Sunday, February 8, 2009

एक माइक्रो पोस्ट – ब्लॉगरों से कुछ सवाल…

उज्जैन में एक प्रोफ़ेसर साहब हैं, जिनके यहाँ एक कुँआ था। “था” इसलिये लिखा कि उन्होंने एक वास्तुशास्त्री की सलाह(?) के अनुसार वह कुँआ बन्द करवा दिया, क्योंकि उसके अनुसार वह अशुभ था। उज्जैन में भीषण जल संकट चल रहा है, प्रोफ़ेसर साहब के कुँए में भरपूर पानी की आवक थी, आसपास के लोग खूब पानी भरते थे और उन्हें दुआएं देते थे। सज्जन प्रोफ़ेसर हैं तो पढ़े-लिखे ही होंगे, उनके दो पुत्र विदेश में हैं और एक पुत्री भी साइंटिस्ट है। जैसा कि मैंने पिछली एक-दो पोस्ट में बताया है कि उज्जैन में भीषण जल संकट चल रहा है और फ़िलहाल 5 दिन छोड़कर पानी दिया जा रहा है (देखें यह लेख) और विस्फ़ोट पर प्रकाशित यह लेख… ऐसे में ब्लॉगरों से सवाल हैं कि –

1) वास्तुशास्त्री की बात मानकर इतने बेहतरीन पानी वाला कुँआ बन्द करने की मानसिकता को क्या कहा जाये?
2) इसमें उस वास्तुशास्त्री का दोष कितना है और पढ़े-लिखे प्रोफ़ेसर साहब का कितना दोष है?
3) क्या उच्च शिक्षा के बावजूद इस प्रकार के वास्तुदोष पर विचार करना और उसे अमल में लाना अंधविश्वास है? अति-विश्वास है? या मूर्खता है?
4) जब उज्जैन में इतना भयानक जल संकट चल रहा हो ऐसे में इस कृत्य को पाप कहना उचित होगा?

आप ही तय करें… मैं तो ज्योतिष और वास्तु पर भरोसा नहीं करता…

30 comments:

mahashakti said...

मै तो भरोसा करता हूँ किन्‍तु मेरा यह मानना है कि जब उस कुऐ से कई तो लाभान्वित हो रहे थे तो व्‍यक्तिगत लाभ के लिये ऐसा करना ठीक नही था। अगर वह अशुभ होता तो प्रो0 साहब को बर्रक्त कैसे मिलती ? शायद अब उनके दिन खराब होने वाले है।

अनिल कान्त : said...

अगर उस कुएं से दूसरों की प्यास भुझती है ....तो इससे बड़ा परोपकार और लाभ क्या हो सकता है .......ज्योतिष और वास्तुशास्त्र तो बाद की बातें हैं अगर कोई इन्हे मानता भी है तो ......इसमे अशुभ और शुभ जैसा क्या है समझ नही आता

रंजन said...

प्रो साहब को समझाना चाहिये.. कुऐ, बावड़ी आदि व्यक्तिगत नहीं होते.. बेचारे नासमझ..

अशोक मधुप said...

वह खुद समझदार है, हालाकि आज बडे बडे वास्तु शास्त्र की मान एेसा कर रहे हैं। मेरे फूफा के घर में पुरूखो का बनवाया कुआ था। कभी कुछ नही हुआ! बाद में हालात बिगडे़ तो परिवार जनों के न करने के कारण। हालाकि उनके घर का बाद में कुंआ बदं हो गया किंतु नल आज भी है

अनुनाद सिंह said...

इन प्राध्यापक महोदय को उच्चतम श्रेणी का मूर्ख और अपराधी माना जाना चाहिए।

राज भाटिय़ा said...

मै तो साफ़ शव्दो मे इन प्रोफ़ेसर साहब को मुर्ख ही कहुगां,पता नही केसे बन गये यह प्रोफ़ेसर, ओर इन के बच्चे इतना पढे लिखे है, फ़िर भी इन बकबास सी बातो पर ध्यान देते है.लेकिन बुढा अपने बच्चो की कहा सुनता होगा, या फ़िर बच्चे भी बाप की तरह से मुर्ख हो गे, जरुरी नही पढ लिख कर भी आदमी को अकल आ जाये, एक दो साल पहले रोहत्क मे एक डा० ने अपने बच्चो को किसी साधू के कहने पर मार दिया था.
वाह केसे केसे लोग है.
आप का धन्यवाद, ऎसी खबरे लोगो की आंखे खोलती है. ओर हमे गलत रास्ते पर जाने से रोकती है.

हिमांशु said...

मूर्खता तो यह है ही.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

काश ! पढ़ाई लिखी लोगों को समझदार भी बना पाती...

संगीता पुरी said...

