Monday, January 26, 2009

मिट्टी की सौंधी खुशबू वाले मेरे पसन्दीदा गीत (भाग-2)

दिन भर की थकान उतारने के लिये, दुनियादारी के झंझटों से मुक्त होकर, गाँव की चौपाल पर रात के वक्त, मुक्त कण्ठ से जो गीत गाये जाते हैं उनमें से यह एक है। जी करता है कि बस चार-छः “सहज-सीधे” दोस्तों की महफ़िल सजी हुई हो, कहीं से एक ढोलकी मिल जाये और यह गीत कम से कम 20 बार गाया जाये तब जाकर कहीं आत्मा तृप्त हो… ऐसा अदभुत गीत है यह… गीत के बारे में विस्तार से पढ़िये, सुनिये और देखिये सागर भाई की महफ़िल में… यहाँ चटका लगायें…

3 comments:

विनय said...

गणतंत्र दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ

---आपका हार्दिक स्वागत है
गुलाबी कोंपलें

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी अभी अभी सुन कर ओर गुनगुना कर आ रह हुं.
धन्यवाद
आप को गणतंत्र दिवस की बहुत बहुत शुभकामनाएं !!

नितिन व्यास said...

वाह वाह!
ये मेरा पसंदीदा गीत है कोई भी महफिल में यदि मुझे गाने को कहा जाता है तो यही याद आ जाता है