पोप का साम्राज्य और उनका दुःख…
Pope & Conversion in India
जी न्यूज़ पर चर्च के बारे में एक सीरिज़ आ रही है, जिसमें बताया गया है कि भारत सरकार के बाद इस देश में भूमि का सबसे बड़ा अकेला मालिक है “चर्च”, जी हाँ, “चर्च” के पास इस समय समूचे भारत में 52 लाख करोड़ की भू-सम्पत्ति है। इसमें से लगभग 50 प्रतिशत ज़मीन उसके पास अंग्रेजों के समय से है, लेकिन बाकी की ज़मीन तमाम केन्द्र और राज्य सरकारों ने उसे धर्मस्व कार्य हेतु “दान” में दी है।
यह एक ऐतिहासिक तथ्य है कि धर्म के नाम पर सबसे अधिक रक्तपात इस्लाम और ईसाई धर्मावलम्बियों द्वारा किया गया है। ईसाई धर्म का प्रचार-प्रसार करना, सेवा करने के लिये स्कूल और अस्पताल खोलना आदि चर्च के मुख्य काम हैं, लेकिन असल में इसका मकसद ईसाईयों की संख्या में वृद्धि करना होता है। गरीब, ज़रूरतमंद, अशिक्षित लोग इनके फ़ेंके हुए झाँसे में आ जाते हैं, रही-सही कसर भारी-भरकम पैसे और नौकरी का लालच पूरी कर देता है। “चर्च” की सत्ता और धन-सम्पत्ति के अकूत भण्डार के बारे में जब-तब कई पुस्तकों और जर्नलों में प्रकाशित होता रहता है। भारत में चर्च फ़िलहाल “गलत” कारणों से चर्चा में है, ज़ाहिर है कि “धर्मान्तरण” के मामले को लेकर। इन घटनाओं पर “पोप” भी बहुत दुखी हैं और उन्होंने भारत में अपने प्रतिनिधियों और भारत सरकार (इसे सोनिया गाँधी पढ़े) के समक्ष चिन्ता जताई है। 
पोप का दुखी होना स्वाभाविक भी है, जिस “एकमात्र सच्चे धर्म” का जन्म 2008 वर्ष पहले समूची धरती से “विभिन्न गलत अवधारणाओं को मिटाने के लिये” हुआ था, उस पर भारत जैसे देश में हमले हो रहे हैं। चर्च और पोप की सत्ता जिस “प्रोफ़ेशनल” तरीके से काम करती है, उसे देखकर बड़ी-बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनियाँ भी शर्मा जायें। जिस तरह विशाल कम्पनियों में “बिजनेस प्लान” बनाया जाता है, ठीक उसी तरह रोम में ईसाई धर्म के प्रचार के लिये “वार-प्लान” बनाया जाता है। यह “योजनायें” विभिन्न देशों, विभिन्न क्षेत्रों, विभिन्न धर्मों के लिये अलग-अलग होती हैं। इन सभी योजनाओं को “गहन मार्केटिंग रिसर्च” और विश्लेषण के बाद तैयार किया जाता है। जिस प्रकार एक कम्पनी अपने अगले आने वाले 25 वर्षों का एक “प्रोजेक्शन” तैयार करती है, उसी प्रकार इसे भी तैयार किया जाता है। ऐसा बताया जाता है कि वर्तमान में ऐसी 1590 योजनायें चल रही हैं जो कि सन् 2025 तक बढ़कर 3000 हो जायेंगी। सन् 2025 के “प्रोजेक्शन” के अनुसार बढ़ोतरी इस प्रकार की जाना है (यानी कि टारगेट यह दिया गया है) वर्तमान 35500 ईसाई संस्थायें बढ़कर 63000, धर्म परिवर्तन के मामले 35 लाख से बढ़कर 53 लाख, 4100 विभिन्न मिशनरी संस्थायें बढ़कर 6000, 56 लाख धर्मसेवकों की संख्या बढ़ाकर 65 लाख (पूरे यूरोप की समूची सेना से भी ज्यादा संख्या) किया जाना है। वर्तमान में चर्च की कुल सम्पत्ति (भारत में) 13,71,000 करोड़ है (जिसमें खाली पड़ी ज़मीन शामिल नहीं है), यह राशि भारत के GDP का 60% से भी ज्यादा है, इसे भी बढ़ाकर 2025 तक 40,00,000 करोड़ किया जाना प्रस्तावित है।
