Tuesday, January 20, 2009

CBSE के महंगे स्कूलों में क्यों पढ़ाते हो, मदरसे में भरती करो…

CBSE Board Equal to Madarsa Board

प्रसिद्ध उपन्यास “राग दरबारी” में पं. श्रीलाल शुक्ल कह गये हैं कि भारत की “शिक्षा व्यवस्था” चौराहे पर पड़ी उस कुतिया के समान है, जिसे हर आता-जाता व्यक्ति लात लगाता रहता है। आठवीं तक के बच्चों की परीक्षा न लेकर उन्हें सीधे पास करने का निर्णय लेकर पहले प्राथमिक शिक्षा को जोरदार लात जमाने का काम किया गया है, लेकिन अब यूपीए सरकार ने वोट बैंक की खातिर मुसलमानों और तथाकथित “सेकुलरों” की “चरणवन्दना” करने की होड़ में एक और अल्पसंख्यक (इस शब्द को हमेशा सिर्फ़ और सिर्फ़ मुसलमान ही पढ़ा जाये) समर्थक निर्णय लिया है कि “मदरसा बोर्ड” का सर्टिफ़िकेट CBSE के समतुल्य माना जायेगा… है न एक क्रांतिकारी(?) निर्णय!!!

रिपोर्टों के मुताबिक केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्रालय अब लगभग इस निर्णय पर पहुँच चुका है कि मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के समतुल्य माना जायेगा। वैसे तो यह निर्णय “खच्चर” (क्षमा करें…) सच्चर कमेटी की सिफ़ारिशों के आधार पर लिया जा रहा है, लेकिन इसमें मुख्य भूमिका “ओबीसी मसीहा” अर्जुनसिंह की है, जो आने वाले लोकसभा चुनावों को देखते हुए “मुस्लिम मसीहा” भी बनना चाहते हैं और असल में अन्तुले की काट करना चाहते हैं।

“संवैधानिक रूप से प्रधानमंत्री” मनमोहन सिंह द्वारा अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमान) के कल्याण हेतु घोषित 15 सूत्रीय कार्यक्रम के अनुसार मंत्रालय द्वारा एक समिति का गठन किया गया था, जिसने यह “बेजोड़” सिफ़ारिश की थी। मानव संसाधन मंत्रालय के इस निर्णय के बाद लगभग 7000 मदरसे, खासकर उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, झारखण्ड, उड़ीसा, असम और पश्चिम बंगाल (यानी लगभग 250 लोकसभा सीटों पर) में मदरसों में पढ़ने वाले साढ़े तीन लाख विद्यार्थी लाभान्वित होंगे। केन्द्र ने अन्य राज्यों में यह सुविधा भी प्रदान की है कि यदि उस सम्बन्धित राज्य में मदरसा बोर्ड नहीं हो तो छात्र पड़ोसी राज्य में अपना रजिस्ट्रेशन करवाकर इस “सुविधा”(?) का लाभ ले सकता है। “स्वयंभू मुस्लिमप्रेमी” लालू यादव भला कैसे पीछे रहते? उन्होंने भी घोषणा कर डाली है और उसे अमलीजामा भी पहना दिया है कि रेल्वे की परीक्षाओं में मदरसा बोर्ड के प्रमाणपत्र मान्य होंगे, ताकि रेल्वे में अल्पसंख्यकों (पढ़ें मुसलमानों) की संख्या में बढ़ोतरी की जा सके। हाथी के दाँत की तरह दिखाने के लिये इसका मकसद है “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा(?) में लाना…” (यानी वोट बैंक पक्का करना), ये सवाल पूछना नितांत बेवकूफ़ी है कि “अल्पसंख्यकों को मुख्यधारा से बाहर किया किसने…”? “क्या किसी ने उनके हाथ-पैर बाँधकर मुख्यधारा से अलग जंगल में रख छोड़ा है?”, क्यों नहीं वे आधुनिक शिक्षा लेकर, खुले विचारों के साथ मुल्लाओं का विरोध करके, “नकली सेकुलरों” को बेनकाब करके कई अन्य समुदायों की तरह खुद ही मुख्यधारा में आते?

