हारना वाकई दुखद है, लेकिन सच्चाई स्वीकार करो और पुनः काम में जुट जाओ… BJP Defeat, UPA wins, Election Assessment
आखिर लोकसभा के बहुप्रतीक्षित नतीजे आ ही गये, और अनपेक्षित रूप से कांग्रेसनीत यूपीए लगभग बहुमत में आ चुका है और भाजपानीत एनडीए को जनता ने नकार दिया है। यह पोस्ट लिखते समय (सुबह 11.30 बजे) हालांकि नतीजे पूरे नहीं आये, लेकिन तात्कालिक विश्लेषण करने के लिये रुझान ही पर्याप्त हैं।
कांग्रेस का मानना है नतीजे आश्चर्यजनक रहे हैं, यही हाल भाजपा का भी है। किसी ने भी नहीं सोचा था कि इतनी महंगाई (आम आदमी के रोज़मर्रा के जीवन को छूने वाला एक मुद्दा) तथा भयानक आतंकवाद (“एलीट क्लास” का मुद्दा) जैसे मुद्दों के बावजूद जनता कांग्रेस-यूपीए को जितायेगी, लेकिन यह हुआ। क्यों हुआ, कैसे हुआ इसको लेकर माथापच्ची तो अगले 5 साल तक चलती ही रहेगी।
यदि सरसरी तौर पर विश्लेषण किया जाये तो भाजपा की हार के कुछ कारण दिखाई देते हैं, वे इस प्रकार हैं –
1) लालकृष्ण आडवाणी की स्वीकार्यता जनता में नहीं होना,
2) कम वोटिंग प्रतिशत, तथा
3) मीडिया का एकतरफ़ा सतत चलने वाला भाजपा-विरोधी अभियान।
1) आडवाणी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाना शायद एक गलत कदम था, उनकी बजाय नरेन्द्र मोदी या सुषमा स्वराज को यदि ठीक से “मार्केटिंग” करके मैदान में उतारा जाता तो युवा वोटर का रुझान भाजपा को अधिक मिलता। सुषमा स्वराज को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाने से महिलाओं के वोट लेने में भी आसानी हो सकती थी, क्योंकि उनकी “इमेज” साफ़-सुथरी और एक परम्परागत भारतीय स्त्री वाली है, इसी प्रकार नरेन्द्र मोदी को गुजरात के विकास का चित्र सामने रखकर उन पर दाँव खेला जा सकता था।
2) कम वोटिंग प्रतिशत – जो वर्ग सबसे अधिक सरकार की आलोचना करता है, अखबारों में, टीवी पर, ड्राइंग रूम में उसी वर्ग ने भीषण गर्मी के चलते मतदान में सबसे कम हिस्सा लिया। सारे देश का प्रतिशत देखा जाये तो कुल 41% प्रतिशत मतदान हुआ, इसका अर्थ यह है कि बाकी के 49% लोग “पप्पू” बने (जानबूझकर बने)। एक आम मतदाता ने तो अपना वोट बराबर डाला, लेकिन मध्यम वर्ग और उच्च मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा पप्पू बना, इसके चलते भाजपा का परम्परागत वोटबैंक घर में (एसी की ठण्डी हवा में) ही बैठा रहा, नतीजा सबसे सामने है। इस 41% वोटिंग का एक मतलब यह भी है कि देश पर ऐसी पार्टी शासन करेगी जिसे असल में देश के सिर्फ़ 22% लोग चाहते हैं।
3) मीडिया की भूमिका – जैसा कि पहले भी कई बार कहा गया है देश में मीडिया पूरी तरह से भाजपा-विरोधी मानसिकता लिये हुए है और भाजपा के विरोध में जहर उगलने के लिये तैयार बैठा रहता है। मीडिया ने हर समय, प्रतिदिन चौबीसों घण्टे भाजपा की नकारात्मक छवि पेश की। भले ही पढ़े-लिखे वर्ग पर मीडिया का असर कम होता है, लेकिन रोज-ब-रोज़ टीवी पर सोनिया-राहुल-कांग्रेस का गुणगान देख-देखकर जनता के मन में कहीं न कहीं तो “सॉफ़्ट कॉर्नर” बन ही जाता है, लेकिन आश्चर्य यह है कि इतनी भीषण महंगाई के बावजूद देश की जनता ने कांग्रेस को कैसे चुना? आखिर क्या सोच रही होगी मतदाता के मन में?
बहरहाल, पोस्ट खत्म होते-होते (दोपहर 1 बजे) लगभग स्थिति साफ़ हो चुकी है कि यूपीए ही सरकार बनायेगा। इस सारे झमेले में सिर्फ़ एक बात ही सकारात्मक हुई है वह ये कि अब आगामी सरकार पर “वामपंथी” नामक ढोंग का काला साया नहीं रहेगा और शायद मनमोहन सिंह और खुलकर काम कर पायेंगे। भाजपा में भी अब आत्ममंथन का दौर चलेगा और यदि आडवाणी अपने शब्दों पर खरे उतरते हैं तो उन्हें सन्यास ले लेना चाहिये। लेकिन इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि भाजपा-संघ-हिन्दुत्ववादी कार्यकर्ताओं को हतबल होकर बैठ जाना चाहिये। निराशा है, उदासी है लेकिन ऐसा तो लोकतन्त्र में होता ही रहता है।
माना कि “हिन्दुओं” को एकत्र करने, उनमें “राष्ट्रवाद” जगाने, देश को इस्लामीकरण के खतरे समझाने, अफ़ज़ल-कसाब को पार्टी मनाने देने, “मिशनरी” के बढ़ते वर्चस्व को समझाने में हम नाकाम रहे। क्या कांग्रेस को सत्ता मिल जाने से देश के समक्ष उपस्थित समस्याओं का समाधान हो गया है? क्या हिन्दुओं और हिन्दुत्व के चारो ओर मंडरा रहे संकेत मद्धिम हो गये, हरगिज़ नहीं। आज जनता इस बात को समझने में नाकाम रही है, तो हमारा यह कर्तव्य है कि उसे समझाने का प्रयास लगातार करते रहें…
“रुके न तू… थके न तू…” की तर्ज पर हमें फ़िर से उठ खड़े होना है, निराश-हताश होने से काम नहीं चलेगा… अभी बहुत काम बाकी है, यह तो सिर्फ़ एक पड़ाव है और ऐसी ठोकरें तो लगती ही रहती हैं… आखिर 1984 में 400 से अधिक सीटों पर जीतने वाली कांग्रेस को 140 तक ले ही आये थे, और 1984 में हम 2 थे और फ़िर 189 तक पहुँचे भी थे, तो फ़िर घबराना कैसा? यह उतार-चढ़ाव तो आते ही रहेंगे… लक्ष्य पर निगाह रखो और पुनः उठ खड़े हो, चलो…



55 comments:
