Wednesday, February 4, 2009

नेताओं, अधिकारियों, कर्मचारियों ने उज्जैन वासियों को भीषण संकट में धकेला…

Water Supply Crisis Ujjain Gambhir Dam

क्या आपने कभी कल्पना की है कि 6-7 लाख की आबादी वाले देश के एक महत्वपूर्ण धार्मिक शहर में यदि नलों से पानी ही न आये तो क्या तस्वीर बनेगी? जी हाँ… भगवान महाकालेश्वर की नगरी में यह एक हकीकत बनने जा रही है, यदि नगर निगम के अधिकारियों की मानें तो दिनांक 15 फ़रवरी के बाद शहर को नलों से पानी नहीं दिया जा सकेगा और पार्षदों और नेताओं की मानें तो अधिक से अधिक 15 मार्च के बाद नलों की पाइप लाइन सूख जायेगी। अर्थात, मार्च-अप्रैल-मई-जून-जुलाई के पाँच महीने उज्जैन की जनता को उनके हाल पर छोड़ दिया गया है, लगभग “अब तुम जानो और तुम्हारा काम जाने… हम तो पानी नहीं दे सकते… जो बन पड़े सो कर लो…” वाले अंदाज़ में…

इस वर्ष समूचे मध्यप्रदेश मे ही सामान्य से कम वर्षा हुई है, कहीं-कहीं तो बहुत ही कम बारिश हुई है। उज्जैन में भी सामान्य से आधी वर्षा हुई, लेकिन 1992 के सिंहस्थ में चम्बल-गम्भीर नदी पर उज्जैन को पानी पिलाने के लिये बनाये गये गम्भीर बाँध जिसकी कुल क्षमता 2250 MCFT है, में बारिश खत्म होने के महीने अर्थात सितम्बर के अन्त तक 350 MCFT पानी संग्रहीत था (देखें यह लेख)। उज्जैन शहर में एक दिन की पानी की खपत 4 MCFT है इस हिसाब से यदि 1 अक्टूबर से तीन दिन छोड़कर चौथे दिन पानी दिया जाता तो लगभग 90 बार अर्थात 270 दिनों तक पानी दिया जा सकता था, जाहिर है कि 350 MCFT पानी को बचा-बचाकर उपयोग किया जाता, तो आराम से मई-जून का समय भी निकाला जा सकता था।

पानी, राजनीति और पैसे के खेल ने ऐसा नहीं होने दिया। उज्जैन में कुल 54 पार्षद हैं और उज्जैन नगर निगम में कांग्रेस का बोर्ड है, पानी की सप्लाई प्रत्येक शहर की तरह P.H.E. के जिम्मे है। जब सितम्बर में ही यह तय हो चुका था कि इतना ही पानी हमें जुलाई तक उपयोग करना है, उसी समय तत्काल निर्णय लेकर काम शुरु हो जाना चाहिये था, लेकिन निगम बोर्ड में 54 पार्षद आपस में लड़ते रहे और नवम्बर अन्त तक शहर में एक दिन छोड़कर ही पानी दिया जाता रहा। इन दो महीनों में अधिकारियों, निगम कर्मचारियों और पीएचई कर्मचारियों ने बाँध से पानी की चोरी रोकने की कोई पहल नहीं की, उधर पानी चोरी होता रहा, इधर एक दिन छोड़कर पानी देने से बाँध में पानी का लेवल खतरनाक निचले स्तर पर पहुँच गया। अधिकारियों ने पैसा खाने की गरज से करोड़ों की एक योजना बनाई, जिसके द्वारा नागदा के पास अमलावदा बीका के एक बैराज से पानी लाने के लिये पाइप लाईन बिछाई जाना थी। सर्वे हुए, योजना बनी, फ़ाइल भोपाल गई, विधानसभा की आचार संहिता के चक्कर में कोई निर्णय नहीं हो पाया, और जब भोपाल से एक तकनीकी दल ने योजना देखी तो उसे अव्यावहारिक घोषित करके रद्द कर दिया। उस योजना को “अव्यावहारिक” बताने के पीछे भी कोई रहस्य है, क्योंकि नागदा का ग्रेसिम उद्योग पहले ही वह पानी देने से मना कर रहा था, और नागदा के विधायक भी किसानों के दबाव में उसका विरोध कर रहे थे, सो अचानक वह योजना रद्द कर दी गई।

