Monday, December 15, 2008

क्या NDTV में दाऊद का पैसा लगा हुआ है?

NDTV, India-Pakistan Relation, Cricket

भारत के खेल मंत्री श्री गिल ने बयान दिया है कि भारत की क्रिकेट टीम को पाकिस्तान का दौरा नहीं करना चाहिये। असल में गिल साहब अभी पूरी तरह “अफ़सर” से “नेता” नहीं बन पाये हैं और उनमें “सेकुलरिज़्म” का कीड़ा भी पूरी तरह घुस नहीं पाया है, सो उन्होंने आम जनता की भावना को शब्दों में मीडिया के सामने उतार दिया।

अब भारत में लाखों व्यक्ति और काफ़ी संस्थान जान चुके हैं कि पाकिस्तान में दाऊद इब्राहीम का नेटवर्क जबरदस्त मजबूत है। पाकिस्तान में होने वाली किसी भी “बड़ी आर्थिक गतिविधि” में उसका “हिस्सा” निश्चित रूप से होता है। उल्लेखनीय है कि पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड लगभग कंगाली की हालत में पहुँच चुका है। भारत की क्रिकेट टीम के दौरे का सपना देखकर वे अपने बुरे दिन उबारना चाहते हैं, लेकिन आतंकवाद की जो फ़सल उन्होंने इतने सालों में उगाई है, उस “गाजरघास” के कुछ बीज मुम्बई हमलों में शामिल थे, अब भारत की आम जनता पाकिस्तान से सम्बन्ध पूरी तरह खत्म करने के मूड में हैं, लेकिन “कांग्रेसी नेता”, “सेकुलरिज़्म से पीड़ित लोग”, और “नॉस्टैल्जिया में जीने वाले तथा कुछ गाँधीवादी लोग” अभी भी पाकिस्तान से दोस्ती का राग अलाप रहे हैं। असल में भारत में तीन तरह के लोग अब भी “पाकिस्तान-प्रेम” से बुरी तरह ग्रसित हैं, पहले वे लोग जो विभाजन के समय यहाँ रह गये (जाना तो चाहते थे), उन्हें अभी भी लाहौर की हवेलियाँ, बाजार, मुजरे वगैरह याद आते रहते हैं, दूसरे हैं फ़िल्म कलाकारों और नचैयों की एक जमात, जिसे दाऊद भाई अपने इशारों और पैसों पर यहाँ-वहाँ-जहाँ-तहाँ नचवाते रहते हैं, तीसरे हैं “मोमबत्ती छाप सेकुलर गैंग”, जो हजार बार गलत साबित होने के बावजूद भी पाकिस्तान को जबरन अपना “छोटा भाई” मानने पर उतारू है (NDTV इस तीसरे टाइप की कैटेगरी में आता है)।




जैसे ही गिल साहब का यह बयान आया फ़ौरन से भी पहले NDTV ने अपनी खबरों में उसे हाइलाईट करना शुरु कर दिया, चैनल पर उपस्थित एंकरों ने खुद अपनी तरफ़ से ही बयानबाजी शुरु कर दी कि “खेल मंत्री को दौरा रद्द करने का कोई अधिकार नहीं है…” “भारत-पाकिस्तान के आपसी सम्बन्ध सामान्य बनाने के लिये यह दौरा बहुत जरूरी है…”, “यह दौरा सिर्फ़ सुरक्षा कारणों से रद्द किया जा सकता है…”, “इससे क्रिकेट का बहुत नुकसान होगा…”, “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…”, आदि-आदि-आदि-आदि, यानी कि “फ़ोकटिया शब्दों की लफ़्फ़ाज़ी” चालू हो गई, जिसमें NDTV पहले से ही माहिर है, और “कमाई” करने के मामले में भी, जाहिर है कि तत्काल SMS भी मंगवाये जाने लगे कि “भारत को पाकिस्तान का दौरा करना चाहिये या नहीं…” हमें SMS करें और हमारी जेब भरें…




सेकुलर और NDTV जैसे लोग शायद यह भूल जाते हैं कि खेल या अन्य किसी भी प्रकार के खेल सम्बन्ध “शरीफ़ों” और “सभ्य नागरिकों” से ही रखे जाते हैं, जो देश अपने जन्म से ही घृणा फ़ैलाने में लगा हुआ हो, जहाँ पाठ्यक्रम में ही बाकायदा “जेहाद” की शिक्षा दी जाती है, जहाँ के नौनिहाल “भारत (बल्कि विश्व) में इस्लाम का परचम फ़हराने के उद्देश्य से ही बड़े होते हैं, उस देश से सम्बन्ध रखने की क्या तुक है? और “खेल में राजनीति नहीं होना चाहिये…” का तर्क तो इतना बोदा और थोथा है कि ये सेकुलर लोग इस बात का भी जवाब नहीं दे सकते कि रंगभेद के जमाने में दक्षिण अफ़्रीका ने भारत क्या बिगाड़ा था, जो हमने उससे सम्बन्ध तोड़ रखे थे? या कि इसराइल ने भारत के कौन से हिस्से पर कब्जा कर लिया था कि यासर अराफ़ात को गले लगाते-लगाते उससे भी हमने सम्बन्ध तोड़ रखे थे? क्या यह व्यवहार खेल में राजनीति नहीं थी? और सबसे बड़ी बात तो यह कि पाकिस्तान के साथ न खेलने से हमारा क्या नुकसान होने वाला है? कुछ भी नहीं। सारा विश्व इस समय पाकिस्तान के खिलाफ़ है, हमें इस माहौल का फ़ायदा उठाना चाहिये, न कि अपना परम्परागत “गाँधीवादी” तरीका अपनाकर मामले को ढीला छोड़ देना चाहिये। लेकिन इस देश में देश का स्वाभिमान देखने से ज्यादा “पैसे के भूखे” लोग हैं, उन्हें तत्काल “डॉलर” का नुकसान दिखाई दे रहा है। जबकि असल में नुकसान होगा पाकिस्तान क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड का, यानी प्रकारान्तर से दाऊद का भी, फ़िर क्यों भाई लोग क्रिकेट खेलने के पीछे पड़े हैं। यहीं से भारत के कुछ “खास” लोगों पर शक मजबूत होता है। पाकिस्तान से मधुर सम्बन्ध बनाये रखने में बासमती चावल, कश्मीरी शॉल, शक्कर, आलू, पान के करोड़ों में “खेलने-खाने-खिलाने” वाले आयातक और निर्यातकों की एक बहुत बड़ी गैंग के अपने स्वार्थ हैं, और इन्हें देश के स्वाभिमान से कभी भी कोई लेना-देना नहीं रहा।

