Monday, April 6, 2009

कुछ विदेशी मदद लेने-देने वाली संस्थाओं का लेखा-जोखा : क्या कोई गम्भीर साजिश दिखाई देती है? Foreign Funds Charity Conversion India

पश्चिमी देशों से भारत की विभिन्न धर्मादा संस्थाओं को दान में लाखों रुपये मिलना कोई नई बात नहीं है। भारत सरकार द्वारा इस प्रकार की सामाजिक, धार्मिक संस्थाओं, NGO आदि को विदेश से मिलने वाली मदद प्राप्त करने के लिये विशेष कानून भी बनाया हुआ है। आर्थिक उदारीकरण का दौर शुरु होने से भी पहले भारत के कई संगठनों को विदेश से चन्दे में रकम प्राप्त होती रही है, जो कि धीरे-धीरे बढ़ती ही गई है।

हमें अक्सर उड़ीसा, तमिलनाडु, कर्नाटक और केरल आदि राज्यों में मिशनरी द्वारा धर्मान्तरण की खबरें सुनाई देती हैं, “संघी” लोग हो-हल्ला मचाते हैं, एकाध स्वामी जी हत्या होती है, सरकारें जाँच का नाटक करती हैं, फ़िर लोग हमेशा की तरह जल्दी ही सब भूल जाते हैं, लेकिन ऐसी घटनायें रह-रहकर होती हैं। इसी प्रकार देश में विभिन्न मदरसों, जमातों और अन्य मुस्लिम सामाजिक संस्थाओं को खाड़ी देशों और ईरान, लीबिया आदि देशों से पैसा सतत आता है। रह-रहकर सवाल उठता है कि आखिर ये अमीर पश्चिमी देश भारत जैसे देश में लाखों-करोड़ों डालर का चन्दा क्यों भेजते हैं? क्या इसलिये कि भारत एक गरीब देश है? लेकिन क्या उन देशों में गरीब नहीं पाये जाते? और चन्दे-दान-मदद के रूप में इतनी बड़ी राशि देने के बाद क्या ये देश उसे भूल जाते हैं? क्या अपने दिये हुए करोड़ों रुपये की उपयोगिता और उसके परिणाम (OUTPUT) के बारे में बिलकुल भी पूछताछ या चिन्ता नहीं करते? ऐसा तो हो नहीं सकता, क्योंकि जो भी दान दे रहा होगा, कम से कम वह उसके बारे में “अपेक्षा” तो रखेगा ही कि आखिर जिस “काम” के लिये वह चन्दा दे रहा है, वह “काम” ठीक से हो रहा है या नहीं।

हाल ही में एक पत्रकार संजीव नैयर ने सन् 2006-07 से अब तक भारत में आये हुए कुल आधिकारिक विदेशी धन, उसके स्रोत, धन पाने वाली संस्थाओं और क्षेत्रों का अध्ययन किया और उसके नतीजे बेहद चौंकाने वाले रहे। उन्होंने भारत सरकार की विदेशी मदद और चन्दे सम्बन्धी आधिकारिक वेबसाईट (यहाँ देखें) से आँकड़े लिये और उनका विश्लेषण किया। भारत में आये हुए विदेशी चन्दे में सबसे बड़ा हिस्सा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, इटली और स्पेन से आता है। आईये संक्षेप में देखें इस विदेशी मदद का गोरखधंधा, शायद आपकी आँखें भी फ़टी की फ़टी रह जायें –

1) 1993-94 से 2006-07 के बीच भारत में कुल 64,670 करोड़ रुपये का विदेशी चन्दा आया (यह आँकड़ा रजिस्टर्ड संस्थाओं द्वारा आधिकारिक रूप से प्राप्त चन्दे का है)।

2) 1993 में विदेशी चन्दा आया था 1865 करोड़ रुपये जबकि 2007 में आया 12990 करोड़ रुपये, यानी कि 650% की बढ़ोतरी… (क्या इसका अर्थ ये लगाया जाये कि 1993 के बाद भारत में गरीबों की संख्या में भारी बढ़त हुई है?)

