Friday, January 2, 2009

“बाज़ार” की शक्तियाँ “एक दिन का धर्मान्तरण” करने में सफ़ल हैं…

New Year Celebration Marketing & Hindu Traditions

उज्जैन स्थित महाकालेश्वर का मन्दिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और इसका खासा महत्व माना जाता है। यहाँ प्रातःकाल 4 बजे होने वाली “भस्मार्ती” (भस्म-आरती) भी प्रसिद्ध है जिसके लिये देश-विदेश से श्रद्धालु पहुँचते हैं। इस भस्मार्ती में रोज शामिल होने वाले 100 लोगों के अलावा बाहर से आने वालों के लिये 100 विशेष पास जारी किये जाते हैं। गत कुछ वर्षों से देखने में आया है कि 31 दिसम्बर की रात (या कहें कि 1 जनवरी को तड़के) की भस्मार्ती के लिये बहुत भीड़ होने लगी है। श्रद्धालुओं(?) का कहना है कि नववर्ष के पहले दिन का प्रारम्भ वे महाकालेश्वर के दर्शन करने के बाद ही करना चाहते हैं। इस वर्ष भीड़ को देखते हुए उज्जैन जिला प्रशासन ने बाहरी 100 लोगों के अलावा भी थोड़े पास वितरित करने की योजना रखी थी, लेकिन भक्तों(?) की भारी भीड़ के चलते 23 दिसम्बर को ही पास समाप्त हो गये और मन्दिर प्रशासन को लोगों को भस्मार्ती के पास के लिये मना करना पड़ा, जो कि गर्भगृह की क्षमता को देखते हुए उचित कदम था। 23 दिसम्बर से लेकर 31 दिसम्बर तक भक्तों(?) और श्रद्धालुओं(?) ने पास के लिये जुगाड़ लगाईं, जोड़-तोड़ किये, प्रशासनिक अधिकारियों पर दबाव डलवाये, और फ़िर भी कुछ वीवीआईपी अपने रुतबे का जलवा दिखाते हुए भस्मार्ती वाली सुबह मन्दिर में “विशेष गेट और विशेष पास” से घुसने में कामयाब रहे… इस तमाम भूमिका की वजह यह प्रश्न हैं कि “बेजा और ठसियलपने की हद तक जाकर पास जुगाड़ कर नववर्ष के पहले दिन सूर्योदय से पहले ही महाकालेश्वर के दर्शन करने की यह जिद आखिर क्यों?”… क्या इसी खास दिन “इतनी नाजायज़ मेहनत”(?) से सबसे पहले भगवान के दर्शन करने से कोई विशेष पुण्यलाभ मिलने वाला है?… और सबसे बड़ा सवाल तो यही है कि क्या यह भारत का अथवा हिन्दुओं का नववर्ष है भी?… साफ़तौर पर नहीं। यह दिन तो विशुद्ध रूप से ईसाई नववर्ष है, ईस्वी सन् है। हैदराबाद से प्राप्त समाचारों के अनुसार तिरुपति बालाजी के मुख्य पुजारियों श्री एमवी सौंदाराजन और सीएस गोपालकृष्ण ने बाकायदा एक अपील जारी करके धर्मालुओं(?) को आगाह किया कि ईसाई नववर्ष के इस मौके पर मन्दिर में खामख्वाह भीड़ न बढ़ायें, इस दिन किसी भी प्रकार की विशेष आरती आदि नहीं की जायेगी और न ही मन्दिर के पट खुलने-बन्द होने के समय में बदलाव किया जायेगा। दोनो पुजारियों ने स्पष्ट कहा कि हिन्दुओं का नववर्ष 1 जनवरी से नहीं शुरु होता, तेलुगू लोगों का नववर्ष “उगादि” पर तथा केरल का नववर्ष “विसू” के तौर पर मनाया जाता है, इसलिये ख्रिस्ती नववर्ष के दिन प्रार्थना करने से कोई विशेष आध्यात्मिक लाभ नहीं होने वाला है। इतना सब कुछ बताने के बावजूद कई धर्मालु(?) 1 जनवरी को अलसुबह मन्दिर में भीड़ करने पहुँच गये थे।

