Thursday, April 9, 2009

“केरल” का तेजी से बढ़ता तालिबानीकरण – गहरी नींद में गाफ़िल हिन्दू तथा भाजपा-संघ को कोसने वाले (भाग-1)

Talibanization Kerala Congress and Communist Secularism

जब वामपंथी कहते हैं कि “धर्म एक अफ़ीम की तरह है…” तो उनका मतलब सिर्फ़ हिन्दू धर्म से होता है, मुसलमानों और ईसाईयों के सम्बन्ध में उनका यह बयान कभी नहीं आता। पश्चिम बंगाल के 22 से 24 जिलों में मुस्लिम आबादी को 50% से ऊपर वे पहले ही पहुँचा चुके हैं, अब नम्बर आया है केरल का। यदि भाजपा हिन्दू हित की कोई बात करे तो वह “साम्प्रदायिक” होती है, लेकिन यदि वामपंथी कोयम्बटूर बम विस्फ़ोटों के आरोपी अब्दुल मदनी से चुनाव गठबन्धन करते हैं तो यह “सेकुलरिज़्म” होता है, कांग्रेस यदि केरल में मुस्लिम लीग को आगे बढ़ाये तो भी यह सेकुलरिज़्म ही है, शिवराज पाटिल आर्चबिशपों के सम्मेलन में जाकर आशीर्वाद लें तो भी वह सेकुलरिज़्म ही होता है… “शर्मनिरपेक्ष” शब्द इन्हीं कारनामों की उपज है। भाजपा-संघ-हिन्दुओं और भारतीय संस्कृति को सतत गरियाने वाले ज़रा केरल की तेजी से खतरनाक होती स्थिति पर एक नज़र डाल लें, और बतायें कि आखिर वे भाजपा-संघ को क्यों कोसते हैं?

केरल राज्य की स्थापना सन् 1956 में हुई, उस वक्त हिन्दुओं की जनसंख्या 61% थी। मात्र 50 साल में यह घटकर 55% हो गई है, जबकि दूसरी तरफ़ मुस्लिमों और ईसाईयों की संख्या में आश्चर्यजनक वृद्धि हुई है। हिन्दुओं की नकारात्मक जनसंख्या वृद्धि दर के पीछे कई प्रकार के राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक कारण हैं, लेकिन सच यही है कि केरल का तेजी से तालिबानीकरण/इस्लामीकरण हो रहा है। केरल की राजनैतिक परिस्थितियों का फ़ायदा जितनी चतुराई से इस्लामी शक्तियाँ उठा रही हैं, उतनी ही चालाकी से मिशनरी भी उठा रही है। जनसंख्या के कारण वोटों का सन्तुलन इस प्रकार बन चुका है कि अब कांग्रेस और वामपंथी दोनों को “मेंढक” की तरह “कभी इधर कभी उधर” फ़ुदक-फ़ुदक कर उन्हें मजबूत बना रहे हैं।

केरल के बढ़ते तालिबानीकरण के पीछे एक कारण है “पेट्रो डॉलर” की बरसात, जो कि वैध या अवैध हवाला के जरिये बड़ी मात्रा में प्रवाहित हो रहा है। मिशनरी और मुल्लाओं को मार्क्सवादियों और कांग्रेस का राजनैतिक सहारा तो है ही, हिन्दू जयचन्दों और “सेकुलर बुद्धिजीवियों” का मानसिक सहारा भी है। जैसे कि एक मलयाली युवक जिसका नाम जावेद “था” (धर्म परिवर्तन से पहले उसका नाम प्रणेश नायर था) जब गुजरात के अहमदाबाद में (15 नवम्बर 2004 को) पुलिस एनकाउंटर में मारा गया और यह साबित हो गया कि वह लश्कर के चार आतंकवादियों की टीम में शामिल था जो नरेन्द्र मोदी को मारने आये थे, तब भी केरल के “मानवाधिकारवादियों” (यानी अंग्रेजी बुद्धिजीवियों) ने जावेद(?) को हीरो और शहीद बताने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। लेकिन जब हाल ही में कश्मीर में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गये चार युवकों के पास से केरल के मतदाता परिचय पत्र मिले तब इन “सेकुलरिस्टों” के मुँह में दही जम गया।

