Tuesday, March 3, 2009

कानून और हिन्दू महिलाओं का मखौल उड़ाता “चाँद-फ़िज़ा” प्रकरण : “सेकुलरिस्ट” और नारी विमर्श की सबलायें कहाँ हैं?

Chand-Fiza Muslim Conversion Hindu Women Concern

गत कुछ समय से हमारे “जागरूक” और “सबसे तेज” चैनलों और अखबारों पर एक मुद्दा चटखारे ले-लेकर परोसा जा रहा है, वह है चन्द्रमोहन-अनुराधा उर्फ़ चाँद-फ़िज़ा का मुहब्बत(?) प्रकरण। टीवी वालों से तो खैर किसी स्वस्थ और गम्भीर बहस की उम्मीद रह नहीं गई है (क्योंकि उनके लिये यह एक “धंधा” है, और जब तय हुआ है कि “धंधा” करेंगे तो फ़िर कोई भी मुद्दा, खासकर जो हिन्दुओं के खिलाफ़ हो, उनका मजाक उड़ाता हो, उस पर सिर्फ़ हल्ला-गुल्ला किया जायेगा, कोई गम्भीर बात नहीं होगी), टीवी चैनल इन दो “अधेड़ों” की छिछोरी हरकत को लैला-मजनू या ससी-पुन्नू जैसी अमरप्रेम कथा बनाने पर तुले हैं तथा व्यक्तिगत एसएमएस, प्रेमपत्रों आदि का घृणित और भौण्डा प्रदर्शन लगातार जारी है (पब भरने वाली रेणुका चौधरी शायद किसी एसी कमरे में आराम कर रही होंगी)। इस हंगामे में अखबारों से कुछ उम्मीद बाकी थी, उन्होंने भी इस प्रकरण में शामिल कुछ मूलभूत सवालों पर कुछ कहना भी मुनासिब नहीं समझा।

जैसा कि सभी जानते हैं भारत में दो-चार अलग-अलग कानून चलते हैं, हिन्दुओं के लिये अलग, मुस्लिमों और अन्य कई धर्मों के लिये अपने-अपने पर्सनल कानून, जहाँ भारत सरकार उनके सामने मेमना बनने में देर नहीं लगाती। मुस्लिमों के पर्सनल कानून उन्हें मुबारक हों, लेकिन जब हिन्दुओं के “एक-पत्नी” कानून को, मुस्लिम शरीयत के जरिये “सिर्फ़ अपनी यौनेच्छा के लिये” तोड़ा जाये और उस पर देश में कोई भी जिम्मेदार व्यक्ति सवाल न उठाये यह आश्चर्यजनक लगता है, हालांकि भारत में इस प्रकार के अजूबे सतत होते ही रहते हैं चाहे कश्मीर का मामला हो या शाहबानो का… “सेकुलरिस्टों” का दोगलापन यदा-कदा नंगा होता ही रहता है। परन्तु यहाँ पर चन्द्रमोहन-अनुराधा मामला सिर्फ़ “सेकुलरों” तक ही सीमित नहीं है, यहाँ एक महिला का पक्ष भी है जो चन्द्रमोहन की पहली शादीशुदा हिन्दू पत्नी है।

जब एक हिन्दू स्त्री विवाह करती है तो वह यह बात जानती है कि कानून के मुताबिक उसका पति उसकी सहमति के बिना न तो उससे आसानी से तलाक ले सकेगा न ही दूसरी शादी कर सकेगा, ऐसे में एक पति के एकतरफ़ा मुस्लिम बन जाने से उस हिन्दू औरत का कानूनी अधिकार कैसे खत्म हो गया? जब विवाह दो पक्षों के बीच हुआ एक समझौता है तो फ़िर कोई एक (पति या पत्नी) अकेले अपनी तरफ़ से एकतरफ़ा निर्णय कैसे ले सकता है? यदि किसी “छैला बाबू” पति को दो-चार औरतें पसन्द आ जायें तो क्या वह धर्म परिवर्तन करके चारों से शादी कर सकता है? फ़िर ऐसे हिन्दू विवाह कानून किस काम के? और “धर्मनिरपेक्ष”(?) सरकार क्या कर रही है? तथा उस पहली हिन्दू पत्नी का क्या? उसके पक्ष में किसी नारी संगठन या महिला मंत्री को बोलते नहीं सुना?