भारत के विभिन्न भागों में विभिन्न धर्म समूहों के नववर्ष अलग-अलग मनाये जाते हैं, फ़िर भी सामान्य तौर पर अप्रैल माह में पड़ने वाला गुड़ी पड़वा (चैत्र शुक्ल प्रथमा) को हिन्दू नववर्ष माना जाता है, इसी प्रकार मुस्लिमों का हिजरी सन और पारसियों आदि के नववर्ष भी साल में अलग-अलग समय पर आते हैं। फ़िर यह ईस्वी सन् को धूमधड़ाके से मनाने की यह परम्परा भारत (और कुछ हद तक समूचे विश्व) में क्यों बढ़ रही है? यदि विश्लेषण किया जाये तो इसके पीछे बाजार की शक्तियाँ प्रमुख होती हैं, जिन्होंने विभिन्न प्रसार माध्यमों के जरिये समूचे विश्व में यह स्थापित कर दिया है कि 1 जनवरी ही नववर्ष है और इसे “धूमधाम से मनाया” जाना चाहिये। जाहिर है कि जिस तरह से वेलेन्टाईन डे, पेरेण्ट्स डे, मदर्स डे, फ़ादर्स डे आदि “कुकुरमुत्ते” दिनोंदिन अपने पैर पसारते जा रहे हैं, उसके पीछे मानसिकता सिर्फ़ और सिर्फ़ “बाजार” है। तर्क देने वाले कह सकते हैं कि आखिर इसमें क्या खराबी है, यदि इस बहाने लोग उत्सवप्रियता का आनन्द लेते हैं और बाजार में पैसे का चलन बढ़ता है तो इसमें क्या बुराई है? सही बात है, कोई बुराई नहीं है… 1 जनवरी जरूर जोरशोर से मनाओ, लेकिन इसके लिये गुड़ी पड़वा को भूलना जरूरी है क्या? जितना धूमधड़ाका, शोरशराबा, हो-हल्ला, पटाखे आदि 31 दिसम्बर की रात को किया जाता है क्या उसका दस प्रतिशत भी हिन्दू नववर्ष को किया जाता है? जितने उल्लास से और अनाप-शनाप पैसा खर्च करके 31 दिसम्बर मनाया जाता है, क्या “उगादि” भी वैसा मनाया जाता है? हिन्दू नववर्ष कब से शुरु होता है इसकी जानकारी का सर्वे किया जाये तो चौंकाने वाले आँकड़े निकल सकते हैं। क्या प्रकारान्तर से यह “एक दिन का धर्मान्तरण” नहीं है? सवाल ये नहीं है कि 1 जनवरी की “मार्केटिंग” सही तरीके से की गई है इसलिये यह अधिक लोकप्रिय है, बल्कि सवाल यह है कि क्या मार्केटिंग कम्पनियाँ अपना माल नहीं बेचेंगी तो हम अपना पारम्परिक धार्मिक नववर्ष भी भूल जायेंगे? दारू पीने और मुर्गे खाने को मिलता है इसलिये 31 दिसम्बर याद रखा जायेगा और चूँकि रात-बेरात लड़कियों के साथ घूमने का मौका नहीं मिलेगा इसलिये गुड़ी पड़वा को भूल जायेंगे? 200 साल की अंग्रेजी मानसिक गुलामी ने धीरे-धीरे भारत की जनता को सांस्कृतिक रूप से खोखला कर दिया है।