इस निर्णय से एक बात स्पष्ट नहीं हो पा रही है कि आखिर केन्द्र सरकार मदरसों का स्तर उठाना चाहती है या CBSE का स्तर गिराना चाहती है? लेकिन एक बात तो स्पष्ट है कि यह उन छात्रों के साथ एक क्रूर मजाक है जो CBSE के कठिन पाठ्यक्रम को पढ़ने और मुश्किल परीक्षा का सामना करने के लिये अपनी रातें काली कर रहे हैं। यदि सरकार को वाकई में मदरसे में पढ़ने वाले मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाना ही है तो उन क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा सकते हैं जिनमें वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण पढ़ाई करवाई जा सके। लेकिन इस्लाम की धार्मिक शिक्षा देने वाले मदरसों को सीधे CBSE के बराबर घोषित करना तो वाकई एक मजाक ही है। क्या सरकार को यह नहीं मालूम कि उत्तरप्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती जिलों में चल रहे मदरसों में “किस प्रकार की पढ़ाई” चल रही है? सरकार द्वारा पहले ही “अल्पसंख्यकों” के लिये विभिन्न सबसिडी और योजनायें चलाई जा रही हैं, जो कि अन्ततः बहुसंख्यक छात्रों के पालकों के टैक्स के पैसों पर ही होती हैं और उन्हें ही यह सुविधायें नहीं मिलती हैं। असल में यूपीए सरकार के राज में हिन्दू और उस पर भी गरीब पैदा होना मानो एक गुनाह ही है। कहाँ तो संविधान कहता है कि धार्मिक आधार पर नागरिकों के साथ कोई भेदभाव नहीं होना चाहिये, लेकिन असल में मुसलमानों को खुश करने में सोनिया सरकार कोई कसर बाकी नहीं रखना चाहती।

धार्मिक आधार पर आरक्षण नहीं होगा यह सुप्रीम कोर्ट भले ही कह चुका हो, संविधान में भी लिखा हो, विभिन्न नागरिक संगठन विरोध कर रहे हों, लेकिन आंध्रप्रदेश के ईसाई मुख्यमंत्री “सैमुअल रेड्डी” “क्या कर लोगे?” वाले अंदाज में जबरन 5% मुस्लिम आरक्षण लागू करने पर उतारू हैं, केन्द्र की यूपीए सरकार मदरसों के आधुनिकीकरण हेतु करोड़ों रुपये के अनुदान बाँट रही है, लेकिन मदरसे हैं कि राष्ट्रीय त्योहारों पर तिरंगा फ़हराने तक को राजी नहीं हैं (यहाँ देखें)। मुल्ला और मौलवी जब-तब इस्लामी शिक्षा के आधुनिकीकरण के खिलाफ़ “फ़तवे” जारी करते रहते हैं, लेकिन सरकार से (यानी कि टैक्स देने वाले हम और आप के पैसों से) “अनुदान” वे खुशी-खुशी स्वीकार करते हैं। केन्द्र सरकार का यह दायित्व है कि वह मदरसों के प्रबन्धन से कहे कि या तो वे सिर्फ़ “धार्मिक”(?) शिक्षा तक ही सीमित रहें और छात्रों को अन्य शिक्षा के लिये बाहर के स्कूलों में नामजद करवाये या फ़िर मदरसे बन्द किये जायें या उन्हें अनुदान नहीं दिया जाये, लेकिन सरकार की ऐसा कहने की हिम्मत ही नहीं है। सरकार चाहती है कि मदरसे देश भर में कुकुरमुत्ते की तरह फ़ैल जायें। जो नकली “सेकुलर”(?) हमेशा सरस्वती शिशु मन्दिरों की शिक्षा प्रणाली पर हमले करते रहते हैं, उन्हें एक बार इन स्कूलों में जाकर देखना चाहिये कि मदरसों में और इनमें क्या “मूल” अन्तर है।

तीन मुस्लिम विश्वविद्यालयों जामिया हमदर्द, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्रवेश के लिये पहले ही मदरसों के सर्टिफ़िकेट को मान्यता प्रदान की हुई है, अब मानव संसाधन मंत्रालय (इसे पढ़ें अर्जुनसिंह) चाहता है कि देश की बाकी सभी यूनिवर्सिटी इस नियम को लागू करें। फ़िलहाल तो कुछ विश्वविद्यालयों ने इस निर्णय का विरोध किया है, लेकिन जी-हुजूरी और चमचागिरी के इस दौर में कब तक वे अपनी “रीढ़” सीधी रख सकेंगे यह कहना मुश्किल है। विभिन्न सूत्र बताते हैं कि देश भर में वैध-अवैध मदरसों की संख्या दस लाख के आसपास है और सबसे खतरनाक स्थिति पश्चिम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती जिलों के गाँवों में है, जहाँ आधुनिक शिक्षा का नामोनिशान तक नहीं है, और इन मदरसों को सऊदी अरब से आर्थिक मदद भी मिलती रहती है।

