Saturday, January 31, 2009

कंधार के शर्मनाक समर्पण के पीछे का सच, और देश का आभिजात्य वर्ग…

Kandhar Hijack Indian Society and BJP

हाल ही में गृहमंत्री चिदम्बरम ने एक सेमिनार में कहा कि “कंधार घटना के वक्त कांग्रेस क्या करती” यह कहना बेहद मुश्किल है, क्योंकि वह स्थिति पेचीदा थी और उसमें कई प्रकार की भावनायें भी शामिल थीं, लेकिन इस सवाल से वे कन्नी काट गये कि क्या एनडीए द्वारा आतंकवादियों को छोड़ने के फ़ैसले में कांग्रेस भी शामिल नहीं थी?

आजादी के बाद भारत में सैकड़ों हिन्दू-मुस्लिम दंगे हो चुके हैं, और स्वाभाविक तौर पर लगभग सभी दंगे कांग्रेस शासित राज्यों में ही हुए हैं, लेकिन जिस तरह अकेले ईसा मसीह को सलीब ढोने पर मजबूर किया गया था, उसी तरह से गुजरात के 2002 के दंगों के लिये अकेले नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार मानकर मीडिया, सेकुलरों की गैंग(?) और तथाकथित पढ़े-लिखे लोग “रुदाली” बने हुए हैं, इस मानसिकता को सिर्फ़ “घृणित” कहना उचित नहीं है इसके लिये कोई और शब्द खोजना पड़ेगा… (इस विशेषण को नरेन्द्र मोदी और ईसा मसीह की तुलना नहीं माना जाये बल्कि उन पर पत्थर फ़ेंकने वाली हजारों मूर्खों की भीड़ पर कटाक्ष समझा जाये, जो आसानी से भारत के इतिहास के सभी दंगो को भुला चुकी है, जबकि गुजरात के दंगों को “बन्दरिया के मरे हुए बच्चे की तरह छाती से चिपकाए” हुए हैं…… मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताने भर से जिस प्रकार कई वरिष्ठ पत्रकारों(?), सेकुलरों(?) और वरिष्ठ ब्लॉगरों(?) के “पेट में मरोड़” उठी उस पर अलग से एक लेख लिखूँगा ही, लेकिन फ़िलहाल इस लेख का विषय मोदी नहीं है)… इसी प्रकार जब कभी आतंकवादियों से बातचीत या कोई समझौता होने की बात आती है तो तत्काल एनडीए के कंधे पर “कंधार” की सलीब रख दी जाती है… हालांकि कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें, खुद भाजपा वाले कंधार को अमिट कलंक मानते हैं, जबकि कांग्रेसी, सिख विरोधी दंगों और आपातकाल को भी कलंक नहीं मानते…) कहने का मतलब यह कि कंधार प्रकरण में जो भी हुआ शर्मनाक तो था ही, लेकिन इस विकट निर्णय के पीछे की घटनायें हमारे देश के “आभिजात्य वर्ग” का असली चेहरा सामने रखती हैं, (आभिजात्य वर्ग इसलिये कि नौ साल पहले एयरलाइंस में अमूमन आभिजात्य वर्ग के लोग ही सफ़र करते थे, आजकल मध्यमवर्ग की भी उसमें घुसपैठ हो गई है)… आईये देखते हैं कि कंधार प्रकरण के दौरान पर्दे के पीछे क्या-क्या हुआ, जिसके कारण भाजपा के माथे पर एक अमिट कलंक लग गया…। ऐसा नहीं है कि महान भारत के सार्वजनिक अपमान की घटनायें कांग्रेसियों के राज में नहीं हुईं, हजरत बल, चरारे-शरीफ़ प्रकरण हो या महबूबा मुफ़्ती के नकली अपहरण का मामला हो, कोई न कोई कांग्रेसी उसमें अवश्य शामिल रहा है (वीपी सिंह भी कांग्रेसी संस्कृति के ही थे), लेकिन कंधार का अपहरण प्रकरण हमेशा मीडिया में छाया रहता है और ले-देकर समूचा मीडिया, भाजपा-एनडीए के माथे पर ठीकरा फ़ोड़ता रहता है।

जिस वक्त काठमाण्डू-दिल्ली हवाई उड़ान सेवा IC814 का अपहरण हो चुका था, प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी दिल्ली से बाहर अपने तय दौरे पर थे। जब उनका विमान दिल्ली लौट रहा था उस समय विमान के एयरफ़ोर्स के पायलट को अपहरण की सूचना दी गई थी। चूंकि विमान हवा में था इसलिये वाजपेयी को इस घटना के बारे में तुरन्त नहीं बताया गया (जो कि बाद में विवाद का एक कारण बना)। जब शाम 7 बजे प्रधानमंत्री का विमान दिल्ली पहुँचा तब तक IC-814 के अपहरण के 1 घण्टा चालीस मिनट बीत चुके थे। वाजपेयी को हवाई अड्डे पर लेने पहुँचे थे राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार ब्रजेश मिश्र, जिन्होंने तत्काल वाजपेयी को एक कोने में ले जाकर सारी स्थिति समझाई। सभी अपहरणकर्ताओं की पहचान स्थापित हो चुकी थी, वे थे इब्राहीम अतहर (निवासी बहावलपुर), शाहिद अख्तर सईद, गुलशन इकबाल (कराची), सनी अहमद काजी (डिफ़ेंस कालोनी, कराची), मिस्त्री जहूर आलम (अख्तर कालोनी, कराची), और शाकिर (सक्खर सिटी)। विमान में उस वक्त 189 यात्री सवार थे।