2009 साल पहले हुई एक घटना के आधार पर आज समूचा विश्व नववर्ष मनाता है, पश्चिम की अंधी नकल करने में माहिर हम भारतवासी भी देखादेखी ईस्वी नववर्ष मनाने लगे हैं। ऐसे-ऐसे गाँव-कस्बों में भी ढाबों-होटलों आदि में जश्न मनाये जाने लगे हैं जहाँ न तो बिजली ठीक से मिलती है, न ही ढंग की सड़क उपलब्ध है, लेकिन फ़िर भी अंधी दौड़ में सब मिलकर बहे जा रहे हैं, क्या 2009 वर्ष पहले इस दुनिया में कुछ था ही नहीं? या 2009 वर्ष पहले दुनिया में न पंचांग थे, न ही काल गणना की जाती थी? जिस प्रकार धर्म परिवर्तन करने के बाद व्यक्ति उस धर्म के त्यौहारों, परम्पराओं को अपनाने लगता है, उसी प्रकार “बाजार” की शक्तियाँ भारत में “एक दिन का धर्मान्तरण” करने में सफ़ल होती हैं। बच्चे-बूढ़े-जवान सभी देर रात तक एक दूसरे को “हैप्पी न्यू ईयर” कहते पाये जाते हैं, ये और बात है कि इनमें से 20% भी गुड़ी पड़वा को “नूतन वर्ष की शुभकामनायें” कहते हुए नहीं दिखाई देते। क्या सिर्फ़ 200 साल की अंग्रेजी गुलामी और 60 साल की आज़ादी(??) में हमारा इतना सांस्कृतिक क्षरण हो गया? कि हम “अपने” ही त्यौहार भूलने लगे हैं। और यदि वाकई में पश्चिम की नकल करना है तो उनकी समय की पाबन्दी की करो, अधिकार के साथ-साथ नागरिक कर्तव्यों के निर्वहन की नकल करो, उनके छोटे-छोटे कानूनों के पालन की नकल करो, उनके सफ़ाईपसन्द व्यवहार की नकल करो, उनके कतार में खड़े रहने की नकल करो… लेकिन भारत के अकर्मण्य और पलायनवादी लोग आसान काम की नकल करते हैं, कठिन काम की नहीं, और आसान काम है पश्चिम की देखादेखी फ़लाने-डे, ढिमाके-डे और न्यू ईयर की फ़ूहड़ डांस पार्टियों की नकल।

अन्तिम पंच लाईन - हिन्दुओं में ही सर्वाधिक धर्मान्तरण क्यों होता है इसका जवाब अगले दो सवालों में है – 1) कितने मुस्लिम हैं जो इस “अंग्रेजी नववर्ष के उपलक्ष्य में” मस्जिदों में विशेष नमाज अदा करने जाते हैं? 2) भारत में कितने चर्च हैं जहाँ गुड़ी पड़वा या उगादि के दिन विशेष घंटियाँ बजाई जाती हैं? ज़रा सोचिये कि हम कहाँ जा रहे हैं… आप कितने ही दरियादिल, कितने ही “सेकुलर”(?), कितने ही “सर्वधर्मसमभाववादी” क्यों न हों, “यदि आप मौसी को माँ कहना चाहते हैं तो शौक से कहें, लेकिन ‘माँ’ को न भूलें…”


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23 comments:

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

यही बात शिवरात्रि और सोमवार के लिए कही जाए तो भी उतनी ही ठीक है। मैं तो सोमवार शंकर जी के, मंगलवार हनुमान जी के और बुधवार गणेश जी के मंदिर जाना ही पसंद नहीं करता। इतने लोग आते हैं कि उन्हें याद ही नही रहता कौन आया और कौन नहीं?

