अमेरिका का मुँह तकती, गद्दारों से भरी पड़ी, पिलपिली महाशक्ति…
Mumbai Terror Attacks India-America and Pakistan
मुम्बई हमले को एक माह होने को आया, गत एक साल में 60 से ज्यादा बम विस्फ़ोट हो चुके, संसद पर हमले को आठ साल हो गये, कारगिल हुए दस साल बीत गये, भारत नाम की कथित “महाशक्ति” लगता है कि आज भी वहीं की वहीं है। मुझे आज तक पता नहीं कि भारत को महाशक्ति (या क्षेत्रीय महाशक्ति) का नाम किसने, कब और क्यों दिया था। महाशक्ति की परिभाषा क्या होती है, इसे लेकर भी शायद विभिन्न मत होंगे, इसीलिये किसी विद्वान(?) ने भारत को महाशक्ति कहा होगा।
चीन ने अमेरिका के जासूसी विमान को अपनी सीमा का उल्लंघन करने पर उसे रोक रखा और तब तक रोक कर रखा जब तक कि अमेरिका ने नाक रगड़ते हुए माफ़ी नहीं माँग ली। रूस, चेचन अलगाववादियों पर लगातार हमले जारी रखे हुए हैं, हाल ही में जॉर्जिया के इलाके में अपने समर्थकों के समर्थन और नई सीमाओं को गढ़ने के लिये रूस ने जॉर्जिया पर भीषण हमले किये। 9/11 के बाद अमेरिका ने न ही संयुक्त राष्ट्र से औपचारिक सहमति ली, न ही किसी का समर्थन लिया, वर्षों पहले जापान ने भी यही किया था। ब्रिटेन हजारों मील दूर अपने फ़ॉकलैण्ड द्वीप को बचाने के लिये अर्जेण्टीना से भी भिड़ गया था और उसे घुटने पर बैठाकर ही युद्ध का खत्मा किया… महाशक्तियाँ ऐसी होती हैं… अलग ही मिट्टी की बनी हुई, अपने देश का स्वाभिमान बनाये रखने के लिये किसी भी हद तक जाने वाली… इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में 1971 के आधे-अधूरे ही सही भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद गत 39 वर्षों में भारत ने अब तक क्या किया है… किस आधार पर इसे कोई महाशक्ति कह सकता है? क्या सिर्फ़ इसलिये कि यह देश सबसे अधिक संख्या में “सॉफ़्टवेयर मजदूर” पैदा करता है (पहले गन्ना कटाई के लिये यहाँ से मजदूर मलेशिया, मालदीव, फ़िजी, तंजानिया, केन्या जाते थे, अब सॉफ़्टवेयर मजदूर अमेरिका जाते हैं), या महाशक्ति सिर्फ़ इसलिये कि बहुराष्ट्रीय कम्पनियों द्वारा अपना माल खपाने के लिये यहाँ करोड़ों की संख्या में मध्यमवर्गीय मूर्ख मौजूद हैं, या इसलिये कि भारत हथियारों, विमानों का सबसे बड़ा ग्राहक है? कोई मुझे समझाये कि आखिर महाशक्ति हम किस क्षेत्र में हैं? क्या सिर्फ़ बढ़ती आर्थिक हैसियत से किसी देश को महाशक्ति कहा जा सकता है? भारत को अमेरिका बराबर की आर्थिक महाशक्ति बनने में अभी कम से कम 30 साल तो लग ही जायेंगे, फ़िलहाल हम “डॉलर” की चकाचौंध के आगे नतमस्तक हैं, फ़िर इस तथाकथित “क्षेत्रीय महाशक्ति” की सुनता या मानता कौन है? नेपाल? बांग्लादेश? श्रीलंका? म्यांमार… कोई भी तो नहीं।
