Monday, April 13, 2009

“केरल” का तेजी से बढ़ता तालिबानीकरण और गहरी नींद में गाफ़िल हिन्दू (भाग-2)… Talibanization Kerala, Congress and Communist Secularism

लेख के भाग-1 (यहाँ देखें) से आगे जारी…

1980 में मलप्पुरम में कई सिनेमाघरों में बम विस्फ़ोट हुए, पुलिस ने कुछ नहीं किया, केरल के उत्तरी इलाकों में गत एक दशक में कई विस्फ़ोट हो चुके हैं लेकिन पुलिस कहीं भी हाथ नहीं डाल पा रही। बेपूर बन्दरगाह पर हुए विस्फ़ोट में भी आज तक एक भी आरोपी नहीं पकड़ाया है, ज़ाहिर है कि सत्ताधारी पार्टी ही जब समर्थन में हो तो पुलिस की क्या हिम्मत। लेकिन मलप्पुरम जिले का तालिबानीकरण अब बेहद खतरनाक स्थिति में पहुँच चुका है, हाल ही में 25 जुलाई 2008 के बंगलोर बम विस्फ़ोटों के सिलसिले में कर्नाटक पुलिस ने नौ आरोपियों के खिलाफ़ केस दायर किया है और सभी आरोपी मलप्पुरम जिले के हैं, क्या इसे सिर्फ़ एक संयोग माना जा सकता है? 6 दिसम्बर 1997 को त्रिचूर रेल धमाके हों या 14 फ़रवरी 1998 के कोयम्बटूर धमाके हों, पुलिस के हाथ हमेशा बँधे हुए ही पाये गये हैं।

पाठकों ने गुजरात, अहमदाबाद, कालूपुर-दरियापुर-नरोडा पाटिया, ग्राहम स्टेंस, कंधमाल आदि के नाम सतत सुने होंगे, लेकिन मराड, मलप्पुरम या मोपला का नाम नहीं सुना होगा… यही खासियत है वामपंथी और सेकुलर लेखकों और इतिहासकारों की। मीडिया पर जैसा इनका कब्जा रहा है और अभी भी है, उसमें आप प्रफ़ुल्ल बिडवई, कुलदीप नैयर, अरुंधती रॉय, महेश भट्ट जैसों से कभी भी “जेहाद” के विरोध में कोई लेख नहीं पायेंगे, कभी भी इन जैसे लोगों को कश्मीर के पंडितों के पक्ष में बोलते नहीं सुनेंगे, कभी भी सुरक्षाबलों का मनोबल बढ़ाने वाली बातें ये लोग नहीं करेंगे, क्योंकि ये “सेकुलर” हैं… इन जैसे लोग “अंसल प्लाज़ा” की घटना के बारे में बोलेंगे, ये लोग नरोडा पाटिया के बारे में हल्ला मचायेंगे, ये लोग आपको एक खूंखार अपराधी के मानवाधिकार गिनाते रहेंगे, अफ़ज़ल गुरु की फ़ाँसी रुकवाने का माहौल बनाने के लिये विदेशों के पाँच सितारा दौरे तक कर डालेंगे…। यदि इंटरनेट और ब्लॉग ना होता तो अखबारों और मीडिया में एक छोटी सी खबर ही प्रकाशित हो पाती कि “केरल के मराड में एक हिंसा की घटना में नौ लोगों की मृत्यु हो गई…” बस!!!

अब केरल में क्या हो रहा है… घबराये और डरे हुए हिन्दू लोग मुस्लिम बहुल इलाकों से पलायन कर रहे हैं, मलप्पुरम और मलाबार से कई परिवार सुरक्षित(?) ठिकानों को निकल गये हैं और “दारुल-इस्लाम” बनाने के लिये जगह खाली होती जा रही है। 580 किमी लम्बी समुद्री सीमा के किनारे बसे गाँवों में हिन्दुओं के “जातीय सफ़ाये” की बाकायदा शुरुआत की जा चुकी है। पोन्नानी से बेपूर तक के 65 किमी इलाके में एक भी हिन्दू मछुआरा नहीं मिलता, सब के सब या तो धर्म परिवर्तित कर चुके हैं या इलाका छोड़कर भाग चुके हैं। बहुचर्चित मराड हत्याकाण्ड भी इसी जातीय सफ़ाये का हिस्सा था, जिसमें भीड़ ने आठ मछुआरों को सरेआम मारकर मस्जिद में शरण ले ली थी (देखें)। 10 मार्च 2005 को संघ के कार्यकर्ता अश्विनी की भी दिनदहाड़े हत्या हुई, राजनैतिक दबाव के चलते आज तक पुलिस कोई सुराग नहीं ढूँढ पाई। मलप्पुरम सहित उत्तर केरल के कई इलाकों में दुकानें और व्यावसायिक संस्थान शुक्रवार को बन्द रखे जाते हैं और रमज़ान के महीने में दिन में होटल खोलना मना है। त्रिसूर के माथिलकोम इलाके के संतोष ने इस फ़रमान को नहीं माना और शुक्रवार को दुकान खोली तथा 9 अगस्त 1996 को कट्टरवादियों के हाथों मारा गया, जैसा कि होता आया है इस केस में भी कोई प्रगति नहीं हुई (दीपक धर्मादम, केरलम फ़ीकरारूड स्वान्थमनाडु, pp 59,60)।

