Tuesday, January 27, 2009

हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-2)

Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

इस लेख के पहले भाग का मकसद सिर्फ़ यहूदियों का गुणगान करना नहीं है, बल्कि यह सोचना है कि आखिर यहूदी इतने शक्तिशाली, बुद्धिमान और मेधावी क्यों हैं? ध्यान से सोचने पर उत्तर मिलता है – “शिक्षा”। इतनी विशाल जनसंख्या और दुनिया के सबसे मुख्य ऊर्जा स्रोत पेट्रोल पर लगभग एकतरफ़ा कब्जा होने के बावजूद मुसलमान इतने कमजोर और पिछड़े हुए क्यों हैं? ऑर्गेनाईज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कॉन्फ़्रेंस यानी OIC के 57 सदस्य देश हैं, उन सभी 57 देशों में कुल मिलाकर 600 विश्वविद्यालय हैं, यानी लगभग तीस लाख मुसलमानों पर एक विश्वविद्यालय। अमेरिका में लगभग 6000 विश्वविद्यालय हैं और भारत में लगभग 9000। सन् 2004 में एक सर्वे किया गया था, जिसमें से टॉप 500 विश्वविद्यालयों की सूची में मुस्लिम देशों की एक भी यूनिवर्सिटी अपना स्थान नहीं बना सकी। संयुक्त राष्ट्र से सम्बन्धित एक संस्था UNDP ने जो डाटा एकत्रित किया है उसके मुताबिक ईसाई बहुल देशों में साक्षरता दर 90% से अधिक है और 15 से अधिक ईसाई देश ऐसे हैं जहाँ साक्षरता दर 100% है। दूसरी तरफ़ सभी मुस्लिम देशों में कुल साक्षरता दर 40% के आसपास है, और 57 मुस्लिम देशों में एक भी देश या राज्य ऐसा नहीं है जहाँ की साक्षरता दर 100% हो (हमारे यहाँ सिर्फ़ केरल में 90% के आसपास है)। साक्षरता के पैमाने के अनुसार ईसाई देशों में लगभग 40% साक्षर विश्वविद्यालय तक पहुँच जाते हैं जबकि मुस्लिम देशों में यही दर सिर्फ़ 2% है। मुस्लिम देशों में प्रति दस लाख व्यक्तियों पर 230 वैज्ञानिक हैं, जबकि अमेरिका में यह संख्या 4000 और जापान में 5000 है। मुस्लिम देश अपनी कुल आय (GDP) का सिर्फ़ 0.2 प्रतिशत शिक्षा पर खर्च करते हैं, जबकि ईसाई और यहूदी 5% से भी ज्यादा।

एक और पैमाना है प्रति 1000 व्यक्ति अखबारों और पुस्तकों का। पाकिस्तान में प्रति हजार व्यक्तियों पर कुल 23 अखबार हैं, जबकि सिंगापुर जैसे छोटे से देश में यह संख्या 375 है। प्रति दस लाख व्यक्तियों पर पुस्तकों की संख्या अमेरिका में 2000 और मिस्त्र में 20 है। उच्च तकनीक उत्पादों के निर्यात को यदि पैमाना मानें पाकिस्तान से इनका निर्यात कुल निर्यात का सिर्फ़ 1.5 प्रतिशत है, सऊदी अरब से निर्यात 0.3% और सिंगापुर से 58% है।

निष्कर्ष निकालते समय मुसलमानों की बात बाद में करेंगे, पहले हमें अपनी गिरेबान में झाँकना चाहिये। 1945 में दो अणु बम झेलने और विश्व बिरादरी से लगभग अलग-थलग पड़े जापान और लगभग हमारे साथ ही आजाद हुए इज़राइल आज शिक्षा के क्षेत्र में भारत के मुकाबले बहुत-बहुत आगे हैं। आजादी के साठ सालों से अधिक के समय में भारत में प्राथमिक शिक्षा का स्तर और स्कूलों की संख्या जिस रफ़्तार से बढ़ना चाहिये थी वह नहीं बढ़ाई गई। आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।