मुम्बई हमलों के बाद मनमोहन सिंह जी ने देश को सम्बोधित किया था। एक परम्परा है, किसी भी बड़े हादसे के बाद प्रधानमंत्री देश को सम्बोधित करते हैं सो उन्होंने भी रस्म-अदायगी कर दी। इतने बड़े हमले के बाद राष्ट्र को सम्बोधन करते समय अमूमन कुछ “ठोस बातें या विचार” रखे जाते हैं, लेकिन सीधे-सादे प्रधानमंत्री उस वक्त भी सीधे-सादे बने रहे और माफ़ी माँगते नज़र आये। अपने सम्बोधन में उन्होंने मुख्यतः तीन बातें कही थीं, उन्होंने आतंकवादियों को धमकी की भाषा भी बड़े मक्खन लगाने वाले अन्दाज़ में दी। उन्होंने कहा कि 1) “हम आतंकवादी गुटों और उनके आकाओं को मिलने वाली आर्थिक मदद को रोकेंगे”, 2) देश में घुसने वाले हरेक संदिग्ध व्यक्ति को रोकने के उपाय किये जायेंगे, 3) हम आतंक फ़ैलाने वालों, उनकी मदद करने वालों और उन्हें पनाह देने वालों का पीछा करेंगे और उन्हें इस कृत्य की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी… सुनने में यह बातें कितनी अच्छी लगती हैं ना!!! 9/11 के बाद लगभग इसी से मिलती-जुलती बातें जॉर्ज बुश ने अपने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कही थीं, और दुनिया ने देखा कि कम से कम आखिरी दो मुद्दों पर उन्होंने गम्भीरता से काम किया है और कुछ अर्थों में सफ़ल भी हुए… यह होती है महाशक्ति की पहचान। इसके विपरीत भारत में क्या हो रहा है, बातें, बातें, बातें, समीक्षायें, मीटिंग्स, लोकसभा और राज्यसभा में बहसें, नतीजा……फ़िलहाल जीरो।
संदिग्ध गुटों को आर्थिक मदद मिलने के मुद्दे पर बस इतना ही कहा जा सकता है कि ISI और SIMI या अल-कायदा किसी बैंक या वित्तीय संस्थान के भरोसे अपना संगठन नहीं चलाते हैं, उनकी अपनी खुद की अलग अर्थव्यवस्था है, अफ़ीम, तस्करी, नकली नोटों, ड्रग्स और अवैध हथियारों की खरीद-फ़रोख्त से बनाई हुई। यकीन न आता हो तो उत्तर भारत की बैंकों की शाखाओं से निकलते 500 के नकली नोटों की बढ़ती घटनाओं पर गौर कीजिये, एक छोटे शहर के छोटे व्यापारी से 500 और 1000 के नोटों का लेन-देन कीजिये, पता चल जायेगा कि अर्थव्यवस्था से विश्वास डिगाने में महाशक्ति कामयाब हुई या ISI? और आतंकवादी देश में वैध रास्तों से तो घुसते नहीं हैं, उनके लिये मुम्बई-कोंकण के समुद्र तटों से लेकर, नेपाल, बांग्लादेश तक की सीमायें खुली हुई हैं, उन्हें कैसे रोकेंगे?
“हम आतंकवादियों का पीछा करेंगे और उन्हें सबक सिखाया जायेगा…” अब तो सभी जान गए हैं कि यह सिवाय “खोखली” धमकी के अलावा कुछ और नहीं है। विश्व देख रहा है कि भारत की सरकार अफ़ज़ल को किस तरह गोद में बैठाये हुए है और बात कर रहे हैं “पीछा करने की”… जिस प्रकार किसी हत्या के मुजरिम को कहा जाये कि आप हत्यारे को ढूँढने में पुलिस की मदद कीजिये उस प्रकार हमारे प्रधानमंत्री ने हमले के बाद ISI के मुखिया को भारत बुलावा भेजा था, क्या है यह सब? दुर्भाग्य यह है कि विपक्ष भी मजबूती से अपनी बात रखने में सक्षम नहीं है, उसके कंधे पर भी संसद पर हमला और कंधार के भूत सवार हैं। NDA ने ही संसद पर हमले के बाद सेनाओं को खामख्वाह छह महीने तक पाकिस्तान की सीमाओं पर तैनात रखा था, जिसका नतीजा सिर्फ़ इतना हुआ कि उस कवायद में भारत के करोड़ों रुपये खर्च हो गये।
अब पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये पूरा देश उतावला है, तो हमारे नेता और पार्टियाँ सिर्फ़ शब्दों की जुगाली करने में लगे हुए हैं। श्री वैद्यनाथन जी ने पाकिस्तान पर दबाव बनाने के लिये कुछ उपाय सुझाये थे – जैसे कि
1) पाकिस्तान से निर्यात होने वाले मुख्य जिंसों जैसे बासमती चावल और कालीन आदि को भारत से निर्यात करने के लिये शून्य निर्यात कर लगाया जाये या भारी सबसिडी दी जाये ताकि पाकिस्तान का निर्यात बुरी तरह मार खाये।
