Wednesday, April 22, 2009

भारत का नया “दामाद” अज़मल कसाब : वकीलों और न्याय व्यवस्था की जय हो… Azmal Kasab, Abbas Kazmi, Indian Judiciary System

सबसे पहले कुछ जरूरी सवाल –
1) मानो यदि किसी वकील को यह पता हो कि जिसका केस वह लड़ रहा है वह देशद्रोही है, फ़िर भी वह उसे बचाने के लिये जी-जान लगाता है और बचा भी लेता है तो इसे क्या कहेंगे “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी” या “देशद्रोह”?

2) कोई पत्रकार किसी गुप्त जगह पर छिपे आतंकवादी का इंटरव्यू लेता है, उसकी राष्ट्रविरोधी टिप्पणियाँ प्रकाशित करता है और उसे “हीरो” बनाने की कोशिश करता है तो यह “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी है या देशद्रोह”?

3) कोई वेश्या यह जानने के बावजूद कि ग्राहक “एड्स” का मरीज है उसे बगैर कण्डोम के “एण्टरटेन” करती है, तो यह “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी” है या “मूर्खता”?

ऐसे कई उदाहरण दिये जा सकते हैं जहाँ “देश” “कर्तव्य” और पेशे की नैतिकता के बीच चुनाव के सवाल खड़े किये जा सकते हैं, अब आते हैं मूल बात पर…

जो अज़मल कसाब पहले तोते की तरह सारी बातें उगल-उगलकर बता रहा था, अचानक एक वकील की संगत में आते ही घाघ लोमड़ी की तरह बर्ताव करने लगा है। सबसे पहले तो वह अपनी कही पुरानी सारी बातों से ही मुकर गया, फ़िर उसके काबिल वकील ने उसे यह भी पढ़ाया कि “वह अदालत से माँग करे कि वह नाबालिग है, इसलिये उस पर इस कोर्ट में मुकदमा नहीं चलाया जाना चाहिये”, फ़िर अज़मल कसाब ने एक और पाकिस्तानी वकील की भी माँग की, अब उसके माननीय वकील ने माँग की है कि पूरे 11000 हजार पेजों की चार्जशीट का उर्दू अनुवाद उसे दिया जाये ताकि वह अपने मुवक्किल को ठीक से केस के बारे में समझा सके और कसाब समझ सके… तात्पर्य यह कि अभी तो शुरुआत है… भारत के कानून और न्याय व्यवस्था के छेदों का फ़ायदा उठाते हुए पहले तो उसका केस सालों तक चलेगा, और कहीं गलती से फ़ाँसी की सजा हो भी गई तो फ़िर राष्ट्रपति के पास “क्षमायाचना” की अर्जी दाखिल करने का विकल्प भी खुला है, जहाँ यदि स्वतन्त्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका रखने वाली “गाँधी” की कांग्रेस रही तो वह भी अफ़ज़ल गुरु की तरह मौज करता रहेगा।

हालांकि कसाब को पाकिस्तानी वकील की माँग करने की आवश्यकता नहीं थी, क्योंकि जो काम पाकिस्तान से आया हुआ वकील करेगा, वही काम हमारे यहाँ के वकील भी उसके लिये कर देंगे। कहावत है कि डॉक्टर और वकील से कुछ भी नहीं छिपाना चाहिये, ज़ाहिर है कि अपराधी (बल्कि देशद्रोही तत्व) भी अपनी हर बात वकील को बताते होंगे, ताकि घाघ वकील उसका “कानूनी तोड़” निकाल सके, ऐसे में सवाल उठता है कि जबकि वकील जान चुका है कि उसका “क्लाइंट” कितना गिरा हुआ इंसान है और देश के विरुद्ध षडयन्त्र करने और उसे तोड़ने में लगा हुआ है, तब उसे “पेशे के प्रति ईमानदारी” और “देशप्रेम” के बीच में किस बात का चुनाव करना चाहिये?

फ़िलहाल कसाब के लिये कड़ी सुरक्षा व्यवस्था, एयरकंडीशनर, वाटर कूलर, रोज़ाना मेडिकल चेक-अप, अच्छा खाना, आदि सुविधायें दी जा रही हैं जो कि लगभग अनन्त काल तक चलेंगी। चाट का ठेला लगाने वाले की, दो कौड़ी की औकात रखने वाली औलाद भला इस “शानदार भारतीय मेहमाननवाज़ी वाली व्यवस्था” को छोड़कर कहीं जाना चाहेगा? सवाल ही नहीं उठता, और फ़िर अब तो उसे “नेक सलाह” देने के लिये एक “वकील” भी मिल गया है, उधर अफ़ज़ल गुरु को भी तिहाड़ में रोज़ाना अखबार/पत्रिकायें, व्यायाम करने हेतु खुली हवा, चिकन/मटन आदि मिल ही रहा है, बस तारीख पर तारीख, तारीख पर तारीख बढ़वाये जाओ, देश को चूना लगाये जाओ, और कांग्रेस के इन “महान दोस्तों” को गोद में बैठाकर सहलाते रहो।

पहले कसाब अपने में खोया-खोया सा रहता था, परेशान और उदास दिखाई देता था, ठीक से भोजन नहीं करता था…। अब्बास काज़मी नामक वकील के मिलते ही कसाब में एक “ड्रामेटिक” बदलाव आ गया है, अब गत कुछ दिनों से वह वकीलों और पत्रकारों से बाकायदा आँखें मिलाकर बात करने लगा है, बड़ा बेफ़िक्र सा नज़र आने लगा है, वह अब मुस्कुराने भी लगा है, उसके साथ सह-अभियुक्त फ़हीम अंसारी ने जब अपनी पत्नी से मिलने की इजाजत माँगी (और उसे वह मिली भी) तो कसाब हँसा भी था… (ये सारी खबर मुकदमा कवर कर रहे पत्रकार ने टाइम्स ऑफ़ इंडिया में यहाँ लिखी हैं)… कहने का मतलब ये कि वकील साहब की मेहरबानियों से मात्र 4-5 दिनों में ही वह समझ चुका है कि उसका कुछ बिगड़ने वाला नहीं है, वह काफ़ी लम्बे समय तक जियेगा और मौज से जियेगा… अब कसाब भी हमारे नेताओं की तरह सार्वजनिक रूप से कह सकता है कि “मुझे भारत की न्याय व्यवस्था पर पूरा भरोसा है और मुझे पूरा न्याय मिलेगा…”। यही सनातन वाक्य कई बार अबू सलेम, तेलगी, शहाबुद्दीन और समर्पण की आस रखने वाले दाऊद इब्राहीम भी बक चुके हैं।

“सरकारी लीगल पैनल” वकीलों की एक पैनल होती है जिसके द्वारा ऐसे मुजरिमों को मदद दी जाती है जो खुद अपना वकील नियुक्त नहीं कर सकते। इस पैनल में शामिल वकीलों को फ़िलहाल 900/- रुपये प्रति केस की दर से भुगतान किया जाता है (हालांकि इस फ़ीस के बहुत कम होने को लेकर जस्टिस टहिलियानी ने सरकार से इसे बढ़ाने को कहा है)। अब आते हैं कसाब के वकील अब्बास काज़मी पर… ये सज्जन(?) प्रायवेट वकील हैं, लेकिन कोर्ट द्वारा इन्हें कसाब का वकील नियुक्त किया गया है। वकील काज़मी किसी भी सरकारी “लीगल पैनल” में नहीं हैं। इसलिये सरकार को इनकी अच्छी-खासी फ़ीस भी चुकानी पड़ेगी, हालांकि ऐसा बहुत ही कम होता है, लेकिन इस केस में हो रहा है। काज़मी साहब की फ़ीस कितनी है इसका खुलासा अभी नहीं हो पाया है, लेकिन अब्बास काज़मी साहब कोई ऐरे-गैरे वकील नहीं हैं, 1993 के मुम्बई बम काण्ड के काफ़ी सारे अभियुक्तों के वकील यही महाशय थे, 1997 के गुलशन कुमार हत्याकाण्ड में भगोड़े नदीम के वकील भी हैं, और गत वर्ष “इंडियन मुजाहिदीन” के खिलाफ़ लगे हुए केसों में भी यही वकील हैं, (खबर यहाँ देखें)। पाकिस्तानी वकील की माँग का राग अलापने वाले कसाब को जब अब्बास काज़मी के बारे में बताया गया तो उसने आज्ञाकारी बालक की तरह तत्काल इसे मान लिया। (अब तक तो आप जान ही गये होंगे कि ये कितने “पहुँचे” हुए वकील हैं)

काज़मी साहब का एक और कारनामा भी पढ़ ही लीजिये… 1993 के मुम्बई बम धमाकों के एक अंडरवर्ल्ड आरोपी एजाज़ पठान को षडयन्त्र रचने और विस्फ़ोट में उसकी भूमिका हेतु दस साल कैद और सवा दो लाख रुपये जुर्माना की सजा मुकर्रर हुई। टाडा कोर्ट ने उसे जेल में ही रखने का आदेश दिया था। (इस खबर को यहाँ पढ़ें) एजाज़ पठान को दाऊद के भाई इब्राहीम कासकर के साथ 2003 में भारत लाया गया था। अब्बास काज़मी साहब ने कोर्ट द्वारा सरकार से एजाज़ पठान को “दिल की बीमारी के इलाज” के नाम पर दो लाख रुपये स्वीकृत करवाये (यानी सवा दो लाख के जुर्माने में से दो लाख रुपये तो वापस मिल ही गये)। कठोर सजायाफ़्ता कैदियों को महाराष्ट्र की दूरस्थ जेलों में भेजा जाता है, लेकिन एजाज़ पठान, काज़मी साहब की मेहरबानी से मुम्बई में आर्थर रोड जेल अस्पताल में ही जमा रहा, जहाँ उसकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हुई।

तो भाईयों और बहनों, इस मुगालते में मत रहियेगा कि कसाब को तुरन्त कोई सजा मिलने वाली है, वह भारत सरकार का एक नया-नवेला “दामाद” है, एकाध मानवाधिकार संगठन भी उसकी पैरवी में आता ही होगा, या कोई बड़ी बिन्दी वाली महिला किसी “भारतीय इस्लामिक चैनल” पर उसे माफ़ी देने की पुरजोर अपील भी कर सकती है, साथ ही उसकी सेवा में “महान वकील” अब्बास काज़मी भी लगे हुए हैं… आप तो बस भारतीय न्याय व्यवस्था और वकीलों की जय बोलिये। कानून के विद्वान ही बता सकते हैं कि कसाब पर “मकोका” क्यों नहीं लगा और प्रज्ञा ठाकुर पर कैसे लगा? लोकतन्त्र की दुहाई देने वाले बतायेंगे कि यदि कसाब अमेरिका में होता तो उसके साथ क्या और कैसा होता तथा चीन को अपना बाप मानने वाले बतायेंगे कि यदि कसाब चीन में होता तो उसके साथ क्या और कैसा होता?
=====================

नोट – पढ़ते-पढ़ते यदि आपका खून खौलने लगा हो तो जाकर ठण्डे पानी से नहा आईये और दो रोटी ज्यादा खा लीजिये, इससे ज्यादा हम-आप कुछ कर भी नहीं सकते…

, , , , , , , ,

73 comments:

Ravi said...

