Friday, May 29, 2009

भाजपा ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी खेमे की इज्जत बचाई… Vote Share of BJP, Left Parties and Congress in Bengal

भाजपा को पानी पी-पीकर कोसने वालों में वामपंथी सबसे आगे रहते हैं, ये अलग बात है कि भाजपा को गरियाते-गरियाते कब वे खुद ही पूरे भारत में अप्रासंगिक हो गये उन्हें पता ही नहीं चला। लेकिन इस लेख में प्रस्तुत आँकड़े सिद्ध करते हैं कि यदि पश्चिम बंगाल में भाजपा एक “ताकत” के रूप में न उभरती तो वामपंथियों को मुँह छिपाना मुश्किल पड़ जाता। सिर्फ़ और सिर्फ़ भाजपा के कारण पश्चिम बंगाल में कांग्रेस-तृणमूल गठबन्धन को कम से कम 7 सीटों का नुकसान हुआ, जो कि वामपंथी खाते में गई, वरना लाल बन्दरों का तो पूरा “सूपड़ा” ही साफ़ हो जाता। ज़रा एक नज़र डालिये इन पर–

1) बर्दवान सीट पर सीपीएम के उम्मीदवार की जीत का अन्तर है 59,419, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 71,632 वोट, सोचिये यदि वहाँ भाजपा का उम्मीदवार ही न होता तो?

2) जलपाईगुड़ी सीट पर भाजपा के उम्मीदवार सुखबिलदास बर्मा ने 94,000 वोट लेकर कांग्रेस को नहीं जीतने दिया, यहाँ से सीपीएम का उम्मीदवार 90,000 वोट से जीता।

3) अलीपुरद्वार में आरएसपी के मनोहर टिर्की जीते 1,12,822 वोट से जबकि भाजपा को आश्चर्यजनक रूप से 1,99,843 वोट मिले और कांग्रेस हार गई।

4) बेलूरघाट सीट पर आरएसपी का उम्मीदवार बड़ी मुश्किल से 5,105 वोट से जीत पाया, जबकि भाजपा उम्मीदवार को मिले 60,000 वोट।

5) फ़ॉरवर्ड ब्लॉक का उम्मीदवार कूच बिहार सीट से 33,632 वोट से जीता, यहाँ भाजपा की झोली में 64,917 वोट आये।

6) मिदनापुर में भाकपा के प्रबोध पाण्डा, भाजपा को मिले 52,000 वोटों की बदौलत हारने से बच गये।

माकपा के स्थानीय नेता भी मानते हैं कि भाजपा के कारण हम भारी शर्मिन्दगी भरी हार से बच गये वरना कांग्रेस-ममता को लगभग 31 सीटें मिलतीं। लगभग यही आरोप ममता बैनर्जी ने भी लगाया और कहा कि भाजपा के उम्मीदवार, वामपंथी खेमे को मदद पहुँचाने के लिये खड़े हैं (हा हा हा हा)।

