? अटल सरकार के समय वस्तुओं के भाव याद मत कीजिये, बस इतना ध्यान रहे कि “भाजपा में सिर्फ़ बुराई ही बुराई है…”, जो कुछ अच्छा है वह सिर्फ़ कांग्रेस और वामपंथ में ही है… आपको पहले ही बताया जा चुका है कि मुद्रास्फ़ीति की दर गिरते-गिरते नकारात्मक हो चुकी है।
इसलिये “जय हो” का भजन गाते रहिये, हो सकता है कि “महारानी” और “युवराज” आपके घर डोमिनो का पिज्जा ही भिजवा दें…
(मेरे नियमित पाठक माफ़ करें… व्यस्तता के बीच 10 मिनट का समय मिला था, उसमें ऐसी अति-माइक्रो पोस्ट ही बन सकती थी)



27 comments:
माफ़ किया भाऊ।क्या याद करोगे किसी रियल सेक्युलर से पाला पड़ा है।मगर एक बात है जितना बज़ाना चाह्ते थे उतना इस छोटी लेकिन तीखी पोस्ट से ही बज़ा दिये हो।मै भी यंहा आया हूं तुअर या अरहर उगाने वाले इलाके मे सस्ते मे बेच कर इन्हे दुगने दाम पर खरीद कर दाल खाना पड रहा है।
भाई मजाक नहीं कर रहा हूँ, खाने-पीने के सामानों ने घर के बजट का बैण्ड बजा दिया है. भाव पूछने छोड़ दिये है. आँख मूँद कर खरीदता हूँ और कार्ड सरका देता हूँ.
इस बीच तसल्ली रहती है कि साम्प्रदायिक ताकते सत्ता से दूर है, अतः फिकर नहीं, जय हो मजे से गा सकता हूँ.
आप भी हद करते हैं,सरकार चाहती है हम सभ्य बने...दाल भात नहीं पिज्जा बर्गर खाएं.....सो हमें अपनी आदत बदल लेनी चाहिए....छोटे लोगों की तरह दाल दाल नहीं चिचियाना चाहिए....
जनाब , "आप ऐसी बात न करे , आता दाल से ज्यादा जरुरी धर्मनिरपैस्था " भाई आटा दाल से आप का पेट भरता है धर्मनिरपैस्था से नेताओ का
bhai aapke blog par pahlee baar aaya hoon. lekin aapse aksar mulaqat hoti rahti hai. aap bahut acchha likhte hain. aisa hi likhte rahye.
भाव की चिंता करना ही हमारी आदत बन गई है। इस देश के नेता न जाने कब कमोडिटी सहित अनेक मुद़दों पर चिंतन मनन शुरू करेगी। किसान के नाम पर किसान का शोषण कब बंद होगा। एसी कमरों में बैठे दलाल कब तक जनता और किसान को दुहना जारी रखेंगे। जब तक नेताओं का भाव कम नहीं होगा दाल का भाव तो ऊपर ही रहेगा। आपकी माइक्रो पोस्ट पर मेगा कमेंट की इच्छा है लेकिन आपके पास तो समय कम है। मैं इस मुददे पर फिर कभी विस्तार से लिखना चाहूंगा।
सुरेश जी हमेशा की तरह से बहुत अच्छी पोस्ट. अब क्या कहे कहने को कुछ बचा ही नही आंसूओ के सिवा,
काफ़ी अच्छा लिखा है। ये सब हो रहा है वायदा कारोबार और जमाखोरी से।
अब मुझे ये सही तरह से पता नही है की वायदा करोबार किसने शुरु किया?
और जमाखोरी करने वाले लोग किस ईशारे पर ऐसा करते है? इसलिये मैं इस विषय पर ज़्यादा नही लिखुगां।
बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ना ज्यादा जरूरी है, भूखे पेट रहकर भी लड़ा जा सकता है. अभी तो डीजल और पेट्रोल तथा गैस की बारी है.
किसने कहा है दाल खाने को, डा. ने तो नही कहा ?
कौन हो तुम जो मँहगाई बढाये जाते हो,
दिन पर दिन हमको रुलाये जाते हो,
मैं हूँ सरकार....मैं हूँ सरकार....
(क्या आपको युवराज सुनाई दिया?)
सरकार मंहगाई के दर की बात कर रहे हैं और मंहगाई से डर की बात कर रहे हैं. चुनाव के दौरान सरकार का विज्ञापन भूल गए क्या? टेलीफोन सस्ता...ये सस्ता..वो सस्ता...
सुरेश जी मैं आप के लेखों का प्रसंशक हूँ. पिछले एक साल से मैं आप के लेखों को नियमित पढ़ रहा हूँ. आप ने म्रत्यु और शवयात्रा जैसे विषयों पर भी लेख लिखे जो की काफी जनकारी देतें है और आप लगभग सभी विषयों को छूते हुए लिखतें है. लेकिन मेरे जहन में एक चीज खटक रही है की वो ये की आप जब सभी विषयों को बारीकी से देखतें है वही आप अपने गृह राज्य महाराष्ट्र में महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना और शिव सेना तथा राज ठाकरे जैसे लोगों की करतूतों पर जरा भी नहीं लिखते है. उत्तर भारतीयों की पिटाई जैसे मुद्दों को आप ने छुआ तक नहीं है इन बातों से तो ऐसा लगता है की कही न कही आप में भी संकीर्ण मराठीपन है.
