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Saturday 29 March 2008

जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट? क्या बकवास है…

Indian Postal Stamps on Celebrities
केन्द्र सरकार के एक बयान के अनुसार सरकार जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट निकालने का विचार कर रही है। संचार मंत्री के अनुसार देश की विशिष्ट हस्तियों पर डाक टिकट छापने के लिये एक समिति इस बात का विचार कर रही है। सरकार ने जो दो-चार नाम गिनाये हैं उसके अनुसार शाहरुख खान, सचिन तेंडुलकर, सानिया मिर्जा आदि के चित्रों वाले डाक टिकट जारी किये जाने की योजना है।

हमारे देश में कुछ न कुछ नया अजूबा करने-दिखाने की हमेशा होड़ लगी रहती है। यह कथित नायाब विचार भी इसी “खुजली” का एक नमूना है। सबसे पहली बात तो यह है कि पहले से ही कई मरे हुए व्यक्तियों, प्रकृति, पशु-पक्षी, स्मारक आदि पर डाक टिकट जारी हो चुके हैं, फ़िर ये नया शिगूफ़ा कि “जीवित व्यक्तियों पर भी डाक टिकट” जारी किये जायेंगे, की कोई तुक नहीं है। जिस देश में इतनी मतभिन्नता हो, जहाँ “महान” माने जाने के इतने अलग-अलग पैमाने हों, जहाँ हरेक मरे हुए नेताओं तक की इज्जत नहीं होती हो, कई मरे हुए नेताओं को लोग आज भी खुलेआम गालियाँ देते हों, ऐसे में जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करना नितांत मूर्खता है, और जरूरत भी क्या है? क्या पहले से मरे हुए व्यक्ति कम पड़ रहे हैं, क्या विभिन्न जीव-जन्तु, पेड़-पौधे, फ़ूल-पत्तियाँ आदि कम हैं जो नये-नये विवाद पैदा करने का रास्ता बना रहे हो? सरकार खुद ही सोचे, क्या शाहरुख सर्वमान्य हैं? क्या समूचा भारत उन्हें पसन्द करता है? और सबसे बड़ी बात तो यह कि डाक टिकट जारी करने का पैमाना क्या होगा? किस आधार पर यह तय किया जायेगा कि फ़लाँ व्यक्तित्व पर डाक टिकट जारी करना चाहिये? क्या डाक टिकट पर शाहरुख को सिगरेट पीते दिखाया जायेगा? या सचिन कोका-कोला की बोतल के साथ डाक टिकट पर दिखेंगे? सौ बात की एक बात तो यही है कि ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी है? क्या मरे हुए और पुराने “सिम्बॉल” कम पड़ रहे हैं, जो जीवितों के पीछे पड़े हो? या कहीं सरकार भी हमारे “न्यूड” (न्यूज) चैनलों की तरह सोचने लगी है कि धोनी, राखी सावन्त आदि पर डाक टिकट जारी करके वह डाक विभाग को घाटे से उबार लेगी? या उसे कोरियर के मुकाबले अधिक लोकप्रिय बना देगी? कोई तो लॉजिक बताना पड़ेगा…

जब एक बार सरकार कोई नीतिगत निर्णय कर लेगी तो सबसे पहले हमारे नेता उसमें कूद पड़ेंगे। इस बात की क्या गारंटी है कि कांग्रेसी चमचे सोनिया गाँधी पर डाक टिकट जारी नहीं करेंगे, फ़िर राहुल गाँधी, फ़िर प्रियंका गाँधी, फ़िर “वर्ल्ड चिल्ड्रन्स डे” के अवसर पर प्रियंका के दोनो बच्चे एक डाक टिकट पर… यानी एक अन्तहीन सिलसिला चल निकलेगा। एक बात और नजर-अन्दाज की जा रही है कि डाक टिकट पर छपे महापुरुषों के वर्तमान में क्या हाल होते हैं। सबसे अधिक खपत महात्मा गाँधी के डाक टिकटों की होती है। गाँधी की तस्वीर वाले उस डाक टिकट को न जाने कहाँ-कहाँ, और न जाने कैसे-कैसे रखा जाता है, थूक लगाई जाती है, रगड़ा जाता है, पोस्ट मास्टर अपनी बीवी का सारा गुस्सा उस पर जोर से ठप्पा लगाकर निकालता है। नोटों पर छपे गाँधी न जाने कैसे-कैसे लोगों के हाथों से गुजरते हैं, महिलाओं द्वारा जाने कहाँ-कहाँ रखे जाते हैं, क्या ये सब अपमानजनक नहीं है? क्या यह जरूरी है कि महापुरुषों का सम्मान नोटों और डाक टिकट पर ही हो? रही प्रेरणा की बात, तो भाई मल्लिका शेरावत पर डाक टिकट छापने से किसको प्रेरणा मिलने वाली है?

जिस देश में नल से पानी लेने की बात पर हत्या हो जाती हो, घूरकर देखने की बात पर अपहरण हो जाते हों, वहाँ जीवित व्यक्तियों पर डाक टिकट जारी करने से विवाद पैदा नहीं होंगे क्या? सोनिया पर डाक टिकट जारी होगा तो नरेन्द्र मोदी पर भी होगा और ज्योति बसु पर भी होगा। सचिन तेंडुलकर पर जारी होगा तो बंगाली कैसे पीछे रहेंगे… सौरव दादा पर भी एक डाक टिकट लो। सानिया मिर्जा पर डाक टिकट निकाला तो बुर्के में फ़ोटो क्यों नहीं छापा? शाहरुख के डाक टिकट की धूम्रपान विरोधियों द्वारा होली जलाई जायेगी। और फ़िर उद्योगपति पीछे रहेंगे क्या? मुकेश अम्बानी की जेब में 150 सांसद हैं तो उनका डाक टिकट जरूर-जरूर जारी होगा, तो विजय माल्या भी अपनी कैलेण्डर गर्ल्स के साथ एक डाक टिकट पर दिखाई देंगे… मतलब एक न खत्म होने वाली श्रृंखला चालू हो जायेगी। हाँ एक बात जरूर है कि सरकार की डाक टिकटों की बिक्री जरूर बढ़ जायेगी, कैसे? भई जब भी कांग्रेसी किसी राज्य से पोस्टकार्ड अभियान चलायेंगे तो सोनिया के टिकटों की माँग एकदम बढ़ जायेगी। बुद्धदेव भट्टाचार्य के मुखड़े वाले डाक टिकट सिंगूर और नंदीग्राम में खूब बिकेंगे। सबसे ज्यादा मजा लेगी आम जनता, जो अपनी-अपनी पसन्द के मुताबिक डाक टिकट के सामने वाले हिस्से में थूक लगायेगी।

यदि मजाक को एक तरफ़ रख दिया जाये, तो कुल मिलाकर सरकार का यह निर्णय बेहद बेतुका, समय खराब करने वाला और नये बखेड़े खड़ा करने वाला है। इसकी बजाय सरकार को ऐसे वीरों पर डाक टिकट जारी करना चाहिये जो निर्विवाद हों (और ऐसा शायद ही कोई मिले)।

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Friday 28 March 2008

क्या सचमुच भारत का मीडिया विदेशी हाथों में पहुँच चुका है?

Foreign Investment Indian Media Groups
भारत में प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मीडिया के मालिक कौन हैं? हाल ही में एक-दो ई-मेल के जरिये इस बात की जानकारी मिली लेकिन नेट पर सर्च करके देखने पर कुछ खास हाथ नहीं लग पाया (हालांकि इसमें कितनी सच्चाई है, यह तो मीडिया वाले ही बता सकते हैं) कि भारत के कई मीडिया समूहों के असली मालिक कौन-कौन हैं?

हाल की कुछ घटनाओं के मीडिया कवरेज को देखने पर साफ़ पता चलता है कि कतिपय मीडिया ग्रुप एक पार्टी विशेष (भाजपा) के खिलाफ़ लगातार मोर्चा खोले हुए हैं, गुजरात चुनाव और चुनावों के पूर्व की रिपोर्टिंग इसका बेहतरीन नमूना रहे। इससे शंका उत्पन्न होती है कि कहीं हमारा मीडिया और विख्यात मीडियाकर्मी किन्हीं “खास” हाथों में तो नहीं खेल रहे? भारत में मुख्यतः कई मीडिया और समाचार समूह काम कर रहे हैं, जिनमें प्रमुख हैं – टाइम्स ऑफ़ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दू, आनन्दबाजार पत्रिका, ईनाडु, मलयाला मनोरमा, मातृभूमि, सहारा, भास्कर और दैनिक जागरण समूह। अन्य कई छोटे समाचार पत्र समूह भी हैं। आईये देखें कि अपुष्ट और गुपचुप खबरें क्या कहती हैं…

समाचार चैनलों में एक लोकप्रिय चैनल है NDTV, जिसका आर्थिक फ़ंडिंग स्पेन के “गोस्पेल ऑफ़ चैरिटी” से किया जाता है। यह चैनल भाजपा का खासमखास विरोधी है। इस चैनल में अचानक “पाकिस्तान प्रेम” जाग गया है, क्योंकि मुशर्रफ़ ने इस एकमात्र चैनल को पाकिस्तान में प्रसारण की इजाजत दी। इस चैनल के सीईओ प्रणय रॉय, कम्युनिस्ट पार्टी के कर्ता-धर्ता प्रकाश करात और वृन्दा करात के रिश्तेदार हैं। सुना गया है कि इंडिया टुडे को भी NDTV ने खरीद लिया है, और वह भी अब भाजपा को गरियाने लग पड़ा है। एक और चैनल है CNN-IBN, इसे “सदर्न बैप्टिस्ट चर्च” के द्वारा सौ प्रतिशत की आर्थिक मदद दी जाती है। इस चर्च का मुख्यालय अमेरिका में है और दुनिया में इसके प्रचार हेतु कुल बजट 800 मिलियन डॉलर है। भारत में इसके कर्ताधर्ता राजदीप सरदेसाई और उनकी पत्नी सागरिका घोष हैं। गुजरात चुनावों के दौरान नरेन्द्र मोदी और हिन्दुओं को लगातार गाली देने और उनकी छवि बिगाड़ने का काम बड़ी ही “स्वामिभक्ति” से इन चैनलों ने किया। गुजरात के दंगों के दौरान जब राजदीप और बरखा दत्त स्टार टीवी के लिये काम कर रहे थे, तब उन्होंने सिर्फ़ मुसलमानों के जलते घर दिखाये और मुसलमानों पर हुए अत्याचार की कहानियाँ ही सुनाईं, किसी भी हिन्दू परिवार का इंटरव्यू नहीं लिया गया, मानो उन दंगों में हिन्दुओं को कुछ हुआ ही न हो।