यह बात भी सिद्ध हो चुकी है कि पाकिस्तान में सेना और आईएसआई का शिकंजा वहाँ के प्रत्येक वित्तीय संस्थान पर कसा हुआ है। पाकिस्तान की डॉ आयशा सिद्दिकी-आगा द्वारा एक अंतर्राष्ट्रीय सेमिनार में सन् 2000 में प्रस्तुत एक पेपर “पावर, पर्क्स, प्रेस्टीज एण्ड प्रिविलेजेस – मिलिटरी इकॉनामिक एक्टिविटीज इन पाकिस्तान” में उन्होंने बताया है कि पाकिस्तान ही एकमात्र ऐसा देश है जहाँ कि सेना का हरेक संस्थान और हरेक जमात पर पूरा नियन्त्रण है। अध्ययनों से पता चला है कि पाकिस्तान में चार विशालकाय फ़ाउण्डेशन हैं 1) फ़ौजी फ़ाउण्डेशन (FF), 2) आर्मी वेलफ़ेयर ट्रस्ट (AWT), 3) बहारिया फ़ाउण्डेशन (BF), 4) शाहीन फ़ाउण्डेशन (SF), इन विभिन्न ट्रस्टों और फ़ाउण्डेशनों पर पाकिस्तान फ़ौज का पूर्ण कब्जा है, पाकिस्तान की आर्थिक धुरी में ये काफ़ी महत्वपूर्ण माने जाते हैं (सन्दर्भ - आर वैद्यनाथन रेडिफ़. कॉम 10/12/08)। ऐसे में यह मानना मूर्खतापूर्ण ही होगा कि आर्थिक रूप से मजबूत पाकिस्तान हमारा दोस्त बन सकता है, बल्कि वह जितना आर्थिक रूप से सम्पन्न होगा, वहाँ की सेना और दाऊद इब्राहीम ही आर्थिक रूप से मजबूत होते जायेंगे। ऐसे में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलना यानी उन्हें संजीवनी प्रदान करने जैसा होगा, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि पाकिस्तान की पूर्ण आर्थिक नाकेबन्दी की जानी चाहिये, जैसे एक “भोगवादी” वर्ग भारत में है वैसा ही पाकिस्तान में भी है, उसके आर्थिक हितों पर चोट होना जरूरी है। पाकिस्तान में सेना ने हमेशा ही कुछ कठपुतलियों को प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति बनाये रखा है और उनसे कोई उम्मीद रखना बेकार ही होगा। खुद जरदारी की यह घोषणा बेहद हास्यास्पद है कि बेनज़ीर की हत्या की जाँच स्कॉटलैण्ड यार्ड से करवाई जायेगी, अर्थात उन्हें अपने देश की पुलिस पर ही भरोसा नहीं है, ऐसे में भारत उस व्यक्ति पर भरोसा क्यों करे जिसका अतीत दागदार है और अपने “बिजनेस”(?) को बढ़ाने के लिये जिस व्यक्ति के दाऊद के साथ रिश्ते सरेआम जाहिर हो चुके हैं? असल में जरदारी और प्रधानमंत्री सिर्फ़ “टाइमपास” कर रहे हैं, और भारत मूर्ख बनता हुआ लग रहा है। जरूरत इस बात की है कि सबसे पहले हम “गुजराल डॉक्ट्रिन” को कूड़े में फ़ेंकें और पाकिस्तान को अपना “छोटा भाई” मानना बन्द करें।

पाकिस्तान के खिलाफ़ अभी हमने युद्ध की मुद्रा बनाना शुरु ही किया है, लेकिन उससे पहले ही NDTV ने “भाईचारे” का राग छेड़ना शुरु कर दिया है, “खेल को राजनीति से दूर रखना चाहिये…” रूपी उपदेश झाड़ने शुरु हो गये हैं। उधर अरुन्धती रॉय ने विदेश में अंग्रेजी अखबारों में भारत और हिन्दुओं के खिलाफ़ जहर उगलना जारी रखा है… ऐसे में शक होता है कि कहीं दाऊद के कुछ “गुर्गे” सफ़ेदपोशों के भेष में हमारे बीच में तो मौजूद नहीं हैं, जो जब-तब पाकिस्तान से दोस्ती का “डोज़” देते रहते हैं? कहीं भारत के कुछ खास लोगों की पाकिस्तान में बैठे खास लोगों से कुछ गुप्त साँठगाँठ तो नहीं, जो हमेशा भारत पाकिस्तान के आगे झुक जाता है?