यदि अफज़ल को मटन बिरयानी मिल रही है तो क्या हुआ, कांग्रेसी सरकार की जेल में प्रज्ञा ठाकुर को भी तो जबरदस्ती अंडा खिलाया जा रहा है

कसाब दामाद तो है, लेकिन देश का नहीं बल्कि सोनिया गांधी की कांग्रेस का,

कहावत है
बाबूजी की जात नहीं, वकील का बाप नहीं

ये कहावतें यूंही नहीं बन गईं

जी.के. अवधिया said...

अंग्रेजों के बनाये हुये कानूनों को, जिसे कि पूर्णतः अंग्रेजी व्यवस्था के हितों को तथा निजी स्वार्थों को ही ध्यान में रखकर बनाया गया था, कमोबेश ज्यों का त्यों अपना लेने के कारण ही यह स्थिति है। ऐसा लगता है कि आज तक जिन्होंने भी देश में शासन किया है उनके हिसाब से तो हमारे देश में कभी अपनी कानून व्यवस्था, अपनी संस्कृति, अपनी सभ्यता, अपनी शिक्षा नीति आदि रही ही नहीं है और हम दूसरों का अनुगमन करने के लिये मजबूर हैं।

रचना said...

is aadmi ko jiska naam kasaab haen
jail sae nikal kar public kae havaale kardo aur isko zinda hi ek khambae sae baandh kar dhup mae bina daane paneei kae chod do

bhaad mae gyaa kanun mujhe nafrat haen har aatankvaadi sae
in par koi kanun mat lagao

zinda marnae kae liyae chod do

संजय बेंगाणी said...

इसमें कोई शक नहीं की कसाब पर मुकदमा चलना चाहिए और सजा न्यायालय द्वारा तय की जानी चाहिए. मगर वैसे ही जैसे सद्दाम पर मुकदमा चला और फाँसी हुई.

दोष प्रणाली का नहीं है, अफ्जल को न्यायालय से नहीं देशद्रोहियों से मदद मिल रही है. जनता फिर भी जै हो जै हो कर रही है.

रही बात हम और आप कुछ नहीं कर सकते कि...तो अभी तक संसद द्वारा बनाए गए कानूनों में विश्वास है. जिस दिन उठ जाएगा...बहुत कुछ किया जा सकता है.

कोई प्रज्ञा की तुलना अफजल से करता है तो मूर्ख है. प्रज्ञा उस कौम से आती है जिन्हे मानव-अधिकार प्राप्त नहीं है.

पंगेबाज said...

एक बात समझ एम नही आई अब तक हर वकील का घेराव हो रहा था इन सज्जन का क्यो नही हुआ . क्या ये एक चाल थी इन वकील साहब को इस केस मे लाने के लिये . अगर ऐसा है तो ये काम किस के कराये हुआ कई सारे मामले है परदे के पीछे इस खेल मे

आशीष कुमार 'अंशु' said...

Yah Sthiti sharmanaak hai...

कुश said...

और साला आमिर खान कहता है वोट दो.. अब लोकतंत्र वोट से नहीं चोट से चलेगा..

अनिल कान्त : said...

ये हमारा देश है ...और ये कानून है ....सब जानते हिं इसका दुरूपयोग करना ...सब कुछ आँखों के सामने हुआ ..रेंज हांथों पकडा गया ...अरे ऐसों को तो सीधे सीधे गोली मरने का नियम बना देना चाहिए फ़ौरन .... पर उनकी खुशामत की जा रही है ...इसी वजह से सबकी औकात बन जाती है ...हिम्मत हो जाती है जब चाहे हमला करने की ....जानते हैं पकडे गए तो मेहमान नवाजी ही होगी ....और कहते हैं
I love my India ....hmmmmmm

परमजीत बाली said...

इसी कारण से तो कहते है कि ’मेरा भारत महान।":))

mahashakti said...

इतना कुछ कहा जा चुका है, अब ज्‍यादा कुछ कहना ठीक नही होगा।

वैसे इस वकील का यह केस लेना लोकप्रियत को भूनना मात्र है।

shubhAM mangla said...

जब कसाब को वकील दिए जाने पर जनता विरोध कर रही थी, तो चैनल्स ज्ञान बाँट रहे थे कि मामले को निपटने के लिए वकील होना ज़रूरी है...

अब वकील महोदय और मेहमान आरोपी ने जो नंगा नाच मचाया हुआ है उस पर सबकी कलम क्यूँ शाँत है? २-२ करोड़ कि सुरंगे बनाओ, जनता के टैक्स का पैसा इनकी हिफाज़त में लगाओ और गाओ 'जय हो'

Shastri said...

इस आलेख का हर वाक्य हर देशप्रेमी को सोचने पर मजबूर करता है.

अवधिया जी ने जो लिखा है वह एकदम सही है. पंगेबाज के निम्न वाक्यों को:

"एक बात समझ एम नही आई अब तक हर वकील का घेराव हो रहा था इन सज्जन का क्यो नही हुआ . क्या ये एक चाल थी इन वकील साहब को इस केस मे लाने के लिये . अगर ऐसा है तो ये काम किस के कराये हुआ कई सारे मामले है परदे के पीछे इस खेल मे"

मेरा भी कथन माना जाये

सस्नेह -- शास्त्री

P.N. Subramanian said...

हमारे यहाँ जयचंदों की एक बड़ी जामात है.

kumararya1111 said...

कृपया अपनी भूल सुधार करे भारत का नही कांग्रेस का नया दामाद लिखे तो बेहतर रहेगा..........

Shiv Kumar Mishra said...

कानून में से केवल नून बचा है. पानी डालकर लोग उसको बहा रहे हैं. कसाब को वकीली ज्ञान मिल ही गया है. अब बिरियानी चाभे. वैसे भी फांसी की सज़ा हो भी जायेगी तो क्या होगा? उसे बचाने के लिए लोग सामने आ जायेंगे. आखिर लोकतंत्र को मज़बूत करने की बात है.

prashant said...

शायद तभी कहते है की ये देश राम भरोसे है.अफजल के बाद कसाब ,शायद इन लोगो के पास ही मानवाधिकार है,

नरेश सिह राठौङ said...

यह सब लिखते समय आपकी अंगुली की बोर्ड पर नही ए के 47 पर होनी चाहिये थी ।

डॉ० कुमारेन्द्र सिंह सेंगर said...

भाईसाहब, दामादों की ज्यादतियों को लेकर ही कभी कहा गया होगा कि ‘‘दामाद जी पैर पूजे हैं पीठ नहीं पूजी, मौका मिला तो पीठ पूज दी जायेगी’’ कसाब जैसे दामादों के तो पैर भी नहीं पूजू पर लगता है कि हम कुछ वोट, कुछ कथित इंसानियत, विश्व बाजार, कुछ अपनी दरियादिली दिखाने के चक्कर में अपना ही नुकसान कर रहे हैं। कितना भी लिखो कम है क्या करें और क्या कहें?
क्या हम सब मिल कर बस बातों के बताशे ही फोड़ सकते हैं? क्या हम ही किसी प्रकार के अन्दोलन की शुरूआत नहीं कर सकते?
(ध्यान ही नहीं रहा....हिन्दू साम्प्रदायिक है, एक आम भारतीय तो अति सहिष्णु है) जय हो.....

Anil Pusadkar said...

अंधा कानून,लंगड़ा लोकतंत्र,बहरे नेता और गूंगी जनता। हो चुका फ़ैसला कसाब की कसबगिरी का।

katyayan said...

इस पूरे विवरण से एक बात तो बिल्कुल साफ हो जाती है कि इस पूरे प्रकरण में दाऊद एण्ड कम्पनीं का हाथ है। इस से स्वाभाविक रूप से यह निष्कर्ष निकलता है कि कांग्रेस में बैठे दाऊद के एजेन्ट अब सक्रिय हो गये हैं।

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

हिन्दू एक हारी हुई गुलाम कौम है, इसे बहुत जल्द असलियत का अहसास हो जायेगा, भीष्म साहनी की कहानी "अहं ब्रहास्मि" की तरह, और तब तक बहुत देर हो चुकी होगी.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कसाब महान है हमारी आँखों ने उसे नहीं देखा ऐ .के ४७ हाथो मे पकडे हुए . उसे आजाद कर दो वह तो हमारा अतिथि है और अतिथि देवो भव

Dikshit Ajay K said...

kya bharat sthit pakistan,america,china aur itely ke agenton ko desh se bahar karne ke liye hamare samvidhan main koi kanoon hahin hai???????????????????

cmpershad said...

कसाब ही क्यों, अफज़ल गुरू, अबु सलेम, तलगी...सभी तो हिंदुस्तान के दामाद हैं और हो सकता है कि कल के भारत के प्रधान मंत्री भी हो। अब तो तालिबान के लिए भी दिल्ली दूर नहीं!!!!

मुनीश ( munish ) said...

"Neighbour will eat neighbour and cows will refuse to part with milk if there is no fear of red-eyed Baton of punishment"
-- Mahabharat

Akhand Bharat said...

It is the time that Congress Party should nominate the name of Kasab for Bharat Ratna....Desh ka sarvanash kar dala is great party ne....Hey Prabhu....ab to kuch dristi karo is deen-heen-asahay HINDU-stan aur HINDU-Stanio par.....

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

वकील द्वारा किसी की पैरवी करना किसी अपराधी का पक्ष लेना कभी नहीं होता। केवल उसे कानूनी सहायता उपलब्ध कराना होता है। यदि आप एक सभ्य समाज में जी रहे हैं तो हर अभियुक्त को यह सुविधा दिलाना समाज, राज्य और न्यायप्रणाली का धर्म है। यदि आप एक ऐसे अभियुक्त को जो बंदी है और जिसे कोई बाहरी साधन उपलब्ध नहीं है उस की चाहत का वकील उपलब्ध नहीं कराते हैं तो आप में और तालिबानों में क्या फर्क रह जाएगा? वे भी तो यही कर रहे हैं। एक बार सोचें कि क्या यह आलेख परोक्ष रूप से तालिबानीकरण का पक्ष नहीं ले रहा है?

कसाब को सारी दुनिया अपराधी मान सकती है और उसे तत्काल सजा देने को तत्पर हो सकती है। लेकिन यदि न्यायालय भी यही माने तो वह न्यायालय नहीं रह जाएगा। केवल औपचारिकता भर रह जाएगी। यहाँ सद्दाम की तरह मुकदमा चलाने की बात कही गई है। वह इराक के कानून के मुताबिक चलाया गया और वह एक स्वतंत्र मुकदमा नहीं कहा जा सकता है। आज भी उस पर अनेक प्रश्नचिन्ह लगे हुए हैं।

कसाब केवल अभियुक्त नहीं है। वह उस आतंकवदी साजिश का सब से मजबूत सबूत है जो भारत और सम्पूर्ण विश्व के विरुद्ध रची गई और आज तक जारी है। उसे न्यायालय द्वारा फाँसी की सजा दे दिए जाने के बाद भी तब तक फाँसी चढ़ाया जाना मूर्खता होगी जब तक उस सबूत की जरूरत रहेगी। यही कारण है कि उस की सुरक्षा करना आज भारत की सुरक्षा करना और विश्व मानवता की सुरक्षा करना है। यदि उसे सुरक्षित रखने में भारत असफल रहता है या फिर उस के मुकदमे में कानून के मुताबिक सारी कानूनी प्रक्रियाएँ नहीं अपनाई जाती हैं तो हम अपनी सुरक्षा के साथ ही विश्वासघात करेंगे।

इस आलेख के लेखक और इस आलेख के पक्ष में टिप्पणियाँ करने वाले सभी टिप्पणीकार मुझे क्षमा करें। मेरा विनम्र मत प्रकट करते हुए यही कह सकता हूँ कि यह आलेख केवल घृणा का सुनियोजित प्रचार प्रतीत होता है। या तो लेखक स्वयं इस में इरादतन सम्मिलित है, या फिर वह इस अभियान का शिकार है। सभी टिप्पणीकार भी उसी से प्रभावित हैं।

Pak Hindustani said...

