क्या वोटिंग मशीनों का “चावला-करण” किया जा सकता है? Electronic Voting Machines Fraud Rigging in Elections
अमेरिका के एक रिटायर्ड प्रोफ़ेसर साईंनाथ ने यह दावा किया है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों से छेड़छाड़ करके उनके द्वारा धोख़ाधड़ी की जा सकती है। श्री साईंनाथ ने सन् 2004 के चुनावों के दौरान इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों की गुणवत्ता और विश्वसनीयता को लेकर एक जनहित याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई थी, उन्हें शक था कि शायद NDA लोकसभा चुनावों में इन मशीनों द्वारा बड़े पैमाने पर धांधली कर सकता है। हालांकि कांग्रेस के चुनाव जीतने की दशा में उन्होंने अपना केस वापस ले लिया था। साईनाथ ने अमेरिका में सम्पन्न हुए चुनावों में भी इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी कैसे की जा सकती है इसका प्रदर्शन किया था।
इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों मे गड़बड़ी करना एक “बच्चों का खेल” है, यह बताते हुए प्रोफ़ेसर साईनाथ कहते हैं (रिपोर्ट यहाँ देखें http://www.indianexpress.com/oldStory/45296/) कि EVM (Electronic Voting Machines) को नियन्त्रित करने वाली कम्प्यूटर चिप को एक विशिष्ट तरीके से प्रोग्राम करके इस प्रकार से सेट किया जा सकता है कि उस मशीन में पड़ने वाले वोटों का एक निश्चित प्रतिशत एक पूर्व-निर्धारित उम्मीदवार के खाते में ही जाये, चाहे कोई भी बटन दबाया गया हो। इस प्रकार की और भी गड़बड़ियाँ मशीन में पैदा की जा सकती हैं। मशीनों में की गई इस प्रकार की छेड़छाड़ को पकड़ना आसान नहीं होता, पार्टियों के “लगभग अनपढ़” चुनाव एजेण्टों के लिये तो बिलकुल भी नहीं। उल्लेखनीय है कि EVM उम्मीदवारों के क्रमवार नम्बर के आधार पर वोटिंग की गणना करती है। नामांकन हो चुकने के बाद यह तय होता कि किस क्षेत्र की मशीन में किस पार्टी के किस उम्मीदवार का नाम कौन से क्रम पर रहेगा। प्रोफ़ेसर साईनाथ के अनुसार नाम वापसी के बाद दो सप्ताह का समय बीच में होता है, इस बीच में मशीनों में कम्प्यूटर चिप की जगह “Pre-Coded Malicious” चिप स्थापित की जा सकती हैं, अथवा सम्भव हुआ तो पूरी की पूरी मशीन भी नकली स्थापित की जा सकती है और यह निश्चित किया जा सकता है कि कौन सी मशीन किस इलाके में जायेगी।
(श्री साईनाथ 1964 की बैच के आईआईटी इंजीनियर हैं, फ़िलहाल अमेरिका में कम्प्यूटर साइंस के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर हैं, और “Better Democracy Forum” नाम की संस्था के अध्यक्ष भी हैं)।
इस प्रक्रिया में चुनाव अधिकारी (जो कि अधिकतर सत्ताधारी पार्टी के इशारों पर ही नाचते हैं) की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। ऐसे में एक गम्भीर सवाल उठता है कि क्या इन मशीनों का “चावलाईकरण” किया जा सकता है? “चावलाईकरण” की उपमा इसलिये, क्योंकि चुनावों में धांधली का कांग्रेस का इतिहास बहुत पुराना है। ऊपर से इस पार्टी को नवीन चावला जैसे “स्वामीभक्त” चुनाव आयुक्त भी प्राप्त होते रहे हैं (इसका एक और सबूत, मान्य संवैधानिक परम्पराओं के विपरीत, सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद पूर्व चुनाव आयुक्त एम एस गिल को मंत्रीपद की रेवड़ी दिया जाना भी है)।