काफ़ी अच्छा लिखा है। ये सब हो रहा है वायदा कारोबार और जमाखोरी से।
अब मुझे ये सही तरह से पता है की वायदा करोबार करने वाले व्यापारियो और बीजेपी के लोगो ने मिलकर काग्रेस सरकार को बदनाम करने के लिये किया है. ताकी हम बाबरी मस्जिद ,कशमीर मे मुसल्मानो और लालगढ मे मायो वादियो पर हो रहे अत्याचार को छोड महगाई पर सरकार का विरोध करे . ये सही कहा ना काशिफ़ प्यारे :)
अब तो सब्जी का छोटा झोला ५०० का नोट तुरन्त गप कर जाता है। अभी कुछ दिनो पहले ५० काफ़ी होते थे। जय हो...!
Hamne Jo Boya Hai Use Hi to Kat Raahe Hai.
smart Mai Aap ke Bat Se itfaq Nahi Rakhta Hoo. Aap Dubara Se Suresh Ji Ke pichele Article Ko Padho Shyad Aapko Pata Chal Jayega Ki Aap Galat Ho. Mai Bhi Bihar Ka Hoo Lekin Suresh Ji ke Mansikta Par Kabhi bhi Mujhe Sak Nahi Hai aur Naa Hoga.
कर दी ना छोते लोगों वाली बात, आपको दाल की पड़ी है। उधर भारतीय टीम ८ विकेट से वे. ई. से हार गई है उसकी आपको कोई चिन्ता नहीं।
भारत के कुछ राज्यों में अब भी भाजपा राज कर रही है, सरकार के इस दुख: में आपको कोई दुख नजर नहीं आता।
सरकार कहती है मंहगाई दर -1.61 हो गई है जो आज तक कभी नहीं हुई। इस बात पर आपको खुशी नहीं होती| बस आपको एक मामूली चीज दाल की पड़ी है। कभी सरकार की खुशियों में शरीक होना भी सीखिये।
सरकार अभी कुछ दिनों में प्लास्टिक की दालें बनवाने वाली है, जिसे आप एक बार खरीदिये बस, रोज बना कर निकाल लिजिये, कल फिर धो धाकर सब्जी बनाइये... अब तो हैप्पी?
:)
सुरेश भाई तुम जैसे लोग कभी ऊंचा नहीं सोच सकते....ये दाल रोटी मैं क्या पङा है..पिज्झा खाओ...और देखा नहीं सरकार मदरसों के लिए एक शिक्षा बोर्ड बना रही है देश की तरक्की हो रही है...और अब तो समलैंगिकता भी कानूनी हो जायेगी...हम बहुत ऊंचा जा रहै हैं...इसलिए नीचे मत देखो...चक्कर आ जायेगा
बिल्कुल ठीक कह रहे हैं. साम्प्रदायिक शक्तियों से लड़ना ज्यादा जरूरी है, भूखे पेट रहकर भी लड़ा जा सकता है.
अब तो मजे ही मजे है. मजे से खाओ.
आज ही पत्नी से बोला है कि अब रोज दाल मत बनाया करो. दाल खाना अब लग्जरी में शामिल हो गया है. उसने भी पलट के पूछ लिया "तो क्या बनाऊ? सब्जी के भाव भी आसमान पर है."
जय हो. धर्म निर्पेक्छ्ता की जय हो.
थोक मूल्य सूचकांक की भी जय हो.
इब्तेदा-ए-इश्क है रोता है क्या?
आगे आगे देखिए होता है क्या!
ज़रा ठहरिए बन्धु- अभि बजट तो आना ही है:)
ये सब वायदा कारोबाद का नतीजा है भई, बनिये लोग जो न करवाएं।
-Zakir Ali ‘Rajnish’
{ Secretary-TSALIIM & SBAI }
JAI JAI CONGRESS OR JAI USKI PSEUDO SAMPRADIYAK SAUHAADRATA...
JAI JAI CONGRESS OR JAI USKI PSEUDO SAMPRADIYAK SAUHAADRATA...
सुरेश व साथियों, क्या नेताओं या पार्टियों के बीच भी विभाजन होते हैं ? आर्थिक मंदी शायद आपके लिए अनोखी और महंगाई के बढ़ते रहने का चलन नया है. भाजपा के समय में (1998) आलू-प्याज़ के दाम याद हैं ? तहलका याद है ? ताबूत घोटाला याद है ? स्टील फैक्ट्री ? रिश्वत काण्ड...?
Chandan Chauhan,
I am sure, atleast you have not read the earlier blog of Suresh Chiplunkar, How much venom he has spitted against Bihari and other Hindibhasi and how much he is biased to Raj Thakrey
The motto of his blog should be " Maha-Rashtra (Madhya Pradesh mein rahkar) Ke Punarnirman ko samarpit" than "Rastra ke punarnirman ko samarpit"
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