उज्जैन में धीरे-धीरे पानी के लिये हाहाकार मचना शुरु हो चुका है, जनवरी माह में 3 दिन छोड़कर चौथे दिन पानी दिया गया है, फ़िर भी बाँध में सिर्फ़ 30 MCFT पानी बचा है। मजे की बात यह है कि पीएचई के इंजीनियर(?) भी नहीं बता पा रहे हैं कि आखिर बाँध में असल में पानी कितना है, कभी वे कहते हैं 30 MFCT है कभी कहते हैं शायद 50 MCFT भी हो सकता है। जब जनता ने नेताओं के घरों को घेरना शुरु कर दिया है तब नेताओं ने बाँध के पीछे के दस किलोमीटर के इलाके का दौरा करके बताया कि बाँध में 5 किलोमीटर पीछे तक खूब पानी भरा हुआ है, लेकिन यह अधिकारियों को नहीं दिखाई दिया। अब उस पानी को जमीन काटकर आगे लाने की योजना बनाई जा रही है, ताकि कम से कम मार्च तक का समय निकाला जा सके, यानी उज्जैनवासियों की कड़ी परीक्षा होगी अप्रैल से जुलाई के बीच।

यह पूरा संकट विशुद्ध मानव-निर्मित है, लालच, कामचोरी और राजनीति ने मिलकर यह गन्दा खेल खेला है। पहले पीएचई कर्मचारियों ने किसानों से मिलीभगत करके पानी की चोरी करवा दी और लाखों कमा लिये, फ़िर विधानसभा चुनाव के मद्देनजर वोटों के लालच में दोनों में से कोई पार्टी यह निर्णय नहीं लेना चाहती थी कि 3 दिन छोड़कर पानी प्रदाय किया जाये, इस कवायद में दिसम्बर निकल गया। नगर निगम और पीएचई के अधिकारी उस पाईप लाइन की योजना पर ज्यादा जोर देते रहे क्योंकि 15 करोड़ की उस योजना में काफ़ी लोगों के “वारे-न्यारे” हो जाते, जबकि उज्जैन शहर में ही कम से कम 10 बड़ी बावड़ियाँ और 60 बड़े कुएं हैं जिनकी सफ़ाई पहले जरूरी थी, लेकिन उसमें पैसे खाने की कोई गुंजाइश नहीं थी। 54 पार्षद भी इसलिये समस्या से मुँह मोड़े रहे क्योंकि सन 2002 के पिछले जल संकट के दौरान टैंकरों से पानी सप्लाई करने में भी उन्होंने काफ़ी कमाया था। उज्जैन के बाहरी इलाके में स्थित भू-माफ़ियाओं के खेतों में वैध-अवैध ट्यूबवेल लगे हुए हैं जहाँ भरपूर पानी है, पैसा लेकर उससे टैंकर भरे जाते हैं…

