Wednesday, May 27, 2009

करकरे, विनायक सेन, साध्वी प्रज्ञा, शहीद जवान – एक माइक्रो पोस्ट…

नईदुनिया अखबार (27 मई) में प्रकाशित समाचार के अनुसार मुम्बई हमले के शहीद हेमन्त करकरे की पत्नी ने बताया है कि उन्हें रुपये 15,000/- का करकरे के “अन्तिम संस्कार का बिल”(???) दिया गया है। इसी प्रकार परिजनों को 25 लाख रुपये देने की घोषणा हुई थी जिसमें से अब तक सिर्फ़ 10 लाख रुपये ही मिले हैं। उधर कसाब को सुरक्षा प्रदान करने और अदालती कार्रवाई के लिये करोड़ों रुपये अब तक खर्च हो चुके हैं। अब चूंकि कसाब तो “देश का जमाई” है इसलिये उसे तो कोई “बिल” थमा नहीं सकता।

एक और महान क्रांतिकारी “विनायक सेन” भी रिहा हो गये हैं, उनके लिये कई बड़े-बड़े लोगों ने प्रार्थनायें कीं, मोमबत्तियाँ जलाई, गीत गाये, हस्ताक्षर अभियान चलाये… कहने का मतलब ये कि विनायक सेन बहुत-बहुत महान व्यक्ति हैं। साध्वी प्रज्ञा के लिये महिला आयोग सहित किसी ने भी ऐसा कुछ नहीं किया, क्योंकि वे कीड़ा-मकोड़ा हैं। विनायक सेन की रिहाई की खुशियाँ मनाई जा रही हैं, इसे “जीत” के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है… उधर नक्सली हमलों में रोज-ब-रोज हमारे आर्थिक रूप से गरीब जवान मारे जा रहे हैं, किसी-किसी के तो शव भी नहीं मिलते और जब अफ़सर ग्रेड वाले करकरे की पत्नी के यह हाल हैं तो बेचारे छोटे-मोटे जवानों के परिवारों के क्या हाल होते होंगे…

अरे… ये आप भी किन खयालों में खो गये भाई… मैं तो इस प्रकार के अनर्गल प्रलाप जब-तब करता ही रहता हूँ… आप तो कांग्रेस की जय बोलिये, राहुल बाबा के नेतृत्व के गुण गाईये, प्रियंका की मुस्कान पर फ़िदा होईये, भाजपा को साम्प्रदायिक कहकर कोसिये, अफ़ज़ल की फ़ाँसी के बारे में चिदम्बरम के मासूम बयान सुनिये… आर्थिक तरक्की के सपने देखिये, सेंसेक्स के बूम की कल्पना करते रहिये, संघियों के “राष्ट्रवाद” को बकवास कहिये…।

कहाँ इन शहीदों और जवानों के परिवारों के चक्करों में पड़ते हैं… मेरा क्या है, मेरे जैसे “पागल” तो चिल्लाते ही रहते हैं…

26 comments:

पंगेबाज said...

खबर गलत छप गई होगी २५ लाख देने को कहा था दस दे दिये पंद्रह लाख का बिल अंतिम संसकार का दिया होगा तभी हिसाब बराबर होगा ना . वैसे भी काग्रेस सरकार इअनके मरने पर नाराज थी साध्वी का केस बीच मे छोड कर चले गये रायता पूरा जितना फ़ैलाना था सरकार नही फ़ैला पाई :)

Abel said...

डॉ. बिनायक सेन और साध्वी प्रज्ञा को एक ही तराज़ू में तौलना कुछ ह्ज़म नही हुआ सुरेशजी. यह तो आम और सेब की तुलना करने जैसा हुआ.

वैसे अमूमन बात आप सही करते हैं लेकिन बी जे पी और संघ को बीच में घसीट कर बात का रस निकल जाता है.

भाजपा को आत्म परीक्षण करने दीजिये और आप डॉ. बिनायक सेन को साध्वी प्रज्ञा की बनिस्पत गूगल पर तौलिये.