आड़े दिन मंदिरों में गिनती के दर्शनार्थी पहुंचते हैं तो उन्हें पता भी रहता है कि भक्त ने आड़े दिन भी याद किया।

फिर महाकालेश्वर में हो, या फिर मेरे मुहल्ले में, या फिर मेरे घर में शिवलिंग तो एक प्रतीक ही है न उस एक का। कहीं कोई विशेष पुण्य नहीं मिलता। महाकालेश्वर के महत्व की बार बार स्थापना भी तो बाजारवाद का ही एक भाग है।

किसी मंदिर में हादसा किसी नववर्ष के दिन नहीं होता वह किसी हिन्दू पर्व के दिन ही होता है। इसलिए मंदिरों में पास की क्या जरूरत है। जो भक्त पहले पहुंच कर लाइन में पहुंच जाए वह दर्शन करे। बाकी बाहर रहें। जरा इन वीआईपी और वीवीआईपी की परीक्षा तो हो कि वे लाइन में खड़े रहने की कितनी ताकत रखते हैं?

उज्जयनी तो भर्तृहरि की भूमि है। और वे कहते हैं कि वह तो चिन्मात्र मूर्तये है। फिर क्यों लोग मंदिरों के चक्कर लगाते हैं। सब धर्मों के सारे धार्मिक कर्मकांड बाजारवाद ही हैं। अपितु उस से भी आगे हमें मानसिक गुलाम बना देने के औजार भी हैं।

दीपक भारतदीप said...

ासच बात तो यह है कि हमारे किसी पौराणिक ग्रंथोें में किसी धर्म का नाम नहीं हैं क्योंकि उचित आचरण को ही धर्म माना गया है। ऐसे में आज सवाल यह है कि धर्म के शीर्षक के तहत लोगों का समूहों को मान्यता कैसे और कब दी गयी? इसका उद्देश्य क्या था? यह अनुसंधान का विषय है और इसमें आपकों बाजार ही नजर आयेगा भले ही वह उस समय इस आधुनिक स्वरूप में नहीं था।
दीपक भारतदीप

sareetha said...

बाज़ार जो ना कराए सो कम । आज दूरदर्शन न्यूज़ ने समाचार दिखाया कि सीहोर के गणेश मंदिर में नये साल के मौके पर महाआरती का आयोजन किया गया । विघ्नहर्ता से देश से आतंकवाद खत्म करने की मांग की गई । साथ में पुजारी महाराज की बाइट भी थी । अब देश की कानून व्यवस्था का भार भी भगवानों के कंधों पर आ पडा है । लेकिन पुजारी की भी क्या गलती ...? कुछ साल पहले तक जिस मंदिर की धूल भी नहीं झडती थी , अब प्रचार और बाज़ार ने थाल भर - भर के नोटों के चढावे लाना शुरु कर दिया है , हर रोज़ ...। ज़ाहिर सी बात है पुजारी आपकी सुने या घर बैठे झमाझम आती लख्श्मी की ....।
बंद करिए ये भारतीयता का दावा .... लोगों को कमा खाने दीजिए । वरना आप पर हिंदूवादी ही पिल पडेंगे ।

प्रवीण शर्मा said...
This comment has been removed by the author.
प्रवीण शर्मा said...

भारत के अधिकतर तथाकथित पढ़े लिखे लोग वर्ष के १२ भारतीय महीनो का नाम गिना दे इसमे मुझे अपार शक है. मंदिरों में १ जनवरी के भीड़ तो भेड़िया -धसान संस्कृति का एक प्रदर्शन मात्र है.

Shashwat Shekhar said...

गुड़ी पड़वा (चैत्र शुक्ल प्रथमा) को नववर्ष मानने के लिए भारत के सभी प्रांत के लोग राजी हों तब तो!!! ये राजी न होना भी १ जनवरी को नववर्ष मानने का कारण है, ठीक वैसे ही जैसे हिन्दी, तमिल, तेलुगु की लड़ाई में इंग्लिश बाजी मार लेती है!

salim said...

