Sunday, February 15, 2009

मुस्लिमों की भलाई के लिये डॉ रफ़ीक ज़कारिया के कुछ सुझाव

Rafique Zakaria, Indian Muslims, Congress and Secularism

पाठकों को लगेगा कि यह किसी संघ-भाजपा के नेता के विचार हैं, यदि यही बातें नरेन्द्र मोदी या आडवाणी किसी सार्वजनिक सभा में कहते तो “सेकुलर मीडिया” और उनके लगुए-भगुए खासा बवाल खड़ा कर देते, लेकिन नहीं… उक्त विचार प्रख्यात मुस्लिम राजनीतिज्ञ और विद्वान डॉ रफ़ीक ज़कारिया के हैं। डॉ ज़कारिया ने अपनी पुस्तक “कम्यूनल रेज इन सेक्यूलर इंडिया” (पापुलर प्रकाशन, सितम्बर 2002) मे मुसलमानों के व्यवहार और उनकी सोच पर “मुसलमानों को क्या करना चाहिये” नाम से एक पूरा एक अध्याय लिखा है। यह पुस्तक उन्होंने गोधरा दंगों के बाद लिखी थी… डॉ ज़कारिया का निधन 9 जुलाई 2005 को हुआ।

गत कुछ वर्षों में मुस्लिमों के लिये अलग से वित्तीय बजट, अल्पसंख्यकों के लिये अलग से मंत्रालय, सच्चर कमेटी द्वारा आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े मुसलमानों की पहचान करना और विभिन्न सुझाव देना, हज सब्सिडी की रकम बढ़ाना, नौकरियों में आरक्षण का हक जताना आदि कई ऐसे काम हैं जो कि UPA सरकार ने समय-समय पर मुस्लिमों के लिये (वोट बैंक मानकर) किये हैं, वैसे भी कांग्रेस तो 1947 से ही मुसलमानों के फ़ायदे के लिये विभाजन से लेकर उनकी हर माँग मानती आ रही है, फ़िर चाहे देश के अन्य धर्मावलम्बियों पर इसका कुछ भी असर हो। सिख, जैन और बौद्ध भी अल्पसंख्यक हैं यह बात लगता है कि कांग्रेस भूल चुकी है। ईसाईयों पर भी कांग्रेस का “विशेष ध्यान” तब से ही जाना शुरु हुआ, जब उनके खानदान में एंटोनिया माइनो बहू बनकर पधारीं, वरना अल्पसंख्यक का मतलब सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान होता है यह हमारी “महान सेकुलर प्रेस और मीडिया” ने भी मान लिया लगता है।

ऐसा प्रतीत होता है कि मुस्लिम नेतृत्व और कठमुल्लों ने विगत 60 सालों में सिवाय हक मांगने और सरकारों को वोट की ताकत के बल पर धमकाने के अलावा कुछ नहीं किया। पाकिस्तान मांगने से लेकर आरक्षण माँगने तक एक बार भी इन मुस्लिम नेताओं ने “देश के प्रति कर्त्तव्य” को याद नहीं रखा, और रीढ़विहीन कांग्रेस ने सदा इनके सामने लोट लगाई, मुसलमानों को अशिक्षित और गरीब बनाये रखा और देश को सतत गुमराह किया। जब किसी समाज या समुदाय को कोई अधिकार या सुविधायें दी जाती हैं तो देश और सरकार को यह अपेक्षा होती है कि इसके बदले में वह समाज देश की उन्नति और सुरक्षा के लिये काम करेगा और देश को और ऊँचे ले जायेगा। क्या कभी मुस्लिम नेतृत्व ने आत्मपरीक्षण किया है कि इस देश ने उन्हें क्या-क्या दिया है और उन्होंने देश को अब तक क्या दिया?

पुस्तक में डॉ ज़कारिया ने स्वीकार किया है कि भारतीय मुसलमानों में इस्लामिक कट्टरतावाद के फ़ैलते असर को लेकर बेचैनी है और वे इसके खिलाफ़ कुछ करना चाहते हैं, इसलिये उन्होंने यह निम्न सुझाव दिये हैं –

1) मुसलमानों के लिये संघर्ष का रास्ता उचित नहीं है। उनके लिये खुशहाली का एकमात्र उपाय यह है कि वे देश और समाज के मुख्य अंगों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलें। मुसलमानों को खुले दिल से हिन्दुओं और इस राष्ट्र को अपनाना चाहिये। इसके लिये सबसे पहले उन्हें अपनी “कबीलाई मानसिकता” (Ghetto Mentality) से बाहर आना होगा, एक समरसता भरे समाज के निर्माण में उन्हें ही मुख्य भूमिका निभानी होगी।