2) जो प्रमुख देश (ब्राजील, जर्मनी और चीन) पाकिस्तान को हथियार सप्लाई करते हैं, उन्हें स्पष्ट शब्दों में बताया जाना चाहिये कि पाकिस्तान को शस्त्र देने से हमारे आपसी सम्बन्ध दाँव पर लग सकते हैं और इन देशों की कम्पनियों को भारत में निवेश सम्बन्धी “धमकियाँ” देनी चाहिये, ताकि वे अपनी-अपनी सरकारों को समझा सकें कि पाकिस्तान से सम्बन्ध रखना ठीक नहीं है, भारत से सम्बन्ध रखने में फ़ायदा है।
3) जिस प्रकार चीन में पेप्सी-कोक के आगमन के साथ ही वहाँ हो रहे मानवाधिकार उल्लंघनों की खबरें दबा दी गई, उसी प्रकार भारत को अपने विशाल “बाजार” को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करना चाहिये।
4) पाकिस्तानी कलाकारों, क्रिकेट खिलाड़ियों को भारत प्रवेश से वंचित करना होगा ताकि दाऊद द्वारा जो पैसा फ़िल्मों और क्रिकेट में लगाया जा रहा है, उसमें उसे नुकसान उठाना पड़े।
5) भारत की कोई भी सॉफ़्टवेयर कम्पनी पाकिस्तान से जुड़ी किसी भी कम्पनी को अपनी सेवायें न दे, यदि हम सॉफ़्टवेयर में महाशक्ति हैं तो इस ताकत का देशहित में कुछ तो उपयोग होना चाहिये।
वैद्यनाथन जी ने और भी कई उपाय सुझाये हैं, लेकिन एक पर भी भारत सरकार ने शायद अभी तक विचार नहीं किया है। जो लोग युद्ध विरोधी हैं उन्हें भी यह उपाय मंजूर होना चाहिये, क्योंकि आखिर पेट पर लात पड़ने से शायद उसे अकल आ जाये। लगभग यही उपाय कश्मीर समस्या के हल के लिये भी सुझाये गये थे। भारत द्वारा कश्मीर और पाकिस्तान को जोर-शोर से प्रचार करके यह जताना चाहिये कि “हम हैं, हमारी मदद है, हमारे से सम्बन्ध बेहतर हैं तो उनकी रोटी चलेगी…वरना”, लेकिन यह इतनी सी बात भी खुलकर कहने में हमारे सेकुलर गद्दारों को पसीना आ रहा है। 
और सबसे बड़ी दिक्कत अरुंधती रॉय, अब्दुल रहमान अन्तुले, लालू-पासवान जैसे सेकुलर हैं, जिनके बारे में निश्चित तौर पर कुछ नहीं कहा जा सकता कि वे किस तरफ़ हैं? पाकिस्तान से भिड़ने से पहले इन जैसे सेकुलर लोगों से पार पाना अधिक जरूरी है। असल में भारत के “सिस्टम” में किसी की जवाबदेही किसी भी स्तर पर नहीं है, जब तक यह नहीं बदला जायेगा तब तक कोई ठोस बदलाव नहीं होने वाला। प्रधानमंत्री से जवाब माँगने से पहले खुद सोचिये कि क्या आपने मनमोहन सिंह को चुना था? नहीं, उन्हें तो मैडम ने चुना था आप पर शासन करने के लिये, फ़िर वे किसे जवाबदेह होंगे? सारा देश इस समय गुस्से, अपमान और क्षोभ से भरा हुआ है, और उधर संसद में हमारे बयानवीर रोजाना नये-नये बयान दिये जा रहे हैं, संयुक्त राष्ट्र से गुहार लगाई जा रही है, जबकि ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ने पाकिस्तान जाकर उसे आतंकवाद से लड़ने के नाम पर 6 मिलियन पाऊण्ड की मदद दे दी। इधर जनता त्रस्त है कि अब कहने का वक्त गुजर चुका, कुछ करके दिखाईये जनाब… उधर पाकिस्तान में एक चुटकुला आम हो चला है कि “जब पचास-पचास कोस दूर गाँव में बच्चा रात को रोता है तो माँ कहती है कि बेटा सो जा, सो जा नहीं तो प्रणब मुखर्जी का एक और बयान आ जायेगा…” और बच्चा इस बात पर