केरल के तालिबानीकरण का इतिहास तो सन् 1921 के मोप्ला दंगों से ही शुरु हो चुका है, लेकिन “लाल” इतिहासकारों और गठबंधन की शर्मनाक राजनीति करने वाली पार्टियों ने इस सच को दबाकर रखा और इसे “सिर्फ़ एक विद्रोह” कहकर प्रचारित किया। “मोप्ला” के दंगों और हिन्दुओं के नरसंहार पर विस्तार से खबर देखने के लिये यहाँ क्लिक करें। एनीबेसेण्ट जैसी विदुषी महिला ने अपनी रिपोर्ट (29 नवम्बर 1921) में कहा था - ..The misery is beyond description. Girl wives, pretty and sweet, with eyes half blind with weeping, distraught with terror; women who have seen their husbands hacked to pieces before their eye, in the way "Moplas consider religious", old women tottering, whose faces become written with anguish and who cry at a gentle touch and a kind look, waking out of a stupor of misery only to weep, men who have lost all, hopeless, crushed, desperate. ..... I have walked among thousands of them in refugee camps, and sometimes heavy eyes would lift as a cloth was laid gently on the bare shoulder, and a faint watery smile of surprise would make the face even more piteous than the stupor.

तथा तत्कालीन कालीकट जिला कांग्रेस कमेटी के सचिव माधवन नायर ने रिपोर्ट में लिखा है - Can you conceive of a more ghastly and inhuman crime than the murder of babies and pregnant women? ... A pregnant woman carrying 7 months was cut through the abdomen by a rebel and she was seen lying dead with on the way with the dead child projecting out ... Another baby of six months was snatched away from the breast of the mother and cut into two pieces. ... Are these rebels human beings or monsters?

जबकि आंबेडकर, जो कि उच्च वर्ग के प्रति कोई खास प्रेम नहीं रखते थे, उन्होंने भी इस तथाकथित “खिलाफ़त” आन्दोलन के नाम पर चल रही मुस्लिम बर्बरता के खिलाफ़ कड़ी आलोचना की थी। अम्बेडकर के अनुसार “इस्लाम और भारतीय राष्ट्रीयता को समरस बनाने के सारे प्रयास विफ़ल हो चुके हैं… भारतीय संस्कृति के लिये इस्लाम “शत्रुतापूर्ण और पराया” है…”, लेकिन फ़िर भी गाँधी ने इस “बर्बर हत्याकाण्ड और जातीय सफ़ाये” की निंदा तो दूर, एक शब्द भी इसके खिलाफ़ नहीं कहा… मुस्लिमों को शह देकर आगे बढ़ाने और हिन्दुओं को सतत मानसिक रूप से दबाने का उनका यह कृत्य आगे भी जारी रहा… जिसके नतीजे हम आज भी भुगत रहे हैं…। तात्पर्य यह 1921 से ही केरल का तालिबानीकरण शुरु हो चुका था…

हद तो तब हो गई जब फ़रवरी 2005 में CPM (Communal Politicians of Marx) ने वरियमकुन्नाथु कुन्जाअहमद हाजी को एक महान कम्युनिस्ट योद्धा और शहीद का दर्जा दे दिया। उल्लेखनीय है कि ये हाजी साहब 1921 के मलाबार खिलाफ़त आंदोलन में हजारों मासूम हिन्दू औरतों और बच्चों के कत्ल के जिम्मेदार माने जाते हैं, यहाँ तक कि “मुस्लिम लीग” भी इन जैसे “शहीदों”(?) को अपना मानने में हिचकिचाती है, लेकिन “लाल” झण्डे वाले इनसे भी आगे निकले।