टाइम्स समूह “बेनेट कोलमेन” द्वारा संचालित होता है। “वर्ल्ड क्रिश्चियन काउंसिल” इसका 80% खर्चा उठाती है, एक अंग्रेज और एक इतालवी रोबर्टियो मिन्डो इसके 20% शेयरों के मालिक हैं। यह इतालवी व्यक्ति सोनिया गाँधी का नजदीकी भी बताया जाता है। स्टार टीवी तो खैर है ही ऑस्ट्रेलिया के उद्योगपति का और जिसका एक बड़ा आका है सेंट पीटर्स पोंटिफ़िशियल चर्च मेलबोर्न। 125 वर्ष पुराना दक्षिण के एक प्रमुख समाचार समूह “द हिन्दू” को अब जोशुआ सोसायटी, बर्न्स स्विट्जरलैण्ड ने खरीद लिया है। इसके कर्ताधर्ता एन.राम की पत्नी स्विस नागरिक भी हैं। दक्षिण का एक तेलुगु अखबार “आंध्र ज्योति” को हैदराबाद की मुस्लिम पार्टी “एम-आई-एम” और एक कांग्रेसी सांसद ने मिलकर खरीद लिया है। “द स्टेट्समैन” समूह को कम्युनिस्ट पार्टी संचालित करती है, और “कैराल टीवी” को भी। “मातृभूमि” समूह में मुस्लिम लीग के नेताओं का पैसा लगा हुआ है। “एशियन एज” और “डेक्कन क्रॉनिकल” में सऊदी अरब का भारी पैसा लगा हुआ है। जैसा कि मैने पहले भी कहा कि हालांकि ये खबरें सच हैं या नहीं इसका पता करना बेहद मुश्किल है, क्योंकि जिस देश में सरकार को यह तक पता नहीं लगता कि किसी एनजीओ को कुल कितनी मदद विदेश से मिली, वहाँ किसी समाचार पत्र के असली मालिक या फ़ाइनेन्सर का पता लगाना तो बहुत दूर की बात है। अधिग्रहण, विलय, हिस्सेदारी आदि के जमाने में अन्दर ही अन्दर बड़े समाचार समूहों के लाखों-करोड़ों के लेन-देन हुए हैं। ये खबरें काफ़ी समय से इंटरनेट पर मौजूद हैं, हवा में कानोंकान तैरती रही हैं, ठीक उसी तरह जिस तरह कि आपके मुहल्ले का दादा कौन है ये आप जानते हैं लेकिन लोकल थानेदार जानते हुए भी नहीं जानता। अब ये पता लगाना शौकिया लोगों का काम है कि इन खबरों में कितनी सच्चाई है, क्योंकि कोई खोजी पत्रकार तो ये करने से रहा। लेकिन यदि इसमें जरा भी सच्चाई है तो फ़िर ब्लॉग जगत का भविष्य उज्जवल लगता है।

ऐसे में कुल मिलाकर तीन समूह बचते हैं, पहला “ईनाडु” जिसके मालिक हैं रामोजी राव, “भास्कर” समूह जिसके मालिक हैं रमेशचन्द्र अग्रवाल और तीसरा है “जागरण” समूह। ये तीन बड़े समूह ही फ़िलहाल भारतीय हाथों में हैं, लेकिन बदलते वक्त और सरकार की मीडिया क्षेत्र को पूरी तरह से विदेशियों के लिये खोलने की मंशा को देखते हुए, कब तक रहेंगे कहना मुश्किल है। लेकिन एक बात तो तय है कि जो भी मीडिया का मालिक होता है, वह अपनी राजनैतिक विचारधारा थोपने की पूरी कोशिश करता है, इस हिसाब से भाजपा के लिये आने वाला समय मुश्किलों भरा हो सकता है, क्योंकि उसे समर्थन करने वाले “पाञ्चजन्य” (जो कि खुद संघ का मुखपत्र है) जैसे इक्का-दुक्का अखबार ही बचे हैं, बाकी सब तो विरोध में ही हैं।

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Tuesday 25 March 2008

राहुल गाँधी के रहस्यमयी “स्टंट” और गंभीर सुरक्षा खतरे…

Rahul Gandhi Orissa Visit Security Threat
“राजकुमार” आजकल भारत खोज अभियान पर निकले हुए हैं, उन्हें असली भारत खोजना है (शायद उन्होंने अपने परनाना की पुस्तक नहीं पढ़ी होगी)। चुनावी वर्ष में इस भारत को खोजने की शुरुआत उन्होंने उड़ीसा के कालाहांडी से की है। अब दिल्ली में बैठकर उन्हें कालाहांडी के बारे में कैसे पता चलता, न तो उनके पास संचार की कोई व्यवस्था है, न ही कांग्रेस के कार्यकर्ता, न ही पुस्तकें, न ही पत्रकार… सो राहुल बाबा ने उड़ीसा सरकार के लाखों रुपये खर्च करवाने की ठान ही ली। जैसा “स्टंट” उन्होंने बुंदेलखंड में एक दलित के यहाँ खाना खाकर और रात बिताकर किया था, कुछ-कुछ वैसा ही “स्टंट” उन्होंने उड़ीसा की यात्रा के दौरान भी करने की कोशिश की, ये और बात है कि उनके इस स्टंट की देश को बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती थी। राहुल गाँधी की इस कलरफ़ुल यात्रा का अन्त एकदम रंगहीन रहा, न तो उन्होंने इन जिलों के बारे में कोई ठोस योजना पेश की, न ही उनके श्रीमुख से कोई खास उदगार फ़ूटे, हाँ लेकिन अपनी खास हरकतों से उन्होंने सुरक्षा अधिकारियों और केन्द्रीय सुरक्षा एजेंसियों की नींद जरूर उड़ा दी थी (और ऐसा उन्होंने पहली बार नहीं किया है)।

उड़ीसा की यात्रा के दौरान राहुल ने स्थानीय प्रशासन और सुरक्षा अधिकारियों को खासा परेशान रखा। राहुल गाँधी एक बार देर रात को अज्ञात स्थान पर भी गये और उन्होंने स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना तक नहीं दी। अपनी बहरामपुर यात्रा के दौरान राहुल कंकिया नाम के गाँव गये, जो कि गोपालपुर कस्बे से 30 किमी दूर है। उनके साथ एक मिशनरी एनजीओ अधिकारी और सिर्फ़ दो सुरक्षा गार्ड थे। वह उस एनजीओ के दफ़्तर में लगभग रात 10 बजे गये और कुछ घंटे उन्होंने वहाँ बिताये। उसके बाद वे पास ही के एक रहवासी स्कूल में भी गये और वहाँ उन्होंने कुछ चॉकलेट बाँटे। वह एनजीओ एक प्रसिद्ध ईसाई मिशनरी का हिस्सा है और वह सक्रिय रूप से उड़ीसा के दक्षिणी जिलों में खुलकर धर्मान्तरण में लगा हुआ है। राहुल गाँधी ने उस एनजीओ को जितना वक्त दिया उतना वक्त तो उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को भी नहीं दिया। राहुल गाँधी अलसुबह अपने कैम्प में लौटे, जब उनके कार्यकर्ता उन्हें खोजने निकल पड़े थे।

गायब होने का कुछ ऐसा ही स्टंट उन्होंने कोरापुट जिले के दौरे में भी किया, जहाँ उनका स्वागत एक धार्मिक संस्था (जाहिर है कि ईसाई) ने बड़े जोरशोर से किया। यहाँ भी वे सिर्फ़ चार सुरक्षाकर्मियों को साथ लेकर उस संस्था में गये, और स्थानीय प्रशासन को खबर तक नहीं की। राहुल गाँधी ने स्थानीय पुलिस का पायलट वाहन लेने से भी इंकार कर दिया और यहाँ तक कि उन्होंने कोरापुट के एसपी को भी अपने पीछे आने से मना कर दिया, जबकि वे जानते थे कि यह एक खतरनाक नक्सली इलाका है। बेहरामपुर की घटना के बारे में गंजम जिले के एसपी ने स्वीकार किया कि राहुल अपने तय कार्यक्रम से हटकर किसी अज्ञात स्थान पर गये थे, लेकिन इसके बारे में विस्तार से कुछ नहीं बताया।

इस घटना का उल्लेख विधानसभा में बीजद के विधायक कल्पतरु दास ने 11 मार्च को विशेष नोटिस के जरिये उठाया, उन्होंने आरोप लगाया राहुल गाँधी की यह आधी रात की यात्रा पहले से तय थी, एक रिटायर्ड आईपीएस पंकज कुमार गुप्ता, जो कि राजीव गाँधी फ़ाउंडेशन का काम भी देखते हैं, वह राहुल को कहीं ले गये थे और जानबूझकर स्थानीय पुलिस को इसकी सूचना नहीं दी गई। उनका यह भी कहना है कि राहुल गाँधी अपनी माँ के कहने पर ही उस खास मिशनरी में गुप्त रूप से गये और धर्मांतरण के काम की जानकारी ली। चलो मान भी लिया जाये कि ये बाद वाला आरोप सिर्फ़ राजनैतिक आरोप है, लेकिन यह सच्चाई तो फ़िर भी अपनी जगह है कि घने जंगलों वाले इस इलाके में नक्सली बेहद सक्रिय हैं। नक्सलियों का आंतरिक नेटवर्क भी काफ़ी मजबूत है, यदि राहुल गाँधी की इस कथित गुप्त यात्रा की खबर उन्हें लग जाती और वे कोई अनर्थ कर बैठते, या तो बारूदी सुरंग बिछाते या अपहरण कर लेते, तो क्या होता? क्या तब राज्य की बीजद-भाजपा सरकार के माथे पर ठीकरा नहीं फ़ोड़ा जाता? कि उन्होंने राजकुमार की सुरक्षा ठीक से नहीं की। क्या 39 वर्ष की आयु में भी वे इतने अनजान हैं कि यदि उनकी हत्या हो जाती है तो इसके देश की जनता पर क्या तात्कालिक परिणाम हो सकते हैं? वह इतनी गैरजिम्मेदाराना हरकत कैसे कर सकते हैं, जिससे खुद उनको तो खतरा हो ही सकता है, लेकिन अन्य कई लोगों की नौकरी भी खतरे में पड़ सकती है।

राहुल गाँधी का कहना है कि वे इन आदिवासी क्षेत्रों की जमीनी हकीकत जानने के लिये उत्सुक हैं और वे इन क्षेत्रों का दौरा करके कुछ वनवासियों के जीवन को नजदीक से देखकर “प्रैक्टिकल नॉलेज” ग्रहण करना चाहते हैं। कितनी हास्यास्पद बात है ना !! कोरापुट-बोलांगीर-कालाहांडी के बारे में मैं राहुल गाँधी से ज्यादा जानता हूँ, जबकि मैं कभी उड़ीसा नहीं गया। राहुल बाबा शायद नही जानते कि आजादी के बाद उड़ीसा में कांग्रेस ने चालीस साल तक राज किया ? वे नहीं जानते कि ये तीन जिले राज्य के कुल भूभाग का 20 प्रतिशत हैं ? वे यह भी नहीं जानते कि घने जंगलों, प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर, बेशकीमती खनिजों से भरपूर इन तीन जिलों में राज्य के कुल 24 प्रतिशत गरीब रहते हैं? वे नहीं जानते कि विश्व मीडिया में भुखमरी का उदाहरण देने की शुरुआत कालाहांडी से ही होती है? आखिर राजकुमार क्या जानना चाहते हैं? चार साल के अपने कार्यकाल में संसद में सिर्फ़ दो बार मुँह खोलने वाले राहुल बाबा चमचों से बचने के लिये क्या करने वाले हैं? सिर्फ़ संसद में मम्मी के पीछे बैठने से कुछ नहीं होगा। वे अपना दृष्टिकोण और विचार भी तो मीडिया को स्पष्ट करें। जिस तरह से उनकी मम्मी मीडिया को एक “पैरपोंछ” समझती हैं, कहीं वे भी तो उसी मानसिकता से ग्रस्त नहीं हैं?