मै नेपाल से हुं। एक बार इन्दौर गया था, वहा से महाकालेश्वर के दर्शन की इच्छा जगी। रात को पहुचते ही दर्शन किए। फिर सुबह सुबह वहां पहुंचे और लाईन मे खडे हो गए। लेकिन लाईन मे खडे सैकडो लोगो को अन्दर प्रवेश नही दिया गया। अन्दर शायद विशेष पास वालो को दर्शन उपल्ब्ध कराया जा रहा था। हमने वहां खडे पुलिस से शिकायत की तो उसने भी अशभ्यतापुर्वक व्यवहार किया। हमने भी लाईन मे खडे खडे "हर हर महादेव" के नारे लगाने शुरु किया और काफी देर तक हम लोगो की अवाज से मन्दिर परिसर गुंजता रहा। फिर कुछ देर बाद लाईन को अन्दर जाने दिया गया। महाकालेश्वर के दर्शन कर मन खुशी से भर गया। निश्चित ही यह एक अतयंत प्राचिन मन्दिर है जिसे विधर्मियो ने नष्ट करने का अनेक प्रयास किया लेकिन आज भी वह गौरवपुर्ण रुप मे हम भक्तो के दर्शन के लिए उपलब्ध है। रही बात एक जनवरी को दर्शन की इच्छा की, इसे धर्मानतरण तो नही कहा जा सकता। ............ एक जानकारी दे दुं। नेपाल मे सरकारी एवम निजी सभी कार्यो के लिए विक्रम संबत ही प्रचलित है। लेकिन विदेशी आइ.एन.जी.ओ की मदत से सुनियोजित रुप से विक्रम संबत का विरोध कराया जा रहा है ताकी नेपाल पर भी वह बिलायती कैलेण्डर लादा जा सके ।

राज भाटिय़ा said...

सब कुछ गडवड है सुरेश जी, अब भगवान भी पास ओर वी पी आई लोगो को ही दर्शन देते है? हम मै से ९०% लो दिखावे की जिन्दगी, जिसे सीधे शब्दो मै गुलामी की जिन्दगी जिते है, जिन्हे पता ही नही आजादी क्या है, जिन्दगी क्या है, पुजा कया है, अब ऎसे लोगो को क्या हिन्दू ओर क्या ईसाई, इन्हे हि दिखावा करना है, करे.
धन्यवाद.
कुछ समय पहले आप का लिंक नही खुल रहा था.

प्रकाश बादल said...

भाई को नव वर्ष की हार्दिक शुभकामनाएं।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

भारतीय अस्मिता को पुन: स्थापित करने के लिये साहसिक कदमोँ की आवस्यकता है आँतरिक विग़्हटन बढाने वाले मुद्दोँ से ज्यादा
एक और अखँड भारत के सर्वोदय पर लक्ष्य रख कर आपसी विनय , कर्मठता और ठोस दिशा मेँ आगे बढने से सी भारत को अपनी
गरिमा प्राप्त होगी - उसीके प्रयास किये जायेँ वही सही दिशा होगी - ईसाई कैलेँन्डर आज के आधुनिक समय का हिस्सा बन गया है
इसका ये मतलब नहीँ कि आगे बढते हुए भारत को और ज्यादा सुद्रढ और सशक्त बनाने क प्रयास ना किये जायेँ - उस दिशा मेँ भी
सोचना और अमल करना अनिवार्य और हितवाह होगा -
- लावण्या

RDS said...

सुरेश जी, आपने हमारे मन की बात कह दी | धर्म के नाम पर कर्मकांड और कर्मकांड के नाम पर प्रदर्शन तथा छलावा ; बस यही कुछ शेष है मंदिरों में हिन्दुत्व के नाम पर | मुझे इसमे देश के मूर्ख और पाखंडी (तथाकथित ) भक्तों से अधिक पुरोहितों का दोष दीख पङता है जो इसे बढावा देते हैं | सदा की तरह इस बार भी उन्ही की निजी लोलुपता वैदिक धर्म के मर्म को लील रही है |

