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Tuesday 20 January 2009

CBSE के महंगे स्कूलों में क्यों पढ़ाते हो, मदरसे में भरती करो…

CBSE Board Equal to Madarsa Board

प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पं. श्रीलाल शुक्ल कह गये हैं कि भारत की “शिक्षा व्यवस्था” चौराहे पर पड़ी उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता व्यक्ति लात लगाता रहता है। आठवीं तक के बच्चों की परीक्षा न लेकर उन्हें सीधे पास करने का निर्णय लेकर पहले प्राथमिक शिक्षा को जोरदार लात जमाने का काम किया गया है, लेकिन अब यूपीए सरकार ने वोट बैंक की खातिर मुसलमानों और तथाकथित “सेकुलरों” की “चरणवन्दना” करने की होड़ में एक और अल्पसंख्यक (इस शब्द को हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान ही पढ़ा जाये) समर्थक निर्णय लिया है कि “मदरसा बोर्ड” का सर्टिफ़िकेट CBSE के समतुल्य माना जायेगा… है न एक क्रांतिकारी(?) निर्णय!!!

रिपोर्टों के मुताबिक केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय अब लगभग इस निर्णय पर पहुँच चुका है कि मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के समतुल्य माना जायेगा। वैसे तो यह निर्णय “खच्चर” (क्षमा करें…) सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के आधार पर लिया जा रहा है, लेकिन इसमें मुख्य भूमिका “ओबीसी मसीहा” अर्जुनसिंह की है, जो आने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए “मुस्लिम मसीहा” भी बनना चाहते हैं और असल में अन्तुले की काट करना चाहते हैं।

“संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री” मनमोहन सिंह द्वारा अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमान) के कल्याण हेतु घोषित 15 सूत्रीय कार्यक्रम के अनुसार मंत्रालय द्वारा एक समिति का गठन किया गया था, जिसने यह “बेजोड़” सिफ़ारिश की थी। मानव संसाधन मंत्रालय के इस निर्णय के बाद लगभग 7000 मदरसे, खासकर उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, असम और पश्चिम बंगाल (यानी लगभग 250 लोकसभा सीटों पर) में मदरसों में पढ़ने वाले साढ़े तीन लाख विद्यार्थी लाभान्वित होंगे। केन्द्र ने अन्य राज्यों में यह सुविधा भी प्रदान की है कि यदि उस सम्बन्धित राज्य में मदरसा बोर्ड नहीं हो तो छात्र पड़ोसी राज्य में अपना रजिस्ट्रेशन करवाकर इस “सुविधा”(?) का लाभ ले सकता है। “स्वयंभू मुस्लिमप्रेमी” लालू यादव भला कैसे पीछे रहते? उन्होंने भी घोषणा कर डाली है और उसे अमलीजामा भी पहना दिया है कि रेल्वे की परीक्षाओं में मदरसा बोर्ड के प्रमाणपत्र मान्य होंगे, ताकि रेल्वे में अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमानों) की संख्या में बढ़ोतरी की जा सके। हाथी के दाँत की तरह दिखाने के लिये इसका मकसद है “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा(?) में लाना…” (यानी वोट बैंक पक्का करना), ये सवाल पूछना नितांत बेवकूफ़ी है कि “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से बाहर किया किसने…”? “क्या किसी ने उनके हाथ-पैर बाँधकर मुख्यधारा से अलग जंगल में रख छोड़ा है?”, क्यों नहीं वे आधुनिक शिक्षा लेकर, खुले विचारों के साथ मुल्लाओं का विरोध करके, “नकली सेकुलरों” को बेनकाब करके कई अन्य समुदायों की तरह खुद ही मुख्यधारा में आते?

इस निर्णय से एक बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है कि आखिर केन्द्र सरकार मदरसों का स्तर उठाना चाहती है या CBSE का स्तर गिराना चाहती है? लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह उन छात्रों के साथ एक क्रूर मजाक है जो CBSE के कठिन पाठ्यक्रम को पढ़ने और मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिये अपनी रातें काली कर रहे हैं। यदि सरकार को वाकई में मदरसे में पढ़ने वाले मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाना ही है तो उन क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा सकते हैं जिनमें वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण पढ़ाई करवाई जा सके। लेकिन इस्लाम की धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों को सीधे CBSE के बराबर घोषित करना तो वाकई एक मजाक ही है। क्या सरकार को यह नहीं मालूम कि उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में चल रहे मदरसों में “किस प्रकार की पढ़ाई” चल रही है? सरकार द्वारा पहले ही “अल्पसंख्यकों” के लिये विभिन्न सबसिडी और योजनायें चलाई जा रही हैं, जो कि अन्ततः बहुसंख्यक छात्रों के पालकों के टैक्स के पैसों पर ही होती हैं और उन्हें ही यह सुविधायें नहीं मिलती हैं। असल में यूपीए सरकार के राज में हिन्दू और उस पर भी गरीब पैदा होना मानो एक गुनाह ही है। कहाँ तो संविधान कहता है कि धार्मिक आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये, लेकिन असल में मुसलमानों को खुश करने में सोनिया सरकार कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती।

धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं होगा यह सुप्रीम कोर्ट भले ही कह चुका हो, संविधान में भी लिखा हो, विभिन्न नागरिक संगठन विरोध कर रहे हों, लेकिन आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री “सैमुअल रेड्डी” “क्या कर लोगे?” वाले अंदाज में जबरन 5% मुस्लिम आरक्षण लागू करने पर उतारू हैं, केन्द्र की यूपीए सरकार मदरसों के आधुनिकीकरण हेतु करोड़ों रुपये के अनुदान बाँट रही है, लेकिन मदरसे हैं कि राष्ट्रीय त्योहारों पर तिरंगा फ़हराने तक को राजी नहीं हैं (यहाँ देखें)। मुल्ला और मौलवी जब-तब इस्लामी शिक्षा के आधुनिकीकरण के खिलाफ़ “फ़तवे” जारी करते रहते हैं, लेकिन सरकार से (यानी कि टैक्स देने वाले हम और आप के पैसों से) “अनुदान” वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं। केन्द्र सरकार का यह दायित्व है कि वह मदरसों के प्रबन्धन से कहे कि या तो वे सिर्फ़ “धार्मिक”(?) शिक्षा तक ही सीमित रहें और छात्रों को अन्य शिक्षा के लिये बाहर के स्कूलों में नामजद करवाये या फ़िर मदरसे बन्द किये जायें या उन्हें अनुदान नहीं दिया जाये, लेकिन सरकार की ऐसा कहने की हिम्मत ही नहीं है। सरकार चाहती है कि मदरसे देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैल जायें। जो नकली “सेकुलर”(?) हमेशा सरस्वती शिशु मन्दिरों की शिक्षा प्रणाली पर हमले करते रहते हैं, उन्हें एक बार इन स्कूलों में जाकर देखना चाहिये कि मदरसों में और इनमें क्या “मूल” अन्तर है।

तीन मुस्लिम विश्वविद्यालयों जामिया हमदर्द, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्रवेश के लिये पहले ही मदरसों के सर्टिफ़िकेट को मान्यता प्रदान की हुई है, अब मानव संसाधन मंत्रालय (इसे पढ़ें अर्जुनसिंह) चाहता है कि देश की बाकी सभी यूनिवर्सिटी इस नियम को लागू करें। फ़िलहाल तो कुछ विश्वविद्यालयों ने इस निर्णय का विरोध किया है, लेकिन जी-हुजूरी और चमचागिरी के इस दौर में कब तक वे अपनी “रीढ़” सीधी रख सकेंगे यह कहना मुश्किल है। विभिन्न सूत्र बताते हैं कि देश भर में वैध-अवैध मदरसों की संख्या दस लाख के आसपास है और सबसे खतरनाक स्थिति पश्चिम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती जिलों के गाँवों में है, जहाँ आधुनिक शिक्षा का नामोनिशान तक नहीं है, और इन मदरसों को सऊदी अरब से आर्थिक मदद भी मिलती रहती है।

सच्चर कमेटी की आड़ लेकर यूपीए सरकार पहले ही मुसलमानों को खुश करने हेतु कई कदम उठा चुकी है, जैसे अल्पसंख्यक (यानी मुसलमान) संस्थानों को विशेष आर्थिक मदद, अल्पसंख्यक (यानी वही) छात्रों को सिर्फ़ 3 प्रतिशत ब्याज पर शिक्षा ॠण (हिन्दू बच्चों को शिक्षा ॠण 13% की दर से दिया जाता है), बेरोजगारी भी धर्म देखकर आती है इसलिये हिन्दू युवकों को 15 से 18 प्रतिशत पर व्यापार हेतु ॠण दिया जाता है, जबकि मुस्लिम युवक को “प्रोजेक्ट की कुल लागत” का सिर्फ़ 5 प्रतिशत अपनी जेब से देना होता है, 35 प्रतिशत राशि का ॠण 3% ब्याज दर पर “अल्पसंख्यक कल्याण फ़ायनेंस” करता है बाकी की 60 प्रतिशत राशि सिर्फ़ 2% का ब्याज पर केन्द्र सरकार उपलब्ध करवाती है। IIM, IIT और AIIMS में दाखिला होने पर पूरी फ़ीस सरकार के माथे होती है, प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु “उनके” लिये विशेष मुफ़्त कोचिंग क्लासेस चलाई जाती हैं, उन्हें खास स्कॉलरशिप दी जाती है, इस प्रकार की सैकड़ों सुविधायें हिन्दू छात्रों का हक छीनकर दी जा रही हैं, और अब मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के बराबर मानने की कवायद…

क्या सरकार यह चाहती है कि देश की जनता “धर्म परिवर्तन” करके अपने बच्चों को CBSE स्कूलों से निकालकर मदरसे में भरती करवा दे? या श्रीलाल शुक्ल जिस “शिक्षा व्यवस्था नाम की कुतिया” का उल्लेख कर गये हैं उसे “उच्च शिक्षा नाम की कुतिया” भी माना जाये? जिसे मौका मिलते ही जब-तब लतियाया जायेगा……

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