3) जितनी संस्थायें 1997 में विदेशी चन्दे का हिसाब देती थीं और जितनी संस्थाएं 2006 में हिसाब देती हैं उनका प्रतिशत 66% से घटकर 56% हो गया है। इसका साफ़ मतलब यह है कि 12990 करोड़ का जो आँकड़ा है वह वास्तविकता से बहुत कम है और कई संस्थाएं झूठ बोल रही हैं।

4) गत पाँच वर्ष से जब से माइनो आंटी सत्ता में आई हैं, विदेशी मदद का प्रतिशत 100% से भी अधिक बढ़ा है।

5) सर्वाधिक चन्दा लेने वाली संस्थायें “संयोग से” (???) ईसाई मिशनरी हैं, जिन्हें अमेरिका, जर्मनी और ब्रिटेन से 2002-2006 के दौरान क्रमशः 10,589 करोड़, 5233 करोड़ और 4612 करोड़ रुपये मिले हैं। पश्चिमी देशों से अधिक चन्दा प्राप्त करने में अपवाद है दलाई लामा का धर्मशाला स्थित दफ़्तर।

6) विदेशी चन्दा प्राप्त करने में अव्वल नम्बर हैं तमिलनाडु, दिल्ली, आंध्रप्रदेश और महाराष्ट्र… (यानी कि “एक और संयोग” कि यहाँ भी 4-5 साल से UPA सत्ता में है)।

7) तमिलनाडु को सन् 2002 में 775 करोड़ का विदेशी चन्दा मिला था जबकि 2006 में 2244 करोड़ रुपये, “संयोग” से 200% की भारी-भरकम बढ़ोतरी।

8) विदेशी मददगारों(?) की लिस्ट में मुस्लिम देशों से कोई भी उल्लेखनीय नाम नहीं मिलता अर्थात या तो वे बेहद ईमानदार हैं या फ़िर “हवाला रूट” का उपयोग करते हैं।

2006-07 के टॉप 6 दानदाता संस्थायें और देश –

1) Misereor Postfach, Germany – 1244 करोड़ रुपये

2) World Vision (Gospel for Asia), USA – 469 करोड़ रुपये

3) Fundacion Vincente Ferrer, Spain – 399 करोड़ रुपये

4) ASA Switzerland – 302 करोड़ रुपये

5) Gospel For Asia – 227 करोड़ रुपये…

6) M/s Om Foundation, USA - 227 करोड़ रुपये

इनमें से सिर्फ़ ओम फ़ाउंडेशन यूएस, का नाम हिन्दू संगठन जैसा लगता है जिन्होंने दलाई लामा को चन्दा दिया है, बाकी सारी संस्थायें ईसाई मिशनरी हैं। ये तो हुई टॉप 6 दानदाताओं की आधिकारिक सूची, अब देखते हैं टॉप 6 विदेशी मदद(?) पाने वाली संस्थाओं की सूची –

2003-2006 के दौरान कुल विदेशी चन्दा लेने वाली टॉप 6 संस्थाओं की सूची –

1) Ranchi Jesuits, Jharkhand – 622 करोड़

2) Santhome Trust of Kalyan, Maharashtra – 333 करोड़

3) Sovereign Order of Malta, Delhi – 301 करोड़ रुपये

4) World Vision of India, Tamil Nadu – 256 करोड़ रुपये (इस संस्था पर “सुनामी” विपदा के दौरान भी गरीबों और बेघरों को पैसा देकर धर्मान्तरण के आरोप लग चुके हैं)

5) North Karnataka Jesuit Charitable Society – 230 करोड़ रुपये (अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक विवादास्पद पुस्तक छापने पर चर्च-विहिप विवाद, में शामिल ईसाई संस्था इसकी Subsiadiary संस्था है)

