Sunday, March 8, 2009

महिला दिवस, शोभा डे और “सीता सेना”… (एक अभद्र और पिछड़ी सी माइक्रो पोस्ट)

World Women’s Day, Shobha De, SITA Sena

हालांकि महिला दिवस पर शोभा डे और खुशवन्त सिंह जैसों के बारे में कुछ लिखना एक कड़वा अनुभव होता है, लेकिन ये “पेज-थ्री हस्तियाँ”(?) अपनी “गिरावट” से मजबूर कर देती हैं कि उनके बारे में कुछ लिखा जाये। जैसा कि सभी जानते हैं शोभा डे नाम की एक “पोर्न लेखिका” भारत के “प्रगतिशील तबके”(?) में मशहूर हैं, अधिकतर अंग्रेजी में ही सोचती, बोलती और लिखती हैं, उन्होंने राम सेना के अत्याचारों के विरोध में महिला दिवस यानी 8 मार्च को नई दिल्ली में “सीटी बजाओ” अभियान का आयोजन किया है और अपनी इस किटी पार्टी सेना को नाम दिया है “सीता सेना”। जी हाँ, राम सेना के विरोध में उन्हें सीता सेना नाम ही सूझ पाया। एक तो यह हिन्दू नाम है और दूसरा इस नाम का “प्रोपेगंडा” करके सेकुलरों की जमात में और भी गहरे पैठा जा सकता है। यदि वे “फ़ातिमा सेना” या “मदर मैरी सेना” जैसा नाम (अव्वल तो रख ही नहीं पातीं) रखतीं और इंडिया गेट पर किसी प्रकार की लेक्चरबाजी करतीं तो उनका सिर फ़ूटना तय था। ये मोहतरमा इतनी महान और प्रगतिशील लेखिका हैं कि इनके हर तीसरे लेख में ‘S’ से शुरु होने वाला अंग्रेजी का तीन अक्षरों का शब्द अवश्य मौजूद होता है, सो बिक्री भी बहुत होती है, ठीक खुशवन्त सिंह की तरह, जो दारू और औरत पर लिखने के मामले में उस्ताद(?) हैं। मैडम का संक्षिप्त सा परिचय इस प्रकार है - शोभा राजाध्यक्ष, जिनका जन्म जनवरी 1947 में हुआ, ये एक मराठी सारस्वत ब्राह्मण हैं। इनके दूसरे पति दिलीप डे हैं और फ़िलहाल ये अपने छः बच्चों के साथ मुम्बई में निवास करती हैं।

भई हम तो ठहरे “साम्प्रदायिक”, “फ़ासिस्ट” “पिछड़े” और “दकियानूसी” लोग, इसलिये मैडम को हम सिर्फ़ सुझाव दे सकते हैं कि इंडिया गेट पर जमने वाली इन महिलाओं के इस झुण्ड को ये “शूर्पणखा सेना” का नाम भी तो दे सकती थीं…।

उधर एक और महिला हैं साध्वी प्रज्ञा, जो कि जेल में भोजन में अंडा परोसे जाने के कारण कई दिनों से भूख हड़ताल पर हैं, उनकी हालत नाजुक है और कोर्ट ने कहा है कि उन्हें अस्पताल में भरती किया जा सकता है (यह कोर्ट ही तय करेगा, भले ही साध्वी की हालत कितनी ही खराब हो जाये, कोई महिला संगठन उनके पक्ष में सामने नहीं आयेगा)। साध्वी प्रज्ञा जी को यह बात समझना चाहिये कि खाने में अण्डा दिये जाने जैसी “छोटी सी बात” पर इतना नाराज़ होने की क्या आवश्यकता है? क्या उन्हें पता नहीं कि “हिन्दुओं की धार्मिक भावना” नाम की कोई चीज़ नहीं होती? इसलिये सरेआम “सीता सेना” भी बनाई जा सकती है, और कोई भी पेंटर हिन्दुओं के भगवानों की नग्न तस्वीरें बना सकता है।

अब महिला दिवस पर इतने बड़े-बड़े लोगों के बारे में लिख दिया कि “फ़ुन्दीबाई सरपंच” (यहाँ देखें) जैसी आम और पिछड़ी महिलाओं के बारे में लिखने की क्या जरूरत है?

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16 comments:

पंगेबाज said...

खुशवंत सिंह वो जो गुरुद्वारे मे जाकर महिलायो की पिछौटी देख कर सेक्स का अनुभव करते है और खुले विचारो के होने के कारण बर्ताते भी है प्रगति शील महिलाये उनके पास जाकर उनके घूरने का आन्न्द उठाती है ऐसे ही शोभा डे भी खुले विचारो की महिला है जो मात्र छै अदद बच्चो की मा है इन पिताओ के बारे मे उन्हे अभि लिखना बाकी है जी :) इत्ती महान आतमाओ के बारे मे हम क्या बोले हम सेकुलर जो ठहरे

mayur said...

`सोशल ट्रीटमेंट´का संकल्प लेना होगा महिला दिवस पर कुछ सार्थक इधर भी पड़ सकते हैं । महिला सशक्त हों.राष्ट्र सशक्त होगा

cmpershad said...

शोभा डॆ अण्ड नाइट पत्र-पत्रिकाओं में दिखती रहती है। इतनी महान हस्ती को कौन नहीं जानता भाई- वो तो फ्री-सेक्स राइटिंग के लिए प्रसिद्ध है ही। खुशवंतजी तो बेचारे बूढे हो ही गए है, अब तो केवल ज़बान ही हिला सकते हैं ना:)

अंशुमाली रस्तोगी said...