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35 comments:

संजय बेंगाणी said...

दाऊद ने केवल टपोरी ही नहीं पुलिस, नेता, पत्रकार, समाजसेवी, फिल्मकार, टीवी शो वाले भी पाले हुए है, जो वफादारी में कुत्तों से कम नहीं है. मगर स्वार्थी भी है. हर बार पूँछ हिलाने के पैसे लेते है और पूँछ हिलाने का कोई मौका नहीं चुकते.

चन्दन चौहान said...

NDTV ही एक यैसा न्यूज चौनल है जिसे कि पाकिस्तान सरकार ने अपने यहाँ दिखाने का इजाजद दे रखा है। आखिर क्या कारण है जाँच होना चाहिये। किसका पैसा लगा है NDTV में

Film Achchi hai said...

Hello Suresh Chiplunkar ji...

Heartly thanks for your comment.

It was really encouraging.


your post was extremely thinking.

you really think.

Though I don't agree with what you all said. Meaningly you were right.

keep on doing what you do.

Lot of good wishes.

God bless you.

Gajendra singh bhati

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COMMON MAN said...

बिल्कुल जांच होना चाहिये, मुझे तो लगता है कि हर चैनल कहीं न कहीं से विदेशी मदद प्राप्त कर रहा है, दुआ साहब में यह भावना कुछ जरूरत से ज्यादा ही है, मैं तो इन सब्से यह प्रार्थना करता हूं कि पाकिस्तान में जाकर रहें और वहां यह धर्मनिरपेक्षता लागू करायें, बुरी बात कहना अच्छा नहीं लगता, लेकिन अगर इन चैनलों वालों, नेताओं , बडे बिजनेस महारथियों और अफसरों के घरवाले आतंकी वारदातों में मरने लगेंगे उस दिन इनके पीछे घुस जायेगी यह उदारता.

sareetha said...

आपकी बात में दम है । मुझे तो पिछले चार - पांच सालों से ये लगता है कि आज तक,स्टार न्यूज़ और इंडिया टी वी खुले आम दाउद का महिमा मंडन कर लोगों के दिलो दिमाग पर नशा सा तारी कर रहे हैं । सरकार की नाक के नीचे दाउद की निजी ज़िंदगी से जुडे फ़ुटेज और किस्सागोइयां कभी ना कभी . कहीं ना कहीं , किसी ना किसी पर तो अपना प्रभाव छोडती ही होंगी । क्या समाचार चैनलों पर दिखाइ जाने वाली ये एक्सक्लूसिव खबरें खास मकसद से नहीं दिखाइ जाती । लोगों से बात करो , तो वे इस बारे में कुछ सुनने समझने को तैयार ही नहीं होते ।

Amit said...

hello suresh jee
bhaut hi accha likha hai aapne...kaafi sateek vivran diya hai aapne...aapka kehna ekdum sahi hai...NDTV he nahi lagbhag har ek news channel apna swarath dekhte hain..apnee TRP ki chinta karte hain...pakistaan se jayada problem to hamaare logo main he hain...agar hamaare neta log ye thaan le ki janta ki bhalai ke liye kaam karna hai...agar wo apne swarth se uper uth kar kaam kare to shayad hame ye din dekhna he nahi padta...

bhaut bhaut aabhaar aapka..aapne hamaare blog per aake hamara hausla
bhadaaya......

Gyan Dutt Pandey said...

यह पढ़ कर दिमाग में टनटनाट घण्टी बजी! सम्भव है!

Sanjay Sharma said...

N "D" TV ?

पंकज बेंगाणी said...

याद है जब मुश मियाँ आगरा आए थे तो किसे इंटरव्यु देकर गए थे!!

आज भी एनडीटीवी को पाकिस्तान में जितनी आजादी मिलती है उतनी शायद किसी अन्य भारतीय चैनल को नहीं मिलती है.

इस चैनल के एंकर भी आत्ममुग्ध रहते हैं. अपने आपको महान समझने वाले ये तथाकथित पत्रकार हर दिन अपनी फजीहत करवाते हैं.

अब और क्या कहा जाए जब इस चैनल के महानतम एंकर को भारतमाता की जय भी हिन्दूवादी नारा लगता है.

सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said...

बिलकुल सच्ची बातें लिखते हैं आप। हिन्दुस्तानियों ! सचेत हो जाओ। अपने दुश्मन को पहचानो। उसका पता यहाँ मिलेगा।

संजय तिवारी said...

मुझे तो लगा कि आप कोई जानकारी दे रहे हैं. सवाल उठाना जायज है लेकिन जब तक कुछ ठोस संबंध न बनता हो तो सवाल मजाक हो जाता है.

जितना मैं एनडीटीवी की व्यवस्था को जानता हूं वह सेकुलर चैनल है लेकिन यह कहना कि उसमें किसी दाऊद आदि का पैसा लगा हो सकता है सिर्फ मजाक ही लगता है. वही एकमात्र चैनल ऐसा है जहां आज भी अधिकांश रपटें और कार्यक्रमों की रूपरेखा पत्रकार तय करते हैं मैनेजमेन्ट नहीं. अन्यथा बाकी जगह टीआरपी की मारामारी ने कहर ढा रखा है.

ऐसे मजाक से बचना चाहिए.

dhiru singh {धीरू सिंह} said...