शिवसेना ने चुनाव आयोग को इन वोटिंग मशीनों द्वारा धांधली किये जाने की आशंका व्यक्त करते हुए इनकी जाँच की माँग करते हुए लिखित में शिकायत की है, जिसमें बताया गया है कि दक्षिण मुम्बई से शिवसेना के लोकप्रिय उम्मीदवार मोहन रावले को कई वोटिंग मशीनों पर शक है, क्योंकि उन्हें शिवसेना के कुछ मजबूत माने जाने वाले इलाकों में से कई मशीनों में 5 या 7 वोट ही मिले (क्या मोहन रावले अचानक अपने ही गढ़ में इतने अलोकप्रिय हो गये?)। रावले ने आगे बताया कि अमेरिका और इंडोनेशिया में भी इन मशीनों के “ठीक से काम न करने” की वजह से इन्हें चुनाव प्रक्रिया से हटा लिया गया था।
अब नज़र डालते हैं हाल ही में सम्पन्न लोकसभा चुनावों के नतीजों पर – पूरे देश में (जहाँ भाजपा का शासन था उन राज्यों को छोड़कर) लगभग सारे नतीजे कुछ इस प्रकार से आये हैं कि जो भी पार्टी कांग्रेस के लिये “सिरदर्द” साबित हो सकती थी या पिछली सरकार में सिरदर्द थी, उनका या तो सफ़ाया हो गया अथवा वे पार्टियाँ लगभग निष्क्रिय अवस्था में पहुँच गईं, उदाहरण के तौर पर – वामपंथियों की सीटें 50% कम हो गईं, मायावती भी लगभग 50% नीचे पहुँच गईं (जबकि सभी सर्वे, चैनल और विशेषज्ञ उनसे बेहतर नतीजों की उम्मीद कर रहे थे), जयललिता भी कुछ खास नहीं कर पाईं और तमिल भावनाओं के उफ़ान और सत्ता विरोधी लहर के बावजूद डीएमके को अच्छी खासी सीटें मिल गईं, लालू-पासवान का सफ़ाया हो गया, आंध्र में चिरंजीवी से खासी उम्मीद लगाये बैठे थे, वे भी कुछ खास न कर सके। जबकि दूसरी तरफ़ आंध्रप्रदेश में कांग्रेस को पूर्ण बहुमत मिल गया, उत्तरप्रदेश में (कांग्रेस की) आशा के विपरीत भारी सफ़लता मिली, उड़ीसा में नवीन पटनायक को अकेले दम पर बहुमत मिल गया। जबकि कर्नाटक, गुजरात, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार जैसे राज्यों में कांग्रेस उतना अच्छा नहीं कर पाई, ऐसा क्यों?
ऐसा नहीं कि खामख्वाह बाल की खाल निकाली जा रहा है, भारत और विश्व के अन्य हिस्सों में भी ताज़ा लोकसभा चुनाव नतीजों को लेकर संशय बना हुआ है, इसका सबूत गूगल की सर्च रिपोर्ट से देखा जा सकता है, जहाँ कि जनता ने ईवीएम मशीनों में गड़बड़ी की आशंका और इनकी विश्वसनीयता को लेकर विभिन्न सर्च किये हैं… यहाँ देखें
http://www.google.com/trends?q=electronic+voting+machine&ctab=398065024&geo=all&date=all
इसी प्रकार अमेरिका के कुछ कम्प्यूटर इंजीनियरों द्वारा फ़्लोरिडा के गवर्नर चुनावों के बाद ई-वोटिंग मशीनों की संदिग्धता के बारे में एक रिपोर्ट की पीडीएफ़ फ़ाइल भी यहाँ देखें…
http://www.computer.org/portal/cms_docs_computer/computer/homepage/May09/r5pra.pdf
तात्पर्य यह कि यदि भारत का मतदाता वाकई में इतना समझदार, परिपक्व और “स्थिरता”(?) के प्रति सम्मोहित हो गया है तब तो यह लोकतन्त्र के लिये अच्छी बात है, लेकिन यदि जैसा कि अभी भी कई लोगों को शक हो रहा है कि इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की गई है, तब तो स्थिति दुर्भाग्यपूर्ण कही जायेगी। हालांकि अभी इस बात के कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं, लेकिन शक के आधार पर इन मशीनों की जाँच हेतु एक दल या आयोग बनाये जाने की आवश्यकता है, कि जब अमेरिका में भी इन मशीनों को “संदिग्ध” पाया गया है तो भारत में भी इसकी विश्वसनीयता की “फ़ुलप्रूफ़” जाँच होनी ही चाहिये। सोचिये, कि अभी तो यह सिर्फ़ शक ही है, कोई सबूत नहीं… लेकिन यदि कहीं कोई सबूत मिल गया तो 60 साल पुराने लोकतन्त्र का क्या होगा?