2) मुसलमानों को समझना चाहिये कि ज़माना बदल रहा, बदल गया है। उन्हें अपने पूर्वाग्रहों को छोड़ना होगा और पुरानी मानसिकता को समय के अनुरूप बदलना चाहिये। मुसलमानों को सरकारों से मदद माँगना छोड़कर अपने पैरों पर खुद खड़े होने का प्रयास करना चाहिये, वरना वे एक अपंग समाज की तरह बन जायेंगे जिन्हें कभी-न-कभी बोझ समझा जाने लगेगा। मुसलमानों को जल्दी ही यह समझ लेना चाहिये कि जो भी नेता उनकी मदद करने को तत्पर दिखाई दे रहा है वह निश्चित ही अपने चुनावी फ़ायदे के लिये ऐसा कर रहा है, यहाँ तक कि मुसलमानों को दूसरे देशों के मुसलमानों से भी कोई अपेक्षा नहीं रखना चाहिये, हो सकता है कि वे कुछ आर्थिक मदद कर दें लेकिन मुश्किल समय मे वे उनके बचाव के लिये कभी आगे नहीं आयेंगे, और यह बात अन्य कई देशों में कई बार साबित हो चुकी है।

3) मुसलमानों को “अपनी खुद की बनाई हुई भ्रम की दुनिया” से बाहर निकलना चाहिये, उन्हें कठमुल्लों की भड़काऊ और भावनात्मक बातों पर यकीन नहीं करना चाहिये। मुस्लिमों के दुश्मन सिर्फ़ ये कठमुल्ले ही नहीं हैं बल्कि समाज के ही कुछ मौलाना, शिक्षाविद और पत्रकार भी इनका साथ देकर आग में घी डालने का काम करते हैं, इनसे बचना चाहिये। भारत के मुसलमानों को इस दलदल से बाहर निकलकर अपने काम और हुनर को माँजना चाहिये ताकि वे समाज की मुख्यधारा में आसानी से आ सकें और देश के निर्माण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें।

4) भारतीय मुसलमानों को देश के उदार हिन्दुओं के साथ मिलकर एक उन्नत समाज की स्थापना के लिये काम करना चाहिये। हालांकि यह कोई मुश्किल काम नहीं है लेकिन इसके लिये उन्हें अपने व्यवहार और मानसिकता में बदलाव लाना चाहिये।

5) यही बात भारतीय मुस्लिमों में युवाओं पर भी लागू होती है, उनका ध्यान शिक्षा और सामाजिक गतिविधियों पर ही होना चाहिये क्योंकि “ज्ञान” का कोई विकल्प नहीं है, इसके लिये सबसे पहले इन युवाओं के माता-पिता को अपने पूर्वाग्रह छोड़ना होंगे और उन्हें अधिक से अधिक और उच्च शिक्षा दिलाने की कोशिश करना चाहिये।

6) भारत के मुसलमानों को जिहादी तत्वों और कट्टर धर्मांध लोगों को सख्ती से “ना” कहना सीखना ही चाहिये। उन्हें अन्य धर्मावलम्बियों को यह विश्वास दिलाने की कोशिश करना चाहिये कि उनका धर्म भी “जियो और जीने दो” के सिद्धान्त पर काम करता है। उनके इस प्रयास से ही इस्लाम को भारत में सच्चे अर्थों में लोकप्रिय बनाने में मदद मिलेगी।

7) कुरान में दिये गये आदेशों को मानते हुए भी भारतीय मुस्लिम “एकपत्नीवाद” का पालन कर सकता है। शरीयत में निकाह, तलाक, मेहर और गुज़ारे के कानूनों को समयानुकूल बदलने की काफ़ी गुंजाइश है। इसे करने की कोशिश की जाना चाहिये।

8) “वन्देमातरम” को गाने या न गाने सम्बन्धी विवाद बेमानी है। आज़ादी के आन्दोलन के समय कांग्रेस के सभी मुस्लिम नेता इस गीत को खुले दिल से गाते थे। जो मुसलमान इसे नहीं गाना चाहते कम से कम वे इसे गाये जाते समय खड़े हो जायें क्योंकि यह राष्ट्रगीत है और देश के सम्मान में गाया जा रहा है। पहले से ही घायल साम्प्रदायिक तानेबाने को एक छोटी सी बात पर बिगाड़ना उचित नहीं है।