सच्चर कमेटी की आड़ लेकर यूपीए सरकार पहले ही मुसलमानों को खुश करने हेतु कई कदम उठा चुकी है, जैसे अल्पसंख्यक (यानी मुसलमान) संस्थानों को विशेष आर्थिक मदद, अल्पसंख्यक (यानी वही) छात्रों को सिर्फ़ 3 प्रतिशत ब्याज पर शिक्षा ॠण (हिन्दू बच्चों को शिक्षा ॠण 13% की दर से दिया जाता है), बेरोजगारी भी धर्म देखकर आती है इसलिये हिन्दू युवकों को 15 से 18 प्रतिशत पर व्यापार हेतु ॠण दिया जाता है, जबकि मुस्लिम युवक को “प्रोजेक्ट की कुल लागत” का सिर्फ़ 5 प्रतिशत अपनी जेब से देना होता है, 35 प्रतिशत राशि का ॠण 3% ब्याज दर पर “अल्पसंख्यक कल्याण फ़ायनेंस” करता है बाकी की 60 प्रतिशत राशि सिर्फ़ 2% का ब्याज पर केन्द्र सरकार उपलब्ध करवाती है। IIM, IIT और AIIMS में दाखिला होने पर पूरी फ़ीस सरकार के माथे होती है, प्रशासनिक और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी हेतु “उनके” लिये विशेष मुफ़्त कोचिंग क्लासेस चलाई जाती हैं, उन्हें खास स्कॉलरशिप दी जाती है, इस प्रकार की सैकड़ों सुविधायें हिन्दू छात्रों का हक छीनकर दी जा रही हैं, और अब मदरसा बोर्ड के सर्टिफ़िकेट को CBSE के बराबर मानने की कवायद…

क्या सरकार यह चाहती है कि देश की जनता “धर्म परिवर्तन” करके अपने बच्चों को CBSE स्कूलों से निकालकर मदरसे में भरती करवा दे? या श्रीलाल शुक्ल जिस “शिक्षा व्यवस्था नाम की कुतिया” का उल्लेख कर गये हैं उसे “उच्च शिक्षा नाम की कुतिया” भी माना जाये? जिसे मौका मिलते ही जब-तब लतियाया जायेगा……

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37 comments:

Cyril Gupta said...

शर्मनाक कदम. इससे अशिक्षा को विस्तार मिलेगा. मुख्यधारा में लाने का मतलब मैं ज्यादा से ज्यादा लोगों को आधुनिक, बेहतर और वैज्ञानिक शिक्षा पद्धति के अंतर्गत शिक्षा देना समझता हूं. और यह कदम यकीनन किसी को भी मुख्यधारा में नहीं लाता.

SHASHI SINGH said...

पापी का घड़ा कितना भी बड़ा क्यों न हो, भरता जरूर है। टेंशन मत लीजिये जनाब... रसगुल्ला खाके भी बदहजमी होती। जल्दी ही लोटा पकड़े नज़र आयेंगे ये कांग्रेस(मुस्लिम) लीगी।

रंजना said...

आपका कोटिशः आभार इतने गंभीर मुद्दे को इतने सटीक ढंग से उठाने के लिए...पूर्ण सहमत हूँ आपसे.
क्या कहूँ.......खून खौल उठता है......इनके रेवैये और अपनी असमर्थता दोनों पर.
नोट वोट और सत्ता सुख के लिए इनका बस चले तो सगी माँ बहनों को बेच दें, अभी तो केवल देश की दुर्गति कर रहे हैं.

कुश said...

काश मैं भी अल्प संख्यक होता!


- एक आम आदमी
तारीख 09 - 12 - 2045

irdgird said...

Ye Bhee Alpsankhyaon ke sath ek sajish hai.

संजय बेंगाणी said...

मुझे यह कदम अपर्याप्त लगते है. जिस तरह हर गरीब के लिए समपन्न जिम्मेदार होता है वैसे ही मुसलमानों के पिछड़ेपन के लिए हिन्दु जिम्मेदार है. जो कमाता है, टेक्स भरता है और गालियाँ खाता.