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

‘महाजनों येन गता स पन्थः’ जैसा हमारे अग्रगण्य करते हैं उसी को आदर्श मार्ग मान सामान्य जन व्यवहार करनें लगते हैं। हिन्दू समाज को दिशा दिखानें वाले और दशा सुधारनें वाले आज खुद ही किंकर्तव्यविमूढ़ हुए पड़े हैं। अधिकांश बड़े मन्दिरों और धार्मिक संस्थानों पर शासन का नियन्त्रण है। शासन सत्ता पर विराजमान हैं अधार्मिक,सेक्युलर और ढ़ोंगी,जो चुनाव अभियान तो प्रारंभ करेंगे रामजन्म भूमि से और सर्वोच्चन्यायालय में राम के अस्तित्व को ही नकारेगे।

जब चाहे सरकार, शंकराचार्य को उठा जेल में ड़ाल दे हम तथाकथित हिन्दू उफ भी न करेंगे। द्वादश ज्योतिर्लिंगों के उद्धारक आदि शंकर की परंपरा के शंकराचार्य की जब यह हैसियत है तो आम हिन्दू तो सिर्फ रिआया है और ज्यादा से ज्यादा वोट। हिन्दू अपनें ही धर्मस्थानों को अपनीं जनाकाँक्षाओं के अनुरुप संचालित नहीं कर सकते हैं। धर्म और समाज का बड़ा ही अन्तरंग अन्योन्याश्रित समबन्ध है,बाजार उसी समाज की एक इकाई है। परिवार से कटे हुए के लिए ईष्ट देव,परिवार से जुड़े हुए के लिए ईष्ट के साथ कुल देव और समाज से सरोकार रखनें वालों को ईष्ट,कुल के साथ ग्राम देव की अवधारणा है। सामूहिकता का धर्म,धर्म की एक विशिष्टता है।

गाय,भैस,घोड़ा,शेर,चीता और भी ढ़ेर सारे पशु-पक्षी जो हिन्दुस्तान की सीमा में रहते,विचरण करते हैं, ‘फार आल प्रैक्टिकल एण्ड़ लीगल परपज़ेज’ हिन्दुस्तान की सम्पत्ति और इसीलिए हिन्दुस्तानी कहे जाँएगे लेकिन क्या वह ‘हिन्दू’ भी कहे जाँएगे? हिन्दुस्तान के जितनें भी नागरिक हैं क्या सब हिन्दू कहे जा सकते हैं,और कहनें पर क्या वह मान भी जाएँगे? जो हिन्दू रिचुअल्स और सेकरामेन्ट्स नहीं मानता या तदनुरूप आचरण नहीं करता उसे आप क्या कहेंगे? कुछ यह कह सकते हैं कि वो संविधान को मानते हैं लेकिन क्या संविधान को माननें वाला हर व्यक्त्ति हिन्दू कहा जाएगा या कहलाना पसंद करेगा?

महाकालेश्वर में ब्राह्ममुहूर्त में सम्पन्न की जानेंवाली भस्मार्ती जलती हुई चिता की ताजी गर्म भस्म से होती है जो एक तांत्रिक प्रकिया है,जिसके अपनें निहितार्थ और फलितार्थ हैं। इसीलिए गर्भगृह में सभी जाऎं, न उसकी आवश्यकता है और न ही स्थान। सुरेश जी एक साथ आपनें बहुत से कन्ट्राड़िक्ट्री प्रश्न खड़े कर दिये परिणामतः वैसी ही अजब गजब टिप्पड़ियाँ-सच मानिये मुझे दुःख हुआ,क्या अपना धर्म इतना निकृष्ट है???क्या कमियों को सुधारनें,सजानें और संवारनें में हमारी आप की कोई भूमिका नहीं हो सकती?

वरुण जायसवाल said...