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43 comments:
गड़बड़ी करनी हो तो एक प्रोग्रामर समझ सकता है कि यह कितना सरल है.
फिलहाल यह केवल शक है. विविधता भरे देश में बड़े पैमाने पर गड़बड़ी कर पाना सरल भी नहीं. हाँ, चुनाव आयोग मशीनों को सत्यापित कर शंका का निवारण जरूर कर सकता है.
ऐसी संभावनाओं से इनकार नहीं किया जा सकता है .
जब मुख्य चुनाव आयुक्त के पद का चावलाकरण हो सकता है तो सभी कुछ हो सकता है!
चुनाव मशीन का चावलाकरण असंभव नहीं है, बड़े आराम से किया जासकता है, अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनावों में बुश की दुबारा जीत मशीनों के चावलाकरण के फलस्वरूप थी
लेकिन भारत में भी मशीनों के चावलाकरण होने की बाद मुश्किल लगती है!
अब पूरे पांच साल आपका कुनबा ऐसे ओरिजिनल रिसर्च कर सकता है।
वैसे अगर इतना आसान था यह सब कुछ तो मामला 206 पर ही कैसे टिक गया? और बिहार में बस दो पर?
दक्षिणपंथियों की समस्या यही है कि वे दीवार पर लिखी इबारत की तरफ़ पीठ करके प्रलाप करते रहते हैं।
तथ्य परक बातें समाने आई है, विश्लेषण जरूरी है।
अशोक कुमार पाण्डेय जी, पहली बात - मेरा ऐसा कोई दावा नहीं कि यह "ओरिजनल रिसर्च" है, दूसरी बात- शायद आपने ठीक से पढ़ा नहीं, मैंने लिखा है "कांग्रेस शासित या समर्थित राज्यों में" और शायद बिहार इस श्रेणी में नहीं आता, तीसरी बात - कृपया यह भी बताते जाते कि "वामपंथी" किस तरफ़ को पीठ करके प्रलाप करते हैं? :) और कांग्रेसी पीठ या पेट में से क्या नीचे करके प्रलाप करते हैं?
जहां भाजपा की सरकारें थी वहां कांग्रेस के पैंदे पर लात क्यों पड़ी?
जहां कांग्रेस या इसके साथी सत्ता में थे वहां ही इसे सफलता क्यों मिली?
क्या चुनाव मशीनों के चावलाकरण के लिये राज्य सरकार के साथ मिली भगत होना आवश्यक है?
मैं तो हेरा फेरी की किसी गुजांइश को सही नहीं मानता.. पर अगर समुचित मांग... जैसे नेता विपक्ष या कोइ राष्ट्रीय दल ऐसी मांग करे तो जांच में कोई दुविधा नहीं हो्नी चाहिये...
यह एक गंभीर मुद्दा है. चुनाव के जो नतीजे सामने आये हैं उनपर तो एकबारगी कांग्रेसी भी यकीन नहीं कर पा रहे थे. केंद्र सरकार का उत्तरदायित्व है कि आशंकाओं को दूर करने कि दिशा में पहल करे.
सुरेश जी दाल मे कुछ काला नही, बल्कि सारी दाल ही काली है, अब यही सवाल सब के दिमाग मै घुम रहा है???
सुरेश जी प्रशन तो अपने सही उठाया परन्तु इस प्रशन को जयललित या मायावती या फिर बीजेपी को उठाना चाहिय. दूसरा हमे एक बात जो समझ नहीं आती की सारी मीडिया इसको लोकतंत्र की जीत कैसे बता सकती है जबकि सरदार मनमोहन सिंह इस से डरते हैं.
