Tuesday, December 30, 2008

भारत को दस लाख “माधवन” चाहिये…

IIT Engineer Farmer India’s Food Crisis

“तकनीकी” भारत को बदल रही है यह हम सब जानते हैं, लेकिन यदि तकनीक का उपयोग भारत की मूल समस्याओं को दूर करने में हो जाये तो यह सोने में सुहागा होगा। हम अक्सर भारत के आईआईटी पास-आउट छात्रों के बारे में पढ़ते रहते हैं, उनकी ऊँची तनख्वाहों के बारे में, उनके तकनीकी कौशल के बारे में, विश्व में उनकी प्रतिभा के चर्चे के बारे में भी… गत कुछ वर्षों में आईआईटी छात्रों में एक विशिष्ट बदलाव देखने में आ रहा है, वह है मोटी तनख्वाह वाली नौकरियों को ठोकर मारकर “अपने मन का काम करना”, उनमें भारत को आमूलचूल बदलने की तड़प दिखाई देने लगी है और भले ही अभी इनकी संख्या कम हो, लेकिन आने वाले कुछ ही सालों में यह तेजी से बढ़ेगी…

पहले हम देख चुके हैं कि किस तरह बिट्स पिलानी का एक छात्र बहुराष्ट्रीय कम्पनी की नौकरी को ठोकर मारकर चेन्नई में गरीबों के लिये सस्ती इडली बेचने के धंधे में उतरा और उसने “कैटरिंग” का एक विशाल बिजनेस खड़ा कर लिया… लेकिन यह काम श्री माधवन सालों पहले ही कर चुके हैं… जी हाँ, बात हो रही है चेन्नई के नज़दीक चेंगलपट्टू में खेती-किसानी करने वाले आईआईटी-चेन्नई के पास आऊट श्री आर माधवन की… ONGC जैसे नवरत्न कम्पनी की नौकरी को छोड़कर खेती के व्यवसाय में उतरने वाले आर माधवन एक बेमिसाल शख्सियत हैं… उनकी सफ़लता की कहानी कुछ इस प्रकार है…

माधवन जी को बचपन से ही पेड़-पौधे लगाने, सब्जियाँ उगाने में बेहद रुचि थी, किशोरावस्था में ही उन्होंने कई बार अपनी माँ को खुद की उगाई हुई सब्जियाँ लाकर दी थीं और माँ की शाबाशी पाकर उनका उत्साह बढ़ जाता था। बचपन से उनका सपना “किसान” बनने का ही था, लेकिन जैसा कि भारत के लगभग प्रत्येक मध्यमवर्गीय परिवार में होता है कि “खेती करोगे?” कमाओगे क्या? और भविष्य क्या होगा? का सवाल हरेक युवा से पूछा जाना लाजिमी है, इनसे भी पूछा गया। परिवार के दबाव के कारण किसान बनने का कार्यक्रम माधवन को उस समय छोडना पड़ा। उन्होंने आईआईटी-जेईई परीक्षा दी, और आईआईटी चेन्नई से मेकेनिकल इंजीनियर की डिग्री प्राप्त की। जाहिर है कि एक उम्दा नौकरी, एक उम्दा कैरियर और एक चमकदार भविष्य उनके आगे खड़ा था। लेकिन कहते हैं ना कि “बचपन का प्यार एक ऐसी शै है जो आसानी से नहीं भूलती…”, और फ़िर आईआईटी करने के दौरान किसानी का यह शौक उनके लिये “आजीविका के साथ समाजसेवा” का रुप बन चुका था। ONGC में काम करते हुए भी उन्होंने अपने इस शौक को पूरा करने की “जुगत” लगा ही ली। समुद्र के भीतर तेल निकालने के “रिग” (Oil Rig) पर काम करने वालों को लगातार 14 दिन काम करने पर अगले 14 दिनों का सवैतनिक अवकाश दिया जाता है, माधवन ने यह काम लगातार नौ साल तक किया। 14 दिन तक मेकेनिकल इंजीनियर अगले 14 दिन में खेती-किसानी के नये-नये प्रयोग और सीखना। वे कहते हैं कि “मुझे मेकेनिकल इंजीनियरिंग से भी उतना ही लगाव है और खेती में इंजीनियरिंग और तकनीक का अधिकाधिक उपयोग करना चाहता था। मेरा मानना है कि किसी भी अन्य शिक्षा के मुकाबले “इंजीनियरिंग” की पढ़ाई खेती के काम में बहुत अधिक उपयोगी साबित होती है। मैंने भी खेत में काम करने, निंदाई-गुड़ाई-कटाई के लिये सरल से उपकरणों का घर पर ही निर्माण किया। अन्न-सब्जियाँ उगाने में मेहनत 20% और इंजीनियरिंग तकनीक 80% होना चाहिये।