अब आज की स्थिति यह है कि एक 3000 लीटर टैंकर के 400 रुपये लिये जा रहे हैं जिसके दाम अप्रैल-मई तक बढ़कर 600-700 रुपये हो जायेंगे। एक टैंकर यदि दिन भर में 10 फ़ेरे भी लगाये तो 5000 रुपये कमायेगा। टैंकर से पानी खरीदने में भी हर कोई तो सक्षम नहीं है और जो सक्षम हैं भी तो 3000 लीटर पानी का स्टोरेज करने की जगह भी होना चाहिये। शासन ने अपनी ओर से टैंकरों से पानी सप्लाई की योजना बनाई है, जिसके अनुसार एक टैंकर एक वार्ड में दिन भर पानी की सप्लाई करेगा, सोचने वाली बात है कि लगभग 2 वर्गकिमी के वार्ड में जहाँ एक-एक वार्ड में 20-25 हजार लोग रहते हों, एक टैंकर से कितना और कैसे पानी मिलेगा, उसके लिये कितना झगड़ना पड़ेगा, और जिन घरों में पानी भरने वाले कोई जवान नहीं हैं उन अकेले रहने वाले बूढ़ों, महिलाओं को पानी कैसे मिल पायेगा। जाहिर है कि लोग पैसा देकर पानी खरीदेंगे, और नेता यही चाहते हैं। पैसा खाने का एक और तरीका है ट्यूबवेल खुदवाना। जब 15 करोड़ की योजना इंजीनियरों ने निरस्त कर दी तो जल संकट से निपटने का बहाना लेकर अब उज्जैन की धरती पर 400 बोरिंग करने की योजना है, यानी बोरिंग करने वाली कम्पनी से उसमें भी कमीशन। जो व्यक्ति खुद के खर्चे पर बोरिंग करवाना चाहता है उसे नगर निगम में ऐसा उलझाया जा रहा है कि वह बोरिंग के नाम से ही तौबा कर ले या फ़िर कुछ पैसा खिलाये तब बोरिंग की इजाजत देने वाली फ़ाइल आगे बढ़ाई जाये, यानी चारों तरफ़ लूट मची हुई है…।

भारतीयों के संस्कार में दोषी को पर्याप्त “सजा” नहीं देने के जो कीटाणु भरे पड़े हैं उसके कारण अभी तक इस संकट के लिये किसी भी अधिकारी-नेता-किसान को जिम्मेदार ठहराना तो दूर, उसकी पहचान भी नहीं की है, क्योंकि सभी तो मिले हुए हैं… और उज्जैन की जनता भी कोई भारत की जनता से अलग थोड़े ही है… जब पूरे बरबाद हो जायेंगे तब नींद खुलेगी वाले अन्दाज में धीरे-धीरे जाग रहे हैं। रोजाना पानी को लेकर आपसी विवाद-झगड़े-मारपीट आम हो चले हैं… जो जागरूक हैं या जो अब मजबूरी में जागरूक बने हैं उन्होंने अपने तईं पानी बचाने के कई उपाय अपनाने शुरु कर दिये हैं, जैसे कि मेहमान को शुरु में आधा गिलास पानी पेश करना, वाश बेसिन और फ़्लश का उपयोग बन्द करना, गाड़ी धोने की बजाय गीले कपड़े से पोंछना, गमलों और बगीचे में कपड़े धोने के बाद का बचा हुआ पानी ही डालना आदि…। लोगों ने अपने परिजनों (जो उज्जैन छोड़ सकते हैं) को तीन महीने के लिये अपने रिश्तेदारों के यहाँ भेजने की योजना भी बना ली है। हालांकि कुछ “देवदूत” भी हैं जो अपने व्यक्तिगत कुंए और ट्यूबवेल से आसपास के हजारों लोगों को निस्वार्थ भाव से पानी दे रहे हैं, लेकिन जब कुओं का जलस्तर घट जायेगा और नलों से पानी आना बन्द हो जायेगा तब स्थिति भयावह हो जायेगी… लेकिन जब जिम्मेदार लोग अपना कर्तव्य भूलकर सिर्फ़ पैसा खाने-कमाने में लग जायें तब जनता को कौन पूछेगा?

चलते-चलते : क्या आप जानते हैं कि आपके शहर में पानी कहाँ से आता है? उस स्रोत में कितना पानी है? वह आप तक कैसे पहुँचता है? यदि नहीं जानते तो पता कीजिये, नेताओं और सरकारी कर्मचारियों के भरोसे मत रहिये… फ़िलहाल आप इस भयावह कल्पना पर विचार कीजिये कि यदि आपके यहाँ नल आना बन्द हो जायें तो क्या होगा… तब तक मैं पानी भरकर आता हूँ…

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14 comments:

संजय बेंगाणी said...