यदि धर्मान्तरण के आरोपों को एक तरफ़ रख भी दिया जाये, तो भी राहुल गाँधी का इस प्रकार सुरक्षा व्यवस्था को धोखा देकर गायब हो जाना, मनचाहे “स्टंट” दिखाना, गुपचुप मुलाकातें करना, क्या दर्शाता है? हीरोगिरी, अपरिपक्वता, गैरजिम्मेदाराना हरकत, लापरवाही या सामंती मानसिकता? आप बतायें…


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सन्दर्भ : देबाशीष त्रिपाठी, ऑर्गेनाइजर (भुवनेश्वर)

Monday 24 March 2008

गंगाजल से मध्यान्ह भोजन “अपवित्र” हो जाता है?

Mid Day Meal Scheme ISKCON Ujjain
केन्द्र और राज्य सरकारों की मिलीजुली महती योजना है मध्यान्ह भोजन योजना। जैसा कि सभी जानते हैं कि इस योजना के तहत सरकारी प्राथमिक शालाओं में बच्चों को मध्यान्ह भोजन दिया जाता है, ताकि गरीब बच्चे पढ़ाई की ओर आकर्षित हों और उनके मजदूर / मेहनतकश/ ठेले-रेहड़ी वाले/ अन्य छोटे धंधों आदि में लगे माँ-बाप उनके दोपहर के भोजन की चिंता से मुक्त हो सकें। इस योजना के गुणदोषों पर अलग से चर्चा की जा सकती है क्योंकि इस योजना में कई तरह का भ्रष्टाचार और अनियमिततायें हैं, जैसी कि भारत की हर योजना में हैं। फ़िलहाल बात दूसरी है…

जाहिर है कि उज्जैन में भी यह योजना चल रही है। यहाँ इस सम्पूर्ण जिले का मध्यान्ह भोजन का ठेका “इस्कॉन” को दिया गया है। “इस्कॉन” यानी अंतर्राष्ट्रीय कृष्ण भावनामृत संघ को जिले के सभी स्कूलों में मध्यान्ह भोजन (रोटी-सब्जी-दाल) बनाने और पहुँचाने का काम दिया गया है। इसके अनुसार इस्कॉन सुबह अपनी गाड़ियों से शासकीय स्कूलों में खाना पहुँचाता है, जिसे बच्चे खाते हैं। चूँकि काम काफ़ी बड़ा है इसलिये इस हेतु जर्मनी से उन्होंने रोटी बनाने की विशेष मशीन बुलवाई है, जो एक घंटे में 10,000 रोटियाँ बना सकती है। (फ़िलहाल इस मशीन से 170 स्कूलों हेतु 28,000 बच्चों का भोजन बनाया जा रहा है) (देखें चित्र)

जबसे इस मध्यान्ह भोजन योजना को इस्कॉन को सौंपा गया है, तभी से स्थानीय नेताओं, सरपंचों और स्कूलों के पालक-शिक्षक संघ के कई चमचेनुमा नेताओं की भौंहें तनी हुई हैं, उन्हें यह बिलकुल पसन्द नहीं आया है कि इस काम में उन्हें “कुछ भी नहीं” मिल रहा। इस काम को खुले ठेके के जरिये दिया गया था जिसमें जाहिर है कि “इस्कॉन” का भाव सबसे कम था (दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चा)। हालांकि इस्कॉन वाले इतने सक्षम हैं और उनके पास इतना विदेशी चन्दा आता है कि ये काम वे मुफ़्त में भी कर सकते थे (इस्कॉन की चालबाजियों और अनियमितताओं पर एक लेख बाद में दूँगा)। अब यदि मान लिया जाये कि दो रुपये साठ पैसे प्रति बच्चे के भाव पर इस्कॉन जिले भर के शासकीय स्कूलों में रोटी-सब्जी “नो प्रॉफ़िट-नो लॉस” के स्तर पर भी देता है (हालांकि इस महंगाई के जमाने में यह बात मानने लायक नहीं है), तो विचार कीजिये कि बाकी के जिलों और तहसीलों में चलने वाली इस मध्यान्ह भोजन योजना में ठेकेदार (जो कि प्रति बच्चा चार-पाँच रुपये के भाव से ठेका लेता है) कितना कमाता होगा? कमाता तो होगा ही, तभी वह यह काम करने में “इंटरेस्टेड” है, और उसे यह कमाई तब करनी है, जबकि इस ठेके को लेने के लिये उसे जिला पंचायत, सरपंच, स्कूलों के प्रधानाध्यापक, पालक-शिक्षक संघ के अध्यक्ष और यदि बड़े स्तर का ठेका हुआ तो जिला शिक्षा अधिकारी तक को पैसा खिलाना पड़ता है। जाहिर सी बात है कि इस्कॉन को यह ठेका मिलने से कईयों के “पेट पर लात” पड़ गई है (हालांकि सबसे निरीह प्राणी यानी पढ़ाने वाले शिक्षक इससे बहुत खुश हैं, क्योंकि उनकी मगजमारी खत्म हो गई है), और इसीलिये इस योजना में शुरु से ही “टाँग अड़ाने” वाले कई तत्व पनपे हैं। मामले को ठीक से समझने के लिये लेख का यह विस्तार जरूरी था।

“टाँग अड़ाना”, “टाँग खींचना” आदि भारत के राष्ट्रीय “गुण” हैं। उज्जैन की इस मध्यान्ह भोजन योजना में सबसे पहले आरोप लगाया गया कि इस्कॉन इस योजना को चलाने में सक्षम नहीं है, फ़िर जब इस्कॉन ने इस काम के लिये एक स्थान तय किया और वहाँ शेड लगाकर काम शुरु किया तो जमीन के स्वामित्व और शासन द्वारा सही/गलत भूमि दिये जाने को लेकर बवाल मचा दिया गया। जैसे-तैसे इससे निपट कर इस्कॉन ने काम शुरु किया, 10000 रोटियाँ प्रति घंटे बनाने की मशीन मंगवाई तो “भाई लोगों” ने रोटी की गुणवत्ता पर तमाम सवाल उठाये। बयानबाजियाँ हुई, अखबार रंगे गये, कहा गया कि रोटियाँ मोटी हैं, अधपकी हैं, बच्चे इसे खा नहीं सकते, बीमार पड़ जायेंगे आदि-आदि। अन्ततः कलेक्टर और जिला शिक्षा अधिकारी को खुद वहाँ जाकर रोटियों की गुणवत्ता की जाँच करनी पड़ी, न कुछ गड़बड़ी निकलना थी, न ही निकली (इस्कॉन वालों की सेटिंग भी काफ़ी तगड़ी है, और काफ़ी ऊपर तक है, ये छुटभैये नेता कहाँ लगते उसके आगे)। लेकिन ताजा आरोप (वैसे तो आरोप काफ़ी पुराना है) ज्यादा गंभीर रूप लिये हुए है, क्योंकि इसमें “धर्म” का घालमेल भी कर दिया गया है।

असल में शुरु से ही शासकीय मदद प्राप्त मदरसों ने मध्यान्ह भोजन योजना से भोजन लेने से मना कर दिया था। “उनके दिमाग में किसी ने यह भर दिया था” कि इस्कॉन में बनने वाले रोटी-सब्जी में गंगाजल और गोमूत्र मिलाया जाता है और फ़िर उस भोजन को भगवान को भोग लगाकर सभी दूर भिजवाया जाता है। काजियों और मुल्लाओं द्वारा विरोध करने के लिये “गोमूत्र” और “भगवान को भोग” नाम के दो शब्द ही काफ़ी थे, उन्होंने “धर्म भ्रष्ट होने” का आरोप लगाते हुए मध्यान्ह भोजन का बहिष्कार कर रखा था। इससे मदरसों में पढ़ने वाले गरीब बच्चे उस स्वादिष्ट भोजन से महरूम हो गये थे। कहा गया कि मन्दिर में पका हुआ और गंगाजल मिलाया हुआ भोजन अपवित्र होता है, इसलिये मदरसों में मुसलमानों को यह भोजन नहीं दिया जा सकता (जानता हूँ कि कई पाठक मन ही मन गालियाँ निकाल रहे होंगे)। कलेक्टर और इस्कॉन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी ने मदरसों में जाकर स्थिति स्पष्ट करने की असफ़ल कोशिश भी की, लेकिन वे नहीं माने। इस तथाकथित अपवित्र भोजन की शिकायत सीधे मानव संसाधन मंत्रालय को कर दी गई। तुरत-फ़ुरत अर्जुनसिंह साहब ने एक विशेष अधिकारी “श्री हलीम खान” को उज्जैन भेजा ताकि वे इस्कॉन में बनते हुए भोजन को खुद बनते हुए देखें, उसे चखें और शहर काजी तथा मदरसों के संचालकों को “शुद्ध उर्दू में” समझायें कि यह भोजन “ऐसा-वैसा” नहीं है, न ही इसमें गंगाजल मिला हुआ है, न ही गोमूत्र, रही बात भगवान को भोग लगाने की तो उससे धर्म भ्रष्ट नहीं होता और सिर्फ़ इस कारण से बेचारे गरीब मुसलमान बच्चों को इससे दूर न रखा जाये। काजी साहब ने कहा है कि वे एक विशेषाधिकार समिति के सामने यह मामला रखेंगे (जबकि भोजन निरीक्षण के दौरान वे खुद भी मौजूद थे) और फ़िर सोचकर बतायेंगे कि यह भोजन मदरसे में लिया जाये कि नहीं। वैसे इस योजना की सफ़लता और भोजन के स्वाद को देखते हुए पास के देवास जिले ने भी इस्कॉन से आग्रह किया है कि अगले वर्ष से उस जिले को भी इसमें शामिल किया जाये।