6) Believers Church India, Kerala – 149 करोड़ रुपये।

यह तमाम डाटा भारत सरकार के FCRA रिपोर्ट पर आधारित है, हो सकता है कि इसमें कुछ मामूली गलतियाँ भी हों…। भारत में गत कुछ वर्षों से असली-नकली NGO की बाढ़ सी आई हुई है, इस सम्भावना से इनकार नहीं किया जा सकता कि NGO का “मुखौटा” लगाये हुए ये संस्थायें किसी “गुप्त खतरनाक खेल” में लिप्त हों। जब सूचना का अधिकार लागू किया गया था उसी समय यह माँग उठी थी कि इस कानून के दायरे में सभी प्रकार के NGO को भी लाया जाये, ताकि सरकार की नज़र से बचकर जो भी “काले-सफ़ेद काम” NGO द्वारा किये जा रहे हैं उन्हें समाजसेवियों द्वारा उजागर किया जा सके, हालांकि हाल ही में सुनने में आया है कि सूचना अधिकार का यह कानून NGO पर भी लागू है, लेकिन अभी इस सम्बन्ध में कई बातों पर स्थिति अस्पष्ट है।

अब यह पाठकों पर निर्भर करता है कि वे इन आँकड़ों को वे किस सन्दर्भ में लेते हैं, इनका क्या मतलब निकालते हैं, लेकिन यह भी सच है कि गत 15 वर्षों में उत्तर-पूर्व में भी धर्मान्तरण को लेकर आये दिन विवाद होते रहे हैं, उत्तर-पूर्व के कुछ राज्यों में 1947 से 2007 के बीच ईसाई जनसंख्या में भारी बढ़ोतरी हो चुकी है तथा कहीं-कहीं मूल आदिवासी आबादी “अल्पसंख्यक” बन चुकी है। यह स्थिति असम के कई जिलों में भी आ चुकी है, जहाँ मुस्लिम धर्मान्तरण और बांग्लादेशी घुसपैठियों के कारण हिन्दू आबादी अल्पसंख्यक हो गई है…और सरेआम पाकिस्तानी झण्डे लहराये जा रहे हैं।

वैसे भी ये आँकड़े “शर्मनिरपेक्ष” नामक बेशर्मों के लिये नहीं हैं और न ही “कमीनिस्ट” नामक (यहाँ एक असंसदीय शब्द मन ही मन पढ़ा जाये) के लिये…

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12 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह खेल सुस्पष्ट है व ज्ञात है. मगर इस तरह से होता है कि "क्या कर लोगे?"

यह तो था वैध तरिके से आया धन. खाड़ी देशों से हवाला मार्फत आता है उसका क्या?

लफत्तू said...

बेत्ते, जे केल तो भौत पेले से चल्लिया ए।

छाले बेईमानों छे जीतना मुछकिल है।

P.N. Subramanian said...

बहुत ही चौकाने वाली जानकारी.

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

ईसाई धर्म मेँ प्रचार और कन्वर्ज़न को भी धार्मिक मान्यता का एक मुख्य अँग गिना गया है
हिन्दु सँगठनोँ को गरीब हिन्दु प्रजा के लिये ठोस प्रयास करना जरुरी है -
अन्यथा पैसा बहा ले जायेगा कईयोँ को
- लावण्या

cmpershad said...

बात केवल इतनी सी है कि भारत को छोड़ कर अब और कोई जगह नहीं बची है धर्मान्तरण के लिए। सारे यूरोप में इसाई धर्म है, अरब व अफ्रीकी देशों में या तो ईसाई हैं या मुस्लिम, रूस और चीन में तो कोई धर्म नहीं जा सकता। तो बचा कौन जिस पर पैसा लगाया जा सके?

Anil Pusadkar said...

छत्तीसगढ मे भी सैकडो एन जी ओ का पता चला है।वैसे संजय सही कह रहे है,उनसे सहमत हूं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

सीएम प्रसाद साहब ठीक कह रहे हैं. वैसे मैं इन संस्थाओं को लिखूंगा कि मुझे भी एक करोड़ का चन्दा दे दें तो मैं कुछ एकड़ बंजर भूमि पर वृक्षारोपण करा दूं. हो सकता है इतने बडे़ दानदाता मुझे भी एक मौका दे दें.

निशाचर said...

