भारत को दस लाख “माधवन” चाहिये…
IIT Engineer Farmer India’s Food Crisis
“तकनीकी” भारत को बदल रही है यह हम सब जानते हैं, लेकिन यदि तकनीक का उपयोग भारत की मूल समस्याओं को दूर करने में हो जाये तो यह सोने में सुहागा होगा। हम अक्सर भारत के आईआईटी पास-आउट छात्रों के बारे में पढ़ते रहते हैं, उनकी ऊँची तनख्वाहों के बारे में, उनके तकनीकी कौशल के बारे में, विश्व में उनकी प्रतिभा के चर्चे के बारे में भी… गत कुछ वर्षों में आईआईटी छात्रों में एक विशिष्ट बदलाव देखने में आ रहा है, वह है मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को ठोकर मारकर “अपने मन का काम करना”, उनमें भारत को आमूलचूल बदलने की तड़प दिखाई देने लगी है और भले ही अभी इनकी संख्या कम हो, लेकिन आने वाले कुछ ही सालों में यह तेजी से बढ़ेगी…
पहले हम देख चुके हैं कि किस तरह बिट्स पिलानी का एक छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनी की नौकरी को ठोकर मारकर चेन्नई में गरीबों के लिये सस्ती इडली बेचने के धंधे में उतरा और उसने “कैटरिंग” का एक विशाल बिजनेस खड़ा कर लिया… लेकिन यह काम श्री माधवन सालों पहले ही कर चुके हैं… जी हाँ, बात हो रही है चेन्नई के नज़दीक चेंगलपट्टू में खेती-किसानी करने वाले आईआईटी-चेन्नई के पास आऊट श्री आर माधवन की… ONGC जैसे नवरत्न कम्पनी की नौकरी को छोड़कर खेती के व्यवसाय में उतरने वाले आर माधवन एक बेमिसाल शख्सियत हैं… उनकी सफ़लता की कहानी कुछ इस प्रकार है…
माधवन जी को बचपन से ही पेड़-पौधे लगाने, सब्जियाँ उगाने में बेहद रुचि थी, किशोरावस्था में ही उन्होंने कई बार अपनी माँ को खुद की उगाई हुई सब्जियाँ लाकर दी थीं और माँ की शाबाशी पाकर उनका उत्साह बढ़ जाता था। बचपन से उनका सपना “किसान” बनने का ही था, लेकिन जैसा कि भारत के लगभग प्रत्येक मध्यमवर्गीय परिवार में होता है कि “खेती करोगे?” कमाओगे क्या? और भविष्य क्या होगा? का सवाल हरेक युवा से पूछा जाना लाजिमी है, इनसे भी पूछा गया। परिवार के दबाव के कारण किसान बनने का कार्यक्रम माधवन को उस समय छोडना पड़ा। उन्होंने आईआईटी-जेईई परीक्षा दी, और आईआईटी चेन्नई से मेकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। जाहिर है कि एक उम्दा नौकरी, एक उम्दा कैरियर और एक चमकदार भविष्य उनके आगे खड़ा था। लेकिन कहते हैं ना कि “बचपन का प्यार एक ऐसी शै है जो आसानी से नहीं भूलती…”, और फ़िर आईआईटी करने के दौरान किसानी का यह शौक उनके लिये “आजीविका के साथ समाजसेवा” का रुप बन चुका था। ONGC में काम करते हुए भी उन्होंने अपने इस शौक को पूरा करने की “जुगत” लगा ही ली। समुद्र के भीतर तेल निकालने के “रिग” (Oil Rig) पर काम करने वालों को लगातार 14 दिन काम करने पर अगले 14 दिनों का सवैतनिक अवकाश दिया जाता है, माधवन ने यह काम लगातार नौ साल तक किया। 14 दिन तक मेकेनिकल इंजीनियर अगले 14 दिन में खेती-किसानी के नये-नये प्रयोग और सीखना। वे कहते हैं कि “मुझे मेकेनिकल इंजीनियरिंग से भी उतना ही लगाव है और खेती में इंजीनियरिंग और तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करना चाहता था। मेरा मानना है कि किसी भी अन्य शिक्षा के मुकाबले “इंजीनियरिंग” की पढ़ाई खेती के काम में बहुत अधिक उपयोगी साबित होती है। मैंने भी खेत में काम करने, निंदाई-गुड़ाई-कटाई के लिये सरल से उपकरणों का घर पर ही निर्माण किया। अन्न-सब्जियाँ उगाने में मेहनत 20% और इंजीनियरिंग तकनीक 80% होना चाहिये।