क्या कहु, दिल को एक बड़ी निराशा लगी की देश की जनता सोती तो है ही साथ में ऐसे लोगो को जिम्मा देती है जो इस देश को अन्दर-२ ही अन्दर खोखला कर रहे है| आपकी ब्लॉग पढ़ कर के मेरे मन में भी राष्ट्रवाद पुनः प्रबल हुआ है अतः जो आज हुआ उसका एक गहरा दर्द उठ रहा था| तभी मन किया की आपकी ब्लॉग देखू, तो आपका लेख मिला और जो एक दर्द था उसमे से अप्पने पुनः उत्साह का प्रवाह किया|
एक बात जो अच्छी लगी वो थी पासवान एवं लालू को बिहार की जनता ने सबक सिखा दिया |
कोटिशः धन्याद जोश और उत्साह के शब्दों के लिए
- श्याम
भाजपा न हो गई कोलकाता नाईट राईडर, सिर्फ करबो, लडबो और न जीतबो पर चल रहे है।
कही बहुत बड़ी कमी रही उसे खोजना ही नही दूर करना भी होगा जैसे कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में किया है। 10 से 20 सीट पहुँचना आसान बात नही है, वो भी बिना गठबन्धन के, मुस्लिम वोट भी काग्रेस के साथ गये जहाँ वे जीत रहे थे।
असल में बात जाति धर्म से ज़रा ऊंचे स्तर की है जिसे दुर्भाग्य से आप और बी जे पी देख कर भी अनदेखा कर रहे हैं. खाली पेट आदर्श की बातें नहीं की जाती. मजबूत नेता और निर्णायक सरकार जैसे नारों से आम आदमी को कोई लेना देना नहीं है. उसे चाहिये रोटी और सुरक्षा. बी जे पी में सक्षम टीम का सब से बडा अभाव था. हर बात में सुई आकर आडवाणी जी पर आकर अटक जाती थी मानो चुनाव जीतने से ज़्यादा उनकी स्वीकार्यता सिद्ध करना ही हर प्रवक्ता मुख्य मकसद था. याद रहे बी जे पी के हर मुद्दे और आरोप को जनता ने सिरे से खारिज कर दिया है. अब उम्मीद है की बी जे पी दकियानूसी मुद्दों से उठकर एक सशक्त और ज़िम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभायेगी और शायद यही अगले चुनाव में उसके सबसे ज़्यादा काम आयेगा.
सटीक विश्लेषण किया है .. आश्चर्य हो या हैरानी .. सच्चाई तो स्वीकारनी ही पडती है .. पर अब भाजपा को सशक्त और ज़िम्मेदार विपक्ष की भूमिका निभानी होगी .. ताकि अगले चुनाव में सफलता प्राप्त की जा सके .. अच्छा संदेश दिया है आपने।
सुरेश जी, बुरा न मानें। घृणा की राजनीति से दिल नहीं जीते जा सकते। बीजेपी को आत्मालोचना करनी चाहिए। आप ने तो कर ली पर राजनीति में लगे लोग क्या कर पाएंगे?
थोडा अफ़सोस इसलिए जरूर हुआ कि अधिकाँश जनता ने पिछले २-३ सालो में जो देखा, जो भोगा, उसे सब भुला दिया ! खैर, मेरा तो यह दृड़ बिस्वास है कि गुलामी के तंतु ही हम हिन्दुस्तानियों के खून में प्रचुर मात्र में मौजूद है, इसलिए हम एक दायरे से बाहर की सोच ही नहीं पाते !
लेकिन इस बात की संतुष्टी है कि हालांकि सारे खिलाड़ी यूपीये में यहाँ भी मौजूद है किन्तु कम से कम यह सरकार ५ साल तक trouble free रहेगी क्योंकि माया,जयललिता और कामरेड की घिघी बंद हो गयी है और लालू, पासवान की भी नहीं चलेगी साथ ही ममता भी इसी ढर्रे पर विधानसभा के चुनाव पर नजर गदयेगी इसलिए वह भी दिक्कत पेश नाहीए करेगी !
रही बात बीजेपी की तो पहली बात तो यह है कि इनको अपना सन्घतनात्मक ढांचा सुधारना होगा साथ ही इन्हें सभी ५४२ सीटो के लिए अभी से एक-एक कर प्रत्याशी ढूँढने होंगे जो इमानदार हो और स्थानीय जनता में पैठ रखते हो , क्योंकि इन क्षत्रीय डालो के भरोसे नहीं रहना चाहिए, ये एक दिन देश को बर्बाद करके छोडेंगे! अतः इन्हें अभी से एक युवा नेता की अग्वाने में अगले चुनाव की तयारी करनी होगी ! और सबसे प्रमुख बात यह ध्यान में रखनी होगी कि इनके सभी नेता अनुसाषित रहे , जोकरों की तरह जहां जो मुह में आया नहीं बोलेंगे ! अगर कही कोई आधिकारिक बयां देना है तो पहले उस बयान को एक कमेटी प्रमाणित करे!
वह पथ क्या पथिक कि सफलता क्या जिस पथ पर विखरे शुल ना हो|
नाविक की धैर्य परीक्षा क्या जव धारा ही प्रतिकुल ना हो।
Bahut sahi kaha aapne....sateek vishleshan kiya hai...
I agreed that BJP got this defeat due to lack of strong Prime minstrial candidate.
Now BJP should start searching for new candidates with full enthusiasm.
They should realise that 75% population of this country is not thinking about the nation,Hinduism they are only focussing on local issues and vote for their caste.
This is my request to BJP please chose strong local candidate from each constituency.
(As in my area BJP candidate was from my town but still we never met him before elections so how this type of candidates can win?)
Surely we will get success in next elections.
Jai Sri Ram
आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती थी.....आडवाणी एक चूके हुये नेता थे....देश की जनता तो दूर खुद पार्टी कार्यकर्ताओं का उनमें विश्वास नहीं था....एक नेता के तौर पर लोगों के दिलों और दिमाग को थिरकाने की उनकी काबिलियत समाप्त हो गई थी। न दो वह हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और न ही सेक्यूलरिज्म का....फिर वोट कहां से मिलता....पार्टी पर व्यक्तित्व को हावी कर दिया गया था.....अब विपक्ष का नेता बनने की मोह से उन्हें बाहर आना होगा.....विपक्ष की फिल्डिंग और बैटिंग भी मजबूत हाथ में होना चाहिये......
आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती थी.....आडवाणी एक चूके हुये नेता थे....देश की जनता तो दूर खुद पार्टी कार्यकर्ताओं का उनमें विश्वास नहीं था....एक नेता के तौर पर लोगों के दिलों और दिमाग को थिरकाने की उनकी काबिलियत समाप्त हो गई थी। न दो वह हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और न ही सेक्यूलरिज्म का....फिर वोट कहां से मिलता....पार्टी पर व्यक्तित्व को हावी कर दिया गया था.....अब विपक्ष का नेता बनने की मोह से उन्हें बाहर आना होगा.....विपक्ष की फिल्डिंग और बैटिंग भी मजबूत हाथ में होना चाहिये......
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आडवाणी को प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत करना भाजपा की सबसे बड़ी रणनीतिक गलती थी.....आडवाणी एक चूके हुये नेता थे....देश की जनता तो दूर खुद पार्टी कार्यकर्ताओं का उनमें विश्वास नहीं था....एक नेता के तौर पर लोगों के दिलों और दिमाग को थिरकाने की उनकी काबिलियत समाप्त हो गई थी। न दो वह हिन्दुत्व का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और न ही सेक्यूलरिज्म का....फिर वोट कहां से मिलता....पार्टी पर व्यक्तित्व को हावी कर दिया गया था.....अब विपक्ष का नेता बनने की मोह से उन्हें बाहर आना होगा.....विपक्ष की फिल्डिंग और बैटिंग भी मजबूत हाथ में होना चाहिये......
मैं सोंचता हूँ की आज की तारीख में मनमोहन सिंह जी से अच्छा प्रधान मंत्री भारत को नहीं मिल सकता. खास कर के इस आर्थिक मंदी के दौर में. ऊपर से छोटे दलों का जितना कम दबाव होगा, वो उतने अच्छे से काम कर सकते हैं.
इसलीये मेरा तो यही मानना है, की ये जनादेश ऊचित और सही है.
सुरेश जी, सबसे पहले मेरा सादर प्रणाम स्वीकारे, मैं काफी दिनों से आपके द्वारा लिखी हुई पोस्ट पड़ रहा हूँ, पर एक बात समझ नहीं आती की आप लिख क्यूँ रहे है, अगर लिख रहे है तो आप मुर्दों को जगाने की कोशिश क्यूँ कर रहे है, अगर सोये हुए को जगाओ तो ठीक है पर.......
मुझे आपसे सुहानुभूति है और आज आमचुनाव के परिणाम देख कर जितनी तकलीफ आपको हुई है उतना ही दर्द और तड़प मुझे भी महसूस हो रहा है.....
लेकिन ख़ुशी इस बात की है की बिहार हीं ऐसा राज्य है जहाँ शर्मनिरपेक्ष दलों की नहीं चली.....
अब मेट्रो शहरो में देखे तो मोमबत्ती संस्कृति और बड़ी बिंदी ( सूरज साइज़ ) और लिपस्टिक, क्रीम लगा कर कांग्रेस की हाय हाय करने वालों ने ही चुनावो में बीजेपी की हाय हाय कर दी..............
पर आप फ़िक्र न करे.... अपना भी वक़्त आएगा.... हिंदुत्व की खातिर चाहे कुछ भी करना पड़े.. चाहे कुछ भी को दुनिया की नज़र में अल्पसंख्यक और कायर हिन्दुओं को हम जगा कर रहेंगे I
सुरेश जी आप फ़िक्र न करे .... मैं सदैव आपके साथ हूँ .....
.... मैं चन्द्रगुप्त बनना चाहता हूँ और मुझे चाणक्य की तलाश है.....
PCG aur KUMAR DEV se poori tarah sahmat, ham log aaj bhi swatantra nahin hain, n hi ham achchha - bura dekh pate hain,इस सरकार का मतलब है कि भ्रष्टाचार को सरकारी स्वीकृति तथा हिन्दुओं को तीसरे दर्जे का नागरिक बनाने की कवायद और इसे हिन्दुओं ने भी स्वीकार लिया है. एक गुलाम कौम से उम्मीद भी क्या की जा सकती है. भाजपा को मोदी, वरुण, रूडी, सिद्धू जैसे लोगों को आगे लाना चाहिये तथा काम भी करना चाहिये और इस सबसे अधिक महत्वपूर्ण कि प्रोपेगैन्डा करना प्रारम्भ करना चाहिये.
आपका विश्लेषण एकदम सही है. अडवानी को युवा वोने अस्वीकार कर दिया. उन्हें अब संन्यास ले ही लेना चाहिए.
बाबरी मस्जिद को शहीद करने वालों का इससे भी बुरा हश्र होना चाहिए.
हालाँकि मैंने वरुण गाँधी को ही वोट किया किया. वजह कि वह युवा नेता है और ताज़े भी |
सुरेश भाई, नई फोटो........ बढ़िया है!
एक काम अच्छा हुआ की लाल झण्डो व लालू-पासवान से छूटकारा मिला. लोकतंत्र है. सत्ता इसको या उसको मिलती ही है. आज नहीं तो कल. मगर अपना प्रचारतंत्र मजबूत करना होगा. और व्याप बढ़ाना होगा.
आडवाणी को हट जाना चाहिए और नए लोगो को पार्टी सौंप देना चाहिए.
कॉंग्रेस को भी राहूल को कोई पद देकर अनुभव लेने देना चाहिए.
desh ne shaya is bahane yeh bataya hai ke use varun gandhi wala bharat pasand hai ya rahul gandhi wala!
सुरेश जी.... किसी भी जंग को जितने के लिए एक खास रणनीति की जरुरत होती है और साथ साथ जंग जितने का जज्बा भी होना चाहिए... बडबोलापन और बुडबक फौज के सहारे आप ज़ंग नहीं जीत सकते... वैसे भी बूढे शेर जंगल में सलाह देने का काम कर सकते है.. शिकार करने या शासन करे के लिए जवां खून और जज्बे की जरुरत होती है और यही गलती बीजेपी ने की एक बुजुर्ग को पहले ही प्रधानमंत्री पद का दावेदार कह कर...... फिर भी एक बात तो सत्य है.... कही न कही हम इस देश में .. पृथ्वीराज चौहाण, चन्द्रगुप्त महान, सिकंदर, नेपोलियन और उससे भी ज्यादा हिटलर जैसे तानाशाह की जरुरत है जो अल्पसंख्यक हिन्दुओं की रक्षा कर सके .........
सुरेश जी .... इन सबसे अलग मुझे इस बात की तकलीफ है की "संजय तिवारी जी" का प्रयास थम गया है .... मैं बात कर रहा हूँ विस्फोट.कॉम ( विस्फोट.कॉम ) के बारे में जो आर्थिक तंगी की वजह से बंद हो गयी है... हमें एक प्रयास कर विस्फोट.कॉम ( Visfot.com ) को एक सार्वजानिक सुचनातंत्र बनाना चाहिए..... कृपया कर ध्यान दे और इस के लिए एक आन्दोलन छेड़े.......