वैसे तो सारा मामला खुद ही अपनी दास्तान बयाँ करता है, इस पर मुझे अलग से कोई कड़ी टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन फ़िर भी यदि मध्यान्ह भोजन योजना में हो रहे भ्रष्टाचार और इसके विरोध हेतु धर्म का सहारा लेने पर यदि आपको कुछ कहना हो तो कहें…


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Wednesday 19 March 2008

यह मेरी आखिरी ब्लॉग पोस्ट हो सकती है…

भाईयों और बहनों, यह मेरी 200 वीं पोस्ट है। “श्मशान वैराग्य” किसे कहते हैं यह कई लोगों को मालूम होगा। जिन्हें नहीं मालूम, उन्हें बता दूँ कि जब हम किसी को श्मशान में छोड़ने जाते हैं और वहाँ उस मुर्दे की मिट्टी को जलते देखते हैं तो मन में एक विशेष भाव पैदा होता है। “यह जगत तो मिथ्या है…”, “यहाँ सब बेकार है…”, "ये दुनिया ये महफ़िल मेरे काम की नहीं…" टाइप की भावनायें पैदा होती हैं। यही भाव आज मेरे मन में भी पैदा हो रहा है।

26 जनवरी 2007 को जब मैंने पहली-पहली पोस्ट लिखी थी, तब मैं सोचता था कि ब्लॉग के जरिये क्रांति बस आने ही वाली है। विगत चौदह माह में 200 पोस्टें लिखने, 50 सब्स्क्राइबर बना लेने, लगभग 18000 बार पढ़े जाने के अलावा मैंने किया क्या है? नेताओं, अफ़सरों, भ्रष्टाचार, अनैतिकता के खिलाफ़ जमकर लिखा, कुछ लोगों ने पसन्द भी किया। एक-एक ब्लॉग को 100-150 लोगों ने पढ़ा भी, लेकिन उससे हुआ क्या? क्या मैंने कुछ हासिल किया? कुछ नहीं…। मुझे आत्मसंतुष्टि के अलावा क्या मिला? कुछ नहीं…। क्या मैं कुछ लोगों के विचारों को प्रभावित कर पाया? या क्या मैंने कुछ लोगों के विचार बदलने में सफ़लता हासिल की? पता नहीं…। मेरे अच्छे-अच्छे लेखों की दो-चार लोगों ने तारीफ़ कर दी तो उससे क्या? इसकी बजाय तो गालीगलौज करने वाले, हिन्दू-मुस्लिम दंगों पर रोटी सेंकने वाले, दलित-दलित, महिला-महिला भजने वाले कई ब्लॉग हैं जो आये दिन छाये रहते हैं, विवाद करते हैं, विवाद पैदा करते हैं, विवादों में ही अपनी दुनिया रमाते हैं, कुछ नकली नामों से लिखते हैं, कुछ नकली नामों से अपने ही ब्लॉग पर टिप्पणी कर देते हैं, यानी कि चालबाजियाँ, साँठगाँठ, उठापटक करने वाले ब्लॉग ज्यादा पढ़े जा रहे हैं। आज तक किसी ब्लॉग एग्रीगेटर के काउंटर पर मैंने टॉप नहीं किया (और मूर्खों की तरह मैं समझता था कि अच्छा लिखना ही काफ़ी है)।

फ़िर क्यों मैं ब्लॉग लिख रहा हूँ, अपना समय नष्ट कर रहा हूँ, अपना पैसा खराब कर रहा हूँ… क्या ब्लॉग लिखने से मुझे कमाई हो रही है? बिलकुल नहीं…। उलटा मेरा कीमती समय, बेशकीमती ऊर्जा, इंटरनेट के खर्चे आदि इसमें लग रहा है। क्या भविष्य में इस प्रकार के लेखन से मुझे कोई कमाई की सम्भावना है? अभी तक तो नहीं लगता…। क्या बड़ी मेहनत से रिसर्च करके तैयार किये गये मेरे लेखों को कोई अखबार छापेगा? यदि छापेगा तो पैसे देगा? यदि बगैर पैसों के छाप भी देगा तो उससे क्या होने वाला है? हजारों लोग यूँ ही रोज लाखों पन्ने काले कर देते हैं, कहीं कुछ होता है क्या? क्या ऐसे लेख लिखने भर से नेता, अफ़सर, उद्योगपति, भ्रष्ट बाबू आदि सुधर जायेंगे? नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं होने वाला, फ़िर मैं ब्लॉग क्यों लिख रहा हूँ? सिर्फ़ अपने मन के लिये, अपने मन को सहलाने के लिये? यदि हाँ तो इसकी कीमत बहुत ज्यादा है, जो मेरे जैसे निम्न-मध्मवर्गीय व्यक्ति के लिये मायने रखती है। तरक्की हुई है, इसमें कोई दो राय नहीं है। पहले 20 सब्स्क्राइबर थे, जो बढ़कर 50 हो गये हैं, पहले प्रति पोस्ट पाठकों का औसत 20-30 ही था जो अब बढ़कर 70-80 हो गया है, एडसेंस खाते में जीरे के समान 5 डॉलर भी जमा हो गये हैं, लेकिन फ़िर वही सवाल कि इस सबका फ़ायदा क्या?

बुजुर्गों ने कहा है कि “शौक ऐसा पालो कि जो तुम्हारी औकात का हो…” क्या ब्लॉग लेखन का शौक मेरे बूते का है? मुझे नहीं लगता। यह शौक अब धीरे-धीरे नशा बनता जा रहा है। जिस तरह से सिगरेट, शराब का नशा होता है, उसी तरह से ब्लॉग लेखन भी एक लत होती है। जब तक आप ब्लॉग नहीं लिख लेते तब तक आप बेचैन रहते हैं, एक प्रकार की “प्रसव-पीड़ा” होती रहती है। किसी समस्या पर नहीं लिख पाते तो मन बेचैन रहता है, यह साफ़-साफ़ “लत” के लक्षण हैं। इस नशे का अगला चरण होता है, “कितने लोगों ने पढ़ा…” उसका अगला चरण होता है, “कितने लोगों ने टिप्पणी की…”, फ़िर विचार मंथन, नहीं पढ़ा तो क्यों नहीं पढ़ा? पढ़ लिया तो टिप्पणी क्यों नहीं की? टिप्पणी की तो विरोधी स्वर क्यों निकाले? यानी अन्तहीन साँप-बिच्छू। (सौभाग्य से अभी मैं नशे के पहले चरण में ही हूँ, यानी कि सिर्फ़ जो मन में आये लिखता हूँ, कोई पढ़े या न पढ़े, टिप्पणी करे न करे, अच्छा बोले या बुरा कोई फ़र्क नहीं पड़ता), लेकिन आखिर यह सब कब तक?

हाल ही में किसी विद्वान ने कहा है कि “अधिक ब्लॉगिंग करने से मानव कर्महीन, निरर्थक और मानसिक खोखला होता जाता है…”। एक मनोचिकित्सक कहते हैं कि Paralysis by Analysis, यानी अच्छा ब्लॉग लिखने के लिये Research and Analysis करना पड़ता है जिससे मानसिक पैरेलिसिस भी हो सकता है, ऊपर से “बुद्धिजीवी” कहलाये जाने का खतरा हमेशा सिर पर मँडराता रहता है। समझ में नहीं आता क्या किया जाये? ब्लॉगिंग पहले-पहल एक शौक होता है, फ़िर वह आत्मसंतुष्टि का साधन बनता है, फ़िर पागलपन और अन्त में एक खतरनाक नशा। ऐसा घातक नशा, जिसका प्रभाव सामने वाले को दिखता तक नहीं… मैं फ़िलहाल दूसरी स्टेज में पहुँचा हुआ हूँ, यानी आत्मसंतुष्टि वाली स्टेज, लेकिन इस पर मैं कब तक रह सकूँगा कह नहीं सकता। बढ़ते खर्चों (और लिखने से कोई कमाई नहीं) तथा ब्लॉग लिखने के लिये होने वाली ऊर्जा विनाश को देखते हुए मेरे पास ज्यादा समय नहीं बचा है…शायद ब्लॉग जगत को अलविदा कहने का वक्त आ गया है।

डिस्क्लेमर : उज्जैन की भांग बहुत प्रसिद्ध है, होली का माहौल है। भंग की तरंग में ऊपर लिखित नायाब, अफ़लातून (और शायद फ़ायदेमंद) विचार सामने आये हैं, जिससे अब मैं वाकई गंभीरता से सोचने लगा हूँ कि भांग का नशा ज्यादा बेहतर है या ब्लॉग लिखने का? दो रुपये की भांग में पूरा दिन दिमाग चकाचक और तबियत झकाझक, जबकि ब्लॉग लिखने से मिलता क्या है… धेला-पत्थर, कुछ तारीफ़ें-कुछ गालियाँ, अब बताइये कौन सा सौदा बेहतर है?


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Monday 17 March 2008

अमेरिकी फ़ंडा : ॠण लेकर घी पियो, अर्थव्यवस्था मजबूत होगी…

American Sub Prime Crisis Indian Economy

जी, मैं कोई मजाक नहीं कर रहा। हालांकि मैं कोई अर्थशास्त्री नहीं हूँ, लेकिन “अमेरिकी रिसेशन” (बाजारों की मंदी) नाम का भूत जब सारी दुनिया को डराता हुआ घूम रहा है, उसके पीछे यही चार्वाक नीति काम कर रही है। अमेरिकी बैंकों और वित्तीय संस्थाओं ने ज्यादा कमाई और ब्याज के लालच में ऐसे-ऐसे लोगों को भी ॠण बाँट दिये जिनकी औकात उतनी थी नहीं, यही है अमेरिकी सब-प्राइम संकट, सरल भाषा में। मंदी छाई हुई है अमेरिका की अर्थव्यवस्था पर, लेकिन घिग्घी बंधी हुई है हमारी और हमारे शेयर बाजारों की। ऐसा क्यों होता है?