द्विवेदी जी टिप्पणी से एक बात तो साबित हो गई कि वकील इन्सान नहीं होते. कसाब को सारी दुनिया चाहे आतंकवादी न भी माने, लेकिन उन 166 लोगों के परिवार का वो अपराधी है जिन्हें उसने मारा. भारत की अस्मिता और स्वतंत्रता का भी वो अपराधी है.

वैसे सवाल कानून के पालन के उपर नहीं, कानून के गलत-इस्तेमाल के उपर उठाया गया है. कानून इसलिये है कि गुनाहगार को सजा मिले, उसमें जो प्रावाधान हैं वो इसलिये हैं कि बेगुनाह को सजा न मिले. लेकिन आज सच्चाई यह है कि बेगुनाह को धड़ाधड़ सजा मिलती है, और गुनहगार बच जाते हैं.

ऐसा क्यों है?

ऐसा इसलिये हैं कि वकील अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं कर रहें. उन्होंने यह समझ लिया है कि हमारा कार्य इन्साफ का नहीं अपने मुवक्किल का साथ देना है. इसलिये बहुत बार उन्हें पता होता कि मुवक्किल गुनहगार है फिर भी वह उन्हें बेगुनाह साबित करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते.

असल में होना यह चाहिये की वकील अगर यह जानता है कि मुवक्किल गुनहगार है तो वह मुवक्किल को अपने गुनाह को समझने और मिलने वाली सजा को स्वीकार करने में मदद करे. लेकिन पैसे के लालच में या शायद किसी और कारण से ज्यादातर वकील ऐसा नहीं करता.

मुझे नहीं पता कि किसे यह संशय हो सकता है कि कसाब अपराधी है, और उस संशय का क्या आधार होगा. अगर कोई आधार है तो जाहिर होना चाहिये.

लेकिन अगर कोई भी आधार नहीं है तो गुनहगार को सजा दिलवाने में मदद न करना किसी वकील की जिम्मेदारी नहीं हो सकती.

कसाब के प्रकरण में खासकर यह देखने को मिल रहा है कि कोशिश इंसाफ दिलवाने की नहीं, इंसाफ को लटकाये रखने की है. उसके नये वकील की कोशिश यकीनन फैसले को टाले रखने की है. क्योंकि जैसे-जैसे समय बीतेगा, तथ्यों के साथ हेराफेरी और खेल आसान होता जाता है.

याद रखिये कानून का काम बेगुनाहों कि हिफाजत है, और वकील का भी. इस बात पर डिबेट होनी चाहिये कि कसाब के वकील के इस कारनामे से यह किस तरह हो रहा है.

और यह भी न भूलिये कि कसाब का अपराध क्या है... यह अपराध किसी व्यक्ति नहीं राष्ट्र के ऊपर किया गया है.

अगर द्विवेदी जी वकील नहीं, इन्सान की तरह सोचें तो शायद उन्हें समझ में आये.

संजीव कुमार सिन्हा said...

ब्‍लॉगजगत में बचे मुट्ठी भर जेहादी वायरस अफजल और कसाब की पैरोकारी में जुटे हुए हैं। विदेशी चंदों की जूठन पर पलने वाले ये से‍कुलरिस्‍ट हमेशा ही आसमान पर थूकने का काम करते हैं। आतंकवादी हमलों में बहे हजारों निर्दोष लोगों के खून से ये विचलित नहीं होते लेकिन आतंकवादियों की रक्षा के लिए ये राष्‍ट्रीय स्‍वाभिमान को चुनौती देने से बाज नहीं आते। ये भारत के असली दुश्‍मन हैं जो राष्‍ट्रद्रोहियों के पक्ष में नारे लगाकर, लेख लिखकर और टिप्‍पणी लिखकर आतंकवाद को खाद-पानी मुहैया कराते हैं। आतंकवादियों के इन दलालों को कडी सजा दी जानी चाहिए।

हमें विश्‍वास है सेकुलरिस्‍टों की गीदडभभकी से सुरेशजी की लेखनी मद्धिम नहीं होगी, अपितु और अधिक प्रखर होकर वे राष्‍ट्रविरोधियों की बखिया उधेरते रहेंगे।

पंगेबाज said...

द्विवेदी जी आपसे ऐसी उम्मीद ना थी जबकि वकील जान चुका है कि उसका “क्लाइंट” कितना गिरा हुआ इंसान है और देश के विरुद्ध षडयन्त्र करने और उसे तोड़ने में लगा हुआ है, तब उसे “पेशे के प्रति ईमानदारी” और “देशप्रेम” के बीच में किस बात का चुनाव करना चाहिये? इस सवाल का जवाब साफ़ गोल कर गये आप ? महोदय अगर वकील को पता है कि उसके क्लाईंट ने एक अबोध बालिका के साथ दुष्कर्म किया हुआ है और उसको सब पता है क्या तब भी आप हस्पताल मे मरती उस लडकी के मरने की प्रार्थना करते हुये उस क्लाईंट के कानूनी प्रक्रिया से बचाने के जुगाड मे ही लगा रहेगा. यानी यहा वकील इंसान नही केवल धंधा करने वाला है फ़िर क्या अंतर है वकील और एक वेश्या मे ? मेरी समझ से इस वक्त वो एक ऐसे वकील से ज्यादा इज्जत की हकदार है जो नोट के लिये आत्मा बेचता है क्योकी वो सिर्फ़ पेट के लिये जिस्म बेचती है और वकील नोट के लिये देश की भी पर्वाह नही करता. जिसे वो न्याय दिलाने का ढोंग कर अन्याय के लिये साथ देता है हर किसी भडुये का. आतंकवादी का चोर का डैकैत का
बाकी आप जाने माने बुजुर्ग वकील है मै अकिंचन आपको क्या रोशनी दिखाऊ :)

dinesh dhawan said...

अपन तो दिनेसराय द्विवेदी से सहमत हैं
वकील का काम तो अपने मुवक्किल को कानूनी सहायता उपलब्ध कराना होता है वह काजमी करा रहा है, बात काजमी की चली है तो बता दें कि काजमी भारत सरकार से तो नाममात्र के पैसे ही लेगा, अपनी असली फीस तो अपने पुराने बास दाऊद भाई से लेगा

कसाब को सारी दुनियां अपराधी भले ही माने लेकिन कम्युनिष्ट और अपन कभी भी अपराधी नहीं मानेंगे।

दिवेदी की बात "कसाब को न्यायालय द्वारा फाँसी की सजा दे दिए जाने के बाद भी तब तक फाँसी चढ़ाया जाना मूर्खता होगी जब तक उस सबूत की जरूरत रहेगी" से फिर एग्री। कानून का कर्तव्य है कि वह सबूतों को सभांल कर रखे। बात सबूतो को संभालने की चली है तो बता दें कि इसीलिये हमारी सरकार इसीलिये कसाब को खिला, पिला कर संभाल कर रख रही है।

वकीलों का काम तो हर हालत में मुवक्किकों का साथ देना होता है, न मानो तो दिल्ली के आर के आनन्द के कर्म देखो। वकीलों की बात चली है तो बतादें कि पब्लिक प्रासीक्यूटर निकम को दिल्ली के बीएमडब्ल्यू वाले आई. यू. खान नसीहत लेकर कसाब का साथ ही देना चाहिये।

अपने राम का भी यही मानना है कि "यह आलेख केवल घृणा का सुनियोजित प्रचार प्रतीत होता है, या तो लेखक स्वयं इस में इरादतन सम्मिलित है, या फिर वह इस अभियान का शिकार है। सभी टिप्पणीकार भी उसी से प्रभावित हैं" सिर्फ अपने राम और दिनेसराय द्विवेदी सही है, बाकी सब बकबास

चलते चलते अपन ये भी बता दें कि वकील की "पेशे के प्रति ईमानदारी" का मतलब मुवक्किल का साथ नहीं बल्कि न्याय का साथ देना होता है,

कानून की डिग्री के समय क्या शपथ दिलाई जाती है इसे जो भूल चुके हैं फिर याद कराने से क्या मतलब?

katyayan said...

रोजी-रोटी और परिवार चलानें के लिए वकालत से ज्यादा घटिया पेशा और कोई नहीं। जहाँ सच को साबित करनें के लिए भी कई बार झूँठ गढ़्नें पड़ते हैं, झूठ को सच बनानें के लिए कितनें झूठ गढ़ने पड़्ते है इसका अनुमान ही किया जा सकता है। वकील को न्याय का साथ देंना चाहिये न कि मुवक्किल का। सत्य और तथ्य में जमीन आसमान का अन्तर होता है। तथ्य को सत्य बनानें में ही वकील झुठ गढ़ता है और जितना बढ़िया कारीगर उतना सफल वकील। एक सफल और सेक्युलर काँग्रेसी वकील का असली रूप देश के सामनें पकट हो चुका है। १७-०१-२००९ को उन्मुक्त जी के ब्लाग पर पैरी मैसन के मुख्य किरदार अवकाश प्राप्त बैरिस्टर होरेस रमपोल के कुछ कमेन्टस हैं जो प्रत्येक वकील को अवश्य पढ़्ना और आत्म मंथन करना चाहिये। सुरेश चिपलूनकर पर तालिबानीकरण का आरोप अपमान जनक और हास्यास्पद है। यही नहीं २६/११ को शहीद हुये लोगों का अपमान भी।

दहाड़ said...

काश कि कोइ दिवेदी जी का सगा मुम्बाइ हमले मे मरा होता
और वे उसे यही उपदेश देते तो सब समझ जाते

दहाड़ said...

शायद आने वाले समय मे लोग जयचंद को भूलकर .दिवेदी जी को याद करें

सिद्धार्थ जोशी Sidharth Joshi said...

सत्‍य वचन।

अनूप शुक्ल said...

द्विवेदीजी की बात से सहमति। कुश की टिप्पणी में और साला ...पढ़कर अफ़सोस हुआ।

पंगेबाज said...
This comment has been removed by the author.
पंगेबाज said...

खूदा का शुक्र है कि महामना अनूप जी या द्विवेदी जी का भी कोई पारिवारिक सदस्य वहा नही था . और शायद हो भी तो उसे अबू आजमी निकाल लाये होंगे वर्ना साहब दो और आदमी तालीबानी बन जाते . या खुदा उन्हे भी दे शऊर नमाजे जनाजे का
वो ना समझे है ना समझेगे
पिता का दर्द
कंधे पे बेटे के जनाजे का

मुनीश ( munish ) said...