भारत के लोग आज भी वही पुराना राग अलापते रहते हैं कि “हमने शून्य का आविष्कार किया, हमने शतरंज का आविष्कार किया, हमने ये किया था, हमारे वेदों में ये है, हमारे ग्रंथों में वो है, हमने दुनिया को आध्यात्म सिखाया, हमने दुनिया को अहिंसा का संदेश दिया, हम विश्व-गुरु हैं… आदि-आदि। हकीकत यह है कि गीता के “कर्म” के सिद्धान्त को जपने वाले देश के अधिकांश लोग खुद ही सबसे अकर्मण्य हैं, भ्रष्ट हैं, अनुशासनहीन और अनैतिक हैं। लफ़्फ़ाजी को छोड़कर साफ़-साफ़ ये नहीं बताते कि सन् 1900 से लेकर 2000 के सौ सालों में भारत का विश्व के लिये और मानवता को क्या योगदान है? जिन आईआईएम और आईआईटी का ढिंढोरा पीटते हम नहीं थकते, वे विश्व स्तर पर कहाँ हैं, भारत से बाहर निकलने के बाद ही युवा प्रतिभाएं अपनी बुद्धिमत्ता और मेधा क्यों दिखा पाती हैं? लेकिन हम लोग सदा से ही “शतुरमुर्ग” रहे हैं, समस्याओं और प्रश्नों का डटकर सामना करने की बजाय हम हमेशा ऊँची-नीची आध्यात्मिक बातें करके पलायन का रास्ता अपना लेते हैं (ताजा उदाहरण मुम्बई हमले का है, जहाँ दो महीने बीत जाने बाद भी हम दूसरों का मुँह देख रहे हैं, मोमबत्तियाँ जला रहे हैं, गाने गा रहे हैं, हस्ताक्षर अभियान चला रहे हैं, भाषण दे रहे हैं, आतंकवाद के खिलाफ़ शपथ दिलवा रहे हैं, गरज यह कि “कर्म” छोड़कर सब कुछ कर रहे हैं)। हमारी मूल समस्या यह है कि “राष्ट्र” की अवधारणा ही जनता के दिमाग में साफ़ नहीं है, साठ सालों से शिक्षा प्रणाली भी एक “कन्फ़्यूजन” की धुंध में है। सबसे बड़ी बात तो यह है कि आज तक हम “हिन्दू” नहीं बन पाये हैं, यानी जैसे यहूदी सिर्फ़ और सिर्फ़ यहूदी है चाहे वह विश्व के किसी भी कोने में हो, जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं, सब कुछ हैं लेकिन “हिन्दू” नहीं हैं। हालांकि मूलभूत शिक्षा और तकनीकी के मामले में हम इस्लामिक देशों से काफ़ी आगे हैं, लेकिन क्या हम उनसे तुलना करके खुश होना चाहिये? तुलना करना है तो अपने से ज्यादा, अपने से बड़े से करनी चाहिये…

संक्षेप में इन सब आँकड़ों से क्या निष्कर्ष निकलता है… कि मुस्लिम देश इसलिये पिछड़े हैं क्योंकि वे शिक्षा में पिछड़े हुए हैं, वे अपनी जनसंख्या को आधुनिक शिक्षा नहीं दिलवा पाते, वे “ज्ञान” आधारित उत्पाद पैदा करने में अक्षम हैं, वे ज्ञान को अपनी अगली पीढ़ियों में पहुँचाने और नौनिहालों को पढ़ाने की बजाय हमेशा यहूदियों, ईसाईयों और हिन्दुओं को अपनी दुर्दशा का जिम्मेदार ठहराते रहते हैं। सारा दिन अल्लाह और खुदा चीखने से कुछ नहीं होगा, शिविर लगाकर जेहादी पैदा करने की बजाय शिक्षा का स्तर बढ़ाना होगा, हवाई जहाज अपहरण और ओलम्पिक में खिलाड़ियों की हत्या करवाने की बजाय अधिक से अधिक बच्चों और युवाओं को शिक्षा देने का प्रयास होना चाहिये। सारी दुनिया में इस्लाम का ही राज होगा, अल्लाह सिर्फ़ एक है, बाकी के मूर्तिपूजक काफ़िर हैं जैसी सोच छोड़कर वैज्ञानिक सोच अपनानी होगी। सभी मुस्लिम देशों को खुद से सवाल करना चाहिये कि मानव जीवन और मानवता के लिये उन्होंने क्या किया है? उसके बाद उन्हें दूसरों से इज्जत हासिल करने की अपेक्षा करना चाहिये। इजराईल और फ़िलीस्तीन के बीच चल रहे युद्ध और समूचे विश्व में छाये हुए आतंकवाद के मद्देनज़र बेंजामिन नेतान्याहू की यह टिप्पणी महत्वपूर्ण है कि “यदि अरब और मुसलमान अपने हथियार रख दें तो हिंसा खत्म हो जायेगी और यदि यहूदियों ने अपने हथियार रख दिये तो इज़राइल खत्म हो जायेगा…”।

[सन्दर्भ और आँकड़े : डॉ फ़ारुख सलीम (फ़्री लांस पत्रकार, इस्लामाबाद)]

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23 comments:

संजय बेंगाणी said...