जब मैंने पिता से कहा कि इतने सालों की नौकरी बाद अब मैं खेती करना चाहूँगा, उस वक्त भी उन्होंने मुझे मूर्ख ही समझा था। चार साल की नौकरी में मैंने इतना पैसा बचा लिया था कि चेन्नई के निकट चेंगलपट्टू गाँव में 6 एकड़ जमीन खरीद सकूँ, सन् 1989 में गाँव में पैण्ट-शर्ट पहनकर खेती करने वाला मैं पहला व्यक्ति था, और लोग मुझे आश्चर्य से देखते थे…”। माधवन जी को किसी ने भी खेती नहीं सिखाई, परिवार का सहयोग मिलना तो दूर, ग्राम सेवक से लेकर कृषि विश्वविद्यालय तक ने उनके साथ असहयोग किया। चार साल तक वे अपने खेत में खेती-किसानी-फ़सल को लेकर विभिन्न प्रयोग करते रहे। 6 एकड़ में उनकी सबसे पहली फ़सल मात्र 2 टन की थी और इससे वे बेहद निराश हुए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।
1996 में उनके जीवन का “टर्निंग पॉइंट” साबित हुई उनकी इज़राइल यात्रा। उन्होंने सुन रखा था कि “टपक-सिंचाई” (Drip Irrigation) और जल-प्रबन्धन के मामले में इज़राइल की तकनीक सर्वोत्तम है। इज़राइल जाकर उन्होंने देखा कि भारत में एक एकड़ में एक टन उगने वाली मक्का इज़राइली एक एकड़ में सात टन कैसे उगाते हैं। जितनी जमीन पर भारत में 6 टन टमाटर उगाया जाता है, उतनी जमीन पर इज़राईली लोग 200 टन टमाटर का उत्पादन कर लेते हैं। उन्होंने इज़राइल में 15 दिन रहकर सारी तकनीकें सीखीं। वे कहते हैं कि “इज़राइलियों से मैंने मुख्य बात यह सीखी कि वे एक पौधे को एक इंडस्ट्री मानते हैं, यानी कि एक किलो मिरची पैदा करने वाला पौधा उनके लिये एक किलो की इंडस्ट्री है। सच तो यही है कि हम भारतवासी पानी की कद्र नहीं जानते, भारत में किसानी के काम में जितना पानी का अपव्यय होता है वह बेहद शर्मनाक है…। 2005 के आँकड़ों के अनुसार भारत में फ़सलों में जितना काम 1 लीटर पानी में हो जाना चाहिये उसके लिये 750 लीटर पानी खर्च किया जाता है…”।
इज़राइल में उन्हे मिले एक और हमवतन, डॉ लक्ष्मणन जो एक तरह से उनके “किसानी-गुरु” माने जा सकते हैं। कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले डॉ लक्ष्मणन पिछले 35 सालों से अमेरिका में खेती कर रहे है और लगभग 60,000 एकड़ के मालिक हैं। उन्होंने माधवन की जिद, तपस्या और संघर्ष को देखकर उन्हें लगातार “गाइडेंस” दिया। उनसे मिलकर माधवन को लगा कि पैसे के लिये काम करते हुए यदि मन की खुशी भी मिले तो काम का आनन्द दोगुना हो जाता है। उस जमाने में न तो इंटरनेट था न ही संचार के आधुनिक माध्यम थे, इस कारण माधवन को लक्ष्मणन से संवाद स्थापित करने में बड़ी मुश्किलें होती थीं और समय ज़ाया होता था। हालांकि आज की तारीख में तो माधवन सीधे “स्काईप” या “गूगल टॉक” से उन्हें अपनी फ़सलों की तस्वीरें दिखाकर दो मिनट में सलाह ले लेते हैं। नई-नई तकनीकों से खेती करने में मन की खुशी तो थी ही, धीरे-धीरे पैसा भी मिलने ही लगा। लगभग 8 साल के सतत संघर्ष, घाटे और निराशा के बाद सन् 1997 में उन्हें पहली बार खेती में “प्रॉफ़िट” हुआ। माधवन बताते हैं “इतने संघर्ष के बाद भी मैंने हार नहीं मानी, मेरा मानना था कि आखिर यह एक सीखने की प्रक्रिया है और इसमे मैं गिरूंगा और फ़िर उठूंगा, भले ही कोई मुझे सहारा दे या ना दे, मुझे स्वयं ही लड़ना है और जीतकर दिखाना है”। भारत में कृषि शिक्षा की बात करते समय उनका दर्द साफ़ झलकता है, “भारत के कृषि विश्वविद्यालयों का समूचा पाठ्यक्रम बदलने की आवश्यकता है, भारत के अधिकतर कृषि विश्वविद्यालय खेती करना नहीं सिखाते, बल्कि बैंकों से लोन कैसे लिया जा सकता है- यह सिखाते हैं। उनकी तकनीकें और शिक्षा इतनी पुरानी ढर्रे वाली और जमीनी हकीकतों से कटी हुई है कि कृषि विश्वविद्यालय से निकला हुआ एक स्नातक खेती करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकता। गाँवों के असली हालात और कृषि पाठ्यक्रमों के बीच भारी “गैप” है…”।