“बचत करना पाप है, खर्च करना गुण है…” एक महान अर्थशास्त्री का यह बयान अमेरिका पर कितना सटीक बैठता है, आइये देखते हैं। आमतौर पर मान्यता है कि जापानी व्यक्ति बेहद कंजूस होता है और बचत में अधिक विश्वास करता है। जापानी अधिक खर्च नहीं करते, जापान की वार्षिक बचत लगभग सौ अरब है, फ़िर भी जापानी अर्थव्यवस्था कमजोर मानी जाती है। दूसरी ओर अमेरिकी खर्चते ज्यादा हैं, बचाते कम हैं, यहाँ तक कि अमेरिका निर्यात से अधिक आयात करता है, उसका व्यापार घाटा चार सौ अरब को पार कर चुका है। फ़िर भी अमेरिकी अर्थव्यवस्था मजबूत मानी जाती है और सारी दुनिया उसकी सेहत के लिये फ़िक्रमन्द रहती है।

अब सवाल उठता है कि अमेरिकी लोग खर्च करने के लिये इतना पैसा लाते कहाँ से हैं? असल में वे उधार लेते हैं, जापान से, चीन से, भारत से और भी वहाँ से जहाँ के लोग बचत करते हैं। बाकी सारे देश बचत करते हैं, ताकि अमेरिका उसे खर्च कर सके, क्योंकि लगभग सारे देश अपनी बचत डॉलर या सोने में करते हैं। अकेले भारत ने ही अपनी विदेशी मुद्रा को लगभग 50 अरब डालर की अमेरिकी प्रतिभूतियों में सुरक्षित रखा हुआ है, चीन का आँकड़ा 160 अरब डॉलर का है। अमेरिका ने पूरे विश्व से पाँच खरब डॉलर लिये हुए हैं, इसलिये जैसे-जैसे बाकी का विश्व बचत करता जाता है, अमेरिकी उतनी ही उन्मुक्तता से खर्च करते जाते हैं। चीन ने जितना अमेरिका में निवेश किया हुआ है उसका आधा भी अमेरिका ने चीन में नहीं किया, यही बात भारत के साथ भी है, हमने अमेरिका में लगभग 50 अरब डॉलर निवेश किया है, जबकि अमेरिका ने भारत में 20 अरब डॉलर।

फ़िर सारी दुनिया अमेरिका के पीछे क्यों भाग रही है? इसका रहस्य है अमेरिकियों की खर्च करने की प्रवृत्ति। वे लोग अपने क्रेडिट कार्डों से भी बेतहाशा खर्च करते हैं, जो कि उनकी भविष्य की आमदनी है, इसीलिये अमेरिका निर्यात कम करता है, आयात अधिक करता है, नतीजा – सारा विश्व अपने विकास के लिये अमेरिका के खर्चों पर निर्भर होता है। यह ठीक इस प्रकार है कि जैसे कोई दुकानदार किसी ग्राहक को उधार देता रहता है ताकि वह उसका ग्राहक बना रहे, क्योंकि यदि ग्राहक खरीदना बन्द कर देगा तो दुकानदार का धंधा कैसे चलेगा? इस प्रकार यह चक्र चलता रहता है और उधारी बढ़ती जाती है, इसमें ग्राहक तो उपभोग करके मजे लूटता रहता है, लेकिन दुकानदार उसके लिये मेहनत करता जाता है।

अमेरिकियों के लिये सबसे बड़ा दुकानदार है जापान। जब तक जापानी खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते वे विकास नहीं कर सकते। जापान सरकार ने बचतों पर भी टैक्स लगाना शुरु कर दिया है, लेकिन फ़िर भी वहाँ सिर्फ़ पोस्ट ऑफ़िसों की बचत लगभग एक खरब डॉलर है, यानी भारत की अर्थव्यवस्था का तीन गुना।

सभी प्रमुख अर्थशास्त्री यह मानते हैं कि जब तक किसी देश के लोग खर्च करना प्रारम्भ नहीं करते, देश तरक्की नहीं कर सकता, और सिर्फ़ खर्च नहीं करना है, बल्कि उधार ले-लेकर खर्च करना है। अमेरिका में बसे भारतीय अर्थशास्त्री डॉ जगदीश भगवती ने एक बार मनमोहन सिंह से कहा था कि भारतीय लोग खामख्वाह बचत करते हैं, भारत के लोगों को विदेशी कारों, मोबाइल, परफ़्यूम, कॉस्मेटिक्स पर खर्च करने की प्रवृत्ति बढ़ानी होगी, इससे भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ेगी। सरकार ने इस दिशा में काम करते हुए पिछले एक दशक में जमा पूँजी पर ब्याज दरों को क्रमशः कम किया है, और वह दिन दूर नहीं जब आपकी जमापूँजी सुरक्षित रखने के लिये बैंके उलटे आपसे पैसा लेने लगेंगी। सरकार चाहती है कि हर भारतीय खर्चा करता रहे, अपना पैसा शेयर मार्केट में लगाकर सटोरिया बन जाये। ईपीएफ़ के पैसों को भी बाजार में झोंकने की पूरी तैयारी है।

अब आप सोच रहे होंगे कि दुकानदार-ग्राहक वाली थ्योरी कैसे काम करेगी, क्योंकि जब कर्जा लिया है तो कुछ तो लौटाना ही होगा, यह तो हो नहीं सकता कि दुकानदार देता ही रहे। होता यह है कि जब अमेरिका को किसी देश का कर्ज उतारना होता है तो वह उसे हथियार बेचता है, बम बेचता है, F-16 हवाई जहाज बेचता है, दो बेवकूफ़ देशों को आपस में लड़वाकर पहले तो दोनों को हथियार बेचता है, फ़िर एक पर कब्जा करके उसका तेल अंटी करता है, ताकि अमेरिकियों की कारें लगातार चलती रहें… अंकल सैम की खुशहाली का यही राज है “जमकर खर्च करो…”। बचत करने के लिये और आपस में लड़कर उनका हथियारों का धंधा जारी रखने के लिये दुनिया में कई मूर्ख मौजूद हैं…


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Sunday 16 March 2008

कर्ज लेकर चुकाते भी हो - महामूर्ख हो…

Bank Loan Waiver VDIS Chidambaram

हमारे महान वित्तमंत्री, अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त अर्थशास्त्री और इकोनोमिक्स के विशेषज्ञ माने जाने वाले बाकी के दोनों वीर मोंटेकसिंह अहलूवालिया और मनमोहन सिंह ने किसानों के लिये 60 हजार करोड़ रुपये के कर्जों को माफ़ करने की घोषणा की है। राजकुमार राहुल गाँधी तो एक कदम आगे बढ़कर कहते हैं कि ये कर्जमाफ़ी नाकाफ़ी है, और ज्यादा कर्ज माफ़ किये जाना थे (उसकी जेब से क्या जाता है?)। ये घोषणा चुनावी वर्ष में ही क्यों की है, यह सवाल करना बेकार है, लेकिन एकमुश्त कुछ भी बाँट देने की नेताओं की इस आदत ने ईमानदार लोगों के दिलोदिमाग पर गहरा असर किया है।

जनार्दन पुजारी का नाम बहुत लोगों को याद होगा। जिन्हें नहीं मालूम उनके लिये बता दूँ कि अस्सी के दशक में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्रित्व काल में ये महाशय वित्त राज्यमंत्री थे। इन्हीं महाशय को यह कालजयी काम (लोन बाँटने और उसे खा जाने) का सूत्रधार माना जा सकता है। हमारे यहाँ बड़े-बड़े हिस्ट्रीशीटर को जेलमंत्री और अंगूठाटेक को शिक्षामंत्री बनाये जाने का रिवाज है। पुजारी महाशय ने बैंकों पर दबाव डलवाकर ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में “लोन मेले” लगवाये थे। इन लोन मेलों की खासियत यह थी कि इनमें से 90% के लोन बैंकों को वापस नहीं मिले। लगभग ऐसी ही योजना है, पीएमआरवाय (PMRY), इसमें भी सरकार ने जमकर लोन बाँटे, उस लोन पर सबसिडी दी, और लोग-बाग करीब-करीब वह पूरा पैसा खा गये। कई बार तो मजाक-मजाक में लोग कहते भी हैं कि यदि पैसों की जरूरत हो तो PMRY से लोन ले लो। (कांग्रेस से घृणा करने के कई कारणों में से एक कारण यह भी है कि आजादी के बाद से इसने कभी सुशासन लाने की कोशिश नहीं की, हमेशा भ्रष्टाचारियों और बेईमानों को संरक्षण दिया)

इन्हीं की राह पर आगे चले चिदम्बरम साहब। नहीं, नहीं, मैं अभी 2007-08 की बात नहीं कर रहा। थोड़ा पीछे जायें सन 1997 में। चिदम्बरम जी एक बड़ी अनोखी(?) योजना लेकर आये थे, जिसे उन्होंने VDIS स्कीम का नाम दिया था, Voluntary Disclosure Income Scheme। इस नायाब योजना के तहत उन्होंने कालाबाजारियों, काला पैसा जमा करने वालों, आयकर चुराने वालों (मतलब बड़े-बड़े डाकुओं) को यह छूट प्रदान की थी कि वे अपनी काली कमाई जाहिर कर दें और उसका तीस प्रतिशत टैक्स के रूप में जमा कर दें तो बाकी की सम्पत्ति को सरकार “सफ़ेद” कमाई मान लेगी। लोगों ने इसका भरपूर फ़ायदा उठाते हुए लगभग 35000 करोड़ रुपये की काली सम्पत्ति जाहिर की और सरकार को 10000 करोड़ से अधिक की आय हो गई, है न मजेदार स्कीम !!! आंध्रप्रदेश के कांग्रेस नेता-पुत्र ने उस वक्त अपनी सम्पत्ति 700 करोड़ जाहिर की थी, यानी 250 करोड़ का टैक्स देकर बाकी की सारी धन-दौलत (जो उसने या उसके बाप ने भ्रष्टाचार, अनैतिकता और साँठगाँठ से ही कमाई थी) पूरी तरह सफ़ेद हो गई, उसका वह जो चाहे उपयोग करे।

कहने का मतलब यह कि हमारी नपुंसक सरकारों ने हमेशा जब-तब यह माना हुआ है कि “भई हमसे तो कुछ नहीं होगा, न तो हम काला पैसा जमा करने वालों के खिलाफ़ कुछ कर पायेंगे, न कभी भी हम बड़े-बड़े सफ़ेदपोश डाकुओं के खिलाफ़ कमर सीधी करके खड़े हो पायेंगे, हमारा काम है सत्ता पाना, भ्रष्टाचार करना और फ़िर चुनाव लड़कर ॠण / आयकर / लोन माफ़ करना…”। कानून का शासन क्या होता है, कांग्रेस कभी जान नहीं पाई न ही कभी उसके इसके लिये गंभीर प्रयास किये। हमेशा नेहरू-नेहरू, गाँधी-गाँधी का ढोल पीटने वाले ये गंदे लोग 1952 के सबसे पहले जीप घोटाले से ही भ्रष्टाचार में सराबोर हैं। इन्हीं की राह पकड़ी भाजपा ने (इसीलिये मैं इसे कांग्रेस की “बी” टीम कहता हूँ)।