प्रधानमंत्री निवास पर तत्काल एक उच्च स्तरीय समिति की मीटिंग हुई, जिसमें हालात का जायजा लिया गया, वाजपेयी ने तत्काल अपने निजी स्टाफ़ को अपने जन्मदिन (25 दिसम्बर) के उपलक्ष्य में आयोजित सभी कार्यक्रम निरस्त करने के निर्देश जारी किये। उसी समय सूचना मिली कि हवाई जहाज को लाहौर में उतरने की इजाजत नहीं दी गई है, इसलिये हवाई जहाज पुनः अमृतसर में उतरेगा। अमृतसर में विमान लगभग 45 मिनट खड़ा रहा और अपहर्ता विभिन्न अधिकारियों को उसमें तेल भरने हेतु धमकाते रहे, और अधिकारी “सिर कटे चिकन” की तरह इधर-उधर दौड़ते रहे, क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि इस स्थिति से निपटने के लिये क्या करना चाहिये। प्रधानमंत्री कार्यालय से राजा सांसी हवाई अड्डे पर लगातार फ़ोन जा रहे थे कि किसी भी तरह से हवाई जहाज को अमृतसर में रोके रखो…एक समय तो पूर्व सैनिक जसवन्त सिंह ने फ़ोन छीनकर चिल्लाये कि “कोई भारी ट्रक या रोड रोलर को हवाई पट्टी पर ले जाकर खड़ा कर दो…”, लेकिन कोई फ़ायदा नहीं हुआ। NSG कमाण्डो को अलर्ट रहने का निर्देश दिया जा चुका था, लेकिन 45 मिनट तक अमृतसर में खड़े होने के बावजूद NSG के कमाण्डो उस तक नहीं पहुँच सके। इसके पीछे दो बातें सामने आईं, पहली कि NSG कमाण्डो को अमृतसर ले जाने के लिये सही समय पर विमान नहीं मिल सका, और दूसरी कि मानेसर से दिल्ली पहुँचने के दौरान NSG कमाण्डो ट्रैफ़िक जाम में फ़ँस गये थे, सचाई किसी को नहीं पता कि आखिर क्या हुआ था।

अपहर्ता NSG कमाण्डो से भयभीत थे इसलिये उन्होंने पायलट और यात्रियों पर दबाव बनाने के लिये रूपेन कत्याल की हत्या कर दी और लगभग खाली पेट्रोल टैंक सहित हवाई जहाज को लाहौर ले गये। लाहौर में पुनः उन्हें उतरने की अनुमति नहीं दी गई, यहाँ तक कि हवाई पट्टी की लाईटें भी बुझा दी गईं, लेकिन पायलट ने कुशलता और सावधानी से फ़िर भी हवाई जहाज को जबरन लाहौर में उतार दिया। जसवन्त सिंह ने पाकिस्तान के विदेश मंत्री से बात की कि हवाई जहाज को लाहौर से न उड़ने दिया जाये, लेकिन पाकिस्तानी अधिकारी जानबूझकर मामले से दूरी बनाना चाहते थे, ताकि बाद में वे इससे सम्बन्ध होने से इन्कार कर सकें। वे यह भी नहीं चाहते थे कि लाहौर में NSG के कमाण्डो कोई ऑपरेशन करें, इसलिये उन्होंने तुरन्त हवाई जहाज में पेट्रोल भर दिया और उसे दुबई रवाना कर दिया। दुबई में भी अधिकारियों ने हवाई जहाज को उतरने नहीं दिया। जसवन्त सिंह लगातार फ़ोन पर बने हुए थे, उन्होंने यूएई के अधिकारियों से बातचीत करके अपहर्ताओं से 13 औरतों और 11 बच्चों को विमान से उतारने के लिये राजी कर लिया। रूपेन कत्याल का शव भी साथ में उतार लिया गया, जबकि उनकी नवविवाहिता पत्नी अन्त तक बन्धक रहीं और उन्हें बाद में ही पता चला कि वे विधवा हो चुकी हैं।