रही आयोगों की बात तो जो सर्कार आज तक नेता जी या मुखर्जी या दीन दयाल जी या शास्त्री जी की मृत्यु का पता नहीं लगा पाए वो यंहा पर आयोग बिठा कर क्या कर लेगी . यहाँ तो भाई राजीव गाँधी और इन्द्र गाँधी का ही केस चलेगा और उन्ही के हत्यारे दण्डित किया जायेंगे. बाकि तो कुते बिल्ली ही हैं.
इसलिय भाड़ में गई आपकी चुनाव मशीन . कुछ बिगड़ सकते हो तो बिगाड़ लो जब -
अपनी मनपसंद का राष्ट्रपति बना सकती है
जब अपनी पसंद का चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सकती है.
खुद (बिना चुनावो के) प्रधानमंत्री थोप सकती है. और अंधी मीडिया इसे लोकतंत्र की जीत बताती है.
खुद इटली से आकर बिना भाषा समझे देश की सर्वशक्तिमान पदाधिकारी बन सकती है.
तो इसे में चुनाव मशीन ठीक हो या गलत क्या फरक पड़ता है.
हम तो एक काल कोठरी में रहेते हैं और दुःख इस बात का हैं की इसे सब सोने का महल कहेते हैं.
सुरेश जी आपकी रुचि पेट और पीठ के नीचे ही है तो क्या किया जा सकता है।:-(
चलिये यूपी और पंजाब के बारे में बताईये।
आपने पढा नहीं मै आपकी नहीं कुनबे की बात कर रहा था।
दरसल हार स्वीकार करने के लिये और जनता पर विश्वास करने के लिये बडा दिल चाहिये। रवि सिंह बतायेंगे कि उत्तराखण्ड मे लात किसकी थी पोंद किसकी और सरकार किसकी? और पंजाब तथा गुजरात में भी? बंगाल में कैसे मिली सफलता और यूपी में क्या हुआ?
ना मै कांग्रेसी हूं ना संघी…मेरी चुनाव पर पोस्ट देख सकते हैं। पर इतना ज़रूर है कि लोकतंत्र पर विश्वास और जनता के फ़ैसले का सम्मान करना जानता हूं।
http://naidakhal.blogspot.com/2009/05/blog-post_17.html
kuch bhi ho sakta hae .
यहाँ विस्फोट हुआ है:
http://www.visfot.com/index.php/election/963.html
पता नहीं ,मगर आपका यह आरोप बहुत गंभीर है -इसे मुंगेरी लाल का सपना नहीं कहा जा सकता !
खिसियानी बिल्ली मशीन नोचे.
चावला करण हो चुका है इस चुनाव में
अशोक कुमार पाण्डेय जी, पेट और पीठ की बात आपने ही शुरु की थी… अब आते हैं मूल बात पर… मैंने सिर्फ़ एक आशंका व्यक्त की है तो आपको इतनी मिर्ची क्यों लगी है समझ नहीं आया। वोटिंग मशीनों सम्बन्धी यह आशंका सारी दुनिया में लाखों लोगों को है, तो क्या सब भाजपाई हो गये? और "विस्फ़ोट" पर भी यही आशंका जताई गई है (यहाँ देखें http://www.visfot.com/index.php/election/963.html)। इस हिसाब से आपके अनुसार प्रोफ़ेसर साईनाथ भी सिरफ़िरे हैं? या नवीन चावला जैसे बेईमान अधिकारी भी आपको पाक-साफ़ नज़र आते हैं? यदि आप कांग्रेसी नहीं हैं तो इतना भड़कने की क्या आवश्यकता है भाई? कम से कम मैं खुलेआम स्वीकार तो करता हूं कि हाँ मैं कांग्रेस विरोधी हूँ… लेकिन इससे वोटिंग मशीनों में गड़बड़ी की आशंका जताना कहाँ से गलत हो गया?