Remember, there are always three ways to do anything--(1)Good way.
(2)Bad way &
(3)The Army way.

The attack on Mumbai is an act of war, the only difference being ; the attackers were wearing Nike, Gap and Wrangler brands instead of Olive green or Khaaki.
Kasaab definitely deserves legal treatment, but under the Army law.
If this country does not hand him over to Army , cosequences are bound to be dangerous. Jai Hind.

dinesh dhawan said...

गरिष्ठ ब्लागर अनूप और द्विवेदी की सहमति की जुगलबन्दी से हमारी भी सहमति

यही कि वकील का काम न्याय का साथ देना भूल कर पैसे के लिये कातिल, लुटेरों हत्यारों का साथ देना चाहिये,

कुश के साला कहने पर हमारा भी आब्जेक्शन नोट कर लीजिये मीलार्ड!

हम आमिर की रंग दे बसन्ती में "ए साला, अभी अभी सुन कर मुंडी हिला सकते हैं

हम आमिर की ही जाने तू या जाने ना मे" पप्पू कान्ट डांस साला" मर मटक सकते हैं

उसी आमिर से सीख कर तो साला नहीं कह सकते

हमारे सभी "सहमतिये" भाईयों से सहमति,

मुनीश ( munish ) said...

ये पूरा मामला विदेश से हुए हमले का है . हमलावरों के तार जिस गुट से जुड़े मिले हैं वों नाम से और काम से दोनों से ही जब लश्कर (सेना) है तो इसमें क्यों नहीं सेना को शामिल किया जा रहा ?

संजय बेंगाणी said...

टिप्पणी का विकल्प हाँ में हाँ मिलाना मात्र नहीं है. अगर कोई अपने विचार ही न रख सके तो यह विकल्प ही बेकार है. विपरीत विचार रखने वाले पर व्यक्तिगत लांछन लगाना गलत है.

कसाब के केस को अब जिस तरह क्रियांवित किया जा रहा है वह गलत है. देश में किसी को भी सजा देने का अधिकार न्यायालय का ही होना चाहिए. मगर इसका गलत तरिके से फायदा उठाने की कोशिश हो रही हो तो यह देशद्रोह व अमानविय कृत्य ही कहा जाएगा. कोशिश एक अपराधी को योग्य सजा दिलाने की नहीं उसे बचाने की हो रही है.

जिस तरह कभी अंग्रेज अदालत द्वारा हर हाल में सजा दिलवाते थे. सबूत न हो तो नकली घड़ कर...आज उससे उलटा हो रहा है. हर हाल में बजाया जा रहा है. एक को फाँसी हुई उसे भी बचा कर रखा है. यह गलत है.

Shiv Kumar Mishra said...

द्विवेदी जी की बात पर मैं कुछ कहना चाहता हूँ.

आदरणीय द्विवेदी जी अदालत के सामने सबूत के महत्व को तो समझते हैं. समझाते भी हैं. लेकिन पोस्ट लिखने वाले को और पोस्ट के समर्थन में टिप्पणी करने वालों को तालिबानी घोषित करने में ज़रा भी देर नहीं लगाते. मुझे लगता है जिस परिप्रेक्ष्य में द्विवेदी जी ने अपनी टिप्पणी लिखी उसमे बाकी के टिप्पणी करने वालों और पोस्ट लिखने वाले को तालिबानी कहने की ज़रुरत नहीं थी.

अदालत का काम करने का अपना तरीका है. अदालत सबूतों पर अपने फैसले सुनाता है. इस बात का महत्व हम सब समझें, उसके लिए द्विवेदी जी का वक्तव्य ठीक है. हमें यहाँ तक कोई शिकायत नहीं है. लेकिन फट से किसी को तालिबानी कह देना कहाँ तक ठीक है?

द्विवेदी जी जब तक यह मानते हैं कि वे जो कुछ कहेंगे वह सही है, तब तक हमें तो कोई शिकायत नहीं है. वे ऐसा मानने के हकदार हैं. लेकिन दूसरों के बारे में क्या कह रहे हैं, उसके बारे में भी सोचें. क्यों कह रहे हैं ऐसा? कसाब को हम आतंकवादी मानते हैं क्योंकि हमने उसे आतंक फैलाते देखा है. हम आम इंसान हैं. शायद द्विवेदी जी खुद को आम इंसान नहीं मानते. ऐसा करने का अधिकार है उनके पास क्योंकि वे वकील हैं. लेकिन सिर्फ इसलिए कि हम उनसे सहमत नहीं हैं, वे हमें तालिबानी तो नहीं कह सकते.

या फिर कह सकते हैं?

मुझे उनकी पूरी टिप्पणी तो नहीं लेकिन टिप्पणी का यह भाग बिलकुल अच्छा नहीं लगा. सबूतों की दुहाई देनेवाले बिना किसी कारण या सबूत के दूसरों को तालिबानी कह रहे हैं.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

सबसे भले हैं मूढ़, जिन्हें न व्यापें जगत गति।

ज्यादा पढ़ा लिखा आदमी कभी-कभी ऐसी बात कहता हुआ दिखायी देता है जो कॉमन सेन्स से मेल नहीं खाती। इसका अर्थ यह नहीं कि उसकी बात गलत ही हो।

महत्वपूर्ण बात यह है कि देश का भविष्य तय करने वालों का चुनाव तो कम पढ़ी लिखी और विशेषज्ञता से कोसों दूर रहने वाली आम जनता के हाथ में है जो अपनी निजी राय के आधार पर सर्वशक्तिमान संसद का चुनाव कर डालती है। आम जनमत के आधार पर सरकार बन जाती है जो देश के लिए बड़े-बड़े फैसले कर डालती है।

लेकिन यही जनमत आज हतप्रभ है कि सरेआम निहत्थों पर गोली चलाकर अनेक परिवारों को उजाड़ देने वाला कसाब आज कुछ पढ़े-लिखे लोगों की शह पाकर फाँसी के फन्दे को लगातार दूर धकेलता जा रहा है। इस आम जनमानस को कानूनी पेंचीदगियों से क्या लेना-देना? जो स्वतः स्पष्ट है, स्वयंसिद्ध है, उसे भी अदालत के आगे सिद्ध करने में जो पसीने छूट जाते हैं उसका कारण यही कानूनी आडम्बर हैं। मैं तो चाहूंगा कि विद्वान कानूनविद्‌ कोई ऐसी प्रणाली सुझाएं और विकसित करें जिससे इस प्रकार के सन्देह से परे मामले अनावश्यक विलम्ब का शिकार न बनें।

न्याय का ‘होना’ जितना जरूरी है उतना ही जरूरी न्याय होता ‘दिखना’ भी है। दुर्भाग्य से ऐसा होता दिख नहीं रहा है। इस प्रकरण में तो कत्तई नहीं।

इसपर जानकार लोग क्या सोचते हैं?

अनूप शुक्ल said...

अपने देश के संविधान(अनुच्छेद २२) में यह व्यवस्था है कि अभियुक्त को अपने बचाव का अधिकार है। इसके लिये कानूनी सहायता प्रदान करना सरकार का दायित्व है।

संविधान और कानून के तहत अभियुक्त को कानूनी सहायता उपलब्ध करायी गयी। वकील अपने मुवक्किल का पक्ष रख रहा है। कानून के पास सबूत हैं कि अभियुक्त आतंकवादी गतिविधि
में शामिल रहा। वकील संविधान के अंतर्गत कानूनन सौंपे गये काम को निर्वाह कर रहा है। इससे क्या वह देशदोही हो गया?

वकील का रिकार्ड कैसा रहा है यह मुझे नहीं पता। लेखक और टिप्पणीकारों को शायद बेहतर जानकारी है। लेकिन क्या सरकार का पक्ष रखने वाले और न्यायालय इतने बबुये हैं कि एक अकेले वकील के झांसे में आ जायेंगे?

पोस्ट और उस पर कई टिप्पणियां अतिवादी हैं। कानूनन हर अपराध की सजा तय है। सजा देने की प्रक्रिया है। लेकिन लोगों की प्रतिक्रियाये हैं:
१. अभियुक्त को पब्लिक के हवाले कर दो और इसको भूखा-प्यासा खंभे से बांधकर धूप में बिना दाना-पानी के छोड़ दो।
२.ऐसों को तो सीधे सीधे गोली मरने का नियम बना देना चाहिए फ़ौरन..
३.ब्‍लॉगजगत में बचे मुट्ठी भर जेहादी वायरस अफजल और कसाब की पैरोकारी में जुटे हुए हैं। विदेशी चंदों की जूठन पर पलने वाले ये से‍कुलरिस्‍ट हमेशा ही आसमान पर थूकने का काम करते हैं।
४.महामना अनूप जी या द्विवेदी जी का भी कोई पारिवारिक सदस्य वहा नही था . और शायद हो भी तो उसे अबू आजमी निकाल लाये होंगे वर्ना साहब दो और आदमी तालीबानी बन जाते . या खुदा उन्हे भी दे शऊर नमाजे जनाजे का
वो ना समझे है ना समझेगे

ये टिप्पणियां संकेत देती हैं कि लेखक और टिप्पणीकार की सोच से अलग आप कुछ दूसरा सोचते हैं तो उसे व्यक्त करने से बचें। यह सोच अतिवादी है। सोच के तालीबानीकरण का प्रयास इसी संदर्भ में लिखा गया। अपनी जो सोच है उससे अलग आपको कुछ सोचने और व्यक्त करने का अधिकार नहीं है। अगर आप ऐसा कहते/करते हैं तो अपने उपहास का इंतजाम करते हैं कि आप
हमारी भाषा बोलिये वर्ना ऐसे ही खिल्ली उड़ावाओगे।

मजे की बात है कि इन दो कमेंट को लिखने के लिये एक फ़र्जी ब्लाग (दहाड़)बनाया जाता है:
१.काश कि कोइ दिवेदी जी का सगा मुम्बई हमले मे मरा होता और वे उसे यही उपदेश देते तो सब समझ जाते।
२.शायद आने वाले समय मे लोग जयचंद को भूलकर .दिवेदी जी को याद करें।

अपनी समझ में संविधान/कानून की बात रखने की कोशिश करने वाले द्विवेदीजी को जयचंद बताया जा रहा है और लेखक इसपर मौन है।

गरिष्ठ ब्लागर अनूप और द्विवेदी की सहमति की जुगलबन्दी से हमारी भी सहमति भी फ़र्जी ब्लागर की टिप्पणी है जिस पर लेखक ने कुछ नहीं कहा न इसे मिटाया इसका मतलब इसके अलावा क्या समझा जाये कि लेखक की इन टिप्पणियों से सहमति है।

शिवकुमार मिश्र ने कहा किसी कारण या सबूत के दूसरों को तालिबानी कह रहे हैं|
यहां व्यक्त टिप्पणियां अतिवादी टिप्पणियां हैं। तालीबानियों की सोच भी अतिवादी है, अगर हमारी बात नहीं मानते तो हमारे लिये दुश्मन हो।

सजा देने के अमानवीय तरीकों की पैरवी और कानून सम्मत बात कहने वाले द्विवेदीजी को जयचंद कहना अतिवाद नहीं तो और क्या है?

