सड़क किनारे मिलने वाले नीबू पानी में शवगृहों का बर्फ़???

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प्रतिवर्ष गर्मी नये-नये रिकॉर्ड बना रही है, ऐसे में आम आदमी को गला तर करने के लिये सड़क किनारे मिलने वाले बर्फ़ के गोले और नींबू पानी पर निर्भर होना होता है, क्योंकि गरीब आदमी महंगे-महंगे बहुराष्ट्रीय शीतलपेय नहीं खरीद सकता।
सड़क किनारे मिलने वाले खाद्य और पेय पदार्थों में अक्सर मिलावट और हल्की सामग्री मिलाने के समाचार तो आते ही रहते हैं। गंदगी और अशुद्धता के बारे में भी खबरें प्रकाशित होती रहती हैं, लेकिन हाल ही में एक चौंकाने वाली खबर आई है कि सड़क किनारे मिलने वाले ठण्डे नींबू पानी में शवगृहों के शव के नीचे रखे बर्फ़ का पानी मिलाया जा रहा है। इसका खुलासा उस समय हुआ जब मुम्बई के विभिन्न शवगृहों के बाहर बर्फ़ खरीदने वाले व्यापारियों का जमघट देखा गया। असल में शव को सड़ने से बचाने के लिये उसे बर्फ़ की सिल्लियों पर रखा जाता है, जब यह बर्फ़ की सिल्ली पिघलते-पिघलते आधी से भी कम हो जाती है तब अस्पतालों और सरकारी शवगृहों के कर्मचारियों की मिलीभगत से उसे बाहर आधे से भी कम दामों पर बेच दिया जाता है। सड़क किनारे ठण्डा नींबू पानी, बर्फ़ के गोले, मछली, मटन ठंडा रखने और फ़्रेश जूस(?) आदि बेचने वाले, इस शव रखे हुए बर्फ़ को खरीद लेते हैं, ताकि मुनाफ़ा बढ़े, क्योंकि बर्फ़ फ़ैक्टरियों से उन्हें बर्फ़ महंगे दामों पर मिलता है। जबकि बर्फ़ फ़ैक्टरी वाले भी बर्फ़ बनाने के लिये शुद्ध पानी का उपयोग न करते हुए, गाय-भैंस को पानी पिलाने वाले भरे-भराये हौद तथा प्रदूषित पोखरों-तालाबों से लाये गये पानी का उपयोग ही बर्फ़ बनाने के लिये करते हैं, लेकिन फ़िर भी शवगृहों से बर्फ़ खरीदने की खबर चिंतित करने वाली है। पैसा देकर भी ठीक-ठाक वस्तु न मिले तो आखिर गरीब आदमी कहाँ जाये?
और सिर्फ़ गरीबों की ही बात क्या करें, मिठाई पर लगने वाले चांदी के वर्क बनाने के लिये उसे भैंस के लीवर में रखकर कूटा जाता है ताकि उसे बेहद पतला से पतला किया जा सके…। रोज़ भगवान के सामने जलाई जाने वाली अगरबत्ती में लगने वाले बाँस की काड़ी में भी, शव जलाने से पहले फ़ेंके जाने वाले अर्थी के बाँस का उपयोग हो रहा है, क्योंकि प्रत्येक शव के साथ दो बाँस मुफ़्त में मिल जाते हैं…
इस खबर को स्थानीय छोटे व्यापारियों का विरोध और बहुराष्ट्रीय कम्पनियों का समर्थन न समझा जाये, क्योंकि बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ भले ही साफ़-सफ़ाई रखें, चमक-दमक से मोहित करें, लेकिन पीछे से आपकी और देश की जेब काटने में लगी हैं, इसलिये वे तो और भी खतरनाक हैं… बताओ कहाँ-कहाँ और कैसे बचोगे इस देश में…
(नोट - किसी वरिष्ठ ब्लॉगर ने कहा है कि स्वाद बदलने के लिये ऐसी माइक्रो-पोस्ट लिखते रहना चाहिये)
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38 comments:
जो गरी { कच्चा कटा नारिया } दिल्ली मे सडको के किनारे बिकती हैं वो भी निगम बोध घाट से आती है
बहुत शर्म की बात है ये तो प्रशासन को गंभीरता से देखना चाहिए कि इतना गंदा पानी न पीना पड़े जिसमें शवाग्रहों की बर्फ मिली हो। सुरेश भाई आपने एक गंभीर मुद्दा उठाया है प्रशासन की इस पर नज़र पड़नी चाहिए और इस पर सख्त कार्र्वाई अमल में लाई जानी चाहिए।
अब यही बाकी था सुनना । क्या क्या हो जाये वही कम है । आश्चर्य की बात की फायदे के लिए ये काम तक शुरू हो चुका है । खोज खबर बढ़िया
सचमुच चिंता का विषय है.