मैं भारतीय और हिन्दू हूँ, मुझे यह कहते हुए दुख होता कि हम निक्कमे और बेईमान है.

अगर समाजवाद कि सनक लागू न होती तो आज भारत अलग ही होता.

डॉ .अनुराग said...

विचारपूर्ण आलेख है ....कही कही असहमति हो सकती है फ़िर भी कुछ बातो को नकारा नही जा सकता

P.N. Subramanian said...

संजय जी को ही हम भी दोहराना चाहेंगे. मश्तिश्क में झंकार पैदा करने वाला लेख. आभार.

संजय बेंगाणी said...

एक बात जो लेख में गलत लगी वह है सीखने सीखाने की बात करना. यह जरा कठीन कार्य है. अब धरना-प्रदर्शन करके, मोमबत्तियाँ जला कर, हाय-हाय थूथू कर और लिख कर, अपनी दशा के लिए दुसरों को दोष कर ही काम बनता हो तो कोई क्यों परिश्रम करे?

दीपक कुमार भानरे said...

आपकी इस बात से सहमत हूँ की भारतीय शिक्षा को भारतीय संस्कृति और परिवेश के अनुरूप न होकर मुगलों और अंग्रेजों की घिसी पिटी पढ़ी लिखे नौकर पैदा करने वाली होना .
साथ ही इस बात से की गीता के कर्म के सिद्धांत वाले देश मैं लोगों का अकर्मण्य और अनैतिक और अनुशाशंहीन होना यही कारण है की आज भारत आतंकिवादी हमले होने के बाद सिर्फ़ कोरी लाफ्वाजी कर रहा है बजाय जमीनी स्तर की बाजिब कार्यवाही करने के . ये दो मुख्या बातें बहुत ही सटीक है भारत के सन्दर्भ मैं .
बहुत ही मेहनत से लिखा गया बहुत ही अच्छा और सार्थक लेख है . बधाई .

पंगेबाज said...

मैं भारतीय और हिन्दू हूँ, मुझे यह कहते हुए दुख होता कि हम निक्कमे और बेईमान है.

अगर समाजवाद कि सनक लागू न होती तो आज भारत अलग ही है
अब कहने को बचा ही क्या है

COMMON MAN said...

हिन्दू व्यापारी बन चुका है, हर काम नफा नुकसान देख कर करता है, वहीं मुसलमान कट्टरता की ओर बढ़ते जा रहे हैं, ऊपर से यह कि भागीदारी करने की जगह भाग मांग रहे हैं. आपका लेख युक्तियुक्त और तर्क संगत है.

विनय said...

बहुत ध्यान से पूरा लेख पढ़ा, बिल्कुल सही कह रहे हैं, हमें पहले हिन्दू बनना होगा बाद में और कुछ्! पर प्रश्न यह है कि यह होगा कैसे? प्रश्न है समानता आयेगी कैसे? बहुत से मूर्ख कहते हैं आरक्षण ख़त्म कर दो, यह समानता लाने में बाधक है! पर चलो एक पल को यह ख़्त्म कर भी दें तो तुम ऊँची जाति के हो, तुम नीचि जाति के हो, यह भेद कैसे ख़्त्म हो! आपकी ही लाइनों से जबकि हम ब्राह्मण हैं, बनिये हैं, ठाकुर हैं, दलित हैं, उत्तर वाले हैं, दक्षिण वाले हैं... समानता जब तक मन से नहीं आती तब तक कुछ नहीं हो सकता! आरक्षण यह क्या, एक आवह्न है कि आओ आगे बढ़कर जो किसी कारणवश पीछे रह गया उसे भी अपने साथ कर लो, लेकिन क्या आज़ादी के 60 साल बाद भी यह भावना किसी दिल में साँस लेती है, उत्तर है नहीं! ऐसा क्यों अन्दर का अहम कि अगर हम पीछे वाले को आगे लायेंगे तो वह हमारे बराबर हो जायेगा और हम फिर नीचा किसे दिखायेंगे!

आशा यह टिप्पणी हटायेंगे नहीं

रंजना said...