सुरेशजी, आपका प्रश्न भले ही तर्कपूर्ण हो परंतु मैं एक बात कहना चाहता हूँ जो कि मेरा अनुभव है मशीन के निर्माता के साथ जिस पर सभी लोगों ने सवाल उठाये हैं, एवं संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं।
इस मशीन के बारे में जितना तकनीकी पक्ष मुझे पता है उससे यह तो मैं कह सकता हूँ कि बहुत बड़े पैमाने पर इन मशीनों में छेड़खानी असंभव है, क्योंकि अगर चिप इसमें बदलनी हो जैसा कि बहुत ही मजबूत तरीके से इसका पक्ष रखा गया है, तो इतनी जल्दी बिना फ़ेक्ट्री में जाये इन मशीनों की चिपों को नहीं बदला जा सकता है।
तकनीकी पक्ष मजबूत होने और दाम कम होने के कारण ही इसकी पूरी दुनिया में बहुत ही मांग है, भारत इलेक्ट्रानिक्स जो कि इस मशीन की निर्माता है, उनके एक सेक्शन को तो मशीन बनाने से फ़ुरसत ही नहीं मिलती है।
मेरी राय में तो यह सब तुक्केबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है। जब कोई भी वस्तु या व्यक्ति अच्छा प्रदर्शन कर रहा होता है तो तकनीकी पक्ष जाने बिना और अव्यवहारिक बातों से कुछ लोग रोड़ा जरुर अटकाते हैं, यह तो दुनिया का नियम है।
सुरेशजी, आपका प्रश्न भले ही तर्कपूर्ण हो परंतु मैं एक बात कहना चाहता हूँ जो कि मेरा अनुभव है मशीन के निर्माता के साथ जिस पर सभी लोगों ने सवाल उठाये हैं, एवं संदेह की दृष्टि से देख रहे हैं।
इस मशीन के बारे में जितना तकनीकी पक्ष मुझे पता है उससे यह तो मैं कह सकता हूँ कि बहुत बड़े पैमाने पर इन मशीनों में छेड़खानी असंभव है, क्योंकि अगर चिप इसमें बदलनी हो जैसा कि बहुत ही मजबूत तरीके से इसका पक्ष रखा गया है, तो इतनी जल्दी बिना फ़ेक्ट्री में जाये इन मशीनों की चिपों को नहीं बदला जा सकता है।
तकनीकी पक्ष मजबूत होने और दाम कम होने के कारण ही इसकी पूरी दुनिया में बहुत ही मांग है, भारत इलेक्ट्रानिक्स जो कि इस मशीन की निर्माता है, उनके एक सेक्शन को तो मशीन बनाने से फ़ुरसत ही नहीं मिलती है।
मेरी राय में तो यह सब तुक्केबाजी से ज्यादा कुछ नहीं है। जब कोई भी वस्तु या व्यक्ति अच्छा प्रदर्शन कर रहा होता है तो तकनीकी पक्ष जाने बिना और अव्यवहारिक बातों से कुछ लोग रोड़ा जरुर अटकाते हैं, यह तो दुनिया का नियम है।
सुरेश जी आपका लिखा पढने में अच्छा लगता है। बांधता भी है। इसके लिए धन्यवाद। अब आज की बात। हो सकता है जो आपकी आशंका है सही हो पर मैं भगवान से मनाता हूं कि यह गलत निकले। और अगर सच हो तो कभी सामने न आए क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो तो जनता का लोकतंत्र से विश्वास उठ जाएगा। खैर आपका प्रयास सराहनीय है। माना कि लोकतंत्र में संविधानिक पदों पर आरूढ लोगों का सम्मान करना चाहिए लेकिन जब हर बडे पद पर प्यादे बैठाने की परंपरा पड गई हो तो क्या किया जा सकता है। खैर भारतीय लोकतंत्र जिंदाबाद
पेट और् पीठ नही मैने मुहावरे का इस्तेमाल किया था जिसे आपने विकृत किया था, जो आपकी सोच के अनुकूल ही था।
मिर्ची लगी उसी मानसिकता का परिचायक है
आप कांग्रेस नहीं लोकतंत्र के विरोधी हैं- मनुष्यता के भी।
यह सिर्फ़ हार की खीज़ है। खम्बे नोचते रहिये नागपुर से दिल्ली तक आपके नेता भी यही कर रहे हैं