भाजपा को हारना जरूरी था क्योकि यह अपनी जमीन को भूल गए अपने कार्यकर्ताओ को भूल गए . नए नए चन्गुओ के चक्कर मे पुराने लोगो को भूल गए , हमारे बरेली में ६ बार से लगातार भाजपा जीत रही थी और आज कांग्रेस से हार गयी उस कांग्रेस से जिसका कोई विधायक नहीं ,कोई संगठन नहीं ,
Ak baar phir hum apne sarkar nahe bana sake kuchh aur dur ho gaya hamara sapna jise hum 200 saalon se pura hote dekhne chahte hain.
Ak baar phir hume vo nahe mil raha jo hamara hai hamare he karan.
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भाजपा का पराभव उसी दिन तय हो गया था जब महान गुटबाज और संकुचित मानसिकता का एक जातिवादी ठाकुर नेता जोड़-तोड़ से इस पार्टी का अध्यक्ष बन बैठा।
कुर्सी मिलने के बाद इसकी साफ रणनीति यह थी कि आडवाणी जी तो पके आम हैं, कभी भी टपक जाएंगे। उनके बाद पार्टी का सिरमौर बनने के लिए जो भी इनके प्रतिद्वन्द्वी हो सकते थे सबको इन्होंने एक खतरे के रूप में ही लिया। नरेन्द्र मोदी को गुजरात में सीमित करना हो, या अरुण जेतली और सुषमा स्वराज की प्रतिभा का पूरा इश्तेमाल न करना रहा हो, इन्होंने हमेशा पार्टी के ऊपर अपना परसनल एजेण्डा रखा।
यू.पी. की हालत यह है कि यहाँ का कोई भी दूसरा बड़ा नेता इन्हें पसन्द नहीं करता। केशरीनाथ त्रिपाठी, लालजी टण्डन, कलराज मिश्र, ओमप्रकाश सिंह आदि सभी इनकी असफलता से मन ही मन खुश होंगे। कल्याण सिंह तो नगाड़े बजवा ही रहें होंगे क्योंकि उन्होने अपना अलग रास्ता चुन लिया है। राजस्थान में रानी साहिबा के शाही रुतबे के हाथों पार्टी को छोड़कर वहाँ से किसी अच्छॆ नेता को पनपने न देने की सोच राजनाथ की ही है।
आडवाणी का conviction भी कई बार बदला है। इतना कि विश्वसनीयता का संकट खड़ा हो गया। हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद की नीति के ऊपर दूसरे समझौतों की मोटी धूल जमती रहती और पार्टी अपने नेताओं की आपसी गुटबन्दी का गन्दा राजनय झेलती रही। इस मरी हालत में भी देखिएगा राजनाथ किस तरह कुर्सी से चिपक कर अपना उल्लू सीधा करना चाहेंगे। मोदी का नाम आते ही किस स्तर की कलह उभर कर आएगी यह पूरा देश देखेगा। मीडिया वाले तो इसका भरपूर तमाशा बनाएंगे ही।
आडवाणी जी के योगदान को कम करके आँकना दुर्भाग्यपूर्ण है। अटलजी के साथ बिना किसी विवाद या अहं का प्रदर्शन किये, ५० वर्ष, जिस सहकारी भाव से उन्होंनें काम किया है वैसा उदाहरण किसी भी दल में नहीं मिलेगा। यदि आप हिन्दुत्व की बात करते हैं तो हिन्दू परंपरा को भी ध्यान से ओझल नहीं होंने देना चाहिये। परिवार के बड़े हमारे सम्माननीय होते हैं।
आज जो मीड़िया अटल जी के कद की तुलना में उन्हें बौना साबित करनें की चेष्टा कर रही है, हमें नही भूलना चाहिये कि उसी मीड़िया नें रंजन भट्टाचार्य की ओट में, अटलजी की प्रतिमा को कम धूल-धूसरित नहीं क्या था। मीड़िया तब भी बिकाऊ थी आज भी बिकाऊ है और आगे भी रहेगी। ताज्जुब है कि आप एक भी चैनल नहीं खरीद पाये?
जैसा आलोक नंदन और कुमारदेव जी नें कहा, आप दो नाव पर चल रहे थे। बिकी हुई मीड़िया और राजनीति के कुटिल खिलाड़ियों नें साम्प्रदायिक होंने का जो आरोप मढ़ा, भाजपा उसका शिकार हो गई। वर्तमान को सबकुछ माननें वाली जनता का एक बड़े वर्ग को, ७० हजार करोड़ के कृषि ऋण की माफी और १०० दिनी निश्चित रोजगार लुभानें के लिए काफी थे। युवाओं को भविष्य के सपनें भी महत्वपूर्ण कारक बनें।
खेल के जो नियम तय करता है वही खेल जीतता है। कांग्रेस को मालुम था कि भूख, गरीबी और बेरोजगारी से तपती जिन्दगी को कैसे खरीदकर अपनें पक्ष में लाया जा सकता है। लक्ष्य तो उसका आगे भी चन्द रईसों के साथ गलबहियाँ करनें का ही रहेगा, क्योंकि उन्हें ऎश्वर्य में जीने की आदत पड़ी हुई है। आम आदमी चाहे वह हिन्दू हो या मुसलमान उसे तो वोट ही रहना है।
भाजपा, मुसलमानों को दूसरे दर्जे का आदमी नहीं मानती इसीलिए वह अल्पसंख्यकवाद के नाम पर हिन्दुओं को भी दूसरे दर्जे का आदमी नहीं माननें देगी, यह सन्देश वह देनें में नाकाम रही है। न मुद्दे बदले हैं न ही हालात। लड़ाई हारी है मैदान नहीं, यह ध्यान में रखा जाना चाहिये।
भाजपा में भी नेता ज्यादा हो गये है, कार्यकर्ता कम। नेंताओं में आपसी सहमति के रास्ते में उनका अहम रुकावट बन रहा है। संघ या भाजपा से जो हिन्दू नहीं जुड़ा है, उसे साथ रखनें की कला का विज्ञान, उन्नत करनें की आवश्यकता है। जो हिन्दू ‘परिवार’ के सदस्य नही हैं उनके शरीर का रक्त भी लाल होता है, उनकी देश भक्ति और देश के प्रति समर्पण अगर ज्यादा नही तो कम भी नहीं होता है, यह सत्य भी ध्यान में रखना हितकर होगा। ऎसे शिक्षित, तार्किक और प्रबुद्ध युवाओं, जिनका सामाजिक दायरा भी बड़ा होता है, उन्हे जोड़ना भविष्य के लिए हितकर होगा।
चुनाव रणनीति ठीक से बनानी होगी. मीडिया को खरीदना होगा. देश को एक बार फिर ईसारो पर नाचने वाले प्रधान मंत्री को झेलना पड़ेगा. कांग्रेस वाले चुनाव लादे साम्प्रदायीकता का राग अलाप कर और चुनाव के बाद विकाश की गाथा गा रहे हैं. मीडिया वालो ने कभी भी विकास का मुद्दा नहीं उठाया किसी भी discussion में.