वास्तव में CBSE के समतुल्य नहीं IIM फाइनल के बराबर माना जाना चाहिए, तभी मुसलमान मुख्यधारा में आ पाएंगे.

विनय said...
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विनय said...

संजय साहब बड़े गुसैल हैं कल से हिन्दुओं के पीछे हाथ धो के पड़े हैं, क्या बात है? मुझे कुछ ख़ास समझ में नहीं आ रहा? मैं सभी मुस्लिमों की बात नहीं करता लेकिन कभी पुराने लखनऊ में आके देखिए साँस लेना कैसा मुश्किल हो जाता है कभी-2, जबकि हिन्दू किसी तरह से उत्तरदायी न हो? क्योंकि न आपने कुछ किया न मैंने, जिसने किया है वह तो दूर बैठा बस हमपे हँस रहा है!

---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

BS said...

मेरा वोट उसी को मिलेगा जो मदरसे की पढ़ाई को IIM, IIT, Harward, Cambridge, Stanford, MIT के बराबर का दर्जा देकर IAS इसको प्राथमिकता देगा।

sareetha said...

अजी ये तो कुछ भी नहीं आगे -आगे देखिए होता है क्या । जल्दी ही आई ए एस के लिए न्यूनतम योग्यता बारहवीं होने वाली है । आप सब करेंगे आईआईएम ,आईआईटी ,इंजीनियरिंग और मदरसा बोर्ड का सर्टिफ़िकेट लेकर की लोग बनेंगे देश के नीति नियंता ...! वाह भई वाह ...! मेरा भारत महान

स्वाति said...

बड़ा ही सटीक लेख , काश हम लोग इस मुद्दे पर कुछ कर सकते ......

पंगेबाज said...

आप पर अभी तक इन्होने जजिया नही लगाया धन्यवाद दीजीये इन्हे . बम बनाने के लिये सीधे सीधे बैंको से २/३% पर कर्ज उपलब्ध नही कराया यही क्या कम है बस आतंकवादियो के घर जाकर सिर्फ़ कुछ लाख का दान ही दिया है अगले बम की तैयारी मे . वैसे ये भी जजिया ही है कि आपसे पैसे वसूल कर मुसलमानो को हज से लेकर बालक पैदा करने उन्हे ( देश विरोध कैसे करे मातृ भुमी से नफ़रत पढाने )उन्हे धन्धा कराने और उन्हे नौकरी दिलवाने ( देश विरोधी पढाई करने के बाद)के लिये खर्च किया जा रहा है

abhishek said...

suresh ji ham hinduo ko ab tak apni aukat ka ahsah nahi hai, aur ye dalal log madarsa sewa main lage hai. is ghor nindniya kadam( is liye nahi ki main hindu hoon, balki isse sabse jyada nuksan to musalmano ka hi hoga ) ka wirodh bade star par hona chahiye . in char panch sal main aejun ne to shiksha ka beda gark kar diya hai .
ye sale bhi to nahi chahte ki koi mulla padhe likhe tabhi to inki rajniti ki dukan chalti rahegi. arjun ko to jamia ne inam bhi diya hai . jite ji unke naam par building par building banaya ja raha hai .

jayram said...

sawal hai ki madarsa ki fajil katarpanthi shiksha kya cbse ka mukabla kar payegi ? kya isse musalmano ka bhala hoga ya ulte unka pichhdapan badhta jayega ?waise ye swaghoshit dharmnirpekshta ke dalal unnhe wisit hone dena chahte hain? agar wahi padh likh gaye to inke wote bank ka kya hoga ?
hinduon ka bhala to ho hi nahi sakta kyunki hame to aaj kal secular hone ki sanak chari hai.
hame is kadam ka wirodh karna chahiye par tarika alag ho jantar-mantar ke wirodh ka natak bahut hua . agar hinduo ko lagta hai ki ye ga;lat hai tio arjun ki is sadi mansikta wali party samet sahayak lalu aur paswan ko bhi woto se kangal kar de .............

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

पंगेबाज जी से सहमत . जजिया लागु ही कर दे यही एक कसर बाकी है

DEEPAK BABA said...

सुरेश जी, आपने तो भविष्य का खाका खिंचा था ... परन्तु परिणाम अभी आपके सामने है : एस न्यूज़ पर नज़र डालो ....