पाठकों ने इस प्रकार की घटनाओं के बारे में कभी पढ़ा-सुना या टीवी पर देखा नहीं होगा, सभी घटनायें सच हैं और वीभत्स हैं लेकिन हमारा “राष्ट्रीय मीडिया”(?) जो कि मिशनरी पैसों पर पलता है, हिन्दू-विरोध से ही जिसकी रोटी चलती है, वामपंथियों और कांग्रेसियों का जिस पर एकतरफ़ा कब्जा है, वह कभी इस प्रकार की घटनाओं को महत्व नहीं देता (वह महत्व देता है वरुण गाँधी को, जहाँ उसे हिन्दुत्व को कोसने का मौका मिले)। ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं जिनमें हिन्दुओं की हत्या, अपहरण और बलात्कार हुए हैं, लेकिन “सेकुलरिज़्म” के कर्ताधर्ताओं को भाजपा-संघ की बुराई करने से ही फ़ुर्सत नहीं मिलती। कोट्टायम और एर्नाकुलम जिलों के जागरूक नागरिकों ने जंगलों में चल रहे सिमी के कैम्पों की जानकारी पुलिस को दी, पुलिस आई, कुछ लोगों को पकड़ा और मामूली धारायें लगाकर ज़मानत पर छोड़ दिया। इन्हीं “भटके हुए नौजवानों”(???) में से कुछ देश के विभिन्न हिस्सों में आतंकवादी गतिविधियों में पकड़ाये हैं। हाल ही में मुम्बई की जेलों में अपराधियों को इस्लाम धर्म अपनाने के लिये दाऊद गैंग का हाथ होने की पुष्टि आर्थर रोड जेल के जेलर ने की थी, यह तकनीक केरल में भी अपनाई जा रही है और नये-पुराने अपराधियों को धर्म परिवर्तित करके मुस्लिम बनाया जा रहा है। जब “सिमी” पर प्रतिबन्ध लग गया तो उसने नाम बदलकर NDF रख लिया, इस प्रकार विभिन्न फ़र्जी नामों से कई NGO चल रहे हैं जिनकी गतिविधियाँ संदिग्ध हैं, लेकिन कोई देखने-सुनने वाला नहीं है (दैनिक मंगलम, कोट्टायम, 9 फ़रवरी 2009)।

जैसा कि पहले उल्लेख किया गया “पेट्रो डॉलर” ने केरल में हिन्दू-मुस्लिम के बीच आर्थिक खाई को बहुत चौड़ा कर दिया है, खाड़ी से आये हुए हवाला धन के कारण यहाँ कई जिलों में 70% से अधिक ज़मीन की रजिस्ट्रियाँ मुसलमानों के नाम हुई हैं और हिन्दू गरीब होते जा रहे हैं। पैसा कमाकर लाना और ज़मीन खरीदना कोई जुर्म नहीं है, लेकिन “घेट्टो” मानसिकता से ग्रस्त होकर एक ही इलाके में खास बस्तियाँ बनाना निश्चित रूप से स्वस्थ मानसिकता नहीं कही जा सकती। यहाँ तक कि ज़मीन के इन सौदों में मध्यस्थ की भूमिका भी “एक खास तरह के लोग” ही निभा रहे हैं और इसके कारण हिन्दुओं और मुसलमानों में आर्थिक समीकरण बहुत गड़बड़ा गये हैं (मलयालम वारिका सम्पादकीय, Vol.VII, No.12, 25 जुलाई 2003)।