एक हिन्दू पति द्वारा तलाक लेने के लिये अदालत के चक्कर काटते-काटते जूते घिस जाते हैं, लाखों रुपये खर्च हो जाते हैं और समय लगता है वह अलग। ऐसे में जब भारत सरकार ही उसकी “मदद”(?) के लिये हाथ बढ़ाकर खड़ी है तो बेहद आसान रास्ता है “धर्म परिवर्तन”, बस चट से मुसलमान बन जाओ और पट से चार-चार के साथ मजे करो, हिन्दू पत्नी जाये भाड़ में… शायद ऐसा ही कुछ “एंटोनिया माइनो” सरकार चाहती है। हो सकता है कि कल को यह भी सुनने में आये कि कोई मुल्ला सरेआम कहे कि “जो भी हिन्दू व्यक्ति अपनी पत्नी से मुफ़्त में छुटकारा पाना चाहता है, आये और मुसलमान बन जाये…”। “धर्म परिवर्तन माफ़िया” के हाथ में “लम्पट हिन्दू पुरुष” नामक एक और हथियार आ गया है, बस उसके कान में मंत्र फ़ूँकना है कि “तू मुस्लिम बन जा, साथ में एक औरत को भी हिन्दू से मुस्लिम बना दे… सरकार, प्रशासन सब तेरे साथ होंगे… हिन्दू संगठन, नारी संगठन आदि सब बकवास हैं…”।

सरकार (सेकुलरों) का इस सारे झमेले में मुस्लिमपरस्त रुख साफ़ नज़र आ रहा है, वरना फ़िज़ा जो यहाँ-वहाँ सारे मीडिया में चिल्लाती फ़िर रही है कि “चाँद मोहम्मद ने उसकी इस्लामी धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाई है और अब चन्द्रमोहन वापस हिन्दू कैसे बन सकता है?…” यह सब किसकी शह पर? इसका एक मतलब यह भी निकलता है कि हिन्दू पुरुष बगैर यह चिन्ता किये कि हिन्दू भावनाओं को चोट पहुँचेगी, मुस्लिम बनकर मौज कर सकता है और वही पुरुष अपनी पहली पत्नी-बच्चों की याद आने पर दोबारा हिन्दू नहीं बन सकता। अर्थात धार्मिक भावनायें सिर्फ़ मुस्लिमों की आहत होती हैं? आखिर कौन है इसके पीछे? जाहिर है कि फ़िजा को इस देश के महान सेकुलरों(?) और सरकारी इस्लामिक ताकतों पर पूरा भरोसा है। पुलिस के उच्चाधिकारी लगातार बयान दे रहे हैं कि “चन्दा मामा” लन्दन में हैं, उधर से चन्दा मामा भी टीवी चैनलों (यानी दलालों के मार्फ़त) पर बयान दे रहे हैं कि वे अभी भी “पूरी तरह से मुस्लिम” हैं, इसका मतलब यह होता है कि यदि वे फ़िर से हिन्दू बने तो सरकार और प्रशासनिक मशीनरी उन्हें नहीं छोड़ेगी, यह भी जाँच का विषय हो सकता है कि कहीं फ़िज़ा के मुस्लिम माफ़िया से कोई अन्तर्सम्बन्ध तो नहीं हैं? एक पेंच यह भी है कि यदि चाँद मोहम्मद लन्दन में हैं तो उनके पासपोर्ट पर नाम कौन सा है चन्द्रमोहन या चाँद मोहम्मद? और यह बदलाव इतनी जल्दी कैसे कर लिया गया?