प्रसंगत: बता दें कि महात्मा गांधी की हत्या नाथूराम गोडसे ने 30 जनवरी,1948 को की। गोडसे का ट्रायल 27 मई, 1948 को शुरू हुआ। उसे फ़ांसी की सजा 8 नवंबर, 1949 को हुई। यह भी तब जब गोडसे ने अपने खिलाफ़ लगाये गये आरोपों को स्वीकार कर लिया और माना कि उसने गांधीजी की हत्या की थी। अगर वह आरोपों को स्वीकार नहीं करता तो कानूनन बहस-मुबाहिसे में और दिन लगते।

गोडसे को भी बचाव के लिये कानूनी सहायता मिली थी। मुझे पता नहीं कि उस टीम में कितने हिन्दू थे कितने मुस्लिम लेकिन कानूनी सहायता मिली थी गोडसे को। गोडसे की कानूनी टीम की इस बात के लिये आलोचना भी हुई कि उसने अपने मुवक्किल के बचाव के लिये यह तर्क क्यों नहीं पेश किये कि उनका मुवक्किल का मानसिक संतुलन ठीक नहीं था या फ़िर वह हत्या दूसरों के द्वारा करवाई गयी थी।

अनुरोध है कि इस उदाहरण को नाथूराम गोडसे और कसाब की तुलना के रूप में न देखा जाये।

अंत में मेरा यही अनुरोध है कि अपने से विरोधी विचारों को भी खुले मन से सुनने का माद्दा रखें। ब्लाग पर टिप्प्णियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनाम लोगों के द्वारा विपरीत विचार रखने वालों की खिल्ली उड़ाने वाली टिप्पणियों से असहमति व्यक्त न करना यह दर्शाता है कि ब्लाग लेखक की उससे सहमति है। ऐसा होता रहा तो शायद आगे आने वाले दिनों में आपके ब्लाग पर
शायद आपके विचार समर्थकों की टिप्पणियां दिखें या फ़िर छद्म नाम से विरोधी टिप्पणी करने वाले जिनके जबाब देने के लिये आपको कुछ और लिखने का मसाला मिलेगा।

संजय बेंगाणी said...

यह केवल जानकारी के लिए लिख रहा हूँ, किसी का समर्थन या विरोध की बात नहीं है.


गोडसे ने गाँधीजी की हत्या की थी. गोडसे को सजा मिलनी चाहिए थी वह मिली. मगर तब सरकार हर हाल में गोडसे को फाँसी देना चाहती थी और उसके लिए (मेरे पास सबूत नहीं, जानकारी मात्र है) उसने नकली गवाह घड़े थे. गोडसे के तर्को से तब कईयों के पसीने छोटे थे. और आज कसाब को बचाने की कोशिश होती दिख रही है. बैचेनी उसी बात की है.

सभ्य समाज न्यायालय का सम्मान करता है, मगर तब तक ही जब तक न्यायालय उसके हितों की रक्षा करता है. कल को कसाब को फाँसी से कम सजा मिली तो तो कोई कानून अपने हाथ में लेकर उसे मारेगा नहीं, ऐसा कहा नहीं जा सकता.

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

अनूप जी आप भी टिप्पड़ीकरों को अतिवादी होनें का फतवा दे रहे हैं? दो शब्दों से आहत होकर आप और द्विवेदी जी दूसरों को अतिवादी कहनें के अधिकार हो जाते हैं किन्तु पूरा देश और विशेषकर वे जिनके परिजन मारे गये उनकी भावना को व्यक्त करनें वाले तालिबानी हो गये? जनभावनाएँ कानून और संविधान से ऊपर होती हैं। कानून क्या सत्य का पर्याय है? संविधान,जिसमें ६० वर्षों में १०० के लगभग संशोधन हो चुके हैं क्या शाश्वत सत्य है? सेक्युलरिज्म क्या मृत्युंञय मन्त्र है? सेक्युलरिज्म के सिद्धान्त को जिस तरह से भारत में व्याख्यायित किया जाता है उससे क्या वे आलिम भी सहमत हैं(धर्म निरपेक्ष भारत में इस्लाम-डा०मुशीरुल्हक पढ़ें) जिनकी चाटुकारिता में सभी राजनितिक दल लगे रहते हैं? गोड़्से ट्रायल का हवाला देकर और कसाब से न जोड़े जानें की बात कह कर आप क्या साबित करना चाहते हैं? गांधी हत्या पर नेहरू पर जो आरोप जनित चर्चाएँ उस जमानें में चली थीं क्या उनकी भी कुछ खबर है? हत्या के २ घण्टे के अन्दर रेड़ियॊ पर सन्देश देते हुए नेहरू नें बिना किसी जाँच के किस पर आरोप जड़ा था? आप कहते हैं कि विरोधी की बात को भी खुले मन से सुननें का माद्दा रखें क्या यह बात आप बन्धुओं पर लागू नहीं होती? अनूप जी, आश्चर्य जनक बात यह है कि आपनें अभी तक सुरेश जी के आलेख पर टिप्पड़ी नहीं की हैं। क्या यह ज्यादा अच्छा न होता कि आप आलेख में वर्णित तथ्यों की गुण-दोष के आधार पर मीमांसा करते? क्या ब्लागर को अपनें आलेख पर आनें वाली टिप्पड़ियों पर सहमति-असहमति व्यक्त करना ही चाहिये, ऎसा ब्लागिंग का कोई नियम है? अनूप जी आप से ऎसी भावुकता की उम्मीद न थी।

पंकज बेंगाणी said...

अमेरिका में लोकतंत्र है, भारत में भी.

लेकिन वे लोग कम से कम हमसे तो अधिक समझदार हैं.

उन्हें पता है आतंकवाद से कैसे निबटा जाएगा, हमें पता है कि शर्मनिरपेक्षता को ओढकर "नीजि हित" कैसे पाले पोसें जाएंगे.

हमसे तो श्रीलंका की सरकार कडी है जो दुनिया [और भारत] की बात ना सुनते हुए वह कर रही है जो उसके हिसाब से सही है [भले ही आम तमिल पीस रहे हों]

क्यों भारत श्रीलंका पर दबाव नहीं बना पाता? लेकिन खुद बांग्लादेश से भी दबा जाता है? क्यों?

हमारी जड़े ही सड चुकी है. किसी काबिल नहीं रहे हम.

Mahesh Sinha said...

ये सारी बातें इस लिए हो रही हैं क्योंकि आम आदमी का वर्त्तमान कानून व्यवस्था से विश्वास उठ गया है , "justice delayed is justice denied" का मूलमंत्र तो शायद अब किसी को याद भी नहीं आता . अंग्रजों नें जिस कानून का निर्माण अपने लिए किया था उसको हम अभी तक ओढे हुए बैठे हैं . ६० साल लगभग एक आदमी का जीवन काल होता है . कितने ऐसे मुक़दमे हैं जिनका अभी तक फैसला नहीं हो सका. अगर कुछ कोशिश सरकार ने बदलने की तो वकील विरोध में खड़े हो गए . पेशी और तारीख का धंदा किस से छुपा हुआ है. इस देश का कानून ऐसा है कि यहाँ का हर व्यक्ति गुनहगार है, और नहीं है, तो सिर्फ इसलिए क्योंकि पकडा नहीं गया है.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

कसाब के मुकदमे में उस के बचाव के लिए कुछ किया जा रहा है, यह कहना बहुत जल्दबाजी है। उस का कोई प्रमाण तो दूर, अभी तक आभास भी नहीं है। यदि उसे बचाव के लिए दिया गया वकील नाजायज तरीके से सच को दबाता है तो वह उस की पेशे के प्रति बेईमानी और देशद्रोह दोनों होंगे। लेकिन आज न्याय की जरूरत पर न्यायालय के आदेश पर कोई वकील उसे न्यायिक सहायता उपलब्ध कराता है तो वह जनतंत्र और भारत की जनता के प्रति अपने कर्तव्य को निभा रहा है।

मैं ने बिलकुल सही कहा था और उसी पर दृढ़ हूँ कि बिना वकील मुहैया कराए किसी भी अभियुक्त पर एक तरफा मुकदमा चला कर सजा देने का काम तालिबानी कर रहे हैं। हम भी वही करते हैं तो इस मामले में उन में और हम में क्या फर्क होगा?

बहुत से लोग भावना में बह कर कुछ भी कह सकते हैं। लेकिन न्याय में भावना का कोई स्थान नहीं है। उसे सत्य पर ही खड़ा होना होगा। यह सच है कि हजारों लोगों ने कसाब को गोलियाँ बरसाते देखा है। इस बात को अदालत के सामने तो साबित करना ही होगा। इस में सरकार कोई कसर रखती है तो वह दोषी होगी।

संजय बैंगाणी जी एक और तो श्रीलंका सरकार की आम तमिलों को पिसने की नीति पर दृढ़ता की प्रशंसा कर रहे हैं दूसरी ओर भारत सरकार की आलोचना भी, कि वह आम तमिलों की रक्षा के लिए श्रीलंका सरकार पर दबाव क्यों नहीं बना रही है।
भारत सरकार कमजोर सरकार है और जनपक्षीय सरकार नहीं है, इस कारण से वह दबाव नहीं बना पाती है। इस मामले में भारत सरकार दोषी है। लेकिन तमिलों के नरसंहार की कोई आलोचना क्यों नहीं करता है? उस के विरोध में जब तमिलनाडु के वकीलों ने आवाज उठाई तो उस आवाज को दबाने के लिए सुब्रमह्यणम स्वामी सामने आए और पुलिस का जो तांडव मद्रास हाईकोर्ट परिसर में देखने को मिला वह दमन का काला इतिहास बन चुका है। उस के विरुद्ध कोई क्यों बोलने को क्यों नहीं खड़ा हुआ?

हम कब तक भावनाओं से खेलने का खेल खेलना छोड़ कर यथार्थ की जमीन पर खडे़ होंगे?

Mahesh Sinha said...

सही कहते हैं कानून अँधा होता है . दरअसल हमने व्यवस्था ही ऐसी बना रखी है . जिसे सारी दुनिया ने अंधाधुंध गोलियां चलाते देखा उसे सजा एक निश्चित तरीके से एक निश्चित व्यक्ति ही दे सकता है . ऐसे कितने ही मामले हैं जिनमे अपराधी दिन दहाड़े हत्या करके छूट गए और न्यायालय को ये कहने पड़ा कि शर्म की बात है. वैसे तो किसीको भी किसीको कोई सजा देने का अधिकार नहीं है .पहला पत्थर वो मारे जिसने कोई पाप नहीं किया हो ! वकील को अपने मुवक्किल की पैरवी करना है उसके पक्ष में ये जानते हुए भी की वोह गुनाहगार है. अजीब स्थिति है वकील किसका साथ दे कानून , मुवक्किल( जो देश का दुश्मन है ) या देश का ?

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

संजय जी, बेफिक्र रहें। कसाब को बचाने की कोशिश कोई भारतीय वकील नहीं करेगा। पाकिस्तानी वकील उस के बचाव के लिए नहीं आ सकता। भारत और पाकिस्तान के बीच ऐसी संधि नहीं है। और यदि कोई कोशिश करेगा तो भी कसाब नहीं बच सकता। कोशिश करने वाला भी धरा जाएगा।

अनूप शुक्ल said...

