Sunday, January 25, 2009

हिन्दुओं और मुसलमानों को यहूदियों से सीखना चाहिये… (भाग-1)

Muslims-Hindus Take a Lesson from Jews

विश्व की कुल आबादी में से यहूदियों की संख्या लगभग डेढ़ करोड़ है, जिसमें से लगभग 70 लाख अमेरिका में रहते हैं, 50 लाख यहूदी एशिया में, 20 लाख यूरोप में और बाकी कुछ अन्य देशों में रहते हैं… कहने का मतलब यह कि इज़राईल को छोड़कर सभी देशों में वे “अल्पसंख्यक” हैं। दूसरी तरफ़ दुनिया में मुस्लिमों की संख्या लगभग दो अरब है जिसमें से एक अरब एशिया में, 40 करोड़ अफ़्रीका में, 5 करोड़ यूरोप में और बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं, इसी प्रकार हिन्दुओं की जनसंख्या लगभग सवा अरब है जिसमें लगभग 80 करोड़ भारत में व बाकी के सारे विश्व में फ़ैले हुए हैं… इस प्रकार देखा जाये तो विश्व का हर पाँचवा व्यक्ति मुसलमान है, प्रति एक हिन्दू के पीछे दो मुसलमान और प्रति एक यहूदी के पीछे सौ मुसलमान का अनुपात बैठता है… बावजूद इसके यहूदी लोग हिन्दुओं या मुसलमानों के मुकाबले इतने श्रेष्ठ क्यों हैं? क्यों यहूदी लोग इतने शक्तिशाली हैं?

प्रख्यात वैज्ञानिक अल्बर्ट आईन्स्टीन एक यहूदी थे, प्रसिद्ध मनोविज्ञानी सिगमण्ड फ़्रायड, मार्क्सवादी विचारधारा के जनक कार्ल मार्क्स जैसे अनेकों यहूदी, इतिहास में अपना नाम दर्ज करा चुके हैं जिन्होंने मानवता और समाज के लिये एक अमिट योगदान दिया है। बेंजामिन रूबिन ने मानवता को इंजेक्शन की सुई दी, जोनास सैक ने पोलियो वैक्सीन दिया, गर्ट्र्यूड इलियन ने ल्यूकेमिया जैसे रोग से लड़ने की दवाई निर्मित की, बारुच ब्लूमबर्ग ने हेपेटाइटिस बी से लड़ने का टीका बनाया, पॉल एल्हरिच ने सिफ़लिस का इलाज खोजा, बर्नार्ड काट्ज़ ने न्यूरो मस्कुलर के लिये नोबल जीता, ग्रेगरी पिंकस ने सबसे पहली मौखिक गर्भनिरोधक गोली का आविष्कार किया, विल्लेम कॉफ़ ने किडनी डायलिसिस की मशीन बनाई… इस प्रकार के दसियों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जिसमें यहूदियों ने अपनी बुद्धिमत्ता और गुणों से मानवता की अतुलनीय सेवा की है।

पिछले 105 वर्षों में 129 यहूदियों को नोबल पुरस्कार मिल चुके हैं, जबकि इसी अवधि में सिर्फ़ 7 मुसलमानों को नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से चार तो शान्ति के नोबल हैं, अनवर सादात और यासर अराफ़ात(शांति पुरस्कार??) को मिलाकर और एक साहित्य का, सिर्फ़ दो मेडिसिन के लिये हैं। इसी प्रकार भारत को अब तक सिर्फ़ 6 नोबल पुरस्कार मिले हैं, जिसमें से एक साहित्य (टैगोर) और एक शान्ति के लिये (मदर टेरेसा को, यदि उन्हें भारतीय माना जाये तो), ऐसे में विश्व में जिस प्रजाति की जनसंख्या सिर्फ़ दशमलव दो प्रतिशत हो ऐसे यहूदियों ने अर्थशास्त्र, दवा-रसायन खोज और भौतिकी के क्षेत्रों में नोबल पुरस्कारों की झड़ी लगा दी है, क्या यह वन्दनीय नहीं है?