25 दिसम्बर की सुबह – विमान कंधार हवाई अड्डे पर उतर चुका है, जहाँ कि एक टूटा-फ़ूटा हवाई अड्डा और पुरानी सी घटिया विमान कंट्रोल प्रणाली है, न पानी है, न ही बिजली है (तालिबान के शासन की एक उपलब्धि)। 25 दिसम्बर की दोपहर से अचानक ही चारों ओर से प्रदर्शनकारी प्रधानमंत्री निवास और कार्यालय के बाहर जमा होने लगे, छाती पीटने लगे, कपड़े फ़ाड़ने लगे, नारे लगाने लगे, प्रधानमंत्री हाय-हाय, हमारे आदमियों को बचाओ… जैसे-जैसे दिन बीतता गया भीड़ और नारे बढ़ते ही गये। अमृतसर, लाहौर और दुबई में निराशा झेलने के बाद सरकार अपनी कोशिशों में लगी थी कि किसी तरह से अपहर्ताओं से पुनः सही सम्पर्क स्थापित हो सके, जबकि 7 रेसकोर्स रोड के बाहर अपहृत परिवारों के सदस्यों के साथ वृन्दा करात सबसे आगे खड़ी थीं। मुफ़्ती प्रकरण का हवाला दे-देकर मीडिया ने पहले दिन से ही आतंकवादियों की मांगें मानकर “जो भी कीमत चुकानी पड़े… बन्धकों को छुड़ाना चाहिये” का राग अलापना शुरु कर दिया था…

मुल्ला उमर और उसके विदेशमंत्री(?) मुत्तवकील से बातचीत शुरु हो चुकी थी और शुरुआत में उन्होंने विभिन्न भारतीय जेलों में बन्द 36 आतंकवादियों को छोड़ने की माँग रखी। मीडिया के दबाव के चलते एक भी वरिष्ठ केन्द्रीय मंत्री अपहृत व्यक्तियों के परिजनों से मिलने को तैयार नहीं था, लेकिन जसवन्त सिंह हिम्मत करके उनसे मिलने गये, तत्काल सभी लोगों ने उन्हें बुरी तरह से घेर लिया और उनके एक वाक्य भी कहने से पहले ही, “हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”, “आतंकवादियों को क्या चाहिये इससे हमें क्या मतलब…”, “चाहे आप कश्मीर भी उन्हें दे दो, हमें कोई फ़र्क नहीं पड़ता…”, “मेरा बेटा है, मेरी बहू है, मेरा पति है उसमें…” आदि की चिल्लाचोट शुरु कर दी गई, जबकि जसवन्त सिंह उन्हें स्थिति की जानकारी देने गये थे कि हम बातचीत कर रहे हैं। जसवन्त सिंह ने उन्हें समझाने की कोशिश की कि देशहित में जेल में बन्द आतंकवादियों को छोड़ना ठीक नहीं है, लेकिन भीड़ में से एक व्यक्ति चिल्लाया “भाड़ में जाये देश और देश का हित…”। इसके बाद जसवन्त सिंह मीडिया के लिये शास्त्री भवन में आयोजित प्रेस कांफ़्रेस में आये, लेकिन वहाँ भी नाटकीय ढंग से भीड़ घुस आई, जिसका नेतृत्व संजीव छिब्बर नाम के विख्यात सर्जन कर रहे थे। उनका कहना था कि उनके 6 परिजन हवाई जहाज में हैं, डॉ छिब्बर का कहना था कि हमें तत्काल सभी 36 आतंकवादी छोड़ देना चाहिये। वे चिल्लाये, “जब मुफ़्ती की बेटी के लिये आतंकवादियों को छोड़ा जा सकता है तो हमारे रिश्तेदारों के लिये क्यों नहीं?… उन्हें कश्मीर दे दो, कुछ भी दे दो, लेकिन हमें हमारे रिश्तेदार वापस चाहिये…”।

उसी शाम को प्रधानमंत्री कार्यालय में स्वर्गीय स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा की पत्नी पहुँचीं, उन्होंने अपहृतों के रिश्तेदारों से मुलाकात कर उनसे बात करके बताने की कोशिश की कि क्यों भारत को इन खतरनाक माँगों को नहीं मानना चाहिये और इससे शहीदों का अपमान होगा, लेकिन “समाज के उन इज्जतदार लोगों” ने ताना मारा कि “खुद तो विधवा हो गई है और चाहती है कि हम भी विधवा हो जायें… ये इधर कहाँ से आई?” फ़िर भी आहूजा की पत्नी देश का सम्मान बनाये रखने के लिये खड़ी रहीं। इसी प्रकार एक और वृद्ध दम्पति भी आये जिन्होंने कहा कि हमारे बेटों ने भी भारत के लिये प्राण दिये हैं, कर्नल वीरेन्द्र थापर (जिनके बेटे लेफ़्टीनेंट कर्नल विजयन्त थापर युद्ध में शहीद हुए थे) ने खड़े होकर सभी लोगों से एकजुट होकर आतंकवादियों के खिलाफ़ होने की अपील की, लेकिन सब बेकार… उन बहरे कानों को न कुछ सुनना था, न उन्होंने सुना… (ध्यान रखिये ये वही आभिजात्य वर्ग था, जो मोमबत्ती जलाने और अंग्रेजी स्लोगन लगाये टी-शर्ट पहनने में सबसे आगे रहता है, ये वही धनी-मानी लोग थे जो भारत की व्यवस्था का जमकर शोषण करके भ्रष्टाचार करते हैं, ये वही “पेज-थ्री” वाले लोग थे जो फ़ाइव-स्टार होटलों में बैठकर बोतलबन्द पानी पीकर समाज सुधार के प्रवचन देते हैं), ऐसे लोगों का छातीकूट अभियान जारी रहा और “जिम्मेदार मीडिया(?)” पर उनकी तस्वीरें और इंटरव्यू भी… मीडिया ने दो-चार दिनों में ही जादू के जोर से यह भी जान लिया कि देश की जनता चाहती है कि “कैसे भी हो…” अपहृतों की सुरक्षित रिहाई की जाना चाहिये…