सदियों से हिन्दू गाय को माता के रूप में पूजते आये हैं, लेकिन भारत में केरल ही एक राज्य ऐसा है जिसने गौवंश के वध की आधिकारिक अनुशंसा की हुई है। सन् 2002 के केरल सरकार के आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक उस वर्ष पाँच लाख गायों का वध किया गया और 2,49,000 टन का गौमाँस निर्यात किया गया (न्यू इंडियन एक्सप्रेस, कोचीन 13 अगस्त 2003), जबकि असली आँकड़े निश्चित रूप से और भी भयावह होते हैं। भले ही मेडिकल साइंस इसके खतरों के प्रति आगाह कर रहा हो, भले ही हिन्दू धर्माचार्य और हिन्दू नेता इसका विरोध करते रहे हों, लेकिन केरल के किसी भी मुस्लिम नेता ने कभी भी इस गौवध का खुलकर विरोध नहीं किया।

केरल के सांस्कृतिक तालिबानीकरण की शुरुआत तो 1970 में ही हो चुकी थी, जबकि केरल के सरकारी स्कूल के “यूथ फ़ेस्टिवल” में “मोप्ला गीत” (मुस्लिम) और “मर्गमकल्ली” (ईसाई गीत) को एक प्रतियोगिता के तौर पर शामिल किया गया (केरल के 53 साल के इतिहास में 49 साल शिक्षा मंत्री का पद किसी अल्पसंख्यक के पास ही रहा है)। जबकि हिन्दुओं की एक कला “कोलकल्ली” का यूनिफ़ॉर्म बदलकर “हरी लुंगी, बेल्ट और बनियान” कर दिया गया… अन्ततः इस आयोजन से सारे हिन्दू छात्र धीरे-धीरे दूर होते गये। 1960 तक कुल मुस्लिम आबादी की 10% बुजुर्ग महिलायें “परदा” रखती थीं, जबकि आज 31% नौजवान लड़कियाँ परदा /बुरका रखती हैं, सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या मुस्लिम लड़कियों में कट्टरता बढ़ रही है, या कट्टरता उन पर थोपी जा रही है? वजह जो भी हो, लेकिन ऐसा हो रहा है।

6 नवम्बर 1999 को पोप जॉन पॉल ने दिल्ली के एक केथीड्रल में कहा था कि “जिस प्रकार पहली सदी में “क्रास” ने यूरोप की धरती पर कदम जमाये और दूसरी सदी में अमेरिका और अफ़्रीका में मजबूती कायम की, उसी प्रकार तीसरी सदी में हम एशिया में अपनी फ़सल बढ़ायेंगे…”, यह वक्तव्य कोई साधारण वक्तव्य नहीं है… थोड़ा गहराई से इसका अर्थ लगायें तो “नीयत” साफ़ नज़र आ जाती है। साफ़ है कि केरल पर दोतरफ़ा खतरा मंडरा रहा है एक तरफ़ “तालिबानीकरण” का और दूसरी तरफ़ से “मिशनरी” का, ऐसे में हिन्दुओं का दो पाटों के बीच पिसना उनकी नियति बन गई है। तीन साल पहले एक अमेरिकी नागरिक जोसेफ़ कूपर ने किलीमन्नूर में एक ईसाई समारोह में सार्वजनिक रूप से हिन्दू भगवानों का अपमान किया था (उस अमेरिकी ने कहा था कि “हिन्दुओं के भगवान कृष्ण विश्व के पहले एड्स मरीज थे…”), जनता में आक्रोश भी हुआ, लेकिन सरकार ने पता नहीं क्यों मामला रफ़ा-दफ़ा करवा दिया।

कश्मीर लगभग हमारे हाथ से जा चुका है, असम भी जाने की ओर अग्रसर है, अब अगला नम्बर केरल का होगा… हिन्दू जितने विभाजित होते जायेंगे, देशद्रोही ताकतें उतनी ही मजबूत होती जायेंगी… जनता के बीच जागरूकता फ़ैलाने की सख्त जरूरत है… हम उठें, आगे बढ़ें और सबको बतायें… मीडिया के भरोसे ना रहें वह तो उतना ही लिखेगा या दिखायेगा जितने में उसे फ़ायदा हो, क्योंकि ऊपर बताई गई कई घटनाओं में से कोई भी घटना “ब्रेकिंग न्यूज़” बन सकती थी, लेकिन नहीं बनी। “नेहरूवादी सेकुलरिज़्म” की बहुत बड़ी कीमत चुका रहा है यह देश…। नेहरू की “मानस संतानें” यानी “सेकुलर बुद्धिजीवी” नाम के प्राणी भी समझ से बाहर है, क्योंकि इन्हें भारत पर और खासकर हिन्दुओं पर कभी भी कोई खतरा नज़र नहीं आता…। जबकि कुछ बुद्धिजीवी “तटस्थ” रहते हैं, तथा जब स्थिति हाथ से बाहर निकल चुकी होती है तब ये अपनी “वर्चुअल” दुनिया से बाहर निकलते हैं… ऐसे में हिन्दुओं के सामने चुनौतियाँ बहुत मुश्किल हैं… लेकिन फ़िर भी चुप बैठने से काम नहीं चलने वाला… एकता ज़रूरी है… “हिन्दू वोट बैंक” नाम की अवधारणा अस्तित्व में लाना होगा… तभी इस देश के नेता-अफ़सरशाही-नौकरशाही सब तुम्हारी सुनेंगे…