सुरेश जी यह कहना कि १ जनवरी विशुद्ध रूप से ईसाई नववर्ष है , ग़लत बात लगती है |
यह तो ग्रेगोरियन कैलैंडर के हिसाब से वर्ष का प्रारम्भ है , हाँ सबसे पहले इसे ईसाई लोंगों ने अवश्य अपनाया था |
बाजार सरलता चाहता है | सारी दुनिया इसी कारण ग्रेगोरियन कैलैंडर को अपना रही है | अजी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा जैसी पुरानी
गणनाएं आज के समय के हिसाब से पूर्णतया अनुचित हैं | दुनिया कि आबादी बढ़कर ६.६ अरब हो गई है | ऐसी आबादी का पेट भरने के लिए जो संसाधन पैदा करने पड़ेंगे वो इस झोलदार गणना पर आधारित समय के हिसाब से कैसे चलेंगे |
ये सब बातें धर्म को कूप मंडूकता की ओर ले जाती हैं | १ जनवरी मनाने से मेरा हिंदुत्व कमजोर नहीं होगा बल्कि और संमृद्ध
हिंदू को ही जन्म देगा ताकि बेमतलब के पंडे - पुजारियों से गणना से छुट्टी तो मिली | अगर आप हिंदू नववर्ष को लोंगो की स्मृति में बरकरार रखना चाहते हैं तो उसके बाजारीकरण अर्थात सरलीकरण के तरीके बताइए ,लेकिन वहां तो दिन को पक्ष के हिसाब से विभाजित कर भेदभाव ही किया जाता है | वैसे तो हम नववर्ष के पहले दिन रंग खेलकर ( चैत्र कृष्ण प्रथमा अर्थात होली ) सर्वाधिक उल्लास से नया साल शुरू कर सकते हैं लेकिन उसे कृष्ण पक्ष कहकर इन धर्म के ठेकेदारों ने मान्यता नही दी | खैर अब मेरे साथ -साथ दुनिया भी १ जनवरी ही मना रही है , |

अविनाश वाचस्पति said...

कहना आपका सही है
गहना जिंदगी का यही है
सच कहो सच सुनो
सच ही बुनो।

जिसे अच्‍छा लगे वो पहने
बाकी को दें सिर्फ दूर रहने
हम तो आपके पास आए हैं
आपके सुर में अपना सुर मिलाये हैं।

मिले सुर मेरा तुम्‍हारा
तो कीबोर्ड कल्‍याण करेगा।

अविनाश वाचस्पति said...

कहना आपका सही है
गहना जिंदगी का यही है
सच कहो सच सुनो
सच ही बुनो।

जिसे अच्‍छा लगे वो पहने
बाकी को दें सिर्फ दूर रहने
हम तो आपके पास आए हैं
आपके सुर में अपना सुर मिलाये हैं।

मिले सुर मेरा तुम्‍हारा
तो कीबोर्ड कल्‍याण करेगा।

lata said...

भारत के अकर्मण्य और पलायनवादी लोग आसान काम की नकल करते हैं...yahi sach hai.

संजय बेंगाणी said...

हमें बाहरी मंजूर है, अपना वाला नहीं. हमारी मानसिकता दास वाली है, जो सदा रहेगी.

दुसरा पहलू, लोग मन्दीर जा रहे थे, चर्च नहीं.

आशीष कुमार 'अंशु' said...

हमारे अतुल भाई भी यही बात कहते हैं ... नव वर्ष में एक दूसरे को बधाई देना ग़लत नहीं है लेकिन अपनी संस्कृति को भूलना भी ठीक नहीं है.
एक सुंदर पोस्ट के लिए आभार ...

रंजना said...

अत्यन्त सशक्त सटीक और सार्थक इस पोस्ट हेतु आपका बहुत बहुत आभार. शब्दशः सहमत हूँ आपसे. लगता है आपने मेरे ही मन कि बात कह डाली. इससे बेहतर और क्या कहा जा सकता था.
साधुवाद.

हो सकता है लोग इसे सकारात्मक ढंग से न लें.पर इससे हतोत्साहित न होइएगा.