सुमन्तजी, मैंने यह अपनी टिप्पणी भावुकता में नहीं की।

१. आप कृपया मेरी टिप्पणी फ़िर से पढ़ें! मैंने लिखा टिप्पणियां अतिवादी हैं न कि टिप्पणीकार! आपने अपने मन से माना कि मैंने टिप्पणी करने वालों को अतिवादी कहा और उनके खिलाफ़ अतिवादी होने का फ़तवा दिया।

२.कानून सत्य का पर्याय नहीं होता लेकिन कानून /संविधान मेरी समझ में इसीलिये बनाये गये होंगे कि निर्णयों में एकरूपता लायी जा सके। संविधान में समय-समय पर सुधार भी परिस्थितियों के अनुसार होते रहते हैं। जहां तक सत्य की बात है तो सत्य एक भले हो लेकिन उसको देखने का नजरिया सबका अलग-अलग हो सकता है। इसीलिये कानून की आवश्यकता पड़ती होगी।
३. मुम्बई में मारे गये परिजनों की भावना व्यक्त करने वालों को हमने तालाबानी कहा यह आपका अपना निष्कर्ष है। आप फ़िर से द्विवेदीजी की टिप्पणी पढ़ें। उन्होंने लिखा था-यदि आप एक ऐसे अभियुक्त को जो बंदी है और जिसे कोई बाहरी साधन उपलब्ध नहीं है उस की चाहत का वकील उपलब्ध नहीं कराते हैं तो आप में और तालिबानों में क्या फर्क रह जाएगा? वे भी तो यही कर रहे हैं। एक बार सोचें कि क्या यह आलेख परोक्ष रूप से तालिबानीकरण का पक्ष नहीं ले रहा है? तालीबान लोग अपनी मनमर्जी से, जिसे वे अभियुक्त मानते हैं ,उसे बिना कोई बचाव का मौका दिये सजा दे देते हैं। द्विवेदीजी ने यही कहा कि बिना कानूनी प्रक्रिया के अगर आप अभियुक्त को सजा देते हैं तो हममें और तालीबानों में क्या फ़र्क रह जायेगा। आपने और अरुण अरोरा ने इसे अपने अनुसार ग्रहण किया कि हम हम मुंबई में मारे गये लोगों की भावनाओं को व्यक्त करने वालों को तालीबानी कह रहे हैं।
४.गोडसे ट्रायल का हवाला देकर और कसाब से न जोड़े जानें की बात कह कर आप क्या साबित करना चाहते हैं? गोडसे ट्रायल का हवाला देकर मैं यही कहना चाहता था कि गोडसे ने गांधीजी की हत्या की थी यह सबको पता था फ़िर भी गोडसे के खिलाफ़ मुकदमा चला तभी उसको सजा हुई। कसाब का भी ट्रायल हो रहा है। गोडसे को भी बचाव के लिये वकील मिले थे ,कसाब को भी। नाथूराम गोडसे और कसाब की तुलना के रूप में न देखा जाये का अनुरोध मैंने इसलिये किया था क्योंकि गोडसे और कसाब द्वारा किये गये अपराध अलग-अलग तरह के थे!
५.आप कहते हैं कि विरोधी की बात को भी खुले मन से सुननें का माद्दा रखें क्या यह बात आप बन्धुओं पर लागू नहीं होती? यह बात हम पर भी लागू होती है। १०० प्रतिशत लागू होती है। लेकिन आप ही बतायें सुमन्तजी कि यह कौन सी बात है कि एक अनाम ब्लागर दो मिनट में एक ठो ब्लाग खोलकर दहाड़ के चला जाता है कि १.काश कि कोइ दिवेदी जी का सगा मुम्बई हमले मे मरा होता और वे उसे यही उपदेश देते तो सब समझ जाते।
२.शायद आने वाले समय मे लोग जयचंद को भूलकर .दिवेदी जी को याद करें।
यह कोई विरोधी बात है क्या? द्विवेदीजी अपनी समझ से कुछ कह रहे हैं और वह किसी के मनमाफ़िक नहीं है तो द्विवेदीजी जयचंद हो गये?
मुंबई में मरे लोगों के परिजनों का दुख क्या केवल उनके परिवार के लोगों का दुख है? यह निष्कर्ष निकालना कि चूंकि हमारा कोई परिजन नहीं वहां नहीं मरा इसलिये हम ऐसी बातें कह रहे हैं यह कौन सा तर्क है?

६.आश्चर्य जनक बात यह है कि आपनें अभी तक सुरेश जी के आलेख पर टिप्पड़ी नहीं की हैं। मेरी टिप्पणी सुरेशजी के आलेख पर आयी टिप्पणियों पर ही है इसलिये यह उनके आलेख पर ही परोक्ष टिप्पणी है। सुरेशजी ने पहले ही पैराग्राफ़ में लिखा- मानो यदि किसी वकील को यह पता हो कि जिसका केस वह लड़ रहा है वह देशद्रोही है, फ़िर भी वह उसे बचाने के लिये जी-जान लगाता है और बचा भी लेता है तो इसे क्या कहेंगे “पेशे के प्रति नैतिकता और ईमानदारी” या “देशद्रोह”? लेख की शुरुआत ही अभियुक्त के वकील को देशद्रोही बताने की मंशा से हुई है। वकील संविधान सम्मत कानून व्यवस्था के अनुसार अपने अभियुक्त को कानूनी सहायता प्रदान कर रहा है। यह देशद्रोह कैसे हो गया?
एक ब्लागर के रूप में मेरे यह सवाल/आपत्तियां सुरेशजी से हैं ब्लाग पर टिप्पणियों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर अनाम लोगों के द्वारा विपरीत विचार रखने वालों की खिल्ली उड़ाने वाली टिप्पणियों से असहमति व्यक्त न करना यह दर्शाता है कि ब्लाग लेखक की उससे सहमति है। ऐसा होता रहा तो शायद आगे आने वाले दिनों में आपके ब्लाग पर शायद आपके विचार समर्थकों की टिप्पणियां दिखें या फ़िर छद्म नाम से विरोधी टिप्पणी करने वाले जिनके जबाब देने के लिये आपको कुछ और लिखने का मसाला मिलेगा।
७.क्या ब्लागर को अपनें आलेख पर आनें वाली टिप्पड़ियों पर सहमति-असहमति व्यक्त करना ही चाहिये, ऎसा ब्लागिंग का कोई नियम है?मेरी जानकारी में ब्लागिंग का ऐसा कोई नियम नहीं है कि ब्लागर को अपने ब्लाग पर आने वाली टिप्पणियों पर सहमति या असहमति व्यक्त करना ही चाहिये। लेकिन मेरी अपनी समझ में ब्लागर अपने ब्लाग पर लेखन और उस पर आई टिप्पणियों के लिये जिम्मेदार होता है। अगर आपके ब्लाग पर कोई अनाम टिप्पणीकार केवल किसी खिल्ली उड़ाने के लिये (शायद आने वाले समय मे लोग जयचंद को भूलकर .दिवेदी जी को याद करें।जैसी)ऊलजलूल टिप्पणी करता है तो मेरी समझ में ब्लागर का यह नैतिक दायित्व बनता है कि वह ऐसी टिप्पणी को या तो हटा दे या उसका समुचित जबाब दे। अगर वह ऐसा नहीं करता तो मेरी समझ में उस टिप्पणी से ब्लागर की सहमति है। (यह मेरी निजी राय है, जरूरी नहीं कि आप इससे इत्तफ़ाक रखें।)
८.अनूप जी आपसे ऎसी भावुकता की उम्मीद न थी सुमन्तजी मेरी समझ में मैंने पिछली टिप्पणी और यह टिप्पणी भी भावुकता में आकर नहीं की है। फ़िर भी अगर मेरे लिखने से आप यही निष्कर्ष निकालते हैं कि मैंने भावुकतावश ऐसा लिखा तो जरूर मेरे संप्रेषण में कोई कमी रह गयी होगी जिसका मैं अफ़सोस व्यक्त करता हूं।

अशोक कुमार पाण्डेय said...

bilkul theek
na kanoon ki zarurat hai na vakilon ki
kandhar tak apne damad ko pahunchane vaale sasur advani aur jasvant ko phansi
gujarat me mandir todne vale hatyhare CM ko shoot at sight
dara singh ko jala ke maar dalo
pragya ke peeth par bomb
army vale pandit ji ko shoot

kvarun ke muh me khoulta sheeshaa

aap bhi dvivedi ji guruji urf gurughantal ke chelon ko kanoon sikha ahe hain jisane samvidhan nahi manusmriti chaha tha

vaise sasuri sushma swaraj bhi kah rahi hai vote daliye.

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

अनूप जी, आशा है इस सारे विचार-विनिमय को मेरिट पर ही लेंगे-

१-आपकी पहली टिप्पड़ी‘द्विवेदीजी की बात से सहमति’, द्विवेदीजी की इस (कमेन्ट का आखिरी पैरा) टिप्पड़ी--‘इस आलेख के लेखक और इस आलेख के पक्ष में टिप्पणियाँ करने वाले सभी टिप्पणीकार मुझे क्षमा करें। मेरा विनम्र मत प्रकट करते हुए यही कह सकता हूँ कि यह आलेख केवल घृणा का सुनियोजित प्रचार प्रतीत होता है। या तो लेखक स्वयं इस में इरादतन सम्मिलित है, या फिर वह इस अभियान का शिकार है। सभी टिप्पणीकार भी उसी से प्रभावित हैं।’

और ‘ यदि आप एक ऐसे अभियुक्त को जो बंदी है और जिसे कोई बाहरी साधन उपलब्ध नहीं है उस की चाहत का वकील उपलब्ध नहीं कराते हैं तो आप में और तालिबानों में क्या फर्क रह जाएगा? वे भी तो यही कर रहे हैं। एक बार सोचें कि क्या यह आलेख परोक्ष रूप से तालिबानीकरण का पक्ष नहीं ले रहा है?’

इन टिप्पड़ियों को ध्यान से देखिये और फिर अपनीं टिप्पड़ी ‘द्विवेदीजी की बात से सहमति’ का क्या अर्थ होता है? द्विवेदीजी कह रहें है (अ) कि आलेख घृणा का सुनियोजित प्रचार है (आ) लेखक इस में या तो इरादतन शामिल है या अभियान का शिकार है (इ) टिप्पड़ीकार भी उसी से प्रभावित हैं (ई) चाहत का वकील उपलब्ध नहीं कराते हैं तो आप में और तालिबानियों में क्या फर्क रह जाएगा और (उ) क्या यह आलेख (हिदुओं के) तालिबानीकरण का पक्ष नहीं ले रहा है। क्या उपरोक्त टिप्पड़ियों से निकलनें वाले निष्कर्षों से वास्तव में सहमत हैं?