आखिर 28 दिसम्बर को सरकार और आतंकवादियों के बीच “डील फ़ाइनल” हुई, जिसके अनुसार मौलाना मसूद अजहर, मुश्ताक अहमद जरगर, और अहमद उमर शेख को छोड़ा जाना तय हुआ। एक बार फ़िर जसवन्त सिंह के कंधों पर यह कड़वी जिम्मेदारी सौंपी गई कि वे साथ जायें ताकि अन्तिम समय पर यदि किसी प्रकार की “गड़बड़ी” हो तो वे उसे संभाल सकें। आखिर नववर्ष की संध्या पर सभी अपहृत सकुशल दिल्ली लौट आये… और भाजपा-एनडीए के सबसे बुरे अनुभव को समेटे और मीडिया द्वारा खलनायक करार दिये गये जसवन्त सिंह भी अपना बुझा हुआ सा मुँह लेकर वापस आये। इस प्रकार भारत ने अपमान का कड़वा घूँट पीकर नई सदी में कदम रखा… (जरा इस घटना की तुलना, रूस में चेचन उग्रवादियों द्वारा एक सिनेमा हॉल में बन्धक बनाये हुए बच्चों और उससे निपटने के तरीके से कीजिये, दो राष्ट्रों के चरित्र में अन्तर साफ़ नज़र आयेगा)।

इस घटना ने हमेशा की तरह सिर्फ़ और सिर्फ़ सवाल खड़े किये (जवाब पाने या माँगने की परम्परा हमारे यहाँ कभी थी ही नहीं)। न ही नौ साल पहले हमने कोई सबक सीखा था, न ही दो महीने पहले हुए मुम्बई हमले के बाद कुछ सीखने को तैयार हैं। एक और कंधार प्रकरण कभी भी आसानी से मंचित किया जा सकता है, और भारत की जनता में इतनी हिम्मत नहीं लगती कि वह आतंकवादियों के खिलाफ़ मजबूती से खड़ी हो सके। हो सकता है कि एक बार आम आदमी (जो पहले ही रोजमर्रा के संघर्षों से मजबूत हो चुका है) कठोर बन जाये, लेकिन “पब संस्कृति”, “रेव-पार्टियाँ” आयोजित करने वाले नौनिहाल इस देश को सिर्फ़ शर्म ही दे सकेंगे। किसी भी प्रकार के युद्ध से पहले ही हम नुकसान का हिसाब लगाने लगते हैं, लाशें गिनने लगते हैं। पाकिस्तान के एक मंत्री ने बिलकुल सही कहा है कि भारत अब एक “बनिया व्यापारी देश” बन गया है वह कभी भी हमसे पूर्ण युद्ध नहीं लड़ सकेगा। डरपोक नेताओं और धन-सम्पत्ति को सीने से चिपकाये हुए अमीरों के इस देश में अपनी कमजोरियाँ स्वीकार करने की ताकत भी नहीं बची है… भ्रष्टाचार या आतंकवाद से लड़ना तो बहुत दूर की बात है…

सन्दर्भ, आँकड़े और घटनायें : कंचन गुप्ता (तत्कालीन प्रधानमंत्री कार्यालय के मीडिया सेल में पदस्थ पत्रकार) के लेख से…

, , , , , , , ,

32 comments:

संजय बेंगाणी said...

बहुत ज्यादा अच्छा लिखा है.

मीडिया की भूमिका भी सही नहीं थी, उस पर नहीं लिखा?

मीडिया तथा बड़ी बिंदी लगाने और मोमबत्ती जलाने वाले वर्ग से कोई उम्मीद नहीं.

Anil Pusadkar said...

तारीफ़ के लिये शब्द नही है मेरे पास ।सुरेश जी आपकी निर्भीक का जादू हमेशा की तरह आपके लेख को शुरू से लेकर अंत तक़ पढने के लिये मज़बूर कर देता है।बहुत-बहुत बधाई आपको,आपकी कलम की धार ऐसी ही तेज़ बनी रहे।

पंकज बेंगाणी said...

