Sunday, February 1, 2009

यह मध्यप्रदेश भाजपा सरकार की सदाशयता है या नाकामी??

Bharat Bhawan Culture Politics & BJP

1982 में चार्ल्स कोरिया द्वारा डिजाइन किया हुआ “भारत भवन” भोपाल ही नहीं बल्कि समूचे देश की एक धरोहर है। इस के मूलतः चार प्रखण्ड हैं, “रूपंकर” (फ़ाइन आर्ट्स का म्यूजियम), “रंगमण्डल” (नाटकों हेतु), “वागर्थ” (कविता और साहित्य सम्बन्धी लायब्रेरी) और “अनहद” (शास्त्रीय और लोक संगीत का पुस्तकालय)। कला और संस्कृति के विकास और साहित्य के प्रचार-प्रसार की गतिविधियों में लगे हुए इस संस्थान के बारे में पहले भी कई सकारात्मक और नकारात्मक खबरें आती रही हैं। ताजा खबर यह है कि “वागर्थ” के अन्तर्गत भारत भवन से एक आलोचनात्मक पत्रिका निकलती है “पूर्वग्रह”, इसे नये कलेवर के साथ पुनः प्रकाशित किया जा रहा है और इसका लोकार्पण 4 फ़रवरी को दिल्ली में डॉ नामवर सिंह करेंगे।




राज्य में चलने वाले किसी भी प्रकार के संस्थान में जब कोई गतिविधि होती है तो उसमें राज्य सरकार का हस्तक्षेप भले ही न हो लेकिन उसकी जानकारी में उस गतिविधि या उससे सम्बन्धित कार्यकलापों की जानकारी उच्च स्तर तक होती ही है और होना चाहिये भी। चूंकि भारत भवन सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों का केन्द्र है और इसके कर्ताधर्ता अन्ततः सरकार के ही नुमाइन्दे होते हैं, चाहे वे प्रशासकीय अधिकारी हों या कोई अन्य। जब इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश के संस्कृति मंत्री लक्ष्मीकान्त शर्मा से फ़ोन पर चर्चा हुई तो उन्हें इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी। यानी कि 4 फ़रवरी को भारत भवन द्वारा आयोजित दिल्ली में होने वाले एक विशेष समारोह और पुस्तक विमोचन की जानकारी मंत्री जी को 31 जनवरी तक नहीं दी गई या नहीं पहुँची, यह घोर आश्चर्य का विषय है।

उल्लेखनीय है कि डॉ नामवर सिंह खुले तौर पर भाजपा-संघ की विचारधारा के आलोचक और भारतीय संस्कृति को पानी पी-पीकर कोसने वालों में से हैं। अब सवाल उठता है कि जब मध्यप्रदेश में भाजपा की सरकार है तो “वागर्थ” द्वारा आयोजित लोकार्पण समारोह में नामवर सिंह जैसे व्यक्ति को मुख्य अतिथि के रूप में बुलाने और महिमामण्डित करने का क्या औचित्य है? क्या इससे नामवर सिंह भाजपा-संघ से खुश हो जायेंगे? या फ़िर भाजपा शासित सरकारें अपनी छवि(?) सुधारने के लिये ऐसी कोई भीषण सदाशयता दिखा रही हैं कि वे अपने घोर विरोधियों को भी सम्मान देने में नहीं हिचक रहीं? या, क्या भाजपा सरकार में नौकरशाही-अफ़सरशाही इतनी मनमानी करने लगी है कि प्रदेश के संस्कृति मंत्री को ही कार्यक्रम की जानकारी नहीं दी गई? क्या कांग्रेसियों और कम्युनिस्टों के किसी कार्यक्रम में संघ की विचारधारा वाले किसी व्यक्ति को बुलाया जाता है? यदि नहीं, तो फ़िर नामवर सिंह, राजेन्द्र यादव, खुशवन्त सिंह, शबाना आजमी आदि जैसे घोषित रूप से संघ विरोधी लोगों के प्रति भाजपा के मन में प्रेम क्यों उमड़ना चाहिये?

भाजपा विरोधियों को सुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन आम लोगों खासकर संघ और भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता से बात कीजिये तो अक्सर उनका यह दर्द उभरकर सामने आता है कि भाजपा की सरकार में संघ के जमीनी कार्यकर्ताओं के मामूली ट्रांसफ़र जैसे वाजिब काम ही नहीं हो पाते, जबकि कांग्रेसी व्यक्ति, कैसी भी सरकार हो, अपना गैरवाजिब काम भी करवा लेते हैं। इसे क्या कहा जाये? भाजपा का कांग्रेसीकरण, कार्यकर्ताओं के त्याग की उपेक्षा या प्रशासनिक नाकामी? भाजपा का यही रवैया भारतीय संस्कृति के बारे में भी है, जब वे सत्ता से बाहर होते हैं तब हिन्दू विरोधी पाठ्यक्रमों, पुस्तकों, पेंटिंग्स आदि पर खूब विरोध जताते हैं, लेकिन सत्ता में आते ही याददाश्त गुम हो जाती है।