मध्यप्रदेश सरकार में सबसे पहले अर्जुनसिंह ने झुग्गी-झोंपड़ियों को पट्टे प्रदान किये थे, यानी जो व्यक्ति जिस जमीन पर फ़िलहाल रहता है, वह उसकी हो गई, यानी सरकार ने मान लिया था, कि हममें तो अतिक्रमण हटाने की हिम्मत नहीं है, इसलिये जो गंद यहाँ-वहाँ बिखरी पड़ी है और भू-माफ़िया (जो हमें चन्दे देता है) चाहे तो सारी जमीन हड़प कर ले। इस महान(?) नीति का फ़ायदा यह हुआ कि रातोंरात लोगों ने हजारों की संख्या में झुग्गियाँ तान दीं, जिसे भू-माफ़िया का संरक्षण हासिल रहा, और बाद में उन्हें वहाँ से भगाकर कालोनियाँ काट दी गईं… अगला नम्बर था भाजपा के सुन्दरलाल पटवा का, सत्ता पाने के लिये उन्होंने सहकारी बैंकों से लिये गये किसानों के दस हजार तक के ॠण माफ़ कर दिये, आज दस साल बाद भी सहकारी बैंक उस झटके से नहीं उबर पाये हैं और यह नवीनतम जोर का झटका भी सबसे ज्यादा सहकारी बैंकों को ही झेलना पड़ेगा। गाँवों में किसान बैंक अधिकारियों से अभी से कहने लगे हैं कि “कैसी वसूली, काहे का पैसा, दिल्ली सरकार ने सब माफ़ कर दिया, वापस भाग जाओ…”। सिर धुन रहा है बेचारा वह किसान जिसने लोकलाज के चलते अपना कर्जा चुका दिया।

सभी जानते हैं कि इस प्रकार की कर्जमाफ़ी या आयकर / कालेधन में छूट का फ़ायदा सिर्फ़ और सिर्फ़ चोरों को ही मिलता है, ईमानदारी से कर्ज चुकाने वाला या आयकर चुकाने वाला इसमें ठगा हुआ महसूस करता है, वह भी सोचने पर मजबूर हो जाता है कि अब मैं भी क्यों कर्ज चुकाऊँ? क्यों न मैं भी बिजली चोरी करूँ, आखिर अन्त में सरकार को यह सब माफ़ करना ही है। सबसे ज्यादा गुस्सा उस नौकरीपेशा व्यक्ति को आता है, उसका टैक्स तो तनख्वाह में से ही काट लिया जाता है।

इसलिये देश-विदेशों में बसे भाईयों और बहनों… भारत में तमाम सरकारों का संदेश स्पष्ट है, कि “हम नालायक, निकम्मे और नपुंसक हैं, कर चोरी करने वालों के खिलाफ़ हम कुछ नहीं कर पायेंगे तो माफ़ कर देंगे, बिजली चोरी हमसे नहीं रुकेगी तो बिल माफ़ कर देंगे, अतिक्रमण हमसे नहीं रुकेगा तो “सीलिंग एक्ट” के बारे में सर्वोच्च न्यायालय में हम बेशर्म बन जायेंगे, एक लाख से ज्यादा किसानों की आत्महत्या के बाद चुनाव जीतने के लिये कर्जमाफ़ी देंगे, आतंकवाद या नक्सलवाद को रोकना हमारे बस का नहीं है इसलिये हम तो x, y, z सुरक्षा ले लेंगे, तुम मरते फ़िरो सड़कों पर… गरज यह कि हमसे कानून-व्यवस्था के अनुसार कोई काम नहीं होगा… जो भी टैक्स आप चुकाते हैं या जो निवेश आप करते हैं अन्त-पन्त वह किसी न किसी हरामखोर की जेब में ही जायेगा… और यदि आप कर्ज लेकर उसे चुकाते भी हैं तो आप परले दर्जे के महामूर्ख हैं…


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Sunday 9 March 2008

ऐ लाल झंडे वाले हरामखोरों, दाल-चावल-तेल नहीं खाते क्या?

Communist Party Double Standards Inflation

वित्तमंत्री चिदम्बरम, प्रमुख योजनाकार अहलूवालिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की त्रिमूर्ति एक बेहतरीन अर्थशास्त्रियों की टीम मानी जाती है (सिर्फ़ मानी जाती है, असल में है नहीं)। बजट के पहले सोयाबीन तेल का भाव 60 रुपये किलो था जो बजट के बाद एकदम तीन दिनों में 75 रुपये हो गया… चावल के भाव आसमान छू रहे हैं लेकिन निर्यात जारी है… दालों के भाव को सट्टेबाजों ने कब्जे में कर रखा है, लेकिन उसे कमोडिटी एक्सचेंज से बाहर नहीं किया जा रहा। देश की आम जनता को सोनिया गाँधी के विज्ञापन के जरिये यह समझाने का प्रयास किया जा रहा है कि “हमने पिछले पाँच साल से मिट्टी के तेल के भाव नहीं बढ़ाये”, मानो गरीब सिर्फ़ केरोसीन से ही रोटी खाता हो और केरोसीन ही पीता हो।

तमाम अखबार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहे हैं कि कमोडिटी एक्सचेंजों से खुलेआम सट्टेबाजी जारी है, निर्यात ऑर्डरों में भारी घपले करके, बैकडेट आदि में नकली बिलिंग करके खाद्यान्न निर्यातक, करोड़ों को अरबों में बदल रहे हैं और चिदम्बरम साहब हमे 9 प्रतिशत की विकास दर दिखा रहे हैं। पहले तो बैंकों में ब्याज दर कम कर-कर के जनता को शेयर बाजार और म्युचुअल फ़ण्डों में पैसा लगाने की लत लगा दी, अब बाजार नीचे जा रहा है, विदेशी निवेशक कमा कर चले गये तो त्रिमूर्ति को कुछ सूझ नहीं रहा… समूचा देश सट्टेबाजों के हवाले कर दिया गया है, और माननीय वित्तमंत्री कहते हैं कि “महंगाई को काबू करना हमारे बस में नहीं है, यह एक अंतर्राष्ट्रीय घटना है…”। कांग्रेस एक और प्रवक्ता आँकड़े देते हुए कहते हैं कि “कमाई में विकास होता है तो महंगाई तो बढ़ती ही है”, क्या खूब!!! जरा वे यह बतायें कि कमाई किसकी और कितनी बढ़ी है? और महंगाई किस रफ़्तार से बढ़ी है? लेकिन असल में AC कमरों से बाहर नहीं निकलने वाले सरकारी सचिवों और नेताओं को (1) या तो जमीनी हकीकत मालूम ही नहीं है, (2) या वे जानबूझ कर अंजान बने हुए हैं, (3) या फ़िर इस सट्टेबाजी में इनके भी हाथ-पाँव-मुँह सब चकाचक लालमलाल हो रहे हैं… और आने वाले चुनावों के खर्च का बन्दोबस्त किया जा रहा है।

सबसे आपत्तिजनक रवैया तो लाल झंडे वालों का है, वे मूर्खों की तरह परमाणु-परमाणु रटे जा रहे हैं, नंदीग्राम में नरसंहार करवाये जा रहे हैं, लगातार कुत्ते की तरह सिर्फ़ भौंक रहे हैं, लेकिन समन्वय समिति की बैठक में जाते ही सोनिया उन्हें पता नहीं क्या घुट्टी पिलाती हैं, वे दुम दबाकर वापस आ जाते हैं, अगली धमकी के लिये। पाँच साल तक बगैर किसी जिम्मेदारी और जवाबदारी के सत्ता की मलाई चाटने वाले इन लोगों को दाल-चावल-तेल के भाव नहीं दिखते? परमाणु समझौता बड़ा या महंगाई इसकी उन्हें समझ नहीं है। सिर्फ़ तीन राज्यों में सिमटे हुए ये परजीवी (Parasites) सरकार को एक साल और चलाने के मूड में दिखते हैं क्योंकि इन्हें भी मालूम है कि लोकसभा में 62 सीटें, अब इन्हें जीवन में कभी नहीं मिलेंगी। भगवाधारी भी न जाने किस दुनिया में हैं, उन्हें रामसेतु से ही फ़ुर्सत नहीं है। वे अब भी राम-राम की रट लगाये हुए हैं, वे सोच रहे हैं कि राम इस बार चुनावों में उनकी नैया पार लगा देंगे, लेकिन ऐसा होगा नहीं। बार-बार मोदी की रट लगाये जाते हैं, लेकिन मोदी जैसे काम अपने अन्य राज्यों मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ आदि में नहीं करवा पाते, जहाँ कुछ ही माह में चुनाव होने वाले हैं। जिस तरह से हमारा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया “अमिताभ को ठंड लगी”, “ऐश्वर्या राय ने छत पर कबूतरों को दाने डाले”, जैसी “ब्रेकिंग न्यूज” दे-देकर आम जनता से पूरी तरह कट गया है, वैसे ही हैं ये राजनैतिक दल…जिस तरह एनडीए के पाँच साल में सबसे ज्यादा गिरी थी भाजपा, उसी तरह यूपीए के पाँच साला कार्यकाल में सबसे ज्यादा साख गिरी है लाल झंडे वालों की, और कांग्रेस तो पहले से गिरी हुई है ही…


अब सीन देखिये… चिदम्बरम ने किसान ॠण माफ़ करने की सीमा जून तय की है (किसान खुश), छठा वेतन आयोग मार्च-अप्रैल में अपनी रिपोर्ट सौंप देगा (कर्मचारी खुश), मम्मी के दुलारे राजकुमार भारत यात्रा पर निकल पड़े हैं और उड़ीसा के कालाहांडी से उन्होंने शुरुआत कर दी है (राहुल की प्राणप्रतिष्ठा), परमाणु समझौते पर हौले-हौले कदम आगे बढ़ ही रहे हैं (अमेरिका भी खुश), अखबारों में किसान और कर्मचारी समर्थक होने के विज्ञापन आने लगे हैं, यानी कि चुनाव के वक्त से पहले होने के पूरे आसार बन रहे हैं, लेकिन विपक्षी दल नींद में गाफ़िल हैं। वक्त आते ही “महारानी”, लाल झंडे वालों की पीठ में छुरा घोंप कर (कांग्रेस की परम्परानुसार) चुनाव का बिगुल फ़ूंक देंगी और ये लाल-भगवा-हरे झंडे वाले देखते ही रह जायेंगे। रही बात आम जनता की, चाहे वह किसी को पूर्ण बहुमत दे या खंडित जनादेश, साँप-नाग-कोबरा-अजगर में से किसी एक को चुनने के लिये वह शापित है…


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Saturday 8 March 2008

ऐसे मनी महाशिवरात्रि उज्जैन में…

Mahakaleshwar Temple Ujjain

उज्जैन का महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग एक महत्वपूर्ण धार्मिक स्थान है, बारह ज्योतिर्लिंगों में से इस पिंडी का आकार सबसे बड़ा है। इस महाशिवरात्रि (6 मार्च) के दिन उज्जैन में मन्दिर के सभी शिखरों को स्वर्ण-मंडित करने का काम पूरा हुआ। कुल 118छोटे-बड़े शिखर हैं जिन पर 16 किलो सोने के पत्तर से कलश चढ़ाने का संकल्प पूरा किया गया।