9) परिवार नियोजन का सवाल हमेशा प्रत्येक विकासशील देश के लिये एक मुख्य प्रश्न होता है। हमें यह सच्चाई स्वीकारना चाहिये कि परिवार नियोजन को मुसलमानों ने उतने खुले दिल से स्वीकार नहीं किया जितना कि हिन्दुओं ने। मुसलमानो को अपनी गरीबी दूर करने के लिये यह गलती तुरन्त सुधारना चाहिये। इसके लिये समाज के पढ़े-लिखे व्यक्तियों को ही एक जागरण अभियान चलाना होगा ताकि अनपढ़ मुसलमान परिवार नियोजन अपनायें, यह एक बेहद जरूरी कदम है, वरना भारत कभी भी आगे नहीं बढ़ सकेगा, गरीबी और अशिक्षा बनी रहेगी।

10) मुसलमानों को अपने स्वभाव, हावभाव, रहन-सहन, व्यवहार से हिन्दुओं को यह विश्वास दिलाना होगा कि वे उनके दुश्मन नहीं हैं और उन्हें कोई नुकसान नहीं पहुँचायेंगे। हिन्दुओं को अपने काम से यह विश्वास दिलाना होगा कि मुसलमान भी इसी देश की संतान हैं जैसे कि हिन्दू हैं, और वे भी इस देश की उन्नति के लिये चिन्तित हैं।

11) सबसे अन्त में मैं सबसे मुख्य बात कहना चाहूँगा, कि “मुसलमानों को यह साफ़ समझ लेना चाहिये कि उनका भाग्य सिर्फ़ वे खुद बदल सकते हैं उनका कोई भी नेता नहीं…”

क्या यह मात्र संयोग है कि ऊपर दिये गये कई विचार हिन्दुत्ववादी मानी जानी वाली पार्टियों और व्यक्तियों के विचारों से मिलते-जुलते हैं? हो सकता है कि कोई “अति-विद्वान”(?), डॉ रफ़ीक ज़कारिया की प्रतिबद्धता पर ही शक कर बैठे, इसलिये यहाँ बताना जरूरी है कि डॉ ज़कारिया एक अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विद्वान थे, उन्होंने लन्दन विश्वविद्यालय से पीएच. डी. की है और भारत के स्वतन्त्रता आंदोलन में भी हिस्सा लिया। डॉ ज़कारिया एक प्रतिष्ठित वकील, शिक्षाविद और पत्रकार थे, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि डॉ ज़कारिया पक्के कांग्रेसी थे, जो संसद के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं तथा महाराष्ट्र सरकार में विभिन्न कैबिनेट पदों पर 15 वर्ष तक रहे।

डॉ ज़कारिया के यह विचार आज के माहौल में बेहद प्रासंगिक हैं, मुस्लिमों के लिये एक पथप्रदर्शक के तौर पर हैं, लेकिन वोट बैंक की राजनीति के चलते पहले ही देश को बरबाद कर चुकी कांग्रेस, जिसने पहले भी एक बार आरिफ़ मोहम्मद खान को बाहर का दरवाजा दिखा दिया था… ज़कारिया जी के इन विचारों और सुझावों को रद्दी की टोकरी में फ़ेंक चुकी है। कांग्रेस, सपा, वामपंथियों के प्रिय पात्र कौन हैं… अबू आज़मी, जावेद अख्तर, शबाना आज़मी, तीस्ता सीतलवाड, अरुन्धती रॉय और अंग्रेजी प्रेस के पेज-थ्री टाईप के कुछ “सेकुलर पत्रकार”(?)… इन जैसे ही कई भांड-गवैयों को नरेन्द्र मोदी के नाम से ही पेचिश हो जाती है… क्योंकि यदि रफ़ीक ज़कारिया के यह विचार अधिक प्रचारित-प्रसारित हो गये तो इनकी “दुकानें” बन्द हो जायेंगी… देश का पहला विभाजन भी कांग्रेस की वजह से हुआ था, भगवान न करे यदि दूसरा विभाजन हुआ तो इसकी जिम्मेदार भी यही घटिया, स्वार्थी और भ्रष्ट लोगों से भरी पार्टी होगी…

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15 comments:

MARKANDEY RAI said...

bahut badhiya sir .aapka likha hua mujhe hamesha pasand aata hai.

संकेत पाठक... said...