किसी जमाने में एक महल में चारो ओर चहल पहल बनी रहती है.....उसका नक्‍शा वही बना रहता है.....फिर भी समय के साथ वह रौनक नहीं रह जाती......और कालांतर में वह खंडहर में भी बदल जाता है......नक्‍शे में बिना कोई छेडछाड किए ही.......यदि वास्‍तुशास्‍त्र का महत्‍व होता.....तो एक महल सदा ही महल बना होता।

sareetha said...

वास्तु शास्त्र का तो मालूम नहीं लेकिन वैसे प्रोफ़ेसर साहब ने कुछ गलत नहीं किया । बेरह्म लोगों को पहले अकल आई नहीं । अब पानी की किल्लत हुई तो लगे छटपटाने । पकडो उन नेताओं को जिनको वोट दिये थे । अब पानी मांगो उनसे ।

jayram said...

bhai ji aapki post ka kayal hun . bilkul kaam ki aur samajik sarokar se judi khabron ko late hain.

विनय said...

कुछ भी सोचने और मानने पर भारत सरकार को कर थोड़े ही देना पड़ता है!


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गुलाबी कोंपलें

cmpershad said...

वास्तु शास्त्र तो एक बहाना था। असल में आदमी का एक इगो होता है कि वह सब को पानी दे रहा है तो उसे सब सलाम करें। यदि नहीं करते तो मैं वह कुआं मुचा रहा हूं। उनको तो कोई समस्य नहीं क्योंकि परिजन तो विदेश में हैं। लोकसेवा से हमें क्या मिला? कुंठित सोच का परिचायक मात्र॥

SHASHI SINGH said...

साक्षरता और शिक्षा नितांत दीगर बातें हैं। पढ़े लिखों के बीच शिक्षित तलाशना बड़ी टेढ़ी खीर है।

अल्पना वर्मा said...

jawab--
1-Maha-bevkoofi
2-50-50--
[vastu mein bina tod-fod kiye badlaav ke bhi pravdhaan hain--is liye wah vastu shastri 'gyani' nahin hai.]
3-pareshaniyon se hare hue insaan ki yah majboori ho sakti hai..jab sare rastey band ho jaatey hain tabhi padhey likhey log in raston ko apnantey hain.
4-Jee han aisey samay mein yah krty sahi nahin hai--paap kah dengey to anuchit na hoga.

विष्णु बैरागी said...

पूरी पोस्‍ट पढ लेने के बाद भी विश्‍वास नहीं कर पा रहा हूं कि ऐसा हुआ है। कोई भी शास्‍त्र मनुष्‍य और मनुष्‍यता से बडा नहीं होता। सलाह देने वाल मुर्ख हो सकता है किन्‍तु सलाह मानने वाला भी? वह भी प्रोफेसर?
इस मामलें में सलाह देने वाला कम और मानने वाला एकमात्र दोषी है। हमारा समाज तो जेठ के महीने में प्‍याउएं लगवाता है और निस्‍सन्‍तान दम्‍पति सार्वजनकि उपयोग के लिए कुआ खुदवा कर अपनी वंश बेल में व़ध्दि मानता है।
ऐसे शास्‍त्रों को दरिया में डुबो देना चाहिए और ऐसा कहा मानने वाले को चौराहे पर संगसार कर देना चाहिए।

अभिषेक ओझा said...

अगर पाप जैसी कोई चीज होती है तो इसे महापाप कहेंगे !

Mired Mirage said...

वास्तु शास्त्र सही है या गलत,मैं नहीं कह सकती। यदि वह हमें यह सिखाए कि मकान बनवाते समय किस दिशा में खिड़की दरवाजे रखने से उचित धूप, हवा आएगी आदि तो ठीक है। परन्तु जब मकान बन चुका हो, कुआँ पहले से खुदा हो तो मकान तुड़वाने या कुआँ भरवाने में कोई समझदारी नजर नहीं आती। वैसे भी अधिकतर ऐसे में सरल उपाय बता दिए जाते हैं,कुँआ भरवाने जैसे नहीं। पानी की कमी में जीवन बेहद कठिन हो जाता है। शायद उन्हें पानी भरने वाले लोग भीड़ लगाकर या लड़ाई झगड़ा करके परेशान कर रहे होंगे।
मुझे याद है एक जगह हमारे घर के बगीचे के नल से बहुत से लोग पानी भरने आते थे। अब सबके सोने जागने के समय अलग होते हैं। जो लोग रात देर तक काम नहीं करते या पढ़ते नहीं वे और जो सुबह उठना अच्छी आदत मानते हैं वे भी बहुत जल्दी उठ जाते हैं। ऐसे में सुबह सुबह पानी भरने वालों के कारण सुबह देर तक सोने वाले की नींद में खलल तो पड़ता ही था। वहाँ सुबह सुबह इतना शोर मचता था कि लगता था कि हम सड़क पर सोए हुए हैं।
शायद ऐसी ही कोई समस्या उनके साथ भी रही हो। यदि वे कहते कि इतने बजे के बाद ही पानी भरो तो लोग उनकी सुनते थोड़े हैं। वैसे भी लोग किसी उपकार के बदले धन्यवाद कहने की बजाय उस उपकार को अपना अधिकार मानने लगते हैं। सो शायद उन्हें समस्या का यह दुखद निदान करना पड़ा हो।
घुघूती बासूती

Anil Pusadkar said...