हँसने लगता है। कुल मिलाकर स्थिति यह बन रही है कि एक पिलपिली सी “महाशक्ति”, बच्चों की तरह अमेरिका, ब्रिटेन, फ़्रांस, संयुक्त राष्ट्र से शिकायत कर रही है कि “ऊँ, ऊँ, ऊँ… देखो, देखो अंकल वो पड़ोस का बच्चा मुझे फ़िर से मारकर भाग गया… अब मैं क्या करूँ, अंकल मैं आपको सबूत दे चुका हूँ कि वही पड़ोसी मुझे रोजाना मारता रहता है…” अंकल को क्या पड़ी है कि वे उस शैतान बच्चे को डाँटें (दिखावे के लिये एकाध बार डाँट भी देते हैं), लेकिन अन्ततः उस शैतान बच्चे से निपटना तो रोजाना पिटने वाले बच्चे को ही है, कि “कम से कम एक बार” उसके घर में घुसकर जमकर धुनाई करे, फ़िर अंकल भी साथ दे देंगे…
फ़िलहाल आशा की एक किरण आगामी लोकसभा चुनाव हैं, जिसमें कांग्रेस को अपना चेहरा बचाने के लिये कोई न कोई कठोर कदम उठाने ही पड़ेंगे, क्योंकि वोटों के लिये कांग्रेस “कुछ भी” कर सकती है, और दोनो हाथों में लड्डू रखने की उसकी गन्दी आदत के कारण कोई कदम उठाने से पहले ही अन्तुले, दिग्विजय सिंह को भी “दूसरी तरफ़” तैनात कर दिया है… हो सकता है कि कांग्रेस एक मिनी युद्ध के लिये सही “टाईमिंग” का इंतजार कर रही हो, क्योंकि यदि युद्ध हुआ तो लोकसभा के आम चुनाव टल जायेंगे, तब तक कश्मीर में चुनाव निपट चुके होंगे और यदि उसके बाद अफ़ज़ल को फ़ाँसी दे दी जाये और पाकिस्तान पर हमला कर दिया जाये तो कांग्रेस के दोनो हाथों में लड्डू और दिल्ली की सत्ता होगी… जैसी कि भारत की परम्परा रही है कि हरेक बड़े निर्णय के पीछे राजनीति होती है, वैसा ही कुछ युद्ध के बारे में होने की सम्भावना है और “पीएम इन वेटिंग” सदा वेटिंग में ही रह जायें। रही आम जनता, तो उसे बिके हुए मीडिया के तमाशे से आसानी से बरगलाया जा सकता है…
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19 comments:
What the Indian politicians are indulging in is called - Angry Posturing. I would like to add the word: Empty.
What we need is to carry out surgically precise air strikes inside PoK and destroy those bloody terrorist camps. We also need to extend a hand to USA asking them to give a more active help in fighting terror, may it be Al Quida or Taliban.
I however doubt the second step that i recommended.
I still stand by the first alternative.
As far as I see, the attacks on Mumbai will also be consigned to history soon. We will all move on and the politicians will heave a sigh of relief and go back to their corruption.
There is just one thing that we need to learn from history, that we have never learnt anything from it.
आपकी बात से शत प्रतिशत सहमत हूँ. बयानबाजी बहुत हो चुकी. अब अपने बूते कुछ ठोस (सचमुच ke ठोस) कदम उठा ही लेने चाहियें. ये लडाई आर या पार होनी ही चाहिए. शांतिप्रिय (दब्बू) मुल्क के शांतिप्रिय (दब्बू) नागरिक कहलाना हमें स्वीकार्य नहीं.
आपने जोरदार लिखा है, हमारा समर्थन है.
महाशक्ति उसे कहते है जो वोटों के लिए आस्तिन के साँप पाले. कभी गाँधी ने जिन्हा को तो कभी मैडम ने अंतूले को पाला है. ऐसे तो कई उदाहरण है.