अक्सर देखा गया है कि जब भी कोई हिन्दू व्यक्ति धर्म परिवर्तन करके मुसलमान बन जाता है तो उतना हो-हल्ला नहीं होता, भाजपा-संघ यदि हल्ला करें भी तो उन्हें “साम्प्रदायिक” कहकर दबाने की परम्परा रही है, लेकिन जब कोई मुस्लिम व्यक्ति हिन्दू धर्म स्वीकार कर ले तब देखिये कैसा हंगामा होता है और “वोट बैंक के सौदागर” और दूसरों (यानी हिन्दुओं) को उपदेश देने वाले बुद्धिजीवी कैसे घर में घुसकर छुप जाते हैं। इसके कई उदाहरण हमारे सामने हैं (ताजा मसला चांद-फ़िजा तथा इससे पहले कोलकाता का रिज़वान हत्या प्रकरण, जिसमें मुस्लिम से हिन्दू बनने पर हत्या तक हो गई)। लेकिन इस कथित “शांति का संदेश देने वाले” और “सभ्य” इस्लाम के अनुयायियों ने केरल में 1946 में ही उन्नियन साहब (मुस्लिम से हिन्दू बनने के बाद उसका नाम “रामासिंहम” हो गया था) और उनके परिवार की मलाबार इलाके के मलप्पुरम (बहुचर्चित मलप्पुरम हत्याकाण्ड) में सरेआम हत्या कर दी थी, क्योंकि “रामासिम्हन” (यानी उन्नियन साहब) ने पुनः हिन्दू धर्म स्वीकार कर लिया था। उस समय भी इन तथाकथित प्रगतिशील वामपंथियों ने पुलिस की जाँच को विभिन्न तरीके अपनाकर उलझाने की भरपूर कोशिश की थी ताकि असली मुजरिम बच सकें (EMS के चुनिंदा लेख (Vol.II, pp 356-57) और इनके तत्कालीन नेता थे महान वामपंथी ईएमएस नम्बूदिरिपाद। केरल की ये पार्टियाँ आज 60 साल बाद भी मुस्लिम तुष्टिकरण से बाज नहीं आ रही, बल्कि और बढ़ावा दे रही हैं।

हिन्दू विरोध धीरे-धीरे कम्युनिस्टों का मुख्य एजेण्डा बन गया था, 1968 में इसी नीति के कारण देश में एक “शुद्ध मुस्लिम जिले” मलप्पुरम का जन्म हुआ। आज की तारीख में यह इलाका मुस्लिम आतंकवाद का गढ़ बन चुका है, लेकिन देश में किसी को कोई फ़िक्र नहीं है। केरल सरकार ने मलप्पुरम जिले में अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय की शाखा खोलने के लिये 24 एकड़ की ज़मीन अधिगृहीत की है, जिसे 1000 एकड़ तक बढ़ाने की योजना है, ताकि राज्य में जमात-ए-इस्लामी का “प्रिय” बना जा सके (अब आप सिर धुनते रहिये कि जब पहले से ही जिले में कालीकट विश्वविद्यालय मौजूद है तब उत्तरप्रदेश से हजारों किमी दूर अलीगढ़ मुस्लिम विवि की शाखा खोलने की क्या तुक है, लेकिन भारत में मुस्लिम वोटों के लिये “सेकुलरिज़्म” के नाम पर कुछ भी किया जा सकता है), भले ही केरल की 580 किमी की समुद्री सीमा असुरक्षित हो, लेकिन इस प्रकार के मूर्खतापूर्ण कामों पर पैसा खर्च किया जा रहा है।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

, , , , , , , ,

24 comments:

आशीष कुमार 'अंशु' said...

उम्मीद है भाग -२ में आप मुक्ति का कोई मार्ग सुझाएंगे?

संजय बेंगाणी said...

हिन्दुओं की एक कमी मार्गदर्शन के लिए दुसरे का म्ऊँह ताकने की रही है.

पंकज बेंगाणी said...

उंगली उठा रहे हैं आप तो... डी. श्रीनिवास से बचना.. हाथ काट देगा वो.. लालू रोलर भी चलवा सकता है.


हाँ दोनो छुट्टे घूम रहे हैं.. परंतु जेल में बंद वरूण सुरक्षित है. आप लेकिन बाहर हैं!!

परमजीत बाली said...

आज राजनिति भांडनिति बन चुकी है।पता नही इन्हें कब होश आएगा ?अपने फायदे के लिए यह क्या क्या कर गुजरते हैं।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

सही और साफ बात कहते हैँ आप सुरेश भाई - परँतु ज़हर उतारने का मार्ग भी सुझायेँ ...

- लावण्या

दहाड़ said...

HAR KOI SOLUTION PUCHTA HAI.ARE SOLUTION TO HAMARE HI PASS HAI,AGAR HUM BHI SANGTHIT TAREEKE SE VOTING KARENGE TO SAB HAMEN BHI POOCHENGE.VARNA KHATE RAHO JUTE.
WAHEGURU KE ASHIRWAD SE SIKHON NE YEH KAR DIKHAYA.CONGRESS BHI GHUTNON KE BAL AA GAYEE HAI.
AB HINDUON KI BAREE HAI. SADAK,PANI BIJLEE TO HAR SARKAR KO KARNA HEE HAI CHAHE KISEE KI BHI BANE.LEKIN VOTE SIRF HINDUON KE SATH KHADE LOGON KO DENA CHAHIYE.
VARNA APNE BACHHON KO ABHI SE KHATNA KYA HOTA HAI BATA DIJIYE TAKI JAB HOGA TAB DARD KAM HOGA

Anil Pusadkar said...

