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Saturday 14 March 2009

पाकिस्तान की शिक्षा प्रणाली, भारत के “नॉस्टैल्जिक” बुद्धिजीवी और “शर्मनिरपेक्षता”… (भाग-1)

Pakistan Education System & Indian Secular Intellectuals

“1947 से पहले भारत, पाकिस्तान का ही एक हिस्सा था”… “1965 के युद्ध में पाकिस्तान ने भारत के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर लिया था, लेकिन निश्चित हार देखकर नई दिल्ली ने संयुक्त राष्ट्र से बचाव की गुहार लगाई और हमने युद्धविराम कर दिया…”, “1971 की लड़ाई में पाकिस्तानी सेना ने बड़ी हिम्मत दिखाते हुए भारत के पूर्वी और पश्चिमी वायु कमान को बुरी तरह नष्ट कर दिया था…” ना, ना, ना भाईयों ये पंक्तियाँ मैं भांग खाकर नहीं लिख रहा, असल में यही कुछ पाकिस्तान के मदरसों में बच्चों को पढ़ाया जा रहा है, और ये बात आरएसएस या भाजपा नहीं कह रही, बल्कि पाकिस्तान की खुफ़िया एजेंसियाँ इस बात की तसदीक कर चुकी हैं कि बगैर किसी सरकारी मदद से चलने वाले हजारों मदरसों में इस प्रकार की विकृत शिक्षा और बे-सिर-पैर के पाठ पढ़ाये जा रहे हैं।

जब मुम्बई में आतंकी हमले हुए तब लोगों ने टीवी पर देखा कि कम उम्र के बेहद कमसिन से नज़र आने वाले छोकरे हाथों में एके-47 और झोले में हथगोले भरे हुए ताबड़तोड़ सुरक्षा बलों और आम आदमियों पर हमले कर रहे हैं। संयोग से उसमें से एक अजमल कसाब पकड़ा भी गया। उस समय कई भारतीयों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया था कि इतनी कम आयु में ये बच्चे आतंकवादी कैसे बन गये? किसने इनके दिमाग में भारत के प्रति इतना जहर भर दिया है कि अपने परिवार और अपनी उम्र को भूलकर ये आतंकवादी बन गये? इसका एकमात्र और विस्तृत जवाब है पाकिस्तान की मौजूदा शिक्षा प्रणाली, पाकिस्तान के स्कूलों में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम, प्रायमरी और मिडिल कक्षाओं में कोर्स में भारत के विरुद्ध उगला गया जहर…

आज जबकि तालिबान का शिकंजा अफ़गानिस्तान से होते हुए स्वात घाटी और कराची तक पहुँच चुका है, भारत के ये “सेकुलर” और “नॉस्टैल्जिक” अभी भी पाकिस्तान से दोस्ती के मुगालते पाले बैठे हैं। न सिर्फ़ खुद मुगालते पाले हुए हैं, NCERT की पुस्तकों की मदद से भारत के बच्चों को भी अपनी तरह के “नकली सेकुलर” बनाने की जुगत में लगे हुए हैं। हाल ही में अखबारों में वाघा सीमा से लौटते हुए कुछ महानुभावों का चित्र छपा था, ये महानुभाव पाकिस्तान की सदभावना यात्रा पर गये थे, जाहिर है कि ये सेकुलर ही होंगे, इनमें शामिल थे महेश भट्ट, कुलदीप नैयर और स्वामी अग्निवेश। अब ये कहना मुश्किल है कि ये सज्जन “नॉस्टैल्जिक” हैं, आवश्यकता से अधिक आशावादी हैं, या फ़िर एकदम मूर्ख हैं… इनमें से पहली सम्भावना सबसे अधिक मजबूत लगती है। इन जैसे कई-कई लोग भारत में भरे पड़े हैं जो 60 साल बाद भी यह सोचते हैं कि मुस्लिम बहुल पाकिस्तान कभी भारत का दोस्त बन जायेगा। एक बड़ा सा समूह है जो पाकिस्तान से दोस्ती के राग अलापता रहता है, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि पाकिस्तान में कोर्स में क्या-क्या पढ़ाया जा रहा है… और इससे भी ज्यादा दुःखद बात यह है कि इन जैसे लोग लगातार “सरस्वती शिशु मन्दिरों” की शिक्षा प्रणाली पर हमले बोलते रहते हैं, शिक्षा का भगवाकरण रोकने के नाम पर बच्चों के मन में एक विकृत सेकुलरिज़्म थोपते जा रहे हैं। भारत, भारतीय संस्कृति आदि से इन सेकुलर लोगों को कोफ़्त महसूस होती है। भारत के प्राचीन इतिहास को किस तरह या तो बदनाम किया जाये या फ़िर तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाये इसी कोशिश में ये लोग सतत लगे रहते हैं… सेकुलरिज़्म के मसीहा अर्जुनसिंह का मंत्रिकाल हो या JNU के किसी प्रोफ़ेसर का लिखा हुआ पाठ्यक्रम हो, अथवा किसी वामपंथी द्वारा ICHR में चमचागिरी से घुसपैठ करके लिखा गया खास सेकुलर इतिहास हो, इस सारी मानसिकता की एक झलक हमें NCERT की पुस्तकों में देखने मिल जाती है… इस लेख के आगे के हिस्सों में हम भारत में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों के बारे में भी जानेंगे, लेकिन पहले हमारे “छोटे भाई”(?) के घर क्या पढ़ाया जा रहा है, यह देख लेते हैं…