अरे इस प्रकार की बाते करना सरकार गैरकानूनी घोषित करने वाली है.जिस बात से अल्पसंख्यक नाराज होने का खतरा हो वो कैसे सोच सकती है कोई सेकुलर सरकार और फ़िर सरकार देश के लिये नही देश से कमाई करने के लिये बनती है.कभी कभी तो मुझे लगता है कि ये नेता दाऊद सरीखे लोगो से तुम मुझे बूस्ट दो मै तुम्हे धंधा दूंगा जैसे वादो से बंधे होते है.
रही बात आतंकवादियो की तो भाई सरकार मे पूरे साल भर मे हुये बम धमाको पर आतंकवादियो को कडी चेतावनी दी तो थी अब अगर अगले नही सुनते तो सोनिया जी का क्या कसूर . क्या आपके कहने से खामखा अपने अलपस्खंयको वोटरो को नाराज कर दे ?
और फ़िर इस बार जब आतंकवादियो ने मुंबई मे अमीर लोगो को निशाना बनाया तो उन्होने अमेरिका तक से शिकायत कर डाली इससे ज्यादा आप क्या चाहते हो ? आपकी वोट कितनी है आप अगर कोई नेता फ़ेता होते तो आपको भी एक आधा दरजन गार्ड दे देते जी. उम्मीद है अब आप बेकार मे सरकार की किरकिरी करने का अपने ये कार्यक्रम दुबारा नही दोहरायेगे खास इसी प्रकार के कार्यो यानी किरकिरी कराने के लिये सरकार ने पहले किरकिरे और अब अंतुले साहब को रखा हुआ है नोट करे खास देश की किरकिरी दुनिया मे कराने के लिये ही रखा हुआ है . आशा है अब आप सरकार की किरकिरी करने का ये व्यर्थ कार्य छोड कर रचनात्मक कार्यो जैसे मोमबत्ती जलाने आतंक वादियो के मानवाधिकार पर किसी चैनल मे बहस पर लगायेगे .
आपने शत प्रतिशत सही बात कही है...महाशक्ति तो छोडिए हम तो अपनी लाज तक नही बचा सकते है...अरे हम काहे की महाशक्ति हैं.......
जब जिसका मन करता है आके हमें रौंद जाता है...काहे की महाशक्ति हैं हम....
जब हमारा संसद भवन भी सुरक्षित नही है तो हम काहे की महाशक्ति हुए......
जब चाहे वो बम्ब विस्फोट कर सकते हैं....जब चाहे वो हमारी जाने ले सकते हैं....और हम कहते हैं की हम महाशक्ति हैं......
अरे लानत है हम पर की हम ऐसा नेताओं को चुन कर संसद में भेजते हैं.....लानत है हम पर जो हम एक अच्छा नेता एक अच्छा लीडर पैदा नही कर सकते...जब तक हम इमानदार नही होंगे , जब तक हम नही सुधेरेंगे हमारे नेता भी वैसे हे रहने वाले....अरे वो है कौन ??वो भी तो हम आप में से हे एक हैं....
जरुरत है ख़ुद को बदलने की...अपने नजरिये को बदलने की....तभी देश बदलेगा......
हमने क्या गुनाह किया जो हमें लपेट लिया :)
आपकी बात से सहमत हूँ, आज वही देश स्वाभिमान से खड़ा है जो अपने अस्तित्व की लड़ाई खुद लड़ता है, किसी दूसरे के कन्धे के भरोसे नही।
महाशक्ति
आपकी लेखनी के सम्मुख नतमस्तक हूँ.आपका कोटिशः आभार,इस अद्वितीय सार्थक आलेख हेतु.
शब्दशः सहमत हूँ आपसे.बहुत ही सटीक लिखा है आपने.इससे अधिक और कुछ नही कहा जा सकता.
आपकी लेखनी के सम्मुख नतमस्तक हूँ.आपका कोटिशः आभार,इस अद्वितीय सार्थक आलेख हेतु.
शब्दशः सहमत हूँ आपसे.बहुत ही सटीक लिखा है आपने.इससे अधिक और कुछ नही कहा जा सकता.
आपने देश को आईना दिखाया है लेकिन रीढविहीन लोगों से कोई उम्मीद नहीं की जा सकती.
जबर्दस्त लेखन.