कुछ भी हो सकता है . हर न्यूज़ चेनल को भी अखवारो की तरह अपने अन्शाधाराको का नाम पता सार्वजनिक करे . पहले सुना था विदेशी पैसा तो लगा है एन .डी.टी .वी मे

सुमीत के झा (Sumit K Jha) said...

NDTV...ke higher level ya admin level ke saath kuch locha to hai jaroor....Mumbai hamle ke baad...ke coverage ko agar dekha jaye..to aapki baat ko bal milta hai. Aam aadmi ke laash par cricket nahi kheli ja sakti...Hum se cricket hai....NDTV ya secular(so called) dhare se nahi....Hum aur aap dekhte hai...tabhi cricket chal raha hai.....Agar in haalato me cricket kheli agyi Pakistan ke saath,to shayad ye hamari sab se bari haar hogi...jiske liye aane waali piddi...hame kabhi maaf nahi kar paayegi......

इंडियन said...

सुरेशजी हमेशा की तरह आपकी बातो से सिर्फ़ सहमत ही हुआ जा सकता है। पर इन सेकुलरों की बोलती भी बंद होनी चाहिए, उनका क्या करें???

anitakumar said...

you have a point...seems to be a strong possibility thought it is shocking...thanks for drawing our attention on this side

Sanjeet Tripathi said...

कौड़ी दूर की लाए हो बॉस पर बात मे दम है

Anil Pusadkar said...

बात मे दम तो है ।

राज भाटिय़ा said...

सुरेश जी आप की बात हमेशा दम दार ही होती है,ओर सची भी.
धन्यवाद

उन्मुक्त said...

मेरे यहां दूरदर्शन का डिश एंटिना है। इसमें मुख्यतः दूरदर्शन के चैनल आते हैं। एनडीटीवी तो नहीं आता है इसलिये मैं न उन पर कोई टिप्पणी करने की स्थिति में हूं न ही यह मेरे लिये उचित होगा पर कोई देश किसी अन्य देश किसी स्पर्धा में भाग ले अथवा नहीं इस पर एक पहलू रखना चाहूंगा।

मैं स्वयं एक खिलाड़ी रहा हूं। मुझे देश का तो नहीं, पर अपने विश्विद्यालय को कई बार, कई खेलों में, और एक बार अपने राज्य का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला। यह प्रश्न का जवाब खिलाड़ियों के परिपेक्ष में भी देखा जाना चाहिये।

भारत के क्रिकेटर पाकिस्तान खेलने जाते हैं अथवा नहीं - इससे उन पर कोई असर नहीं पड़ता। न जाने से, न तो उनकी शोहरत कम होती है, न ही उनके पैसों में कमी आती है, और न ही उनकी लोप्रियता में। वे पाकिस्तान जा कर नहीं खेलेंगे तो किसी दूसरे देश चले जायेंगे। यदि बोर्ड उन्हें भेजने की बात भी करता है और खिलाड़ी पाकिस्तान जाने के लिये आतंकवाद के कारण मना कर देते हैं तो उनकी शोहरत, लोकप्रियता में इज़ाफा ही होगा... पर क्या यह बात हर खेलों में लगती है।

एथलेटिक्स (Athletics) की सबसे महत्वपूर्ण स्पर्धा ओलम्पिक्स है पर यह चाल साल में केवल एक बार होती है। खिलाड़ी इसके लिये सालों मेहनत करते हैं। कुछ साल पहले कई देशों ने एक ओलम्पिक्स में भाग लेने के लिये अपने खिलाड़ियों को नही भेजा। वे सारे खिलाड़ी जो इसमें पदक जीत सकते थे, जिसके लिये उन्होंने कड़ी मेहनत की थी - वे उस सम्मान पाने से रह गये जो उन्हें मिलना चाहिये था।

इसी साल हो रहे बेजिंग ओलम्पिक्स को ही लें। बहुत से लोग इसमें अपने देशों को, चीन के तिब्बत पर रवैये के कारण ,भाग लेने से मना कर रहे थे। मुझे भी चीन का तिब्बत पर रवैया अनुचित लगता है। अपने देश में भी यह बात उठी थी हम इस ओलम्पिक्स में भाग न लें। इस ओलम्पिक्स में हमें हॉकी के अतिरिक्त किसी अन्य खेल में पहला स्वर्ण पदक मिला। बिन्द्रा को वह सम्मान मिला जो, यदि वे पदक न जीत पाते तो, कभी नहीं मिलता। यदि हम इस स्पर्धा में भाग न लेते तो वे हमेशा के लिये इससे वंचित रह जाते और हमारा देश भी। यह कोई जरूरी नहीं कि हम, या बिन्द्रा, अगले ओलम्पिक्स में स्वर्ण तो क्या कोई पदक भी जीत सकें - राठौर को इस बार पदक नहीं मिला। मेरे विचार से यह सवाल उतना आसान नहीं है जितन आम व्यक्ति सोचता है।

मैं यहां पर इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड और उनकी टीम की तारीफ करना चाहूंगा। वे भले ही वन डे या टेस्ट मैच हार गये पर वास्तविकता में वही जीतें है दिलों को उन्होंने ही जीता है। वे मुम्बई कान्ड के बाद भी भारत खेलने आये यह न केवल बहादुरी का कदम है पर दर्शाता है कि आतंकवाद के खिलाफ वे हमारे साथ हैं।

मैंने इस टिप्पणी से, एक पहलू रखने का प्रयत्न किया है। आशा करता हूं आप बुरा नहीं मानेंगे और इसे स्वस्थ बहस के रूप में लेंगे।

Suresh Chandra Gupta said...