मुझे एक चीज का ताज्जुब हुआ कि सुरेश जी और टिप्पणीकर्ताओं ने भाजपा का तो पोस्टमार्टम कर दिया परंतु कांग्रेस के बारे में कुछ भी नहीं कहा। आखिर सत्ता में कांग्रेस थी तो जाहिर है कि उसकी गलतियों पर चर्चा होनी चाहिये थी। मंहगाई, आतंकवाद, नैनो का पलायन, सीबीआई की क्लीनचिट, सरकार का हलफनामा, काले धन का मुद्दा जब कोई असर नहीं दिखा पाया तो भाजपा के मुद्दों से भी कोई फर्क पड़ा होगा मुझे इसमें संदेह है बस वोटर ने सिर्फ वोट दिया है और कुछ चीजें उसके दिमाग में रही होगी इसमें मुझे संदेह है।
जनता से साबित किया है कि वो बेवकूफ नहीं है. एक बड़ी पार्टी को पूर्ण समर्थन देकर जनता ने अपनी ताक़त दिखाई है. भाजपा अलगाववाद और घृणा की राजनीति करती है...उनका हारना सुखद है दुखद नहीं.....कम से कम इस बहाने ही सही मोदी जैसे लोग समझ जाएँ कि द्वेष के संस्कारों और जहर उगलने से भाड़े के लोगों की तालियाँ तो मिल जाती हैं पर वोट नहीं.... जितना भी विश्लेषण कीजिये जब तक आप लोग ये नहीं समझेंगें कि ये देश किसी एक समुदाय, धरम या जाति का नहीं है जब तक आप सब को साथ लेकर चलने की नहीं सोचेंगे तब तक भाजपा सत्ता से दूर ही रहेगी और उससे भी बड़ी बात चुनाव प्रचार में अपने गुण बताने की कोशिश करें न कि दूसरे के अवगुण....कौन क्या है जनता समझती है जानती है....रही बात वोटों के कम प्रतिशत की...तो इस बार ५७ प्रतिशत वोट पड़े हैं जो उन चुनाओं से बेहतर हैं जब भाजपा सत्ता में आई थी.....तो ये बिलकुल बेकार का excuse है. अडवानी से बेहतर नेता कौन था इस बार भाजपा के पास ??? मोदी???? सुषमा???? i dont think so
शायद व्यक्तिगत आक्षेप भी एक बडा कारण है इन आश्चर्यजन्क परिणाम के लिए। मुद्दों पर बातह ोती तो चुनाव के नतीजे शायद और होते।
सुरेश जी एक बात तो तय है की आडवानी के कारण ही भाजपा हारी है , मुझे एक बात समझ में नहीं आ रही कि जो बात एक आम आदमी जानता है वो भाजपा के शीर्ष नेताओं के समझ में क्यों नहीं आ रही है
नरेन्द्र मोदी देश के लिए "नए" थे गुजरात में उनका काम देखा और सराहा गया है,तो फिर भाजपा और आडवानी को अपना अहं अलग रख कर निर्णय लेना चाहिए थाऔर मोदी को प्रधानमंत्री हेतु प्रचारित करना चाहिए था आडवानी 'ढपोरशंख" है ये बात सभी जानते है आडवानी वादे करते है लेकिन पूरा करने के वक़्त दुम दबा लेते . मानता हूँ की महत्वाकांक्षा सभी को रखनी चाहिए लेकिन अपनी छवि और औकात को देख कर ही.पता नहीं क्यों लोगों का विश्वास आडवानी पर जम नहीं रहा है धारा ३७०, मंदिर निर्माण के मुद्दों को ले कर भाजपा सत्ता में आई लेकिन वादा पूरा एक भी नहीं किया. भाजपा में भ्रष्टाचार और नाकारापन इतना बढ़ गया है की उसका तो कहना ही क्या ....व्यक्ति गत तौर पर मैं भी कांग्रेस को पसंद नहीं करता लेकिन मैंने पार्टी को वोट न देकर व्यक्ति को वोट दिया.
भाजपा वाले सोचते हैं की वोटर बेवकूफ है. जयपुर में(मैं जयपुर का हूँ ) एक नालायक और घटिया किस्म के उम्मीदवार को टिकट दे दिया जो के पहले ही राज्य सरकर मैं मंत्री था और उसका कार्य अच्छा नहीं था,दूसरे अहं वश उस व्यक्ति ने वोटरों से मिलना भी उचित नहीं समझा ...फलस्वरूप मेरा वोट महेश जोशी (कांग्रेस) को गया. कांग्रेस में एक ही कमी है जो मुझ जैसे व्यक्ति को पसंद नहीं आती है, और वो है "नेहरू राजवंश"!