यह विशुद्ध ब्लॉगरिया पोस्ट है. एकदम ब्लॉग की अवधारणा के अनुरूप. बधाई देता हूँ.


हमारे शहर में नर्मदा का पानी आता है, जो सौ किलोमिटर दूर है और उसका पानी साबरमति नदी तक दोनो नदियों को जोड़ कर लाया गया है. दशकों बाद साबरमति बारह महिनों पानी से भरी रही है, वरना बरसाती नदी बन गई थी. फिलहाल तो रोज पर्याप्त पानी आता है.

Anil Pusadkar said...

हर समस्या की जड़ है अनइक्वल डिस्ट्रीब्युशन।यहां भी वही हाल है जिसके घर मे म्युनिसिपल का नल है उसके घर मे निजी बोरिंग भी है। और जिसके घर मे दोनो नही है वो सरकारी नल पल पर लाईन लगाता है।उसे पीने का पानी मुस्किल से मिलता है और सेठ के यंहा का कुत्ता भी दो बार नहाता है।उसके कपड़े तालाब मे धुल्ते है और बड़े लोगो की गाड़िया धोने से सड़क पर तालाब बन जाता है।इस स्थिती के लिये हम सब जिम्मेदार हैं।

Anil Pusadkar said...

हर समस्या की जड़ है अनइक्वल डिस्ट्रीब्युशन।यहां भी वही हाल है जिसके घर मे म्युनिसिपल का नल है उसके घर मे निजी बोरिंग भी है। और जिसके घर मे दोनो नही है वो सरकारी नल पल पर लाईन लगाता है।उसे पीने का पानी मुस्किल से मिलता है और सेठ के यंहा का कुत्ता भी दो बार नहाता है।उसके कपड़े तालाब मे धुल्ते है और बड़े लोगो की गाड़िया धोने से सड़क पर तालाब बन जाता है।इस स्थिती के लिये हम सब जिम्मेदार हैं।

कुश said...

सिस्टम में बुराई और करप्शन इस कदर धँस गया है की अब निकल ही नही सकता.. आपने उज्जैन की बात की है. यक़ीनन देश के बाकी शहरो का भी यही हाल होगा.. संजय जी से सहमत.. विशुद्ध ब्लॉग पोस्ट है ये..

ghughuti said...
This comment has been removed by the author.
Mired Mirage said...

आपने जो चिन्ता दर्शाई है वह सही है। यदि उज्जैन में यह स्थिति है तो बहुत चिन्ताजनक है। पानी खरीदना न हरेक के वश की बात है और टैन्करों से यदि मुफ्त पानी बंटे तो भी हरेक इस मारामारी को झेल नहीं सकता। ऐसी समस्याओं का सामना शारीरिक व आर्थिक रूप से समर्थ लोग तो फिर भी कर सकते हैं परन्तु असमर्थ पर इसकी मार भयंकर पड़ती है।
समस्या के समय कुछ लोग तो पैसा बनाएँगे ही। वैसे यदि हर शहर में हर नए बनने वाले मकान में वर्षा का पानी इकट्ठा करना आवश्यक कर दिया जाए, हर बड़ी इमारत की छत का पानी जमा किया जाए तो समस्या कुछ सीमा तक कम की जा सकती है। हर शहर में तालाब बावड़ी होते ही थे परन्तु उन्हें भरकर मकान बना दिए जाते हैं। वर्षा का जल यूँ ही बहकर बाढ़ के रूप में तबाही मचाता है और साल भर लोगों को पानी नहीं मिलता। समस्या की जड़ में बढ़ती जनसंख्या, हमारा लालच व प्रकृति का असीमित दोहन ही है।
घुघूती बासूती

मसिजीवी said...