कलम की धार ऐसी ही तेज रखे और सच को उजागर करते रहें. बहुत बढिया प्रयास

Debashish said...
This comment has been removed by the author.
डॉ .अनुराग said...

मोदी प्रकरण को छोड़ आपकी सारी बातो से सौ फी सदी सहमत हूँ ओर आपकी निर्भीक लेखनी को सलाम करता हूँ ,जिस वक़्त ये काण्ड हुआ उस वक़्त मेरे कजिन जो आर्मी में पाइलट है उस वक़्त किसी काम से दिल्ली आए हुए थे ओर इस पुरे प्रकरण में एक दर्शक की तरह उनकी भागीदारी थी ,भारत के इन तथा कथित बुद्दिजीवियों ओर आरामतलब लोगो की स्वार्थता ओर आत्मकेंद्रित प्रवति देख वे इतने निराश ओर हताश हुए थे (तब उन्हें ज्वाइन किए एक सल् ही हुआ था )की उन्होंने कहा "इन लोगो के लिए हम लड़ते है ...'ख़ुद मैंने भी इस तरह की भावना महसूस की थी ....
आज से एक साल पहले जहाज में बंधक बनाए हुए यात्री किसी जगह इकठ्ठा हुए ओर उनमे से कई ने स्वीकार किया उस वक़्त उनके रिश्तेदारो का व्यवहार शर्मिंदगी कर देने वाला था.
कभी कभी आप ऐसा लिख जाते है की टिपण्णी करने को विवश होना पढता है .

Debashish said...

तो कुल मिलाकर बीजेपी का दामन पाक साफ है और कंधार काँड का ठीकरा दरअसल अभिजात्य वर्ग पर ही फोड़ना चाहिये? तो फिर हम काँग्रेस या अन्य किसी राजनैतिक दल को भी क्यों दोष क्यों देते फिरते हैं। वे भी तो जनता के हाथों लाचार हैं। सारी गलतियों के लिये क्यों न हम सारे दलों को क्लीन चिट दे दें? और फिर 26/11 का जिम्मा भी सरकार पर क्यों छोड़ें और राजनेताओं को गाली क्यों दें, यह भी तो दरअसल हमारा ही किया धरा है।

कब तक हम किसी दल विशेष की पैरवी करने के लोभ में logic को परे रख कर तर्क देते रहेंगे? कब आपमें यह स्वीकार करने का साहस होगा की सारा तालाब ही गंदा है, कि हमारी संपूर्ण राजनैतिक प्रणाली ही रीढ़विहीन है, कि हमें केवल पढ़े लिखे, समझदार और गुणी नेताओं को वोट देना चाहिये चाहे वो किसी भी दल के हों। याद रखिये, बदलाव व्यक्ति लायेंगे, दल नहीं।

नयनसुख said...

उस समय यात्रियों के रिश्तेदारों का व्यवहार वाकई स्वार्थपरक था,
शायद हमारे रिश्तेदार होते तो हम भी इतने ही स्वार्थी और देश की चिन्ता न करने वाले होते,
शायद हम भारतवासियों के लिये अपने स्वार्थ देश के अस्तित्व से बढ़कर हैं

लेकिन उस समय जसवन्त सिंह की भूमिका जीवट भरी थी और उन्ही के माथे इस की कालिमा आई

आपने बहुत प्रखर रूप से इस घटना का सजीव वर्णन किया है

Suresh Chiplunkar said...

@ अनुराग जी - मैं जानता हूँ कि मोदी से कई लोग घृणा की हद तक भावना रखते हैं, आपके बारे में तो पता नहीं, लेकिन मेरा मानना है कि वर्तमान परिदृश्य में लालू-मायावती-मुलायम-राहुल बाबा जैसों के बीच उनसे बेहतर कोई नहीं है… मजबूरी में ही सही टिप्पणी करने के लिये धन्यवाद…
@ देबाशीष जी - शायद आपने लेख की यह पंक्तियाँ ठीक से नहीं पढ़ी… "कंधार की घटना और उसके बाद आतंकवादियों को छोड़ने का जो कृत्य एनडीए ने किया था उसे कभी माफ़ किया ही नहीं जा सकता (भाजपा के कट्टर से कट्टर समर्थक भी इस घटना के लिये पार्टी नेतृत्व को दोषी मानते हैं, और ध्यान रखें कि इस प्रकार की भावनाएं कांग्रेसियों में नहीं पाई जाती कि वे अपने नेतृत्व को सरेआम दोषी बतायें…" देश हित के लिये आभिजात्य वर्ग की जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि एक गरीब-अनपढ़ व्यक्ति से त्याग-बलिदान-आदर्श की अपेक्षा रखना उचित नहीं है… पहले भी था और सत्यम राजू प्रकरण के बाद मेरा स्पष्ट मत है कि "सुधार" करना है तो पहले देश के उच्च वर्ग से शुरु करो… नीचे तो सुधार अपने-आप पहुँचेगा… और सीधे शब्दों में कहूँ तो "जितना बड़ा आदमी, उतना बड़ा चोट्टा…" तो पहले उसका पिछवाड़ा गरम करो, गरीब आदमी उसे देखकर ही सीधा हो जायेगा… "आपने भी एक बार कहा था कि टिप्पणी करने पर विवश हो जाते हैं…" इसलिये आपको भी टिप्पणी के लिये धन्यवाद… और यदि मैं टिप्पणी करने को "उकसाने" मे सफ़ल होता हूँ मतलब मेरा ब्लॉग लेखन उचित दिशा में है… :)