यह एक स्वाभाविक सी बात है कि बच्चा एक कच्ची मिट्टी के घड़े के समान होता है उसे जिस प्रकार ढाला जाये ढल जायेगा और एक विशेष आयु के बाद उसका दिमाग इतना “कण्डीशण्ड” हो चुका होता है कि उसे बदलना बेहद मुश्किल होता है। कच्चे दिमागों पर काबू पाने और उन्हें अपनी विचारधारा के मुताबिक मोड़ने में सबसे ज्यादा प्रभावशाली हथियार है “स्कूली पढ़ाई”, पाकिस्तान के प्रायमरी और मिडिल स्कूलों में सरकारी तौर पर क्या पढ़ाया जा रहा है और बच्चों का इतिहास बोध कितना सही है, इसके सर्वेक्षण हेतु पाकिस्तान के कुछ शिक्षाविदों की एक समिति बनाई गई थी, जिसने अपने अध्ययन में बेहद चौंकाने वाले खुलासे किये हैं और इस पाठ्यक्रम को तत्काल बदलने की सिफ़ारिश की है (हालांकि ऐसा कुछ होने की उम्मीद कम ही है)। Sustainable Development Policy Institute (SDPI) द्वारा इस समिति की एक रिपोर्ट प्रकाशित की गई है, जिसका नाम है “The Subtle Subversion : The State of Curricula and Textbook in Pakistan” जिसके सम्पादक हैं एएच नैयर और अहमद सलीम (कुल पृष्ठ 154)। (यहाँ देखें)

SDPI द्वारा जो अध्ययन किया गया था वह पाकिस्तान के सरकारी स्कूलों में पढ़ाये जा रहे पाठ्यक्रम के बारे में है, उसी पाकिस्तान सरकार के बारे में जिसके “प्रेम और विश्वास” में गाँधी-नेहरु और समूची कांग्रेस 60 साल से डूबे हैं। जब सरकार के स्तर पर यह हालात हैं तो “जमात-उद-दावा” द्वारा संचालित और आर्थिक मदद से चलने वाले मदरसों में क्या पढ़ाया जाता होगा इसकी एक हल्की सी झलक लेख के पहले पैराग्राफ़ में आप पढ़ चुके हैं।

