Monday, February 9, 2009

मुस्लिम आरक्षण का “भूत” फ़िर निकला, आम चुनाव की हवा बहने लगी…

Muslim Reservation in India, Congress & Minority Politics

विश्व के सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे प्रधानमंत्री माननीय मनमोहन सिंह का यह बयान कि “देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है…” अब जोर-शोर से अपना रंग दिखाने लगा है, जाहिर है कि आम चुनाव सिर पर हैं, “कौए” बोलने लगे हैं और “सियार” गुफ़ाओं से बाहर आ चुके हैं। रविवार (दिनांक 1 फ़रवरी 2009) को दिल्ली में आयोजित मुस्लिम आरक्षण सम्बन्धी राष्ट्रीय अधिवेशन को सम्बोधित करते हुए विभिन्न वक्ताओं ने सरकार से एक सुर में मुसलमानों को आरक्षण देने की माँग की। तमाम मुस्लिम संगठनों के नेताओं का कहना था कि उन्हें जनसंख्या के अनुपात में और पिछड़ेपन की वजह से सरकारी नौकरियो में आरक्षण मिलना चाहिये। इस सिलसिले में एक संयुक्त कमेटी बनाकर सरकार से कम से कम 10 प्रतिशत का आरक्षण माँगा गया है। हालांकि अधिकतर वक्ताओं ने रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफ़ारिशों को मानने का आग्रह करते हुए 15% आरक्षण की माँग की, साथ ही यह माँग भी रखी गई कि मुस्लिमों और ईसाई दलितों को अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जाये। सम्मेलन को सम्बोधित करते हुए उच्चतम न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री एएम अहमदी ने कहा कि “मुस्लिम गत 60 साल से समाज के हाशिये पर हैं (यानी कौन सा दल जिम्मेदार हुआ?), और मुसलमानों के साथ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से लगातार भेदभाव होता रहा है, उन्हें मुख्यधारा (फ़िर मुख्यधारा का राग) में लाने के लिये “सच्चर” कमेटी की रिपोर्ट को पूरी तरह से लागू किया जाये…”।

इस अवसर पर रामविलास पासवान (एक और “शर्मनिरपेक्ष” नेता) ने कहा कि “सच्चर कमेटी ने पाया है कि मुस्लिम आबादी की सामाजिक और आर्थिक स्थिति भारत की अनुसूचित जनजातियों के बराबर ही है… इसे देखते हुए उच्चतम न्यायालय द्वारा जो 50% प्रतिशत आरक्षण की सीमा तय की गई है, उसे बढ़ाना उचित होगा, क्योंकि मण्डल आयोग ने पिछड़ी जातियों को 52% आरक्षण देने की सिफ़ारिश की थी, जबकि उन्हें सिर्फ़(?) 27% आरक्षण दिया जा रहा है… और अधिकतम 50% आरक्षण की सीमा व्यवहारिक नहीं है…” (यानी पासवान अपने दलित हिस्से में से मुसलमानों को आरक्षण नहीं देंगे, अलग से चाहिये)। भाकपा के एबी बर्धन ने कहा कि “मुसलमानों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा आज समाज से कटा हुआ और निराश महसूस कर रहा है और देश के लिये यह एक खतरनाक संकेत है…” (यानी कि बर्धन साहब मुसलमानों का उत्साहवर्धन करते हुए पश्चिम बंगाल के सभी जिलों को मुस्लिम बहुल बनाकर ही दम लेंगे)।

हालांकि अधिकतर नेताओं के सुर थोड़े धीमे थे, लेकिन सबसे खतरनाक बयान था स्टूडेण्ट इस्लामिक ऑर्गेनाइज़ेशन के सचिव शाहनवाज़ का, उन्होंने कहा कि “मुसलमानों को आरक्षण सरकार से भीख में नहीं चाहिये, यह मुसलमानों का हक है…” (सुन रहे हैं मनमोहन सिंह जी, आपकी कोशिशें रंग लाई हैं)। शाहनवाज़ ने आगे कहा कि “हमारे लिये आरक्षण कोई खैरात नहीं है, मुस्लिम इस देश की आबादी का 23 प्रतिशत हैं, जिसमें से 10% मुस्लिमों को आरक्षण की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बाकी के 12% मुसलमानों को नौकरियों में 12% आरक्षण चाहिये…। 10% आरक्षण तो कम है, 15% आरक्षण ज्यादा लगता है, इसलिये हम 12% आरक्षण की माँग करते हैं (यह देश पर उनका अहसान है)। मुस्लिम द्रविड़ मुनेत्र कषगम के इब्नैस मुहम्मद कहते हैं, “हमें देश को एक कारपोरेट कम्पनी की तरह देखना चाहिये, इस हिसाब से मुसलमानों का 15% शेयर इस कम्पनी में बनता ही है…” (अब कोई इस शेयर होल्डर को जाकर बताये कि “कम्पनी” को बरबाद करने में इसका शेयर कितना है)

आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री रेड्डी द्वारा 5% आरक्षण देने के बावजूद “शर्मनिरपेक्षता” के इस खुले नाच के बाद हमेशा की तरह अनसुलझे सवाल उठते हैं कि, मुसलमानों को हमेशा पिछड़ा, अशिक्षित और भयग्रस्त रखने वाली कांग्रेस आखिर इनके वोटों के लिये इन्हें कितनी बार और कितने साल तक उपयोग करती रहेगी? मुसलमानों को तथाकथित “मुख्यधारा”(?) में लाने के बहुतेरे प्रयास पहले भी किये गये, लेकिन “कठमुल्लों” के अत्यधिक नियन्त्रण के कारण वे इस धारा से बाहर ही रहे, इसमें किसकी गलती है? मुसलमानों को मदरसे छोड़कर सीबीएसई या राज्य के स्कूलों में पढ़ने से किसने रोका था, क्यों नहीं वे कम से कम बच्चे पैदा करके खुद की गरीबी दूर कर लेते?

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच मुसलमान राष्ट्र की मुख्यधारा में आना भी चाहते हैं या नहीं? यदि वाकई में वे मुख्यधारा में आना चाहते हैं तो पहले उन्हें अपने दिमाग खुले करने पड़ेंगे, ये नहीं चलेगा कि वे मुख्यधारा में भी आना चाहें और शरीयत के कानून(?) भी चाहें, ऐसा नहीं हो सकता कि वे मदरसों को आधुनिक बनाने के लिये पैसा माँगते रहें और लड़के-लड़कियों की सहशिक्षा को इस्लाम-विरोधी बताते रहें (हाल ही में उप्र के एक उलेमा ने सहशिक्षा वाले स्कूलों के खिलाफ़ फ़तवा जारी किया है), कश्मीर में लड़कियाँ स्कूल की साधारण वेशभूषा में भी स्कूल नहीं जा सकती हैं, सरेआम उनके चेहरे पर तेजाब फ़ेंका जा रहा है और “शर्मनिरपेक्ष मीडिया” को मंगलोर की घटनायें अतिवादी लग रही हैं (शर्म की बात तो है, मगर भाजपा या हिन्दूवादी संगठनों की बातों को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करना और मुस्लिम कट्टरपंथियों की हरकतों को नज़र-अंदाज़ करना शर्मनिरपेक्ष लोगों का एक पुराना खेल है)।

अब एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि सभी तरह का जाति आधारित आरक्षण पूरी तरह से समाप्त कर दिया जाये, नया फ़ार्मूला इस प्रकार हो कि - जिस “परिवार में सिर्फ़ एक बच्चा” हो उसे 5%, विकलांगों के लिये 10%, महिलाओं के लिये 20%, आर्थिक रूप से अति-गरीब सभी जातियों-धर्मों के लोगों के लिये 30% तथा सेना-अर्धसैनिक बलों-पुलिस वालों के परिजनों तथा शहीदों के उत्तरजीवियों के लिये 10% आरक्षण दिया जाये। इस फ़ार्मूले से एक तो जनसंख्या पर रोक लगाने में मदद मिलेगी तो दूसरी ओर सेना और पुलिस में भरती होने का एक और आकर्षण बढ़ेगा, गरीबों का सच में फ़ायदा होगा। बाकी के आर्थिक रूप से सक्षम लोगों, जातियों, धर्मों आदि को आरक्षण की क्या जरूरत है?

लेकिन जो पार्टी 60 साल से वोट-बैंक की राजनीति के आधार पर ही इस देश में टिकी हुई है, आज की तारीख में कथित “युवा शक्ति और युवा सोच”(?) का ढोल पीटने के बावजूद उसमें इस प्रकार का राजनैतिक “प्रस्ताव रखने तक की” हिम्मत नहीं है… अमल में लाना तो बहुत दूर की बात है।

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13 comments:

mahashakti said...

आपके कीबोर्ड से एक और उम्‍दा लेख। आज धर्म और जा‍ति के नाम पर देख को बांटा जा रहा है। आज धर्म और जाति के बीच विद्वेष फैलाने का सरकारे कर रही है। कुल जनसंख्‍या की 0.001% नौकरी के कारण हर व्‍यक्ति के जात और धर्म की पूछ सिर्फ सरकार करती है। आज तक संघ के किसी कार्यक्रम कें किसी भी व्‍यकि्त के जात के बारे में कोई प्रश्‍न नही किया गया।

बताइये दोषी कौन राष्‍ट्रीय स्‍वयंसेवक संघ या भारत सरकार ?

Shastri said...