२-सत्य तो एक और शाश्वत ही होता है इसीलिए ‘सत्य’ कहा जाता है। जहाँ तक अलग-अलग नज़रिये की बात है उसका सम्बन्ध हस्तगत सूचनाओं, विश्लेषणात्मक बुद्धि और ज्ञान पर निर्भर करता है और यह क्षमता सबकी समान नहीं होती, इसीलिए मत भिन्नता होती है और यह कोई गुण नहीं है। संविधान में संसोधन परिस्थितियों के आधार पर ही नहीं राजनीतिक लाभ और बहुजनों को दबानें के लिए भी किये गये हैं। संविधान ही नहीं उसके प्रिएम्बिल तक में सेक्युलर और समाजवादी शब्द ठूँसा गया है सिर्फ हिन्दुओं को दबानें के लिए। काँग्रेस और तथाकथित समाजवादी भले ही दिवास्वप्न देखते रहें और कहते रहें कि बँटवारा अप्राकृतिक है, किन्तु सच यह है कि बँटवारा ‘टू नेशन’ के आधार पर हुआ था। बँटवारे के बाद जिस संविधान को लागू किया गया उसमें अल्पसंख्यकों के अधिकार तो हैं लेकिन हिन्दू तो आज चौथे दर्जे का नागरिक बनकर रह गया है। अब तो उसे आंतकवादी और तालिबानी भी कहा जा रहा है।

३-मात्र इतना ही कहना चाहता हूँ कि लीगल असिस्टेन्स प्रोवाइड़ करनें का प्राविधान है न कि चाहत का। और वह भी पैनल से। चाहत का वकील ही यह सजेस्ट कर सकता है कि नाबालिग होंने की बात उठाओ या उर्दू में डाक्युमेन्ट उपलब्ध कराओ। कानून में एक प्राविधान समरी ट्रायल का भी होता है और यह तो ड़े लाइट क्राइम है और ओपन एण्ड़ शट वाला केस है। द्विवेदीजी तो फाँसी की सजा देने के बाद भी अफज़ल्गुरू की तरह उसे अजायब घर में लीगल नहीं राजनीतिक फायदे के लिए रखना चाहते हैं। लोग भूल रहे है कि ऎसे रखनें पर तथाकथित मानवतावादी अपनी दूकान चलाएँगे और अन्ततः अमेरिका की गुप्त जेलों मे बन्द कैदियों की भाँति बदनाम होकर छोड़ना पड़ेगा।

४- आप कह रहे हैं इसलिए मान लेता हूँ लेकिन मेरी समझ में गोड़्से का उदाहरण नाँस्टी था।

५-अनाम टिप्पड़ीकार ब्लागर नहीं होता दूसरे शब्दों में वह आम जनता जैसा होता है। यह ब्लागिंग के पाजिटिव और निगेटिव दोंनों पक्ष की ओर इशारा करता है। दोंनों टिप्पड़ियाँ अपेक्षित नहीं थीं, टिप्पड़ियों में होश कम रोष ज्यादा है, किन्तु फिर भी यह क्रिया की प्रतिक्रिया ही तो है। वैसी टिप्पड़ी शायद न होती अगर द्विवेदीजी की टिप्पड़ी आक्षेपकारी न होती।

६-अपनीं बात पर मैं कायम हूँ। सुरेश जी नें अधिवक्ता काज़मी के बैकग्राउण्ड़ पर जो समाचारों के हवाले से बात कही है उस को देखनें की भी जरूरत है। परिस्थितिवश चोरी करनें वाले और आदतन चोरी करनें वाले में अन्तर नहीं करेंगे? क्या कसाब दॆशद्रोही नहीं है? सुरेशजी कह रहे है कि मान लो कि काज़मी ऎसे देशद्रोही को बचा लेते हैं उस स्थिति में सरे आम सैकड़ों लोगों की जान जिसनें ली हो को बचाने वाले को आप क्या कहेंगे,यह प्रश्न उठाया गया है। दुर्भाग्य से अगर ऎसा हो जाता है तो मै तो काज़्मी को देशद्रोही कहूँगा और उम्मीद है आप भी कहेंगे।

७-अनाम टिप्पड़ीकार किसी की भी खिल्ली कुछ समय भले उड़ा लें लेकिन यह ज्यादा दिन नहीं चलता, सभ्य ब्लागर और टिप्पड़ीकार उस का जवाब देंगे लेकिन क्या एक बड़ी जमात खुद ब्लागर्स की ऎसी नहीं है जो सेक्युलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं को गाली बकती रहती है?

८-भावुकता कोई अवगुण नहीं है किन्तु टिप्पड़ी का लक्ष्य सीधे आलेख पर न होकर द्विवेदीजी की टिप्पड़ी पर होंने के कारण भावुकता शब्द का प्रयोग मैनें किया था।

एक निवेदन सभी से कि यह विवाद यहीं खत्म कर देना चाहिये।

संजय बेंगाणी said...

ब्लॉगजगत में महा भंयकर विवाद हुए हैं, तथा भयंकर अपशब्दों का उपयोग भी हुआ है. उन्हे देखते हुए यहाँ कि चर्चा फिर भी शिष्ट लग रही है. अभी इसे बन्द न करें. यहाँ के टिप्पणी कारों में कोई देशद्रोही नहीं है, न ही भावनाओं में अंतर है. व्यक्त करते शब्द जरूर अलग अलग है. अतः चर्चा चलनी चाहिए.
सरकार ने कसाब पर जो धाराएं लगाई है क्या उन में जानबुझ कर कुछ ढील दी गई है? मुझे ऐसा लगता है. विशेषज्ञ अपनी राय दे सकते है.

Pak Hindustani said...

द्विवेदी जी राजनीती और देशप्रेम में जो फर्क होता है क्या आप उसे महसूस कर सकते हैं? यहां और वहां की गई कोई भी बात राजनीति नहीं देशप्रेम के चलते लिखी गई है। इस फर्क को सबसे पहले समझिये।

सच्चाई का ठेका आपने अपने बली कन्धों पर अकेले ही उठा रखा है, लेकिन दुख है कि यह सच्चाई सिर्फे आपकी खुद की बनाई सपनों की दुनिया में ही सच है। सच्चाई यह है कि कसाब ने देश के कानून का उल्लंघन करते हुए 166 लोगों की हत्या में महत्वपूर्ण रोल अदा किया। आप कानूनों के इतने बड़े जानकार होकर ब्लाग लिखते हो जरा बताओ कि मकोका लगाने लायक केस है यह नहीं? या मकोका का सिर्फ एक खास इस्तेमाल होगा अब?

वकील न्याय व्यवस्था की लचरता से हानी उठा रहे हैं? किस तरह जरा समझाना? तारीख पे तारीख लेकर मुकदमे लटकाकर वो वादी और प्रतिवादी दोनों से जिस तरह नोट कूट रहे हैं इसके कई उदाहरण मैंने देखें हैं। दोषी व्यक्ति इंसाफ के डर से कहता है वकील से कि भाई तारीख ले लो और वकील कभी उसे अस्पताल भेज देता है कभी खुद बीमार पड़ जाता है और किसी न किसी बहाने तारीख लेता जाता है। वकील लोगों ने कानून की लचरता को नावांपीटी का जबर्दस्त जरिया बनाया है इसलिये वह नहीं चाहते की व्यवस्था सुधरे। जहां सुधरने की कोशिश होती है वकील हड़ताली बन जाते हैं।

अब आपको लगता है कि कसाब को कोई नहीं बचा सकता, क्योंकि जब आपकी तालिबानी टिप्पणी पर इतने लोगों ने सवाल उठाया तो आपको सफाई देने की जरुरत महसूस हो रही है। चलिये कारण जो भी हो कम से कम आपको अब लगना तो शुरु हुआ कि कसाब को नहीं बचा सकते वरना आप यह भी कह सकते थे कि जब तक कानून अपना फैसला नहीं देगा मैं कसाब को दोषी नहीं मानता।

लेकिन आपकी बाकी बातें सुनकर और भी क्षोभ हुआ। कसाब को वकील की जरुरत ही नहीं है? कसाब 'जैसा' अपराधी कानून के सारे पंगों का जानकार है? इसलिये 'वह' नाबालिग होने का आधार लेना चाहता है? उसने जो कुछ कहा उसके लिये वकील की जरुरत ही नहीं थी? बच्चा-बच्चा भी जानता है कि बयान से मुकरा जा सकता है?

द्विवेदी जी आपकी इन बातों से ही जाहिर होता है कि आप वकालत के पेशे के खिलाफ कुछ सुनने को तैयार नहीं है। हर वकील को आपने हमसाया मान लिया है और उसकी अंधी पैरवी आप कर रहे हैं। इससे पहले जो वकील था न उसने कसाब को नाबालिग कहा था, न उसके बयान से मुकरने को कहा था, नये वकील के आते ही कसाब सब जान गया? भाई द्विवेदी जी, थोड़ा सोचिये कि आप क्या कह रहे हैं? क्या यह सब लोगों के गये उतरेगा?

आतंकवाद की मदद कसाब के मुकदमे को कमजोर करने का विरोध करने वाले लोग नहीं कर रहे, वह लोग कर रहे हैं जो कसाब के मुकदमे को कमजोर करने के विरोध करने वाले लोगों का विरोध कर रहे हैं। जरा यह बताइये कि अगर यह मुकदमा कमजोर होगा तो इससे आतंकवाद का किस प्रकार विरोध होगा? और अगर यह मुकदमा सही चले तो किस प्रकार मदद होगी?

भाया कसाब को दुनिया के आगे कुछ नहीं प्रमाणित करना है। प्रत्यक्ष प्रमाण है पाकिस्तान। आप हाथ हिला-हिला के, नाच-नाच के चाहे जितना चिल्ला लो 'बटेर-बटेर' जो बटेर होगी वह ही बटेर दिखेगी। मतलब इन उच्चू-पुच्चू मुकदमों से किसी देश को आतंकवादी साबित कर सकें तो आधी दुनिया के देशों को बाकी आधी दुनिया के देश आतंकवादी साबित कर देंगे। यहां तो फलिस्तनी बम-के-बम बांध-बांध कर इजराइल में लोगों को मार रहे हैं और कोई अब तक फिलीस्तीन को आतंकवादी देश घोषित नहीं कर पाया? आप मजाक कर रहे हो या हमारा पोपट बना रहे हो?

यह भी बहुत ही सही मजाक है कि कसाब को सबूत बना के जिंदा रखना है। ऐसी ही भोथरी दलीलें अफजल गुरु के बारे में लोग देते हैं। भाया जो बंदा इतना श्याना है कि वकीलों के कान काट ले वो क्या गवाही देगा पाकिस्तान के खिलाफ? बयान से तो मुकर गया अदालत में? या इस केस के तथ्यों की जानकारी आप नहीं प्राप्त कर रहे?

आप तो रहो ढृढ़, जीवन भर जिस विचारधारा को पाल पोस कर बड़ा किया कोई उसे एक दिन में थोड़े ही छोड़ेगा, चाहे वह बात देश के खिलाफ ही क्यों न हो। हम भी ढृढ़ है आपके झूठ और दुष्प्रचार का विरोध करने के प्रति। आपको जो चोट पहुंची उसके लिये हमें माफ कीजिये यह बातें आपके नहीं आपके द्वारा व्यक्त विचारों के खिलाफ है।

और यह भी ध्यान रखिये सुरेशी जी का विरोध कसाब को कानूनू मदद देने के खिलाफ नहीं था उनका विरोध था: -

1. बेईमान वकील देने पर
2. बेईमान वकील द्वारा कसाब को बचाने के लिये बेईमान दलीलों का सहारा लेने पर
3. बेईमान वकील द्वारा कसाब के मुकदमे को लटकाये रखने की कोशिश पर

हिन्दी के अच्छे जानकार हैं आप, पढ़ेंगे तो जानेंगे।

कुछ बातें गांठ बांधने योग्य:

1. तालिबानी वह है जो तालिबानी हैं, सुरेश जी या उनके टिप्पणीकार नहीं।
2. अतिवादी वह होते हैं जो लोगों को मारते व सताते हैं, उनका विरोध करने वाले हम अतिवादी नहीं।
3. आप अतिवादी को अतिवादी कहने से कतराते हैं और किसी निर्दोष को इतनी आसानी से अतिवादी कह जाते हैं? यह शर्मनाक है। सोचिये इस बारे में।

Suresh Chiplunkar said...