ऐसे ही लिखते रहे तो वरुण टाईप लपेट देंगे धर्मनिरपेक्ष लोग आपको।

Anil Pusadkar said...

ऐसे ही लिखते रहे तो वरुण टाईप लपेट देंगे धर्मनिरपेक्ष लोग आपको।

mahashakti said...

आपने अपने लेख में सच्‍चाई से अवगत कराया जो वास्‍तविकता है वही बताया

मुनीश ( munish ) said...

Secularism --this word came in our samvidhaan in mid seventies only. Do u know that mass conversion is legally banned in France --the originator of equality, liberty and fraternity .So called secularists will eat this country away !

मुनीश ( munish ) said...

Apke lekhan mein Nana Patekar ki pratidhvani hai.Sahi hai !

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

जस्टिस गीता मित्तल के पाबन्दी के मुताल्लिक़ फैसले के बाद देश के अलग अलग इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद तरह तरह की बातें मीडिया की पसंदीदा चीज़ बन गई है एक नया पहलू बातचीत में लाया गया है वह मुस्लिम गैर सरकारी इदारों को मिलने वाली माली इमदाद का है भारत सरकार के आंकडों की रौशनी में अपने अपने अंदाज़ से रंग भरे हैं शुरू में इस विषय पर जरी किए गए आंकडे और सरकारी मुक्त नज़र पेश करके फ़िर उन पर तन्कीदी नज़र डाली जायेगी अलग अलग अख़बारों में अलग अलग से अंदाज़ में बातें की गईं हिन्दी राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी से ही आप विषय की ज़हरनाकी का अंदाज़ लगा सकते हैं "आतंक की पूंजी की कुंजी कहाँ है?" "हाथ पैर मरती खुफिया एजेंसियां हलकान" ख़बर में बताया गया कि मुल्क में २००४-२००५ में १७१४५ गैर सरकारी इरादे काम कर रहे थें जिन्हें ५०१५ करोड़ रुपये विदेशों से वसूल हुए थे ये रक़म १९९७ में ९०० करोड़ रुपये थी देश में हर साल १० करोड़ रुपये की मदद हासिल करने वाले ५९ गैर सरकारी इदारे (एनजीओ) हैं जबकि उसमें एक भी मुस्लिम इदारा नहीं है और ८०% ईसाई हैं और बाकी हिंदू हैं भारत में १५२ मुमालिक पैसा भेज रहे हैं जिनमे अमेरिका का हिस्सा ३४% यानि १६ अरब ७९ करोड़ रुपये है इटली का ३ अरब चार करोड़, इंग्लैंड ६ अरब ७९ करोड़ रुपये, होलैंड २ अरब ३७ करोड़ रुपये वार्षिक भेजते हैं सबसे ज़्यादा पैसा डेल्ही, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, और महाराष्ट्र को जा रहा है वित्त मंत्रालय ये जानने और देखने की कोशिश कर रहा है की मुस्लिम एनजीओ को कहाँ से पैसा आ रहा है? जवाब है हवाला के ज़रिये से? ख़बर पड़ते ही एक अजीब सी कैफियत मेरे ज़हन में आई और मुझे इकबाल का ये शेर याद आ गया "खुदाया तेरे सादा दिल बन्दे किधर जायें, कि दुर्वेशी भी अय्यारी, सुल्तानी भी अय्यारी"! पैसा आए तो बुरा न आए तो बुरा भारत में बड़े मदारिस कि साफ में सबसे बड़ा इदारा दारुल उलूम देवबंद है जिसका २००८ का बजट महज ११ करोड़ ४० लाख का है एक दूसरा बड़ा इदारा मेरे हिसाब से शायेद नदवातुल उलेमा लखनऊ है और तीसरा शायेद सबसे बड़ा इदारा जमीअतुल फलाह आजमगढ़ है जहाँ ४५०० स्टुडेंट पढ़ते और रहते हैं जिनका सालाना खर्चा १६ करोड़ रूपया है बकिया मदारिस इनसे छोटे ही हैं अब बहुत बड़े मदारिस का कुल बजट इतना है कि जितना कम मदद लेने वाले इदारों का हिसाब देखा गया है यानि १० करोड़ से ऊपर रुपया लेन वाली संस्थाओ का जबकि हकीक़त ये है कि --१. ज्यादातर मुस्लिम इदारे इतने बड़े नही हैं कि उनका खर्च पचासों करोड़ में हो२. ये इदारे अपने सभी बजट देसी ज़रिये से हासिल करते हैं३. बड़ी तादाद में मुस्लिम इदारों के साथ वक्फ जायदादे जुड़ी हुई हैं सिर्फ़ बकरीद में हलाल जानवरों कि खल अरबों रुपये कि होती है४. १९९० में मुस्लिम इदारा एकम्यु कि रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय मुसलमान वार्षिक ९ अरब रुपया सिर्फ़ ज़कात अदा करते हैं उसके अलावा इमदाद, उश्र और खुम्स कि शकल में फसलों कि जकात बड़े पैमाने पर अदा कि जाती है५. हर मुसलमान पर ईद कि नमाज़ से पहले सदका ऐ फ़ित्र अदा करता है हिन्दोस्तान में १५ करोड़ मुसलमान हैं सद्क़तल- फितर कि रक़म हीकितने अरब रुपये होगी?६. खर्च कि मद देखें तो मुस्लिम इदारों में अखाराजत दीगर इदारों के मुकाबले में न के बराबर होते हैं दारुल उलूम देवबंद के उस्तादों कि तनख्वाह और सहूलियतों का मुकाबला किसी भी फलां फलां के उस्तादों कि तनख्वाह, अलाउंस, कोठी, कार, से करके देख ले तो खद बी ख़ुद अंदाजा हो जाएगा कि बहार के पैसे कि ज़रूरत क्यूँ नही होती?