संजय बेंगाणी said...

हमें तो अपने पागलपन से प्रेम है. यूँ ही प्रलाप करते रहेंगे....


मगर मुझे शिकायत से ज्यादा घटनाओं से सीखने की बात पसन्द है.

जैसे एन.डी.टी.वी. के कर्म सरहाने लायक नहीं, मगर राष्ट्रवादियों के पास ऐसा चैनल क्यों नहीं, किसने रोका है?

नक्सलियों के लिए रोने वाली जमात है, वैसी है हमारी क्यों नहीं?

Suresh Chiplunkar said...

@ एबल जी - मैं तो पहले ही अर्ज़ कर चुका हूँ कि विनायक सेन के सामने साध्वी प्रज्ञा की औकात कुछ भी नहीं है… लेकिन पोस्ट का असल मकसद जवानों और शहीदों के बारे में है…
@ बेंगाणी जी - हिन्दुओं के लिये रोने वाली जमात तो है, लेकिन संगठित नहीं है और जिनकी यह जिम्मेदारी है उन्हें "सेकुलरिज़्म" का वायरस धीरे-धीरे खत्म कर रहा है…। चैनल वाली बात में दम है।

Shastri said...

"मैं तो इस प्रकार के अनर्गल प्रलाप जब-तब करता ही रहता हूँ…"

मेरी कामना है कि यह "अनर्गल" प्रलाप चलता रहे. देख का कुछ तो फायदा होगा.

हां, आप राजनीति (कांग्रेस, बीजेपी) आदि को बीच में न लायें तो बेहतर है क्योंकि ऐसा किये बिना भी ये बातें लिखी जा सकती हैं.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info

mahashakti said...

बहुत ही निन्‍दनीय कृत्‍य है

sanjay patel said...

शहीद हमारे लिये पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी का टाइम पास आयटम हैं. दर असल शहादत, देशप्रेम,और राष्ट्र स्वाभिमान पर सारी चर्चाएँ हमारे ड्राइंगरूम्स तक महदूद रह जातीं हैं...सड़क पर आकर बात करने को कहिये ...सब बिखर लेंगे.

हिन्दूत्व को अपना चेहरा मानवीय बनाने की ज़रूरत भी है. कई ऐसे प्रकल्प हो सकते हैं जिसके ज़रिये हिन्दूवादी संगठन युवाओं को रचनात्मकता की ओर रूपांतरित कर सकते हैं लेकिन ऐसा होता नहीं और सब बिखर जाते हैं.क्या सिर्फ़ पराक्रम दिखने या बाहुबल दिखाने के लिये ही हिन्दूत्व होना चाहिये.विषय ज़रा लम्बा हो जाएगा...इसलिये यहाँ बात खत्म करता हूँ.

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

AGAIN KUTARKA (कुतर्क)

अंशुमाली रस्तोगी said...

नहीं सुरेशजी आपका प्रलाप अनर्गल नहीं है। आपने बड़ा ही महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। इस पर हमें सिर्फ बौद्धिक सोच से नहीं, बल्कि जमीनी हकीकत पर आकर शहीद करकरे के परिवार के लिए कुछ न कुछ करना पड़ेगा।
नक्सलवाद हमारे सामने बड़ी समस्या के रूप में खड़ा है। हैं हमारे बीच कुछ महान प्रगतिशील जो इसे हवा दे रहे हैं। जबकि नक्सलवाद गरीब ही नहीं, इस देश के लिए गहरी चोट है।

राजीव रंजन प्रसाद said...