आप जो कह रहे हैं उस सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता. सरकार में कुछ मंत्री और अन्य पदाधिकारी, बाबु, अन्य राजनीतिबाज, स्वघोषित धर्म-निरपेक्षी (मतलब हिंदू विरोधी), मीडिया (एनडीटीवी जैसे) पैसे के लिए कुछ भी कर सकते हैं. भारत सरकार की और से उस के एक मंत्री ने यूएन सुरक्षा परिषद् में मुंबई हमले के बारे में बयान दिया पर उस बयान में नरिमान हॉउस पर आतंकी हमले के बारे में कुछ नहीं कहा गया. यह सरकार में बैठे लोगों में से ही कुछ ने किया होगा. यहुदिओं की हत्या को इस तरह नकारना, मुस्लिम तुष्टिकरण का एक अमानवीय पक्ष है, जिस में कांग्रेस एक्सपर्ट है. केन्द्रीय जांच एजेंसी बनाना, पर एक सख्त आतंक विरोधी कानून को फ़िर नकार देना भी इसी तुष्टिकरण का हिस्सा है. ऐसे समय में भी कांग्रेस इस तुष्टिकरण से बाज नहीं आई.

काजल कुमार Kajal Kumar said...

सचाई तो यह है कि सभी न्यूज़ चैनलों की अपनी अपनी ढपली है और अपना अपना राग है. कोई भी चैनल आज तटस्थ होकर समाचार देने को तैयार नहीं है.... बल्कि वे इस तरह के विचार को ही नकार देते हैं. किसी के भी यहाँ से समाचार, चैनल के विचारों के बिना प्रसारित करना यूँ लगता है मानो यह अपराध हो. आज के यह चैनल, समाचार-चैनल कम और विचार-चैनल अधिक हैं. ये बात दीगर है कि उनके इन विचारों कि महत्ता क्या है.

Ghost Buster said...

पाकिस्तान लम्बे समय से भारत के विरुद्ध छ्द्म युद्ध लड़ रहा है. आतन्कवादियों की घुसपैठ कराने के लिये नियन्त्रण रेखा पर रुक-रुक कर गोलाबारी, देश में जगह जगह आतंकवादी हमले और बम ब्लास्ट तो गतिविधियों का फ़्रंट एन्ड है. बैक एन्ड पर है अन्तर्राष्ट्रीय कूट्नीति (जिसमें हमारे मूर्ख नेतागण हमेशा मात खाते रहे हैं), फ़ेक करेन्सी द्वारा देश के आर्थिक जगत पर हमला आदि.

लेकिन इस हथकण्डों में सब में सबसे अहम होता है कि दुश्मन के इन्टेलिजेन्शिया पर कब्जा किया जाये और वहां अपने लोग बिठाये जायें. NDTV एक ऎसा ही उपक्रम है. कोई सामान्य बुद्धि का स्वामी व्यक्ति भी सहज ही ताड़ सकता है कि यह चैनल स्पष्ट रूप से केवल पाकिस्तान के हितों के लिये काम कर रहा है.

दिल्ली में बम विस्फ़ोटों के बाद भी ऑस्ट्रेलिया ने अपना भारत दौरा रद्द नहीं किया तो पाकिस्तान की तिलमिलाहट देखते ही बनती थी. पाकिस्तानी विदेश मन्त्रालय ने प्रैस कॉन्फ़्रेंस करके ऑस्ट्रेलिया को भला-बुरा कहा. आज जब इंग्लैंड ने इस मुश्किल वक्त में भी दौरा जारी रखने का निर्णय लिया, तो जहां चारों ओर उसकी प्रशंसा हो रही है, वहीं NDTV बुक्का फ़ाड़ कर रो रहा है.

Anil Pendse अनिल पेंडसे said...

सटीक समीक्षा! ध्यानाकर्षण के लिए धन्यवाद्

Alok Singh said...

I think you are right. Most of the times NDTV always hows hindus and BJP as tresrists.

कुश said...

ऐसे लोगो से क्या कहिए..

Debashish said...
This comment has been removed by the author.
Debashish said...

फिलहाल सभी चैनलों की दिक्कत यह है कि राष्ट्रवाद (इसे युद्धोन्माद पढ़ें) की रौ में आननफानन कुछ भी करने के चक्कर में अक्सर गड़बड़ा भी रहे हैं। खबरों में NDTV के अलावा और कुछ देखने का मतलब नहीं, यह अब भी मुद्दे की खबरें देता रहता है। इंडिया टीवी और स्टार न्यूज़ देखने की बजाय टीवी न देखना पसंद करुंगा।