हम महाशक्ति नहीं अक्षम हैं। इसीलिए बेचैन हैं। आपसे पूरी तरह सहमत।
पिलपिली महाशक्ति...पिल्ल...पिली...क्या सटीक विश्लेषण है...
आप का लेख एक दम से सटीक है, बिलकुल सच लिखा है आप ने लेकिन आम नगरिक को भी जागरुक होना चाहिये??? इतना कुछ होने के बाद भी यह कग्रेस फ़िर से दिल्ली मे जीत गई... जब जीत उस के कदमो मे खुद वा खुद आती है तो उसे क्या देश के बारे सोचने की, ओर जो जनता उसे जीताती है वो तो मरती है साथ मै देश के अन्य नागरिको को भी मरवाती है, सब से पहले जनता हो जागरुक होना चाहिये.
धन्यवाद
धारदार लिखा है दादा.
लेकिन पहले ज़रा मोमबत्तियों की सेल
तो बढ़ा लें फ़िर युध्द वुध्द और महाशक्ति आदि के बारे में सोचेंगे.
थोड़ा इंतज़ार कीजिये करकरे,उन्नीकृष्णन आदि ब्राँडनेम की कैण्डल बाज़ार में तो आ जाने दीजिये.
हम सब शब्दों की जगलरी कर रहे हैं दादा.
मेरी प्रतिक्रिया पढ़ने वाले ज़रा समय निकाल कर रात साढ़े आठ बजे आसपास बीबीसी उर्दू सर्विस सुनें , मालूम पड़ जाएगा सुरेश भाई ने जो बातें कहीं क्यों कहना ज़रूरी है और पाकिस्तानी अवाम,विशेषज्ञ,मीडिया और राजनेता किस तरह की आग उगल रहे हैं भारत के खिलाफ़.
भाई सुरेश चिपलूनकर,
अब से पहले मे सोचता था की ब्लोग्वानी और उसमे लिखने वाले फुर्सुतिया किस्म के लोग होते है.आप अकेले लगे भीड़ मे अलहदा . आप ज्यादा से ज्यादा लोगो तक पहुंचे, मै अपने सरे दोस्तों को यह लिंक भेज रहा हू. आप अपने इस लेख को ज्यादा जगह पर रखिये, एक प्रति प्रधानमंत्री कार्यालय एक ग्रह विभाग और एक विदेश मंत्रालय भिजवाए. और जितने अख़बार और पत्रिकाए है सब मे छापिये...इस मुल्क मे बहरापन और अंधापन ज्यादा है...शायद ज्यादा मेहनत लगे...
आपकी लेखनी को ढेर सारा साधुवाद ...
"फ़िर इस तथाकथित “क्षेत्रीय महाशक्ति” की सुनता या मानता कौन है? नेपाल? बांग्लादेश? श्रीलंका? म्यांमार… कोई भी तो नहीं।"
सुरेश जी,
इस संसार की रीति यही है कि जब तक कोई मनवाये नहीं, दूसरा मानता नहीं। भारत महाशक्ति तो है पर वह इस सत्य को मनवाना नहीं चाहता। गांधी की अहिंसा और क्षमा का पाठ हमें ऐसे पढ़ाया गया है कि हमारा ब्रेनवाश हो गया है और हम गीता में दिये गये कृष्ण के उपदेश को भूल चुके हैं। हमें अपनी संस्कृति सभ्यता को भुलवाने के लिये मुगलों और अंग्रेजों ने तो षड़यंत्र रचा ही, स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हमारे लोगों ने भी यही किया।
यदि हम सब स्वयं को महाशक्ति मनवाने की ठान लें तो संसार की कोई भी शक्ति नहीं है जो हमें रोक सके। यदि हम सब स्वयं को महाशक्ति मनवाने की ठान लें तो संसार की कोई भी शक्ति नहीं है जो हमें रोक सके। हमें कमजोर बनाने में हमारी शिक्षा ही का ही हाथ है।
सहमत हूँ आपसे. भारत महाशक्ति नहीं महाभक्त (सोनिया, अमेरिका) देश है...
सुरेशजी।
विचारो मे सटिकता झलकति है। आपने अच्छा लिखा है। हमे चिन्तन करने कि जरुरत है।
*****EXCELLENT
aapse puri tarah sahmat hun.
kya karen kuch samajh nahi aata.
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