इवेलैंजिकल चर्च द्वारा लाखों की संख्या में साहित्य बाँटा जाता है। वर्तमान में चर्च द्वारा 20 करोड़ बाइबल, 70 लाख बुकलेट, 1,70,000 मिशनरी साहित्य, 60000 पत्रिकायें और 18000 लेख वितरित किये जाते हैं, सन् 2025 तक इसे बढ़ाकर दोगुना करने का लक्ष्य दिया गया है। इसी प्रकार चर्च द्वारा अलग-अलग देशों में संचालित विभिन्न रेडियो और टीवी स्टेशनों की संख्या 4050 से बढ़ाकर 5000 करने का लक्ष्य भी निर्धारित किया गया है। हालांकि चर्च द्वारा अपरोक्ष रूप से “खरीदे हुए” कई चैनल चल ही रहे हैं, लेकिन इससे उनका नेटवर्क और भी मजबूत होगा। बजट देखें तो हाल-फ़िलहाल प्रति व्यक्ति को ईसाई बनाने का खर्च लगभग 1.55 करोड़ रुपये आता है (सारे खर्चे मिलाकर) जिसे 2025 तक बढ़ाकर 3.05 करोड़ प्रति व्यक्ति कर दिया गया है।
दुनिया भर के चार्टर्ड अकाउंटेण्ट्स के लिये एक खुशखबरी है। चर्च द्वारा इन चार्टर्ड अकाउंटेंट्स को किसी भी बड़ी से बड़ी मल्टीनेशनल कम्पनी से अधिक भुगतान किया जाता है। चर्च द्वारा हिसाब-किताब रखने के लिये लगभग 4800 करोड़ रुपये ऑडिट फ़ीस के रूप में दिये जाते हैं। लेकिन पोप की मुश्किलें यहीं से शुरु भी होती हैं, एक अनुमान के अनुसार चर्च के पैसों में घोटाले का आँकड़ा बेहद खतरनाक तरीके से बढ़ रहा है, जिसके सन् 2025 तक बहुत ज़्यादा बढ़ जाने की आशंका है। इस प्रकार चर्च एक संगठित MNC की तरह काम करता है, भले ही इसमें आर्थिक घोटाले होते रहते हैं, अधिक जानकारी के लिये International Bulletin of Missionary Research (IBMR, जनवरी 2002 का अंक) देखा जा सकता है।
पोप की मुश्किलें भारत में और बढ़ जाती हैं जब जयललिता और नरेन्द्र मोदी जैसे “ठरकी” लोग धर्मान्तरण के खिलाफ़ अपने-अपने राज्यों में कानून लागू कर देते हैं, उनकी देखादेखी शिवराज और वसुन्धरा जैसे लोग भी ऐसा कानून बनाने की सोचने लगते हैं। यदि ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जायेगी तो पोप 2000 साल पुराने इस सबसे पवित्र धर्म को कैसे बचायेंगे? उनकी विशाल “सेना” क्या करेगी? जबकि उसमें से भी 5 लाख लोग प्रतिवर्ष रिटायर हो जाते हैं, उससे अधिक की नई भरती की जाती है। “चर्च” दुनिया की सबसे बड़ी रोज़गार निर्माता “कम्पनी” है। जयललिता और मोदी दुनिया के उस इलाके से आते हैं जहाँ के गरीबों को “सेवा” और “पवित्र धर्म” की सबसे अधिक ज़रूरत है। IBMR की रिपोर्ट के अनुसार भारत में किसी भी गरीब को ईसाई बनाने का खर्च दुनिया के किसी विकसित देश के मुकाबले 700 गुना (जी हाँ 700 गुना) सस्ता है। भारत पोप के लिये सबसे “सस्ता बाजार” है, लेकिन जयललिता और मोदी जैसे लोग उनका रास्ता रोकना शुरु कर देते हैं। पोप और उनके भारतीय “भक्त” इस प्रयास में हैं कि इस प्रकार के कानून और न बनने पायें, जो बने हैं उन्हें भी हटा लिया जाये, टीवी चैनलों पर चर्च की छवि एक “सेवाभावी”, “दयालु” और “मददगार” की ही दिखाई दे (ये और बात है कि नागालैण्ड जैसे राज्य में जैसे ही ईसाई बहुसंख्यक होते हैं, हथियारों के बल पर बाकी धर्मों के लोगों को वहाँ से खदेड़ना शुरु कर देते हैं), और इस कार्य में वे सफ़ल भी हुए हैं, क्योंकि उन्हें भारत के भीतर से ही “सेकुलरिज़्म” के नाम पर बहुत लोग समर्थन(?) के लिये मिल जाते हैं।
तो कहने का तात्पर्य यह है कि पोप अपने विशाल साम्राज्य के बावजूद भारत के मामले में बहुत दुःखी हैं, आइये उन्हें सांत्वना दें… और हाँ यदि आप में भी “सेवा”(?) की भावना हिलोरें लेने लगी हो, तो एक NGO बनाईये, चर्च से पैसा लीजिये और शुरु हो जाईये… भारत जैसे देश में “सेवा” का बहुत “स्कोप” है…
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