रही बात पाकिस्तान की, तो मेरी हमेशा से यह राय रही कि कुछ ताकते हैं जो बस पाकिस्तान और भारत में जंग देखना चाहती हैं। किसी सरफिरे तालीबानी के हाथ में न्यूक्लियर बटन पड़ गया तो करोड़ों जानें दोनों तरफ से जायेंगी, दोनों देश ५० साल आर्थिक ताकत में पिछड़ जायेंगे। युद्ध कोई मज़ाक तो नहीं है, मुख्यधारा के मीडिया ने मुंबई काँड के बाद सारा रुख belligerent यानि युद्धोन्मादी कर दिया। ठीक है अगर यह रूख दिखाने भर का भी है तो हम कम से कम यह तो समझें कि वास्तविक युद्ध असंभव है, असंभव होना भी चाहिये। जब अमरीका और ब्रिटेन का हमें साथ है तो अक्लमंदी की बात यही है कि डिप्लोमैटिक तरीके अपनाये जायें। पहली बार ऐसा हुआ है जब पाकिस्तान की सिविल सरकार ने माना है कि आतंकवाद से वे भी त्रस्त हैं, कि सेना की वजह से दिक्कतें हैं, कि तालीबानी और जिहादी अब पाकिस्तानी सेना के काबू में भी नहीं रहे। जरदारी लगातार पॉज़ीटिव बयान देते रहे हैं। एक आतंकवादी का बाप कबूल रहा है कि उसका बेटा भटक गया, एक पाकिस्तानी अखबार उसकी खबर छाप रहा है, तो हम यह तो समझें कि वे भी हमसे सहमत हैं। हर पाकिस्तानी जिहादी है वाली बात उतनी ही गलत है जैसे हम कहें कि हर मुसलमान आतंकवादी है। इंदिरा के देहांत के समय यही रुख सिक्खों के प्रति था, आज हम शर्मिंदा हो जाते हैं यह सोचकर।

मेरा तो यही मानना है कि यह बात हम समझें कि पाकिस्तान पर दबाव बनाकर, जिहादियों की आर्थिक मदद के रास्ते रोककर, पाकिस्तान की सिविल सरकार को मजबूत बना कर वास्तविक लोकतंत्र की बहाली में ही हमारी ही बेहतरी है। वाजपेयी ने भी माना था कि पड़ोसी हम चुन नहीं सकते।

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

सुरेशजी,दाऊद या किसी भ्रष्ट नेता/ब्युरोक्रेट या चोर उद्योगपति/व्यापारी को सीधे कहीं पैसे लगानें की जरूरत नहीं है,मनमोहनी अर्थव्यवस्था में अब सभी कारपोरेट सिस्टम के अनुयायी होगये हैं।
स्विस बैकों में भारतीयों का ड़ेढ लाख करोड़ रुपया जमा है।तथ्य यह भी है कि वृंदा करात की बहन राधिका प्रणयराय की पत्नी हैं।पैसा कहाँ से आ और लग रहा है यह कुछ बहुत छुपा भी नही है।सवाल तो यह है कि इसके लिए कोई बोलनें को तैयार नहीं है।हिन्दुओं को गाली देनी होगी या पूंजीवाद को गाली बकनी होगी(कुछ हद तक जायज भी) तो भांति भांति के कलम के कारीगर कागज काले करनें लगेंगे।

क्या यह आश्चर्य की बात नहीं है कि गरीबों मज़दूरों की बात करनें वाले हमारे साम्यवादी भी चुप हैं।क्या वह भी हमाम में नंगे नहीं हैं?

इकबाल हारदोमी की कम्पनीं हारदोमी एण्ड पार्टनर्स क्या है?उसका सलेम ग्रुप से क्या सम्बन्ध है?हाँ वही सलेम ग्रुप जिसे नंदीग्राम राजारहाट और सिंगूर में ठॆके दिये गये थे।यही नहीं इन दोनों का इस्लामिक इन्वेस्ट्मेन्ट ट्रस्ट/फण्ड से क्या सम्बन्ध है?

वर्तमान वैश्विक अर्थ संकट में पार्टीसिपेटरी नोट के माध्यम से जो धन भारतीय शेय़र बाजार में लग रहा था और जिसकी वल्दियत नहीं पूँछी जाती,और जो बरास्ता मलेशिय़ा और सिंगापुर से आ रहा था क्या उस पापाचार में सभी राजनैतिक दलों के पैसे साम्यवादियों सहित नहीं आ रहे थे?

एन०डी०टी०वी०में किन स्रोतों से पैसा आया और लगाया गया इसकी जाँच कौन करेगा?खासकर तब मार्क्सवादी पार्टी सत्ताधारी दल की जब बगलगीर हो रही हो?

क्या कोई इस देश की फ्रेन्चाइजी बेसिस पर चलनें वाली सरकार के CEO(मुखिया)से यह पूँछेगा कि माईबाप जरा स्विस बैंक से पूँछ्नें का कष्ट करेंगे कि भारत के किन किन कुलभूषणों का धन वहाँ जमा है?

पुलिस और सी०बी०आई० जैसी एजेन्सियों से पहले जिन खबरिया चैनलों को आतंकियों तक की पूरी जन्मकुण्ड्ली मिल जाती है,क्या यह आश्वर्य नहीं है कि वे भी गाँधी के बन्दर बनें बैठे है?क्या इसलिए कि इन मीडिया मुगल्स के यहाँ ऎसे ही भ्रष्टों का पैसा लगा है?

प्रकाश बादल said...

अगर आपका कहना सच्चा है तो बात अच्छी नहीं है हमारे देश के लोग ही अपने देश को लुटाने पर तुले हैं। छी छी।

News Eye said...

aapka lekh padkar mujhai bahut dukh pahuncha kynki mujhai laga ki aap main aur kisi aatankvadi main koi anter nahi hai
aapnai jis tarah NDTV jaisai news channel ko dawood ke paisai se chalnai wala channel bataya is baat par aapko ek din jarur apni galti mahsus hogi
agar aap cricket ko politics se na jod kar ek khel premi ki najar se dekhtai to sayad aisa likhnai ki bhool kabhi nahi kartai
par afsos ki aapke pass vo najar hi nahi hai jo ek khel premi ki hoti hai
aur haan aapnai jo apnai lekh main pakistan premion ke 3 karan diyai hai main unmai sai koi nahi hoon
main sirf ek khel premi hoon aur mujhai lagta hai ki khel jodta hai torta nahi

ho sake to apani is artical ko delet kar dena

shekhu said...