इस सारे घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जो बात भाजपा के मामूली कार्यकर्ता को भी मालूम है उससे पार्टी का शीर्ष नेतृत्व कैसे अनजान है, कि भाजपा को अब अकेले चुनाव लड़ना चाहिये। NDA वगैरह बकवास है, यह भाजपा की बढ़त तो रोक ही रहा है, साथ ही साथ उसे वैचारिक रूप से भ्रष्ट भी कर रहा है। “सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है। आँकड़ों से स्पष्ट है कि पश्चिम बंगाल में भाजपा अकेले चुनाव लड़कर राज्य स्तर पर “तीसरी ताकत” के रूप में उभरी है, ऐसा ही समूचे देश में आसानी से किया जा सकता है। जब किसी “मेंढक” से गठबन्धन ही नहीं होगा, तो उसके फ़ुदकने का कोई असर भी नहीं होगा, तब भाजपा अपनी वैचारिक बात जनता तक ठोस रूप में पहुँचाने में कामयाब होगी। इस रणनीति का फ़ायदा दूरगामी होगा, यह करने से लगभग प्रत्येक गैर-भाजपा शासित राज्य में भाजपा दूसरी या तीसरी शक्ति के रूप में “अकेले” उभरेगी। ऐसे में स्थानीय पार्टियाँ बगैर शर्त के और स्वाभाविक रूप से भाजपा के पाले में आयेंगी क्योंकि देर-सवेर कांग्रेस या तो उन्हें “खाने” वाली है या अपने दरवाजे पर अपमानित करके खड़ा करेगी, तब ऐसी स्थानीय पार्टियों से “लोकसभा में हम और विधानसभा में तुम” की तर्ज पर समझौता किया जा सकता है, जैसा कि पश्चिम बंगाल में दार्जीलिंग सीट पर किया गया और जसवन्त सिंह तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद विजेता बने, कृष्णनगर में भी भाजपा प्रत्याशी को 1,75,283 वोट मिले। भाजपा के प्रदेश महासचिव राहुल सिन्हा कहते हैं कि “यह सफ़लता बंगाल में हमारे संगठनात्मक ढाँचे की ताकत के कारण मिली है…”। क्षेत्रीय पार्टियाँ हों या वामपंथी, ये लोग जब तक भाजपा को अपना प्रतिद्वन्द्वी नम्बर एक मानते रहेंगे, तब तक कांग्रेस मजे करती रहेगी, क्योंकि उसने बड़ी चतुराई से अपनी छवि “मध्यमार्गी” की बना रखी है और “धर्मनिरपेक्षता” नाम का ऐसा सिक्का चला दिया है कि बाकी सभी पार्टियों को मजबूरन कांग्रेस का साथ देना ही पड़ता है।

पश्चिम बंगाल में भाजपा सभी 42 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ी, एक सीट (दार्जीलिंग) जीती, लेकिन कम से कम दस सीटों पर उसने कांग्रेस का खेल बिगाड़ दिया। एक चुनाव हारने पर भाजपा को दिन-रात सलाह देने में लगे ऐरे-गैरे-नत्थू-खैरे भी “लाल-गढ़” में भाजपा प्रत्याशियों को मिले वोटों को देखकर हैरान होंगे, लेकिन इसमें हैरानी की कोई बात नहीं है, जिस तरह उत्तरप्रदेश में कांग्रेस अकेले लड़ी और जीती, भाजपा भी अकेले ही लड़े। इस बार नहीं तो अगले चुनाव में, अगले नहीं तो उसके अगले चुनाव में, जीत निश्चित मिलेगी। आज लाखों-करोड़ों लोग कांग्रेस-वामपंथियों की नीतियों से त्रस्त हो चुके हैं, उनकी भावनाओं को आवाज़ देने वाली कोई पार्टी उन्हें दिखाई नहीं दे रही, इसलिये उन्होंने कांग्रेस को ही चुन लिया, जब उनके पास एक सशक्त विकल्प मौजूद रहेगा तब वे निश्चित ही उसे चुनेंगे। लेकिन लौहपुरुष का विशेषण और कंधार जैसा शर्मनाक समर्पण तथा राम मन्दिर आंदोलन और जिन्ना की मज़ार पर जाने जैसा वैचारिक अन्तर्द्वन्द्व अब नहीं चलेगा। पश्चिम बंगाल जैसे राजनैतिक रूप से संवेदनशील, लगभग 23 सीटों पर 40% से अधिक मुस्लिम वोटरों तथा वामपंथियों द्वारा इतने वर्षों से शासित राज्य में भाजपाई उम्मीदवारों को कई जगह एक लाख से अधिक वोट मिल रहे हैं, इसका क्या अर्थ है यह मेरे जैसे छोटे से व्यक्ति को समझाने की जरूरत नहीं है।

रही बात वामपंथियों की तो उन्हें भाजपा का शुक्र मनाना चाहिये कि उनकी कम से कम 6-7 सीटें भाजपा के कारण ही बचीं, वरना इज्जत पूरी लुट ही गई थी, लेकिन वे ऐसा करेंगे नहीं। रस्सी तो जल गई है, मगर……

(खबर का मूल स्रोत यहाँ है)


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14 comments:

अंशुमाली रस्तोगी said...