सुरेश जी,
अच्छी जानकारी दी है आपने, पर क्या आपको लगता है, ये मुसलमान जो कारगिल उद्ध के समय पाक के जीत की दुआ करता हो, क्रिकेट में पकिस्तान की जीत पर फटाके फोड़ता हो, दूसरे देश में बने कार्टून पर अपने देश में आग लगाता हो, वो मुस्लिम इन चार पंक्तियों से सुधर जाएगा, और रही बात कांग्रेस की तो वो वोट के लिए अपनी बीबी को भी नीलाम कर सकती है फ़िर तो ये देश की बात है...

अनुनाद सिंह said...

यह भी पढ़ने लायक है (मुझे इसका हिन्दी रूप कहीं नहीं मिला)


Johann Hari: Why should I respect these oppressive religions?

http://www.councilofexmuslims.com/index.php?topic=4427.0

success mantra said...

देश के संसाधनो पर मुस्लिमों का पहला हक बताने वाले काग्रेंस से और क्या उम्मीद की जा सकती है आज सिर्फ मुसलमानों के तुष्टीकरण की बात होती है

Mired Mirage said...

अच्छी जानकारी है। सभी को चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो विकास व शिक्षा की आवश्यकता है।
घुघूती बासूती

समुत्कर्ष said...

भारत की सरकार ने मुसलमानों का भला कराने के स्थान पर उन्हें पंगु बना दिया है! इसके आलावा उनके पास कोई और चारा नही है. क्योंकि तालीम प्रोफेशनल नही है. तो उन्हें 10 से 15 हजार से ज्यादा कहीं नही मिलाता है. बिचारे जैसे कर्म करेंगे वैसे ही तो फल मिलेगा.

Anil Pusadkar said...

जय ह॥ सुरेश भाऊ की जय हो।

Anil Pusadkar said...

जय ह॥ सुरेश भाऊ की जय हो।

ab inconvenienti said...

बात तो सही है, पर आपका ब्लॉग बहुत कम मुस्लिम पढ़ते हैं, और हिंदू तो यही बातें जाने कब से दोहरा रहे हैं. ऊपर की टिप्पणी में एक लिंक दिया है, उस लेख को छापने पर कोलकाता के दो संवाददाताओं को हवालात की हवा खानी पड़ गई, 'मुस्लिमों की भावनाओं को ठेस' पहुँचने के अपराध में.

http://www.councilofexmuslims.com/index.php?topic=4427.0

Sanjay Sharma said...

तह तक जाने वाला हर आदमी डॉ . जकारिया हो सकता है .उनके जिंदा रहते उनके विचारों की क़द्र कुछ ही लोग किए हैं .अब सौ फीसदी क़द्र किए जाना सच्ची श्रद्धान्जली होगी उनके प्रति. शत नमन मेरा उन्हें !

COMMON MAN said...

कट्टरवाद से बाहर निकलना पड़ेगा मुस्लिमों को अन्यथा स्वात घाटी की तरह हालात हो जायेंगे. जो लोग उदार हैं उन्हें आगे लाना चाहिये.सुन्दर विश्लेषण.

Dev said...

बहुत सुंदर .
बधाई
इस ब्लॉग पर एक नजर डालें "दादी माँ की कहानियाँ "
http://dadimaakikahaniya.blogspot.com/

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी बहुत ही सुंदर लिखा, समझदार मुस्लिम सब समझता है, लेकिन अकेला कुछ बोल नही सकता, अगर यह लोग अभी भी ना चेते तो कभी भी नही चेते गे, इन का देश यही है यही रहेगा, फ़िर क्यो ना खुद भी शांति से रहे ओरो को भी शांति से रहने दे, यह किताब बाद मै पढूगां.
आप का धन्यवाद

Tarun said...

सुरेशजी, बहुत अच्छा आलेख, उन्हें ये समझना चाहिये, अभी कल ही पढ़ा था पाकिस्तान के स्वाट में तालिबान ने कमान संभाल ली है।

jayram said...

suresh ji ko namaskar ...........
jis din is desh ke musalman zakaria jaise wicharo ko manne lagi sara kles hi ddoor ho jayega .
par nikat bhawishya mein aisa sambhaw nahi dikhta hai . secularta ka dhong pitne wali jamia university mein---- m f hussain ke nam par art gallery banayi jati hai ,, nandita das ki gujrat dango par bani film firak ka promo hota hai lekin agar wakai secular hote to kabhi taslima ki kisi kitab ka wimochan kar dikhayen , salman rushdi ke naam par koi dept khole to jane .
to bhai bat yahi hai ki right to expression to m f hussain , arundhati jaise logon ko hi hai hame ye haq kahan tabhi to arundhati ko juta marne wali khabar par pabandi lagayi jati hai is blog jagat mein.