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

Waiting for the part 2

cmpershad said...

कौन कहता है हिंदू बहुसंख्यक है। अभी हाल ही के एक न्यायाधीश ने कहा है कि हिंदू तो अल्पसंख्यक है क्यों कि वे संप्रदायों में बटे हुए हैं। हमें तो सरकार अल्पसंख्यक घोषित करें और सारी सुविधाएं दें जो अल्पसंख्यक के नाम पर दी जा रही हैं।

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

What is the definition of "Talibanikaran"? Can anybody tell me? Who invent this word and in whcih dictionery it is mentioned with its meaning?

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

और हाँ, वेदों को ज़रूर पढें ....... यह एक गुज़ारिश है मेरे सभी हिन्दू भाईयों से....

dschauhan said...

लेख में सच्‍चाई है!कल भी गरीबों का धर्म रोटी था, और आज भी रोटी ही है! उन्होने कोई धर्म परिवर्तन नहीं किया है जहाँ पर उनकों रोटी का लालच मिलता गया वे वहा तक चले गए! दूरी ज्यादा हो गई तो वापस नहीं आए! और अगर वापसी की सोची तो रोटी देने वालों ने मौत दीखाकर वापसी के रास्ते बंद कर दिए! हमारे कुछ मित्रों ने सही सलाह दी है कि समाधान हमारे ही हाथों में है! 100% मतदान कर सही चुनाव करें! सत्ता मेंजब सही सरकार आएगी तो यह सब कारोबार बंद हो जायेंगे!

वीरमदेव की चौकी से ......... said...