भाई सुरेश चिपलूनकर,
आपका आलेख पढ़ा... कई बार.समझने की चेष्टा की और सारे हिस्सों मे सामंजस्य बिठाने की कोशिश की.मानसिकता मेरी भी ऐसी ही है पर कुछ बातें तर्कों की दृष्टी से देखने की कोशिश करो.गिल साहब का हक बनता है क्योंकि वोह खेल मंत्री है और उनको परोक्ष-अपरोक्ष से अपनी बात कहनी है. उनकी बातो को छापना और व्याख्या करना पत्रकारिता का काम है. एन ड़ी टीवी वाले एक खास तरीके से मार्केटिंग वाली पत्रकारिता करते है उस तबके के लिए जो उनको देखता और सुनता है. सबके ग्राहक तय होते है.आप के घर मे सारे अख़बार तो आते नही होंगे और ना सारी पत्रिकाए.न आप सारे चैनल्स पर चक्करघिन्नी कर पाते होंगे.यह तयशुदा जिंदगी आपकी-मेरी और दुसरो की अलग-अलग खेमो मे बट जाती है -कांग्रेस,बीजेपी,एन ड़ी टीवी एक तरीके से यह मार्केटिंग संस्थाए है जो आपके-मेरे और आम जनता के विचारो को भुनाती है अपने अपने फायदों के लिए.हमारा जुनून भले ही ड्राइंग रूम वाला देशभक्ति जुनून हो पर सच्चा होता है ..शायद आम जिंदगी का आदमी ही विपरीत परिस्थितयों मे सच्चा देशभक्त होता है और यह उपरी तौर वाले देशभक्त मीडिया चैनल्स और राजनैतिक दल हर समय,किसी भी परिस्थितयों मे चतुर व्यापारी होते है और कुछ नही...यह तुम्हारी और हमारी जिंदगी के रुख से अपने व्यापर की दिशा मोड़ते है और तय करते है. इनकी मार्केटिंग इतनी प्रभावशाली होती है की तुम-और हम हमेशा इनके झांसे मे फँस जाते है.
एन ड़ी टीवी वालो को बाहर से पैसा क्यों चाहिए ... यह मंझे लोग है.आपकी और मेरी इतनी हैसियत नही की यह तय कर पाए की इनका नेटवर्क क्या है.यह हमें घुमाते रहेंगे और हम घूमते रहेंगे.
मुंबई पर हमला वस्तुत एक रियलिटी शो की तरह बन गया है...सीधे प्रसारण से अब तक...हम चाय की चुस्कियों की तरह से इससे गटक रहे है.गारेनटी देता हु कुछ नही होगा...और ६ महीने-एक साल मे हम और वोह क्रिकेट खेल रहे होंगे...एक मुल्क को एक व्यापारी चला रहा है और दुसरे को एक अर्थशास्त्री ...युद्ध मीडिया और नेताओ का शगूफा बना रहेगा और हम एक के बाद एक बेवकूफ बने इनकी बातें सुनेगे और उस पे तुर्रा यह की चर्चा भी करेंगे.
एक मुल्क जिसके एक दूर वाले शहर मे १०-१२ लोंडो की टोली दिवाली-होली खेल लेती है वोह भी ७२ घंटे की उसको पहले अपना डिफेन्स सुधारना होगा...कैसे ?
१)सरकार के सारे तंत्रों को अपने हाथ मे लेना...एक क्रांति से..जब मंडल के खिलाफ अपने को आग लगा सकते हो तो यहाँ पर सिर्फ़ मोमबती?
२)बताओ की तुम ताकत हो ठीक उसी तरह जैसे थाईलैंड मे हुआ...क्या नही कर सकते? जब वोह १०-१२ लोंडे ७२ घंटे मे दुनिया को बता सकते है की हमने इतने बड़े मुल्क की ले ली..तो क्या तुम अपनी सरकार को नही बता सकते...?
३) या तुम और हम शुरआत करते है..इंडिया गेट पे तख्तिया ले कर चल के अपने को आग लगा लेते है...एन डी टीवी और दुसरे झट आ जायेंगे तमाशा कवर करने...अमिताभ और आमिर लिखेंगे की मुंबई फिर जगी है...राज ठाकरे के लोंडे शायद फिर आम इन्सान बन मुंबई के बारे मे सोचे अपने आका को छोड़ कर ...सोचो शायद मुल्क मे मंडल की तरह देश भक्ति की लहर दोड़ जाए...
४) या फिर वोह आमिर की पिक्चर की तरह एन डी टीवी पर कब्जा करके देश को बता ते है कि जागो..अब तो जागो..और कैमरा के सामने अपनी बात कहने के बाद पुरे मुल्क के सामने अपने आप को गोली मार दे..शायद उसका असर होगा...
होगा की नही?
शायद नही...व्यापर की दुनिया मे देश-भक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ ड्राइंग रूम और ब्लॉग पे जिन्दा है...और हां यदा-कदा तुम-और मै मोमबती भी जला आते है.
एन डी टीवी मे दावुद इब्राहीम का पैसा लगा हो या किसी और का, कोई फर्क पड़ता है मेरे भाई?

shekhu said...