और सुनो जो लस्सी पाँच या दस रूपय गिलास हमें सडक के किनारे मिलती है उसमें टिश्यु पेपर मिलाया जाता है जिससे मोटी मलाई जमती है.
हम कचड़ा पी रहे होते है
सचमुच यह खबर अत्यंत डरावनी है। जब खाने पीने की चीज़ों से ही भरोसा उठ जाएगा तो आगे दुनिया कैसे चलेगी?
- आनंद
जैसा की रचना ने कहा है दिल्ली में मिलने वाली गरी के लिए वो तो हमने भी सुना है । पर अब ये ।
सच मे डरावनी खबर है।
सुरेश,
अफसोस की बात यह है कि यह काम तो पिछले 30-40 साल से होता आ रहा है. फरक इतना है कि आज यह मुम्बई में होता है तो कल दिल्ली में और परसों किसी छोटे शहर में.
1970 के आसपास ग्वालियर में (मैं महाविद्यालयीन विद्यार्थी था) लोगों को कडी हिदायत दी जाती थी कि पानी के ठेलों से पानी ना पियें. कारण यही था.
लिखते रहो! माईक्रो हो या मेक्सी, लिखने से बदलाव जरूर आता है.
सस्नेह -- शास्त्री
बहुत सही लिखा है। लेकिन ऐसा नहीं है कि सब ऐसा ही करते हों। हाँ वैसे भी बर्फ की वस्तुएँ नहीं खाना चाहिए।
आप को विभिन्न विषयों पर लिखना ही चाहिए।
पढ़ कर ही अजीब सा लग रहा है.
जो गलत है देशी या विदेशी उसका विरोध होना चाहिए. जो सही है चाहे वह विदेशी हो उसकी प्रसंशा करनी चाहिए.
हम हजार सभ्यता ढोल पीट लें, घी से लेकर तमाम चीजों में मिलावट करते है. अपने स्वार्थ के लिए किसी भी हद तक जा सकते है. मूर्दे का कफन भी नहीं छोड़ते...
बढिया जानकारी. बताने के लिए धन्यवाद.
ऐसी "फोर अ चेंज" अलग पोस्ट भी लिखते रहे
Maine to ye bhi suna hain ki bhutte bhi chita ke liye istemaal honewale koyele se paka kar beche jate hain.
Manorma
manorma74@yahoo.co.in
अब आगे से इस बात का ध्यान रखना पड़ेगा ....सरकार का तो पता नहीं वो क्या करेगी
अभी कुछ दिन पहले ही हमने सडक किनारे ठेले से नींबू पानी पिया था......अब जाकर पता चला कि उसका स्वाद कुछ बदला बदला सा क्य़ूं था...))
ऐसे लघु पाठ ही इस अंतर्जाल पर बहुत प्रभावी होंगे। यह छोटी पर महत्वपूर्ण जानकारी है।
दीपक भारतदीप
होश उड़ गये ये खबर और टिप्पणी में और भी इस तरह की बातें पढ़कर क्या होगा मानव स्वास्थ्य का चिंताजनक बात है...