पहली बात तो ये शंका निराधार लगती है। दूसरी बात अगर ये सच है तो, बीजेपी और दूसरी पार्टियां राजनीति क्यों कर रही हैं कांग्रेस से समझौता करके कुछ और दुकानदारी करें ना। अगर इतनी बड़ी साजिश कांग्रेस कर ले जा रही है।
उम्मीद करता हूं आप अपने घर में दरवाज़ा लगाकर सोते होंगे यह लोकतंत्र का विरोध नहीं है।
संघी कितने बदतमीज़ हो सकते हैं आप तो बेहतर जानते होंगे तो जैसा कि पहले कहा ग़ाली ग़लौज़ रोकने के लिये माडरेशन ज़रूरी है।
आपकी भडास भी बिलकुल उसी रूप में सजा दी है।:-)
सच बताऊं-- व्यवहार के स्तर पर बंगाल वाले कथित वामपंथियों और नागपुरी संघियों में मुझे कोई फ़र्क महसूस नहीं होता। दोनों अपने अपने स्तर पर मानवता के शत्रु हो चुके हैं।
बस एक फ़र्क रह जाता है-- बंगाल वाले जो करते हैं खुल के और नागपुरी सिवाय झूठ के कुछ नहीं करते। उन्हें किसी सैद्धांतिक जामे की ज़रूरत नहीं पडती।
जनता अब इससे कम लोकतंत्र के लिये तैयार नहीं हो सकती … काश दोनों अहमकों को यह समझ में आ जाता।
अशोक जी , क्या कहें आप से ? संघ और वामपंथ आप को एक समान लगती है , आप संघ को कितना जानते है मे नहीं कह सकता पर ये जरुर कहूँगा की एक बार संघ का सामीप्य जरुर लीजिये ताकि आप की टिप्पणी सच के करीब हो .
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भाई आठ साल संघी स्कूल में काटे हैं
मैने कहा है विचार के स्तर aपर नही व्यवहार के स्तर पर वह भी वाममोर्चे के लिये
मै मार्क्स को मानता हूं करात को नहीं
yahan to bado ki mahfil hai fir bhi itna jarur kahunga ....... mudde par tarkpurn bat rakhen chahe kisi bhi panth ko mante hon .... yah nitant niji masla hai ........ waise aane wale dino mein ek naye panth ki aor desh badh raha hai ..... kuchh naye sawal samne honge kyonki gandhi , marx , lohiya ....... aadi ke formule (vad) ab kewal gaal bajane ko rah gaye hai ......... desh - kaal -paristhiti ki tikdi ne wartmaan tamam panth ko aprasangik kar diya hai ..........
अजब मशीन है -बहुत बेईमान-विधान सभा मे बी जे पी की हो जाती है तो कभी मायावति की और लोक सभा में कांग्रेस की..इन्टेलिजेन्ट बेईमान!!
और मूर्ख भी उतनी ही है यह मशीन-जब बेईमानी कर ही रही थी तो २० सीटों पर और कर लेती-कम से कम दूसरों का मूँह देखने का टंटा तो खत्म होता. फिर वो भी इसी तरफ बैठकर सबके साथ मशीन हिला हिला कर देखते. :)
तकनिकी तौर पर भले ही ये संभव है.
पर सवाल ये है कि अगर ऐसा किया जाता तो क्या सरकारें बदलतीं ?
@अशोक पांड्य जी
आठ साल काटे हैं. परन्तु फिर भी टेडी की टेडी ही.
सुरेश जी, सुबह मैंने नई दुनिया में यह खबर पढी थी। मुझे लगता है नई दुनिया को यह खबर पहले पन्ने पर लगानी चाहिए थी। एक पत्रकार के नाते अगर खबर मेरे पास होती तो मेरा डीसिजन यही होता। खैर उससे बडी बात यह है कि करकरे की पत्नी के साथ जो व्यवहार किया गया अनुचित है। सरकार को इसे नोटिस में लेकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। देश की जनता ने कांग्रेस को दोबारा मौका दिया है उन्हें भी जनता की अपेक्षा पर खरे उतरना चाहिए। जब पीएम साहब को आस्ट्रेलिया में पकडे गए एक संदिग्ध की मां का रोना सुनकर रातभर नींद नहीं आती तो यह खबर जानने सुनने के बाद वे कैसे चुप हैं....?