Hindus outnumber Muslims in some West Bengal madrasas
Tue, Jan 20 10:50 AM
Kolkata, Jan 20 (IANS) Madrasas in West Bengal are attracting an increasing number of Hindu students with the shift in focus from Islamist education to science and technology. Hindu students now outnumber Muslims in four madrasas of the state.

These include Kasba MM High Madrasa in Uttar Dinajpur district, Ekmukha Safiabad High Madrasa in Cooch Behar district, Orgram Chatuspalli High Madrasa at Burdwan district and Chandrakona Islamia High Madrasa at West Midnapore district.


http://in.news.yahoo.com/43/20090120/812/tnl-hindus-outnumber-muslims-in-some-wes.html

डॉ .अनुराग said...

एक विचारणीय लेख...जो पढ़े लिखे लोगो को भी बेबस महसूस करवाता है....शिक्षा में भी अगर धर्म घुस जायेगा तो इस देश का पतन समझिये.....समझ नही आता क्यों लोग इस कदर रसातल में चले जाते है.....सच पूछिए तो ये भी देशद्रोह की श्रेणी में आते है.......


"तीन मुस्लिम विश्वविद्यालयों जामिया हमदर्द, जामिया मिलिया और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने पोस्ट-ग्रेजुएशन में प्रवेश के लिये पहले ही मदरसों के सर्टिफ़िकेट को मान्यता प्रदान की हुई है,"
ये पढ़कर आपने आँखे खोल दी...क्यों ऐसा है समझ नही आया ?

COMMON MAN said...

इस बार दोबारा गुलाम बनने जा रहे हैं और जबरदस्ती इस्लाम स्वीकार करना पडे़गा, लिखकर रख लीजिये, हिन्दुओं की आंखें न खुली हैं न खुलेंगी.हिन्दू को गुलाम रहने में मजा आता है, इससे ज्यादा बेवकूफ कौम मैंने नहीं देखी.

अभिषेक ओझा said...

ये बुड्ढा (अर्जुन सिंह) मरने के पहले और पता नहीं और क्या क्या करेगा. पंगेबाज जी की टिपण्णी ही सही लगती है मुझे तो.

SUNIL DOGRA जालि‍म said...

सचमुच चिपलूनकर जी, देश का बडा दुर्भाग्य है... मेरी अल्पविकसित बुद्धि में आपकी यह बातें नहीं समाती... नफरत मत लिखिए.. दुहाई है ... प्यार और सद्भावना की जरूरत है भारत को...

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

देश में यदि एक देशद्रोही का चुनाव करना हो तो मेरा वोट निस्सन्देह अर्जुन सिंह के पक्ष में जाएगा। इस एक आदमी ने इस देश की पूरी एक पीढ़ी का बेड़ा गर्क कर दिया है।

इस्लामी मदरसों से पढ़कर निकलने वाले राष्ट्र निर्माण की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बनने वाले हैं। यहाँ इस्लामी कट्टरवाद के अलावा कुछ भी नहीं सिखाया जाता।

लावण्यम्` ~ अन्तर्मन्` said...

धर्म को निजी जीवन तक सीमित रखना चाहीये २१ वीँ सदी मेँ,
मध्ययुगीन धर्म के सिध्धाँत
कैसे लागू किये जायेँ
ये जामिया मिलीया
जैसी नीतिसे पता चलता है
इन्हेँ कौन रोकेगा ?
- लावण्या

varsha said...

कांग्रेस पार्टी वास्तव में सिर्फ़ वोट बटोरने के लिए किस हद तक गिर सकती है देखने को मिल रहा है। कम से कम शिक्षा के क्षेत्र में खिलवाड़ नही होना चाहिए हाँ जरूरतमंदों को आर्थिक मदद देनी चाहिए फिर वो हिंदू ब्राह्मिन ही क्यों न हो आख़िर वो भी तो गरीब है इस देश में उसे तो कोई आरक्षण भी नही मिलता।
लेकिन मदरसों की शिक्षा पर मोहर लगाने से वाहियात कदम कुछ नही सूझता। नई पीढी इस तरह की शिक्षा लेकर निकलेगी तो क्या हाल होगा सोचिये। ये तो हमें भी पता है की मदरसों में क्या पढाया जाता है।

Meenu khare said...