भारत की खुफ़िया एजेंसी आईबी द्वारा भी विभिन्न सीमावर्ती मदरसों से जब्त पुस्तकों और कश्मीरी आतंकवादियों से पूछताछ के दौरान पता चला है कि कच्चे दिमागों को “हरे रंग” में रंगने के लिये पाकिस्तान के मदरसों में अनवर-अल-अवलाकी द्वारा लिखित पुस्तक “जेहाद का समर्थन करने के 44 तरीके…” पढ़ाई जाती है। (यहाँ देखें) पाकिस्तान के मदरसों में पढ़ाई जाने वाली कक्षा 11 की पुस्तक में “संस्कृति” अध्याय की शुरुआत ही “भारत के साथ युद्ध” से की जाती है। लगभग हरेक पुस्तक में भारत को एक दुश्मन के रूप में चित्रित किया गया है तथा “जेहाद” और “शहादत” को जबरदस्त तरीके से महिमामण्डित किया गया है। इसी प्रकार खास तरह की अंग्रेजी भी पढ़ाई जा रही है, जिसमें B से बन्दूक, K से नाइफ़ (चाकू), R से रॉकेट, T से टैंक और S से सोर्ड (तलवार) के उदाहरण दिये गये हैं… दूसरी तरफ़ “सेकुलरों के देश” भारत में “ग” से गणेश की बजाय “ग” से गधा पढ़ाया जा रहा है।

तात्पर्य यह कि मदरसों में हिंसा को महिमामंडित किया जा रहा है। इतिहास और सामाजिक अध्ययन की पुस्तकें पाकिस्तान में बाजार में नहीं मिलती हैं इन्हें जमात-उद-दावा द्वारा सीधे मदरसों में पहुँचाया जाता है, जिसमें बताया गया है कि किस तरह मुस्लिम पीरों और फ़कीरों ने जाहिल और मूर्ख हिन्दुओं को उनके अन्धविश्वासों और अन्य गलत कामों से मुक्ति दिलवाई। एक अध्याय मुहम्मद अली जिन्ना पर भी है जिसमें उन्हें मुसलमानों का उद्धारक बताया गया है और कहा गया है कि भारत की “हिन्दू कांग्रेस पार्टी” मुसलमानों को गुलाम बनाना चाहती थी लेकिन जिन्ना ने जिद करके हमें गुलाम बनने से बचा लिया। इन मदरसों से निकले “प्रतिभाशाली”(?) छात्रों को लश्कर-ए-तोयबा में शामिल कर लिया जाता है, जहाँ पहले साल उनका नाम “व्हाईट फ़ॉल्कन” होता है, और 10-12 वर्ष की आयु से उनकी “जेहाद” की ट्रेनिंग शुरु हो जाती है। एक रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान में लगभग 6000 गैर-सरकारी मदरसे हैं जिनमें अधिकतर में सिर्फ़ और सिर्फ़ नफ़रत का पाठ पढ़ाया जाता है। पाकिस्तान में मदरसों में लगभग 5 लाख छात्र पढ़ते हैं जिसमें से 16000 अफ़गानी बच्चे हैं और लगभग 18000 अन्य इस्लामी देशों के। लश्कर-ए-तैयबा अमूमन गरीब घरों के बच्चों को चुन लेता है और उनके परिवारों को हर महीने एक निश्चित रकम भेजी जाती है, सो परिवार वालों को भी कोई आपत्ति नहीं होती।

यह तो हुई गैर-सरकारी मदरसों में पढ़ाये जाने वाले लश्कर और जमात के पाठ्यक्रम के बारे में, लेकिन खुद पाकिस्तान सरकार भी आधिकारिक रूप से क्या पढ़ा रही है यह हम देखेंगे लेखमाला के अगले भाग में…
(भाग-2 में जारी…)

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15 comments:

अनिल कान्त : said...

इन सब के बारे में न ही तो ज्यादातर भारतवासियों को पता है न ही जनता के नेताओं को .......... मेरी आँखें तो फटी की फटी रह गयी ये सब पढ़कर

चन्दन चौहान said...

पाकिस्तान कसम खा रखा है हिन्दुस्तान को बरर्बाद करने का ये बातें हम हिन्दुस्तानी भुल जाते हैं लेकिन पाकिस्तानी ये बातें नही भुलते हैं हिन्दुस्तानी नेता को मुस्लमानों के तलवा चाटने में मजा आता है चाहे वे हिन्दुस्तान के हों या पाकिस्तान के।

पंगेबाज said...