.....अरे मैं तो भूल गया, शहीद तो इस देश में सिर्फ गांधी (नेहरू-इंदिरा-फिरोज) परिवार के लोग हुए है। बाकी तो सब मारे गए हैं। तभी तो सावरकर को सलाम करने में नानी मरती है और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम लेने झिझकते हैं। खैर लिस्ट बहुत लंबी है।
कमाल है भाई. साइनाथ शक करें तो कुछ नहीं सुरेशजी लिखे तो लानत मलानत. ये वही साइनाथ है जो इलेक्शन के दौरान विभिन्न चैनलों पर घूम घूम कर प्रवचन कर रहे थे. सुरेशजी की बात मैं कुछ दम लगता है क्योंकि साइनाथ की कोर्ट में अपील फिर बेशर्मी से वापस लेना, चावला का आयुक्त बनना, गिल को मंत्री बनाना और अमेरिकन की इतनी दिलचस्पी अजीब लगती है. मगर लोह्पुरुष की पार्टी क्यों सो रही है? आवाज़ क्यों नहीं उठती.
सुरेश जी,
प्रणाम... ये अशोक नाम की चिडिया बहुत फुदक रही है,, अपने ज्ञान की कैची चला कर इस चिडिया के पर काट दो...
और जरा इस चिडिया को बता देना की वामपंथी और दक्षिणपंथी के का अंतर होता है......
पता नहीं इस दुनिया में कितने प्रकार के अंधे होते है, मेरी नज़र में तो दो है... इस चिडिया का पता नहीं है... जिसे शिकारी ही पालक नज़र आता है...
जय जवान जय किसान जय विज्ञान और जय भगवान् ....
:-)
itna hi kaafi hai aapke vishleshan aur uske baad hui charcha ke lie
हाँ तो कुमार देव नाम के चूहे तुम्हारा ये चिपलूनकर नाम का चिडिमार तो छोडो उसके जो नागपुरी आका हैं उनको भी वर्षो पढ़ना और वर्जिश करना पडेगा इस बाज़ के पंख काटने में..
और हां.त्यागी जी अब नागपुरी नाली में घुसे रहोगे तो पूँछ क्या सब सीधा रहेगा...
हाँ एक दोस्त ने तुम लोगों की बदतमीजी के बारे में बताया तो आना पडा
अब चाहे जीतनी गंद फैलाकर उसमे लोटो मई डिस्टर्ब करने नही आउंगा...
चिपलूनकर जी
आपके चम्पू गण ने हमारी बात ही साबित की कि बदतमीजी और घटियापन में सबसे आगे होते हैं..
Suresh Chiplunkar ने आपकी पोस्ट " हर धर्म औरत का दुश्मन है " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:
आप मेरे ब्लॉग पर पुनः पधारे आपका शुक्रिया।
आपको "नागपुर" शब्द से कुछ खास लगाव मालूम होता है :)
आपने जिन्हें "मेरा चम्पू" कहा है, उनके द्वारा की गई टिप्पणी के लिये मैं कैसे जिम्मेदार हो सकता हूँ?
बहरहाल, जो भी है… जैसा कि आपने एक और टिप्पणी में कहा कि "मैं डिस्टर्ब करने नहीं आऊंगा…" वादा कीजिये कि वाकई नहीं आयेंगे… हमें अपनी गन्दगी में खुश रहने दीजिये, आप भी अपनी गन्दगी में खुश रहिये…। न आप मेरे विचार बदल सकते हैं न मैं आपके… काहे बहस करें…। नमस्ते कहें और अपने-अपने रास्ते पर चलते चलें… हम दोनों का मकसद तो एक ही है "अपने विचारों का प्रचार करना…" आप भी कीजिये, हम भी करेंगे…। मेरी कोशिश भी यही रहेगी कि इधर न आऊँ…। यही सबसे बढ़िया उपाय है…। यदि मैंने अपनी टिप्पणी में कभी गालीगलौज का उपयोग किया हो तो माफ़ी चाहूँगा… बाकियों
के लिये वे जानें।
suresh jii
aapke liye maine kisii galat baat kaa istemaal nahii kiyaa na karungaa. nagpur se aapko aur mujhe dono ko lagav hai..dishaa alag alag hai.
par jin logon ne kuttaa aur chidiya banaaya mujhe unakaa javab denaa zaroorii thaa
vichar ka bhed hotaa hai...aapne mere liye galat nahii kahaa to maine bhii nahii kiyaa...is roop me aapse mujhe koii shikayat nahii..matbhed aur manbhed me antar hota hai...ab aapki merii kya dushmani? kuch bura laga to aapse vyktigat maafii
raha aana jana to rashta khula rakhiye
इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन (EVM) की असलियत ?