AKSHAT VICHAR said...

मेरा सारा आक्रोश आप ही व्यक्त कर गये अब मैं क्या लिखूं?

शाश्‍वत शेखर said...

दरअसल दोगलापन खून में हैं हमारे, यही लोग आज राग अलापते हैं कहीं कोई सुरक्षा नहीं है| आपका बहुत धन्यवाद जो इस विषय पर सटीक लेख लिखने के लिए| लोग बीजेपी की भूल याद रखते हैं, अपनी कमजोरी को नहीं| कांग्रेस, सीपीएम सभी दोषी हैं इसके लिए|

चन्दन चौहान said...

जबरदस्त लेख है। हिन्दुस्तान के 2500 से ज्यादा ईसाइ मिशनरी का स्कूल हिन्दुस्तान में चलता है उसमें से हर साल निकलने बाले अर्द्ध अग्रेजों (जो ना पुरी तरह हिन्दुस्तानी हैं और ना अंग्रेज) उन लोगें से देशभक्ती का कामना करना भी बेकार है और मेरे ख्याल से उस जहाज में भी वैसे अर्द्ध अग्रेजों यात्री बैठे थे जिसके कारण उन्के परिवार बालों ने हल्ला मचाया

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया लिखा है।यह बात सच है कि मोदी में कुछ कमियां हैं ले्किन वह आज भी बहुत बेहतर हैं।
बहुत अच्छा व सही लगा आपका यह लेख।

Upadhyayjee said...

बहुद बढिया लेख। मुझे याद है कि कांग्रेस ये भी कही थी कि सरकार जो निर्णय
ले हम उसके साथ है। ये सबको भली भाती मालुम था कि यसवंत सिंह बंधको
को लेने गये थे। खुद मिडिया को मालुम था कि यसवंत सिंह बंधको को सफलपुर्वक
रिहाई के लिये गये थे। लेकिन वही कांग्रेस और उसके पैसो पर बिकी हुई
मिडिया पुरा प्रकरण को उल्टा बताती है आजकल. कांग्रेस अपना पल्ला झाड़ ली। यसवंत सिंह
को बताया जाता है कि वो आतंकवादियों को छोड़ने गये थे। कितना हास्यास्पद लगता
है मिडिया और कांग्रेस का आरोप। शायद ये मान चुके हैं कि देश मे सब मुरख लोग हैं
जिनको कुछ याद नहीं रहता।
मोदी के बारे मे आपकी टिप्पड़ी बहुत शानदार है खासकर ८४ के दंगे और अपातकाल।
लालू भागलपुर दंगो से अपने आपको नहीं बचा सकते। सबको मालुम है कि
भागलपुर दंगो मे एक विशेश जाती के लोग सक्रिय थे। जबतक लालु रहे बिहार
मे वो बचते रहे। जैसे हटे उनको सजा हुई। परदे के पीछे मोदी से भी घिनौना
खेल होता है। बिहारियों पर हो रहे अत्याचार कांग्रेस के शासनकाल मे हो रही है।
क्या वो इंसान नहीं हैं? कांग्रेस के चुहो क्यों इंसानो मे धर्म, मजहब और जाती ढुंढ रहे हो?

अनुनाद सिंह said...

मुझे तो मिडिया की भुमिका सबसे घृणित लगी थी। फली बार समझ आया कि भारत का मिडिया कितना शक्तिशाली किन्तु गैरजिम्मेदार हो सकता है।

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

यह राजनीति जो न कराए।

किसी विषय पर वस्तुनिष्ठ जानकारी मिलना अब असम्भव होता जा रहा है। मीडिया स्वयं राजनीतिक घरानों की पैरोकार होती जा रही है। नहीं तो एक पार्टी विशेष की छोटी-छोटी कमियों को उजागर करने और दूसरे की बड़ी-बड़ी न्य़ूनताओं को पचा जाने की नीति मीडिया में क्या कर रही है?

आपका विश्लेषण आँखें खोलने वाला है।

विवेक सिंह said...

आपके पास कलम है कि तलवार !

उधेड देते हो !

राज भाटिय़ा said...