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विशेष नोट - यह लेख त्रिवेन्द्रम निवासी डॉ सीआई इसाक (इतिहास के रिटायर्ड प्रोफ़ेसर) द्वारा चेन्नै में 8 मार्च 2009 को रामाकृष्णन मेमोरियल व्याख्यानमाला में दिये गये उनके भाषण पर आधारित है।


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22 comments:

संजय बेंगाणी said...

भाई सुरेशजी, आपकी बातों से न तो असहमत हुआ जा सकता है न ही होना चाहिए. आपने जोरदार लिखा है.

एक बात जो समझ मं नहीं आती है वह यह है कि मीडिया पर विचारधारा विशेष का कब्जा क्यों है? क्या हिन्दुओं को मनाई है?

जो ताकतवर नहीं है उसका खत्म होना प्रकृतिक है.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

लेख पढ़कर जैसे सारे शब्द ही गुम हो गए...

मुनीश ( munish ) said...

whatever u said is sadly TRUE ! Situation is pathetic really.Poor Hindus! They have forgotten their biggest temple is in Combodia . Their was a time when entire area of Thailand and Indonesia was Hindu. They r moving towards a dark future.

चन्दन चौहान said...

सिर्फ केरल का तालिबानी करण नही हो रहा हैं मुस्लमान जहाँ कही भी हैं उसके बस्ती के चारो ओर से हिन्दुओं को खदेरा जा रहा है। आप अपने शहर के मुस्लिम बस्ती में जा कर देख सकते हैं वहाँ का क्या हाल है। रही बात सेकूलरों कि तो आप इतिहास जानते ही होगें मुगलों के आक्रमण काल में कुछ यैसे भी आदमी थे जो अपने स्वार्थ के लिये अपने बहू-बेटियों को नंगा करके मुगलों के हवाले कर दिया था। वही पर्मपरा को ये सेकूलर निभा रहें हैं

Anil Pusadkar said...

जीतेगा भई जीतेगा सुरेश भैया जीतेगा।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

यह ऐसा सत्य है जिसके प्रति स्वयं हिन्दू ही आंखे मूंदे बैठे हैं. हिन्दुओं ने इतिहास से कुछ नहीं सीखा, एक स्वाभिमानी कौम को गुलाम बनाकर रख दिया लोकतन्त्र के इस रूप में. आजादी भी इसलिये मिलगयी कि उस समय लोग पढ़े लिखे नहीं थे लेकिन समझदार थे, आज पढ़े लिखे हैं लेकिन समझदार और दूरंदेशी नहीं हैं.

Shastri said...

आलेख के अधिकतर विश्लेषण तथ्यों पर आधारित है एवं चौकाने वाले हैं.

दो तथ्यात्मक भूल-सुधार:

मीडिया पर चर्च का कब्जा कुछ गलत आंकडों पर आधारित है, इसे एक बार और जांच लें.

“मोप्ला गीत” (मुस्लिम) और “मर्गमकल्ली” आदि को मुस्लिम एवं ईसाई कहना शत प्रतिशत सही नहीं है क्योंकि ये मुख्यतया केरल के मुस्लिम एवं ईसाई जनाजातियों के द्वारा प्रयुक्त "भारतीय" गीत हैं. केरल में हर कौम के बच्चे इन गीतों का प्रयोग उतना ही करते हैं जितना हिन्दुओं के जनजातीय गीतों का प्रयोग होता है. अत: इन जनजीवन से घुलेमिले गीतों को धर्म के आधार पर बांटना ठीक नहीं है.

लेख सही दिशा में जा रहा है. इसे जारी रखें.

सस्नेह -- शास्त्री

पंकज बेंगाणी said...

शत शत नमन आपको.


आँखे खुल रही है.

दिल दुखता है... said...