साफ़ दिखाई दे रहा है कि “धर्म-परिवर्तन” की ताकतें इस सारे खेल में एक मजबूत भूमिका बनाये हुए हैं। “शर्मनिरपेक्ष” सरकार खुल्लमखुल्ला एक विशेष धर्म के प्रति अपना झुकाव जाहिर कर रही है। शायद लोगों को अभी भी कोलकाता के रिज़वान-उल-हक का मामला याद होगा, जिसमें रिज़वान की हत्या हो गई थी, लगातार सन्देह व्यक्त किया जाता है कि रिज़वान की हत्या भी धर्मान्ध मुस्लिमों ने ही की थी क्योंकि अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक रिज़वान अपनी प्रेमिका की खातिर हिन्दू बनने को तैयार हो गया था, जबकि हत्या का आरोप लगा और केस चला उस प्रेमिका के परिजनों पर… देखा!!! कितना महान है हमारे भारत का सेकुलरिज़्म…

कई-कई सवाल अनछुए-अनकहे रह गये हैं, चैनलों और सेकुलरों(?) की बात जाने दीजिये, वे तो हैं ही शर्मनिरपेक्ष, लेकिन “गुलाबी चड्डी” पर हजारों पन्ने काले करने वाली प्रगतिशील महिलायें(?) उसका बीस प्रतिशत भी चन्द्रमोहन की परित्यक्ता हिन्दू औरत के पक्ष में लिखतीं तो कुछ संतोष होता, लेकिन अफ़सोस…

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22 comments:

Shiv Kumar Mishra said...

सारे सवाल जवाब मांगते हैं.

धर्म की आड़ में बहुत कुछ होता आया है. हो रहा है. आगे भी होता रहेगा. लेकिन धर्म को देखकर कारवाई और विमर्श भी हमारी संस्कृति का एक हिस्सा बन चुका है.

संजय बेंगाणी said...

मैं भी लिखना चाहता था, मगर सारा खेल "काम" व अर्थ के आस पास घुमता लगा. पहली पत्नी का बयान कहीं नहीं दिखा. पता नहीं कौन किसे मूर्ख बना रहा है. इस्लाम जरूर मूर्ख बना है जिसकी आड़ में गंदा खेल खेला जा रहा है. मुझे तो एक ही देश के दो दो कानून भी समझ में नहीं आते. तुष्टीकरण की भी सीमाएं पार हो चुकी है और मूर्ख हिन्दू हद दर्जे तक विभक्त है.

सौरभ शर्मा said...

aap ne bahut hi sahi prashan uthaya hai, kisis ne bhi chandr mohan ki pahli patni ke baare me kuch nahin socha ya bola......

Cyril Gupta said...

आपके लेख में कहीं बातों से सहमत... धर्म परिवर्तन आस्था का प्रश्न होना चाहिये, प्रलोभनों का नहीं.

अंशुमाली said...

वाजिब सवाल। सीधे प्रश्न। तेज लेख।

neeshoo said...

टी वी पर तो कुछ भी दिखाया जा रहा है कोई आचार संघिता नहीं कोई कानून नहीं । चांद और फिजा के मामले पर ज्यादा क्या कहा जाय । पर जो भी हो रहा है वह मेरे हिसाब से सही नहीं है । कानून में बदलाव से ही नहीं सोच बदलने की भी जरूरत है । क्यों कि ऐसी घटनाएं न हो तो कानून की जरूरत ही न होगी । आपका आलेख अच्छा लगा ।

पंगेबाज said...

आप क्या चाहते है कि हम सेकुलरता को छॊड दे ? सेकुलरता का मतलब क्या है ये क्या हमे आपको सम्झाना पडेगा सुरेश जी ? सेकुलरता का सीधा सीधा मतलब होता है हिंदुओ को गरियाना बाकी का उत्साह बढाना कि वोह इस देश से हिंदुओ का नामोनिशान कश्मीर के श्रीनगर की तरह मिटा दे

अभिषेक आनंद said...

हिंदुस्तान का पूरा तंत्र सेकुलर है, मतलब हिन्दुओं को गाली दो और लात जूते मारो.. हिन्दू खुद इतने बटे हुए है कि इनमे विरोध की ताकत ही नहीं है... सोंच बदल दिया गया है.. एक येसा राष्ट्र जहा तुष्टिकरण के लिए अलग अलग कानून बने हुए है, एक येसा राष्ट्र जहा एक राज्य को विशिष्ट बना दिया गया है, एक येसा राष्ट्र जहा रहने वालें नागरिक विरोधी राष्ट्र की जय जयकार करते है...
मुद्दा चाँद या फिजा का नहीं, मुद्दा साम्प्रदायिकता के नाम पर थोथी गलबाजी करने हिन्दू बहुल राष्ट्र में हिन्दुओं को गरिया कर और उनके ऊपर राज करने की मानसिकता की है और मुद्दा है कि हिन्दू इस कदर बेबस क्यूँ नजर आते है?????????????

ashwatthama said...