इस आलेख का उद्देश्य विशुद्ध रूप से यह बताना है कि मौसी को माँ बनने कि धुन में हम अपनी माँ को बिसराए जा रहे हैं.
किसी भी संस्कृति की अच्छी बातों को अपनाना ग़लत नही है,ग़लत अपनी संस्कृति की अच्छी बातों को भुलाना है.

makrand said...

bahut sahi likha aapne yahi satya he

COMMON MAN said...

अपनी जड़ों से परिचित ही नहीं हैं भारतवासी, जो अपनी संस्कृति को जानते ही नहीं, वह क्या सनातन धर्म को पहचानेंगे, मैं यह जानता हूं कि हिन्दू सिर्फ व्यापारी बन गया है, मन्दिर जाकर माथा टेकने से कोई हिन्दू नहीं बन जाता, इनमें से ९५ प्रतिशत लोग उस जगह खड़ा होना भी पसन्द नहीं करते जहां हिन्दुओं के साथ किये जा रहे भेदभाव की बात की जाती है तो ऐसे लोगों को सिर्फ व्यापारी ही कहा जा सकता है.

ANIL KANT said...

suresh ji mein aapki baat se kuchh had tak sehmat hoon kintu kya kabhi khud hinduon ke saamanya varg ke logo ne jaati pratha kam karne ki koshish ki......aapko pata to hoga hi ki aaj bhi ek general category ki shadi SC/ST se possible nahi.....aur agar hum fir bhi antar jateey vivaah jaisi baat karte hain to kis had tak sahi hain.....

aaj bhi anusoochit jaati aur anusoochit jan jaati ke sath abhadra vyavhar, balatkar, unhe dabana aam baat hai jahaan unki nahi chalti.

agar Dr. B.R. Ambedkar reservation ka concept na laaye hote to aaj bahut buri haalat hoti.

waise gareebi ek sabse bada kaaran hain dharm parivartan ke liye.

muslim isliye dharm parivartan nahi karte kyunki woh bahut kattar panthi hain.


aur hum hinduo ne hindutva ke peechhe jaat paat aur oonch neech ke alava kiya hi kya hai.

agaar aisa nahi hai to bihaar aur jhaarkhand mein kitni baar SC/ST ka CM bana hai.

ye ek bahut bada mudda hai....aur isme gareebi sabse bada kaaran hai....
jab unke pass khana nahi , kapda nahi aur siksha nahi to unhe kya samjh aayega aur kitna woh samjhenge.

पंगेबाज said...

अकेले सारी दुनिया ,मे केवल हिंदू ही २००० साल गुलाम रहे कबी मुस्लिमो के कभी अग्रेजो के . और इसी मे उन्हे फ़क्र महसूस होता रहा है. यहा भी आधे लोगो ने आपकी भावना को ना समझ मंदिरो का विरोध कर डाला आप बात खेत खि कर रहे थे भाई लोग खलिहान पर अपनी अपनी राय दे रहे है.
शायद हिंदुओ के इतने सारे अलग अलग पुजन देख कर बाल गंगा धर तिलक ने हिंदुओ मे सर्वपूजित देव श्री गणेश का महोत्सव शुरू कराया जो अब महाराष्ट्र की सीमाओ से बाहर निकल चुका है. वाकई मे आपकी बात चिंतित कर देने काबिल और चिंतन लायक है . हमारे मंदिरो के महंतो ने मंदिरो को अपनी जागीर और कमाई का जरिया बना डाला है . इसके लिये हमे गुरू घर यानी गुरुद्वारो की तरह ही मंदिरो को जनसाधारण के लिये खोलना उनके हर किसी को आश्रम मिले ऐसी प्रथा चालू करनी होगी तभी हिंदू धर्म को मंदिरो से एक बडा संबल मिलेगा . तभी मंदिर आस्था का सच्चा केंद्र बन सकेगे