नारियल की गरी -निगमबोध घाट (दिल्ली का शमशान) के चिता पूजन वाले नारियल से!
भुट्टे भूनने का कोयला -चिता के कोयले से!!
नींबू पानी की बर्फ -शवगृह की!!!
ये सब लागत नियंत्रण के उदाहरण हैं क्या?
खानपान की घरेलू परम्परायों को भूल कर, बाज़ारवाद के आक्रमण, सस्ते के चक्कर में ऐसी ही कितनी वस्तुयों का उपभोग, समाज कर रहा है।
इस लागत नियंत्रण के खेल पर कौन नियंत्रण करेगा?
सुरेश जी, सच तो यह है कि आज जो कुछ भी हम खाते या पीते हैं, चाहे हम उसे सस्ता खरीदे या मंहगा अंततः हमें मिलावटी और अधिकांशतः कम या ज्यादा मात्रा में जहरीली वस्तु ही खाने को मिलती है.अनाज हो या मसाले, दूध हो या दुग्ध उत्पाद यहाँ तक कि हवा और पानी भी शुद्ध नहीं है. आप सोचिये कि किस काम का होगा ऐसा पैसा जो आपको स्वस्थ जीवन न दे सके. इसलिए जरूरी है कि हम जागरूक बनें और आवाज उठायें ऐसी वस्तुओं के खिलाफ और ऐसे मुनाफाखोरों के खिलाफ जो आपको पूरे पैसे देने के बावजूद जहर खिला - पिला रहें हैं.
गंभीर मसला है.
आ. सुरेश जी
खोज खबर के लिये धन्यवाद
आलू की टिक्की ( ढेले पर चाट वाली ) को बनाने की विधि देखिये तो चाट खाना छोड़ देंगे ।
वरुण गान्धी ने ऐसा क्या कह दिया यह अखबार वाले असली खबर तो लिखते नहीं कि विवादित ( आपत्तिजनक ) क्या कहा है ।
आप अपनी राय व्यक्त करें ।
शीर्षक पढ़ते ही मन लिजलिजा गया.....और लेख पढ़ा तो उबकाइयां आने लगी.....
क्या किया जाय...क्या करें हम...एक तरफ कुँआ है,दूसरी ओर पहाड़....
जागरूक करने वाले इस महत आलेख हेतु बहुत बहुत आभार..
सही कहा ... कहां कहां और कैसे कैसे बचोगे इस देश में ... व्यवसाय करने वाले पैसे को छोडकर और किसी चीज को देखते ही नहीं है।
दुखद है लेकिन सच है .बनारस में घाट पर घुमते हुए माझी ने बताया यहाँ की लकडी आइसक्रीम की फेक्ट्री में जाती है .उसकी डंडी बनाने के लिए ..
क्या कहूं?
उफ।
औद्योगिकीकरण का आखिरी पड़ाव हैं। यहां से आगे नरक ही होगा।
वापस गांवों की ओर लौटना पड़ेगा वरना बर्फ दिखाई तो देती है एक अरब की आबादी के लिए उगाए गए धान को बचाने के लिए पौधों पर छिड़का गया पेस्टिसाइड दिखाई भी नहीं देता। कैंसर के मरीज बढ़ते जा रहे हैं। ये उन्हीं क्षेत्रों में अधिक दिखाई देते हैं जहां पेसिटसाइड का अधिक इस्तेमाल हो रहा है।
यह् बात आज की नहीं दशकों का यथार्थ है....कि मुर्दों को लिटाया जाना वाला बर्फ ठंडा पानी स्टॉल और नींबू पानी वाले सस्ते और फ्री में ले आते हैं. आइस क्रीम की डंडी भी अरसों से उस लकड़ी से बन रही है और फिर वर्क से डालडा तक में संशय की स्थिति रही है...फिर भी जनसंख्या बढ़ती गई, लोग जिन्दा रहे. टंटा हुआ तब जब बेसिक सुविधायें जुट गई.रोटी, कपड़े और मकान की समस्या निपट गई तब हमें स्टॆशन के बम्बे के पानी ने नुकसान पहुँचाना शुरु किया और हम बिसलरी पर उतर आये और ब पता चलता है कि पाईरेसी के बाद वो भी उसी बम्बे का है.