बहुत ही बढिया एवं स्तरीय लेख!

आपका लेख काफ़ी कुछ सोचने पर मजबूर करता है. इसी बात से याद आया कि फ़िल्म अभिनेता धर्मेंद्र ने भी हेमा मालिनी से शादी करने के लिये 'टेंपरेरी' तौर से इस्लाम स्वीकार के दिलावर ख़ान बनना ज़रूरी समझा.

http://www.milligazette.com/Archives/2004/16-30Jun04-Print-Edition/163006200433.htm

रंजना said...

सबकुछ कह दिया आपने......यही तो विडंबना है कि आपके (हमारे भी)ये सारे प्रश्न अनुत्तरित रह जायेंगे......कोई नहीं इनके उत्तर देने वाला.....क्योंकि जिनके पास इनके उत्तर हैं,वो किसी भी प्रकार बाध्य नहीं उत्तर देने को...

लवली कुमारी / Lovely kumari said...

आपसे सहमत हूँ ..यह कोई मतलब नही है की अगर आप स्वछंद यौनाचार चाहतें हैं तो धर्म परिवर्तन कीजिये..लानत है ऐसी धार्मिकता पर. मिडिया से किसी प्रकार के सहयोग की आशा बेईमानी है.लिखना चाहती थी इसपर, पर लिख नहीं पाई (संजय जी की टिप्पणी को पेस्ट कर लीजिये यहाँ )
किसी दिन लिखूंगी इसपर भी .पर याद रखिये यह कानून है और हम साधारण लोग कानून नहीं बदल सकते.

भारतीय नागरिक - Indian Citizen said...

शायद लोगों को अभी भी कोलकाता के रिज़वान-उल-हक का मामला याद होगा, जिसमें रिज़वान की हत्या हो गई थी, लगातार सन्देह व्यक्त किया जाता है कि रिज़वान की हत्या भी धर्मान्ध मुस्लिमों ने ही की थी क्योंकि अपुष्ट सूत्रों के मुताबिक रिज़वान अपनी प्रेमिका की खातिर हिन्दू बनने को तैयार हो गया था, जबकि हत्या का आरोप लगा और केस चला उस प्रेमिका के परिजनों पर…


yah mukhya mudda hai meri najar me, jo abhi tak kisi ne nahi uthaya, baaki phir wahi baat ki hindoo to vyopari hai, jo chahe kharid lo, jise chahe bech do

पंकज बेंगाणी said...

वे जो सबलाएँ हैं ना वे चिड्डियों का नया शेड ढूंढ रही है.. इस बार भगवा चड्डी खूब चलेगी. सोच रही होंगी किसे भेजें!!

Shastri said...

सशक्त आलेख!!

पंकज ने सही कहा है. सवाल यह है कि आजादी के नाम पर जिन लोगों ने चड्डी-कांड किया था वे लोग इस तरह के मामले में कैसे चुप्पी कर जाते हैं.

सस्नेह -- शास्त्री

हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है.
हर महीने कम से कम एक हिन्दी पुस्तक खरीदें !
मैं और आप नहीं तो क्या विदेशी लोग हिन्दी
लेखकों को प्रोत्साहन देंगे ??

http://www.Sarathi.info

Anil Pusadkar said...

सटीक सवाल जिसका जवाब सब जानते है मगर देना कोई नही चाहता।आपकी दमदारी को सलाम सारी प्रणाम्।

Mired Mirage said...

इस प्रश्न का उत्तर मैं भी खोज रही हूँ। शायद कानून में कोई कमी रह गई है। वैसे पति या पत्नी को, यदि वह ना चाहे, तो कोई भी बाँध कर नहीं रख सकता। परन्तु कुछ महीनों पहले ही एक पति को तलाक देने से सुप्रीम कोर्ट ने भी मना कर दिया। टूटे हुए विवाहों को भी ढोने को लोगों को बाध्य किया जाता है और वहीं जिन्हें धर्म परिवर्तन एक सरल उपाय लगता है उनके लिए यह उपाय भी है।
घुघूती बासूती

राज भाटिय़ा said...