सुरेश जी इस बात के लिये धन्यवाद कि आपने महत्वपूर्ण मुद्दा उठाया है। हम अपने शहीदों को और उनके परिवारों को तो अपमानित करते हैं लेकिन अफ़जलों और कसाबों को पालते हैं।

साध्वी प्रज्ञा और विनायक सेन एक बात से एक तराजू में तौले जा सकते हैं कि आतंकवाद और नक्सलवाद दोनों एक ही शब्द के पर्यायवाची हैं। नक्सलियों को इस देश के तथाकथित बुद्धिजीवियो (लाल छाप) का समर्थन हासिल है। यह लॉबी इतनी मजबूत है कि हमारा साहित्य और मीडिया दोनों ही इनकी चौखट पर गिरवी हैं। लाल सार्टिफिकेट के बिना न तो कोई "महान" लेखक कहला सकता है न ही "महान" पत्रकार। लाल सार्टिफिकेट ले कर ही अरंधुती टाईप समाजसेवक पैदा होते हैं और नक्सलियों के मानवाधिकार की लडाई लडते हैं। आदिवासियों के कोई मानव अधिकार नहीं होते क्या? उनकी आवाज कौन है? रोज मेरे बस्तर में हजारो नक्सल आतंक के पीडित आदिम या मारे जा रहे हैं या विस्थापित हैं लेकिन उनके लिये न तो कोई कम्बख्त लेखक लिखने को तैयार है न कोई समाजसेवक आवाज उठाने को।

हम आतंकवाद से कभी जीत नहीं सकते क्योंकि हमारे पास विनायक सेन के लिये अगल मापदंड हैं और प्रज्ञा के लिये अलग। एक को जमानत मिलेगी तो हीरो बन कर जीत का निशान बना कर निकलेगा। और दूसरे को मिलेगी तो हाय तौबा मच जायेगी। जैसे जमानत मिलने का अर्थ बेदाग बरी हो जाना है.....?????

रंजना said...

ये प्रलाप या अनर्गल कतई नहीं है....

चलिए कोई तो है जो निर्भीक होकर आवाज उठा रहा है....और कुछ न कर सकते तो कम से कम आपकी आवाज से आवाज तो मिला ही सकते हैं.

Ravi Singh said...

विनायक सेन जैसे देशद्रोही आतंक के पैरोकारों की साध्वी प्रज्ञा से तुलना कतई नाजायज है, मेरी भी आपत्ति नोट कीजिये

विनायक सेन अभी बेल पर छूटा है, रिहा नहीं हुआ है, बेल पर भी यह सिर्फ इसलिये छूटा है क्योंकि मानवधिक्कारवादी अपनी छाती कूट मचा रहे थे

ravi said...

सुरेश जी , मै आपसे कुछ कहना चाहता हूँ जो लिख रहा हूँ . आशा है आप अन्यथा नहीं लेंगे .

१- अगर सो कॉल्ड सेकुलर लोग मीडिया चला रहे हैं तो राष्ट्रवादियों को किसने रोक रखा है . हमेश इसी मीडिया को दोष देते हैं लेकिन अपना मीडिया संगठन खडा नहीं करतें हैं . आज-कल का समाज मीडिया से ही सोंचता है , उसे जो बात लगातार दिखाई जायेगी , वो उसी को सत्य मानने लगता है . इसी लिए अ़ब राष्ट्रवादियों को भी आपनी बात रखने और लोगो को सुनाने की लिए मीडिया सुरु करना चाहिए . नहीं तो एक दिन ऐसा आएगा जब लोग सत्य को जान भी नहीं पाएंगे . राष्ट्रवादियों को भी आपनी बात जोर शोर से मीडिया और समाचार में रखनी चाहिए . तभी लोग सचाई जान पायेंगे और इनकी बात को सुनेगे .

२-दूसरी बात , जमीनी स्तर पर काम करना चहिये ना की एलिट क्लास के लिए . आप इस चुनाव में उठे हुए मुद्दों की बात करिए तो पाएंगे की जमीनी स्तर के मुद्दों को बीजेपी ने नहीं उठाया है .
इस देश में रोटी , कपडा , मकान , सुरक्षा , एजूकेशन और हैल्थ सर्विसेस जैसे बहुत से आम लोगो के मुद्दे हैं लेकिन यह तो हमेशा कमजोर प्रधानमन्त्री की बात चिल्लाते रहे . अगर आम आदमी का वोट चाहिए तो फिर आम आदमी से जुड़े मुद्दों को उठाना ही होगा .