संजय की बात से पूर्ण सहमति, ये ब्‍लॉगराना प्रकृति की शानदार पोस्‍ट है।

गैर बराबर वितरण अहम मसला है। न केवल शहर में गैर बराबर वितरण का संकट है वरन एक याहर की तुलना में दूसरे शहर को कितना पानी मिलता है ये भी गैर बराबरी का मसला है।

हम देश की राजधानी में बैठे हैं दिन में दो बार पर्याप्‍त पानी मिलता है जो दिन भर के लिए टंकियों में भर भी लिया जाता है। बाकी सोसाइटी भर की साझा बोरिंग तो है ही। पानी तीन दिन में एक बार मिले इस कल्‍पना से रोंगटे खड़े होते हैं। कभी एकाध बार टैंकर से पानी भरा है वो अगर रोजमर्रा की हकीकत बन जाए तब तो जिंदगी ही ठप्‍प हो जाए।

विवेक सिंह said...

ऊपर के सभी टिप्पणीकारों से सहमत हूँ !

ई-गुरु राजीव said...

ऐसी समस्याओं का सामना शारीरिक व आर्थिक रूप से समर्थ लोग तो फिर भी कर सकते हैं परन्तु असमर्थ पर इसकी मार भयंकर पड़ती है।

राज भाटिय़ा said...

यह लोग हमारे मुंह से रोटी ओर पानी छीन कर कितना अमीर बन जायेगे, क्या शर्म नाम की भी कोई चीज होती है, अब तो हद होती जा रही है... लेकिन कब तक यह सब चलेगा???? एक दिन लावा जरुर फ़ुटेगा इस जनता का तो यह नेता क्या करेगे?? कहा भागेगे???
धन्यवाद सुरेश जी हालात से जान पहाचान करवाने के लिये

Hamara Ratlam said...

हमारा रतलाम भी लगभग इसी कगार पर है फिर भी यहाँ के वर्तमान लोकप्रिय विधायक श्री पारस सकलेचा जी ने एक मुहिम आज से लगभग 4-5 वर्ष पूर्व ही शुरू कर दी थी जिसमें शहर के सभी कुँए, बावडीयाँ व अन्‍य जल स्‍त्रोतों की सफाई और दो दिन में एक बार पानी की आपूर्ति की जाती है। अर्थशास्‍त्र में मांग और आपूर्ति का सिद्धात को हम सभी समझ रहें है इसके तहत जब तक किसी वस्‍तु की आपूर्ति कम नहीं होती तब तक कोई उसका महत्‍व नहीं समझता। अब समय आ गया है की इस दिशा में महत्‍वपूर्ण कदम उठाये जावें।
1 पानी को रिचार्ज करना अनिवार्य किया जावे।
2 जानबूझकर पानी की कमी रखी जावे।
3 सडकों पर कार्नर टू कार्नर सिमेेंटीकरण पर तत्‍काल रोक।
4 वृक्षारोपण।
6 लगातार जागरूकता के तहत विभिन्‍न कार्यक्रम आदि।

वर्तमान टेक्‍नोलॉजी का शानदार उपयोग करने हेतु आपको साधुवाद! हमारा रतलाम का भी इसी प्रकार का प्रयास जारी है, आप सभी महानुभावों के आर्शीवचनों की प्रतीक्षा में! धन्‍यवाद।

COMMON MAN said...

पहली बात कि लोगों को जल संरक्षण करना चाहिये.
दूसरा यह कि लिहाज को छोड़ कर माफिक सजा मिलनी चाहिये दोषियों को.
तीसरा यह कि जनसंख्या पर अविलम्ब रोक लगानी चाहिये.
आपका लेख आंखें खोलने वाला है.

Shastri said...

फिलहाल हिन्दुस्तान की इतनी बडी जनसंख्या के लिये जरूरी हर चीज मौजूद है. लेकिन उनका सही दोहन करके जनता तक पहुंचाने के लिये जिस "समर्पण" की जरूरत है वह देश का भरण-पोषण करने वाले लोगों में नहीं है. जनता जब तक चुप रहेगी तब तक ये लोग सिर्फ अपने परिवार के भरण-पोषण की ही फिकर करते रहेंगी.

सस्नेह -- शास्त्री

G M Rajesh said...

yeh
very true story
i loved this attitude