अभिजात्य वर्ग एक कमीनो का ही वर्ग है जो सिर्फ़ अपने लिये जीना चाहते है , ओर पुलिस को चाहिये एक दम से इन्हे --साले ना तो वोट देते है ना, गरीबो का खुन यही चुस्ते है, ओर यही वो ब है जो इन गोरो की गन्दी भी खाते है.
धन्यवाद , बहुत अच्छा लेख लिखा आप ने.
धन्यवाद

COMMON MAN said...

मोदी के बारे में तो गुजरातियों से पूछना अधिक अच्छा रहेगा. रही बात दंगों की, जो मारे गये हैं, उनके घरवालों से पूछिये, हिन्दुओं की इस प्रतिक्रिया के विरोधी कभी मुरादाबाद का दौरा कर देखें, आंखें खुल जायेंगी.

रंजना said...

क्या कहूँ......आपको और आपकी लेखनी को शत शत नमन....
ऐसे ही निर्बाध गति से यह चलती रहे और यथार्थ का सत्यापन करती रहे........
बहुत ही सही लिखा है आपने.....वाह !

mahashakti said...

आपने जो लिखा, उसकी जितना प्रशंशा की जाये कम होगी। यहॉं जो सच सामने रखा वह वक्‍त की जरूरत थी। आज कंधार को लेकर एनडीए शासन को कोसा जाता है, किन्‍तु उस समय कड़ा कदम न उठा पाना मजबूरी थी।

Meenu khare said...

माँ सरस्वती की अर्चना के दिन आपकी निर्भीक लेखनी को मेरा नमन और वसंत पंचमी की सबको शुभकामनाएं.

Hari Joshi said...

सुरेश जी,
आप जब किसी व्‍यक्ति या घटना को एक विशेष चश्‍में से देखते हैं तो वही दिखाई देता है जो पहना हुआ विशिष्‍ट चश्‍मा दिखाना चाहता है। मोदी अच्‍छे प्रशासक हो सकते हैं, एनडीए सरकार की उपलब्धियां भी हैं लेकिन कंधार की घटना एनडीए पर एक कलंक है और रहेगी; भले ही मैं और आप एक चश्‍मा विशेष पहनकर कुछ भी देखें या कहें।

Mired Mirage said...

बचपन में एक लेख पढ़ा था जिसमें अन्य देश के नागरिकों व अंग्रेजों में यह अन्तर बताया गया था कि अंग्रेज कुछ अधिक समय तक वीरता दिखाते हैं, जबकि वीर सभी होते हैं। तबसे सोचती हूँ कि यही अन्तर सफल व असफल या प्रथम आने व दसवें आने वाले व्यक्ति में होता है, प्रथम आने वाला अपना ध्यान अधिक देर उद्देश्य पर केन्द्रित कर पाता है। स्वार्थी सभी होते हैं परन्तु हम भारतीय अपने परिजनों के स्वार्थ में अधिक ही अंधे हो जाते हैं।
मुझे भी वह समय याद है जब अपहृत जहाज में बैठे लोगों के परिवार वाले किसी भी मूल्य पर उन्हें छुड़वाना चाहते थे। शायद मैं भी वैसा ही करती परन्तु जब हम झुकते हैं तो भविष्य में भी झुकते ही जाते हैं। यह हमारी आदत बनती जाती है। हममें से किसी ने नहीं सोचा कि हमारे सैनिकों व पुलिस के भी परिवार होते हैं और उनके परिवारों के लिए वे भी प्रिय व अमूल्य होते हैं।
घुघूती बासूती

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

समस्या साफ है
उस का हल शाँत चित्त से और सही दिशा मेँ खोज कर
लागू करना भी आवश्यक है
( चाहे आभिजात्य वर्ग की
सार्वजनिक पिटाई से ही आरँभ हो ! )
परँतु, ये होगा क्या ?
&
For "Common Man - "
what is going on in Muradabad ?
& Is that city not part of India ?
What can be done to resolve their grievances ?
Please suggest a way to bridge the anger & to unite INDIA.

वँदे मातरम !!


वसंत पँचमी भी आ गई ..
सभी पाठकोँ को और आपको
शुभकामना
- लावण्या

अनूप शुक्ल said...

बढि़या लेख। अपने हर सही-गलत निर्णय की कीमत हमको देर सबेर चुकानी ही पड़ती है!

पंगेबाज said...