३-तीसरी बात , अपने संगठन को मजबूत करना होगा और सबसे जरूरी है की गुटबाजी को ख़त्म करें . आप देखिये , चुनाव से ठीक पहले अरुण जेतली और राजनाथ सिंह आपस में लड़ रहे थे तो चुनाव परिणाम आने के बाद मुरली मनोहर जोशी मीडिया में इधर-उधर की बात कर रहे थे . कोइ किसी की बात को सुन ही नहीं रहा है और पूरी पार्टी गुटबाजी की बुरी तरह शिकार है .

४-चोथी बात , अ़ब बीजेपी को भी पढ़े लिखे युवा लोगो को जमीनी स्तर पर आगे बढाना चाहिए . नए और युवा लोगो को पार्टी से जोड़ना चाहिए तभी भविष में कुछ आगे जा सकते हैं नहीं तो भविष्य में अंधकार ही दिख रहा है .

कमेन्ट बहुत लम्बा हो रहा है , इसके लिए माफ़ी चाहता हूँ . आशा है की आप कभी इन् मुद्दों पर भी कुछ लिखेंगे .

GJ said...

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प्रदीप कुमार said...

सुरेश जी, सुबह मैंने नई दुनिया में यह खबर पढी थी। मुझे लगता है नई दुनिया को यह खबर पहले पन्ने पर लगानी चाहिए थी। एक पत्रकार के नाते अगर खबर मेरे पास होती तो मेरा डीसिजन यही होता। खैर उससे बडी बात यह है कि करकरे की पत्नी के साथ जो व्यवहार किया गया अनुचित है। सरकार को इसे नोटिस में लेकर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करनी चाहिए। देश की जनता ने कांग्रेस को दोबारा मौका दिया है उन्हें भी जनता की अपेक्षा पर खरे उतरना चाहिए। जब पीएम साहब को आस्ट्रेलिया में पकडे गए एक संदिग्ध की मां का रोना सुनकर रातभर नींद नहीं आती तो यह खबर जानने सुनने के बाद वे कैसे चुप हैं....?
.....अरे मैं तो भूल गया, शहीद तो इस देश में सिर्फ गांधी (नेहरू-इंदिरा-फिरोज) परिवार के लोग हुए है। बाकी तो सब मारे गए हैं। तभी तो सावरकर को सलाम करने में नानी मरती है और नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम लेने झिझकते हैं। खैर लिस्ट बहुत लंबी है।

Baba said...

Sureshji pahale main aapaka Ghisa Pura Read karta tha... Fir Pahali 4 ine Read karata hoon, Chhod deta hoon.... aap kisi bhi subject par likhe, kisi bhi Ghatna par likhe... Usame Congress, Soniya Gandhi Jarur aate hai... aap Apani Personnal Bhadas Usame Lekh main kyon Dalte ho.... aapaka GHISA huaa Max. Article main congress, Soniya Gandhi, Rahul Gandhi...aa hi jata hai... Jara Is bare main Sochiye... jo log Comments main apaki Tarif kar rahe hai.... vo Sab Chaplusi kar rahe hai....taki aap bhi Unake blog par Ek BEst Comment de maro...

प्रशांत said...

सुरेश जी , बात सही है पर हम क्या कर रहे है , हर रोज हिंदुस्तान मे शहीदों , आम आदमी के मानवाधिकारो की नहीं आतंकवादियो , नक्सलवादियों के अधिकारों की बात की जाती है . विषय ये हो कि हिंदुस्तान मे हिन्दुस्तानी को , अधिकार कैसै दिलाया जाये

Deshabhakta said...

प्रज्ञा जी और पुरोहित जी अभी ब्लाग मात्र में हीं दिखते हैं :( अभी ए फिरंगी सरकार पता नहीं और क्या क्या जुल्म करेगी उनके ऊपर!