इस बार दोबारा गुलाम बनने जा रहे हैं और जबरदस्ती इस्लाम स्वीकार करना पडे़गा, लिखकर रख लीजिये, हिन्दुओं की आंखें न खुली हैं न खुलेंगी.हिन्दू को गुलाम रहने में मजा आता है, इससे ज्यादा बेवकूफ कौम मैंने नहीं देखी.

कविता वाचक्नवी said...

सटीक व सामयिक लेख।

इसे अपने याहू समूह ‘हिन्दीभारत’
( http://in.groups.yahoo.com/group/HINDI-BHARAT/ ) पर आपके नाम सहित सदस्यों के पठनार्थ भेज रही हूँ। आशा है, आपको आपत्ति न होगी।

राज भाटिय़ा said...

१२% वोट के लिये यह काग्रेस अपनी मां बेटी ओर बहिन को इन अल्प संख्यको के सामने पेश कर रही है, अरे बाकी ८८% तो हमारे पास है वोट?? तो क्यो नही मिल कर सब इन दल्लॊ को इन की ओकात बता देते.
युही अन्दर ही अन्दर कुडने से क्या होगा, जागो जागो.....
विनय जी के शब्द.... संजय साहब बड़े गुसैल हैं कल से हिन्दुओं के पीछे हाथ धो के पड़े हैं, क्या बात है? तो मत दो इसे वोट, इस की अम्मा को क्यो देते हो वोट, मत जाओ इन की सभा मै, मत जाओ इन की रेलियो मै, अब भी जागो जागो.. वरना गुलामी द्रुर नही.
धन्यवाद

safat alam said...
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संजय बेंगाणी said...

मुझे विनय व राज भाटिया की टिप्पणी से आपत्ति है. वे क्या कहना चाहते है, समझ से बाहर है. मैने कब हिन्दूओं के विरूद्ध लिखा है? और मेरी अम्मा कौन है? मेरी माँ इटली में तो नहीं पैदा हुई.

टिप्पणी आपके चिट्ठे पर आई है, स्पष्टिकरण मांगे...अन्यथा इन टिप्पणियों को हटाएं.

safat alam said...

आप से की टिप्पणियों का मैं सम्मान करता हूं पर ज़रा हृदय को विशाल करके सोचेंगे तो कभी मन एव मस्तिष्क में इस प्रकार की बातें नहीं आएंगी जिनमें साम्प्रदाइकता की झलक देखाई देती हो। कभी भी लेख अथवा टिप्पणी पक्षपात से दूर हो कर लिखनी चाहिए। उत्तम व्यक्ति वही है जो पूरे समाज की प्रगति और कल्याण सोचता है। न कि केवल अपनी जाति की भलाई।
आज कुछ विशेष जातियाँ अपनी आर्थिक स्थिति बेहतर होने के कारण अच्छी शिक्षा प्राप्त कर रही हैं और अच्छी अच्छी नोकरियाँ ले रही हैं। यह अच्छी चीज़ है परन्तु यदि सरकार उन लोगों की कल्याण के सम्बन्ध में कोई नियम पास करती है जो ज़िन्दगी के दौड़ में पीछे रह गए थे तो न जाने हम क्रोधित क्यों हो जाते हैं। बल्कि हम तो उन जातियों को अधिक पीछे करने की कोशिश करने लगते हैं।
दोस्तो! हम सब को हमेशा सारे लोगों की कल्याण के सम्बन्ध में सोचना चाहिए। जातिवाद ने हमें बहुत नुक़सान पहुंचाया है। देश की प्रगति में हम से मिल कर भाग लें लोगों का पैर खीचने की प्रयास कृपया न करें। आप सब से हमारी यही प्रार्थना है
मानवता की बात करेंगे तो ऐसी भावनायें कदापि दिल में पैदा न होंगी।
अंत में मैं आप सब से क्षमा चाहता हूं और अनुरोध करता हूं कि हम सब जाति और धर्म से हट कर मानवता के रखवाले बनें। धन्यवाद

आभा said...

और भी बाकी है पतन .. वोट की खातिर...

अन्तर सोहिल said...