सब समय-समय की बात है बंधु।

Sachi said...

Nice detailed analysis.

You know how to express. Hats off to you!

त्यागी said...

देखिया बात सीधी सी बात है सेमलेगिक विवाह के समर्थन में नारे वालो का साथ देने से कुछ नहीं बन सकता. क्या उनसे कोई पूछे गा की विवाह करने के बाद बच्चे कैसे पैदा करोगे.
इसी प्रकार झूठी धर्मनिपेक्ष्ता के ढोंगियो के साथ कदमताल करने से कुछ भी नहीं होग. भारत कहाँ से पैदा होगा. अब तो बीजेपी को बात समझ में आ जानी चाहिय.
देश पर राज करना है तो पहेले अपनी वोटरों की मानसिकता समझो. कांग्रेस के वोटर और बीजेपी के वोटर में यही तो मूलभूत अंतर है. बीजेपी वाले वोटर, को कांग्रेसी मत समझो.
यह वो है जो शारीर पर ८० घाव होने, अपनी एक आंख खोने, और घास की रोटी खाने वाले राणा सांगा की औलाद है. जयचंद की नहीं. हा कहेने को दोनों हिन्दू है. अब फैसला आपका है. क्योंकि निर्णायक नेता तो आप ही है. और आज मजबूत कांग्रेस.

संजय बेंगाणी said...

धर्मनिरपेक्षता का काट राष्ट्रवाद है. एकला चालो....लम्बी रणनीति के साथ.

Arun said...

“तेरा ब्लॉग बन्द करवा दूंगा बे साले…”। :)

:)

Back-up lete rahiyo pyare !!

aapka ek fan.

Arun

रंजना said...

Sahi kaha aapne.

जयराम "विप्लव" said...

suresh jee ! aapke likhe par tippni karne ke liye bhi socna padta hai .khair jara in link par jayiye

http://mohalla.blogspot.com/2009/05/blog-post_28.html

http://janokti.blogspot.com/2009/05/blog-post_28.html

चन्दन चौहान said...

सही बिषलेषण किया है बम पंथी अब देशभक्त बी.जे.पी बालों के पैर पकरेगें

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

“सेकुलरों” की बातों और सेकुलर मीडिया के प्रभाव में आकर भाजपा ने अपनी छवि बदलने का जो प्रयास किया है, अब सिद्ध हो चुका है कि वह प्रयास पूरी तरह से असफ़ल रहा है। सेकुलर बनने के चक्कर में भाजपा “धोबी का कुत्ता” बन गई है।
सुरेश जी, आप की उक्त बात से पूरी सहमति है। माकपा और भाकपा को तो विपथगामी होने के कारण यह दिन बहुत पहले तकरीबन 1990 के बाद ही देख लेना चाहिए था।

Desh Premi said...

सुरेश जी,

आपका ब्लॉग मैं बहुत समय से देख रहा हूँ.
एक बात कहना चाहूँगा, भाजपा की हार से भाजपा को सबक लेना चाहिए. भाजपा का वोट हमारे हिन्दुस्तान मे फिक्स्ड है, जो लोग भाजपा को वोट देते हैं वो हमेशा से देते है, उन्मन कोई आंतर नही आने वाला, ये ऐसे वोट है जिनको लोग केडर वोट कहते है.
रही बात दूसरे वोटेरों की तो उनके लिए भाजपा को उनका दिमाग़ पढ़ना परेगा, उनको समझना परेगा,
हिंदुटवा का जो मुद्दा भाजपा लकर् के चलती है , आम आदमी को कभी कभी ऐसा लगता है की ये वोट लेने का एक तरीका है.
एक बात बिल्कुल सॉफ हो जानी चाहिए की भारत कभी भी एक हिंदू राष्ट्रा नही बन सकता , चाहे इशके लिए विश्वा हिंदू परिषद कुछ भी केरले, क्योंकि कोई भी हिंदू 4 बच्चे नही पैदा करेगा... जैसे की और लोग केरते है..
भाजपा को हिंदुटवा के साथ साथ रास्ट्रवाद को भी ले केरके चलना चाहिए... और यही एक तरीका है भाजपा को मजबूती से देश मैं राज केरने का....