सुरेषजी
आपने लिखने में तथा कहने में जीतना सटीक लिखा है वह दिमाग में हलचल पैदा करने के लिए, पढने वाले में, चेतना जगाने के लिए, देखने वाले की आंख खोलने के लिए, सुनने वाले के कानों को झंकृत करने के लिए सम्पूर्ण है। आपकी इस खोज पूर्ण ब्लोग लेखनी को जितना सराहा जाये तो भी वह कम पडेगा। मुझे महिम्न का श्लोक याद आ गया कि लिखति यदि शारदा सर्व कालम् त्वगुणानामं पारम न याति। आपके लिखे हुये को पढ़ना अच्छा लगता है। यह इस देष तथा इसमें रहने वाले हिन्दू समाज का दुर्भाग्य है कि उसके अपने लोग जो अपने आपको इस समाज का हिस्सा कहते है। उस नाम पर वोट लेते है। जातिवादी राजनीति करते है। वे सभी लोग उस समाज के शत्रु बने हुये है। स्वात घाटी में जो कुछ घट रहा है क्या वह इन अंधों को राह दिखाने के लिए पर्याप्त नहीं है। इस देष में तालिबानी मानसिकता बढने पर सबसे पहला प्रहार इन कथित शर्म निरपेक्षों पर ही होगा। कारण तालिबानियों के नजदीकी मित्र यह लोग तो है।
लिखने में, कहने में आपने संघियों तथा पूराने जनसंघियों को पीछे छोड दिया। भाजपा वाले तो स्वयं भी कुछ-कुछ शर्म निरपेक्ष बनने की छदम राह पर है। इस कारण उनके लिए कुछ कहना, उनसे कुछ अपेक्षा करना गलत होगा। इस पर भी इस देष में एक संगठित प्रयास बहुत आवष्यक है। जो देष में बढते इस तालिबानी प्रयासों को जवाब दे सके। तालिबानी मानसिकता से लडने की जिम्मेदारी हम सबकी सांझी बनती है। उसके लिए एक कोमन मिनिमम प्रोग्राम बनना चाहिए। इसके लिए हम सबको मिलकर, बैठकर चिंतन करना चाहिए। इसके पुरोधा तथा अग्रेसर आप बने। ऐसी कामना है। महाकाल की नगरी से कोई हंुकार तो उठे। एक पुराने उपन्यास जय महाकाल के कुछ पन्ने लिख रहा हूॅ - ‘‘ महाकल में प्रजाजनों, महाकल की धरती म्लेच्छों से आक्रान्त है। पंचनद और सिंधु प्रदेष आततायी वयनों की दासता को गले का हार बना चुके है। अभी तक दोपहर की बात है: गौतमेष्वर के महालिंग पर दम्भी और दुर्नीत म्लेच्छराज ने अपनी गदा से प्रहार किया है। लोग सुनकर स्तब्ध रहे गए! एक मौन, मारक शान्ति छा गई और तभी, सहसा एक घोष उठा - ‘‘ हम म्लेच्छराज से लड़ेगे ! ‘‘युद्ध करेगे! युद्ध होगा!!’’ लोगों ने चिल्लाकर कहा। ‘‘तथास्तु!’’ कापलिक बोला - ‘‘ एक ऐसा युद्ध, जैसा आज तक न हुआ। मैं कहता हूूॅ, यदि इस युद्ध की दुंदुभि देष-देष, द्वार-द्वार न बजी तो याद रहे-सोमनाथ फिर टूटेगा और फिर से लूटा जाएगा! ...... उज्जयिनी का विध्वंस होगा और पतीत पावनी क्षिप्रा म्लेच्छों के मलमूत्र के स्पर्ष से दुखी होकर, हाहाकार कर उठेगी! इसलिए हम कहते हैः युद्ध होगा! ..... महा मालव की भाग्यवती भूमा के दुलारों, पहाडों की तरह उठो और वज्रों की तरफ शत्रुओं पर टूट पड़ो! क्षिप्रा की लहर-लहर पुकार रही है! बूंद-बूंद तुम्हारी बाट जोह रही है। देखता हूॅः कौन सबसे पहले माॅ के आॅसू पोंछता है? देखता हॅॅू कौन मालवी आर्यावर्त की स्वाधीनता की प्रचंड पताका गगनांगनों की गोद में फहराता है! उठो, एक प्रलयंकर बाढ़ बन कर! हजार-हजार सूरज और हजार-हजार ज्वालामुखी बन कर! आज से तुम में से प्रत्येक माई का लाल, महाकाल है! और मैं, नागों के नाग इस महानाग की शपथपूर्वक कहता हूॅ कि जब तक त्रिषुल की ऊॅंची नोक म्लेच्छों के मुंडमाल से नहीं ढॅक जाती, मैं केवल पवन पी कर जीवन निर्वाह करूंगा! .... आज से मुझे अन्न-जल की शपथ! आज से मेरा प्ररा है कि रिपुओं के रक्त से मालवा की मिट्टी का सिंचन करता रहूॅगा, जब तक कि माटी यह काली न पड़ जाए, काली का रूप धारण न कर ले ! इसलिए हमारा नारा युद्ध और घोर युद्ध! कि देवालय रक्षित रहे, मूर्तियाॅ कभी खंडित न हों, बहनें और बहुएॅ म्लेच्छों की सेज न सजाएॅ!’’.....
‘‘ हम विधर्मियों की उन सेजों पर बिजलियाॅ गिराएॅगी!’’ एक ओर से आवंतिकाओं और मालविकाओं का सम्मिलित स्वर आया। इस स्वर की कोमलता में सर्वस्व स्वाहा कर देने का दुर्दम्य, भयंकर विष्वास भरा था। ! सुनकर, कापालिक भी सहम गया, एक निमेष, एक पल के लिए - ‘‘ तो दुर्गा और भवानी बनो! भवानी और चण्डी बनो! आज आर्यावर्त की वसुंधरा को विधर्मियों की वासना के विनाष-पाष से परे रखना ही होगा! आज आत्म-बलिदान ‘मुक्ति’ बनेगा! ‘स्वाहा’- ‘स्वाहा’ की हमारी आहुतियों के स्वरों की भीड़ में सिद्धियाॅ ठोकरें ..... आगे बढ़ों, संघर्षरण के के ताम्र-पत्रोंपर अपने लहू से अपने नाम लिखो। शत्रुओं के विनाष की षिलापर अपने करालक्रोध की मसि से अपने नाम लिखो! मुक्तियाॅ नहीं चाहिए; सिद्धियाॅ नहीं चाहिए; कल्याण की कामना नहीं, सफलताओं की इच्छा नहीं ! वर्ग, अपवर्ग, स्वर्ग; पृथ्वी, पाताल, परलोक; तल, अतल, वितल; कुछ न चाहिए! अभिलाषा केवल एक ही है: स्वतंत्रता के प्रदीप पर, शलभ बनकर, स्वाहा हो जाएॅ ! मुक्ति की मषाल जलाएॅ, बुझे जो कभी नहीं! प्रकाष जिसका युगान्तरांे तक, सबको मिले, समान रूप से मिले ! उठो, महाकाल आज तुम्हारे द्वार पर खूनी खप्पर लिए खड़ा है! ....युद्ध होगा, भैरव नाचेगा...ष्रूद्र का ताण्डव होगा ,.... काली कपालों से खेेलेगी... युद्ध अवष्य होगा ! ...’’ और उस युद्ध में तथा इस युद्ध में सर्वस्व अर्पण करना होगा।