सफ़त आलम जी आर्थिक स्थिति बेहतर और बदतर तो हर जाति में है। कोई जाति किसी दूसरी जाति को जिन्दगी की दौड में पीछे रहने के लिये उत्तरदायी नही है। और सरकार अगर उन लोगों के कल्याण के लिये जो जिन्दगी की दौड में पीछे हैं कुछ करती है तो उस कदम का स्वागत ही किया जाता है, लेकिन यह तो सब वोट बैंक के लिये हो रहा है। अच्छी नौकरियां आजकल योग्य पात्र के बजाय अयोग्य को आरक्षण की वजह से मिल रही है।
आपको सुरेश जी की इस बात से सहमत होना चाहिये कि "यदि सरकार को वाकई में मदरसे में पढने वाले मुस्लिमों को मुख्यधारा में लाना ही है तो उन क्षेत्रों में विशेष स्कूल खोले जा सकते हैं जिनमें तर्कपूर्ण पढाई करवाई जा सके" ।

अजित वडनेरकर said...

मदरसों की ज़रूरत ही क्या है? बहुसंख्यक हिन्दुओं के लिए क्या कोई अलग स्कूल या पाठ्यक्रम हैं ? अगर मदरसों में इस्लामी संस्कृति के साथ व्यावहारिक शिक्षा दी जाती है तो फिर हिन्दुओं के लिए भी गुरुकुल खोले जाएं। हिन्दू भी अपनी संस्कृति भूलते जा रहे हैं। इन गुरुकुलों को भी वैसी ही सुविधाएं और उतनी ही फिक्र की जाए जैसी मदरसों की की जा रही है।
मुसलमान छलावे और भुलावे में आना छोड़े। उन्हें कोई और नहीं उनके मौलवी-मौलाना गलत-सलत जानकारियां दे कर छल रहे हैं। -भारत मुसलमानों का था। अंग्रेजों ने इसे हिन्दुओं को दे दिया...जैसे बेवकूफाना तथ्य मुसलमानों में बरसों से भ्रम फैला रहे हैं....क्या यह भी समझने-समझाने की ज़रूरत है ?

safat alam said...

अजित साहिब! मदरसों की आवश्यकता है। उसमें धार्मिक शिक्षा ही मात्र नहीं दी जाती बल्कि दुनियावी शिक्षायें भी दी जाती हैं। बहुत सारे लोगों के मन में यह भ्रम है,और भारत एक जमहूरी देश है जहाँ हर धर्म के पालन करने वाले अपने धार्मिक शिक्षा के लिए पाठषाला खोल सकते है। चाहे वह मुस्लिम हों अथवा हिन्दू या दूसरे धर्मों का पालन करने वाले।

प्रकाश बादल said...

भाई,

आपने एक सटीक मुद्दा उठाया है। मुझे ये कतई समझ नहीं आ रहा कि हिन्दु और मुस्लिमों के लिए अलग-अलग शिक्षा पद्धति पर क्यों जोर दिया जा रहा है। क्या जो मुसल्मान होगा वो अलग ही प्रकार की शिक्षा ग्रहण करेगा अगर ऐसा है तो भला क्यों। शिक्षा की ऐसी दोहरी नीति क्यों जब हम एक ही देश में रह रहे हैं तो दोहरे मानदण्डों को क्यों लागू करते हैं। जब हमने एक से व्यव्यस्था चलानी है तो एक व्यक्ति सरल पढ़ाई करके प्रशासन कैसे चला लेगा और दूसरे के लिए पढ़ाई इतनीव्मुश्किल क्यों। हमारे देश में जब तक यह ओछे मानसिकता रहेगी हम वहीं के वहीं रहेगे और हम पर आतंकी हमलों की बौछार होती रहेगी। न केवल हिन्दु भाईयों को बल्कि मुसल्मान, सिख और ईसाई भाईयों सहित सभी धर्म के लोगों को ऐसे नेताओं के खिलाफ आना चाहिए जो शिक्षा के नाम पर भी राजनीति कर रहे हैं और एक जैसी शिक्षा की सिफारिश करनी चाहिए। आज हम कितने विकसित हो गए हैं हम समझ सकते हैं कि शिक्षा तो शिक्षा है चाहे हिन्दु की हो या मुसल्मान की या फिर सिख और ईसाई की। राजनीतिज्ञों के इस गोरख़ धंधे थू थू। अच्छे लेख के लिए चिपलूनकर भाई को प्रणाम।

RDS said...

बड़ी आग है इस लेख में !

सत्ता के चटोरों नें देश का सारा लोनी चाट लिया है | बचेंगे क्या ? रूखे सूखे दरख्तों की तरह कुम्हलाये लोग और छाया को तरसती सी मुल्क की ज़मीन ? खबर एक यह भी कि एक मुख्य मंत्री नें अपने चटोरेपन के चलते अपने बेटे को भी जीमन परोस दी | ले तू उप-मुख्यमंत्री बन और मेरे साथ मेवा मसक !