मानव जाति की सेवा सिर्फ़ मेडिसिन से ही नहीं होती, और भी कई क्षेत्र हैं, जैसे पीटर शुल्ट्ज़ ने ऑप्टिकल फ़ायबर बनाया, बेनो स्ट्रॉस ने स्टेनलेस स्टील, एमाइल बर्लिनर ने टेलीफ़ोन माइक्रोफ़ोन, चार्ल्स गिन्सबर्ग ने वीडियो टेप रिकॉर्डर, स्टैनली मेज़ोर ने पहली माइक्रोप्रोसेसर चिप जैसे आविष्कार किये। व्यापार के क्षेत्र में राल्फ़ लॉरेन (पोलो), लेविस स्ट्रॉस (लेविस जीन्स), सर्गेई ब्रिन (गूगल), माइकल डेल (डेल कम्प्यूटर), लैरी एलिसन (ओरेकल), राजनीति और अर्थशास्त्र के क्षेत्र में येल यूनिवर्सिटी के अध्यक्ष रिचर्ड लेविन, अमरीकी सीनेटर हेनरी किसींजर, ब्रिटेन के लेखक बेंजामिन डिज़रायली जैसे कई नाम यहूदी हैं। मानवता के सबसे बड़े प्रेमी, अपनी चार अरब डॉलर से अधिक सम्पत्ति विज्ञान और विश्व भर के विश्वविद्यालयों को दान करने वाले जॉर्ज सोरोस भी यहूदी हैं। ओलम्पिक में सात स्वर्ण जीतने वाले तैराक मार्क स्पिट्ज़, सबसे कम उम्र में विंबलडन जीतने वाले बूम-बूम बोरिस बेकर भी यहूदी हैं। हॉलीवुड की स्थापना ही एक तरह से यहूदियों द्वारा की गई है ऐसा कहा जा सकता है, हैरिसन फ़ोर्ड, माइकल डगलस, डस्टिन हॉफ़मैन, कैरी ग्राण्ट, पॉल न्यूमैन, गोल्डी हॉन, स्टीवन स्पीलबर्ग, मेल ब्रुक्स जैसे हजारों प्रतिभाशाली यहूदी हैं।

इसका दूसरा पहलू यह है कि हिटलर द्वारा भगाये जाने के बाद यहूदी लगभग सारे विश्व में फ़ैल गये, वहाँ उन्होंने अपनी मेहनत से धन कमाया, साम्राज्य खड़ा किया, उच्च शिक्षा ग्रहण की और सबसे बड़ी बात यह कि उस धन-सम्पत्ति पर अपनी मजबूत पकड़ बनाये रखी, तथा उसे और बढ़ाया। शिक्षा का उपयोग उन्होंने विभिन्न खोज करने में लगाया। जबकि इसका काला पहलू यह है कि अमेरिका स्थित हथियार निर्माता कम्पनियों पर अधिकतर में यहूदियों का कब्जा है, जो चाहती है कि विश्व में युद्ध होते रहें ताकि वे कमाते रहें। जबकि मुस्लिमों को शिक्षा पर ध्यान देने की बजाय, आपस में लड़ने और विश्व भर में ईसाईयों से, हिन्दुओं से मूर्खतापूर्ण तरीके से लगातार सालों-साल लड़ने में पता नहीं क्या मजा आता है? यहूदियों का एक गुण (या कहें कि दुर्गुण) यह भी है कि वे अपनी “नस्ल” की शुद्धता को बरकरार रखने की पूरी कोशिश करते हैं, अर्थात यहूदी लड़के/लड़की की शादी यहूदी से ही हो अन्य धर्मावलम्बियों में न हो इस बात का विशेष खयाल रखा जाता है, उनका मानना है कि इससे “नस्ल शुद्ध” रहती है (इसी बात पर हिटलर उनसे बुरी तरह चिढ़ा हुआ भी था)।

(भाग-2 में जारी रहेगा…)

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22 comments:

नितिन व्यास said...

लेख अच्छा लगा। आपके लेख में क्षेत्र के आधार पर दी गई यहूदी जनसंख्या का कुल योग १.५ करोड से ज्यादा हो रहा है, ये लेख देखें।

Anil Pusadkar said...

अच्छा लिखा मगर संख्या का जोड़ गड़बड़ लग रहा है।गणतंत्र दिवस की शुभकामनाएँ भाऊ।

Suresh Chiplunkar said...