सुरेश जी के विश्लेषण से सहमत हूँ केवल एक असहमति है कि भाजपा हिन्दुत्व की पर्याय नहीं है। जनता का फैसला स्वागतयोग्य । हमारी निष्ठा हिन्दुत्व के प्रति होनी चाहिये किसी राजनीतिक दल के प्रति नहीं। जनता ने बताया है कि वह राम और जिन्ना को एक साथ भजने वाले पर विश्वास नहीं कर सकती।
सटीक विश्लेषण किया है
१६ तारीख को १०.३० पर जैसे ही कंप्यूटर खोला सुरेश जी का मिसिज मिला के बुरी खबरें आने लगी. वाकई खबरें तो बुरी ही आ रही थी जिन को पढ़ कर हिन्दुत्व की हार से ज्यादा दुःख इस बात पर हुआ की क्या देश एक बार फिर पश्चिम के क़दमों तले रोंधे जाने के लिए अपने आप को तैयार कर रहा है . आज फिर वो ही २५० साल पहले वाला माहोल बन रहा जब कुछ मासूम से लोग व्यापारी बन कर कोल्कता आये थे . वो तो हम ही थे जिन ने उन की गोरी चमरी देख कर उन को सर पर बैठा लिया बाद मैं हम २०० साल तक उन के क़दमों के नीचे के कालीन के तरह बिछे रहे. आज लगता है की इतिहास अपनेआप को dohra रहा है. विदेशी और गोरी चमरी देख कर कुछ जय चाँद के वंशज फिर चाटुकारिता में लग कर देश और धरम को भुला कर उन की चरण वंदना में लग गई हैं. यह चाटुकारिता की पराकाष्ठा नहीं है तो और क्या है उन लोगों ने अपने आप को इस कदर समर्पित कर दिया है की उन्हों ने न केवल अपना (congress ) इतने वर्षों का इतहास भुला दिया बल्की अपने उन प्रतिष्ठित नेताओं के कांग्रेस और देश को दिए योग दान को भी भुला दिया. उन चाटुकारों ने गोरी चमरी के चरण चुम्बन कर के विनीत भावः से कहा "हम सब (कांग्रेस्स्य) तो मुर्ख और अग्गयानी हैं हे गोरी चमरी की मालकिन तुम हमारी शासक बन जाओ और हम पर राज करो, यह सुन कर कुछ देश भक्तों ने उन चाटुकारों को फटकारा तो उस गोरी चमरी की मालकिन ने बरी दरिया दिली से कहा की मैं तुम्हारी शासक नहीं बनना चाहती. पर इस से उन चाटुकारों को उन का स्वार्थ सिद्ध होता नहीं देखा तो उन ने उस रानी से कहा की कोई बात नहीं आप न बनना चा हे तो कोई बात नहीं आप का छोटा बच्चा भी हम सब से अधिक काबिल है उसे ही हमारे सर पर मुता दो हर सब तर जैन गे. इतना प्रेम भावः देख रानी प्रस्सन्न हुई और उस ने अपने छोटे बच्चे का राज तिलक करने की इस बात पर इजाज़त दी की बो अभी गद्दी पर नहीं बैठे गा. ५ साल बाद बैठेगा .
एक प्रशन मेरा भी है " क्या कांग्रेस में सोनिया (जिस ने कुछ साल पहले ही देश की नागरिकता ली है ) और राहुल से बरा और वरिष्ठ कोई और नेता नहीं है जो देश और पार्टी का सञ्चालन कर सके, या सब कांग्रेस जन वाकई नपुंसक हैं की वे वंश वाद को बारहवा दे कर पार्टी और देश दोने को खोकला कर रहे हैं .
कोई बात नहीं जय चाँद की करनी का फल पुरे देश ने और विभीषण की करनी का फल पुरी लंका ने भोगा था . अब्ब अपने कुछ चाटुकारी भैओं की करनी का फल भोगने के लिए पुरे देश को कमर कास लेनी चाहिए जय हो चाटुकारिता की उस मैं ही सब का कल्याण है
भाजपा गरीबों की नहीं बल्कि अमीर लाला बनिया पूंजीपतियों व धन्ना सेठो की पार्टी है. सुरेश जी ने खुद इस बात को यह कह कर स्वीकार किया कि भाजपा का परंपरागत वोट बैंक चुनाव वाले दिन एसी में बैठा रहा और वोट नहीं किया उसके उलट कांग्रेस ने अपने आपको गरीबों में स्थापित कर लिया है. वैसे भाजपा के लिए मेरा एक सुझाव है कि वो १९९२ या २००२ गुजरात की तरह सांप्रदायिक तनाव फैलाकर एक बार फिर से देशव्यापी दंगा करा दे तो शायद फिर से सत्ता में वापिस आ सकती है क्योंकि ये एक सच्चाई है कि दंगे फसाद आतंकवाद भाजपा व संघ परिवार कि कामयाबी का राज़ है. वरना पूरा संसार जनता है कि १९९२ से पहले भाजपा की क्या हैसियत थी.
Dixit ji BJP vansvad ko barawa dene wali shiv sena ka samarthan kyon kar rahi hai,. zara is par bhi roshni daliye.
खुर्शीद जी के अनुसार 1992 से पहले इस देश में दंगे-फ़साद नहीं होते थे… या जो भी होते थे उससे भाजपा-संघ मजबूत नहीं होते थे… (सिर्फ़ कांग्रेस मजबूत होती थी) :) :) खुर्शीद के इस अफ़लातून विश्लेषण पर आप सिर्फ़ मुस्करा सकते हैं…
Dange hote the magar deshvyapi nahi hote the. Dange hote the magar sthaniy muddo ki wajah se, kisi rajnitik party ki wajah se nahi. 2 se 189 tak aap kaise pahuche kewal aur kewal sampradayik tanaw aur dange ki wajah se.
Dange hote the magar deshvyapi nahi hote the. Dange hote the magar sthaniy muddo ki wajah se, kisi rajnitik party ki wajah se nahi. 2 se 189 tak aap kaise pahuche kewal aur kewal sampradayik tanaw aur dange ki wajah se.
गुजरात में अप्रैल 2002 के दंगों में बीजेपी के एक मंत्री भरत बारोट शामिल थे। यह बात अहमदाबाद के पूर्व पुलिस कमिश्नर के लिखे खत में सामने आई है।
दंगों के वक्त अहमदाबाद के पुलिस कमिश्नर पीसी पांडे ने राज्य के डीजीपी के चक्रवती को एक खत लिखा था जिसमें मौजूदा बीजेपी विधायक और तब मोदी सरकार में मंत्री भरत बारोट के दंगाइयों को उकसाने की बात लिखी गई थी। पांडे ने डीजीपी से कहा था कि वे मंत्रियों से आग्रह करें कि दंगाइयों को न उकसाएं। इस खत से एक बार फिर ये बात साफ होती है कि मोदी सरकार के मंत्रियों का हाथ गुजरात दंगों में रहा है।
सुरेश जी ये बात सही है की कांग्रेस भी दंगो का सहारा लेती रही है मगर ये भी सच्चाई है कि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और गुजरात जो भाजपा के प्रभाव वाले प्रांत हैं वही हिन्दू मुस्लिम दंगे अधिक होते हैं। तामिलनाडु, केरल, असम जैसे इलाकों में हिन्दू मुस्लिम तनाव नहीं के बराबर हैं क्योंकि यहां भाजपा अधिक प्रभावकारी नहीं हैं। सोचने का विषय है.
भाजपा को अवश्य आत्म चिंतन की आवश्यकता है. वैसे आडवानी और जसवंत की आत्मकथा ने पूरे कंधार मामले में पार्टी की छीछालेदर करवाई है. और तो और टीवी कार्यक्रम में अच्छे वक्ताओं की जगह किसी को भी भेज देते हैं. राज नाथ तो बिलकुल भी इम्प्रेस नहीं करते. थोडा सा युवाओं को भी आगे लाना होगा.