"हक" सिर्फ बराबरी, आजादी, सुरक्षा आदि बातों का है. जहां तक नौकरी की बात है इसे सिर्फ योग्यता के आधार पर दिया जाना चाहिये.

यदि महज हक के आधार पर नौकरियां बंटने लगीं तो देश का कबाडा हो जायगा.

सस्नेह -- शास्त्री

चन्दन चौहान said...

ये जितने भी नेता है जिनका नाम से तो हिन्दु लगता है लेकिन इनके शरीर में पता नही किसका खून वह रहा है जो इस देश में बाबर और औरंगजेब के ऎजेन्ट के रुप में काम कर रहें हैं। आने बाला समय हिन्दुओं के लिये बहूत ही विनाशकारी होने बाला है अपनी समझदारी इसी में है कि या तो हिन्दु सर्वश्व त्याग या सर्वश्व बलिदान के लिये तैयार हो जाये दुबारा से अपनी बहू बेटियों के गले में विष का टुकरा बांध कर रखे जो इज्जत लूटने के समय खा कर अपने जीवन को खत्म करके अपना इज्जत बचाया जा सके। शादी-शुदा औरतें जौहर के लिये आग का इन्तजाम करले जो उसके पति के मरने के बाद जलने का काम आ सके।

निशाचर said...

बँटवारे के बाद मुसलमानों का नारा था "हंस के लिया है पाकिस्तान, लड़ के लेंगे हिंदुस्तान". क्या मनमोहन सिंह का बयान इसे सच साबित नहीं करता. धर्म के नाम पर बंटवारा हुआ. मुसलमानों को दो अलहदा मुल्क मिले. उन्हें किसने रोका था पाकिस्तान या बाग्लादेश में जा कर बसने से. सारे भारतीय प्रायद्वीप पर हिन्दुओं का अधिकार था, मुसलमान तो यहाँ शरणार्थी और घुसपैठिये ही बनकर आये थे. यह तो हिदू धर्म की सहिष्णुता का परिणाम है कि आज वे "ऊँगली के बहाने पहुंचा पकड़ रहे हैं". कांग्रेस पकिस्तान और मुसलमानों के एजेंट के रूप में काम कर रही है और सभी शर्मनिरपेक्ष दल उनके सहयोगी हैं. हिन्दुओं........अरे कायरों अब तो जागो.....

संजय बेंगाणी said...

हक जता कर पाकिस्तान ले तो लिया, अब और क्या लोगे?


शास्त्रीजी ने सही लिखा है. नोकरी आरक्षण से नहीं योग्यता से मिले...

तपन शर्मा said...

शर्म निरपेक्ष मुझे पसंद आया...

पंकज बेंगाणी said...

आपके शर्मनिरपेक्ष शब्द और शाष्त्रीजी के कमेंट से सहमत.


ऐसा ही लिखते रहिए और आँखे खुलवाते रहिए

अभिषेक ओझा said...

एक के बाद एक जो कुछ भी बचा है सब बर्बाद नहीं कर लेंगे ये चुप कैसे बैठ सकते हैं !

COMMON MAN said...

kaash aam aadmi ki samajh me aaye, sach hamesh kaduwa hota hai, isliye ise koi nahin nigalna chahta.

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आरक्षण को दवा बताया गया था। वह मर्ज बन गया है। इस तरह देश को बांट दिया जाएगा। सभी तरह के आरक्षण की समाप्ति की ओर बढ़ना होगा। पिछड़ेपन को दूर करने का और कोई इलाज तलाशा जा सकता है।

आरक्षण तो पीड़ा निवारक निकला जो अब पीड़ा घटाने के स्थान पर बढ़ा रहा है।

Anil Pusadkar said...

नेताओ के लिये भी बीमार होने पर आरक्षण से बने डाक्टर से ईलाज़ कराना कम्पलसरी कर देना चाहिये।शास्त्री जी और द्विवेदी जी से सहमत हूं।

राज भाटिय़ा said...

हे राम इस देश का क्या होगा, जिस देश के पढे लिखे लोग दुनिया को राह दिखा रहे है, ओर यह देश इन कमीने नेताओ की वजह से दल दल मे धंसता जा रहा है, आज अमेरिका मै ४०% भारतीया साईंस ओर अन्य क्षेत्रो मै है, नाशा मै भी भारतीया है, ओर इन के बिना यह अमेरिका पंगू सा है, ओर हमारा अपना देश हमारे ही नेता बरवाद कर रहे है...
सुरेश जी आप का लेख बहुत सटीक है.
धन्यवाद

समयचक्र - महेद्र मिश्रा said...

चुनाव के समय ये सभी मुद्दे नेताओं के लिए अस्त्र बन गए है . सहमत हूँ आपके विचारो से. धन्यवाद.