पुरे विश्व में कही भी इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन का प्रयोग नहीं किया जाता है
तो फिर भारत में ही इसे विदेशियों के दबाव में क्यों प्रयोग किया जाता है.
जानिए कारण और फायदे.....
१- इलेक्ट्रोनिक वोटिंग मशीन किसी चीन की बनी मोबाइल से आसान और उसमे कुछ भी
किया ज़ा सकता है.
२-इसमे ऐसे प्रोग्राम किये ज़ा सकते है की वोट चाहे जिसे देंगे उसका एक
निश्चित प्रतिशत जैसे ३५% ५०% या २०% किसी एक चुनाव चिन्ह के खाते में दर्ज
किया ज़ा सकता है और यही खासियत इस मशीन की प्रमुख उपयोगिता है जिस पर हर तरफ
से उंगली उठाई ज़ा रही है और बात को उजागर करने वाला इंजिनियर अभी भी जेल में
है.
३- इस मशीन में एक चावल के दाने के बराबर के मशीन यदि बाहर ही चिपका दी जाये
तो इसे अमेरिका में बैठे बैठे संचालित किया ज़ा सकता है और किसी भी
प्रत्यासी को जिताया ज़ा सकता है. चिदंबरम का केस अभी भी नहीं सुलझ पाया है.
४-इस मशीन के प्रोग्राम हंकओंग से आता है जब की भारत में बहुत सारे सॉफ्टवेर
इंजिनियर है क्यों और खुद हंग कांग और अमेरिका वोटिंग मशीन का प्रयोग नहीं
करते है क्यों की उन्हें मालूम है की इसमे अप्रत्याशित हेर फेर किया ज़ा सकता
है और इसी मशीन के सहारे चिदंबरम ने कहा था की कांग्रेस अभी १० साल और सत्ता
में रहेगी.
५- मत पत्र से वोटिंग करने पर इसे १० बार गिना ज़ा सकता है मशीन में एक बार
डाटा बना दिया जाने से कोई नहीं जान पायेगा की उसका वोट कहा है, किसे वास्तव
में कितना वोट मिला था. डाटा ट्रांसफर करते समय भी इसमे ऐसे हेरा फेरी की ज़ा
सकती है की उसे चलाने वाला प्राइमरी का मास्टर क्या जान पायेगा की इसमे क्या
घपला किया गया है.
बीजेपी इसका पुरजोर विरोध कर रही है पर मिडिया और चुनाव योग इसको महत्व नहीं दे रही .
इसमे नुकसान उस जनता को है जो राष्ट्रवादी नेता नहीं चुन पा रही है.
परचा और डब्बा वाला मतदान सबसे विश्वशनीय मतदान था जो की भारत छोड़ कर पुरे
विश्व में जारी है.
यह इसलिए की भारत में ऐसे लोगो को बिठाया ज़ा सके जो अमेरिका और यूरोप
परस्त हो जिससे भारत के लोगो को गुलामी में रखकर इनका खून चूसा ज़ा सके, जैसे
की अभी अभी ऍफ़ डी आई यानि पुनः गुलामी लाने की तैयारी है. विदेशी लोग नेता
के स्तर पर, जासूसी के स्तर पर, मिडिया के स्तर पर, विज्ञापन के स्तर पर,
कंपनियों के स्तर पर , एन जी ओ के स्तर पर, शिक्षा के स्तर पर सक्रिय
होकर भारत की जनता को गुमराह करते रहते है और मेहनत कश भारतीयों का खून
चूसते रहते है जिसमे कांग्रेस भी अपना हिस्सा पा लेती है.....
bharat ko is mashin ki kya sach me jarurat hai kya?
desh me itane sushikshit berojgar yuvak hai ki unko is kam par lagaya jay to desh ka vikas hi hoga aur berojgari kam hone me kuch pratishat madat milegi aur hona wala kharcha kam hoga
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