कौन सी कीमत ? कैसी कीमत ? चुकाने के लिये है सिर्फ़ निंम्न मध्यम वर्ग .मलाई वाले तब भी मलाई खाते थे अब भी खाते है और आगे भी खाते रहेगे. जब हमला ताज पर हो तब देश मे सरकार से लेकर मीडिया तक स्भी खडे हो जाते है जब आम आदमी मरे तब सूट बदलते ग्रहमंत्री और सरकार की खडी भर्तसना के अलावा कुछ नही होता . अगर गलती से कही कोई आतंकवादी मर भी जाये तो जाच की मांग खडी होती है और किसी साध्वी के गले आतंकवादी होने का आरोप मढ कर सेकुलरता दिखाने की बैलेंसिंग कार्यवाहिया होती है.
हम एक लिजलिजे देश मे रेगने वाले कीडो से ज्यादा कुछ नही है जिनके जीवन और मौत से किसी मलाईदार को किसी सरकार को कोई फ़रक नही पडता जिस सेकुलरता के हाथ मे हमने अपनी नालाकियो से देश को जाने दिया उसके लिये वोट बैंक से ज्यादा कोई भी बात माने नही रखती और इसलिये हम कहे चाहे कुछ भी हमे अब लगातार मिटते और घटते जाना है नही यकीन तो आखे खोल कर देखिये कितनी हस्ती मिटी है पिछले दशको मे हमारी कश्मीर से क्न्याकुमारी तक कितने जगहो से हम भगाये या धर्मांतरण के जरिये अपनी पहचान मिटाये जा रहे है . माला टूत रही है पर दिखआई तभी देगी जब एक झटके से इसके कई मनके टूट जायेगे . और हम गाते रहेगे पाक के राष्ट्रीय कवि का ये गाना " कुछ बात है कि हस्ती मिटती नही हमारी " छोडिये ये तोता रटंत औरआंक खोल कर देखिये कही बदलते वक्तके साथक ्कही हम पाकिस्तान का इतिहास तो नही दोहराने वाले . कही हम दुनिया को अपनी सेकुलरता दिखाने के चक्कर मे देश के बटवारे का आधारभूत सिंद्धांत को बढावा तो नही दे रहे

Kirtish Bhatt, Cartoonist said...

सुरेशजी बहुत ही अच्छा और आँखें खोल देने वाला लेख.
बधाई.

GJ said...

.

कलम की धार ऐसी ही तेज रखे और सच को उजागर करते रहें. बहुत बढिया प्रयास. आपका विश्लेषण आँखें खोलने वाला है।

.

lata said...

क्या कहूँ......आपको और आपकी लेखनी को शत शत नमन.
ऐसे ही निर्बाध गति से यह चलती रहे और यथार्थ का सत्यापन करती रहे.

आपने जो लिखा, उसकी जितना प्रशंशा की जाये कम होगी।

निशाचर said...

असल बात ये है कि इस देश में और खासकर हिन्दुओं में दो वर्ग हो चुके हैं - एक वह जो व्यवस्था का हिस्सा है और दूसरा वह जो इससे क्रस्त है. पहला वर्ग सिर्फ मलाई चाटने में लगा हुआ है और उसे देश और देशहित से कोई लेना - देना नहीं है. दूसरा वर्ग इस जुगाड़ में लगा रहता है किसी तरह वह भी पहले वर्ग में शामिल हो जाये, यही उसका ध्येय बन गया है. वह व्यवस्था को गरियाता तो रहता है परन्तु मौका मिलने पर (याने कभी स्वयं व्यवस्था का हिस्सा बन जाने पर) सुधार के बजाये उसी रास्ते पर चल निकलता है. आज जो बैठे इस व्यवस्था को गरिया रहे हैं वही छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के लागू होने से गदगद हैं और मिलने वाली मलाई को चाटने में इतने मशगूल हो गए हैं कि मतदान के दिन या तो छुट्टी मना रहे होंगे या फिर "मलाई का टुकडा" फेंकने वाले कि जय कर रहे होंगे................ क्या ऐसे जनमानस से बदलाव कि उम्मीद रखते हैं??

इंडियन said...

बहुत सही कहा आपने। ये कांग्रेसी कौवे कहाँ गए थे जब ये सब हो रहा था ? तब क्यों इन्हें सौंप सूंघ गया था ? और अब ये कोई मौका नही गंवाते हैं एन डी ऐ सरकार को कोसने का। इतने ही पारंगत थे तो क्यों नही उसी समय अपने "योग्य" कांग्रेसियों से सलाह कर एन डी ऐ सरकार का साथ दिया और बताया कि ऐसी स्थिति में क्या किया जाना चाहिए ? किसने रोका था इन तथाकथित "देशभक्तों" को ? दरअसल कांग्रेसी और उसके सहयोगी ( दरअसल मौका परस्त ) एक चोरो की जमात है, इस से ज़्यादा कुछ नही । कहने को एन डी ऐ ने कई गलतिया की है किंतु वो कांग्रेस से तो कम चोर ही हैं । और यदि वो नही तो कोई एक नाम तो बता दे जो चोर नही है ?

Suresh Chand said...

@सुरेश जी :- भारतीय अभिजात्य वर्ग के बारे में बहुत ही कडवी सच्चाई बयां कर दी. ये वर्ग केवल मोमबत्तिया जलाने में ही आगे है. जब खुद पे संकट पड़ता है तो असलियत बाहर आ ही जाती है.इस देश के लिए मरने में केवल माध्यम और गरीब वर्ग ही आगे है.