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

बिकाऊ और प्रतिबद्ध चौथे खम्भे के इस दौर में सच उजागर करना यदि प्रलाप है तो भी जनहित में जारी रहना चाहिये। प्रचार के इस युग में ‘मार्क्स-सम्प्रदाय’ जिसका अधिकांश मीड़िया पर कब्ज़ा है, सुनियोजित तरीके से ब्लाग जैसे मंच को भी एकाधिकार मे रखना चाहता है। अतः अपनें दायित्व को समझते हुए ऎसे ही लिखते रहिये।

विनोद कुमार पांडेय said...

सियासत के लोग ऐसे ही होते है
बहुत अच्छा कटाक्ष,
पर सुधरेंगे ये कहना मुश्किल है.

दर्द भरा है, उन लम्हो मे,उनको कोई होश नही,
कितनो के घर उजड़ चुके है,पर उनको अफ़सोस नही,
रंग सियासत का मत पूछो,गिरगिट भी शरमा जाए,
बातों मे ये राजा है,पर कुछ करने का जोश नही.

Anil Pusadkar said...

ये पगला है समझाने से समझे ना।

सही है।विनायक सेन के सारी दुनिया के मानवाधिकार वादी लगे थे।इस गरीबो के मसीहा के इतने अमीर हमदर्द आये कंहा से ये भी पता लगाना चाहिये।

Pak Hindustani said...

डा. विनायक सेन बहुत ही जबर्दस्त आदमी है, ये नक्सलियों का सुंदर, सौम्य, लक्स से धुलाया हुआ चेहरा हैं इन्हें पेश करके बड़े-बड़े गुनाहों पर पर्दा डाला जा सकता है. विनायक सेन बच्चों के डाक्टर भी हैं, एक्टिविस्ट भी हैं और निहिलिस्ट भी. जय हो इनकी, अभी रिहा हुये हैं, कारनामे फिर शुरु होंगे. यकीनन अगली बार और तगड़े सबूतों के साथ पकड़े जायेंगे और लंबे नपेंगे.

Kashif Arif said...

सुरेश जी, मै आपकी बात से पुरी तरह सहमत हू, करकरे जी, की पत्नी के साथ जो हुआ वो हमारे देश के हर श्हीद सिपाही के घर वालो के साथ होता आया है, कोई नई बात नही है...

चाहे वो कोई भी सरकार हो, सब यही करते है..

सुरेश जी, क्या आप भाजपा के सद्स्य है क्या? क्यौकीं आप की कोई भी बात भाजपा, सघं की तारिफ और कौगंर्स की बुराई करे बगैर पुरी नही होती है,

सिर्फ़ राष्त्र्ध्र्म कि बात कह्ने से कुछ नही होता, राष्ट्ध्र्म सिर्फ़ हिन्दुऒ के हित कि बात करने से नही होता इस राष्ट मे जीतने ध्रर्म के लोग रेह्ते है उन सब के हित कि बात आप करें तो आप राष्टहित कि बात कर रहें हैं.

प्रशांत said...

कासिफ जी , बिलकुल सही कहा ये देश केवल हिन्दुओ का नहीं है , ये देश है उन सबका जो इस देश को अपने धर्म , जाती या किसी और मुद्दे से पहले मानते है , ये देश है उन लोगो का जो इस देश की हजारो साल पुरानी सभ्यता के वारिस है , ये देश है उन सबका जो कश्मीर से कन्याकुमारी तक की भूमि को माँ का आँचल मानते है , अब ये लोग हिन्दू हो ,मुस्लिम हो , इसाई हो या और किसी धर्म के ये देश उन सब का है

cmpershad said...

करकरे के साथ अब तो अंतुले भी शहीद हुए ना!!!:)

Dikshit Ajay K said...

आज के बाद अगर तुम ने कसाव को "देश का दामाद" लिखा तो मैं तुम पर अपनी भावनाओं को ठेस पहुँचने का केस कर दूंगा,


अगर तुम उसे सोनिया जी का, कांग्रेस का या पाकिस्तान का दामाद लिखो तो कम से कम मुझे कोई एतराज नहीं होगा.