तथ्य वाकई चौकाने वाले है.. लेकिन कुछ उलटी खोपडी के लोगों को अभी भी समझ नहीं आएगा... वो अपने शहर में ही मुस्लिम मानसिकता और कार्य पधति को देख कर नहीं समझ पाते. हमेशा घुन लगी लकडी को छुपाने की कोसिस करते है.. पर उन्हें नहीं पता की घुन बिना दावा छिडके लकडी को खोखला करना नहीं छोड़ती...

Dev said...

आपको और आपके पुरे परिवार को वैशाखी की हार्दिक शुभ कामना !

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

TAALIBAANI khade hain desh ki seema par aur ham abhi bhi HINDUON o gali MUSALMANON ko pyaali diye hain.
unka khoon khoon hamaara khoon pani,
ham karen to apradh we karen to nadani.
wah.
AAJ KE HAMAARE AALEKH PAR BHI NIGAH DALIYEGA.
http://kumarendra.blogspot.com

वीरमदेव की चौकी से ......... said...

सुरेशजी.
महाकाल की नगरी ने हर बार इतिहास बदला है इस बार भी सुरुआत करो हम सब साथ है. हम एक दुसरे को गाली देकर राजी होते है जातिवाद को समर्थन देते है ऐसे नेताओ को हटाने का टारगेट बनाना चाहिए नेता वो चुनियो जो हिन्दू के नाम पर मरे तब तो तालिबान का मुकाबला होगा पार्टी मत देखो हिन्दू का लाभ देखो

Dr. Munish Raizada said...

देशवासियों! अभी भी समय है. अपने देश, धरम, संस्कृति को तो पहचानिये!

मुनीश ( munish ) said...

U r bound to get more n more support here, but please maintain this tempo.

Arvind Mishra said...

सचमुच यह बहुत ही भयावह स्थिति है और हम कान में तेल डाले बैठे हैं !

Arvind Mishra said...

सचमुच यह बहुत ही भयावह स्थिति है और हम कान में तेल डाले बैठे हैं !

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

आप सभी लोग कुंठित हैं और तर्क के बजाये कुतर्क का सहारा लेकर अपनी बात सिद्ध करने में लगे हैं!

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

बहुत पहले मैंने एक पत्रिका में पढ़ा था आज वो सच लगने लगा है.........

"भारत में जितने ही शिक्षित हिन्दू हैं, वो सब कुंठित हैं और अति साम्प्रदायिक हैं."

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

लेकिन भला उस पत्रिका का कि जिसमें इस बीमारी का कारण और इलाज दोनों ही लिखा था-----

भारत में १०० में से ९९ प्रतिशत हिन्दू अपने सबसे पुराने और विश्वशनीय ईश्वर की महान पुस्तक वेदों को नहीं पढ़ते हैं, और अगर वे वेदों को पुराणों को पढने लगें तो उनकी आँखें खुल जाएँ|

लेकिन नहीं मुझे नहीं लगता ऐसा हो सकता है क्यूंकि वही ईश्वर जिसने वेदों को अवतरित किया, अपने अंतिम ईश ग्रन्थ में फरमाता है --

"वे अंधे हैं, गूंगे हैं और बहरे हैं, वे अब लौटने वाले नहीं"

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

अरे ये सब करने से अच्छा यह नहीं हो सकता कि आप ऐसे लेख लिखें ऐसे आचरण करें जो एकता की तरफ ले जाएँ

GJ said...

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जीतेगा भई जीतेगा सुरेश भैया जीतेगा।

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khursheed said...

Eating cows' flesh is not prohibited in hinduism according to VEDAS.
Again in RigVeda book 10 Hymn 28 verse 3 it says "0 Indra, Bulls they dress for thee, and of these (meat) thou eatest when Maghavan, with food thou art invited".

In Rig veda Book 10 Hymn 86 verse 13 says “indra will eat thy bulls, thy dear oblation that effecteth much. Supreme is Indra over all" These verses indicates that Indra, a god of vedic age, used to eat meat.

Also another god of vedic age, Agni, is referred to as "flesh-eater' in vedas. For example, in Rig Veda bock 10 Hymn 16 verse 10 it is said I choose as god for Father-worship Agni, FLESH Eater, who hath past within your dwellings".

In RigVeda Vivah sukta book 10 Hymn 85 verse 13, it mentions that during marriage ceremony the guests were fed with the meat. it says “in Magha days are oxen slain, in Arjunis they wed the bride"

Atherva veda book 9 Hymn 4 verses 37-38-39 gives _expression that cow's milk and cow's meat are most tasty among all other foods. It says "The man should not eat before the guest who is Brahmin versed in holy lore When the guest hath eaten he should eat. Now the sweet est portion, the produce of cow, milk or flesh, that verily he should not eat (before the guest)"