सादर,

एक देश प्रेमी
http://rashtravad.blogspot.com/

mahashakti said...

आपके लेख तथा देश प्रेमी दोनो जी से सहमत हूँ/

Dikshit Ajay K said...

आप की और देश प्रेमी दोनों की बात से सहमत हूँ. सुरेश जी ने अपनी पोस्ट दिनांक १६.०५.०९ में एक स्थान पर लिखा था की भा ज पा का वोटर चुनाव बाले दिन ऐर्कोन्दिशन मैं बैठता है. किसी हद तक यह बात सही है. भा ज पा का वोटर बदलता नहीं है, न पैसे से न दवाब से. भा ज पा का वोटर अधिकतर शिक्षित होता है, अतः वो नेता लोग की बातों से विचलित नहीं होता. समस्या तो यह है की भा ज पा का वोटर के घर की महिलाएं वोट डालने नहीं निकलती और पकोरे या भठूरे का लालच दे कर मर्दों को भी घर पर रोक लेती हैं. मेरा व्यक्तिगत सर्वे है की मेरे अपने सर्कल मैं ९५% भा ज पा का वोटर है, लेकेन दुर्भाग्य से उन मैं से ६० % ने वोट ही नहीं डाला (मेरे शहर मैं भा ज पा ही जीती है). जब उन से पूंचा की वोट क्यों नहीं डाला तो अधिकांश ने कहा की यार अमुक ने कहा था की वोट डालने साथ चलेंगे, पर वो आया नहीं इसी चक्कर में रह गया. अब भा ज पा का संगठनात्मक ढांचा इतना कमजोर हो गया है की वो अपने निश्चित वोटर को भी घर से निकल कर वोट नहीं डलवा पाटा. अखीर मैं भा ज पा के प्रत्याक्षी अपने वास्तविक वोट बैंक का केवल ४०-४५ % ही प्राप्त कर पाते हैं, उन मैं से कुछ इतने भाग्यशाली होते हैं की उतने मैं ही जीत जाते हैं.

ab पहले तो आप खुद सोचिया की आप के सर्कल मैं से ही भा ज पा का कितना वोट ना डाले जाने के कारन कट गया, फिर जरा कल्पना कर के देखिया अगर भा ज पा का ७०-८० % वोट भी पर गया तो ....................................?
--
Regards

DIKSHIT; AJAY K

Kumar Dev said...

सुरेश जी,
आपकी बात सौ फीसदी सत्य है, लेकिन जब भी आप लिखते इस दुनिया के दुसरे नम्बर के अंधों ( अरुण जी ) को मिर्ची लग जाती हैं,
जरुर इन अंधो की प्रेमिका या रिश्तेदार ( पता नहीं कैसे ) वाम या इस्स्स्स्ला.. है तभी तो इनको हमेशा से पता नहीं कुछ, कुछ होने लगता है....
अगर ये महोदय "पंगेबाज" अरुण जी है तो, या नहीं है तो भी इन्हें अगली बारी से ये ख्याल रखना चाहिए की किसी के लेख पर टिप्पणी देते वक्त ऐसी भाषा का प्रयोग न करे.........
इतने सारे लोग इस लेख पर टिप्पणी कर रहे है लेकिन किसी की नज़र इन महोदय की टिप्पणी पर नहीं गयी.... आश्चर्य होता है.
"जय जवान, जय किसान, जय विज्ञानं और जय भगवान् ".........

Sachi said...

An important issue...
I wanted to write you on your mail, but I am not seeing it, so I am putting a comment: Check this and plaese write as according to me it is very serious...
http://www.youtube.com/watch?v=VN6Ty-djVTc&feature=related