जब मैंने पिता से कहा कि इतने सालों की नौकरी बाद अब मैं खेती करना चाहूँगा, उस वक्त भी उन्होंने मुझे मूर्ख ही समझा था। चार साल की नौकरी में मैंने इतना पैसा बचा लिया था कि चेन्नई के निकट चेंगलपट्टू गाँव में 6 एकड़ जमीन खरीद सकूँ, सन् 1989 में गाँव में पैण्ट-शर्ट पहनकर खेती करने वाला मैं पहला व्यक्ति था, और लोग मुझे आश्चर्य से देखते थे…”। माधवन जी को किसी ने भी खेती नहीं सिखाई, परिवार का सहयोग मिलना तो दूर, ग्राम सेवक से लेकर कृषि विश्वविद्यालय तक ने उनके साथ असहयोग किया। चार साल तक वे अपने खेत में खेती-किसानी-फ़सल को लेकर विभिन्न प्रयोग करते रहे। 6 एकड़ में उनकी सबसे पहली फ़सल मात्र 2 टन की थी और इससे वे बेहद निराश हुए, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।

1996 में उनके जीवन का “टर्निंग पॉइंट” साबित हुई उनकी इज़राइल यात्रा। उन्होंने सुन रखा था कि “टपक-सिंचाई” (Drip Irrigation) और जल-प्रबन्धन के मामले में इज़राइल की तकनीक सर्वोत्तम है। इज़राइल जाकर उन्होंने देखा कि भारत में एक एकड़ में एक टन उगने वाली मक्का इज़राइली एक एकड़ में सात टन कैसे उगाते हैं। जितनी जमीन पर भारत में 6 टन टमाटर उगाया जाता है, उतनी जमीन पर इज़राईली लोग 200 टन टमाटर का उत्पादन कर लेते हैं। उन्होंने इज़राइल में 15 दिन रहकर सारी तकनीकें सीखीं। वे कहते हैं कि “इज़राइलियों से मैंने मुख्य बात यह सीखी कि वे एक पौधे को एक इंडस्ट्री मानते हैं, यानी कि एक किलो मिरची पैदा करने वाला पौधा उनके लिये एक किलो की इंडस्ट्री है। सच तो यही है कि हम भारतवासी पानी की कद्र नहीं जानते, भारत में किसानी के काम में जितना पानी का अपव्यय होता है वह बेहद शर्मनाक है…। 2005 के आँकड़ों के अनुसार भारत में फ़सलों में जितना काम 1 लीटर पानी में हो जाना चाहिये उसके लिये 750 लीटर पानी खर्च किया जाता है…”।