आपके सभी लेख सहेज कर रखे जाने योग्य हैं.......पूर्ण सहमत हूँ आपसे......शब्दशः सही लिखा है आपने.
इतने सारगर्भित सटीक और महत आलेख हेतु साधुवाद और आभार...

Shastri said...

प्रिय सुरेश,

छोटे भाई, तुम्हारी कलम एवं तुम्हारा विश्लेषण एकदम गजब है. यदि प्रभु इस तरह के 100 देशभक्त चिट्ठाकार आज पैदा कर दें तो वाकी में सन 2025 तक देश में वैचारिक क्राति आ जायगी.

निम्न प्रस्तावना से मैं शत प्रतिशत सहमत हूँ:

"आधुनिक शिक्षा के साथ संस्कृति के मेल से जो शिक्षा पैदा होना चाहिये वह जानबूझकर नहीं दी गई, आज भी स्कूलों में मुगलों और अंग्रेजों को महान दर्शाने वाले पाठ्यक्रम ही पढ़ाये जाते हैं, बचपन से ही ब्रेन-वॉश करके यह बताने की कोशिश होती है कि भारतीय संस्कृति नाम की कोई बात न कभी थी, न है। शुरु से ही बच्चों को “अपनी जड़ों” से काटा जाता है, ऐसे में पश्चिम की दुनिया को जिस प्रकार के “पढ़े-लिखे नौकर” चाहिये थे वैसे ही पैदा हो रहे हैं, और यहाँ से देश छोड़कर जा रहे हैं।"

हम बच्चे थे तब "इतिहास" की पुस्तक में सबसे बडी बातों के रूप में कोलंबस एवं वास्को डि गामा के बारे में पढाया जाता था. मतलब यह कि यूरोप के सामंतवादियों ने अपनी लूटखसोट जारी रखने के लिये जो असान समुद्री रास्ते ढूंढ निकाले वे इतिहास की महान उपलब्धियां है!!

लज्जा की बात है कि आजाद भारत में (1960 से 71 के बीच)करोडों विध्यार्थीयों को यह पढाया गया. इसी लिये तो अब भी हम लोग सफेद चमडी वाले लुटेरों की संतानों को देखते हैं तो उनके चरणों में लोट जाते हैं एवं बोलती भूल जाते हैं.

लिखते रहो -- वैचारिक क्राति के बिना देश असली आजादी नहीं पा सकेगा.

सस्नेह -- शास्त्री

jayram said...

bilkul satya bola hai ................jab bhi ham kamjor padte hain to wahi purani sanskriti ki gaurawpurna atit ko yaad kar aatmwibhor hote hain.aap to pichhle 100 saal ki baat karte hain main to kahta hoon 5win - 6thi shatabdi ke baad hamne kisi bhi field main apne liye kichh nahi kiya , aaj bhi amerika aur briten aadi ki technology se lekar arthwyawstha ki dekhrekh ka jimma hamare hi bhartiy mastishk ke hathon main hai ... isse purw ka jo gyan bahar gaya wahi aaj wapas ghum-phir kar nawinikrit roop main lakar bade hi khush hote hain..............
ab charcha is baat ki ho ki aakhir aisa kyun hua ?
chahe jis karan se rahi ho, hamare yahan is dauran bahya shasan hi raha .......aajadi ke baad bhi is disha main jyada badlaw nahi hua .....ek se ek diggaj hue to msahi par ......sarkar aur hamari laparwahi ne unhe kho diya .......
gumnaam ganitagya washisth narayan singh pagal khane main sad rahe hain.......to wahi tathagat jaise adbhut balak ko america ki sharan main jana pada.......aise anek udahran .......hamare samne hain....

विवेक सिंह said...

विचारपूर्ण आलेख ! धन्यवाद !

कार्तिकेय said...

आदरणीय चिपलूनकर जी,
आपकी लगभग सभी बातों से पूर्ण सहमत हूँ. विशेषकर इस बात पर कि सबसे पहले राष्ट्र के बारे में सोचो फिर किसी और बारे में.