यहा के मदरसो का तो पता नही पर जे एन यू मे भी शायद इसी प्रकार की पढाई होती लगती है .

Mired Mirage said...

इतनी घृणा के बिना कोई कैसे स्वयं को व संसार को उड़ाने को तैयार होगा? यह घृणा जन्मजात तो हो नहीं सकती तो स्वाभाविक है सिखाई जाती है।
घुघूती बासूती

P.N. Subramanian said...

अमरीका ने तो पूरी दुनिया का ठेका ले रखा है. क्या उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि इस्लाम (जो पढाई जा रही है) के कारण पूरी दुनिया खतरे में है.

संजय बेंगाणी said...

पता था की पाकिस्तान में क्या पढ़ाया जा रहा है, ऐसी शिक्षा भारत में भी जारी है. और जे एन यू का तो कहना ही क्या?

जारी रखें. हर बार की तरह अच्छी श्रृंखला....

निशाचर said...

ये तथाकथित नेता, सामाजिक / मानवाधिकार कार्यकर्ता, छद्म सेकुलरिस्ट जमात - सभी पाकिस्तान के एजेंट के रूप में कार्य कर रहे हैं. ISI अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अफीम, नशीले पदार्थों के उत्तपादन, अवैध हथियारों की बिक्री, हवाला, नकली नोटों आदि के कारोबार से करोडो डालर की कमाई करती है. जब वह आतंकवादियों को हजारों- लाखों रुपये दे सकती है तो क्या इन "कार्यकर्ताओं" को नहीं दे सकती?
वही दूसरी ओर संसद हमले के दौरान अपनी जान पर खेलकर इन नेताओं की जान बचाने वाले देशभक्तों के साथ इन्होने क्या सुलूक किया है वह सारी दुनिया जानती है.

इसलिए हाल के मुंबई हमलों के बाद किसी की ये टिप्पणी बड़ी मौजूं है कि - " देश को 'बोट' से आये लोगों से ज्यादा खतरा 'वोट' से आये लोगों से है."

अन्तर सोहिल said...

एक सर्वेक्षण भारत के मदरसों का भी होना चाहिये
कोई शक नही कि यहां भी कुछ मदरसों में इसी तरह का पाठ्यक्रम पढाया जाता हो

रंजना said...

बहुत सही कहा आपने....

'ग' से हमारे यहाँ 'गणेश' न पढ़ा 'गधा' जरूर पढाया जाता है,पर हम गधे ही अच्छे हैं. "ग से गन" पढाकर वो भूल जाते हैं कि "ग से गायब " भी होता है. गधा जीवन और मेहनत का प्रतीक है,गन विध्वंस के सिवा कुछ नहीं देता. वे भस्मासुर तैयार कर रहे हैं,खतरा हमें जरूर है,पर अंततः विनाश भी उन्हीको झेलना है.बबूल बो रहे हैं,काटेंगे भी कांटे ही.जरूरत से ज्यादा नुकीले बनेंगे तो झाड़ झंकार की तरह उखाड़ फेंके जायेंगे..यह निश्चित है.
गधा पढ़ लेने से हम या बाकी दुनिया गधे हो नहीं जायेंगे...समय पर लतियाना भी आता है हमें.

उन्होंने अपनी संस्कृति की आधारशिला भले नफरत पर रखी हो,हमारी संस्कृति का मूल ही प्रेम और भाईचारा है.हमारे नियंता यदि हमें 'ग से गधा' पढायेंगे भी तो हम गधे होंगे नहीं......पक्का है.

गर्दूं-गाफिल said...

उन्होंने अपनी संस्कृति की आधारशिला भले नफरत पर रखी हो,हमारी संस्कृति का मूल ही प्रेम और भाईचारा है.हमारे नियंता यदि हमें 'ग से गधा' पढायेंगे भी तो हम गधे होंगे नहीं......पक्का है.

सुरेश भाई ,

रंजना जी की टिप्पणी उद्ध्रत कर रहा हूँ .यह टिप्पणी सत्य दर्शन है .किंतु एक देश के रूप में हम निहायत लाचार दिखाई देते हैं .देश जिन्हें चुनता है अपने संरक्छक सरपरस्त के रूप में .वे निरंकुश क्यों हो जाते हैं ?