इज़राइल में उन्हे मिले एक और हमवतन, डॉ लक्ष्मणन जो एक तरह से उनके “किसानी-गुरु” माने जा सकते हैं। कैलिफ़ोर्निया में रहने वाले डॉ लक्ष्मणन पिछले 35 सालों से अमेरिका में खेती कर रहे है और लगभग 60,000 एकड़ के मालिक हैं। उन्होंने माधवन की जिद, तपस्या और संघर्ष को देखकर उन्हें लगातार “गाइडेंस” दिया। उनसे मिलकर माधवन को लगा कि पैसे के लिये काम करते हुए यदि मन की खुशी भी मिले तो काम का आनन्द दोगुना हो जाता है। उस जमाने में न तो इंटरनेट था न ही संचार के आधुनिक माध्यम थे, इस कारण माधवन को लक्ष्मणन से संवाद स्थापित करने में बड़ी मुश्किलें होती थीं और समय ज़ाया होता था। हालांकि आज की तारीख में तो माधवन सीधे “स्काईप” या “गूगल टॉक” से उन्हें अपनी फ़सलों की तस्वीरें दिखाकर दो मिनट में सलाह ले लेते हैं। नई-नई तकनीकों से खेती करने में मन की खुशी तो थी ही, धीरे-धीरे पैसा भी मिलने ही लगा। लगभग 8 साल के सतत संघर्ष, घाटे और निराशा के बाद सन् 1997 में उन्हें पहली बार खेती में “प्रॉफ़िट” हुआ। माधवन बताते हैं “इतने संघर्ष के बाद भी मैंने हार नहीं मानी, मेरा मानना था कि आखिर यह एक सीखने की प्रक्रिया है और इसमे मैं गिरूंगा और फ़िर उठूंगा, भले ही कोई मुझे सहारा दे या ना दे, मुझे स्वयं ही लड़ना है और जीतकर दिखाना है”। भारत में कृषि शिक्षा की बात करते समय उनका दर्द साफ़ झलकता है, “भारत के कृषि विश्वविद्यालयों का समूचा पाठ्यक्रम बदलने की आवश्यकता है, भारत के अधिकतर कृषि विश्वविद्यालय खेती करना नहीं सिखाते, बल्कि बैंकों से लोन कैसे लिया जा सकता है- यह सिखाते हैं। उनकी तकनीकें और शिक्षा इतनी पुरानी ढर्रे वाली और जमीनी हकीकतों से कटी हुई है कि कृषि विश्वविद्यालय से निकला हुआ एक स्नातक खेती करने की हिम्मत तक नहीं जुटा सकता। गाँवों के असली हालात और कृषि पाठ्यक्रमों के बीच भारी “गैप” है…”।

अगस्त में धान की खेती से उनका वार्षिक सीजन शुरु होता है, दिसम्बर तक वह फ़सल तैयार हो जाती है तब वे फ़रवरी तक सब्जियाँ उगाते हैं, जब फ़रवरी में वह फ़सल निकल आती है तो सूखा प्रतिरोधी तेल-बीज की फ़सलों जैसे तिल और मूंगफ़ली के लिये खेत खाली हो जाते हैं, मई में इसकी फ़सल लेने के बाद वे एक माह तक विभिन्न सेमिनारों, विदेश यात्राओं के जरिये खेती की नई तकनीकें और नई फ़सलों के बारे में जानकारी लेने में समय बिताते हैं। जून-जुलाई में वापस अपने खेत पर पहुँचकर अगले सीजन की तैयारी में लग जाते हैं। 1999 में उन्होने और 4 एकड़ जमीन खरीद ली। फ़िलहाल उनका लक्ष्य प्रति एकड़ एक लाख रुपये कमाने का है जिसका “आधा टारगेट” वे हासिल कर चुके हैं, यानी फ़िलहाल वे प्रति एकड़ 50,000 रुपये की कमाई कर पा रहे हैं। फ़सलें बेचने के लिये उनके पास खुद की एक जीप और ट्रॉलर है, वे सीधे अपनी फ़सल ग्राहक को बेचते है, बगैर किसी बिचौलिये के। अब तो आसपास के लोग उन्हें आवश्यकतानुसार पहले ही चावल का ऑर्डर दे देते हैं, और माधवन उन्हें खुशी-खुशी पूरा कर देते है, ग्राहक भी कम भाव मिलने से खुश रहता है। उनके खेत के प्रत्येक एकड़ की दस प्रतिशत जमीन विभिन्न प्रयोगों के लिये होती है, वे अलग-अलग फ़सलों पर तरह-तरह के प्रयोग करते रहते हैं, कुछ सफ़ल होते हैं और कुछ असफ़ल। भविष्य की योजनानुसार वे कम से कम 200 एकड़ जमीन खरीदकर उस पर “फ़ूड प्रोसेसिंग” का कारखाना शुरु करना चाहते हैं, और उनका दावा है कि विभिन्न फ़ूड प्रोसेसिंग इकाईयाँ खुद-ब-खुद आयेंगी और वे अपने गाँव को समृद्ध बनाने में सफ़ल होंगे। उनका कहना है कि सबसे पहला लक्ष्य होना चाहिये फ़सल की प्रति एकड़ लागत में कमी करना। उससे पैदावार भी अधिक होगी और सस्ती भी होगी, जिससे निर्यात भी बढ़ाया जा सकता है। उनके दिल में भारत के गरीबों के लिये एक तड़प है, वे कहते हैं “अमेरिका में चार घंटे काम करके एक श्रमिक तीन दिन की रोटी के लायक कमाई कर सकता है, जबकि भारत के गाँवों में पूरा दिन काम करके भी खेती श्रमिक दो वक्त की रोटी नहीं जुटा पाता। संयुक्त राष्ट्र की एक रिपोर्ट के अनुसार विश्व की लगभग 65% जनसंख्या कुपोषण या अल्पपोषण से ग्रस्त है, जिसमें भारत के नागरिकों की संख्या सर्वाधिक है। भारत के दस वर्ष से कम 49% बच्चे कुपोषण से पीड़ित हैं, उनकी भूख मिटाना मेरा लक्ष्य है, क्योंकि यदि इस एक पूरी की पूरी भूखी पीढ़ी को हमने नज़र-अंदाज़ कर दिया तो यह एटम बम से भी खतरनाक हो सकती है।