मई 2007 में भारत भवन में चित्रकार कैलाश तिवारी की चित्र प्रदर्शनी लगी थी, जिसमें गोधरा के ट्रेन जलाये जाने की एक पेंटिंग थी। स्थानीय मुस्लिम संगठनों ने विरोध किया और प्रदर्शनी बन्द कर दी गई। आगामी 13 फ़रवरी को भारत भवन का वार्षिकोत्सव होने जा रहा है, उसमें एक कवि सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, पता चला है कि उसमें से 70% कवि कम्युनिस्ट विचारधारा वाले हैं, और अब नामवर सिंह से “पूर्वग्रह” का विमोचन करवाने जैसी हरकत… ऐसा क्यों किया जा रहा है और हो कैसे रहा है, यही सोच-सोचकर हैरानी होती है, कि इसका क्या अर्थ निकाला जाये?

मैं जानता हूँ कि इस लेख के विरोध में कई कथित “संस्कृति प्रेमी” उठ खड़े होंगे और कला-संस्कृति-साहित्य में किसी राजनैतिक हस्तक्षेप या तथाकथित राजनैतिक दखल-अंदाजी के विरोध की मुद्रा अपनाने की कोशिश करेंगे, लेकिन जेएनयू के कम्युनिस्ट हों, ICHR से पैसा लेकर विकृत भारतीय इतिहास लिखने वाले हों या जमाने भर के नकली फ़ाउण्डेशनों के द्वारा “संस्कृति” की सेवा(?) करने वाले हों, वे खुद जानते हैं कि वे भीतर से कितने खोखले हैं। दुःख तो इस बात का है कि सत्ता का फ़ायदा उठाकर कम्युनिस्ट और कांग्रेसी तो अपनी विचारधारा फ़ैलाने वालों को प्रश्रय देते हैं, खुलेआम अनुदान देते हैं, विभिन्न हिन्दू विरोधी और संघ विरोधी संस्थाओं को पैसा देते हैं, जबकि भाजपा दूसरी बार पूर्ण बहुमत मिलने के बावजूद भारत भवन जैसी संस्था के कार्यक्रम में “भारतीयता विरोधी व्यक्ति” को प्रमुखता दे रही है…। इस समय जबकि देश एक वैचारिक लड़ाई के दौर से गुजर रहा है, ऐसे वक्त में भाजपा को अपने बौद्धिक और वैचारिक समर्थकों को आगे बढ़ाना चाहिये या किसी और को? या फ़िर संघ कार्यकर्ताओं, भाजपा समर्थक बुद्धिजीवियों, लेखकों का काम सिर्फ़ सभाओं में दरियाँ उठाना और भूखे पेट गाँव-गाँव जाकर प्रचार करना भर है? इतनी छोटी सी बात मेरे जैसा अदना व्यक्ति समझाये, यह उचित नहीं है…


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14 comments:

ई-गुरु राजीव said...

चित्रकार कैलाश तिवारी का लिंक सही कर दें. मैंने उनकी पेंटिंग देखी. जो सच का प्रतिबिम्ब है जिसे हर कोई भुला देने और दबा देने पर आमादा है. यह सही बात है कि पुरानी और बैर फैलाने वाली बातें भूल कर जीवन में आगे देखना चाहिए पर उन गोल टोपी वालों से मैं डरता हूँ क्योंकि वे सर्व धर्म-समभाव से ही विरोध करते हैं. विहिप, आरएसएस तक मुसलमानों को भारत में रहने की छूट देता है पर हमारे मुसलमान भाई ही हमसे नफरत करेंगे तो कैसे काम चलेगा.
मैं नहीं कहता कि उनको भारत की सर्व धर्म सम भाव की संस्कृति अपना लेनी चाहिए, पर यह ज़रूर कहूँगा कि इस दारुल-हर्ब और.. (ठीक पता नहीं) यह नफरत वाला धर्म भूलना ही होगा वरना यह देश नहीं चल पायेगा.
मैं नहीं कहता कि हिंदुत्व की (वसुधैव कुटुम्बकम) की धारणा को आप अपना लें पर यह तो अवश्य ही कहूँगा कि सिर्फ़ अपने-आप को ही सबसे बड़ा धर्म मानने वाले और किसी और धर्म की बात को हराम समझने वाले कम से कम इंसान बनकर सोचें कि क्या सही और क्या ग़लत है.

sareetha said...

बेवजह की चों-चों मचाना बंद कीजिए । दिल्ली की गद्दी तक पहुंचना है या नहीं । अब गैरों से तो कह नहीं सकते । अपनों को ही हलाल करना पडेगा । अब तक दरियां उठाई हैं आगे सौ - दो सौ साल और उठा लेंगे । लेकिन इन नाशुक्रों का तो भला हो ही जाएगा । भई हम लोग तो बचपन से महाराणा प्रताप की खुद्दारी की गाथा सुन - सुन कर ही बडे हुए हैं ,जी लेंगे घास की रोटी खाकर जंगलों में ,बीहडों में जाकर .....। इस त्याग से इन बेचारों की पीढियां तर जाती हैं ,तो हर्ज़ ही क्या है ।
शहीदों की चिता पे लगेंगे हर बरस ही मेले ,
वतन पे मरने वालों का यही अंजाम होता है ।
आज जो है सो है , बाद में सम्मान मिलना तय जानिये.......!??????