भ्रष्ट होने के लिए धन को आमजनता द्वारा दिया जाने वाला सन्मान उत्तरदायीप्रेरणा नही है क्या ?

जैसे रंजना जी को लगता है सब आप ही ठीक हो जाएगा .तो फिर आपकी बुनावट ऐसी क्यों है कि सब ठीक कर देने की इक्छा मचलती रहती है.ऐसे में हम क्या कर सकते हैं ?कैसे जाग्रति आएगी ?राष्ट्र प्रेम के साथ रोटी और सन्मान की चिंता कैसे हो पायेगी ?आमजनता ऐसे ही सोचती है ।

आप क्या सोचते है ?

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी पता तो मुझे भी बहुत पहले ही है इस बात का, ओर मुझे बताने वाले पाकिस्तानी खुद थे, जो बाद मै हमारे दोस्त बन गये, लेकिन एक सीमा तक फ़िर भी दुरी बनाये रखे,
कई बार इन लोगो की मदद की तो उन्होने ने बताया कि उन्हे यकीन नही होता कि हिदुस्तानी इतने अच्छे होते है, ओर बातो बातो मे बताया कि पाकिस्तान के स्कुलो ओर मदर्सो मे तो यही पढाया जाता है, जो आप ने अपने इस लेख मै लिखा, लेकिन इन बातो को अगर मै अपने किसी लेख पर लिखता तो....पाकिस्तान के लोगो के दिल मै जिस तरह से भारत के बारे वहां पढाया जाता है उस से तो यही लगता है कि पाकिस्तान कभी भी दोस्त तो क्या हमारी दुशमनी के भी काबिल नही...बस इसे एक दम से भुल जाओ, ओर इजराल की तरह से जबाब दो
आप का धन्यवाद

वरुण जायसवाल said...

अरे सुरेश भाई , अब वो दिन दूर नहीं जब
अ से अफजल
क से कसाब या कांग्रेस एवं काफिर ( सेकुलरों की भाषा में चिपलूनकर जैसे लोग )
स से सेकुलर
इ से इटली ( महारानी सोनिया जी का मायका )
म से मुसलमान और मुलायम
उ से उलेमा
फ से फतवा
त से तालिबान ( अर्थात सेकुलरों के जात भाई )
ज से जेहाद और जन्नत ( जहाँ असीमित बिरयानी मिलती है ...और भी बहुत कुछ )

इत्यादि शब्द पाठ्य - क्रम में अनिवार्य कर दिए जायेंगे |

आखिर केंद्र में फिर से सेकुलर सरकार बनने जा रही है ||
धन्यवाद ||

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

ऐसी शिक्षा सरहद के इस पार हमारी नाक के नीचे भी दी जा रही है। नेपाल सीमा से सटे मदरसों में, सेकुलर पार्टियों के पैरोकार मौलवियों द्वारा यहीं पर हिन्दुस्तानियों (हिन्दुओं) को दुश्मन बताने वाले और हिन्दुओं को काफ़िर समझाने वाले पाठ तैयार किये जा रहे हैं। बाहर के दुश्मन से तो हम लड़ लेंगे लेकिन भीतर के देशद्रोहियों से कैसे निपटें?

sareetha said...

सरह्द पार के लोगोंको कोसने से क्या होगा ? हमारे अपने देश में सरकार बच्चों को क्या शिक्षा दे रही है,इस पर भी गौर फ़रमाएँ । देश के भीतर के हालात भी कोई बहुत अच्छे नहीं हैं । वामपंथियों और सेक्यूलर शिक्षाविदों द्वारा तैयार पाठयक्रम देश पर गौरव करना नहीं सिखाता । एक तरह की हीन भावना पैदा करता है ।

ePandit said...

ऍन॰ सी॰ ई॰ आर॰ टी॰ की किताबों में भी "सेकुलरिज्म" ही पढ़ायी जाती है। मैं गणित पढ़ाता हूँ, 90% सवालों में पात्रों के नाम जैकब, अमीना, डेविड टाइप होते हैं।