भाई सुरेश चिपलूनकर,
आपका आलेख पढ़ा... कई बार.समझने की चेष्टा की और सारे हिस्सों मे सामंजस्य बिठाने की कोशिश की.मानसिकता मेरी भी ऐसी ही है पर कुछ बातें तर्कों की दृष्टी से देखने की कोशिश करो.गिल साहब का हक बनता है क्योंकि वोह खेल मंत्री है और उनको परोक्ष-अपरोक्ष से अपनी बात कहनी है. उनकी बातो को छापना और व्याख्या करना पत्रकारिता का काम है. एन ड़ी टीवी वाले एक खास तरीके से मार्केटिंग वाली पत्रकारिता करते है उस तबके के लिए जो उनको देखता और सुनता है. सबके ग्राहक तय होते है.आप के घर मे सारे अख़बार तो आते नही होंगे और ना सारी पत्रिकाए.न आप सारे चैनल्स पर चक्करघिन्नी कर पाते होंगे.यह तयशुदा जिंदगी आपकी-मेरी और दुसरो की अलग-अलग खेमो मे बट जाती है -कांग्रेस,बीजेपी,एन ड़ी टीवी एक तरीके से यह मार्केटिंग संस्थाए है जो आपके-मेरे और आम जनता के विचारो को भुनाती है अपने अपने फायदों के लिए.हमारा जुनून भले ही ड्राइंग रूम वाला देशभक्ति जुनून हो पर सच्चा होता है ..शायद आम जिंदगी का आदमी ही विपरीत परिस्थितयों मे सच्चा देशभक्त होता है और यह उपरी तौर वाले देशभक्त मीडिया चैनल्स और राजनैतिक दल हर समय,किसी भी परिस्थितयों मे चतुर व्यापारी होते है और कुछ नही...यह तुम्हारी और हमारी जिंदगी के रुख से अपने व्यापर की दिशा मोड़ते है और तय करते है. इनकी मार्केटिंग इतनी प्रभावशाली होती है की तुम-और हम हमेशा इनके झांसे मे फँस जाते है.
एन ड़ी टीवी वालो को बाहर से पैसा क्यों चाहिए ... यह मंझे लोग है.आपकी और मेरी इतनी हैसियत नही की यह तय कर पाए की इनका नेटवर्क क्या है.यह हमें घुमाते रहेंगे और हम घूमते रहेंगे.
मुंबई पर हमला वस्तुत एक रियलिटी शो की तरह बन गया है...सीधे प्रसारण से अब तक...हम चाय की चुस्कियों की तरह से इससे गटक रहे है.गारेनटी देता हु कुछ नही होगा...और ६ महीने-एक साल मे हम और वोह क्रिकेट खेल रहे होंगे...एक मुल्क को एक व्यापारी चला रहा है और दुसरे को एक अर्थशास्त्री ...युद्ध मीडिया और नेताओ का शगूफा बना रहेगा और हम एक के बाद एक बेवकूफ बने इनकी बातें सुनेगे और उस पे तुर्रा यह की चर्चा भी करेंगे.
एक मुल्क जिसके एक दूर वाले शहर मे १०-१२ लोंडो की टोली दिवाली-होली खेल लेती है वोह भी ७२ घंटे की उसको पहले अपना डिफेन्स सुधारना होगा...कैसे ?
१)सरकार के सारे तंत्रों को अपने हाथ मे लेना...एक क्रांति से..जब मंडल के खिलाफ अपने को आग लगा सकते हो तो यहाँ पर सिर्फ़ मोमबती?
२)बताओ की तुम ताकत हो ठीक उसी तरह जैसे थाईलैंड मे हुआ...क्या नही कर सकते? जब वोह १०-१२ लोंडे ७२ घंटे मे दुनिया को बता सकते है की हमने इतने बड़े मुल्क की ले ली..तो क्या तुम अपनी सरकार को नही बता सकते...?
३) या तुम और हम शुरआत करते है..इंडिया गेट पे तख्तिया ले कर चल के अपने को आग लगा लेते है...एन डी टीवी और दुसरे झट आ जायेंगे तमाशा कवर करने...अमिताभ और आमिर लिखेंगे की मुंबई फिर जगी है...राज ठाकरे के लोंडे शायद फिर आम इन्सान बन मुंबई के बारे मे सोचे अपने आका को छोड़ कर ...सोचो शायद मुल्क मे मंडल की तरह देश भक्ति की लहर दोड़ जाए...
४) या फिर वोह आमिर की पिक्चर की तरह एन डी टीवी पर कब्जा करके देश को बता ते है कि जागो..अब तो जागो..और कैमरा के सामने अपनी बात कहने के बाद पुरे मुल्क के सामने अपने आप को गोली मार दे..शायद उसका असर होगा...
होगा की नही?
शायद नही...व्यापर की दुनिया मे देश-भक्ति सिर्फ़ और सिर्फ़ ड्राइंग रूम और ब्लॉग पे जिन्दा है...और हां यदा-कदा तुम-और मै मोमबती भी जला आते है.
एन डी टीवी मे दावुद इब्राहीम का पैसा लगा हो या किसी और का, कोई फर्क पड़ता है मेरे भाई?

R. K. Singh said...

यह एक "ओछा" आरोप है.

R. K. Singh said...

एन.डी.टी.वी. पर लगाये गए आरोपों से बिलकुल सहमत नहीं हूँ. यह एक खिसिहाट पूर्ण "ओछा"आरोप प्रतीत होता है. संजय तिवारी जी, विस्फोट कॉम की टिप्पणी से सहमत हूँ.