धन्यवाद व्यास जी और अनिल जी, गलती सुधारने की कोशिश की है… पोस्ट में सुधार दी है, लेकिन ब्लॉगवाणी हेडिंग में नहीं सुधर सकेगी अब… जनसंख्या के आँकड़ों को मैंने इतनी तवज्जो नहीं दी थी इसलिये जल्दी-जल्दी में लिख गया… लेख का असल मकसद कुछ और ही है… कभी-कभार चूक हो ही जाती है, लेकिन आप जैसे सुधी पाठक हों तो मुझे क्या चिन्ता, अपने-आप समझ ही लेंगे… :) :) :)

दिनेशराय द्विवेदी Dineshrai Dwivedi said...

आलेख अभी तक बहुत अच्छा है। लेकिन पूरा होने तक कोई भी प्रतिक्रिया करना उचित नहीं होगा। आप ने आलेख को दो भागों में बांट कर अच्छा किया इस से पाठक का ध्यान केन्द्रित रहता है।

AKSHAT VICHAR said...

जानकारी में ऐसी ही बढ़ोत्तरी करते रहिये अच्छा लगता है।

Gyan Dutt Pandey said...

मुझे तो प्रिय लगी आतंकी हमाज़ की ठुकाई!

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही सुंदर लेख, ओर एक अच्छी जानकारी, आप का पुरा लेख पढ कर ही बाकी बाते .
धन्यवाद

गणतंत्र दिवस की आपको हार्दिक शुभकामना !!

भारत मल्‍होत्रा said...
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Dr Prabhat Tandon said...

यहूदियों द्वारा किये गये योगदानों को जानकर अच्छा लगा । समाज मे उनकी उलटी तस्वीर ही दिखाई जाती रही है , आगे की कडी का बेसब्री से इंतजार रहेगा ।

Udan Tashtari said...

आपको एवं आपके परिवार को गणतंत्र दिवस पर हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाऐं.

Tarun said...

आलेख अच्छा शुरू किया है और जहाँ तक संख्या का सवाल है तो थोड़ा कम बाकि से कोई फर्क नही पड़ता, जो बात कहना चाहते थे वो समझ आ रही है।

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

ज्ञानवर्द्धक।

ab inconvenienti said...
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ab inconvenienti said...
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डॉ .अनुराग said...

एक विचारणीय तथ्य ...जिसे पूर्व में कही लेखको द्वारा कहा गया है .....जिसमे भारतीय विदेशी दोनों लेखक है ....अगली कड़ी का इंतज़ार रहेगा .

Meenu khare said...

मैं आपके लेखन कौशल की बहुत बड़ी फैन हूँ सुरेश जी .गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाए ............

संजय बेंगाणी said...

लेख पूरा होने पर पूरी प्रतिक्रिया.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

लेख जो आँखें खोले! बधाई...।
अगली कड़ी की प्रतीक्षा।

jayram said...

aapke aalekh se yahudion ka wishw wikas main yogdan ko samajhna aasan ho jata hai.aam taur par yahudion ka nam aate hi israil ka nam dimag main aata hai aur log gaja patti dhyan main aati hai ..........is lekh ko padhne ke baad logon ko ek naya najariya milega unke prati sochne ka ............waise ek baat to sabhi mante hain israil hi duniya ka ek akela rashtra hai jo 'vibrant 'hai...........
"vibrant nationalism "ka isse behtar udahran anyatra mushkil hai.. hame nishchit rup se sikhne ki jarurat hai .................

COMMON MAN said...

लेख तो बहुत सुन्दर है ही हमेशा की तरह. आंखे खोल देने वाला. जर्मनी में उनके साथ ठीक हुआ या गलत इसे तो जर्मनवासी ही ठीक राय दे सकते हैं. मैं इतना ही कहना चाहता हूं कि इजरायलियों से राष्ट्रप्रेम, खेती और कानून-व्यवस्था ही सीख ली जाये तो देश का कल्याण हो जाये.

विवेक सिंह said...

और तो और बॉलीवुड में एक फिल्म भी बन गई 'यहूदी' !
पर हिन्दू या मुसलमान तो फिल्म नहीं बनी !

Anand G.Sharma आनंद जी.शर्मा said...

यहूदियों को गाली देने वाले और उनका इस दुनिया से नामों निशान मिटा देने वाले लोगों को सबसे पहले यहूदियों द्वारा इजाद की गई सभी चीजों का इस्तेमाल तुरंत बंद कर देना चाहिए - उसके बाद बात करो !!!!