बंधु, काहे इतना तीखा लिख-लिखकर प्रगतिशीलों को नाराज करते रहते हो?

sareetha said...

इस पोस्ट को लिखने वाले और कमेंट करने वाले फ़ासिस्टों आप सब वाकई दकियानूस , पिछड़े और सांप्रदायिक हैं । अरे भई जब राम का अस्तित्व ही नहीं था ( ऎसा सरकार कहती है) तो सीता सेना बने या वानर सेना क्या फ़र्क पड़ता है । इन किटियों की आज़ाद ख्याली से जलते हैं आप लोग , इसी लिए कुछ भी आँय बाँयं शाँय कहने लगते हैं । अँग्रेज़ियत में सब जायज़ है कब समझेंगे आप लोग । आए दिन छाती पीट पीट कर पूरे देश को मातमखाने में तब्दील करके छोड़ रखा है हिन्दूवादियों ने । एँजॉय करना सीखिए । जश्न मनाना सीखिए । खुश रहने की खुशफ़हमी पालना सीखिए । बी कूल ,बी पेशेंट , बी पॉज़िटिव ....।

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी यही नारी समान पाती है( फ़ुंदी बाई जेसी) यही नारी अपने ही समाज को दल दल मे ले जाती है, किसी ने सच ही कहा है की अच्छी नारी नर्क को स्वर्ग बना देती है, ओर वेबकुफ़ नारियां स्वर्ग को नरक बना देती है.
सीता सेना बनाने से पहले इन विशेष नारियो मे सीता ना सही किसी ककेयी या मंथरा के ही गुण आ जाते..... देश के नोजवान पीढी को घुम राह करने वालिया.....आज के भारत की आजाद नारिया.....:)
आप का धन्यवाद



आपको और आपके परिवार को होली की रंग-बिरंगी भीगी भीगी बधाई।
बुरा न मानो होली है। होली है जी होली है

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

तो क्या नारीवादी आन्दोलन की कमान अब शोभा डे सम्हालने जा रही हैं? फिर तो हम इसके लिए भगवान से प्रार्थना ही कर सकते हैं...। जय हो।

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

यह किटीयाँ ही तो नारी को बदनाम करती है . इनेह हिन्दुओं की अस्मिता से खेलना का परमिट प्राप्त है

दिल दुखता है... said...

ये लोग नारी को सम्मान से नहीं जीने दे सकते सर जी..
ये तो उन लोगो में से है, जो भारतीय नारियों को पतित करने के लिए 'पब भरो' का आवहान करती है.

Shastri said...

शोभा डे जैसे लोगों की लेखनी दिनप्रतिदिन हमारे जवानों (और जवान बूढों) को कामकला के 64 कोण आधुनिक तरीके से सिखा कर उनको बुद्धिजीवी के साथ साथ "@#$%" जीवी बना रही है. ये लोग इतना स्थान इसलिये पा जाते हैं के ये "अंग्रेजी-माता" का प्रयोग अपनी लेखनी के लिये करते हैं.

पब संस्कार, चड्डी-संस्कार, लडकियों को चालू और शराबखाने को आबाद बनाने वाले संस्कार, को इस तरह के लेखन द्वारा गजब का प्रोत्साहन मिलता है.

हिन्दी चिट्ठाजगत मे कई हैं जो स्त्री-स्वतंत्रता के नाम पब संस्कृति का समर्थन करते हैं.

इस सब का एक ही लक्ष्य है -- स्वार्थ को बढावा दो, देश जाये भाड में.

लिखते रहें! माईक्रों तो मेक्सी असर दे रहा है!!

सस्नेह -- शास्त्री

Meenu khare said...

जय हो।

Sanjeet Tripathi said...

चलिए बाकी बहस एक तरफ, मैं दूसरे मुद्दे पे बात करूं।
वो ये कि प्रभु, आपकी जो माइक्रो पोस्ट है उसकी साईज़ तो बहुतों की असल पोस्ट की साईज़ से भी बड़ी है। मतलब यह कि आपके लिए भले ही ये माइक्रो पोस्ट है लेकिन……… ;)

गर्दूं-गाफिल said...

साध्वी प्रज्ञा जी को अंडे खिलने की कोसिस हो रही है .यह जान कर दुःख हुआ ।

तुलसी हाय गरीब की कबहूँ न निष्फल जाए

मरी खल की श्वांस से लोह भस्म हो जाए

G M Rajesh said...

swatantrataa ke maayne yahi hai ki chaahe jo karo koi kuchh kahe to usiko nyaayaalay me ghaseeto

संजय बेंगाणी said...

जब गर्त में जाने को ही उत्कर्ष माना जा रहा है तो कहने बचता ही क्या है? पता है हिन्दुओं से खतरा नहीं तो बहादूर बन कर खुश होने में क्या जाता है?

त्यागी said...

ख़ैर सहभ हम तो कुछ कहने की हसियत ही नहीं रखते बस जो कुलीन (कुल हीन) लोग कुछ लिख दे उन सुभाष गतेडे, खुशवंत सिंह, शोभा डे या भूषण जी जैसे पर बिना अंग्रजी की भद्दी गाली दिया ही टिप्पणी कर दे.
ख़ैर रंगे सियारों का जमाना है. शेर को समय तो लगे गा ही. रंग अबकी बार प्रलय में ही उतेरेगा