अर्जुन सिंह को शायद परलोक में भी मंत्री पद का सुख चाहिए इसीलिये मुस्लिम - तुष्टि का पुण्य कब्र में पैर लटकाते हुए भी ले लेना चाहते हैं | उनको सबब मिलेगा ; ज़रूर मिलेगा | सोचिये, मदरसों की गुणवता बेहतर करने की बात करते तो भला कोई तारीफ़ करता ? सफत साहब इसे गलत ना समझें तो उचित यही होगा कि समान शिक्षा की पैरवी की जाए | पन्थगत पाठ निजी शिक्षा का विषय हो | सी बी एस ई का समतुल्य मदरसों को तो कतई नहीं बनाया जाए |

मुस्लिम भाई सोचें कि अर्जुन सिंह मीठी छुरी से कहीं उन्हें ही तो हलाल नहीं करने जा रहे हैं ?

- आर डी सक्सेना भोपाल

चन्दन चौहान said...

मैं लेख पढ़ने के साथ सभी का टिप्पणी भी पढा़ सभी ने लगभग एक सुर में मुस्लिम मंत्री अर्जुन को एक सुर में गाली दिय‌ा लेकिन
safat alam जी के टिप्पणी को हजम नही कर पा रहा हूँ। मुस्लमान अगर पिछडे़ हैं तो इस में गलती किस की है मुस्लमान 4 शादी करके 128 बच्चा पैदा करते हैं किसने कहा है सुगर की तरह इतना बच्चा पैदा करों बस एक - दो बच्चा पैदा करो और किसी अच्छे स्कूल में पढाओं लेकिन नही मुस्लमानों के दिल में सिर्फ एक सपना है जनसख्या में बढत ले कर हिन्दुस्तान में कब्जा करने का। और दुसरी बात इस देश में हिन्दु टैक्स देता है वैसे मुस्लमान हिन्दु को काफिर कह कर दुत्कारते रहता है लेकिन हिन्दु के पैसा पर हज जाता है हिन्दु के पैसा पर अपने बच्चों को पालता है, हिन्दुओं के बीच में अपना व्यपार करता है और मौका मिलने पर हिन्दु का गला भी काटता है अगर मुस्लमानों में थोडा सा भी गैरत रहता तो जामा मस्जिद से फतवा जारी करवा कर सभी मुस्लमानों को हिन्दु के साथ किसी भी तरह का संबन्ध से मना कर देता हिन्दुओं के पैसा पर हज में किसी भी तरह का सब्सीडी से मना कर देता लेकिन शायद मुस्लमानों को तो हिन्दुओं के टुकरों पर पलने का आदत पड गया है। हिन्दु अपना टुकरा फेकता है और मुस्लमान उसे ही लेता है।

safat alam said...

प्यारे मित्र! क्रोधित होने की आवश्यकता नहीं। ज़रा सर्वे को उठा कर देखिए कि भारत में बहूपत्नी मुसलमानों के पास ज़्यादा है या हिन्दुओं के पास। मैं इस मुद्दा पर बात कर के किसी का दिल दुखाना नहीं चाहता क्योंकि हम सब से प्यार करते हैं, हम अपना सम्पर्क सब से अच्छा रखना चाहते हैं क्यों कि हमें इस्लाम यही शिक्षा देता है, हम किसी को गाली नहीं देते। किसी को अपशब्दों में नहीं पुकारते।
हम तो धर्म के सम्बन्ध में भी इतने कंजूस नहीं कि समझें इस्लाम केवल हमारा है बल्कि यह तो सारे संसार के लिए ईश्वर का उपहार है। हम सारे मानव को एक समझते हैं हमारे पास भेद-भाव और पक्षपात की भावनाएं नहीं हैं। हम सब धर्म के मानने वालों का सम्मान करते हैं और उन्हें अपना भाई समझते हैं।
चन्दन भाई!हम सब एक हैं, एक ईश्वर ने हमें पैदा किया है,एक ही आदि पुरुष की संतान हैं, इस संसार में कुछ दिनों के लिए हमें बसाया गया है। तो क्यों हम दूसरों को बुरा भला कहें, हमें चाहिए कि प्रेम की बातें लिखें और प्रेम से रहें। धन्यवाद