अगस्त में धान की खेती से उनका वार्षिक सीजन शुरु होता है, दिसम्बर तक वह फ़सल तैयार हो जाती है तब वे फ़रवरी तक सब्जियाँ उगाते हैं, जब फ़रवरी में वह फ़सल निकल आती है तो सूखा प्रतिरोधी तेल-बीज की फ़सलों जैसे तिल और मूंगफ़ली के लिये खेत खाली हो जाते हैं, मई में इसकी फ़सल लेने के बाद वे एक माह तक विभिन्न सेमिनारों, विदेश यात्राओं के जरिये खेती की नई तकनीकें और नई फ़सलों के बारे में जानकारी लेने में समय बिताते हैं। जून-जुलाई में वापस अपने खेत पर पहुँचकर अगले सीजन की तैयारी में लग जाते हैं। 1999 में उन्होने और 4 एकड़ जमीन खरीद ली। फ़िलहाल उनका लक्ष्य प्रति एकड़ एक लाख रुपये कमाने का है जिसका “आधा टारगेट” वे हासिल कर चुके हैं, यानी फ़िलहाल वे प्रति एकड़ 50,000 रुपये की कमाई कर पा रहे हैं। फ़सलें बेचने के लिये उनके पास खुद की एक जीप और ट्रॉलर है, वे सीधे अपनी फ़सल ग्राहक को बेचते है, बगैर किसी बिचौलिये के। अब तो आसपास के लोग उन्हें आवश्यकतानुसार पहले ही चावल का ऑर्डर दे देते हैं, और माधवन उन्हें खुशी-खुशी पूरा कर देते है, ग्राहक भी कम भाव मिलने से खुश रहता है। उनके खेत के प्रत्येक एकड़ की दस प्रतिशत जमीन विभिन्न प्रयोगों के लिये होती है, वे अलग-अलग फ़सलों पर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं, कुछ सफ़ल होते हैं और कुछ असफ़ल। भविष्य की योजनानुसार वे कम से कम 200 एकड़ जमीन खरीदकर उस पर “फ़ूड प्रोसेसिंग” का कारखाना शुरु करना चाहते हैं, और उनका दावा है कि विभिन्न फ़ूड प्रोसेसिंग इकाईयाँ खुद-ब-खुद आयेंगी और वे अपने गाँव को समृद्ध बनाने में सफ़ल होंगे। उनका कहना है कि सबसे पहला लक्ष्य होना चाहिये फ़सल की प्रति एकड़ लागत में कमी करना। उससे पैदावार भी अधिक होगी और सस्ती भी होगी, जिससे निर्यात भी बढ़ाया जा सकता है। उनके दिल में भारत के गरीबों के लिये एक तड़प है, वे कहते हैं “अमेरिका में चार घंटे काम करके एक श्रमिक तीन दिन की रोटी के लायक कमाई कर सकता है, जबकि भारत के गाँवों में पूरा दिन काम करके भी खेती श्रमिक दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 65% जनसंख्या कुपोषण या अल्पपोषण से ग्रस्त है, जिसमें भारत के नागरिकों की संख्या सर्वाधिक है। भारत के दस वर्ष से कम 49% बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं, उनकी भूख मिटाना मेरा लक्ष्य है, क्योंकि यदि इस एक पूरी की पूरी भूखी पीढ़ी को हमने नज़र-अंदाज़ कर दिया तो यह एटम बम से भी खतरनाक हो सकती है।
माधवन के जीवन का एक और स्वर्णिम क्षण तब आया जब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम उनके खेत पर उनसे मिलने और प्रयोगों को देखने गये, राष्ट्रपति से तय 15 मिनट की मुलाकात दो घण्टे में बदल गई, और तत्काल कलाम साहब के मुँह से निकला कि “भारत को कम से कम दस लाख माधवन की आवश्यकता है…”, स्वभाव से बेहद विनम्र श्री माधवन कहते हैं कि यदि मैं किसी उद्यमशील युवा को प्रेरणा दे सकूँ तो यह मेरे लिये खुशी की बात होगी…
इस खबर का स्रोत इस जगह है…
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चलते-चलते : सन् 2008 बीतने को है, हो सकता है कि इस वर्ष की यह अन्तिम ब्लॉग पोस्ट हो… संयोग से 30 दिसम्बर 2007 को भी मैंने फ़ुन्दीबाई सरपंच की एक ऐसी ही पोस्ट (यहाँ क्लिक कर पढ़ें) लिखी थी, इस प्रकार की सकारात्मक और प्रेरणादायी पोस्ट लिखने हेतु यही उत्तम अवसर है, 2008 में कई अच्छी-बुरी घटनायें घटीं, नेताओं ने हमेशा की तरह निराश ही किया, लेकिन माधवन और फ़ुन्दीबाई सरपंच (एक आईआईटी इंजीनियर और दूसरी अनपढ़) जैसे लोग उम्मीद की किरण जगाते हैं, निराशा से उबारते हैं, और हमें आश्वस्त करते हैं कि बुराई का अंधेरा कितना ही गहरा हो, अच्छाई का एक दीपक उसे हरा सकता है…। इस वर्ष मुझे पाठकों का भरपूर स्नेह मिला, मेरे सभी स्नेही पाठकों, ब्लॉगर मित्रों, इष्ट मित्रों को आगामी अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें… स्नेह बनाये रखें और माधवन जैसे लोगों से प्रेरणा लें… फ़िर मिलेंगे अगले वर्ष… सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…
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