वो सज्जन प्रोफ़ेसर है इसलिये मूर्ख तो नही कहूंगा मगर उन्हे मराठी मे अती शहाणा कहने से नही डरूंगा।

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर said...

महोदय को उच्चतम श्रेणी का मूर्ख और अपराधी माना जाना चाहिए।

swapandarshi said...

Ghughutiji se sahamat. I also feel that more than stupidity, it may be a simple solution to protect the peaceful environment of their house and unnecessary encroachment in their privacy.

most people have become very abusive to the things and resources, which they get for free.

Tarun said...

ऐसे लोगों को ही वास्तु शास्त्र के हिसाब से घर सजाने की और बनाने की चिंता रहती है, गरीब के लिये तो एक झोपड़ी कहीं भी कैसे भी लग जाये वो ही किस्मत है। पढकर साक्षर होने और समझदार होने में बहुत फर्क है। कुआँ बंद करके गलत किया है इसमें दो राय होनी नही चाहिये।

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी हो सकता है कि पानी के कारण हो सकता है वहाँ मछली बाजार जैसा महौल बन जाता हो और इससे उन्हें दिक्कत होती हो। खैर इस का कोई ना कोई हल निकल सकता था, कुआँ बंद करना इसकाभी कोई हल नही है।

संजय बेंगाणी said...

पढ़ लिख लेने और समझदार होने में फर्क है. कबीरदासजी अनपढ़ रहें होगें मगर पंडितों से ज्यादा समझदार थे.

वास्तुशास्त्री मिल जाए तो कान के नीचे बजाएं.

आशीष खण्डेलवाल (Ashish Khandelwal) said...

इस कुकृत्य के लिए प्रोफेसर साहब और वास्तुशास्त्री शास्त्री साहब को बहुत-बहुत बधाई.. कौन कहता है कि पढ़े लिखे लोग मूरख नहीं हो सकते..

ab inconvenienti said...

Ghughuti ji se sahmat.

COMMON MAN said...

जो लोग अपने आप पर विश्वास नहीं करते वे ही अन्य चीजों पर विश्वास करते हैं, सरिता जी से कुछ हद तक सहमत कि नेताओं से पूछे, लेकिन कुंआ बन्द कराना दुराग्रह.

राधिका बुधकर said...

ऐसे लोगो से क्षमा, क्योकि इनके ऐसे काम देखकर हँसी आती हैं .जिस कुए के जल से सबकी प्यास बुझती हो,वह अशुभ कैसे हो सकता हैं ?यह एक प्रकार की भीरु मानसीकता हैं और केवल स्वत: का विचार हैं . ज्ञान विज्ञानं से जुड़े व्यक्ति जब ऐसा कर सकते हैं तब अज्ञानियों को क्या कहा जाए .?वास्तु शास्त्री जी को क्या कहे उन्हें जो वास्तु के हिसाब से jo लगा होगा कहा होगा ,आख़िर उन्हें भी तो पैसे कमाने हैं .:-)

सागर नाहर said...

प्राध्यापकजी और वास्तुशास्त्री दोनों को सरे बाजार जूते लगाने चाहिये।
ऐसे लोग सम्मान के पात्र नहीं हो सकते।

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

'वास्तु' का मूल अर्थ एक ऐसे आवास से है जहाँ के रहवासी सुखी, स्वस्थ एवं समृद्ध हों। परिवार में मुखिया का सम्मान हो, सदगृहस्थ की सद् व्यवहार के कारण सदगति हो और भोजनकक्ष में भूख की अनुभूति, बैठककक्ष में सामूहिकता की भावना, अध्ययनकक्ष में जागरू कता, पूजास्थल में मन की एकाग्रता, शयनकक्ष में विश्राम की अनुभूति हो।
किन्तु वास्तु का जो एक वैदिक स्ववरूप है ओर जो आज के युग में प्रचलन में है,उसमें आकाश-पाताल का अन्तर है.
आपको जिस घटना का वर्णन किया है, उसमे 'वास्तुशास्त्र' का कोई दोष नहीं है. इससे तो उस कथित वास्तुशास्त्री एवं प्रोफैसर साहब की मूर्खता का ही आभास हो रहा है.

पंकज बेंगाणी said...

ये वास्तुशाष्त्री और फेंगसुइए किसी का भला नही करने खुद को छोड के.

लोग ही बेवकुफ हैं.