एक मई को सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित विशेष जांच टीम [एसआईटी] ने नरोदा गाम दंगे के सिलसिले में गुजरात की पूर्व मंत्री माया कोडनानी के खिलाफ हत्या के मामले में आरोपपत्र दाखिल किया था| एसआईटी गुजरात दंगों से जुड़े कुछ मामलों की फिर से जांच कर रही है।
दंगे में शामिल होने का आरोप लगने के बाद माया को मोदी मंत्रिमंडल से इस्तीफा देने के लिए बाध्य होना पड़ा था। अब जेल में बंद माया नरोदा गाम दंगे के मामले में प्रमुख आरोपियों में से एक हैं।
एसआईटी ने कोडनानी और विश्व हिंदू परिषद विहिप के वरिष्ठ नेता जयदीप पटेल समेत तमाम अन्य विहिप व भाजपा कार्यकर्ताओं पर आरोप लगाये थे। इनके अलावा निलंबित पुलिस अधिकारी वी एस गोहिल और पंकज पारिख का नाम दर्ज किया गया था । माया और पटेल ने 2002 में हुए गुजरात दंगों के दौरान दंगाई भीड़ का नेतृत्व किया था। माया और पटेल जेल में बंद है जबकि गोहिल और पाटिल जमानत पर रिहा चल रहे हैं।
मै खुर्शीद और हिन्दुस्तान की आवाज़ से सहमत हू, हिन्दु - मुस्लिम देशव्यापी दन्गे ९२ के बाद से शुरु हुए है, और दन्गे के बाद हमेशा BJP कि सरकार बनी है, २ सीटो से १८९ पहुचना इतना आसान नही है, सिर्फ़ भाजपा के प्रभाव वाले प्रदेश मे हिन्दु - मुस्लिम दन्गे ज़्यादा क्यौ होते है............
यह देश सिर्फ़ हिन्दुओ का नही है और यह बात हमारे देश के हर नौजवान मतदाता को मालुम है, और उन्ही कि वजह से भाजपा हारी है.....यह हिन्दुस्तान की जीत है और हिन्दुत्व की हार, यह विकास की जीत है और साम्प्रादायिक ताकतो की हार, भाजपा को सबके वोट मिलेंगे अगर वो देश के भले कि बात करेंगे तॊ
काशिफ आरिफ जी, आपने ठीक कहा है...
खुर्शीद जी ,
मैंने वंशवाद का विरोध ज़रूर किया है या कांग्रेस जानो के सोनिया प्रेम का . मैंने शिवसेना के समर्थन में तो 1 शब्द भी नहीं लिखा . जब आप उन (कांग्रेस जानो ) की वकालत कर रहीं हैं तो कृपा कर मुझे यह ज्ञान देने का कस्ट करें की सोनिया और राहुल मैं वंश विशेषता के अलावा क्या खास है जो मुझ मैं या खुद आप में नहीं है की ५०-५० साल के अनुभवी कांग्रेसी अपना अतम सम्मान भुला कर उस कल की (भारतीय बनी) औरत की चप्पल चाटने में अपने आप को गोरवान्वित समझते हैं. लानत है लानत. थू.
अपने को रास्त्र वादी कहने वाले कांग्रेसी यह भूल गई हैं की इसी सोनिया ने शादी के बाद कई साल तक भारत की नागरिकता तक लेने मैं अपना अपमान समझा था. बाद मैं जब इसे सत्ता के महक लगी तो नागरिकता भी ले ली और कांग्रेसी चमचों की मदद से सत्ता की चोटी पर पहुँच गई. यह बात दूसरी है की कुछ देश भक्त लोगों के डर से खुद कुर्सी पर नहीं बैठी अपने १ कठपुतले को बैठा कर राज कर रही है. जय हो
हिन्दू-मुस्लिम दंगो का निकटम ज्ञात इतिहास १८वीं शताब्दी से मिलता है(पहले भी होते रहे हैं)। १९३१ और १९४६ के देशव्यापी दंगे, मुस्लिम लीग नें साजिशन कराये थे। मुस्लिम-हिन्दू साथ नही रह सकते,दोनों अलग कौमियते हैं और मुस्लमानों का मज़हब सुरक्षित नहीं है अतः मुसलमानों का अलग देश होंना चाहिये, यह साफ उद्देश्य था। इकबाल नें थीसिस लिखी ,मुस्लिम लीग नें परवान चढ़ाई और जिन्ना नें फसल काटी। ज़ाहिर है उस समय संघ परिवार बच्चा था और जनसंघ या भाजपा का जन्म ही नहीं हुआ था। फायदा यदि किसी को हुआ तो टी०बी० से ग्रसित जिन्ना को पाकिस्तान के रूप में, जो जल्द ही गुजर गये और या फिर नेहरू और उनके परिवार को जो ६२/५० साल से सत्ता पर काबिज है। १००/२०० साल बाद जब इतिहास पढ़ाया जाएगा तो यवनों,तुर्कों,मुगलों के डायनेस्टिक रूल के बाद नेहरू डायनेस्टी ही लिखा जाएगा। तब अभी के अकबर महान की जगह नेहरू महान, इन्द्रा/राजीव/सोनिया और राहुल महान लिखा-पढ़ा जाएगा। तस्वीर आईनें की तरह साफ है-दंगो से भाजपा को फायदा होता है को सिद्धान्त बनाना गलत है। सबसे ज्यादा फायदा काँग्रेस को हुआ है या फिर मुसलमानों के उन दलाल नेंताओ का जो हर दंगे के बाद अपनी जेब गरम करते रहे हैं और आगे भी करेंगे।
यार एक बात बता, अगर मैं मुस्लिम लीग के तर्ज़ पर एक पार्टी " हिन्दू लीग" बनता हूँ तो उस पार्टी को परम आदरणीय परम पूज्यनीय परम धर्मनिरपेक्ष और परम ज्ञानी कांग्रेस्सी जन एक रस्त्रवादी पार्टी का दर्जा इनायत फरमाय गे या साम्प्रादायिक पार्टी का ?
वाह मुस्लिम भाइयों,
आपने इस ब्लॉग पर टिपण्णी लिख के दिखा दिया की आपकी सोच कितनी छोटी है..
मैं भी मध्य प्रदेश से हूँ.. और आज तक नहीं भूला हूँ उस दिन को जब सुन्दर लाल पटवा की सरकार को गिराने के लिए कांग्रेस ने रातों रात भोपाल में दंगे करवाए.. और इससे पहले की सरकार को समय मिल पाता, सरकार गिरा कर राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया.. कितनी गहरी चाल थी.
और जहां जहां भी भाजपा शासन में आती है, कांग्रेस सबसे पहले दंगा करवाती है... भाजपा को कलंक लगाने के लिए.
वैसे ८४ के दंगों में क्या हुआ था?? वहाँ तो भाजपा नहीं थी?
और गुजरात... वहाँ गोधरा को क्यों भूलते हैं?
वैसे भी सुरेश जी ने तो बोल ही दिया है.. आपके मुताबिक भाजपा के पहले दंगे कभी हुए ही नहीं?