माधवन के जीवन का एक और स्वर्णिम क्षण तब आया जब पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम उनके खेत पर उनसे मिलने और प्रयोगों को देखने गये, राष्ट्रपति से तय 15 मिनट की मुलाकात दो घण्टे में बदल गई, और तत्काल कलाम साहब के मुँह से निकला कि “भारत को कम से कम दस लाख माधवन की आवश्यकता है…”, स्वभाव से बेहद विनम्र श्री माधवन कहते हैं कि यदि मैं किसी उद्यमशील युवा को प्रेरणा दे सकूँ तो यह मेरे लिये खुशी की बात होगी…

इस खबर का स्रोत इस जगह है…
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चलते-चलते : सन् 2008 बीतने को है, हो सकता है कि इस वर्ष की यह अन्तिम ब्लॉग पोस्ट हो… संयोग से 30 दिसम्बर 2007 को भी मैंने फ़ुन्दीबाई सरपंच की एक ऐसी ही पोस्ट (यहाँ क्लिक कर पढ़ें) लिखी थी, इस प्रकार की सकारात्मक और प्रेरणादायी पोस्ट लिखने हेतु यही उत्तम अवसर है, 2008 में कई अच्छी-बुरी घटनायें घटीं, नेताओं ने हमेशा की तरह निराश ही किया, लेकिन माधवन और फ़ुन्दीबाई सरपंच (एक आईआईटी इंजीनियर और दूसरी अनपढ़) जैसे लोग उम्मीद की किरण जगाते हैं, निराशा से उबारते हैं, और हमें आश्वस्त करते हैं कि बुराई का अंधेरा कितना ही गहरा हो, अच्छाई का एक दीपक उसे हरा सकता है…। इस वर्ष मुझे पाठकों का भरपूर स्नेह मिला, मेरे सभी स्नेही पाठकों, ब्लॉगर मित्रों, इष्ट मित्रों को आगामी अंग्रेजी नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें… स्नेह बनाये रखें और माधवन जैसे लोगों से प्रेरणा लें… फ़िर मिलेंगे अगले वर्ष… सभी को नववर्ष की हार्दिक शुभकामनायें…

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27 comments:

PD said...

आज का सूचना प्रद लेख अच्छा लगा..

संजय बेंगाणी said...

शानदार.


साथ ही कृषि विद्यालय सहित भारत की तमाम शिक्षा व्यवस्था ही समय से ताल नहीं मिला पाती.

स्वाति said...

अत्यन्त प्रेरणा -दायक . बिल्कुल सही बात है की भारत को ऐसे १० लाख तो क्या बल्कि १० करोड़ से भी ज्यादा माधवन जैसे व्यक्ति चाहिए , उन किसान पुत्रो को सीख लेना चाहिए जो पढ़ लिख कर खेती को हेय समझते है .
बधाई .
नए वर्ष की सभी को शुभकामनाये ....