हेल्थ इश्यू तब ही उठते हैं वैसे जब बेसिक्स पूरे हो जायें मगर तब तक तो हम इम्यून हो चुके होते हैं और आम आबादी की लाइफ स्पान बढ़ी ही है इस बीच...कहीं इसी वजह से तो नहीं.
एक वैज्ञानिक शोध की दरकार है भाई!!मात्र सनसनीखेज खुलासे जैसी खबर की नहीं.
अन्यथा न लेना सुरेश बाबू!!
बेहद अफसोसजनक मामला है .
फ़ानी में मिलके फ़ानी , अंजाम ये के फ़ानी- माटी ही ओढन माटी बिछावन, माटी का तन बन जाएगा!!!!! उसी का तो यह रिहर्सल कराते हैं ये लोग!!!!
सुरेश भाऊ आप तो अपनी राष्ट्र तोड़क वाली ईमेज तोड़ने पर उतर आये है लगता है, अच्छा लगा आपकी अलग पोस्ट पढ कर।
कल चाँदी की वरक के बारे में पढ़कर मन दुखी हुआ, आज यह खबर पढ़कर। क्या फिर से घर के बाहर कुछ ना खाने वाले पुराने संस्कारों को पुनः जागृत करना होगा? शायद इसीलिए हमारे पुरखे अपने हाथ का बना ही खाते थे।
घुघूती बासूती
इसे ही कहते हैं सिटीजन जर्नलिज्म बॉस, भले ही एक स्थानीय अखबार मे यह खबर छप चुकी है लेकिन
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे को उठा कर आप बधाई के पात्र हैं।
आप की यह पोस्ट पढ कर दिल आजीब सा हो गया, वेसे हमे तो सालो साल हो गये यह सब खाये पीये, अभी खाते है कभी कभार लेकिन घर का बना हुआ ही, ओर हमारे यहां मिलावट करने वाले को बहुत ही कडी सजा दि जाती है, कई बार तो अजीवन केद भी.
यह जो मुनाफाखोर पेसो के लालच मै इतनी मिलावट करते है, क्या इन के बच्चे नही यह सब खाते होगे...सच मै हम कितना गिर गये है कि अपनी जेब भरने के लिये.....कितनी जिन्दगियो से खेल रहे है.... राम राम
इसी प्रकार की अन्य जानकारी के लिये देखें।
Please read this carefully! on
http://anilpendsertm.blogspot.com
padhke hi mann bhanbhana gaya,uff
जब तक भ्रष्टाचारी नेता और अधिकारी रहेंगे सब ऐसे ही चलेगा.
अघोर पाप हो रहा है ।
इसलिए ही पुराने जमाने में लोग घर का ही खाते थे. और स्वाद पर नियन्त्रण जरूरी है अन्यथा ऐसे ही जायके के चक्कर में पता नहीं क्या क्या खाते रहेगें.
दूसरे यह कि संख्या(जनसंख्या)बढने पर गुणवत्ता तो कम होगी ही.
आज के समय में इन्टरनेट का यही तो फायदा है. कि ऐसी बाते सुनने को मिल जाती है.
आशा ऐसे ही जागरूकता जारी रखेगें.
padh kar hairaan hoon ..aaj desh mein kya kya ho raha hai ..itnee neechtaa mein log lage hue hain..ab bhee kahin se koi pratikriyaa nahin..lagtaa hai ab insaanee samaaj hee gal sad gaya hai
had hai ..patitpan kee paraakaastha hai
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