तो फिर पाकिस्तान साला बना कैसे?
ज़रा अपना इतिहास पढ़ लें..
और फिर दंगों से डरते हैं तो यहाँ क्यों हैं?
पाकिस्तान क्यों नहीं भाग जाते?
वैसे भी पाकिस्तान में हिन्दू तो बचे नहीं, नाम मात्र को रह गए हैं..
वैसे भी हिन्दू तो सारे नपुंसक ही होते हैं. इसीलिए तो आपके बाप-दादा चढ़ पाए और अभी भी हम पर चढाते हैं!!!
दंगों के सम्बन्ध में मेरा लेख पढ़े "साम्प्रदायिकता का निवारण" HERE.IS/swachchhsandesh
सुषमा स्वराज और नरेन्द्र मोदी को भाजपा और संघ भले स्वीकार कर लें, पर जहां तक देश की जनता की बात है, इनकी स्थिति भी आडवाणी से बेहतर नहीं है. क्या इनके अलावा भाजपा के पास नेतृत्व के लिए और नाम नहीं बचे हैं. मेरा भाजपा से कोई लगाव नहीं है, लेकिन अपने आकार-प्रकार और क्षमताओं के लिहाज से इस दल में देश के नेतृत्व की कूवत है, यह सच है. अटल के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार यह साबित भी कर चुकी है. पर पिछले क़रीब 7-8 वर्षों से भाजपा में वही लोग शीर्ष पर हैं, जो अपने फ़ायदे के लिए पार्टी की लगातार ऐसी-तैसी किए जा रहे हैं. योग्य लोगों की उपेक्षा कर रहे हैं और अकसर अपना अस्तित्व और मह्त्व बचाए रखने के लिए उन्हें बाहर का दरवाजा दिखा रहे हैं. इन्हीं लोगों के चलते भाजपा की स्थिति कॉंग्रेस जैसी होती जा रही है, एक जेबी संगठन की. ऐसी स्थिति में जनता या मीडिया को दोष देना बिलकुल वैसे ही है जैसे अपनी ग़लती दूसरे के सिर मढ़ना. ज़रा सोचिए कि जब वही सब इनसे भी झेलना है तो जनता क्यों लाए इन्हें. फिर जलालत झेलाने के लिए कॉंग्रेस ही काफ़ी है. आख़िर क्या वजह थी कि भाजपा ने पूरे चुनाव के दौरान एक बार भी भूल से भी महंगाई का मुद्दा जोरदार ढ्ंग से नहीं उठाया? बेकारी और भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग जैसी बातें भाजपा को क्यों नहीं दिखीं? भाजपा को ये चीज़ें दिखें या न दिखें, पर जनता को दिख रही हैं और जनता एक दिन ख़ुद आगे बढ़कर संसदीय राजेनीति के दलदल में फंसी सारी पार्टियों को परे धकेल कर सत्ता की नकेल पूरी तरह अपने हाथ में ले लेगी. अभी सबको यह बेवकूफ़ी भरी बात लग रही होगी, लेकिन 10 साल बाद यही होना है.
सुरेश जी
विश्लेष्ण अच्छा है किन्तु उस पर जो टिप्पणियाँ आई है वे भी काफी सार्थक हैं
पर अनुरोध करूंगा की गली गलौज से बचा जाये कठोर शब्दावली के लिए शालीन शब्दों की कमीं नहीं है
भा ज पा हारी है अब यही सच्चाई है दोपहरी का सूरज अंधियारे से हारा है ऐसा ही कुछ अटल जी ने एक बार कहा था भाजपा के समर्थकों के लिए यह पंक्ति समाधान देगी किन्तु हार या जीत किसी की किसी एक कारन से नहीं होती . आडवानी जी को कोई पसंद करे या न करे उनकी तपस्या पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए .जिन्ना की मजार का प्रकरण क्या है इस पर बहुत कुछ कहा सुना गया है भारतीय जनमानस अगर इतना यद् रखने वाला या कट्टर होता तो फिर देश की हर समस्या हल हो गई होती .
सुरेश जी
अआपने अपने विश्लेष्ण में कुछ तथ्यों को नजर अंदाज क्र दिया है या फिर उससे सम्बन्धित सूचनाएँ आपके पास नहीं हैं ये दो बिन्दुओं पर मुझे भी सूचनाओं की तलाश है
१ मंतिमंडल में छह माह पुर्व एक चुनाव आयुक्त को खेल मंत्री बनाया गया था .उन्होंने इस बीच कौन सा खेल खेला है .उन्हें क्यों उपकृत किया गया था उनके किस उपकार का बदला चुकाया गया था उन्हें आगामी चुनावो में क्या भूमिका दी गई थी उसके क्या परिणाम आये है .कांग्रेस की तजा सफलता में उनका क्या योगदान है
२ अमेरिका अपने उपकार का बदला अवश्य चुकाता है सी आई ए की रूचि अमेरिका समर्थक सरकार बनाने में दुनिया भर में रहती है चुनाव से पहले अमेरिका की अर्थ व्यस्था के लिए ओक्सिजन बनने वाले परमाणु समझोते को करवाने का क्या पारितोषिक और कैसे अमेरिका ने मनमोहन सिंह को दिया है इसकी गहरी पड़ताल के बिना नतीजों पर विलाप करना अच्छा नहीं है
अच्छा हो आप एक पोस्ट इस पर लिखें की नकारात्मक प्रचार सामने वाले को लाभ ही पाहुचाता है भजपा की नै पीड़ी को इसकी समझ तक नहीं है उन्हें याद तक नहीं है की अटल जी और इंदिराजी कभी विरोधियों पर कोई व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं करते थे भाजपा इन दिनों विपकछ की भूमिका ठीक से निबाहने के लिए तय्यार हो जाये यह भी बड़ी देश सेवा होगी क्योंकि भाजपा के बहूत से नेता इन दिनों सन्निपात किस्तिथि में हैं उन्हें लग रहा था सत्ता आने ही वाली है और उन्होंने जाने क्या क्या स्वप्न संजो रखे थे .उन्हें याद दिलाइये की वे जिस विचार के लिए कम करने इस पार्टी तक आये हैं उस परम वैभवं के लक्ष्य को स्मरण रखे
आपने कार्य कर्ताओं समर्थकों को कीड मकोडा समझने की मानसिकता से बाहर आयें अंधियारे में दिया जलाएं
दादा इतने राजनितीक विशलेषक कहा से पकड के लाये इन सब का टिप्पणी पढ तो यैसा लग रहा है ये लोग अगर राजनीति में रहते तो लम्बा तीर मार देतें और चुनाव कभी हारते ही नही।
हा हा हा हा हा हा
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