राधिका बुधकर said...

यह पोस्ट वाकई प्रेरणादायी और अति उत्तम हैं .आपको बहुत बहुत बधाई. सच में भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता हैं ,लेकिन सबसे बुरी हालत कृषि और कृषको की ही हैं ,अगर माधवन जी की तरह लोग और भी कृषि क्षेत्र में आए तो भारत इस क्षेत्र में बहुत आगे बढेगा .

sareetha said...

किसी भी तकनीक को सीखने के लिए किताबी जानकारी काफ़ी नहीं । अनुभव की पाठशाला ही सही रास्ता बता सकती है । जानकारों का काम है सिर्फ़ पांच सितारा होटलों में बैठकर शब्दों की जुगाली करना ।
भारत को बुनियादी तौर पर खेती पर ही सबसे ज़्यादा ध्यान देना चाहिए । कांक्रीट के जंगल उगा कर तिजोरियां भरने की बजाय खेतों में लहलहाती फ़सलों के माध्यम से देश के हर नागरिक को उसका हक देने की कोशिश होना चाहिए ।
पानी आने वाले वक्त में बेशकीमती और दुर्लभ होगा । लोग इस अनमोल धरोहर के साथ जिस बेरहमी से पेश आ रहे हैं वो बेहद अफ़सोसनाक है । इज़राइल में पानी की बूंद बूंद का महत्व है । पानी को की मर्तबा रीसाइकल करके इस्तेमाल किया जाता है और एक हम हैं हज़ारों लीटर पानी फ़्लश और नालियों में बहा देते हैं ।

मैथिली गुप्त said...

माधवन और फुन्दी बाई जैसों के बारे में पढ़ना बहुत अच्छा लगता है

COMMON MAN said...

बहुत प्रेरणादायक लेख.आपके लिये साधुवाद.

mahashakti said...

बहुत ही अच्‍छा और सार्थक लेख

आज भारत को विकास की बहुत जरूरत है, यह विकास नई विधाओ के बल पर मिल सकता है।

Alok Nandan said...

किसानी जीवन को उर्जा देने वाला आलेख, भारत का सारा पाढ्यक्रम बदलने की जरूरत है।

Amit said...

बहुत हे सूचना प्रद लेख रहा....अच्छा लगा पढ़ कर

पंगेबाज said...

ब्लोगिंग आप भी करते है और मै तथा मेरे जैसे और भी करते है पर सही बात यही है हम सभी यहा या तो भडास निकालते है या फ़िर इधर उधर की कविताये चर्चा आपस मे एक दूसरे की खिचाई या बडाई के अलावा कुच नही करते . लेकिन आप वाकई मे हर बार कडी मेहनत कर हमारे लिये कभी पथ प्रर्दशक कभॊ अथाह सोचने का सामान ले आते है . बधाई हो जी आपको वाकई आपही की ब्लोगिंग असली ब्लोगिंग है

पंकज बेंगाणी said...

आपकी ब्लॉगिंग से लाभ मिल रहा है. अच्छा लेख . प्रेरणादायक

जी.के. अवधिया said...

अत्यन्त प्रेरणास्पद लेख लिखा है आपने सुरेश जी। मेरी यही ईश्वर से प्रार्थना करूँगा कि वह भारत को दस लाख माधवन दे कर आपकी इच्छा को पूर्ण करे।

राज भाटिय़ा said...

बहुत ही अच्छा लगा पढ कर.
धन्यवाद

सुमन्त मिश्र ‘कात्यायन’ said...

अत्यन्त प्रेरणा दायक और ज्ञानवर्द्धक।आप और माधवन जी दोनों को धन्यवाद।

eSwami said...

बहुत बढिया आलेख! धन्यवाद.
यूं ही लिखते रहें!

वर्षा said...