सुरेश जी, इनमें से एक संस्था world vision india को मैं अच्छी तरह जानता हूँ. एक दशक पहले यह संस्था अपने यहाँ सभी धर्मावलम्बियों को नौकरी पर रखती थी. फिलहाल इनका नियम है केवल ईसाईयों को अपने यहाँ नौकरी पर रखने का. आप जानकर हैरान रह जायेंगे कि सभी कर्मचारी धर्मान्तरित इसाई हैं जिनमें कुछ मुसलमान से इसाई बने हुए लोग भी है. यानि पैसे का चुम्बक सभी को खींच रहा है. यह सभी पहली पीढी के धर्मान्तरित हैं और अधिकांश के रिश्तेदार यहाँ तक कि भाई -बहन, माता - पिता आदि अभी भी अपने मूल धर्म का ही पालन करते हैं. सभी पढ़े - लिखे और उच्च शिक्षा प्राप्त हैं. उत्तर प्रदेश में खासकर पूर्वांचल में (बलिया से लेकर बरेली तक) हर जिले में इनके प्रोजेक्ट चल रहें हैं जो पोलियो उन्मूलन, स्त्री सशक्तिकरण, बाल कल्याण की आड़ में धर्मान्तरण का कार्य कर रही है. उत्तराँचल में इनका विस्तार ज्यादा नहीं हो पाया है क्योंकि वहां अभी हिन्दू धार्मिक आस्थाएं प्रबल हैं और लालच का दांव चल नहीं पाया है. साथ ही उत्तराँचल के आदिवासी इलाके बाहरियों के लिए वर्जित क्षेत्र घोषित होने के कारण यह निर्द्वंद होकर वहां अपना कार्यक्रम नहीं चला पाते. लखनऊ में २००४ में इनका एक प्रोजेक्ट मॉनीटरिंग ऑफिस खुला था. आज उसके अंतर्गत केवल लखनऊ में ही ६ प्रोजेक्ट ऑफिस स्थापित हो चुके हैं. सामान्य से चपरासी की तनख्वाह भी १२-१५ हजार है. २००४ में UP PROJECT HEAD की तनख्वाह ५०,००० महीना थी. इसी से आप समझ सकते है कि किस तरह पैसे का खेल चल रहा है.

Santhosh said...

अच्छी लेखनी हे / पड़कर बहुत खुशी हुई /

आप जो हिन्दी मे टाइप करने केलिए कौनसी टूल यूज़ करते हे...? रीसेंट्ली मे यूज़र फ्रेंड्ली इंडियन लॅंग्वेज टाइपिंग टूल केलिए सर्च कर रहा ता, तो मूज़े मिला " क्विलपॅड " / आप भी " क्विलपॅड " यूज़ करते हे क्या...?

www.quillpad.in

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...