लेकिन सवाल अपनी जगह है, कि कितने लोग अपने जातीय , सामजिक, या मानसिक पूर्वाग्रहों को त्यागकर वस्तुतः राष्ट्र के बारे में सोचने को तैयार हैं..? यूपी का ब्राह्मण या तो एनडी तिवारी को वोट देता था या अब सतीश चन्द्र मिश्र के नाम पर मायावती को. उसने कभी कांग्रेस या बसपा को वोट दिया ही नहीं. इसी तरह दलितों ने मायावती को वोट दिया न कि आंबेडकर के विचारों को. क्षत्रियों ने राजा भैया जैसे गुंडों या अमर सिंह जैसे दलालों को चुना. मुस्लिमों के पास शिया-सुन्नी-अहमदिया-पठान जिसे विकल्प नहीं थे इसलिए वे गैर-बीजेपी, संभव हुआ तो गैर-हिन्दू को वोट देते आये.

और समस्या यह है कि यह प्रवृत्ति घटने के बजाय बढती जा रही है, यहाँ तक कि पढ़ा लिखा तबका या तो वैचारिक क्रांति से अछूता रहना चाहता है या उन्ही मध्ययुगीन विचारों में मुब्तिला.. आसार बहुत उम्मीद नहीं जगाते..

sareetha said...

लेख विचारोत्तेजक है ,लेकिन इसे शिक्षा से जोड कर देखना ठीक नहीं । किताबी ज्ञान हासिल करने भर से कुछ नहीं हो सकता । कुछ करने के लिए जज़्बा चाहिए, कोरे जज़्बातों से बात नहीं बनती । दूसरी बात ...देश का हर शख्स दूसरे के कंधे पर बंदूक रख कर चलाना चाहता है । हर आदमी क्रांति की मशाल तो थामना चाहता है लेकिन चिंगारी सुलगाने भर में हाथ कांपने लगते हैं । आप ही की पोस्ट पर एक टिप्पणी है ,जो ईश्वर से 100 देशभक्त पैदा करने की प्रार्थना कर रहे हैं । लेकिन देशभक्तों के टोले से खुद को अलग रखकर ....! वाह जनाब ...? देशभक्त तो पैदा हों लेकिन दो घर छोडकर ,ताकि पुलिसिया पूछताछ तक की आंच ना आ सके कभी । ध्न्य है ये प्राचीन सभ्यता का देश और धन्य हैं भारत वासी ।

Anil Pusadkar said...

बेबाक,दमदार और ईमानदार कलम को प्रणाम्।

अशोक मधुप said...

बहुत विचारपूर्ण लेख।
लेख के समर्थन मे किसी की कविता..
कब तक हथेलियों को फैलाकर रेखाआें से भविष्य जानोंगे।
भविष्य जानने के लिए खुली हुई हथेलियों की नही, तनी हुई बंद मुटृठियों की जरूरत होती है।।

अशोक मधुप said...

बहुत विचारपूर्ण लेख।
लेख के समर्थन मे किसी की कविता..
कब तक हथेलियों को फैलाकर रेखाआें से भविष्य जानोंगे।
भविष्य जानने के लिए खुली हुई हथेलियों की नही, तनी हुई बंद मुटृठियों की जरूरत होती है।।

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी बहुत सुंदर लिखा आप ने एक दम से सटिक, मेने एक दो बार सोचा कि कुछ ऎसा लिखूं जिस से हम सब की आंखे खुले, हमे अपने ओर दुसरो के बारे पता चले, लेकिन कुछ सोच कर रुक गया,ओर आज आप का लेख पढ कर मुझे लगा जेसे मेरे दिल की आवाज आप ने सुन कर अपनी सुनहरी कलम से यह कुछ यहां लिख दिया, बहुत बहुत धन्यवाद.
काश ज्यादा से ज्यादा लोग इसे पढे.

Swabhimaan said...

kya aap swabhimaan ke sadasya banna chahenge?

http://swabhimaan2008.blogspot.com

अभिषेक ओझा said...

कमाल का लेख है... शत प्रतिशत सहमत.

Dr Prabhat Tandon said...

बहुत ही वैचारिक और ओजपॄर्ण लेख .

ई-गुरु राजीव said...

बस नतमस्तक होने के अतिरिक्त कुछ कह पाने की स्थिति में नहीं हूँ. यही कुछ बातें आपके लेख, आपके व्यक्तित्व की श्रेष्ठता को परिलक्षित करती हैं.

SACHIN JAIN said...

मैं हिन्दू हूँ, हिन्दू हूँ मैं, मन की मैं करता ही जाऊं,
सर्वश्रेष्ठ हूँ मैं, हर पंथ (religion) को मैं सर्वश्रेष्ठ ही पाऊँ,

http://sachinjain7882.blogspot.com/2008/10/blog-post_11.html