Pratik Jain said...

अभी तक कि‍तने उदाहरण हैं कि‍सी मुस्‍लि‍म या इसाइ के हिंदू बनने के
?

दिल दुखता है... said...

वामपंथियों की कारगुजारी को उजागर करने की लिए धन्यवाद्... ये तो आजादी के पहले से ही, देश के साथ गद्दारी करने में लगे है... और पोपले मुह से गरीबी की बात करते है.. धर्म निरपेक्षता की बात करते है.. पर हकीकत में हिन्दू विरोदी और अन्य धर्मों का पक्ष लेने वाले है... क्योकि हिन्दू ने अभी तक सहन शीलता नहीं छोड़ी है... जबकि अन्य इसके विपरीत है... उल्टा बोलने पर वो अपने भाइयों को ही नहीं छोड़ते तो इन्हें क्या छोडेंगे इस डर से और अपनी राजनितिक रोटियां सकने की गन्दी सोच की वजह से सम बात नहीं करते. सदा से एक पक्षीय बात करते है.. जिसके चलते अब हिन्दू भी क्रोधित हो कर अपना पक्ष रखने लगा है.. और रखना भी चाहिए जब तक समाज में समानता की बात न की जाये... आपके लेख की प्रतीक्षा रहेगी...

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

hinddoo ek haari huyi gulam kaum hai, jiske andar swabhiman jaisi koi cheej nahin hai, jisne gulami se kuchh nahi seekhan, inhen maaro peeto, ye apna achchhha bura soch hi nahi sakte.mera man to gaali dene ko karta hai.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

hinddoo ek haari huyi gulam kaum hai, jiske andar swabhiman jaisi koi cheej nahin hai, jisne gulami se kuchh nahi seekhan, inhen maaro peeto, ye apna achchhha bura soch hi nahi sakte.mera man to gaali dene ko karta hai.

Readers Cafe said...

Aaage kya hoga pata nahi lekin itna jaroor maloom hai Bharat ke gulam hone ki shuruwat east India company ke aagman se kuch isi terah hui thi.

baatapni said...

MUSLIM VIRODH KI BUNIYAD PAR TIKA HUA BLOG, FUNDED BY SANGHPARIVAR