जस्टिस गीता मित्तल के पाबन्दी के मुताल्लिक़ फैसले के बाद देश के अलग अलग इलाकों में हुए बम धमाकों के बाद तरह तरह की बातें मीडिया की पसंदीदा चीज़ बन गई है एक नया पहलू बातचीत में लाया गया है वह मुस्लिम गैर सरकारी इदारों को मिलने वाली माली इमदाद का है भारत सरकार के आंकडों की रौशनी में अपने अपने अंदाज़ से रंग भरे हैं शुरू में इस विषय पर जरी किए गए आंकडे और सरकारी मुक्त नज़र पेश करके फ़िर उन पर तन्कीदी नज़र डाली जायेगी अलग अलग अख़बारों में अलग अलग से अंदाज़ में बातें की गईं हिन्दी राष्ट्रीय सहारा की सुर्खी से ही आप विषय की ज़हरनाकी का अंदाज़ लगा सकते हैं "आतंक की पूंजी की कुंजी कहाँ है?" "हाथ पैर मरती खुफिया एजेंसियां हलकान" ख़बर में बताया गया कि मुल्क में २००४-२००५ में १७१४५ गैर सरकारी इरादे काम कर रहे थें जिन्हें ५०१५ करोड़ रुपये विदेशों से वसूल हुए थे ये रक़म १९९७ में ९०० करोड़ रुपये थी देश में हर साल १० करोड़ रुपये की मदद हासिल करने वाले ५९ गैर सरकारी इदारे (एनजीओ) हैं जबकि उसमें एक भी मुस्लिम इदारा नहीं है और ८०% ईसाई हैं और बाकी हिंदू हैं भारत में १५२ मुमालिक पैसा भेज रहे हैं जिनमे अमेरिका का हिस्सा ३४% यानि १६ अरब ७९ करोड़ रुपये है इटली का ३ अरब चार करोड़, इंग्लैंड ६ अरब ७९ करोड़ रुपये, होलैंड २ अरब ३७ करोड़ रुपये वार्षिक भेजते हैं सबसे ज़्यादा पैसा डेल्ही, तमिलनाडु, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक, और महाराष्ट्र को जा रहा है वित्त मंत्रालय ये जानने और देखने की कोशिश कर रहा है की मुस्लिम एनजीओ को कहाँ से पैसा आ रहा है? जवाब है हवाला के ज़रिये से? ख़बर पड़ते ही एक अजीब सी कैफियत मेरे ज़हन में आई और मुझे इकबाल का ये शेर याद आ गया "खुदाया तेरे सादा दिल बन्दे किधर जायें, कि दुर्वेशी भी अय्यारी, सुल्तानी भी अय्यारी"! पैसा आए तो बुरा न आए तो बुरा भारत में बड़े मदारिस कि साफ में सबसे बड़ा इदारा दारुल उलूम देवबंद है जिसका २००८ का बजट महज ११ करोड़ ४० लाख का है एक दूसरा बड़ा इदारा मेरे हिसाब से शायेद नदवातुल उलेमा लखनऊ है और तीसरा शायेद सबसे बड़ा इदारा जमीअतुल फलाह आजमगढ़ है जहाँ ४५०० स्टुडेंट पढ़ते और रहते हैं जिनका सालाना खर्चा १६ करोड़ रूपया है बकिया मदारिस इनसे छोटे ही हैं अब बहुत बड़े मदारिस का कुल बजट इतना है कि जितना कम मदद लेने वाले इदारों का हिसाब देखा गया है यानि १० करोड़ से ऊपर रुपया लेन वाली संस्थाओ का जबकि हकीक़त ये है कि --१. ज्यादातर मुस्लिम इदारे इतने बड़े नही हैं कि उनका खर्च पचासों करोड़ में हो२. ये इदारे अपने सभी बजट देसी ज़रिये से हासिल करते हैं३. बड़ी तादाद में मुस्लिम इदारों के साथ वक्फ जायदादे जुड़ी हुई हैं सिर्फ़ बकरीद में हलाल जानवरों कि खल अरबों रुपये कि होती है४. १९९० में मुस्लिम इदारा एकम्यु कि रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय मुसलमान वार्षिक ९ अरब रुपया सिर्फ़ ज़कात अदा करते हैं उसके अलावा इमदाद, उश्र और खुम्स कि शकल में फसलों कि जकात बड़े पैमाने पर अदा कि जाती है५. हर मुसलमान पर ईद कि नमाज़ से पहले सदका ऐ फ़ित्र अदा करता है हिन्दोस्तान में १५ करोड़ मुसलमान हैं सद्क़तल- फितर कि रक़म हीकितने अरब रुपये होगी?६. खर्च कि मद देखें तो मुस्लिम इदारों में अखाराजत दीगर इदारों के मुकाबले में न के बराबर होते हैं दारुल उलूम देवबंद के उस्तादों कि तनख्वाह और सहूलियतों का मुकाबला किसी भी फलां फलां के उस्तादों कि तनख्वाह, अलाउंस, कोठी, कार, से करके देख ले तो खद बी ख़ुद अंदाजा हो जाएगा कि बहार के पैसे कि ज़रूरत क्यूँ नही होती?

स्वच्छ संदेश: हिन्दोस्तान की आवाज़ said...
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Shastri said...

अच्छा आरंभ है, लेकिन जानकारी अधूरी है. मेरा अनुमान है कि विदेशों से आवक असली राशि इससे कम से कम 10 से लेकर 100 गुना है जिसे ईसाई, मुस्लिम, हिन्दु, एवं गैर धार्मिक संस्थायें ग्रहण करती हैं.

टिप्पणी में देर इस लिये हुई कि एक हफ्ते से सफर कर रहा था.

सस्नेह -- शास्त्री