जब तक हिन्दू जात पात पर लडते रहेगे, तब तक हम पिटते रहेगे,
आप ने बहुत ही सटीक लेख लिखा है, लेकिन जबाब ???
जब यह चन्दु मुस्लिम बना तो कोई नही चीखा, ओर अब.....पंकज जी ने सही कहा है, ओर यह गुलाबी चड्डी वाली कहां भाग गई??
धन्यवाद

सतीश चंद्र सत्यार्थी said...

"शर्मनिरपेक्ष"- अच्छा शब्द दिया है आपने धंधेबाज मीडिया और स्त्री अधिकारों के तथाकथित वकीलों के लिए. लानत है.
धर्मपरिवर्तन पर जो बातें आपने उठाई हैं वह बड़ी ही सवेदनशील हैं और उनपर गंभीर और सार्थक बहस की आवश्यकता है.

रचना said...

लेकिन “गुलाबी चड्डी” पर हजारों पन्ने काले करने वाली प्रगतिशील महिलायें(?) उसका बीस प्रतिशत भी चन्द्रमोहन की परित्यक्ता हिन्दू औरत के पक्ष में लिखतीं तो कुछ संतोष होता, लेकिन अफ़सोस…



बिलकुल इन्मान्दारी से कहिये गा आप कितनी महिला लेखिकाओ के ब्लोग्स को पढ़ते हैं और अगर पढ़ते हैं तो आपने इस लिंक
पति क्या कोई ट्राफी होता हैं की जैसा भी हैं शेल्फ पर सजा रहे ??

को क्यूँ नहीं देखा . सीधा फतवा दे दिया प्रगतिशील नारियों पर . आप जिस परकार से अपने हर मुद्दे को महिलाओ से जोड़ देते हैं लगता हैं आप महिला को ही हर सामजिक कुरीती और न्याय मे गलती के जिमेदार मानते हैं . चाँद फिजा प्रकरण मे पुरुष का का क्या रोल हैं इस पर ही एक धाँसू फासु ब्लॉग पोस्ट दे . कितना पतन हो रहा हैं पुरुषों की वजह से हिन्दू समाज का कभी उस पर नहीं लिखते सुरेश जी आप लिखे ताकि पुरुष को समझ आये की उसका पतन इतना हैं की प्रगतिशील नारी कितना भी लिखे कीचड़ मे पत्थर फकने जैसा हैं

swapandarshi said...

"चाँद फिजा प्रकरण मे पुरुष का का क्या रोल हैं इस पर ही एक धाँसू फासु ब्लॉग पोस्ट दे . कितना पतन हो रहा हैं पुरुषों की वजह से हिन्दू समाज का कभी उस पर नहीं लिखते सुरेश जी आप लिखे ताकि पुरुष को समझ आये की उसका पतन इतना हैं की प्रगतिशील नारी कितना भी लिखे कीचड़ मे पत्थर फकने जैसा हैं"

dschauhan said...

कुछ समय पूर्व की घटना है कि हैदराबाद में प्रसिद्ध लेखिका तस्लीमा नसरीन पर कातिलाना हमले में आंध्र प्रदेश के तीन मुस्लिम विधायकों ने खुलेआम यह घोषणा भी की कि अगली बार यदि तस्लीमा नसरीन हैदराबाद आईं तो जिंदा नहीं जाने दी जाएंगी। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर सुनियोजित आक्रमण तथा देश की संवैधानिक मर्यादा का मजाक उड़ाया गया!

इससे पहले इमराना, गुड़िया, हसीना, जरीना जैसी कई विवश स्त्रियों पर अत्याचार जैसी घटनाओं पर भी मुस्लिम मौलवियों की कुत्सित राजनीति का एक हिस्सा मात्र है! यह प्रकरण शुद्ध रुप से भारतीय संस्कृति पर हमला है इसके लिए ज़िम्मेदार चाँद और फ़िज़ा को भी दोशी माना जाना चाहिए और उनके विरुद्ध कार्य्वाही होनी चाहिए! सुरेश जी आपका लेख बहुत ही अच्छा और विचारोत्तेजक है! हमारी हार्दिक शुभकामनाएँ स्वीकारें!

Meenu khare said...

सुरेश जी आपका लेख बहुत ही अच्छा और विचारोत्तेजक है!जय हो।