Anil Pusadkar said...

भाजपाईयो के साथ ये बड़ी दिक्कत है जब अपना राज होता है तो वे अपनो को छोड़ बाकी सब को संतुष्ट करने मे लगे होते हैं और जब उनका राज नही होता तो दूसरे लोग भाजपाईयो को छोड़ बाकी सबका ख्याल रखते हैं।

विष्णु बैरागी said...

कुर्सी पर काबिज बने रहने के लिए क्‍या-क्‍या नहीं करना पडता?
एब्‍सल्‍यूट पावर करप्‍ट्स एब्‍सल्‍यूटली।
कुर्सी के लिए सबने क्‍या-क्‍या नहीं किया? धुर विरोधियों ने आंलिंगनबध्‍द हो सरकारें बनाईं। बस, अब किसी दिन भाजपा-कांग्रेस की संयुक्‍त सरकार नजर आ जाए तो चौंकिएगा नहीं।

राज भाटिय़ा said...

आप का लेख बहुत अच्छा लगा, लेकिन मुझे इन सब के बारे इतना पता नही इस लिये मै तो यही कहुगां यह सब चोर है ओर मुसेरे भाई है.
धन्यवाद

mahashakti said...

भाजपा ने कभी अपनो का हित नही किया, नामवर जैसे देशद्राहियो का सम्‍मान करने की अपेक्षा अपने राष्‍ट्रभक्‍तों का उद्भव किया होता तो आज भाजपा केन्‍द्र में सत्‍तासीन होती।

ab inconvenienti said...

कांग्रेस गाँधी के राजनीती में प्रादुर्भाव से पहले भी स्वतंत्रता आन्दोलन में सबसे प्रमुख दल थी, १९२० के आसपास अवसरवादी और संदिग्ध लोगों देखा की आज़ादी दूर नहीं है, और आज़ादी के बाद कांग्रेस ही सत्ता संभालेगी, तो आसपास जमावडा लगाना शुरू कर दिया. और कभी सुभाष, तिलक, पटेल जैसे देशभक्तों पर गर्व कर सकने वाला संगठन आज महाभ्रष्ट और देशद्रोही चरित्र अपना चुका है.

बस भाजपा का भी कांग्रेसीकरण हो रहा है, इसमें भी समर्पित संघियों की जगह मौकापरस्तों ने ले ली है, आम प्रचारक हाशिये पर चला गया है. यह भाजपा के भी पतन और देशद्रोहीकरण की शुरुआत है. परिवारवाद, तुष्टिकरण और बाहुबली संस्कृति की शुरुआत हो ही चुकी है.

संजय बेंगाणी said...

मैं मौन हूँ.

Zakir Ali 'Rajneesh' (S.B.A.I.) said...

गम्‍भीर एवं सार्थक चिन्‍तन।

COMMON MAN said...

बस मौन को छोड़कर सभी से सहमत.आंखें खुलना चाहिये.

विवेक सिंह said...

काफी कुछ नया जान पाते हैं आपको और सरिता जी को पढकर !

रंजना said...

बड़ा ही अफसोसजनक है.पता नही किस भय से ग्रसित हो ये इस तरह तुष्टिकरण के प्रयत्न में संलग्न हो जाते हैं.

आनंद said...

महोदय, इससे नामवर सिंह को बुलाकर क्‍या कोई उनका ‍मान बढ़ाएगा। बल्कि नामवर सिंह के आने से स्‍वयं उस कार्यक्रम का ‍मान बढ़ जाएगा। यह तो बुलाने वाला ही जाने कि उसने क्‍या सोचकर नामवर सिंह को बुलाया, परंतु इस कार्य से भारतीयता या पूरी विचारधारा को खतरा कैसे हो गया? और वह भी तब, जब आप जैसे ओजस्‍वी लेखक मौजूद हैं? किसी एक व्‍यक्ति को बड़ी कुरसी पर बिठा देने पर छोटी कुरसी वाले व्‍यक्ति की विचारधारा छोटी नहीं हो जाती। और रही बात किसी भी धारा के लेखकों, कवियों को सम्‍मान मिलने की, तो उन्‍हें यथासंभव मान सम्‍मान मिलना चाहिए, इसके अलावा उनके पास है भी क्‍या? गनीमत है विमोचन किसी नेता के हाथों नहीं हो रहा है।

Science Bloggers Association of India said...

आपने एक गम्भीर एवं महत्वपूर्ण मुददे पर कलम चनाई है। किन्तु चूंकि इस विषय में हमारी ज्यादा जानकारी नहीं है, इस लिए मौन रहना ज्यादा उचित है।