I am out of Ujjain and away from my computer I definitly try to reply all the comments when I will back. Thanks for each and every comment.

लोकेश Lokesh said...

मुझे लगता है कि काफी लंबे समय बाद, टिप्पणियों के बहाने, शुरूआती आक्रोश के बाद, ब्लॉगजगत पर एक सार्थक बहस चल रही है।

हालांकि इतने विवादित विषय पर, एक नज़र में, कोई महिला ब्लॉगर हिस्सा लेते हुये नहीं दिखी।

khursheed said...

Bilkul sahi kaha Ajmal ko fasi honi chahiye jald se jald. Sath hi Sath Babri Maszid Dhahne wale ko bhi fansi honi chahiye taki nafrat phailane walon ko sabak mile.

संजय बेंगाणी said...

@ खुरशीद

जब बात खेत की हो रही है, आप खलिहान का राग अलाप रहे हो..


यहाँ चर्चा कसाब पर केन्द्रीत रहे और वकील की भूमिका पर रहे....

khursheed said...

Wakeel ki bhumika ke wajah se to bache hue hain sabhi.

Dikshit Ajay K said...

Main khursheed jee ki bat se sehmat hun kee kasab ke sath Maszid girane walon ko bhee Phanse Lage. Meree Khursheed jee se Iltza hai keevo mare sath Pakistan Chalen Wahan zada miszid girai gai hai, udhar ja kar aap yeh mang uthana Aur JUTE khana Main ginu ga.
Bada Maza aayga.

संजय बेंगाणी said...

अजय भाई का जवाब मजेदार रहा :) वैसे मुझे नहीं मालुम था कि उस जगह को मस्जिद कहते है, जहाँ राम की मूर्ति स्थापित हो.

चर्चा की पटरी न बदले तभी उसकी सार्थकता है.

डॉ .अनुराग said...

मुझे पहले कुछ टिपण्णी कर्ताओं ने ढेरो तर्क रखे है....पहली बात कसाब एक राष्ट का अपराधी है इसलिए उसके अपराध के विषय में किसी को कोई संशय नहीं होना चाहिए ....देश की सुरक्षा से जुड़े मामलो में हमें कठोर निर्णय लेने में किसी बात की हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए .....इस देश में पहले भी किसी विदेशी से बलात्कार के मामले में न्याय पालिका ने जल्दी निर्णय लेकर दंड दिए है तो इस मामले में हमें किंचित देरी किये बगैर ....त्वरित न्याय होना चाहिए ...सिद्धांत ओर असूलो की बात वहां आती है जहाँ इनकी कीमत हो. इस देश में संसद में हुए हमलो में शहीद जवान के परिवार आज किस पीडा से गुजर रहे है वे हम ओर आप महसूस नहीं कर सकते .
बहुत सारे लोगो को नहीं मालूम की पाकिस्तानी सेना भारतीय जवानो के शरीर के साथ कितनी निर्ममता से व्यवहार करती है ..हमें भारतीय सेना के मनोबल ओर अनुशासन की प्रशंसा करनी चाहिए के अपने साथियों के शरीर के साथ ये दुर्व्यवहार देखकर भी वे अपनी मानवता नहीं खोते .
पिछले कई सालो में बेहद परिवर्तन आये है .देश इस वक़्त आतंकवाद के दौर से गुजर रहा है ...यदि हम आतंकवादियों को कोई सख्त सन्देश नहीं देंगे तो उनके हौसले बुलंद होगे.....
सच मानिए मेरे दिल से पूछिए मै नहीं समझता उसके किसी भी तर्क या बचाव को सुना जाये ...उसकी जिंदगी तब तक जरूरी समझी जाये जब तक उससे कोई जानकारी नहीं मिलती....वर्ना उसे फ़ौरन फांसी दे दी जाये ...
कल ही सेना ने अपने तीन जवान श्री नगर में खोये है ...उनकी उम्र २७ से २९ सल् के बीच थी ओर इस देश के सारे चैनल आई पी एल का राग अलापे जा रहे है.....यही इस देश की विडंबना है .....यहाँ आतंकवाद भी अब किसी हिस्से की समस्या है...देश की नहीं...

khursheed said...

@Dixit Ajay k. and sanjay

मैं दीछित जी और संजय जी की बात से बिलकुल सहमत हूँ की पाकिस्तान में कई मस्जिद गिराई गई और वहां तो मस्जिद में ब्लास्ट होता रहता है. ऐसा करने वालें वहां के कानून और न्यायलय को बिलकुल नहीं मानते. लेकिन भारत में ऐसा नहीं है यहाँ कानून का राज है मगर फिर भी यहाँ सर्वोच्च न्यायलय को ठेंगा दिखाकर सिर्फ और सिर्फ अपने राजनितिक मकसद के लिए मस्जिद को गिरा दिया गया. लेकिन पाकिस्तान जो ये सब करते हैं उनको हम आतंकवादी, उग्रवादी, हिंसक आदि जाने क्या-क्या शब्दों से संबोधित करते हैं. इसलिए यहाँ भी ऐसा करने वालों को क्या इसी शब्द के साथ संबोधित करना चाहिए?

Pak Hindustani said...

खुर्शीद,

'कसाब को फांसी के साथ बाबरी मस्जिद गिराने वालो लोगों को भी फांसी मिले'

1. आपने बात दंगो की नहीं किसी स्थल को नुक्सान पहुंचाने की कि। आप का कहना है कि किसी इमारत (या धार्मिक स्थल) को गिराने वाले को फांसी होनी चाहिये? यही बात आप मंदिरो को नुक्सान पहुंचाने वाले लोगों के लिये भी कहेंगी?

यह भी बताइये कि हिन्दुस्तान के किस कानन के अनुसार किसी इमारत को गिराने वाले को फांसी देने का प्रावाधान है।

(द्विवेदी जी, आपको खुर्शीद की बात में कानून का मखौल या अतिवादी कोई बात नहीं दिखी न? अतिवादी तो सुरेश जी हैं न? खुर्शीद तो बस 'ओहो-सताई-हुईं-हैं')

2. कसाब को फांसी और बाबरी मस्जिद को गिराने का संदर्भ किस प्रकार आपस में ताल्लुक रखता है? क्या हम कह सकते हैं कि प्रज्ञा को सजा तभी दें जब गोधरा कांड के हर अभियुक्त को फांसी देंगे? आप सहमत हैं?

[द्विवेदी जी, क्या आपको इनकी बातों में सड़न की बू आती है? या फिर आपको सिर्फ सुरेश जी (जिन्होंने कसाब को पहले की किसी घटना से नहीं जोड़ा) से ही परेशानी है?]

भारत में कानून का राज है लेकिन उसका इस्तेमाल कुछ लोग गलत नतीजों के कर रहे हैं, दूसरे लोग (खुर्शीद जैसे) कानून का मनमाफिक मतलब निकाल रहे हैं। उनकी अजीब-अजीब बातें, अजीबो-गरीब शर्तें किसी भी देश के नागरिक इमानदार के गले नहीं उतरतीं।

लेकिन जो बेईमान नागरिक हैं, जिन्हें देश से ज्यादा अपना धर्म और प्रपंच प्यारे हैं वो देश से दगा करते हैं, कुछ अपने काम से, और कुछ अपनी बातों से।

khursheed said...

"लेकिन जो बेईमान नागरिक हैं, जिन्हें देश से ज्यादा अपना धर्म और प्रपंच प्यारे हैं वो देश से दगा करते हैं, कुछ अपने काम से, और कुछ अपनी बातों से" JAISE SANGHIYON KO APNE DESH SE AUR DESH KE KANOON SE ZAYADA APNA DHARM AUR PRAPANCH AUR APNA RAJNITIK HIT PYARE THE.

Pak Hindustani said...

वैसे मैं आपकी बात कर रहा हूं, लेकिन अगर संघियों और किसी को भी देश से ज्यादा धर्म प्यारा है तो वह बेहद घटिया व्यक्ति है हमें बस यह पता है

जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरियसी
मां और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं

क्या आप इस पर विश्वास करती हैं? या फिर आपके उपर कोई सवाल उठे तो उसका जवाब आपको सिर्फ यह आता है कि संघियों के यहां भी ऐसा होता है

आपकी खुद का फलसफा क्या है? देश के प्रति समर्पण क्या है? धर्म का स्थान क्या है आपके लिये? आपके समाज के नियम क्या हैं? कभी इनपर भी चर्चा हो

हम तैयार हैं

कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...
This comment has been removed by the author.
कविता वाचक्नवी Kavita Vachaknavee said...

प्रवास पर हूँ, आज ही देख पाई।

मेरे विचार से राष्ट्र की तुला में शेष सारे नियम कानून,संविधान,मानवाधिकार,कोर्ट,विधायिका,संसद, प्रधानमन्त्री,राष्ट्रपति आदि आदि आदि भी गौण हैं। राष्ट्रीय अस्मिता व सुरक्षा से बढ़कर कुछ भी नहीं है.
अत: ऐसे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों पर न्यायपालिका अथवा अन्य वैसे ही किसी तर्क या सम्वैधानिक स्थिति का आश्रय लेना राष्ट्रीयशर्म की बात है, राष्ट्रीय पतन की स्थिति है। इसे अन्य किसी भी संवैधानिक नीति से तुलना में नहीं रखा जाना चाहिए न ही वैसा ही कोई न्यायिक प्रावधान इस पर लागू होना चाहिए। गाँधी-हत्या वाला तक भी नहीं। राष्ट्र गांधी से भी बहुत बड़ा है, अन्य इतर सभी प्रकरणों से तो बड़ा है ही।

राष्ट्र इन सब से बहुत ऊपर है, उसकी सुरक्षा के मामले इन दाव पेंचों में नहीं उलझाए जाने चाहिएँ\
भले ही अफ़जल हो, कसाब हो या कोई भी और।
कोई संवैधानिक स्थिति, व्यक्ति, नियम, उदाहरण, घटना,वाद, पद,या भाव उस से ऊपर नहीं है। अत: इसे सेना अदालत में सीधे गोली मार देने के लिए निर्देशित कर दिया जाना चाहिए।

डा० अमर कुमार said...

हो चुका, अब हम भी कुछ बोलें...
काहे की ज़ल्दी है, आप लोगों को ?
बहुतेरे ज़रूरी मुद्दे ठँडे बस्ते में पड़े सुस्ता रहे हैं ।
आप एक आदर्श भारतीय व्यवस्था का परिचय देते हुये, कसाब भाई को भी ठँडॆ बस्ते में डाल दो !

questnaveen said...

its a genuine post and having very good description....
India's No 1 Local Search Engine


QuestDial