मैं तो हॉलीवुड की फिल्मों में किसी पात्र को खेती करते देखती और उनकी लाइफस्टाइल जो किसी इंजीनियर से कम न होती, तो लगता कि हमारे यहां भी ऐसा ही होना चाहिए। खेती अनपढ़ों का काम नहीं माना जाना चाहिए। माधवन जी के बारे में पढ़कर लगा ऐसा हो रहा है, मुझे लगता है हिंदी-अंग्रेजी की तरह खेती के बारे में आधारभूत जानकारी पाठ्यक्रम में शामिल होनी चाहिए, फिजिक्स-कैमेस्ट्री की तरह इसके भी प्रैक्टिकल होने चाहिए, फिर वृक्षारोपण अभियान की जरूरत भी नहीं पड़ेगी।

Savitari said...

It is very informative and raising the hope of bright future. Suresh Ji, you have finished the year in a positive way, let us hope this year Mother India will produce a number of "Madhvans" to serve and save her kisan sons. It is right that Agriculture UNiversities are burden on the country and are working for "Loan companies". India should get rid of these universities. Only Madhavans will free India from these Univs. Congratulations on the best writeup and wish you a happy new year to progress further and further . Savitari Devi

Kapil said...

सुरेशजी,
उम्‍मीद है इस साल पहले से ज्‍यादा तीखी बहसें जारी रहेंगीं। नये साल की मुबारकवाद कबूल फरमाएं।
नया वर्ष
नयी उम्‍मीदों,
नयी तैयारियों
नयी शुरुआतों के नाम,
पराजय की घड़ी में भी
विजय के स्‍वप्‍नों के नाम,
लगातार लड़ते रहने की
जिद के नाम,
संकल्‍पों के नाम जीवन,
संघर्ष और सृजन के नाम!!!

नया वर्ष युवा दिलों के नाम,
साहसिक यात्राओं के नाम,
सक्रिय ज्ञान के नाम,
न्‍याय-युद्ध में भागीदारी की
तत्‍परता के नाम,
सच्‍चे प्‍यार के नाम,
मानवता के भविष्‍य में
उत्‍कट आस्‍था के नाम!!!

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत ही प्रेरणादायक लेख लिखा है आपने.
सचमुच माधवन जैसे लोग ही इस देश मे उन्नति की नींव रख सकते हैं ओर दूसरों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं.
आपको एवं आपके समस्त मित्र/अमित्र इत्यादी सबको नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाऎं.

Anil Pendse अनिल पेंडसे said...

ब्लोगिंग का अत्यन्त उपयोगी , प्रेरणादायी , सकारात्मक रूप बताने के लिए धन्यवाद्
आपकी अगली पोस्ट की प्रतीक्षा में !!!!

jayram said...

namaste ! bahut-bahut sadhuwaad. rashtra ko jagte hua sone se aagaah karne ka aapka kaam wakai anukaraniy hai. aapke paas waqt ho to 12 jan ko delhi university main aayojit rashtrawadi karyakram main padharen . aaj sabhi rashtrawadi tatwo ko ek saath ek maanch par aana chahiye. hum kab tak yun hi aalag-alag prayaas karte rahenge . ham delhi samet pure bharat main ek aandolaan khada kare ki pahel kar chuke hain aapka sahyoog hame apekshit hai.

अजित वडनेरकर said...

सूचनाप्रद, प्रेरणादायी आलेख..
शुक्रिया...

अशोक पाण्डेय said...

सुरेश जी,
सचमुच देश को आर माधवन जैसे सपूतों की ही जरूरत है।
एक किसान होने के नाते मेरे लिए यह आलेख विशेष रूप से प्रेरणादायी है। इस उत्‍कृष्‍टतम पोस्‍ट के लिए आपको कोटिश: नमन और धन्‍यवाद।

प्रकाश बादल said...

सही कहा आपने बिल्कुल सटीक, सहमत हूं आपकी बातों से। नव वर्ष की शुभकामनाएं।

आनंद said...

एक अत्‍यंत प्रेरक लेख लिखने के लिए आपका धन्‍यवाद। ईश्‍वर इसी तरह आपके लेखनी की धार बनाए रखे और आप इसी तरह लिखते रहें।


नववर्ष शुभ हो।

- आनंद

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया व प्रेरणादायक आलेख।