हर छोटे-बड़े मन्दिर में अनियमिततायें, भ्रष्टाचार, मनमानी, भाई-भतीजावाद और पक्षपात चलता रहता है, महाकालेश्वर मन्दिर भी इसका अपवाद नहीं है (पढ़ें यह दो लेख - महाकालेश्वर मंदिर में धर्म के नाम पर और महाकालेश्वर मन्दिर से लाखों की तांबे की पट्टियाँ गायब)। जैसा कि हर शिवरात्रि को यहाँ होता है, मन्दिर समिति, प्रशासन और नागरिकों की बैठक में लिये गये निर्णयों पर ईमानदारी से अमल नहीं होता। इस बार भी मंदिर में कई स्थानों पर भक्तों के लिये लाइन में खड़े होने हेतु शामियाने (टेंट) और गर्मी से पैरों को बचाने के लिये मैटिंग की व्यवस्था कई जगह नहीं थी, इस कारण महिलाओं, वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों को काफ़ी तकलीफ़ उठानी पड़ी।

रही-सही कसर तीन “P” ने पूरी कर दी, तीन “P” अर्थात प्रशासन, पुलिस और पंडे-पुजारी। जहाँ आम जनता धूप में बगैर पानी पिये तीन-तीन घंटे लाइन में खड़े होकर किसी तरह गर्भगृह के सामने पहुँच पा रही थी, दूसरी ओर वीआईपी लोग, उनके चमचे, उनके लगुए-भगुए, उनके चाचे-भतीजे सबके सब “विशेष दर्शन गेट” से (जिसमें 200/- रुपये का शुल्क देकर पिछले दरवाजे से प्रवेश करवाया जाता है) अन्दर सीधे नन्दीगृह में आसन जमाकर बैठ गये थे (व्यवस्था कुछ ऐसी है कि, गर्भगृह के सामने बड़ा द्वार है, उसके सामने नंदी विराजमान होते हैं वहाँ एक हॉलनुमा स्थान है और उसके बाद स्टेडियमनुमा सीढ़ियाँ बना दी गई हैं जिससे दर्शनार्थी दूर से भी दर्शन कर सके)।

विशेष मौकों, जैसे महाशिवरात्रि, श्रावण के सभी सोमवार, नागपंचमी, सोमवती-शनीचरी अमावस्या आदि के मौके पर आम जनता का गर्भगृह में प्रवेश प्रतिबन्धित होता है। लेकिन आलम यह था कि गर्भगृह में तो पंडे-पुजारियों ने कब्जा जमा रखा था, नंदीहॉल में सब वीआईपी पसर गये थे, आम जनता जो कि हजारों की संख्या में थी और जिन्हें पुलिस के जवान सतत धकिया रहे थे, दूर से सीढ़ियों से भी ठीक से दर्शन नहीं कर पा रहे थे।

महाशिवरात्रि के अगले दिन साल में एक बार दोपहर को भस्मारती की जाती है, जिसमें प्रशासन और सिंधिया राजवंश की ओर से पूजा की जाती है (बाकी वर्ष भर भस्मारती का समय तड़के तीन बजे का होता है) को भी स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया था। उज्जैन के कलेक्टर को नाराज होकर गर्भगृह से निकल जाना पड़ा, क्योंकि वह भी कुछ बोलने की स्थिति में नहीं थे। खुद ही सोचिये, कमिश्नर, आईजी, डीआईजी की पत्नियों, सालों और भतीजों के सामने एक कलेक्टर की क्या हैसियत है? उस दिन (7 मार्च) भी जनता को दो घंटे तक बाहर धूप में खड़ा रखा गया और शासन की विशेष पूजा सम्पन्न हुई।

बहरहाल, उस दिन उज्जैन में भांग घोटे वालों ने जमकर कमाया, जो भांग आमतौर पर बिकती है उससे दोगुनी बिक्री हुई, लोगों ने जमकर रगड़े छाने, ठंडाई पी (मिलावटी ही सही) और बमभोले का नाम लिया। तमाम बुरी बातों में से एक अच्छी बात निकलकर सामने आई, वह यह कि जिन 118 स्वर्ण कलशों के लिये प्रत्येक दानदाता से 1 लाख 51 हजार की राशि ली जा रही है, उसमें से एक कलश के लिये दान देने वाली एक गरीब महिला है, जो कि मिल में काम करती थी, विधवा हो जाने, पुत्रों के दुत्कार दिये जाने और बुढ़ापे का कोई अन्य कमाई का साधन न होने के बावजूद उसने अपनी जीवन भर की सारी कमाई 1 लाख 51 हजार रुपये, मंदिर को दान कर दिये और अब आज की तारीख में उसका बैंक बैलेंस मात्र 400 रुपये है।

बाकी के 100 से ज्यादा कलश के लिये दान देने वालों में, अतिक्रमणकर्ता, गौशाला का चन्दा खाने वाले, शिक्षा माफ़िया, रिटायर होने के बाद “अचानक” ईमानदार बने हुए आईएएस अधिकारी, गरीबों का शोषण करने और सरकार को चूना लगाने वाले उद्योगपति, मध्यप्रदेश की बदहाल सड़कों के लिये जिम्मेदार बड़े-बड़े ठेकेदार और इंजीनियर जैसे लोग हैं, जो चाहें तो अकेले ही 16 किलो का सोना दान कर सकते हैं। लेकिन धन्य है वह गरीब महिला, जिसके कारण वह तमाम स्वर्ण कलश पवित्र हो गये। तो ऐसे मनी महाशिवरात्रि उज्जैन में...
(यह लेख अखबारी रिपोर्टों और चश्मदीद गवाहों के बयान पर लिखा गया है, क्योंकि मैं तो पिछले काफ़ी समय से महाकाल मन्दिर नहीं गया)…

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Friday 7 March 2008

अनचाहे टेलीफ़ोन “कॉल्स” से बचने के कुछ और नुस्खे…

Unwanted Telephone Calls Telemarketing

उज्जैन एक कस्बेनुमा बड़ा शहर है, बड़ा शहर है इसलिये इसे अपने पड़ोसी इन्दौर जैसा महानगर बनने की “फ़ुल्टू” चाह है, इन्दौर जो कि “मिनी मुम्बई” कहलाता है, फ़ुल्ल मुम्बई बनना चाहता है और मुम्बई को मनमोहन सिंह साहब शंघाई बनाने पर तुले हुए हैं… (अबे कहाँ से कहाँ पहुँच गया बहकते-बहकते… टेलीफ़ोन की बात कर रहा था न !!!)…

हाँ तो बात हो रही थी, अनचाहे फ़ोन कॉल्स की। कस्बे से नगर और फ़िर शहर बनने की प्रक्रिया में कुछ विकृतियाँ हमें झेलनी ही पड़ती हैं, जैसे कारों की बढ़ती जनसंख्या, तेजी से बाइक दौड़ाते रईसजादे, जींस और टॉप के बीच में एक इंच से अधिक का गैप दिये हुए लड़कियाँ आदि-आदि, इन्हीं में से एक बीमारी है प्रायवेट कम्पनियों द्वारा मौके-बेमौके किये जाने वाले कॉल्स। हर निजी बीमा, बैंक, फ़ायनेंस, शेयर दलाल कम्पनी को लगता है कि हर व्यक्ति उसका ग्राहक है, उठाया फ़ोन और घुमा दिया।

एक बार बजाज अलायंज वालों का बारहवीं बार फ़ोन आया। जाहिर है कि उधर से लड़की की मीठी आवाज सुनाई दी, “नमस्कार, हमारी कम्पनी ने आपको एक “लकी विनर” के तौर पर चुना है, क्या आप आज दोपहर में 4 बजे अपनी पत्नी के साथ हमारे दफ़्तर में आ सकते हैं?”
इसके पहले ग्यारह बार मैं उसे “नहीं, आज बिजी हूँ”, “आज बाहर जा रहा हूँ”, “आज बीमार हूँ…”, “साहब घर पर नहीं हैं…”, “पिताजी से पूछ कर बताऊँगा…”, आदि कहकर टाल चुका था, लेकिन फ़िर भी डायरेक्ट्री उठाकर पता नहीं क्यों वह मेरा ही नम्बर घुमाये जाती थी (या शायद यह मेरी मीठी गलतफ़हमी थी)। आखिर में मुझे शराफ़त छोड़कर “अपनी वाली” पर आना ही पड़ा…

मैंने उससे पूछा, “पहले तू (जी हाँ “तू” ही कहा) ये बता कि तुझे यह नम्बर कहाँ से मिला?”
“जी सर, यह तो हम ‘रैण्डमली सिलेक्ट’ करते हैं और लकी विनर को कम्पनी ऑफ़िस बुलाकर गिफ़्ट देते हैं…”
“क्यों ऑफ़िस बुलाकर क्यों? घर आकर गिफ़्ट दे दे…”
“सर, बात यह है कि हमारे मार्केटिंग मैनेजर आपको एक सेमिनार भी देंगे…”
“यानी मुफ़्त में कुछ नहीं मिलेगा ना? फ़िर क्यों बुला रहे हो?…”
“नहीं सर हमारी कम्पनी जीवन बीमा के साथ-साथ एक अनोखी निवेश योजना लाई है (अब वो भी अपनी वाली पर आ गई थी)… उसके बारे में आपको समझाना था…”
“तो घर आकर समझा दे ना (तुझे देख भी लूँगा)…”
“सर यहाँ ऑफ़िस में एक साथ सभी को समझा सकते हैं ना इसलिये… (यानी कि मेरे जैसे और कई वहाँ बुलाये जाने वाले थे (बीस बकरे बुलाये और उसमें से दो भी हलाल हो गये तो आज की तनख्वाह तो निकली, यह मंशा होगी शायद…)…”
अब तक मेरा धैर्य जवाब दे चुका था, मैंने कहा “फ़ोन रख…”
“जी”, वह बुरी तरह चौंकी (किसी मधुर आवाज में बात करने वाली बाला को यह लफ़्ज सुनने की आदत नहीं होती), “हाँ… मैने कहा फ़ोन रख, और यह नम्बर जो डायल किया है अच्छी तरह से नोट कर ले… यदि गलती से भी तेरे ऑफ़िस से किसी ने इस नम्बर पर तेरहवीं बार फ़ोन कर दिया, तो न वह फ़ोन रहेगा, न वह काँच रहेगा जिसके पीछे तू बैठी है…”
“बड़ी गलत बात करते हैं आप तो, आप धमकी दे रहे हैं हमें…”
“हाँ दे रहा हूँ…”
बस वह दिन है और आज का दिन है कोई फ़ोन नहीं आया कि बीमा करवा लो।

आईसीआईसीआई वालों ने भी क्रेडिट कार्ड दिलवाने के लिये फ़ोन किया था, “नमस्कार, मैं ICICI Bank से बोल रही हूँ, सुरेश जी हैं क्या?” (इतना सुनते ही कान तो खड़े हो ही गये थे…)
मैंने कहा, “जी नहीं, सुरेश जी तेल लेने गये हैं…”
ICICI वाली लड़की समझदार थी, पहली बार में ही माजरा समझ गई कि “तेल लेने गये हैं” का क्या मतलब होता है, और फ़िर कभी उसका फ़ोन नहीं आया।

रिलायंस मनी वाले डीमैट खाता खुलवाने के पीछे पड़े थे, “सर नमस्कार, क्या आपको मालूम है कि रिलायंस पावर का शेयर मार्केट में आने वाला है?”
“नहीं मुझे तो नहीं मालूम…”
“सर टीवी पर ऐड तो दिखा रहे हैं”
“मेरे यहाँ टीवी नहीं है…”
“सर रिलायंस मनी में आप शेयर खाता खुलवा सकते हैं बिलकुल मुफ़्त में…”
“शेयर खाता क्या होता है?”
“यह एक खाता होता है जिसे डीमैट कहते हैं, इससे आप शेयर खरीद और बेच सकते हैं”
“लेकिन मैं तो सट्टेबाजी नहीं करता…”
“नहीं-नहीं सर, शेयर बाजार कोई सट्टा नहीं है, यह तो बिजनेस है आपके फ़ायदे का…”
“लेकिन मैं तो नगर निगम में सफ़ाई-कर्मचारी हूँ… मुझे बिजनेस क्यों करना चाहिये?”
“अच्छा सर नमस्कार, मैं आपको बाद में फ़ोन करती हूँ…” (यदि मैं उसे बता देता कि मैं LIC एजेंट हूँ और चार साल से शेयर में ट्रेडिंग कर रहा हूँ, तो उस नाजनीन का दिल टूट जाता न !!! हो सकता है कि सदमे से वह आत्महत्या भी कर लेती…)

लेकिन जिस तरह से ये लोग मेहनत कर रहे हैं उससे लगता है कि उज्जैन की दस प्रतिशत समझदार जनता (यानी मेरे जैसी) को छोड़कर, बाकी सब या तो लोन ले लेंगे, या बीमा करवा लेंगे, या क्रेडिट कार्ड बनवा लेंगे, या डीमैट खाता खुलवा लेंगे। भाईयों और बहनों, मैं तो कभी “येड़ा” बनकर, कभी “शाणा” बनकर, कभी “भाई” बनकर तो कभी “झूठों का सरताज” बनकर फ़िलहाल तो गला कटवाने से बचा हुआ हूँ, लेकिन नये-नये फ़ोन, नई-नई आवाजों में आने अभी बन्द नहीं हुए हैं…

यदि किसी को ऐसी तकनीक मालूम हो कि घर बैठे ही फ़ोन पर सामने वाले के कान के नीचे एक जोरदार आवाज निकाली जा सके, तो मुझे बतायें…

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Sunday 2 March 2008

“दैनिक भास्कर” की चाय पार्टी नौटंकी

Dainik Bhaskar Indore Tea Party

हाल ही में इन्दौर में दैनिक भास्कर अखबार द्वारा एक सामूहिक चाय पार्टी का आयोजन किया गया था। जिसमें लगभग 32000 लोगों ने एक साथ चाय पी और इस “करतब” को गिनीज बुक ऑफ़ वर्ल्ड रिकॉर्ड में जगह दी गई। इसके लिये गिनीज बुक की विशेष प्रतिनिधि इन्दौर आईं थीं और उन्होंने सारे वाकये की वीडियो रिकॉर्डिंग भी की।

सबसे आपत्तिजनक लेकिन मजे की बात यह थी कि इस बड़े तामझाम को “इन्दौर के विकास” से जोड़ा गया। महीने भर तक “भास्कर” में बड़े-बड़े विज्ञापन देकर बताया गया कि “सारा इन्दौर” दैनिक भास्कर के साथ एकजुट होगा, इससे इन्दौर की एकता प्रदर्शित होगी, इससे इन्दौर का विकास होगा आदि-आदि। अमूमन ऐसी लफ़्फ़ाजियाँ आमतौर पर मार्केटिंग “गुरु”(?) अपनाते रहते हैं। प्रत्यक्ष तौर पर किसी मूर्ख को भी दिखाई दे रहा है कि यह सारी कवायद इन्दौर के विकास (?) के लिये तो बिलकुल नहीं थी, सिर्फ़ “रिकॉर्ड” बनाने के लिये भी नहीं थी, यह साफ़-साफ़ दैनिक भास्कर की मार्केटिंग का एक फ़ंडा था, जिसमें ब्रुक बाँड रेड लेबल नाम की चाय कम्पनी ने भी एक प्रमुख भूमिका निभाई।

हम भारतवासियों को नाटक-नौटंकी-खेल-तमाशे-झाँकी-झंडे की जैसे आदत सी पड़ गई है, यदि कोई काम सीधे तौर पर ईमानदारी से कर दिया जाये तो लगता ही नहीं काम हुआ है। कोई भी काम करने के लिये (और यहाँ तो कोई काम भी नहीं करना था, चाय पिलाने के अलावा) बड़ा सा तमाशा होना जरूरी है। फ़िर उस तमाशे को कोई एक “नोबल” सा नाम दिया जाये, ताकि लोगों को लगे कि “देखो हम तो कितने नाकारा हैं कि घर से उठकर मुफ़्त की चाय पीने भी नहीं जा सकते, और अगला है कि मेहनत किये जा रहा है इन्दौर के विकास के लिये, कितनी पीड़ा है उसके मन में इन्दौर की तरक्की के लिये।

एक साथ हजारों लोगों के चाय पीने से इन्दौर का विकास कैसे होगा यह समझ में नहीं आता, क्या उससे खराब सड़कें ठीक हो जायेंगी, या हजारों कप चाय पीने भर से इन्दौर के भदेस लोग ट्रैफ़िक नियम सीख जायेंगे, या एक स्टेडियम मे इकठ्ठे होकर गाना-बजाना कर लिया तो इन्दौर का प्रदूषण कम हो जायेगा, या फ़िर भू-माफ़िया अचानक गाँधीवादी हो जायेगा और हथियाई हुई जमीनें सरकार को वापस भले न करे, लेकिन उसके पूरे पैसे सरकार को दे देगा।

जाहिर है कि ऐसा कुछ भी नहीं होना है, न कभी हुआ है, न कभी होगा। लेकिन भारत की जनता को ऐसी नौटंकियों से बहलाया खूब जा सकता है, और इस काम में हमारे नेता और कथित मार्केटिंग गुरु उस्ताद हैं, लेकिन कोढ़ में खाज की बात यह है कि अब इस तमाशे में अखबार भी शामिल हो गये हैं, उन्हें भी अपनी “रीडरशिप” और “खपत संख्या” की चिंता सताने लगी है। जिस अखबार को सरकार, सरकारी कारिंदों, भ्रष्ट अधिकारियों, भू-माफ़ियाओं, अवैध अतिक्रमणों, प्रदूषण जैसी समस्याओं को लेकर अपने अखबार में आग उगलना चाहिये, रोजाना एक से बढ़कर एक भंडाफ़ोड़ करना चाहिये, प्रशासन की नाक नाली में रगड़ना चाहिये, वह चाय पिलाने में लगा हुआ है “विकास” और “एकता” के नाम पर…

हालांकि यह कोई पहला और आखिरी उदाहरण नहीं है, कुछ माह पहले भी मध्यप्रदेश सरकार ने सभी स्कूलों में बच्चों को “गरीबी हटाने” की शपथ दिलवाई थी। अब खुद ही सोचिये, स्कूलों में बच्चों को गरीबी हटाने की शपथ दिलाने से गरीबी कैसे मिट सकती है? जिन आईएएस अफ़सरों और सरकार ने मिलकर यह नौटंकी रचाई थी, गरीबी तो दर-असल उन्हीं लोगों के कारण फ़ैली है, भला उसमें स्कूली बच्चे क्या करेंगे? लेकिन नहीं, वही तथाकथित “उत्सवशीलता” और “जनभागीदारी” के नाम पर जैसे धर्मगुरु तमाशे करते हैं, आये दिन सरकारें, एनजीओ, प्रशासन कुछ न कुछ करता रहता है। कभी एड्स को लेकर मानव श्रृंखला बनाई जायेगी (भले ही अस्पतालों की हालत नरक से बदतर बना दी हो), कभी बच्चों के हाथों में तख्तियाँ पकड़ा कर पोलियो का प्रचार किया जायेगा, कभी कोई प्रवचनकार अपने ढोल-नगाड़े-बैंड-बाजे के साथ एक लम्बी सी शोभायात्रा निकालेंगे (जाहिर है कि विश्व शांति के नाम पर), कहने का मतलब यह कि ईमानदारी से काम करने के अलावा सब कुछ किया जाता है। इस सारे खेल में लाखों रुपया कभी एनजीओ खा जाते हैं, कभी अफ़सर खा जाते हैं, कभी ठेकेदार और उद्योगपति खा जाते हैं…

जनता भी ऐसी होती है कि जैसे उसे अपनी समस्याओं से कोई लेना-देना ही न हो। लोग-बाग आते हैं, तमाशा देखते हैं, चाय-वाय पीते हैं, प्रवचन हों तो तर घी का चकाचक प्रसाद ग्रहण करते हैं, पिछवाड़े से हाथ पोंछते हैं और अपने-अपने घर !!! वाकई क्या मूर्खता है… रही बात दैनिक भास्कर की, तो फ़िलहाल तो वह “माल” कूटने में लगा हुआ है, ढेरों विज्ञापन, ढेरों संस्करण, न जाने क्या-क्या बेचने के लिये विशेष परिशिष्ट (?), महिलाओं की किटी पार्टी जैसी थर्ड क्लास बात की भी पेज भर की रिपोर्टिंग, ताजमहल के लिये SMS भिजवाने की मुहिम, हिन्दी की दुर्दशा और भाषा का भ्रष्टाचार बढ़ाने में भी ये सबसे आगे हैं… आखिर ये हो क्या रहा है? और खुद को कहलाते हैं भारत का सबसे ज्यादा पढ़ा जाने वाला अखबार (आज तक चैनल भी ऐसा ही दावा करता रहा है, और उसका स्तर क्या है सभी जानते हैं)। सिर्फ़ एक छोटी सी बात यह भूल गये हैं वह है “पत्रकारिता और अखबार का लक्ष्य तथा उनकी सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियाँ”…


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